मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

विद्यालयों में नैतिक शिक्षा और संस्कृत

        आजकल विद्यालयों में नैतिक शिक्षा एक कोर्स के रुप में पढ़ाई जा रही है। संस्कृत भाषा में सूक्तियों एवं महान् चरित्र वाले कथानकों में नैतिक शिक्षा प्राप्त हो जाती है। भारतीय में संयुक्त परिवार के विघटन के पश्चात् इस प्रकार के शिक्षा की आवश्यकता हो गयी है। जिस समाज में माँ पिता या सर्वश्रेष्ठ व्यक्तियों के पास बच्चों के लिए समय उपलब्ध नहीं हो रहा है, वहाँ इस प्रकार की शिक्षा एक पाठयक्रम द्वारा मुहैया कराया जा रहा है। वस्तुतः नैतिक शिक्षा व्यवहार का विषय है। इसे व्यवहार द्वारा ही जाना और सीखा जाना चाहिए।

संस्कृत किसके लिए?

संस्कृत में उपलब्ध ज्ञान सम्पदा सबके लिए उपयोगी है। प्रत्येक मानव को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए। रोजगार की दृष्टि से विज्ञान एवं तकनीकि, पत्रकारिका आदि अनेक जीविका के प्राप्ति के माध्यम विषयों के अध्ययन के साथ-साथ शौक एवं ज्ञान के लिए संस्कृत पढ़ना चहिए।
          मैं बार-बार यह बात दुहराता हूँ कि दो ही वर्ग के लोग संस्कृत पढ़ सकते हैं। एक वह जो नितान्त गरीब है क्योंकि यह शिक्षा बिना धन खर्च किये गुरु से प्राप्त की जा सकती है तथा इसमें सामाजिक रोजगाार सुनिश्चित है। दूसरा वह वर्ग जो संस्कृत पढ़ कर इस क्षेत्र में रोजगार नहीं खोजता। वह साधन सुविधा सम्पन्न है। वह ज्ञान की खोज में लगा है। वह आय के अन्य स्रोतों पर जीवित रहते हुए संस्कृत अध्ययन कर सकता है।
           इन दोनों के अतिरिक्त अन्य व्यक्तियों को भी सामाजिक राष्ट्रीय उत्थान के लिए संस्कृत पढ़ना चाहिए। 

सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्थान में संस्कृत की भूमिका-

         एक बच्चा रोजगार को दृष्टि में रखते हुए रोजगारपरक भाषा एवं विद्या पढ़ता है। अभिभावक उसे समाज से दूर किसी ऐसे विद्यालय में उसे पढ़ने भेजते हैं, जहाँ वह रोजगारपरक भाषा एवं शिक्षा प्राप्त करने में सफल होता है।
                   बच्चा संस्कृत नहीं पढ़ता। संस्कृत न पढ़ने से उसमें सामाजिक सदाचार, नैतिकता, अपने देश के सांस्कृतिक विरासत से अछूता रह जाता है। माँ-पिता सिर्फ धन देकर पढ़ने में सुविधा प्रदान करने वाले तक रह जाते हैं। बच्चा विदेश जाता है, वहीं का निवासी हो जाता है। माँ-पिता द्वारा किया गया खर्च वह लौटाता है। ऐसा बच्चा न तो अपने देश, न ही अपने समाज के लिए कुछ कर पाता है। अतः यह आवश्यक है कि मानव के संतुलित विकास के लिए संस्कृत की शिक्षा जरुर दी जाए।

