सोमवार, 20 जनवरी 2014

संस्कृत का वैश्वीकरण एवं व्यावसायिकता

           आज विश्व के समक्ष वैश्वीकरण का सूत्रपात हो चुका है। ऐसी दशा में हमें संस्कृत को एक नये रूप में प्रस्तुत करना होगा। हमें आधुनिक दृष्टि से वैदिक  विज्ञानों के अनेक पहलुओं को सर्वाधिक परिष्कृत रूप में प्रस्तुत करना होगा। हम विभिन्न कालों में संस्कृत भाषा में निहित ज्ञानविज्ञान, चिकित्सा विज्ञान को अपने अध्ययन, शोधों में पूर्णरूप से स्थापित कर चुके है। सूचना विज्ञान, भौतिक विज्ञान, वनस्पति, संगणक, यांत्रिकीय, भौगोलिक, भूगर्भीय,गणितीय, आन्तरिक्ष आदि विधाओं एवं विज्ञानों में हमने विश्व के समक्ष अपनी मेधा को परिमार्जित रूप में प्रकट किया है।
         आज वैश्वीकरण और निजीकरण के चलते संस्कृत भाषा और उसका समाज अपने को दयनीय स्थिति में पाता है। अनेकों संस्थान ,विद्यापीठों विभागों संगठनों, विश्वविद्यालयों महाविद्यालयों, गुरूकुलों के रहते भी आज का विद्यार्थी संस्कृत पढ़कर आने को सिर्फ शिक्षक बनने तक केन्द्रित करता है। हमने अपने शास्त्रीय ज्ञान को नवीन विज्ञान से तराशना होगा।
       इसमें कोई संदेह नही कि हमने पिछली शताब्दियों वेदो, पुराणों, रामायण, दर्शन आदि पर वैज्ञानिक अनुशीलन से अपनी भाषा की गरिमा को पुनः प्रतिष्ठापित किया है। परंतु आज की आवश्यकता इसके व्यावसायिकता की स्थापना की है। जो हमें अपने समाज पीढ़ी को आत्मनिर्भर बना सके। आज की युवा पीढ़ी रोजगारोन्मुखी पाठ्य की ओर तेजी से वह बढ़ रही है। हमें संस्कृत वाडमय में विभिन्न अध्ययनों पूर्व शोधों से रोजगार, व्यवसाय जैसे पहलुओं पर मन्थन करना होगा। जिससे हमारी पीढ़ी इसके वर्तमान को पहचाने। साथ ही साथ इसके आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के पहलुओं का भी समन्वय करना होगा। संस्कृत केवल भाषा नहीं अपितु यह विशाल वाङ्मय जो दुनिया के प्राचीन एवं विज्ञान को अपने आप में समेटे है। इस भाषा में रोजगार और व्यवसाय के अनेकों आयाम विद्यमान हैं।
      आज का वैज्ञानिक चिन्तक, समाज सुधारक, अपने द्वारा प्रतिपादित नई विद्या के समर्थन हेतु पूर्व शोध एवं प्रमाणों का आधार लेता है। जो कुछ भी नया है वह सब कुछ संस्कृत में पूर्व से विद्यमान है। आज के जगत में सर्वकारीय तंत्र हो या स्वैच्छिक संगठन, प्रबंध तंत्र हो या सूचना तंत्र सभी का अविर्भाव हम अपने वाड्मय में देख सकते है। आज शासकीय सेवा में संस्कृत के विद्यार्थियों को सभी दिशाओं में रोजगार के अवसर विद्यमान है। पारम्परिक उपाधियों के साथ नवीन रोजगार मूलक पाठ्यक्रम भी कतिपय विश्वविद्यालयों द्वारा चलाये जा रहे है। सङ्गणकीय संस्कृत पाठ्यक्रम पाण्डुलिपि विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, पौरोहित्य कर्मकाण्ड, नाट्यशस्त्रीय पाठ्यक्रम इनमें अध्ययन कर विद्यार्थी आर्थिक