गुरुवार, 27 मार्च 2014

स्मृति ग्रन्थों में आचरण की व्यवस्था (द्वितीय अध्याय) आचरण के स्वरूप

द्वितीय अध्याय - स्मृतियां तथा आचार स्वरूप
क. आचार - अर्थ
ख. आचार - क्षेत्र तथा प्रकार
ग. आचार तथा वर्णाश्रम व्यवस्था
घ. आचार - महत्त्व

क. आचार - अर्थ

       आचार का शाब्दिक अर्थ है - अच्छा आचरण। महर्षि मनु ने ‘‘ब्राह्मणादि तथा अम्बष्ठ-रथकार आदि वर्णसङ्कर जातियों का कुल परम्परागत जो आचार है वही सदाचारकहा है।
भविष्य पुराण के अनुसार ‘‘क्षमा, इन्द्रिय, दमन, दया, दाम, सत्य, पवित्रता, धैर्य, धारण, मृदुता, सरलता, सन्तोष, निरभिमान, तप, शम, धर्म, ज्ञान, चुगली न करने, ब्रह्मचर्य, विद्वान, ध्यान, आस्तिकता, द्वेषहीन, स्वर्ग आदि लोक में विश्वास रखने, बैर न करने, वैराग्य, पाप से डरने वाला, चोरी, मत्सर एवं तृष्णा न करने वाला संसार से पृथक रहकर गुरुसेवा करने वाले, मन वाणी तथा शरीर का संयम रखना सदाचार है।
वामन शिवराम आप्टे ने आचार का अर्थ 1. आचरण, व्यवहार, कार्य करने की रीति, चाल-चलन, 2. प्रथा, रिवाज, प्रचलन, लोकाचार, प्रथा सम्बन्धी कानून।
वाचस्पत्यम् में भी आचारकी व्युत्पत्ति बताते हुए उसे सदाचार तथा कदाचार इन दो रूपों में विभाजित किया है।
    संस्कृत के प्रसिद्ध कोश शब्दकल्पद्रुममें आचार का अर्थ बताते हुए मनुस्मृति, हेमचन्द्र तथा बृहस्पति को उद्धृत किया है। यादवप्रकाशाचार्य ने भी आचार का अभिप्राय वृत्त, चरित्र, चरणादि से लेकर इष्टपूर्वक कर्मों के रूप में उसकी व्याप्ति बताई है।
हलायुध ने आचार का तात्पर्य आचरण, शील, चरित्र आदि शब्द बताये हैं। 
संस्कृत शब्दार्थ कौस्तुभ में आचार का तात्पर्य चाल, चलन, चरित्र, चाल-ढाल। रीति-रिवाज, चलन, पद्धति। सदाचार, शील किया है।
शिवराम वामन आप्टे ने आचार का अभिप्राय बताते हुए मनु को उद्धृत किया है।
सर मोनियर विलियम्स ने आचार के लिए प्रयुक्त होने वाले ‘‘मारल’’, ‘‘मारल फिलासफी’’ तथा ‘‘मैनर’’ का पर्याय माना है।
    इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार का सम्बन्ध ऐच्छिक क्रियाओं से है अनैच्छिक क्रियाओं से नहीं - जैसे छींकना, खांसना आदि। आचार का सम्बन्ध इच्छानुसार होने से किस प्रकार कार्य करना चाहिए ? क्या उपयुक्त है क्या अनुपयुक्त ? इसी उपयुक्त तथा अनुपयुक्त को परखने वाली कसौटी ही आचार शास्त्र हैं।
आचार को प्रायः कर्तव्य तथा धर्म से जोड़ा जाता है। यद्यपि आचार तथा धर्म मानव जीवन की दो अलग-अलग पंूजी है अपितु दोनों ही एक दूसरे के पूरक हैं। अंग्रेजी में आचार को एथिक्सतथा धर्म को रिलीजनकहा जाता है। रिलीजनशब्द देश तथा काल की परिधि में सीमित है। आचार्य बलदेव उपाध्याय ने रिलीजनका अर्थ धर्म मानने पर टिप्पणी करते हुए कहा है ‘‘अंग्रेजी शब्द रिलीजनके लिए हमने धर्म को पर्याय मानकर बड़ी गलती की दोनों में महान अन्तर है। रिलीजनका यथार्थ पर्याय मजहबहै न कि धर्म। किसी देश विशेष में किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा सामयिक उपयोगिता की दृष्टि से एक दूसरे को विशिष्ट समाज के रूप में बांधने के लिए जो आचार नियम बनाये जाते हैं वे ही रिलीजनके अन्तर्गत आते हैं। यह शब्द लातीनी भाषा के रिलिजिओशब्द से निष्पन्न है जो मूलतः रेलिगारे’ (बांधना धातु से सम्बद्ध) है। फलतः रिलीजनएक समाज विभिन्न मानवों को बांधने वाली अनुष्ठान विधियों का द्योतक है।’’
