गुरुवार, 27 मार्च 2014

स्मृति ग्रन्थों में आचरण की व्यवस्था, स्मृति - स्वरूप विवेचन

         क. स्मृति - अर्थ
         ख. स्मृति - सङ्ख्या     
         ग. स्मृति - स्वरूप        
         घ. स्मृति - प्रतिपाद्य विषय       
         ङ. स्मृति - टीका परम्परा
1.       मनुस्मृति तथा टीकायें  
2.       याज्ञवल्क्य स्मृति तथा टीकायें  
3.       पराशर स्मृति तथा टीकायें      
4.       नारद स्मृति तथा टीकायें        
5.       कात्यायन स्मृति तथा टीकायें   
6.       विष्णुस्मृति तथा टीकायें         
7.       बृहस्पति स्मृति तथा टीकायें    
8.       हारीत स्मृति तथा टीकायें       
9.       गौतम स्मृति तथा टीकायें       
10.     अङिगरा स्मृति तथा टीकायें    
11.     संवर्त स्मृति तथा टीकायें        
12.     दक्ष स्मृति तथा टीकायें 
13.     यम स्मृति तथा टीकायें 
14.     आपस्तम्ब स्मृति तथा टीकायें   
15.     अत्रि स्मृति तथा टीकायें
16.     शातातप स्मृति तथा टीकायें    
17.     व्यास स्मृति तथा टीकायें        
18.     वसिष्ठ स्मृति तथा टीकायें 

क. स्मृति - अर्थ

          स्मृति शब्द का शाब्दिक अर्थ है - जो याद किये जाने योग्य हो। स्मृतियां हिन्दुओं के धर्म का मूल उपादान है। जिस प्रकार श्रुति को वेद माना जाता है उसी प्रकार धर्मसूत्र भी स्मृति ग्रन्थ मानी जाती है।
          मनु का कथन है कि - ‘‘स्मृति तथा धर्मशास्त्र का अर्थ एक ही जानना चाहिए।’’ वेद को श्रुति तथा धर्मशास्त्र को स्मृति जानना चाहिए वे सभी विषयों में प्रतिकूल तर्क के योग्य नहीं हैं क्योंकि उन दोनों से ही धर्म का प्रादुर्भाव हुआ है।1
स्मृति के अन्तर्गत षड्वेदाङ, धर्मशास्त्र, इतिहास, पुराण, अर्थशास्त्र तथा नीतिशास्त्र इन सभी विषयों का अन्तर्भाव किया गया है।
   स्मृतियों पर धर्मशास्त्र का प्रभाव अधिक दिखायी पड़ता है। धर्मशास्त्र उन शास्त्रों को कहा जाता है जिनमें, प्रजा के अधिकार, कर्तव्य, सामाजिक आचार-विचार, वर्णाश्रम धर्म-व्यवस्था, नीति, सदाचार आदि शासन सम्बन्धी नियमों का वर्णन किया जाता है इसलिए यह कहा जा सकता है कि स्मृतियों की रचना धर्मसूत्रों के आधार पर की गई है।
      स्मृतियां हमारी संस्कृति, आचार, व्यवहार को स्मरण रखने में सहायक है। पी.वी. काणे ने अपने ग्रन्थ ‘‘धर्मशास्त्र के इतिहास’’ में स्मृति शब्द के अर्थ के सम्बन्ध में कहा है कि - ‘‘स्मृति शब्द दो अर्थों में प्रयुक्त हुआ है। एक अर्थ में यह वेदवाङ्मय से इतर ग्रन्थों यथा पाणिनि के व्याकरण श्रौत, गृह्य, धर्मसूत्रों, महाभारत मनु, याज्ञवल्क्य एवं अन्य ग्रन्थों से सम्बद्ध है किन्तु संकीर्ण अर्थ में स्मृति एवं धर्मशास्त्र का अर्थ एक ही है।
    तैत्तरीय आरण्यक में स्मृति की व्याख्या करते हुए कहा है कि - ‘‘स्मृतिरनुमेयश्रुतिमूलं मन्वादिशास्त्रम्। प्रत्यक्षं सर्वपुरुषाणां श्रोत्रेण ग्राह्यं वेद वाक्यं च। अनुमानः शिष्टाचारः। तेन हि मूलभूतं श्रुतिस्मृतिलक्षणं प्रमाणनुमीयते। तदेतत्स्मृत्यादिचतुष्मवगतिकारण भूतं प्रमाणम्। एतैः स्मृत्यादिभिः सर्वै रेव प्रमाणैरादित्यमण्डलं विधास्यते प्रमीयते, यादृशमिदं मण्डलं भवति यथा च प्रवर्तते यथा वा मन्वन्तरादिभेदाभिन्नं कालं प्रवर्तयति यथा चोदकसृष्टयादिना विश्वमुत्पादयति तत्सर्वं स्मृत्यादिप्रमाणसिद्धम्।
गौतम धर्मसूत्र में स्मृति को धर्म का उपादान माना है।
‘‘प्रिया अथवा प्रिया की अभूतपूर्व चेष्टाओं आदि द्वारा उद्बोधित संस्कार से उत्पन्न होने वाला ज्ञान स्मृति कहलाता है।
वाचस्पत्यम् के अनुसार स्मृति स्त्रीलिंग शब्द है तथा स्मृधातु, क्तिन् प्रत्यय से मिलकर बना है। स्मृति का पहला अर्थ उन्होंने किया है - ‘‘अनुभूतवस्तुन उद्बोधक - सहकारणेन संस्कारधीने ज्ञानभेदे।’’ (अनुभूत की हुई वस्तु उद्बोधन) प्रकट या जागृत करने में साधन रूप तथा संस्कार के अधीन है वह स्मृति है।
अमरकोश - ‘‘स्मृतिस्तु धर्मसंहिता’’ स्मृति (स्त्रीलिंग), स्मृति शास्त्र अर्थात् मनु आदि के बनाये हुए धर्मग्रन्थ का नाम है।’’
‘‘वेदार्थस्मरणपूर्वकं रचित्वात्स्मृति।’’
स्मृति का अर्थ - स्मरण करना, याद करना। एक संचारी भाव। अभिलाषा। अपेत (स्मृत्यपेत्) वि-भूला हुआ। स्मृति शास्त्र विरूद्ध। न्यायवर्जित। उक्त (स्मृत्युक्त) (वि.) स्मृतियों में वर्णित।
Smriti-Remembrance, remimiscence, thinking of law givers being, held to be, inspired and to have based their precepts on the Veda, a reprinand given to a person by reminding him of his duty.
1. Remembrace, recollection, memory 2. thinking of, calling to mind, 3. What was delivere by human authors law, traditional law, the body of traditional or memorial law.
स्मृतियां व्यक्ति के कार्यों पर नियंत्रण लगाकर, अनुशासित करके, व्यक्ति को समाज से अलग नहीं रखती अपितु स्मृतियां व्यक्ति को सुसंस्कृत, सामाजिक प्राणी बनाने में सहायक होती है।
स्मृति ग्रन्थ का तात्पर्य उन रचनाओं से है जो प्रायः श्लोकों में है तथा उन्हीं विषयों का प्रतिपादन करती हैं जिनका विवेचन धर्मसूत्रों में किया गया है। स्मृतियां प्रायः पद्य में तथा धर्मसूत्र गद्य में हैं। भाषा की दृष्टि से धर्मसूत्रों की भाषा अत्यंत क्लिष्ट तथा विद्वज्जनों की भाषा है किन्तु स्मृति की भाषा अत्यन्त सरल एवं आमजन की बोलचाल की भाषा है। विषय वस्तु की दृष्टि से स्मृतियां धर्मसूत्रों से अधिक व्यवस्थित तथा सुगठित है।

ख. स्मृति सङ्ख्या

स्मृतियों की संङ्ख्या विषय में विभिन्न मत प्राप्त होते हैं। डाॅ. काणे के अनुसार मुख्य स्मृतियों की संङ्ख्या 18 है - मनुस्मृति, बृहस्पति स्मृति, दक्ष स्मृति, गौतम स्मृति, यम स्मृति, अंग्रिा स्मृति, योगीश्वर स्मृति, प्रचेता स्मृति, शातातप स्मृति, पराशर स्मृति, संवर्त स्मृति, उशना स्मृति, लिखित स्मृति, शंख स्मृति, अत्रि स्मृति, विष्णु स्मृति, आपस्तम्ब स्मृति तथा हारीत स्मृति।
याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार -
मन्त्रत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योशनोऽग्रिा।
यमापस्तम्बसंवर्ताः कात्यायनबृहस्पत।।
पराशव्यासंशङखलिखिता वृक्षगौतमौ।
शातातपो वसिष्ठश्च धर्मशास्त्रप्रयोजकाः।।
अष्टादश स्मृति में निम्न प्रमुख स्मृतियों का समावेश किया गया है - अत्रि संहिता, विष्णु प्रोक्त धर्म, हारीत स्मृति, औशनस स्मृति, अंग्रिा रस स्मृति, संवर्त स्मृति, लघु यम स्मृति, आपस्तम्ब स्मृति, बृहस्पति स्मृति, कात्यायन स्मृति, पराशर स्मृति, दक्ष स्मृति, गौतम स्मृति, शातातप स्मृति।
वीरमित्रोदय के अनुसार स्मृतिकारों की संङ्ख्या 21 है -
        वसिष्ठो नारदश्चैव सुमन्तुश्च पितामहः।
        विष्णु काष्र्णाजिनिः सत्यव्रतो गाग्र्यश्च देवल।।
        जमदग्निर्भरद्वाजः पुलस्य पुलहः क्रतुः।
        आत्रेयश्च गवेयश्च मरीचिर्वत्स एवच।।
        पारस्करश्चष्र्यशृंगे वैजावापस्तथैवच।
        इत्येते स्मृतिकत्र्तार एकविंशतिरीरिताः।।
इसके अतिरिक्त उप स्मृतियों के भी नाम गिनाये गये हैं -
         जाबालिर्नाचिकेतश्च स्कन्दो लौगाक्षिकाश्यपौ।
         व्यास सनत्कुमारश्च शन्तनुर्जनस्तथा।।
         व्याघ्रः कात्यायश्चैव जातूमकण्र्य कपिञ्जलः।
         बौधायनश्च काणादो विश्वामित्रस्तथैव च।।
         पैठीनसिर्गोभिलश्चेत्युपस्मृति विधायकाः।
स्मृति सन्दर्भ के प्रथम भाग में - मनुस्मृति, नारदीय, मनुस्मृति, अत्रि स्मृति, अत्रि संहिता, प्रथम विष्णु स्मृतिः (महात्म्यं), विष्णु स्मृति, द्वितीय भाग में - पराशर स्मृति, वृहत्पराशर स्मृति, लघुहारीत स्मृति, वृद्धहारीत स्मृति, तृतीय भाग में - याज्ञवल्क्य स्मृति, कात्यायन स्मृति, लिखित स्मृति, शंखलिखित स्मृति, वसिष्ठ स्मृति, लघुव्यास संहिता, (वेद) व्यास स्मृति, बौधायन स्मृति, चतुर्थ भाग में-गौतम स्मृति, वृद्ध गौतम स्मृति, यम स्मृति, लघुयम स्मृति, वृहद्यम स्मृति, अरूण स्मृति, पुलस्त्य स्मृति, बुध स्मृति, वसिष्ठ स्मृति नं. - 2, वृहद्योगियाज्ञवल्क्य स्मृति, ब्रह्मोक्तयाज्ञवल्क्यसंहिता, काश्यम स्मृति, व्याघ्रपाद स्मृति पंचम भाग में - कपिल स्मृति, वाधूल स्मृति, विश्वामित्र स्मृति, लोहित स्मृति, नारायण स्मृति, शाण्डिल्य स्मृति, कण्व स्मृति, दाल्भ्य स्मृति, अंगिरस स्मृति नं-2, (क) पूर्वांगिरसम् (ख) उत्तरांिरसम् षष्ठ भाग में - लौगाक्षि स्मृति तथा मार्कण्डेय स्मृति का संग्रह है।
स्मृतिचन्द्रिका के अनुसार -
          तेषां मन्वङिगरोव्यासगौतमान्न्युशनोयमाः।
          वसिष्ठदक्षसंवर्तशातातप शातातपपराशराः।।
          विष्णवापस्तम्बहारीताः शंङ्ख कात्यायनो गुरुः।
          प्रचेता नारदो योगी बौधायनपितमहौ।।
          सुमन्तु कश्यपो बभ्रु पैठीनो व्याघ्र एव च।
          सत्यव्रतो भारद्वाजो गाग्र्यः काष्र्णाजिनिस्तािा।।
          जाबालिर्जमदग्निश्च लौगाक्षिब्र्रह्मसम्भवः।
          इति धर्मप्रणेतारः षङिशदृषयस्मृताः।।
स्मृतियों की सङ्ख्या में एक मत नहीं है। स्मृतियों की संङ्ख्या 100 के समकक्ष मानी जाती है। जिनमें 18 स्मृतियां प्रमुख हैं। उपस्मृतियों की संङ्ख्या अधिकतम है।