दृष्टि से सक्षम व आत्मनिर्भर हो सकता है। आज की विद्या विमुक्तये नहीं रह गयी है वह नियुक्तये हो गयी है। इन पाठ्यक्रमों में अर्थप्राप्ति के अनेकों अवसर विद्यमान है। इसके साथ-साथ नाट्यकला, साहित्य शिक्षकीय वैद्य, कवि, भविष्यवक्ता, सामुद्रिकशास्त्री आदि, शिल्पकला, वास्तु आदि का श्रेष्ठ ज्ञाता बनकर अर्थोपार्जन की असीम सम्भावनाएँ जुटाने में समर्थ हो सकता है। पारम्परिक उपाधियों में शेाध के लिए किसी एक विद्या का चयन कर वह उसमें प्रवीणता प्राप्त करता है। उस विषय का श्रेष्ठ ज्ञाता बन कर अर्थोपार्जन कर सकता है। नवीन व्यावसायिक आयामों में, वैदिक कृषि, महाभारतीय नीति, रामायण कालीन मानवीय मूल्यों, कालिदास जैसी काव्यकला भर्तृहरी जैसी दार्शनिकता इत्यादि विषयों के द्वारा लोक को पूर्ण दृष्टि दे सकता है। आज विश्व के अनेको पाठ्यक्रमों से संस्कृत को जोड़कर एक समन्वयात्मक पाठ्यक्रम तैयार कर हम अपनी व्यवसायिकता स्थापित कर सकते है। संस्कृत में ऐसी समस्त बीज मौजूद हैं जो भावि पद्धति को समन्वय की सीख दे सकते हैं। भारतीय दृष्टिकोण हमेशा से परिपूर्णता के सिद्धांत को अपनाता आ रहा है। आध्यात्मिक आधिदैविक आधि भौतिकताओं का समावेश हमारी शिक्षा की विशेषता प्रारंभ से चली आ रही है। हमें आगामी शताब्दियों में व्यवसायिकता से निपटने के लिए संस्कृत का प्राच्य/नव्य दृष्टिकोण प्रत्येक विधा के साथ समाविष्ट कर एक नये रूप में प्रस्तुत करना होगा। उंची-उंची कल्पनाएँ और स्वप्न देखना भी आवश्यक होता है। भवभूति के समान कालोऽह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी कोई तो इसे स्वीकारेगा।
महाकवि कालिदास का संदेशकाव्य सूचना प्रौद्योगिकी के आज के तर्क को साकार करता सा दिखता है। सूचनातन्त्र के रहते न रहते भी कल्पना का बेजोड़ नमूना महाकवि के यश को अक्षुण्ण बना रहा है। भारतीय आधुनिक मनीषी जिन्होनें सोलहवी शताब्दी के गैलालियों की इस मान्यता को साकार किया है कि कोई भी प्राचीन वचन प्रमाण न मानकर स्वंय के निरीक्षण और परीक्षण को प्रमाण माना जाये।
  यही आधुनिक विज्ञान की आधारशिला है। इस अवधारणा के फलस्वरूप संस्कृत मनीषियों में उन्नीसवी बीसबीं शती के आधुनिक संस्कृत मनीषियों ने संस्कृत के सम्पूर्ण ज्ञान विज्ञान को तराशा है। उनकी प्रेरणा को हमें अपने व्यावसायिक स्वरूप में बनाने में सार्थकशील होगा।
         वर्तमान सूचना प्रौद्योगिकी के समय में परिवर्तन में अब वह समय नहीं लग रहा है जो इसके अभाव में लगता था। आज का युवा वर्ग तेजी से बदल रहा है। संस्कृत और सांस्कृतिक समाज अपनी पुरानी परम्पराओं रीति-रिवाजों को जानता हुआ भी उसके प्रयोग को अपनी पीढ़ी को देेने में असमर्थ सिद्ध हो रहा है। हम अपने को देखे हमारे पूर्वज जैसे थे वैसे हम है क्या या हमारी पीढ़ी यदि हम जैसी रहेगी क्या आदि-आदि स्थिति को देखने