धर्म शब्द धृधातु से बना है जिसका अर्थ है - धारण करना, आलम्बन लेना या पालन करना। धर्मशब्द का बहुत शास्त्रकारों ने विभिन्न अर्थ प्रकट किये हैं। ऋग्वेद में धर्म धार्मिक क्रियाओं या धार्मिक संस्कारों के रूप में प्रयुक्त हुआ है।  धर्म अलौकिक शक्ति का द्योतक है।  कहीं-कहीं धर्म का अर्थ निश्चित नियम तथा आचार नियम के लिए प्रयुक्त हुआ है।  इन नियमों से संसार के लोग सुखी तथा स्वच्छन्द पूर्वक रहते हैं।
वेदों में अग्नि को धर्म का उपादान माना गया है।
उपनिषद् साहित्य में भी वेदों के अतिरिक्त धर्म का वर्णन प्राप्त होता है। छान्दोग्योपनिषद् में वर्णाश्रम धर्म तत्व के रूप में प्रयुक्त हुआ है।  भारतीय दर्शन के अनुसार अभ्युदय तथा निःश्रेयस की सिद्धि धर्म का लक्ष्य है।’’  भगवतगीता में धर्म शब्द से अभिप्राय है कि प्रत्येक मनुष्य अपने कर्तव्य का पालन करें।  महाभारतानुसार हिंसा न करना ही सबसे बड़ा धर्म है।
स्मृतिशास्त्र में धर्म को कर्तव्य के अर्थ में प्रयुक्त किया है।  महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी धर्म को कर्तव्य के अर्थ में प्रयुक्त किया है।  मिताक्षरा में धर्म के छः स्वरूप बताये गये हैं।
     धर्म की प्रेरणा से सदाचार उत्पन्न होता है।  सदाचार का प्रत्यक्ष तथा साक्षात् आदर्श लोगांे को एक सजीव प्रेरणा प्रदान करता है। धर्म सम्बन्धी विवाद में सदाचार का प्रत्यक्ष आदर्श निर्णायक कार्य करता है। धर्म के विधानों में विरोध होने से धर्म का निर्णय कठिन हो सकता है किन्तु सदाचार के आदर्शों में इतना अधिक विरोध कभी सम्भव नहीं है।
       वेद, स्मृति तथा सदाचार धर्म के तीन मुख्य प्रमाण हैं। उनसे प्रमाणित आचार ही धर्म है। महाभारत धर्म के यही तीन प्रमाण माने गये हैं। अहिंसा, सत्य, दया आदि इन्हीं के अनुसार धर्म ठहरते हैं। स्मृतियों में इनका विधान है। मनु ने आत्मप्रियता अथवा आत्मतुष्टि को धर्म का एक चतुर्थ प्रमाण माना है।  इस मर्यादा के अन्तर्गत अपने प्रिय तथा अनुकूल कर्म भी धर्म हो सकते हैं।
जीवन बहुत विशाल तथा जटिल है। उसके अनेक पक्ष, अनेक परिस्थितियां तथा अनेक सम्बन्ध होते हैं। जीवन की इस जटिलता तथा विविधता के अनुरूप धर्म के विशेष लक्षण अनेक रूप बन जाते हैं। इस प्रकार धर्मशास्त्रों, वेदों, स्मृतियों, महाभारत में धर्म के सामान्य सिद्धान्त एवं स्वरूप तथा सामान्य लक्षणों के साथ-साथ धर्म के विविध रूपों का भी विवरण किया जाता है।

ख. आचार क्षेत्र तथा प्रकार

आचार क्षेत्र अत्यधिक विस्तृत है। मनुष्य के सभी कार्य किसी न किसी रूप में आचार के अन्तर्गत आते हैं। अतः स्मृतिकारों ने आचार का वर्णन करते हुये।
आचार के दो भेद माने हैं - 1. सदाचार 2. अशौचाचार महर्षि अत्रि ने आचार के दो भेद किये हैं - यम तथा नियम