ग. स्मृति स्वरूप

     वेद भारतीय संस्कृति का मूलभूत आधार हैं। मनुष्य के समस्त जीवन मूल्यों का समावेश वेदों में निहित है। हजारों वर्षों से वेदों पर ही मानव जीवन का अस्तित्व टिका हुआ है। वेदों का प्रधान विषय ज्ञान, कर्म एवं उपासना है किन्तु इसके अतिरिक्त धार्मिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक, सामाजिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक उन्नति का विस्तृत विवेचन किया गया है। वैदिक संस्कृति में न्याय, समानता, विश्वबन्धुत्व जैसे मानवीय मूल्यों का समावेश है। वेदों में धर्म का कोई व्यवस्थित उल्लेख नहीं है। किन्तु स्मृतियाँ वेदों से अधिक सुगठित शास्त्र है। वेदों के समान ही स्मृतियों में भी धर्म, शिक्षा, संस्कार, आश्रम व्यवस्था, राजधर्म आदि विषयांे का चरणबद्ध प्रतिपादन किया गया है। सामाजिक व्यवस्था को अधिक सुदृढ़ बनाने के लिए मनु ने आश्रम व्यवस्था के समान वर्ण व्यवस्था को भी महत्त्वपूर्ण माना है। वेद एवं मनु की वर्ण व्यवस्था जन्मगत न होकर कर्मगत है। अतः हम यह कह सकते हैं कि स्मृतियां वेदों का अनुकरण करती हैं इसलिए स्मृतियां वेदानुवर्ती हैं।
     मनु ने मनुष्य का जो धर्म कहा है, वह सब धर्म वेदों में कहा गया है। वे मनु सब वेदों के अर्थों के ज्ञाता हैं।  वेदों तथा स्मृतियों में कहे गये धर्म का अनुष्ठान करता हुआ मनुष्य इस संसार में यश पाता है तथा धर्मानुष्ठाजन्य स्वकर्मादि के अनुत्तम सुख को पाता है।
     ऋग्वेद में भी वेदानुकूल कर्म करने का आदेश दिया है। ‘‘हे देवों ! हम न कभी प्राकृतिक नियमों को तोड़ते हैं तथा न कभी इन नियमों को होने देते हैं। वेद के मन्त्रों के आदेशानुसार आचरण करते हैं।  मनु ने वर्णाश्रम धर्म के अन्तर्गत क्रमशः वर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) तथा आश्रम (ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा सन्यास) के विशिष्ट धर्मों का परिगणन कराया है।
     वर्ण का वर्णन मनु से पूर्व सर्वप्रथम ऋग्वेद के पुरुष सूक्त में मिलता है।  यही कथन मनु ने भी कहा है।  मनु भी धर्म के उपदेश के लिए वेद को मुख्य प्रमाण मानते हैं।  जहां पर श्रुति तथा स्मृति के विधानों में मतभेद मिलता हो वहां पर परस्पर श्रुति को ही प्रमुखता दी गई है।
    जिस प्रकार मनु ने जीवन में अनुशासित मर्यादाएं निर्धारित की उसी प्रकार का वर्णन ऋग्वेद में भी दृष्टिगोचरचित होता है। ’’विद्वानों ने जीवन की सात मर्यादाएं निर्धारित की हैं। ये सात मर्यादाएं हैं - सुरापान, जुआ खेलना, नारी व्यसन, मृगया, कटु वचन, कठोर दण्ड व दूसरे पर मिथ्या आरोप। इनकी तथा कदापि नहीं जाना चाहिए। इनसे बचने वाला प्रतिष्ठा व उच्च स्थिति को पाता है।’’
       जिस प्रकार स्मृतियों में आचार का अधिक वर्णन किया है उसी प्रकार वेदों में भी आचार की शिक्षा दी जाती है। ‘‘चरित्र रक्षा के बारे में यजुर्वेद में कहा गया है कि - ‘‘मैं तेरी वाणी को शुद्ध करता हूँ। मैं तेरे प्राणों को शुद्ध करता हूँ। मैं तेरी आंखों को शुद्ध करता हूँ। मैं तेरे कानों को शुद्ध करता हूँ। मैं तेरी नाभि को शुद्ध करता हूँ। मैं तेरे आचरण तथा पैरों को शुद्ध करता हूँ।’’
      ऋग्वेद में दान का महत्त्व वर्णित किया गया है। दान सभी इष्ट सुखों को देने वाला है तथा मनुष्य की सभी कामनाओं की पूर्ति करता है।
   ‘‘दान देने वालों को ही उत्तम धन प्राप्त होते हैं। दान देने वालों को द्युलोक में सूर्यलोक प्राप्त होते हैं। दान देने वाले अरत्व या मोक्ष को प्राप्त करते हैं। दान देने वाले ही अपनी आयु को निरन्तर बढ़ाते हैं।’’  मनु ने भी दान की प्रशंसा की है।
 याज्ञवल्क्य स्मृति में दान को धर्म के मुख्य साधनों में गिनाया है।’’ उनका कथन है कि ‘‘अहिंसा, सत्य, अस्तेय, स्वच्छता, संयम, दान, मनोनिग्रह, दया, क्षमा ये सभी धर्म के साधन है।’’
    महर्षि मनु ने धर्म के दस लक्षण बताये हैं - धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, घी (तत्वज्ञान), विद्या, सत्य, अक्रोध।
     भारतीय संस्कृति का मूल वेदों में ही निहित है। आधुनिक काल में वैवाहिक आदि सामाजिक समारोहों में वैदिक मन्त्रोच्चारण श्रद्धा के साथ किया जाता है। अत्यन्त प्राचीन काल से धर्म, दर्शन, ईश्वरोपासना तथा सदाचार का ज्ञान वेदों से प्राप्त होता है। वेदों में मानव जीवन से सम्बन्धित सभी आचारों को समाविष्ट किया है जिससे मनुष्य विकास की चूड़ान्त को प्राप्त कर सके। प्रायः वेदों में देवता स्तुतिवाचक मन्त्रों का ही वर्णन किया गया है किन्तु वैदिक देवताओं की स्तुति में जीवन आचार की झलक प्रस्तुत की गई है। इनके देवता ऋत, सत्य, अहिंसा, दया, दान, ज्ञान मैत्री आदि आचारों से ओतप्रोत हैं।
    ऋत - निरूक्त में यास्क ने ‘‘ऋत’’ का अर्थ उदक (जल) , सत्यं एवं यज्ञ  किया है अपितु सायण ने ‘‘ऋत’’ को कर्मफल, स्तोत्र, एवं गति वाचक अर्थ किया है।  ऋग्वेद में मनुष्य को विद्या, धर्म, बल एवं पराक्रमशील होने का उपदेश दिया है जिससे उनका जीवन कष्ट मुक्त हो सके।  व्यक्ति को अपने कल्याण के लिए उन लोगों की शरण में जाना चाहिये जो सत्यज्ञान का सेवन करने वाले, यज्ञ के उपासक तथा सत्य न्याय को बढ़ाने वाले हैं।  ऋग्वेद में उपासना करते हुए सदाचारी मनुष्य दुराचरणों से निवृत्ति की प्रार्थना करता है।
    ऋग्वेद में विद्वानों के गुणों का वर्णन करते हुए कहा गया है कि - सत्यपरायण, सत्य की शिक्षा प्राप्त किये हुए, सत्यरूपी यज्ञ की वृद्धि करने वाले तथा असन्मार्ग के अत्यन्त द्वेषी विद्वानों के सुखतम मार्ग में तुम लोग चलो तथा उन विद्वानों से जो अपने गुणगौरव द्वारा तेजस्वी है तुम लोग प्रार्थना करो कि हम भी उक्त गुणों से सम्पन्न हों।
  सत्य - सन्मार्ग चाहने वाले को पुरुष को उचित है कि सच्चाई का ज्ञान करने के लिए परमात्मा की शरण  लें।  मनुष्य को सत्यग्राही बनने का उपदेश दिया है।  विद्वानों के लिए सत्य हितकारी है।  मनुष्य को मानसिक तथा वाचिक दोनों ही प्रकार से सत्य का पालन करना चाहिए।  मनुष्य का जीवन पापरहित होना चाहिए जिससे वह प्रार्थना करता है कि उसका विचार सत्य से युक्त हो।
जो राजा सरल भाव से प्रजा पर शासन करता हुआ श्रद्धा, तप तथा सत्य आदि गुणों को धारण करता है, ऐसे कर्मशील राजा दीर्घायुओं को प्राप्त होता है।  सत्य भाषण तथा सत्य के आश्रित कर्म करने वाला राजा के राज्य को परमात्मा अटल बनाता है।  जो सत्यादि धर्मों का त्याग करता उसका जीवन अवश्यमेव चिरस्थायी होता है तथा वह अनेक रसों का भोक्ता होता है।
वेदों में उन सभी आचारों का वर्णन किया गया है जिनका वर्णन स्मृतियों में किया गया है। ‘‘जैसे क्रम से सूर्य जल के धारण तथा वृष्टि से इस संसार का हित करता है वैसे ही उत्तम गुण तथा न्यायों के सहित राजा आदि लोग उत्तम प्रकार रक्षित राज्य का पालन करे।
नीतिवान तथा संयमशील मनुष्य ही ज्ञान को प्राप्त करते हैं।  काम के वशीभूत होकर इन्द्रियों के विषय में आसक्त नहीं होना चाहिए।’’
वेदों में हिंसा का निषेध करने के लिए कहा गया है।’’ गाय तथा मनुष्य का वध करने वाले दूर रहें।’’  इसी प्रकार प्राणियों की हिंसा कभी भी सुखदायक नहीं होती है।
     इस चराचर जगत् में जो हिंसा वेद सम्मत है, उसे हिंसा नहीं समझना चाहिये क्योंकि वेद से ही धर्म की उत्पत्ति हुई है।
    कर्म को वेदों में सुखों का कारण माना है। ‘‘सज्जन पुरुषार्थ तथा सुरक्षा के द्वारा (सुखों का) भोग करते हैं।  कर्म से तप की उत्पत्ति हुई।’’  कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जीने की इच्छा करे। इसके अतिरिक्त तथा कुछ (उपाय) नहीं है, (जिससे) मनुष्य में कर्म का लोप न हो।  मनु ने कहा है कि मनुष्य की उत्तम, मध्यम तथा अधम स्थितियाँ गतियों (जन्म) को प्राप्त होती है वे सब कर्म से उत्पन्न हुई है।  अथर्ववेद में कर्मफल के विषय में कहा गया है ‘‘मनुष्य जैसा पकाता है, वैसा खाता है’’  अर्थात् जैसा कर्म करता है वैसा ही फल प्राप्त होता है।
   मनु ने भी ऐसा ही कहा है कि यदि अधर्म का फल कर्ता को नहीं मिलता, तो पुत्रों को मिलता है तथा यदि उसके पुत्रों को नहीं मिलता तो पौत्रों को अवश्य मिलता है, क्योंकि किया गया कर्म कभी निष्फल नहीं होता है।
      वेदों में अतिथि को देवता स्वरूप माना गया है। ‘‘अतिथि मनुष्य को स्वर्ग (के सुख) तक पहुंचाते हैं।  इसी प्रकार मनु ने कहा है कि ‘‘अतिथि का सत्कार सौभाग्य, यश, आयु तथा स्वर्ग देने वाला होता है।’’  अतिथि के भोजन कर लेने पर गृहस्थ भोजन करें।
मनु ने भी अतिथि से पहले भोजन करने का निषेध किया है।  जो अतिथि से पहले खा लेता है, वह अपना यज्ञ तथा परोपकार का पुण्य खा जाता है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि वेदों में जो कर्म मनुष्य के लिए धर्मरूप में कहा गया वह सब स्मृतियों चाहिएअर्थ में कहा गया है। अतः हम यह कह सकते हैं कि स्मृतियां वेदानुवर्ती हैं।