से भूमण्डलीय दौर के इस युग में यदि हम संस्कृत अपने नीति उपदेश, धर्म, दर्शन, साहित्य और पुरूषार्थ का आज के संदर्भ में नवीन उद्भावनाओं के साथ युवावर्ग के व्यावहारिक जीवन में इसकी संश्लिष्टि नही कर पाये तो हम आने वाले समय में अपने विचारकों को उत्तर देने में भी असमर्थ सिद्ध हो सकते है। संस्कृत वाणी के अपार वैभव को यद्यपि व्यावसायिक स्वरूप नहीं दिया जा सकता यह सही है। परंतु बिना इसके भी हम आधुनिक दौर में शामिल नही रह सकते यह भी सच है। हमने अपने पुरातन समृद्धशाली विज्ञान को पर हस्तगत कर दिया है। अंग्रेज शासक उसका यथोचित दोहन कर उसके वास्तविक लाभ को भोग रहे हैं। आज हम अपने साहित्य को दुनिया के तमाम साहित्यों से समृद्धशाली पाते तो हैं, पर इसमें अप्रतिम उद्भावनाओं, नाट्यशास्त्रीय प्रयोगों को शाश्वत् धारा से जोड़कर प्रायोगिक जीवन में उतार नहीं पाते। इसके शाश्वत् पहलुओं को समझकर वास्तविक चिन्तन की धारा को सरलतम केन्द्रीकृत रूप में प्रस्तुत करना होगा। आज मानव जीवन के  शाश्वत मूल्यों वाली शिक्षा ही विकास की शाश्वत धारा स्थापित करने में समर्थ हो सकती है। परंतु यह भी सत्य ही है कि हमारी प्रतिभाएँ हमारे ही यहाँ उचित वृत्ति के अभाव में पलायित हो जाती है। हमारी नीति भी जीविका एवं धनोपार्जन श्रम और उद्योग की उदात्तभावना की व्यापकता का बखान करती आ रही है।
                             यस्मिन देशे न सम्मानो न वृत्तिर्न च वान्धवः।
                             न च विद्यागमः कश्चित्तं देशं परिवर्जयेत् ।।
आने वाले समय में हमने अपने पूर्वजों से प्रेरणा नहीं ली, चतुराई और त्यागशीलता की प्रवृत्ति विकसित नहीं की तो हम वृत्ति अर्जन करने में भी समर्थ नही हो सकते लोकजीवन को मंगलमय बनाने हेतु चारों पुरूषार्थों का संगम नितान्त अपेक्षित है। आधुनिक वृत्तिवाद की प्रवृत्ति हमारे अन्य तीनों पुरूषार्थों को कमजोर कर रही है। ऐसी अवस्था में हमारा ऋषिचिन्तन ही हमें इस उदासीनता से मुक्ति दिला सकता है। यह बात सही है कि जहाँ भोग यात्रा संभव न हो वहाँ निवास भी श्रेयस्कर नहीं है। सम्भवतः इसी कारण भारतीय उच्च प्रतिभा विदेशों की ओर आकृष्ट हो रही है।
                              लोकयात्राऽभयं लज्जा दाक्षिण्यं त्यागशीलता
                                          पञ्च यत्र न विद्यन्ते कुर्यात्तत्र न संस्थितम्।।
                             धनवान् बलवान् लोके सर्वः सर्वत्र सर्वदा
                                           प्रभुत्वं धनमूलं हि राज्ञामप्युपजायते।।
यह प्रवृत्ति भी हमें शुरू से ही प्राप्त हुयी है। अर्थसम्पन्न राष्ट्र ही भौतिक प्रगति करता है। उसका जीवनदर्शन एक जैसा ही होता है। दुःख दर्द रोग, भौतिक विपदायें उसे अर्थसम्भव होने से निजात नहीं दिलाती, अर्थ लोलुपता की निवृत्ति भी शास्त्र ही हमें सिखाता है। इस तरह शास्त्रा प्रवृत्ति और निवृत्ति की अभिव्यक्ति का विकास मनुष्य को सदैव बोधित कराता आया है।