अक्रूरता, क्षमा, सत्य, अहिंसा, दान, नम्रता, प्रीति, प्रसन्नता, मधुर वाणी तथा कोमल स्वभाव ये दश यम हैं।  शौच, यज्ञ, तप, दान, वेद का पढ़ना, लिंग, इन्द्रिय को रोकना, व्रत, मौन, उपवास, स्नान ये दस नियम हैं।
महर्षि शंङ्ख के अनुसार क्षमा, सत्य, दम तथा पवित्रता चारों वर्णों का सामान्य नियम है।
मनु ने धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच (पवित्रता) इन्द्रियों को वश में करना, ज्ञान, विद्या, सत्य, क्रोध का त्याग ये धर्म के दस लक्षण हैं।
महर्षि याज्ञवल्क्य ने लोक विरूद्ध आचार का पालन का निषेध करते हुए कहते हैं कि - ‘‘कर्म मन तथा वचन से यत्नपूर्वक धर्म का आचरण करे धर्म विहित होने पर लोकविरूद्ध कर्म हो तथा उससे स्वर्ग की प्राप्ति न हो तो उसे नहीं करना चाहिए।
सदाचार के अन्तर्गत काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, ईष्र्या, राग-द्वेष, झूठ, कपट, छल, दम्भ आदि असद् कारणों का त्याग तथा सत् आचरणों को ग्रहण करना चाहिए।
सत्य बोलना, क्रोध का त्याग करना, दान देना, हिंसा नहीं करना तथा सन्तान उत्पन्न ये सब मनुष्यों के धर्म हैं।
मनु के अनुसार मनुष्य को अवस्था, कर्म, सम्पत्ति, शास्त्र तथा कुल के अनुसार ही वेष, वचन तथा बुद्धि का व्यवहार करना चाहिए।
    याज्ञवल्क्य स्मृति में अहिंसा, सत्य, अचैर्य, शौच (पवित्रता), इन्द्रिय संयम, दान, दम (अन्तःकरण का संयम), दया (दीनों पर) तथा (अपकार पर भी) क्षमा ये सभी के लिये (सामान्य रूप से) धर्म के साधन हैं।  योग को सर्वश्रेष्ठ धर्म बतलाया है।  यज्ञ करना, अध्ययन तथा दान ये कर्म वैश्य तथा क्षत्रिय के भी हैं। ब्राह्मण में दान लेना, यज्ञ कराना तथा अध्यापन कराना (ये वैश्य तथा क्षत्रिय से) अधिक हैं।’’
आयु, बुद्धि, धन, वाणी, वेष, शास्त्रज्ञान एवं कर्म उपयुक्त ऐसी जीवन-वृत्ति स्वीकारनी चाहिए जो टेढ़ी तथा मत्सर युक्त न हो।
     पराशर स्मृति में स्नान, जप, होम, देवताओं की पूजा, अतिथि सत्कार तथा वैश्वदेव यज्ञ - ये नित्य कर्म हैं।  पराशर ने गृहस्थ के कर्म तथा आचार का, चारों वर्णों तथा आश्रमों के साधारण धर्म का प्रवचन किया।
वैशेषिक दर्शन में आचार के दो भेद माने हैं - सामान्य तथा विशेष। सामान्य धर्म सभी वर्णों तथा आश्रमों पर लागू है तथा विशेष धर्म किसी एक वर्ण या आश्रम के नियमों पर आधारित है। प्रशस्तपाद के मतानुसार ‘‘श्रद्धा, अहिंसा, भूतहितता, सत्य वचन, अस्तेय (चोरी न करना), मनोभाव शुद्धिरूप, अनुपधा, कोप परित्याग, स्नान एवं शुद्ध धृत, तिल, द्रव्यों का पर्व दिनों में नियम से सेवारूप शुचिद्रव्य सेवन तथा वेदशास्त्र सम्मत देवताओं की भक्ति, एकादशी आदि व्रत तथा नित्य (सन्ध्योपासना) नैमित्तिक कर्मों का तथा प्रमाद न करना सम्पूर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन त्रैवर्णिको के सामान्य आचार हैं  तथा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य के होमादि, वेदपाठ तथा अपने द्रव्य ने पर की सत्ता प्राप्त करना रूप दान, यह तीन सामान्य धर्म के साधन हैं। किन्तु दान शब्द से शास्त्रीय कर्मोक्ति यज्ञादि सम्बन्ध विशिष्ट