घ. स्मृति-प्रतिपाद्य विषय

प्रायः सभी स्मृतिग्रन्थों में मुख्य रूप से आचार की महत्ता का प्रतिपादन किया गया है। वेदों, ब्राह्मण, उपनिषद्, रामायण, महाभारत सम्पूर्ण संस्कृत वांङ्मय में विवेचित धर्म का वास्तविक रूप आचार ही है। उनके सभी नियम व्यक्ति के आचरण से सम्बद्ध है। मनुष्य को किन-किन अवस्थाओं में, परिस्थितियों में किस प्रकार का आचरण करना चाहिए यही स्मृतियांे में विवेचित है। शिष्टाचार को परम महत्त्व देने के कारण ही स्मृतिकारों ने प्रत्येक अवसर के लिए छोटे-छोटे आचार नियमों का भी निर्देश किया है। स्मृतियाँ मानव जीवन को समग्र रूप में ग्रहण करती हैं तथा इसी कारण आचरण को व्यवस्थित करने के लिए नियमों एवं निषेध नियमों का निर्देश करती हैं। स्मृतियों में आचार विषयक नियमों की ही अधिकता है तथा आचार का क्षेत्र इतना विस्तृत है कि उसका स्पष्टीकरण कठिन है। स्मृतियों की विषय वस्तु को आचार, व्यवहार, प्रायश्चित्त शीर्षकों में विभक्त करते हुए आचार के अन्तर्गत वर्णाश्रम कर्तव्य, अकर्तव्य, सदाचार, संस्कार, श्राद्ध, शौचाचार, नैतिक-अनैतिक आचरण तथा विविध प्रकार के शुद्धि विषयक आचारों का वर्णन किया गया है इसके अतिरिक्त राजा के भी कर्मों का विवेचन किया है। जिससे मनुष्य में अच्छे-बुरे कर्मों का ज्ञान बढ़ता है तथा सामाजिक व्यवस्था सुचारू रूप से चलती रहें। षोडश संस्कारों में जिस बालक का उपनयन एवं यज्ञोपवीत आदि संस्कार किये गये हो वही व्यक्ति दैव एवं पितृ कर्म करने का अधिकारी माना गया है।  श्रेष्ठ पुरुषों के अनुशासन को आचार-सदाचार कहकर परिभाषित किया गया है।
स्मृतियों में आचार के पश्चात् व्यवहार का उल्लेख किया गया है। स्मृतियों में वर्णित व्यवहार पक्ष न्याय व्यवस्था, दण्ड, नीति नाम से जाना जाता है। मनुष्य पर अंकुश लगाकर उन्हें अनुशासित करना व्यवहार के अन्तर्गत आता है। आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक राजद्रोह तथा अन्य अपराधों के लिए दण्ड का निरूपण स्मृतियों ने व्यवहार पक्ष के माध्यम से किया है। इसके अन्तर्गत राजा की शासन व्यवस्था, लेन-देन, दण्ड व्यवस्था का निर्धारण किया गया है। जब समाज में राग, द्वेष बढ़ने लगा, सत्य का हृास होने लगा तथा लोक मर्यादा का भाव न रहा तब इस दण्डनीति एवं व्यवहार का आविर्भाव हुआ अर्थात् राज्य शासन की आवश्यकता उत्पन्न हुई।  व्यवहार प्रकरण के अन्तर्गत आने वाले दाय भाग, स्त्री धन, वसीयत एवं सम्पत्ति विभाजन इत्यादि विषयों को स्मृति ग्रन्थों ने तथा मिताक्षरा अपरार्क आदि व्याख्याकारों ने भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया है। दाय-भाग में सभी प्रकार लेन-देन, जायदाद के हिस्से तथा पुत्र एवं स्त्री के अधिकार तथा स्त्री धन का उपयोग जैसे अनेक विषयों का समावेश किया गया है।
स्मृतियों में अन्तिम प्रतिपाद्य विषय प्रायश्चित्त है। इसमें पापों के प्रायश्चित्त, पाप करने से नारकीय गति का विवरण, शुद्धि-अशुद्धि की प्रक्रिया, दुष्ट कर्मों का फल, प्रायश्चित्त का स्वरूप, पापी को सुधारने का उपाय, कामज, क्रोधज, अतिपाप, उपपातक, अतिदेश, संकरीकरण एवं मालिनीकरण को दिखाकर उन-उन पापकर्मों के प्रायश्चित्त की विधियां बताई गई है। अन्त में सन्यास धर्म में संसार की अनित्यता एवं भगवान् की सत्यता बताकर मानव जगत को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है अर्थात् जाने अनजाने में किए गए दुष्कर्मों को सुधारने हेतु जो मृत्यु या सरल दण्ड मिलता है वही प्रायश्चित्त हैं।
कुछ स्मृतियां मूलतः प्रायश्चित्त परक हैं जिनमें विभिन्न प्रकार के व्रत उपवास एवं प्रायश्चित्त का विधान किया गया है जिनमें देवल स्मृति, व्यास स्मृति, बौधायन स्मृति, शातातप स्मृति का विशेष महत्त्व है। बौधायन स्मृति के अनुसार प्रायश्चित्त न करने से नरक भोगने के अनन्तर देह में चिन्ह, शारीरिक विकृति एवं असाध्य रोग के अङ्कुर हो जाते हैं।  देवल ने विभिन्न प्रकार की शुद्धि, जाति, शुद्धि तथा समाज शुद्धि की व्यवस्था की है। साथ ही समाज से बहिष्कृत जनों की पुनः अपने ग्राम या समाज में सम्मिलित करने की विधि भी बतायी है।

ङ. स्मृति-टीका परम्परा

टीका अत्यन्त प्राचीन परम्परा है। वेदों, उपनिषदों, ब्राह्मण आदि क्लिष्ट के ग्रन्थों को सरलतम विधि से पढ़ने की विद्या टीका है। टीका के माध्यम से क्लिष्ट ग्रन्थों की व्याख्या करने की परम्परा रही है। सायण, स्कन्दस्वामी, नारायण, माधव भट्ट आदि भाष्यकारों ने वेदों पर टीका लिखी। यही परम्परा अनन्तर बढ़ते हुए स्मृतिशास्त्र में भी उद्बोधित होती है। मेघातिथि, कुल्लूक, विज्ञानेश्वर, विशेश्वर आदि टीकाकारों में ये परम्परा परिलक्षित होती है। टीका जिसके माध्यम से हम मूलग्रन्थ के भावस्वरूप के रहस्य तक पहुंचते हैं।
टीका शब्द टीकृधातु से निष्पन्न है। टीकृ का मूल अर्थ - गति के स्वरूप में अन्तर्निहित है। टीका में टीकाकार मुख्य रूप से कर्ता की मूल भावना को ज्यों का त्यों पाठकों के सम्मुख स्पष्ट करने का प्रयास करता है तथापि भाष्य में भाष्यकार मूलग्रन्थ के भावों की सम्यग् विवेचना करते हुये उसके उचित अथवा अनुचित पक्ष का भी प्रकाशन करता है साथ ही मूलग्रन्थ की भावना के अनुकूल अथवा प्रतिकूल अपने मत की भी उपस्थापना निःसंकोच रूप से करता है।