                           वृत्यर्थं नातिचेष्टेत् सा हि  धात्रैव निर्मिता।
                                         गर्भादुत्पातते मातुः प्रस्रवतः स्तनौ।।
                          येन शुक्ली कृताः हंसा शुकाश्च हरितीकृताः।
                                   मयूराश्च चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति।।
इस दर्शन का ज्ञान जीवन को जीने की कला संतोष कार्यवाहिका आदि की विश्वव्यापी ज्ञान की पूर्ण प्रणाली का सिमेटे हमारा संस्कृत ज्ञान दुनिया के ज्ञानों से परिपूर्ण है।
स्वातन्त्रयोत्तर संस्कृति साहित्य के क्षेत्रा में एक अभूतपूर्व क्रान्ति हमनें विकसित की है अपने देश के साथ-साथ विदेशों में भी कतिपय संस्थाएँ इस दिशा में प्रयासरत है। भारत में संस्कृत के पारम्परिक रोजगार के अनेको  अवसर हमारे लिए सुलभ है। तमाम वर्तमान प्रशासनिक सेवाओं के साथ-साथ हम इस विषय को लेकर देश को एक कुशल राजनेता कुशल प्रशासक, कुशल शिक्षक एवं कुशल विद्यार्थी देने में पूर्णतः सक्षम है। राजनीति हो या प्रबंध शास्त्रा शिक्षा हो या संगठन हमने अपने भाषा की अन्तव्र्याप्ति सर्वत्र सिद्ध की है। देश में वर्तमान में संस्कृतवाङ्मय के क्षेत्र में स्थापित संस्थान/विश्वविद्यालय है जिनमें हमारे लिए तमाम सेवाओं के विविध अवसर विद्यमान हैं। इनमें प्रमुख है, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, जिसके संपूर्ण भारत वर्ष में अनेकों परिसर स्थापित है। इसमें नवीन विषयों जैसे विज्ञान, अग्रेंजी, गणित के साथ, संस्कृत की प्राच्यविधाओं वेद, पुराणों, दर्शन साहित्य व्याकरण की उच्चस्तरीय शिक्षा की व्यवस्था है। इन संस्थानो में विशेषकर एक पूर्ण एवं सक्षम शिल्पी बनाने का प्रभावशाली अध्यापन कराया जाता है। ये सभी संस्थान एक स्वायत्तशासी निकाय द्वारा संचालित है। इनमें व्याख्याता, प्रोफेसर, कुलसचिव प्राचार्य जैसे महत्वपूर्ण पद हैं। जिनमें सेवा का अवसर प्राप्त किया जा सकता है। वर्तमान में सेवा के प्रत्येक क्षेत्रा में संस्कृत का विद्यार्थी चयनित हो सकता है। स्वातन्त्रयोत्तर शैक्षिक संस्थानों का विकास एवं विश्व विद्यालयों में स्थापनाकाल से स्थापित संस्कृत विभागों, महाविद्यालयों का कार्य शोध एवं इस दिशा में की गयी प्रसंशास्पद उन्नति से संस्कृत का विश्वव्यापी दृष्टिकोण पुनः आज चरितार्थता की ओर है।
              संस्कृत साहित्य अपने आप में सभी ज्ञान-विज्ञानों का समन्वयात्मक स्रोत है। नाट्यकलाओं के बढ़ते रुझान पर एक बार फिर भारत पर दुनिया की  दृष्टि आकृष्ट हुयी है। वर्तमान में इसकी समसामयिकता को नवीन आयाम देने वाले हमारे पुरोधा आचार्यो के अतिरिक्त आचार्य आर. व्ही. त्रिपाठी, आचार्य राजेन्द्र मिश्र, आचार्य हरिदत्त शर्मा, भट्ट श्री मथुरानाथ  आदि विद्धानों की विस्तृत त है। नये रूप में कुछ नवीन आयाम इस दिशा में तेजी से उभर रहे हैं। यथा पाण्डुलिपि विज्ञान, ज्योतिर्विज्ञान, नाट्यशास्त्रादि।