दान लेना चाहिए, क्योंकि सामान्य दान का शूद्र को भी अधिकार है। विशिष्ट व्यक्ति से दान लेना, अध्यापन तथा ऋत्विक्कर्म ये तीन केवल ब्राह्मण के धर्म के साधन हैं, क्योंकि इन्हीं तीन कर्मों द्वारा उपार्जित द्रव्य से ब्राह्मण को धर्म-कर्म में अधिकार है तथा अड़तालीस प्रकार के ब्राह्मण के संस्कार भी वैदिक कर्मों के अनुष्ठान करने की योग्यता संपादन द्वारा धर्म के साधन होते हैं तथा अच्छी तरह शास्त्रोक्त राजधर्म के अनुसार प्रजा का पालन, अधर्मी दुष्टों को दण्ड देना, युद्ध में अनिवर्तन (न भागना) यह तीन केवल क्षत्रिय वर्ण के विशिष्ट धर्म के साधन हैं। उनके शास्त्रोक्त गर्भाधानादि संस्कार भी विशिष्ट धर्म के साधन हैं।’’
    पतंजलि ने योगसूत्र में ‘‘अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य तथा अपरिग्रह, पांच यम तथा शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्राणिधान, मनुष्य के पालन योग्य दस धर्म बताये हैं।
मीमांसा में धर्म का लक्षण ‘‘चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः’’ कहा गया है। मीमांसा के अनुसार धर्म के दो भेद हैं - लौकिक तथा पारमार्थिक। लौकिक कर्तव्य का अर्थ है जिससे फल प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो। पारमार्थिक के फल प्रत्यक्ष दृष्टिगोचरित नहीं होते हैं। याज्ञ का अनुष्ठान करना लौकिक धर्म है।
पारमार्थिक कर्तव्य के दो भेद हैं - काम्र्य कर्म तथा नैमित्यिक कर्म।
       आचार को धर्म तथा कर्तव्य से जोड़ा गया है। वेद जिसे धर्म कहते हैं स्मृतियां उसे आचार तथा कर्तव्य से उद्बोधित करती हैं। दर्शनशास्त्र में भी मनु के समान आचार का वर्गीकरण किया गया है।
अतः इससे प्रतीत होता है कि वेदों से लेकर आधुनिक संस्कृत साहित्य में धर्म, आचार, कर्तव्यों का वर्गीकरण इस प्रकार किया गया है कि उनमें मनुष्य के जीवन के समस्त कार्य समाहित हो गये हैं।
ग. आचार तथा वर्णाश्रम व्यवस्था
व्युत्पत्ति की दृष्टि से वर्ण शब्द प्रचलित अर्थ से भिन्नता रखता है। वर्ण शब्द वृधातु से बना है इसका प्रयोग वर्णन करने, वरण करने एवं रंग के अर्थ में होता है। कहीं-कहीं जीविका के भी अर्थ में प्रयुक्त होता है। ब्रह्मणादि चारों वर्णों का वर्ण क्रमशः श्वेत, रक्त, पीत एवं कृष्ण माना गया है। इसी प्रकार सत्वगुण, रजोगुण, तमोगुण का वर्ण भी अलग-अलग माना गया है। मनु के अनुसार सभी व्यक्तियों में सत्व, रजस् तथा तमस् गुण प्राप्त होते हैं। अतः जिस मनुष्य में जिस गुण की अधिकता होती है वह उसी गुण के अनुकूल शरीर धारण करता है।  मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति में वर्ण की दैवी उत्पत्ति मानी गई है। लोक वृद्धि के लिए ब्रह्मा ने मुख, बाहु, उरु तथा पैर से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र की सृष्टि की।