1. मनुस्मृति तथा टीकायें

मुख्य स्मृतियों में मनुस्मृति सबसे प्राचीनतम कृति है। मनुष्य के धर्म का उल्लेख सर्वप्रथम मनुस्मृति में प्राप्त होता है। सर्वप्रथम ऋग्वेद में मनु शब्द का उल्लेख किया है।  इसमें मनु का अर्थ (मनुष्य) से किया गया है। मनु में पिता शब्द जुड़ा हुआ है जिससे यह अनुमान किया कि मनुष्य के पिता (मनु) हुए जिन्होंने सृष्टि को उत्पन्न किया तथा मनुस्मृति की रचना की। ऋग्वेद में मनु अर्थ मननशील के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है।  ऋग्वेद में वैवस्वत मनु मन्त्र दृष्टा ऋषि के रूप में उल्लिखित हुये हैं।
ऋग्वेद में उल्लिखित मनु स्मृतिकार मनु नहीं हो सकते हैं क्योंकि वेदों तथा स्मृतियों के रचनाकाल में अन्तर है।
महाभारत में स्वायंभुव मनु  तथा प्राचेतस मनु  का उल्लेख किया गया है। अपितु मनुस्मृति में स्वायंभुव मनु  तथा वैवस्वत मनु का उल्लेख किया है। मनु के वंश में उत्पन्न अन्य 6 मनुओं ने अपनी-अपनी प्रजा की सृष्टि की वह छः मनु हैं - स्वारोचिषु, उत्तम, तामस, रैवत, चाक्षुष तथा महातेजस्वी वैवस्वत। मनु स्मृति के अनुसार ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो भाग करके आधे भाग से पुरुष तथा आधे भाग से स्त्री हो गये उसी स्त्री से विराटनामक पुरुष की उत्पत्ति हुई।  फिर उस विराट पुरुष ने तपस्या करके जिसको उत्पन्न किया उसे इस संसार का रचयिता मनु को जानो।  तत्पश्चात् मनु ने तपस्या करके दस प्रजापतियों को उत्पन्न किया।  मनुस्मृति के अनुसार इस ग्रन्थ को ब्रह्मा ने सर्वप्रथम मुझे पढ़ाया तथा मैंने मरीचि इत्यादि प्रजापतियों को पढ़ाया।
मनु ने मनुष्य के धर्म को बताने के लिए धर्मशास्त्र में वर्ण धर्म, आश्रम धर्म, गुण धर्म, निमित्त धर्म, साधारण धर्म का विधिपूर्वक प्रतिपादन किया है।  इसकी भाषा सरल तथा सुगम है। शैली भी धारा प्रवाह है। इस स्मृति के बहुत से सिद्धान्त गौतम, बौधायन, आपस्तम्ब धर्मसूत्रों में दृष्टिगोचरित होते हैं।
मनुस्मृति के बहुत से श्लोक वसिष्ठ धर्मसूत्र तथा विष्णु स्मृति में प्राप्त होते हैं। मनुस्मृति सभी स्मृति ग्रन्थों में अत्यधिक प्राचीन तथा प्रामाणिक ग्रन्थ है। गौतम धर्मसूत्र में ‘‘त्रीणि प्रथमान्यनिर्देश्यानि मनु’’  कहकर मनु का समर्थन किया है। अत्रि, अंग्रिा आपस्तम्ब, बृहस्पति, पराशर में मनु को उद्धृत किया गया है। बाल्मीकि रामायण में मनु का वचन उद्धृत किया गया है इससे सिद्ध होता है कि मनुस्मृति अर्वाचीन है।
मनु ने पौण्ड्रक, चैड्र, द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, चीन, किरात, शक क्षत्रिय जातियों का उल्लेख किया।  इन जातियों का उल्लेख अशोक के पंचम शिला अभिलेख में प्राप्त होता है - ........ धंमयुतस च योण कंबो (ज) गंधाशन रिस्टिकपेतेणिकान्।  इतिहासकारों के अनुसार शकों ने (पार्थियों के शासक द्वितीय मिथ्रदत्त) (ई.पू. 123-88) की शक्ति बढ़ने के कारण) भारत की तथा रूख किया। अतः दूसरी शताब्दी ई.पू. के बाद मनु स्मृति की रचना हुई। मनुस्मृति का प्रणयन किसने किया इसका कोई साक्ष्य उपलब्ध नहीं है मानवों के आदि पूर्वज मनु ने इसका प्रणयन नहीं किया। प्रस्तुत मनुस्मृति में बारह अध्याय हैं तथा 1200 श्लोक हैं।
मनुस्मृति के नौ टीकाकार है - मेघातिथि, गोविन्दराज, कुल्लूक भट्ट, सर्वज्ञ नारायण, राघवानन्द, नन्दन, रामचन्द्र, मणिराम, भारूचि। इनमें मेघातिथि प्राचीन भाष्यकार माने जाते हैं।
मेघातिथि - मनुस्मृति पर मेघातिथि की टीका का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। मेघातिथि की टीका अत्यधिक प्राचीन एवं विद्वतापूर्ण मानी जाती है। मेघातिथि की टीका मनुभाष्यके नाम से प्रसिद्ध है। मनुस्मृति के बहुत से भाष्यों में मेघातिथि कृत टीका प्रथम प्रधान है। मनुस्मृति में मेघातिथि ने गौतम, बौधायन, आपस्तम्ब वसिष्ठ, विष्णु, शंङख, मनु, याज्ञवल्क्य, कात्यायन, पराशर, नारद, बृहस्पति, उशना, जैमिनी  आदि के नाम उद्धृत किये हैं। मेघातिथि की एक अन्य कृति है जिसका नाम स्मृति विवेकहै। 
अन्तः साक्ष्य के आधार पर यह कहा जा सकता है कि सहारण के पुत्र मदन नामक राजा ने किसी देश से मेघातिथि की प्रतियां मंगाकर भाष्य का जीर्णोद्धार किया। मनुभाष्य में मेधातिथि जन्मस्थान आदि का परिचय नहीं दिया है। आपने अपने पिता का नाम श्री भट्टवीरस्वामी बताया है।  मेधातिथि ने कुमारिल का उल्लेख किया है अतः मेघातिथि उनके बाद हुए हैं।  कुल्लक भट्ट ने इनको गोविन्दराज (1050-1140) ई. पू. माना है। पी.वी. काणे ने आपका समय 820 ई.-1050 ई. के बीच माना है। विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में मेधातिथि को प्रामाणिक भाष्यकार गृहीत किया है। अतः मिताक्षरा की अपेक्षा मेघातिथिः अधिक प्राचीन है।
कुल्लूक भट्ट - कुल्लूक भट्ट ने मनुस्मृति पर मन्वर्थमुक्तावलीटीका की रचना की। यह बहुत संक्षिप्त तथा सारगर्भिक भाषा शैली निहित है। मनुस्मृति पर बहुत से टीकाकारों में कुल्लूक टीका प्रधान है। कुल्लूक टीका में मेधातिथि , गोविन्दराज का अत्यधिक प्रभाव दिखाई देता है। कुल्लूक ने स्मृतिसागरनामक एक ग्रन्थ लिखा जिसमें अशौचसागर, विवादसागर, श्राद्धसागर नामक प्रकरण लिखे हैं।
कुल्लूक भट्ट गौड़ देश के (बंगाल) नन्दनग्राम निवासी थे। आपके पिता का नाम दिवाकर भट्ट था। आपके द्वारा टीका में मंगलाचरण में काश्मीर स्थित विद्वान कुल्लूक ने मन्वर्थ मुक्तावली की रचना की।
कुल्लूक का काल निर्णय करना कठिन है किन्तु गोविन्द का नामोल्लेख किया है अतः वे 1950 ई. के बाद ही माना जा सकता है। रघुनन्दन ने कुल्लूक का नामोल्लेख किया है। पी. वी. काणे के अनुसार कुल्लूक 1100-1300 ई. के बीच हुए होंगे।
गोविन्दराज - भाष्यकार गोविन्दराज ने मनुस्मृति पर एक टीका लिखी। उसका नाम मनुटीकाहै। गोविन्दराज ने अपने भाष्य में अपनी कृति स्मृतिमंजरीकी चर्चा की है।  आपके पिता का नाम माधव तथा नारायण के पौत्र थे।
कुल्लूक भट्ट ने अपने भाष्य मन्वर्थ मुक्तावली में गोविन्दराज कृत मनुटीका के बहुत से उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। अतः पी. वी. काणे ने गोविन्दराज को 1050 से 1140 के मध्य माना है। गोविन्दराज ने व्यास, उशना, देवल, पराशर, याज्ञवल्क्य स्मृतियों का उल्लेख किया है।
सर्वज्ञनारायण - सर्वज्ञनारायण ने मनुस्मृति पर मनवर्थ निबन्ध लिखा है।  पी. वी. काणे के अनुसार आपका समय 1400 ई. से पूर्व का है।
राघवानन्द - राघवानन्द सरस्वती ने मन्वर्थचन्द्रिका नामक टीका लिखी।  पी. वी. काणे के अनुसार आपका समय 1350 ए.डी. के बाद है।
नन्दन - नन्दन ने मनुस्मृति पर नन्दिनी नामक टीका लिखी। नन्दन के बड़े भाई का नाम लक्ष्मण था। इनके समय काल के बारे में कुछ भी ज्ञात नहीं है।
रामचन्द्र - रामचन्द्र ने दीपिका नामक टीका लिखी।
भारूचि - विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा (याज्ञ. 1/81, 2/124), पराशर स्मृति में माधवाचार्य ने (2/3, पृ. सं. - 10) भारूचि का उल्लेख किया है।  आचार्य रामानुज ने छः वेदान्ताचार्यों के नाम गिनाये हैं - बौधायन, टंक, द्रविण, गुहदेव, कपर्दी एवं भारूचि। पी. वी. काणे ने वेदान्ताचार्य भारूचि तथा धर्मशास्त्रकार भारूचि को एक मानते हुए आपका समय 9वीं शता. के प्रथमार्ध निश्चित किया है।