एक यक्ष प्रश्न संस्कृत का उद्धारक सरकार या प्रेरक समूह

          यह तय है कि संस्कृत मूल धारा में न होकर भी समाज का उपकारक शास्त्र बना रहेगा। जिस गति से इस भाषा को चाहने वालें की संख्या घटती जा रही है, सम्भव है कुछ दिनों बाद इसके उद्धारक तो दूर, प्रशंसकों को ढूढ़ना भी मुश्किल होगा। अक्सर लोग इसे पढ़ना नहीें चाहते। सरकार रोजगार सृजित करे तो अध्ययनकर्ता पढ़ें। सरकार निजीकरण को बढ़ा रही है। खुद सिर्फ नियामक की भूमिका में रहना चाहती, क्योंकि खर्च घटाना आवश्यक है। सरकार जन भावना को देखकर आगे कदम बढ़ाती है, क्योंकि लोकतंत्र में सरकार वोट पाकर सत्ता में आती है। लोग जो माँगे वो सरकार दे। लोग संस्कृत क्यों माँगे? क्योंकि इसमे रोजगार नहीं। इसके लिए तीसरा मार्ग है प्रेरक समूह। वे बुद्विजीवी, जो संस्कृत के महत्व को जानते हैं। जो मानवता के लिए है। वे लोगों को प्रेरित करें। जरुरी नहीं कि सरकार में बैठे लोग संस्कृत के विकास के लिए उत्साह से लवरेज हों। वे सरकार की नीतियों के संचालक होते हैं। जब नीति ही न हो। लाभार्थी ही न हो तो नीति किसलिए? संचालन किसलिए? यहाँ तो एक-एक व्यक्ति के पास जाकर संस्कृत को जानने का आग्रह करने की आवश्यकता है।

धार्मिक संस्थाओं, धनिकों ने किया संस्कृत का प्रचार

           संस्कृत का प्रचार प्रसार व संरक्षण सरकार से कहीं अधिक धर्मिक संस्थाओं तथा धनिकों ने किया है। आज से 200 वर्ष पूर्व राजाओं द्वारा गुरुकुल संचालित करने की प्रथा थी। कुछ धार्मिक संस्थाओं को राजाओं, जमींदारों ने ईश्वर के नाम भूदान किया था। उस भूमि उपज से संस्कृत शिक्षा के केन्द्र संचालित किये जाते थे। अनेक साधु संतो ने भिक्षाटन कर भूमि क्रय किया। वे संस्कृत शिक्षा प्रसार के लिए समाज से बच्चों की मांग भी करते थे। हरेक गांव-कस्बे से बच्चों को लाकर उन्हें निःशुल्क भोजन, आवास एवं शिक्षा उपलब्ध करायी जाती थीं। आज भी यह परम्परा अनेकों स्थान पर जीवित है। उन मनीषी संतो में संस्कृत संरक्षण एवं विकास को लेकर अदम्य लालसा थी। वे जमीनी स्तर पर संस्कृत का विकास कर रहे थे। आज धनिकों द्वारा पालित ऐसे असंख्य गुरुकुल हैं, जहाँ वेदाध्ययन एवं संस्कृत शिक्षा दी जाती है। वहाँ से शिक्षित छात्र संस्कृत विद्या का प्रसार अपने-अपने क्षेत्र एवं समुदाय में करता है।
            केन्द्र और राज्य सरकार की योजनाएं भी संस्कृत विकास हेतु हैं। विद्यार्थियों के छात्रवृत्ति, अल्पशुल्क पर शिक्षा उनमें से एक है। परन्तु यहाँ जमीनी स्तर पर लागू कराने की दृढ़ इच्छा शक्ति किसमें है। समाचार पत्रों में एक दिन के विज्ञापन देने मात्र से इन विद्यालयो की संख्या नहीं बढ़ायी जा सकती। आवश्यक है कि यहाँ  छात्रों का सतत अन्वेषण हो और उसे समाज से जोड़ा जाय।
           जहाँ और जो भी गुरुकुल समाज से जुड़ा है। जहाँ आचार्य से सहयोग प्राप्त कर विद्यालयों का संचालन कर रहें है, वहाॅ छात्र भी है, शिक्षा भी है, रोजगार भी है, प्रचार भी है।

           संस्कृत क्षेत्र में ग्रहीता पात्र को ढूढ़कर उसे भरने से ही इसका विकास व प्रचार सम्भव है। यह कार्य सरकार द्वारा निर्मित संस्थाएँ करने में उदासीन ही रहेगी।