वर्ण व्यवस्था के सम्बन्ध में तीन मत प्रचलित हैं। प्रथम मत के अनुसार केवल जन्मगत ही वर्ण का निर्णय होता है। दूसरे मत के अनुसार कर्म के अनुसार वर्ण व्यवस्था होनी चाहिए। तीसरे मत के अनुसार जाति तथा कर्म के अनुकूल कर्म करने वाला व्यक्ति ही उस वर्ण का माना जा सकता है। अतः धर्म के द्वारा चार प्रकार से कर्मों को विभाजित करके मानव समाज में चातुर्वण्र्य की स्थापना की गई है।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भारतीय मनीषियों ने गुण कर्म के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र इन चार वर्णों का सृजन किया।
    चारों वर्णों का सामान्य आचार मनु ने निम्नलिखित कहा - अहिंसा, सत्य, अस्तेय, शुद्धता (आन्तरिक तथा भीतरी मानसिक तथा बाह्य शरीर आदि की स्वच्छता), इन्द्रियों को रोकना, श्राद्धकर्म, अतिथि सत्कार, दान, अस्तेय, सरलता अपनी स्त्रियों में सन्तानोत्पादन तथा अनसूया अर्थात् दूसरे के शुभ में द्वेष का न होना यह चारों वर्णों का सामान्य आचार है।
    ब्राह्मण आचार - अध्यापन, अध्ययन, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना तथा दान लेना ये छः कर्म ब्राह्मणों के हैं।  इन छः कर्मों में से वेदाध्यापन, यज्ञ कराना तथा विशुद्ध से दान लेना ब्राह्मण की जीविका के लिये है।  उपनिषद् सहित वेद का अभ्यास (प्राजापत्य आदि) तप (ब्रह्मविषयक) ज्ञान इन्द्रियों का संयम, अहिंसा तथा गुरुजनों की सेवा ये ब्राह्मण के लिए श्रेष्ठ मोक्षसाधक छः कर्म हैं।
ब्रह्मचारी के दो भेद माने गये हैं - 1. उपकुर्वाण 2. नैष्ठिक
उपकुर्वाण - जो छब्बीस वर्ष का ब्राह्मण केशान्त कर्म तक शास्त्रोक्त व्रतों को करता है उपकुर्वाणक ब्रह्मचारी कहते हैं।  जो ब्रह्मचारी ब्रह्मचर्याश्रम के सीमान्त में गृहस्थाश्रम में प्रवेश करता है। वह उपकुर्वाण ब्रह्मचारी है।
नैष्ठिक - जो ब्रह्मचारी यज्ञोपवीत से लेकर मृत्युपर्यन्त ब्रह्मचर्य व्रत धारण करता है तथा एक वस्त्री है वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी है।  नैष्ठिक ब्रह्मचारी आचार्य के समीप रहे, आचार्य के मरने पर उनके पुत्र के अथवा उनकी पत्नी के पास या उनके अग्नि की रक्षा करे।
क्षत्रिय आचार - वेदाध्ययन, यज्ञ करना तथा दान देना ही क्षत्रिय का कर्तव्य है।
वैश्य आचार - व्यापार, पशुपालन, खेती करना वैश्य का कर्म है तथा दान देना, अध्ययन करना तथा यज्ञ करना धर्म है।
शूद्र आचार - शूद्र के लिए ब्रह्मा ने एक ही कर्म का विधान किया - हार्दिक प्रसन्नता के साथ तीनों वर्णों की सेवा अर्थात् उनके कर्मों में सहायता करना।
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, पवित्रता, इन्द्रियों का संयम, दान देना, अन्तःकरण का संयम, दया तथा धैर्य धारण करना ये सभी व्यक्तियों के लिये सामान्य आचार के साधन हैं।
इस प्रकार सभी वर्ण एक दूसरे पर आश्रित हैं। कोई भी वर्ण दूसरे वर्ण की उपेक्षा करके जीवित नहीं रह सकता है। सभी वर्णों के स्व-स्व आचार हैं जिसका पालन करना अनिवार्य है।
वर्ण व्यवस्था के पश्चात् आश्रम व्यवस्था का उल्लेख स्मृतियों में प्राप्त होता है। आश्रम मानव जीवन की आध्यात्मिक यात्रा में विश्राम स्थल है। आश्रम शब्द संस्कृत की श्रमधातु से बना है। जिसका अर्थ परिश्रम एवं कार्य तथा शरीर को उद्देश्य के साथ गतिशील रखना होता है।