2. याज्ञवल्क्य स्मृति तथा टीकायें

उपलब्ध स्मृतियों में याज्ञवल्क्य स्मृति सबसे अधिक सुव्यवस्थित, सुगठित एवं सरल है। वैदिक साहित्य में याज्ञवल्क्य नाम सुप्रसिद्ध है। शुक्ल यजुर्वेद के वे प्रणेता माने जाते हैं। याज्ञवल्क्य का एक नाम वाजसनेन भी था क्योंकि शुक्ल यजुर्वेद का ज्ञान उन्हें वाजिन् (अश्व) रूप आदित्य से प्राप्त हुआ था।  महीधर के अनुसार वाजसनि का पुत्र होने के कारण वाजसनेय प्राप्त हुआ। इनके माध्यंदिननामक शिष्य के द्वारा इनकी शुक्ल यजुर्वेद का प्रचार होने के कारण इन्हें माध्यंदिनभी कहते हैं।
वायु पुराण में इन्हें ब्रह्मवाहसुत कहा गया है।  याज्ञवल्क्य को ब्रह्मा के अग् से उत्पन्न बताया गया है।  विष्णु पुराण में इन्हें ब्रह्मरात का पुत्र बताया है।
ब्रह्माण्ड पुराण में याज्ञवल्क्य के पिता का नाम ब्रह्मरात उल्लिखित है।  याज्ञवल्क्य के गुरु का नाम वैशम्पायन था।  इनके एक अन्य गुरु का नाम हिरण्यनाभ भी था।  इसका उल्लेख वायु पुराण में भी है।
श्रीमद्भागवत पुराण में याज्ञवल्क्य के पिता का नाम देवरात तथा गुरु का नाम वैशम्पायन उल्लिखित है।
याज्ञवल्क्य स्मृति में बृहदारण्यक उपनिषद का नामोल्लेख किया है।  अतः अन्तः साक्ष्य से प्रतीत होता है कि वृहदारण्यक में वर्णित याज्ञवल्क्य ही याज्ञवल्क्य स्मृति के रचयिता थे।
याज्ञवल्क्य के इस विवेचन से ऐसा प्रतीत होता है कि अनेक याज्ञवल्क्य हुए होगे। इस विषय में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है।
  याज्ञवल्क्य स्मृति की श्लोक संङ्ख्या में विभिन्न मत हैं। विज्ञानेश्वर प्रणीत मिताक्षरा व्याख्या के प्रस्तुत संस्करण में श्लोकों की संङ्ख्या 1009 है। विश्वरूप बालक्रीड़ा के भाष्य में (प्रस्तुत संस्करण) में 903 श्लोक हैं। डा. पी. वी. काणे ने याज्ञवल्क्य स्मृति का समय 100 ई. पू.-300 ई. के मध्य है।
याज्ञवल्क्य स्मृति को तीन अध्यायों में विभक्त किया गया है - आचाराध्याय, व्यवहाराध्याय, प्रायश्चित्त अध्याय।
    आचाराध्याय में निम्न विषयों का समावेश किया गया है - 1. उपोद्धात प्रकरण, 2. ब्रह्मचर्य प्रकरण 3. विवाह प्रकरण 4. वर्णजाति विवेक का वर्णन 5. गृहस्थ धर्म प्रकरण 6. स्नातक प्रकरण 7. भक्ष्याभक्ष्य प्रकरण 8. द्रव्यशुद्धि प्रकरण 9. दान प्रकरण 10. श्राद्ध प्रकरण 11. गणपतिकल्प प्रकरण 12. ग्रह शान्ति प्रकरण 13. राजधर्म प्रकरण
     व्यवहाराध्याय में निम्न विषयों का उल्लेख किया गया है - 1. साधारण व्यवहार मातृका प्रकरण 2. असाधारण व्यवहार मातृका प्रकरण 3. ऋणादान प्रकरण 4. उपनिधि प्रकरण 5. साक्षि प्रकरण 6. लेख्य प्रकरण 7. दिव्य प्रकरण 8. दाय भाग प्रकरण 9. सीमा विवाद प्रकरण 10. अस्वामि विक्रय प्रकरण 11. स्वामि पाल विवाद 12. दत्ताप्रदानि प्रकरण 13. क्रीतानुराय प्रकरण 14. अभ्युपेत्याशुश्रूषा प्रकरण 15. संविद्धन्यतिक्रम प्रकरण 16. वेतनादान प्रकरण 17. द्यूतसमोह्न प्रकरण 18. वाक्य पारूष्य प्रकरण 19. दण्डपारूष्य प्रकरण 20. साहस प्रकरण 21. विक्रीयासंप्रदान प्रकरण 22. संभूयसमुत्थान प्रकरण 23. स्तेय प्रकरण 24. स्त्री-संग्रह प्रकरण 25. प्रकीर्ण प्रकरण
प्रायश्चित्ताध्याय में छः विषयों को समावेशित किया गया है - 1. अशौच प्रकरण 2. आपद्धर्म प्रकरण 3. वानप्रस्थ प्रकरण 4. यतिधर्म प्रकरण 5. प्रायश्चित्त प्रकरण 6. प्रकीर्णक प्रायश्चित्तानि
याज्ञवल्क्य स्मृति पर सात टीकाएं हैं - विश्वरूप की बालक्रीड़ा, विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा, शूलपाणि की दीपकलिका, अपरार्क, नन्दपण्डित की मिताक्षरा पर प्रमीताक्षरा व विश्वेश्वर भट्ट की सुबोधिनी नामक टीका, बालम्भट्ट की बालम्भट्टी टीका प्रसिद्ध हैं।
न्याय व्यवस्था एवं उत्तराधिकार के सम्बन्ध में हिन्दू विधि के अन्तर्गत इस स्मृति का विशिष्ट स्थान है। याज्ञवल्क्य के अतिरिक्त याज्ञवल्क्य नाम की तीन स्मृतियां हैं - वृद्ध याज्ञवल्क्य, योग याज्ञवल्क्य एवं वृहद् याज्ञवल्क्य। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनेक टीकाकार का उल्लेख प्राप्त होता है।
विश्वरूप - धर्मशास्त्र साहित्य के आकाश में भाष्यकार विश्वरूप का योगदान है। भाष्यकारों में विश्वरूप सर्वप्रथम हैं। आपकी याज्ञवल्क्य स्मृति पर बालक्रीड़ानामक टीका अति प्रसिद्ध है। विज्ञानेश्वर ने मिताक्षरा में विश्वरूप भाष्य की चर्चा की है। ‘‘आचार्य शंकर के शिष्य सुरेश्वर को विश्वरूप माना गया है अपितु माधवाचार्य ने सुरेश्वर के ग्रन्थों से उद्धरण लिया है तथापि ग्रन्थकर्ता का नाम विश्वरूप लिखा है। आचार्य शंकर के चार शिष्य थे - सुरेश्वर, पद्मवाद, त्रोटक एवं हस्तामलक सुरेश्वर ही विश्वरूप थे इसका स्पष्ट निर्देश श्री रामतीर्थ ने अपने ग्रन्थ मानसोल्लासमें किया है।’’
जीमूतवाहन के दायभाग एवं व्यवहारमातृका, स्मृति चन्द्रिका आदि ग्रन्थों में विश्वरूप के मतों की चर्चा हुई है।
आचार्य शंकर का काल 788 ई. से 820 ई. तक है अतः विश्वरूप का समय 800 से 1000 ई. के मध्य हो सकता है।
विज्ञानेश्वर - याज्ञवल्क्य स्मृति पर विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका स्मृति ग्रन्थों में अद्वितीय है। पी. वी. काणे ने मिताक्षरा को केवल याज्ञवल्क्य स्मृति का एक भाष्य मात्र ही नहीं अपितु यह स्मृति सम्बन्धी निबन्ध माना है।  इसमें बहुत सी स्मृतियों के उद्धरण संकलित हैं। इसमें असहाय मेधातिथि, श्रीकर, भारूचि तथा भोजदेव का नामोल्लेख किया है। विज्ञानेश्वर में मीमांसा-शास्त्रीय जैसा वैदुष्य देखने को मिलता है।
आपका जन्म भारद्वाज गोत्र में हुआ था। इन्होंने अपने पिता का पद्मनाभ भट्ट उपाध्याय बताया है तथा परमहंस के शिष्य थे।
पी. वी. काणे के अनुसार विज्ञानेश्वर कृत मिताक्षरा टीका का रचना काल 1070 से 1100 के मध्य माना है।
कृत्यकल्पतरू में लक्ष्मीधर ने विज्ञानेश्वर का उल्लेख किया है। लक्ष्मीधर 12वीं शताब्दी में हुए थे। अतः मिताक्षरा का प्रणयन काल 12वीं शताब्दी से पूर्व हुआ था।
अपरार्क - याज्ञवल्क्य स्मृति पर अपरार्क भाष्य का नाम अपरार्क याज्ञवल्क्यधर्मशास्त्रनिबन्धहै। लम्बे-लम्बे उद्धरण लेने के कारण यह भाष्य धर्म सम्बन्धी एक निबन्ध माना जाता है।
जीमूतवाहन वंश के शिलाहार राजकुमार का नाम अपरादित्यदेवथा।  पी. वी. काणे के अनुसार अपरार्क को अपरादित्य भी कहा जाता है। शिलाहारों के अभिलेखों से ज्ञात होता है जीमूतवाहन वंश के तीन राज्य थे। (1) उत्तरी कोंकण (2) दक्षिण कोंकण (3) कोल्हापुर पी. वी. काणे के अनुसार उत्तरी कोंकण वाले शिलाहारों में अपरादित्य देव नाम प्रसिद्ध था।  अपने भाष्य में जो उपाधि अपरादित्य ने लिखा है वैसा ही शिलालेखों में उपलब्ध है यथा - शिलाहार, नरेन्द्र, जीमूतवाहनान्वय प्रसूत आदि।
मङ्खकृतकृत श्रीकण्ठचरितम्में वर्णन आया है कि कोंकण नरेश अपरादित्य ने तेजकण्ठ को कश्मीर नरेश जयसिंह की सभा में दूत बनाकर भेजा था। इससे यह ज्ञात होता है कि तेजकण्ठअपरार्क की टीका अपने साथ ले गये होंगे।
पी.वी. काणे के अनुसार आपका समय 12वीं शताब्दी पूर्वार्द्ध हो सकता है।
शूलपाणि - शूलपाणि ने याज्ञवल्क्य स्मृति पर दीपकलिकाभाष्य प्रसिद्ध है। यह टीका बहुत संक्षिप्त है। इस भाष्य में कल्पतरू, गोविन्दराज, मिताक्षरा, मेधातिथि एवं विश्वरूप के मतों में उल्लेख किया है। आपने स्मृतिविवेकनामक एक विस्तृत ग्रन्थ की रचना की। जिसमें विभिन्न भाग हैं - एकादशी विवेक, तिथि विवेक, दत्तक विवेक, दुर्गोत्सव विवेक, यात्रा विवेक, प्रतिष्ठा विवेक, प्रायश्चित्त विवेक, रासयात्राविवेक व्रतकालविवेक, शुद्धिविवेक, श्राद्ध विवेक, संक्रान्ति विवेक, सम्बन्ध विवेक।
शूलपाणि के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। शूलपाणि ने अपने ग्रन्थ प्रायश्चित्त विवेकमें साहुडियाल महामहोपाध्याय उपाधि दी है।  पी. वी. काणे के अनुसार बल्लालसेन के काल से बंगाल में साहुडियाल ब्राह्मण निम्न श्रेणी के कहे जाते हैं। पी. वी. काणे के अनुसार शूलपाणि का समय 1460 ई. पू. माना जा सकता है।

