शनिवार, 22 सितंबर 2012

नामकरण संस्कार

बाल्यावस्था के संस्कार- नामकरण

  नामकरण एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संस्कार है जीवन में व्यवहार का  सम्पूर्ण आधार नाम पर ही निर्भर होता है
     नामाखिलस्य व्यवहारहेतुः शुभावहं कर्मसु भाग्यहेतुः
     नाम्नैव कीर्तिं लभेत मनुष्यस्ततः प्रशस्तं खलु नामकर्म।-बी.मि.भा. 1
उपर्युक्त स्मृतिकार बृहस्पति के वचन से प्रमाणित है कि व्यक्ति संज्ञा का जीवन में सर्वोपरि महत्त्व है अतः नामकरण संस्कार हिन्दू जीवन में बड़ा महत्त्व रखता है।
शतपथ ब्राह्मण में उल्लेख है कि
      तस्माद्‌ पुत्रास्य जातस्य नाम कुर्यात्‌
      पिता नाम करोति एकाक्षरं द्वक्षरंत्रयक्षरम्‌ अपरिमिताक्षरम्‌ वेति-वी.मि.
       द्वक्षरं प्रतिष्ठाकामश्चतुरक्षरं ब्रह्मवर्चसकामः
प्रायः बालकों के नाम सम अक्षरों में रखना चाहिए। महाभाष्यकार ने व्याकरण के महत्व का प्रतिपादन करते हुए नामकरण संस्कार का उल्लेख किया ।
याज्ञिकाः पठन्ति-    ''दशम्युतरकालं जातस्य नाम विदध्यात्‌
                  घोष बदाद्यन्तरन्तस्थमवृद्धं त्रिापुरुषानुकम  नरिप्रतिष्ठितम्‌।
                  तद्धि प्रतिष्ठितमं भवति।
                  द्वक्षरं चतुरक्षरं वा नाम कुर्यात्‌ न तद्धितम्‌ इति।
                 न चान्तरेण व्याकरणकृतस्तद्धिता वा शक्या विज्ञातुम्‌।-महाभाष्य
उपर्युक्त कथन में तीन महत्त्वपूर्ण बातों का उल्लेख है-
(1) शब्द रचना (2) तीन पुस्त के पुरखों के अक्षरों का योग (3) तद्धितान्त नहीं होना चाहिए अर्थात्‌ विशेषणादि नहीं कृत्‌ प्रत्यान्त होना चाहिए।
विधि-विधान-गृह्य सूत्रों के सामान्य नियम के अनुसार नामकरण संस्कार शिशु के जन्म के पश्चात्‌ दसवें या बारहवें दिन सम्पन्न करना चाहिए -
         द्वादशाहे  दशाहे वा जन्मतोऽपि त्रायोदशे।
         षोडशैकोनविंशे वा द्वात्रिांशेवर्षतः क्रमात्‌॥
संक्रान्ति, ग्रहण, और श्राद्धकाल में संस्कार मंगलमय नही माना जाता। गणेशार्चन करके संक्षिप्त व्याहृतियों से हवन सम्पन्न कराकर कांस्य पात्रा में चावल फैलाकर पांच पीपल के पत्तों पर पांच नामों का उल्लेख करते हुए उनका पद्द्रचोपचार पूजन करे। पुनः माता की गोद में पूर्वाभिमुख बालक के दक्षिण कर्ण में घरके बड़े पुरुष द्वारा पूजित नामों में से निर्धारित नाम सुनावे। हे शिशो! तव नाम अमुक शर्म-वर्म गुप्त दासाद्यस्ति'' आशीर्वचन निम्न ऋचाओं का पाठ-
''क्क वेदोऽसि येन त्वं देव वेद देवेभ्यो वेदोभवस्तेन मह्यां वेदो भूयाः। क्क अङ्‌गादङ्‌गात्संभवसि हृदयादधिजायते आत्मा वै पुत्रा नामासि सद्द्रजीव शरदः शतम्‌'
  गोदान-छाया दान आदि कराया जाय। लोकाचार के अनुसार अन्य आचार सम्पादित किये जायें।
बालिकाओं के नामकरण के लिए तद्धितान्त नामकरणकी विधि है। बालिकाओं के नाम विषमाक्षर में किये जायें और वे आकारान्त या ईकारान्त हों। उच्चारण में सुखकर, सरल, मनोहर मङ्‌गलसूचक आशीर्वादात्मक होने चाहिए।
      स्त्रीणां च सुखम्‌क्रूरं विस्पष्टार्थं मनोहरम्‌।
      मत्त्ल्यं  दीर्घवर्णान्तमाशीर्वादाभिधानवत्‌। - वी.मि.