आश्रम शब्द का शाब्दिक अर्थ विश्राम होता है। हिन्दू संस्कृति के अनुसार जीवन का अन्तिम लक्ष्य मोक्षोपलब्धि है। मानव जीवन की विशाल यात्रा में आश्रम विश्राम स्थल है। प्राचीन भारतीय विद्वानों ने जीवन को चार भागों में विभक्त कर, चतुः सूत्री विभाजन के अनुकूल चार आश्रमों का संयोजन किया। इन आश्रमों में प्रत्येक मनुष्य अपनी अवस्था तथा कर्मों के अनुकूल यथाक्रम चारों आश्रमों में पदार्पण करता है।
आश्रम का सम्बन्ध व्यक्ति के व्यक्तिगत जीवन से है। इस अवस्था के अनुकूल मनुष्य का आध्यात्मिक लक्ष्य निर्धारित किया गया है। आश्रम व्यवस्था केवल द्विजों के लिए है शूद्रों के लिए नहीं। आश्रम के चार भेद माने गये हैं - ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम, वानप्रस्थाश्रम, सन्यासाश्रम।
ब्रह्मचर्य आश्रम - ब्रह्मचारी गुरु के घर में वास करते हुए पृथ्वी पर शयन, अग्निहोत्र करें तथा गुरु के लिये जल का घड़ा, ईंधन तथा गायों के निमित्त घास का प्रबंध करे।  मृगछाला, दण्ड मेखला (मूंज की कौंधनी), यज्ञोपवीत इनको सावधान तथा अप्रमत्त होकर धारण करें।  प्रातः तथा सायं के समय भिक्षा निमित्त भ्रमण करें तथा नित्य आचमन के पश्चात् दन्तधावन करना चाहिये।  छत्री, जूता, गंध, माला, नृत्य, गाना, निरर्थक बोलना तथा मैथुन का त्याग करना चाहिये।
ब्रह्मचारी हाथी तथा घोड़े पर न चढ़े।  सन्ध्या के उपरान्त गुरु के दोनों चरणों में नमस्कार करने के पश्चात माता-पिता की सेवा करे।  गुरु से सम्पूर्ण चारों वेद या एक वेद को पढ़कर उन्हें दक्षिणा दे उसके उपरान्त ग्राम में निवास करे।  मधु, मांस, लेप तथा अंजन, जूठा भोजन, कठोर वचन, अश्लील तथा असत्य भाषण तथा दोषान्वेषण का त्याग करे।  ब्रह्मचर्याश्रम में रहते हुए, रोगादि विपत्ति से मुक्त दशा में किसी एक व्यक्ति के अन्न का भोजन न करें।
इससे प्रतीत होता है कि ब्रह्मचारी का जीवन अत्यन्त कष्टकारी होता है। विद्या की प्राप्ति अत्यन्त शुद्ध तथा सात्विक ढंग से की जाती है।
 वृहत्पराशर में ब्रह्मचारी के चार भेद हैं - 1. गायत्र 2. वैधस 3. नैष्ठिक 4. प्राजापत्य
गायत्र - जो नमक रहित भोजन करता है, गायत्री जप करता है, नित्य भिक्षा द्वारा जीविकोपार्जन करता है।
वैधस - भिक्षा पर जो ब्रह्मचारी चारों वेदों का अध्ययन करता है।
नैष्ठिक - वृहत्पराशर याज्ञवल्क्य का अनुसरण करते हैं।
प्राजापत्य - जो ऋतुकालाभिगामी, परस्त्री एवं पर्व वर्जित हो तथा भिक्षा ग्रहण करता है वह वेदार्थी प्राजापत्य कहलाता है।
गृहस्थाश्रम - मनु ने चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वश्रेष्ठ माना है। गृहस्थ ही (ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ तथा सन्यासी) का पालन करता है।  गृहस्थ आश्रम में मानव उषाकाल में उठकर शौचादि करे।  पड़वा, अमावस्या, छठ तथा नवमी तिथि में दातौन न करें क्योंकि ऐसा करने से उसके सात कुल दग्ध हो जाते हैं।  पहले मन्त्रों से आचमन करके तत्पश्चात स्नान करे तथा मन्त्रों से आत्मा को शुद्ध कर जल की अंजुलि से सूर्य भगवान को अर्पित करे।  प्रातःकाल सन्ध्या तथा सायं सन्ध्या में गायत्री का जप करें। सन्ध्या वन्दन के उपरान्त बुद्धिमान ब्राह्मण घर में जाकर शास्त्रानुसार स्वयं होम करें। इसके पश्चात पुत्र भृत्य आदि के भरण-पोषण के निमित्त चिन्ता करे।