3. पराशर स्मृति तथा टीकायें

महाभारत के अनुसार पराशर वसिष्ठ ऋषि के पौत्र थे।  पराशर ने मरने की इच्छा रखने वाले वसिष्ठ मुनि को पुनः जीवित रहने के लिए उत्साहित किया था इसलिए वह लोक में पराशर नाम से विख्यात हुये।  पराशर के पिता का शक्ति था।  ऋग्वेद प्रथम मण्डल के 65 से 73 सूक्त तक पराशर मन्त्र दृष्टा ऋषि के रूप मेें वर्णित है। आचार्य यास्क ने पराशर का अर्थ पराशीर्ण (जर्जर) तथा वृद्ध वसिष्ठ ऋषि से उत्पन्न बताया है।  पराशर स्मृति प्राचीन स्मृति है क्योंकि याज्ञवल्क्य ने पराशर को धर्मवक्ताओं में गिना है।
पराशर स्मृति में मनु के उद्धरण प्राप्त होते हैं। मनु के अतिरिक्त इसमें उशनस, प्रजापति, शङ्ख आदि धर्मशास्त्रकारों का उल्लेख किया गया है। मिताक्षरा, अपरार्क, स्मृति चन्द्रिका, हेमाद्रि आदि अनेक ग्रन्थों में पराशर के उद्धरण प्राप्त होते हैं। पराशर स्मृति में बारह अध्याय एवं तीन काण्ड हैं - आचार, व्यवहार तथा प्रायश्चित्त। इनमें से व्यवहार काण्ड आचार्य माधव ने स्वयं जोड़ा है।
इसके प्रथम अध्याय से ज्ञात होता है कि सतयुग में मनु प्रोक्त मानव धर्मशास्त्र, त्रेतायुग में गौतम स्मृति, द्वापर में शंख लिखित स्मृति तथा कलियुग में पराशर स्मृति की प्रमुखता रहेगी।
पी. वी. काणे के अनुसार पराशर स्मृति प्रथम शताब्दी से पांचवीं शताब्दी के मध्य लिखी गई होगी।
पराशर के नाम से पराशर स्मृति, बृहत्पराशर स्मृति तथा वृहत् पराशर होरा शास्त्र है। जिनमें पराशर स्मृति एक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। वृहत्पराशर, पराशर स्मृति का विस्तृत रूप है। वृहत् पराशर होराशास्त्र ज्योतिष का विवेचन करती है। पराशर स्मृति के टीकाकार माधवाचार्य हैं।
माधवाचार्य - माधवाचार्य ने पराशर स्मृति पर पराशरमाधवीनामक टीका अति प्रसिद्ध है। माधवाचार्य विजय नगर के संस्थापक राजा बुक्क के मन्त्री थे। इनके पिता का नाम मायण तथा माता का नाम श्रीमती था। ये भारद्वाज गोत्र के थे। इनके दो छोटे भाई थे - सायण तथा भोगनाथ।  इनके गुरु का नाम सर्वज्ञ विष्णु तथा भारतीतीर्थ था। राज्य कार्य में प्रवीण माधवाचार्य ने उच्चकोटि के ग्रन्थों का निर्माण किया। सन्यास आश्रम ग्रहण करने के पश्चात् आपका नाम विद्यारण्यहुआ। आचार्य माधव ने स्वयं ही कहा है कि सम्पूर्ण व्यवहारअध्याय को स्वयं प्रतिपादित किया है।
श्री विद्यातीर्थ, भारतीतीर्थ एवं शंकरानन्द ये तीनों ही आचार्य माधवाचार्य के गुरु थे तथा सुप्रसिद्ध विशिष्टाद्वैताचार्य श्रीवेदान्तदेशिकाचार्य उनके समकालीन तथा बाल सखा थे।
माधवाचार्य ने निम्न ग्रन्थों की रचना की - 1. ऋग्वेद भाष्य 2. यजुर्वेद भाष्य 3. सामवेद भाष्य 4. अथर्ववेद भाष्य 5. चारों वेदों वा शतपथादि ब्राह्मण ग्रन्थों का विचार 6. दशोपनिषदद्यीपिका 7. जैमिनीन्याय माला विस्तर 8. पंचदशी 9. अनुभूति प्रकाश 10. ब्रह्मगीता 11. पराशर स्मृति भाष्य 12. मनुस्मृति व्याख्यान 13. सर्वदर्शन संग्रह 14. माधवीय धातुवृत्ति 15. शंकर दिग्विजय 16. कालनिर्णय।
पी. वी. काणे ने आपका समय 1330-1385 ई. के मध्य निर्धारित किया है।

4. नारद स्मृति तथा टीकायें

नारदीय मनु संहिता तथा नारद स्मृति में अधिकतम समानता है। इसमें हिन्दू धर्म के प्राचीन नियम हैं जो किसी प्राचीन ऋषि के द्वारा कहे गये हैं किन्तु इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि नारद ही वह ऋषि हैं।
नारद स्मृति का वास्तविक लेखक कौन है यह कितनी प्राचीन है यह आज भी प्रश्न का विषय बना हुआ है।
याज्ञवल्क्य ने नारद को धर्मवक्ता के रूप में नहीं माना है, अपितु कुछ आचार्यों ने इनकी गणना धर्मशास्त्रकारों में की है। नारद स्मृति में अट्ठारह प्रकरण तथा एक हजार अट्ठाइस (1028) श्लोक हैं। नारद स्मृति तथा मनुस्मृति दोनों में बहुत कुछ समानता है  क्योंकि नारद ने बहुत कुछ मनु स्मृति से लिया है। वर्तमान समय में प्राप्त नारद स्मृति का प्रतिपाद्य विषय व्यवहार है। नारद स्मृति के रचनाकाल के विषय में भी निश्चित कुछ नहीं कहा जा सकता है। याज्ञवल्क्य तथा पराशर ने नारद का नामोल्लेख नहीं किया है अतः यह याज्ञवल्क्य के बाद की रचना है अपितु मिताक्षरा ने नारद के उद्धरण प्रस्तुत किये हैं। नारद स्मृति में राजनीति पर केवल परोक्ष रूप से यत्र-तत्र चर्चा हुई है इसमें व्यवहार-सम्बन्धी बातों का अधिकतर उल्लेख किया है। पी. वी. काणे के अनुसार नारद स्मृति की रचना प्रथम शताब्दी से 300 ई. के बीच सम्भावित थे। अन्य ग्रन्थों में उनके उद्धरण प्राप्त होते हैं।  नारद स्मृति के भाष्यकार असहाय हैं।
असहाय - असहाय एक सुप्रसिद्ध टीकाकार थे। नारद स्मृति पर लिखित भाष्य दुर्भाग्यवश पूर्णरूप से उपलब्ध नहीं है। मनुस्मृति (मेधातिथि) भाष्य में असहाय का नामोल्लेख किया है। याज्ञवल्क्य स्मृति की व्याख्या में विश्वरूप ने असहाय को गौतम धर्मसूत्र के भाष्यकार के रूप में याद किया है।  विश्वरूप एवं मेधातिथि ने असहाय का उल्लेख किया है, अतः असहाय का समय 750 ई. के लगभग होना चाहिए।

5. कात्यायन स्मृति तथा टीकायें

कात्यायन हिन्दू विधि तथा व्यवहार की विशद् व्याख्या करने वाले धर्मशास्त्रकार हैं। इन्होंने व्यवहार सम्बन्धी विवरण में नारद तथा बृहस्पति को आदर्श माना है। इनके उद्धरण भाष्यों तथा निबन्धों में पाये जाते हैं। वीरमित्रोदय के प्रत्येक भाग में इसके उद्धरण प्राप्त होते हैं।  याज्ञवल्क्य तथा पराशर ने कात्यायन को धर्मवक्ताओं में माना है। बौधायन धर्मसूत्र में भी कात्यायन प्रमाणरूप से उद्धृत है।  कात्यायन ने भृगु का नामोल्लेख किया है।  व्यवहारमयूख ने एक वृहत्कात्यायन तथा दायभाग ने वृद्ध कात्यायन की चर्चा की है। कात्यायन ने प्रतिहारसूत्रम्की भी रचना की है। जीवानन्द संग्रह में एक कात्यायन स्मृति ग्रन्थ प्रकाशित है। जिसमें तीन प्रपाठक, 29 खण्ड एवं 500 श्लोक हैं।
इस ग्रन्थ को कात्यायन का कर्मप्रदीपकहते हैं।  कर्मप्रदीप में यज्ञोपवीत कर्म, श्राद्ध कर्म, पूताग्निप्रतिष्ठा, तर्पण विधि, पंचमहायज्ञ, ब्रह्मयज्ञ विधि, स्त्री धर्म, दाह संस्कार, शौच-अशौच आदि कर्तव्यों का वर्णन है। कात्यायन ने स्त्रीधन को मुख्य विषय माना है।
पी. वी. काणे के अनुसार कात्यायन, मनु एवं याज्ञवल्क्य के पश्चात आते हैं। नारद तथा बृहस्पति स्मृतियों का निर्माण भी उनके स्मृति प्रणयन से पहले हो चुका था। अतः आपका समय कम से कम चैथी तथा छठी शताब्दी के मध्य माना जा सकता है। कात्यायन स्मृति पर किसी टीकाकार का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है।