          पाण्डुलिपि विज्ञान- राष्ट्रीय पाण्डुलिपि मिशन द्वारा तैयार कराये गये डाटावेसेज के अनुसार भारत के अनेक प्रान्तों में हस्तलिखित ग्रंथो की तादाद आज भी बहुत अधिक है। सागर वि. वि. के पाण्डुलिपि संसाधन केन्द्र में ही लगभग 15 हजार ग्रंथों का संचय एवं उपलब्धता की जानकारी विद्यमान है। इस क्षेत्र में लिपियों के ज्ञान के बल से हम अनेक ग्रन्थों का भारतीय भाषाओं में अनुवाद कर सकते है। यह कार्य अनेकों दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं आर्थप्राप्ति परक भी हो सकता है। इसमें ऐसे अन्य भी है जिनका भाषाई अनुवाद अभी तक अप्राप्त है। इस दिशा में नई सदी में इस विषय का एक व्यावसायिक डिग्री पाठ्यक्रम प्रारंभ किया जा सकता है। इसके जरिये एक तो हमें लिपियों का ज्ञान प्राप्त हो सकेगा दूसरा अनुवाद परक कार्य से हम आर्थिक दृष्टि से भी सक्षम हो सकेगें। डिप्लोमा इन संस्कृत लैंग्वेज विथ मैन्युस्क्रिप्टोलोजी कम से एक समन्वयात्मक पाठ्यक्रम बनाया जाकर विद्यार्थियों को इसके फायदों से परिचित कराया जा सकता है।
            ज्योतिर्विज्ञान - इस क्षेत्र में सूर्यसिद्धांत जैसे ग्रंन्थों एवं पाश्चात्य में हुये यन्त्रविषयक दूरवीक्षण ग्रंथों के सहारे हम एवं मिलाजुला पाठ्यक्रम तैयार कर एक नवीन एवं न्यायसंगत परक दृष्टि विश्व को दे सकते है। ज्योतिर्विज्ञान का भारतीय प्रारंभिक गहन चिन्तन साहित्य हमें प्राप्त है। इसके क्षेत्र में संस्कृत विश्वविद्यालयों के ज्योतिर्विज्ञान विभागों में हुये शोध एवं पन्द्रहवी शताब्दी के इटली के गैलीलियों द्वारा बनाये गये दूरबीक्षण यन्त्रों के माध्यम से हम अपने ज्योतिषीय विज्ञान को एक विश्व दृष्टि परक नवीन दिशा के साथ प्रस्तुत  कर सकते है। पाश्चात्य देशों के अनेको विश्वविद्यालय है जहाँ ज्योतिर्विज्ञान की पढ़ाई आज भी विद्यमान है इसके तीनों पक्ष फलित गणित एवं सिद्धांतों के समन्वयात्मक ज्ञान से हम समाज के आवश्यक जीवन के रहस्यों एवं पूर्व-पूर्व जन्मों के संयोग का खगोलीय अध्ययन कर उसके जीवन को एक नई दिशा देते है। इसके वास्तविक अध्ययन के गणितीय विश्लेषण से हम ठीक-ठीक फलादेश कर अर्थापार्जन कर सकते है। सम्पन्न देशों का रूझान इस ओर अधिक है। परंतु इसके ठीक जानकारों का अभाव है। नई सदी में पुनः एक बार इस विज्ञान को व्यापक बनाकर समाज के लोगों को अर्थोपार्जन में स्वावलंबी बनाया जा सकता है।