6. विष्णु स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने बीस धर्मशास्त्रकारों में विष्णु का उल्लेख किया है। इसके अतिरिक्त पैठानसि ने छत्तीस धर्मशास्त्रकारों में विष्णु की चर्चा की है। विष्णु स्मृति सौ अध्यायों में निबद्ध है। विष्णु स्मृति का प्रारम्भ सृष्टि के वर्णन से हुआ है। प्रथम अध्याय तथा अन्तिम के तीन अध्याय में विष्णु तथा लक्ष्मी की स्तुति की गई है। विज्ञानेश्वर, अपरार्क, देवणभट्ट तथा माधवाचार्य ने विष्णु स्मृति के श्लोकों को उद्धृत किया है।
विष्णु स्मृति का सम्बन्ध कठ शाखा के चरक संहिता के कृष्ण यजुर्वेद से माना जाता है। विष्णु स्मृति के बहुत से श्लोक मनुस्मृति , याज्ञवल्क्य स्मृति  तथा भगवतगीता  के समान हैं।
विष्णु स्मृति में वर्णित विषय निम्न हैं - सृष्टि की उत्पत्ति , वाराह द्वारा पृथ्वी का उद्धार, देवी की उत्पत्ति, पृथ्वी द्वारा विष्णु की स्तुति, वर्णाश्रम की रचना, राजधर्म, राजा के कर्तव्य, दिन तथा रात्रि परिवर्तन, अशौचविवाह, स्त्रीधर्म ब्रह्मचारी के नियम, सन्यास के नियम, ज्ञेयज्ञान, गम्यज्ञान, विचार आदि विषय मध्य के अध्यायों से सम्बद्ध हैं। अन्तिम अध्याय में पृथ्वी के प्रति नारायण की उक्ति है।
विष्णु स्मृति की शैली वसिष्ठ धर्मसूत्र के समान गद्य-पद्य मिश्रित है। विष्णु धर्मसूत्र का प्रकाशन कई बार हुआ है। जीवानन्द संग्रह धर्मशास्त्र संग्रह’ (1876 ई.), एशियाटिक सोसाइटी द्वारा (1881), वैजयन्ती टीका सहित डाॅ. जाली द्वारा सम्पादित (1962) चैखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी।
पी. वी. काणे के अनुमान के अनुसार विष्णु धर्मसूत्र का काल ईसापूर्व 300-100 के बीच माना है।
विष्णु स्मृति के टीकाकार नन्दपण्डित हैं।
नन्दपण्डित - विष्णु स्मृति पर वैजयन्ती नामक टीका लिखी गई। नन्दपण्डित ने संवत् 1679 में वैजयन्ती टीका पूरी की।  माधवानन्द हस्तलिखित ग्रन्थ के ऊपर आपने 1655 में कार्य किया। शुद्धिचन्द्रिका पर टीका शतशीतिकी रचना की। श्राद्धकल्पलता हस्तलिखित ग्रन्थ की रचना संवत् 1641 ई. में की। अतः आपका समय 1580-1630 ई. सन् के मध्य है। आपने निम्नलिखित पुस्तकों पर कार्य किया-
1.       दत्तकचन्द्रिका 2. दत्तक मीमांसा 3. हरिवंश विलास 4. ज्योतिषशास्त्र समुच्चय 5. काशीप्रकाश 6. माधवानन्द काव्य 7. नवरात्रप्रदीप 8. मीताक्षरा पर प्रथिताक्षरा व्याख्या 9. स्मार्तसमुच्चय 10. स्मृतिसिन्धु 11. श्राद्धकल्पलता 12. श्राद्धमीमांसा 13. शुद्धिचन्द्रिका 14. शूद्राधिकारमीमांसा 15. तत्व मुक्तावली 16. तीर्थकल्पलता 17. पराशरस्मृति पर विद्वन्मनोहरा व्याख्या 18. विनायक शान्ति पद्धति।

7. बृहस्पति स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने बृहस्पति की चर्चा धर्मशास्त्रकारों में नहीं की है तथापि बृहस्पति को धर्म शास्त्रकार के रूप में रखा जा सकता है। बृहस्पति देवताओं के गुरु माने जाते हैं। ऋग्वेद के 10वें मण्डल के 71 एवं 72वें सूक्त के मन्त्र दृष्टा ऋषि माने गये हैं।
बृहस्पति अर्थशास्त्रकार भी माने गये हैं। कौटिल्य ने भी बृहस्पति नाम का उल्लेख किया है।  बृहस्पति ने धर्म, अर्थ, काम पर ब्रह्मा के ग्रन्थ को 3000 अध्यायों में संक्षिप्त किया।  वनपर्व में बृहस्पति नीति का उल्लेख किया है।  1921 में लाहौर डी.ए.वी. कालेज के रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर प्रो. भगवत दत्त ने अपनी अतिरिक्त प्रस्तावना के साथ डाॅ. टामस द्वारा सम्पादित बृहस्पति स्मृति ग्रन्थ देवनागरी लिपि में प्रकाशित हुआ। इस सूत्र ग्रन्थ में देवराज इन्द्र तथा देवगुरु बृहस्पति के संवाद के रूप में है। इस ग्रन्थ को प्रारम्भ में ही नीतिसर्वस्व अर्थात् राजनीति का संक्षेप कहा गया है।
बृहस्पति नाम से दूसरा ग्रन्थ बृहस्पति स्मृति है। स्मृति ग्रन्थ की रचना व्यवहार प्रधान है। डाॅ. जाली द्वारा सम्पादित बृहस्पति स्मृति में 711 श्लोक हैं। इनके अनुसार बृहस्पति स्मृति में निम्न बातें बताई गई हैं - 1. व्यवहारभियोग के चार स्तर प्रमाण, गवाह, लेखप्रमाण, भुक्ति (स्वत्व), दिव्य, 18 स्वत्व, ऋणादान, निक्षेप, अस्वाभिविक्रय, सम्भूयन्समुत्थान, दत्ताप्रदानिक, अभ्युपेत्याशुश्रूषा वेतनस्यानपाकर्म, स्वामिपालविवाद, सेविद्व्यतिक्रम, विक्रीयासम्प्रदान, पारूष्य साहस, स्त्रीसङ्ग्रहण, स्त्रीपुंसधर्म विभाग, द्यूत, समाह्य, प्रकीर्णक।
स्मृति सन्दर्भ में प्रकाशित बृहस्पति स्मृति इससे भिन्न हैं इसमें दान कर्म का वर्णन किया गया है - यथा - सुवर्ण पृथ्वीदानफलमहत्त्व वर्णनम्, गोचर्म लक्षणं पृथिवीदानफलवर्णनम्, सफलं नीलवृषभलक्षणं, भूमिहर्तुनिन्दावर्णनम्, अन्यायेन भूमिहरणेफलं कन्यानृतादिविषयेदोषनिरूपणफलम्, तडायादिनिर्माणकला- भिधानम्।
पी. वी. काणे के अनुसार बृहस्पति स्मृति का समय 200 से 400 ई. के बीच हो सकता है। आपने अर्थशास्त्री बृहस्पति तथा स्मृतिकार बृहस्पति दोनों अलग-अलग माने हैं। स्मृति ग्रन्थ को महत्त्व प्रदान करने के लिए बृहस्पति नाम जोड़ दिया गया है। बृहस्पति स्मृति पर किसी भी टीकाकार का उल्लेख प्राप्त नहीं होता है।

8. हारीत स्मृति तथा टीकायें

हारीत स्मृति में आचार पक्ष पर अधिक बल दिया गया है। इसी कारण इसके व्यवहार सम्बन्धी उद्धरण अन्य ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं। वस्तुतः स्मृति वाङ्मय बहुत विशाल है, किन्तु अनेक स्मृतियां अभी तक उपलब्ध नहीं हो सकी है तथा कुछ के पूर्ण रूप से प्राप्त नहीं हो सकी है।
हारीत स्मृति के दो भाग हैं - लघु हारीत स्मृति, वृद्ध हारीत स्मृति।
लघु हारीत स्मृति में 7 (सात) अध्याय हैं - पहला अध्याय तेईसवें (23) श्लोक में लिखा है कि स्मृति तथा श्रुति को न जानने वाले ब्राह्मण के कुल को नष्ट कर देता है।  ब्राह्मण के धर्म को पहले अध्याय में बताया गया है।
इसमें ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, संस्कार, ब्रह्म विवाह की विधि, अतिथि पूजन, वानप्रस्थ आश्रम, वर्णाश्रम आदि धर्मों एवं कर्मों के नियम बताये गये हैं।
वृद्ध हारीत स्मृति में आठ अध्याय हैं - इसमें प×च संस्कार, वैष्णव सम्प्रदाय की दीक्षा, मन्त्र विधान, भगवत समाराधन विधि, तामस देवताओं का वर्णन, राजा का धर्म, संसार मुक्ति के उपाय, पूजन, जप, उपासना का विधान, आचारानुसार भगवान के महोत्सव की विधि, पापों का वर्णन, प्रायश्चित्त वर्णन, विष्णु पूजा आदि का वर्णन किया गया है।
वृद्ध हारीत में वैष्णव धर्म के अनुसार तुलसी तथा आंवले की मिट्टी से स्नान करने का विधान है।  काणे ने इसके रचनाकाल के सम्बन्ध में अपने ग्रन्थ धर्मशास्त्र का इतिहास में बृहस्पति तथा कात्यायन के समकालीन मानते हैं अर्थात् यह स्मृति 400 ईस्वी तथा 700 ईस्वीं के मध्य कभी प्रणीत होगी। हारीत स्मृति पर भी किसी टीका का उल्लेख नहीं प्राप्त होता है।

9. गौतम स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने गौतम को धर्मशास्त्रकार माना है। गौतम स्मृति इक्कीस अध्यायों में मिलती है इसमें आचार वर्णन के प्रसंग में ब्रह्मचारी के कर्म गृहस्थाश्रम तथा उसके कर्तव्य संस्कार वर्णन , राजधर्म वर्णन, साक्षियों अनध्याय प्रायश्चित्त महापातकियों के लिए प्रायश्चित्त, गुप्त पापों के प्रायश्चित्त कृच्छ् तथा अतिकृच्छ व्रत की विधि, चान्द्रायण व्रत की विधि तथा पुत्रों को अपने पिता की सम्पत्ति में अधिकार आदि का वर्णन है। गौतम धर्मसूत्र केवल गद्य में है। इसमें कोई भी पद्य नहीं मिलता है। वसिष्ठ धर्मसूत्र तथा गौतम धर्मसूत्र के बहुत से सूत्र एक ही हैं।

10. अङ्गिरा स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने बीस धर्मशास्त्रकारों में अङ्गिरा का भी उल्लेख किया है। कलकत्ता संस्करण से प्राप्त स्मृति सन्दर्भ में अङ्गिरा स्मृति नामक स्मृति उपलब्ध होती है। तिहत्तर पद्यों में निबद्ध यह स्मृति अति संक्षिप्त है। सम्भवतः यह वृहत् स्मृति का संक्षिप्त रूप है। अङ्गिरा स्मृति के बहुत से उद्धरण अन्य ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं तथा वीरमित्रोदय के सभी प्रकरणों में उसके उद्धरण प्राप्त होते हैं। अङ्गिरा स्मृति में केवल प्रायश्चित्त का ही विधान है। अन्त्यज के पात्र में पानी पीने के प्रायश्चित्त रूप में सान्तपन व्रत, अज्ञान से पानी पीने पर केवल एक दिन का उपवास , उच्छिष्ट भोजन करने पर प्रायश्चित्त, गाय के वध्य करने पर गाय को अन्य क्षति पहुंचाने पर प्रायश्चित्त का विधान, निषिद्ध व्यक्ति का खाने पर प्रायश्चित्त  आदि अनेक प्रकार के प्रायश्चित्तों तथा उन प्रायश्चित्तों से सम्बद्ध चन्द्रायण व्रत, सान्तवन व्रत आदि व्रतों का विधान मिलता है। अङ्गिरा स्मृति में अङ्गिरा ने स्वयं अपना तथा आपस्तम्व के नामों का उल्लेख किया है।
आङ्गिरस स्मृति के कई संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। थियोसोफिकल सोसाइटी के अन्तर्गत अड्यार पुस्तकालय मद्रास से प्रकाशित है। जीवानन्द संङ्ग्रह में प्रकाशित आङ्रिस स्मृति में कुल 1297 श्लोक हैं। आङ्गिरस स्मृति के दो भाग हैं - 1. पूर्वाङ्गिरसम् 2. उत्तराङ्गिसम।
पूर्वाङ्गिरसम् में 1113 श्लोक हैं तथा उत्तराङ्गिरसम् में 164 श्लोक तथा 12 अध्याय हैं। अङ्गिरा स्मृति पर भी किसी की टीका नहीं प्राप्त है।

11. संवर्त स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य तथा पैठीनसि ने धर्मशास्त्रकारों में संवर्त का उल्लेख किया है। संवर्त के आचार सम्बन्धी श्लोकों को अन्य भाष्यकारों तथा आचार्यों ने उद्धृत किया है। इस स्मृति का आरम्भ वामदेवादि ऋषियों तथा संवर्त वार्तालाप से हुआ है। इसके अतिरिक्त इस स्मृति में ब्रह्मचर्य वर्णनसन्ध्योपासना, विवाह, अशौच  शुद्धि श्राद्धकर्म, विविध दानों का महात्म्य, कन्या का विवाहकाल, दान, गृहस्थ की दिनचर्या, वानप्रस्थ याति धर्म पापों का विधान, प्रायश्चित्त, उपवास, ब्राह्मण भोजन, गायत्री जप, प्राणायाम आदि का वर्णन है। सम्वर्त स्मृति पर भी टीकायें नहीं प्राप्त होती हैं।

12. दक्ष स्मृति तथा टीकायें

दक्ष स्मृति सात अध्यायों तथा 208 श्लोकों में निबद्ध है। याज्ञवल्क्य ने दक्ष का उल्लेख किया है। विश्वरूप, मिताक्षरा, अपरार्क ने दक्ष से उद्धरण लिये हैं। इस स्मृति में वर्णित विषय निम्नलिखित हैं -
प्रथम अध्याय में - भक्ष्याभक्ष्य आदि दोषों से रहित बाल्यकाल , उपनयन संस्कार की अवधि, आश्रमों का महात्म्य तथा सभी आश्रमवासियों के लक्षण आदि का वर्णन है।
द्वितीय अध्याय में - वैदिक कर्मों के अनुसार दिनचर्या स्नान तथा सन्ध्या का महात्म्य, अन्नदान स्नान के प्रकार, गृहस्थ के कर्मों तथा गृहस्थाश्रम के महात्म्य आदि का वर्णन है।
तृतीय अध्याय में - गृहस्थ के नव कर्मों तथा विकर्मों, सुख के साधन रूप धर्म तथा चरित्र का वर्णन है।
चतुर्थ अध्याय में - स्त्री धर्म का वर्णन है।
पंचम अध्याय में - शौच की परिभाषा, वाह्य तथा आभ्यान्तर शोध, जल तथा मृत्तिका शोध आदि का वर्णन है।
षष्ठ अध्याय में - जन्म तथा मृत्यु पर होने वाले शौच तथा अशौच के न्यूनाधिक्य आदि का वर्णन है।
सप्तम अध्याय में - योग के अगें , योग सिद्धि, समाधि, यति के कर्तव्य तथा दक्ष स्मृति के महात्म्य आदि का वर्णन है।
दक्ष स्मृति पर भी कोई टीका नहीं प्राप्त होती है।

13. यम स्मृति तथा टीकायें

यम स्मृति के विषय में स्पष्ट नहीं कहा जा सकता है। पी. वी. काणे के अनुसार विश्वरूप, स्मृति चन्द्रिका अनादि बाद वाले ग्रन्थ यम के लगभग 300 श्लोकों को उद्धृत करते हैं। इस कथन के आधार पर यह किसी यम की वृहद् पुस्तक होगी जिसके उद्धरण व्याख्याकारों तथा निबन्धकारों ने दिये हैं। श्रीमन्महर्षि प्रणीत स्मृति सन्दर्भ नामक धर्मशास्त्रसंग्रह में प्राप्त यम स्मृति में 78 श्लोकों में निबद्ध है तथा उसमें केवल प्रायप्रिायश्चित्तश्चतों का ही विधान हुआ है।  इसके अतिरिक्त इसी नाम वाली लघुयम स्मृति 99 श्लोकों में तथा ब्रहद्यमस्मृति 182 पद्यों में प्राप्त होती है।
यम स्मृति की भी कोई टीका नहीं प्राप्त होती है।

14. आपस्तम्ब स्मृति तथा टीकायें

आपस्तम्ब प्रसिद्ध सूत्रकार एवं स्मृतिकार भी थे। प्रायः धर्मसूत्रकार स्मृतियों के नाम से प्रसिद्ध हैं। प्रस्तुत स्मृति शुद्धि विषयक तथा प्रायश्चित्त विषयक आचारों की प्रधानता है। इसमें दस अध्याय हैं। इसमें बालक तथा गौ के पालन करने में असावधानी होने पर प्रायश्चित्त का वर्णन, जलशोधन का विचार, चाण्डाल के कुएं से जल पीने पर चारों वर्णों का प्रायश्चित्त, ब्राह्मण चाण्डाल को स्पर्श करने का प्रायश्चित्त, नीलवस्त्र धारण करने का प्रायश्चित्त, कांस आदि पात्रों की शुद्धि, भोजन में अयोग्य पदार्थ का सेवन करने का प्रायश्चित्त तथा अन्त में मोक्ष प्राप्ति का साधन का वर्णन किया गया है। मनुस्मृति की छाप इस स्मृति में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है।  अतः इसका समय द्वितीय शताब्दी के बाद है। इस पर कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है।

15. अत्रि स्मृति तथा टीकायें

कलकत्ता से प्रकाशित स्मृति सन्दर्भ में अत्रि स्मृति प्राप्त होती है उसमें छः अध्याय तथा 145 पद्य हैं। इसके प्रधान विषय हैं - आत्मशुद्धि, सभी प्रकार के पापों से मुक्ति, गायत्री जप का महात्म्य, वेदाभ्यास का महात्म्य तथा सभी पापों का प्रायश्चित्त, पाद प्रक्षालनभोजन के समय मण्डल का विधान आदि शुद्धि वर्णन सूतक दिन निर्णय, अन्तिम अध्याय में पांच पद्यों में स्वर्गमुख प्राप्ति तथा दान से स्वर्ग की प्राप्ति  आदि का वर्णन है।
अत्रि स्मृति की भी टीका अप्राप्त है।

16. शातातप स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने शातातप की गणना धर्मशास्त्रकारों में की है जैसा कि याज्ञवल्क्य स्मृति के प्रथम अध्याय के पांचवें पद्य में बतलाया गया है। यह स्मृति छः अध्यायों तथा 218 पद्यों में प्राप्त होती है। सम्पूर्ण शातातप स्मृति में केवल प्रायश्चित्तों का विधान हुआ है यथा पूर्वजन्म कृत प्रायश्चित्त चिह्न, सामवेद द्वारा पापों का प्रायश्चित्त, हत्या के पाप के नाश के लिए प्रायश्चित्त प्रकीर्ण रोगों का प्रायश्चित्त कुल को नाश करने वाले के लिए प्रायश्चित्त, अगम्यागम्य प्रायश्चित्त अनुचित व्यवहार पल, अगति प्रायश्चित्त वर्णन आदि।
शातातप स्मृति की टीका भी अनुपलब्ध है।

17. व्यास स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने धर्मशास्त्रकारों में व्यास की चर्चा की है। इस स्मृति के बहुत से उद्धरण अन्य ग्रन्थों में प्राप्त होते हैं। पी. वी. काणे ने अपने ग्रन्थ ‘‘धर्मशास्त्र का इतिहास’’ में जहां व्यास स्मृति की चर्चा की है वहां पर लिखा है कि - अपरार्क, चन्द्रिका तथा अन्य ग्रन्थों में लगभग 200 श्लोक उद्धृत है जिनसे प्रतीत होता है कि व्यास ने व्यवहार विधि पर लिखा है तथा नारद तथा बृहस्पति से उनके सिद्धान्त बहुत कुछ मिलते हैं। पी. वी. काणे ने व्यास स्मृति का समय 200 ई. से 500 ई. के बीच माना है। इसके अतिरिक्त वृहद्व्यास तथा लघुव्यास स्मृति का भी उल्लेख मिलता है। व्यास स्मृति में लेख्य प्रमाण, व्यवहार, राजशासन, दिव्यों की चर्चा आदि विषयों का उल्लेख किया है।
व्यास स्मृति पर भी कोई टीका उपलब्ध नहीं है।

18. वशिष्ठ स्मृति तथा टीकायें

याज्ञवल्क्य ने धर्मशास्त्रकारों में वशिष्ठ का नामोल्लेख किया है उसमें वशिष्ठ बीसवें स्थान पर आते हैं। स्मृति सन्दर्भ में वसिष्ठ स्मृति प्राप्त है। उसमें सात अध्याय तथा 1139 पद्य हैं। इस स्मृति का वण्र्य विषय निम्न प्रकार है -वर्णाश्रमों के नित्य, नैमित्तिक कर्मों का वर्णन वैष्णवों के नामकरण, संस्कार का वर्णन तथा वैष्णव धर्म के अनुसार अन्य संस्कारों का वर्णन, गृहस्थ धर्म, स्त्री धर्मनित्य नैमित्तिक विधि तथा सातवें अध्याय में विष्णु के स्थान का वर्णन है।
वसिष्ठ स्मृति पर भी टीका उपलब्ध नहीं है।
इससे प्रतीत होता है स्मृति तथा उसकी टीका परम्परा निबद्ध रूप में चली आ रही है। कुछ स्मृतियों की टीकायें अप्राप्त हैं यथासमय यह टीकायें समाज में लुप्त हो गईं।