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में केवल एक ही तत्व अधिभौतिक शेष रह गया है। यह प्रणाली भारतीय ज्ञान पर आधारित नही कही जा सकती। भारतीय मायने में हमारी शिक्षा की स्थिति आध्यात्मिक आधिदैविक और अधिभौतिक विविध समन्वित शिक्षा में ही निर्भर करती है। इसका ही यह परिणाम है कि विद्यार्थीयों का जीवन जहाॅ विकासशील, आनंदमय, समस्याविहीन स्वावलम्बी होना चाहिये वहाॅ वह अशान्ति भारवान् अनुशासन हीनता तनाव और अपराधी भावना से युक्त होता जा रहा है। यदि शिक्षा की वर्तमान धारा में अध्यात्म और अधिदैव को स्थान नहीं दिया गया तो यह केवल पत्तों को जल देने जैसे स्थिति होगी जिससे तना मूल से उच्छिन्न होकर शाखा और पत्तों की स्थिति को भी न प्राप्त कर पायेगा। ‘‘छिन्ने मूले नैव शाखा न पत्रम्।’’ आधुनिक विज्ञान का एकाकीपन ही वास्तविक परिपूर्णता को खो बैठता है। स्रोत और आधुनिक का समन्वयात्मक स्वरूप ही पूर्णता को प्रदान कर सकता है। समन्वय के सिद्धांत की लोकप्रियता उसकी शाश्वतिक उचाईयों को हम कालिदास के इस पद्य से गृहीत कर लेते है।
                          पुराणमित्येव न साधु सर्वं न चापि काव्यं नवमित्यवद्यम् ।
                          सन्तः परीक्ष्यान्यरत् भजन्ते मूढ़ः परप्रत्ययेन बुद्धिः।
       सहस्राब्दी में सुरक्षित रहा हमारा साहित्य हमें जीवन के तमाम पक्षों को जीने की कला सिखाता है। संस्कृत के विश्वव्यापी साहित्य की कोई भी विधा सिर्फ परम्परा और समन्वय के चलते ही आज तक अक्षुण्ण बनी हुयी है। विश्व में तमाम भाषाओं में हुये इनके अनुवादों से यह निर्विवाद सत्य है। कि स्वतंत्रता पश्चात् संस्कृत में अभूतपूर्व प्रगति हुयी है। जहाँ एक ओर इसके स्वरूप की अजस्र धारा पल्लवित हो रही है वहीं इस पर आधुनिक सर्जनाएँ और नये द्वार भी विकसित हो रहे है। कतिपय आधुनिक मनीषियों ने इस पर आधुनिक दृष्टि से चिन्तन मनन कर इस दिशा में युवावर्ग पर अपनी एक पैनी दृष्टि डाली है। इसके क्लिष्ट पदावली को सहज स्वरूप में प्रस्तुत किया है। इसके गर्भ के तिरोहित उन तमाम अन्वेषणों को अभिव्यक्ति दी है। जिसकी जरूरत आगामी पीढ़ी को हैं। कला विषयक चिन्तन हो या वैज्ञानिक अवधारणाएँ सभी का उन्मेष हमें वेद में प्राप्त होता है। कृषि एवं तकनीकी के पर्याप्त आधार वेदों में निहित है। तथ्य है कि संस्कृत भाषा ने हमें जो अभिव्यक्ति प्रदान की है, जीवन के सर्वागीण सिद्धांत बताये है उन्हीं के द्वारा हम अपने राष्ट्र को परमोन्नत एवं पूर्णविकसित राष्ट्र के आदर्श के रूप में देख सकते हैं। नई सहस्राब्दी में हमारा समन्वित प्रयास होना चाहिये कि हम अपने सांस्कृतिक धरातल को और अधिक परिमार्जित करते हुये कला के साथ-साथ विज्ञान के आयामों पर विशेष ध्यान दे और ऐसे समन्वयवादी दृष्टिकोण को विकसित करें जिससे हम पूर्ण भारतीय ज्ञान विज्ञान को दुनिया के समक्ष अनुकरणीय तरीके से प्रस्तुत कर पायें।  रोजगारोन्मुखी पाठ्यक्रम द्वारा आज की युवा पीढ़ी को   तेजी से रोजगार दे सकें।