द्विज जल से देव आदि के तीर्थ से सूर्यदेवता का तर्पण करें।  श्रद्धायुक्त होकर कुशा के आसन पर बैठकर कुशा हाथ में लेकर पूर्वमुख करके विधि के अनुसार ब्रह्मयज्ञ करें।  इसके उपरान्त वैश्वदेव की विधि के अनुसार वैश्वदेव बलि दे, जितने समय तक गौदुहन हो सकता है उतने समय तक गृहस्थ अतिथि की राह देखे।  सन्यासी तथा ब्रह्मचारी भिक्षुक को बलिवैश्वदेव के लिये अन्न को निकालकर भिक्षा देकर विदा करे।  गृहस्थ मनुष्य प्रथम सुहागिन तथा कुमारी, बालक तथा वृद्ध इन मनुष्यों को भोजन कराकर शेष बचे अन्न को खाये।  भोजन के उपरान्त आचमन करके इष्टदेवता का स्मरण करता हुआ उदर का स्पर्श करें, इसके उपरान्त विद्वान मनुष्य कुछ समय को इतिहास तथा पुराणों के सुनने में व्यतीत करें।  तत्पश्चात्  विधिविधान सहित ग्राम से बाहर जाकर सन्ध्यावन्दन करें, तत्पश्चात् होम करके तथा अभ्यागत को भोजन कराकर आप रात्रि को भोजन करें।
मनु ने गृहस्थाश्रम के चार भेद कहे हैं - 1. कुसूलधान्यक 2. कुम्भीधान्यक 3. त्र्यहैहिको 4. अश्वस्तिनिक ।
कुसूलधान्यक - जो ब्राह्मण गृहस्थ तीन वर्ष या अधिक समय तक परिवार तथा भृत्यादि के भरण-पोषण योग्य अन्न का संचय करने वाला ही ‘‘सोमयाग’’ का अधिकारी है।  मेघातिथि के अनुसार एक साल का अन्न स×चय करने वाला ‘‘कुसूलधान्यक’’ गृहस्थी है।  गोविन्दराज के अनुसार केवल बारह दिन का अन्न स×चय करने वाला ‘‘कुसूलधान्यक’’ है। मेघातिथि का मत कुछ ठीक प्रतीत होता है अपितु गोविन्दराज का मत ठीक नहीं है।
गृहस्थ ब्राह्मण उच्छ, शिल, अयाचित, कृषि, याचित तथा व्यापार इन छः कर्मों के द्वारा परिवारादि का पालन-पोषण करें।
कुम्भीधान्यक - कुल्लूक के मतानुसार एक वर्ष तक परिवार भृत्यादि के पालन-पोषण करने योग्य अन्न स×चय करने वाला कुम्भीधान्यक गृहस्थी है।’’  मेघातिथि के अनुसार छः माह का अन्न स×चय करने वाला कुम्भीधान्यक है।  गोविन्दराज मतानुसार 6 दिन का अन्न स×चय करने वाला कुम्भीधान्यक है।  कुम्भीधान्यक गृहस्थ उच्छ, शिल, अयाचित इन तीन कर्मों से जीविकोपार्जन करे।
त्र्यहैष्टिक - उच्छ, शिल तथा अचायित में से अपनी इच्छानुसार किन्हीं दो कर्मों से जीविकोपार्जन करता है त्र्यहैहिक गृहस्थ कहलाता है।
अश्वस्तनिक - गृहस्थ शिल तथा उच्छ में से एक कर्म द्वारा जीविकोपार्जन करता है उसे अश्वस्तनिक गृहस्थ कहते हैं।
सर्वप्रथम गृहस्थ के वर्गीकरण में यह उठता है कि उच्छ, शिल क्या है। किसान के द्वारा खेत में बोये हुए अन्न को काटकर ले जाने के बाद उनमें गिरे हुए एक-एक दाने को दोनों अग्ुलियों से चुनने को उच्छतथा उसी खेत में एक-एक धान्य के गुच्छों को चुनना शिलकहते हैं।
इससे प्रतीत होता है कि उत्तम जीविका चलाने वाला ब्राह्मण यदि उच्छ तथा शील वृत्तियों के माध्यम से उसके परिवार का पालन-पोषण करेगा तो पालन-पोषण असम्भव हो जाएगा। इसलिये मेघातिथि, कुल्लूक आदि आचार्यों ने यज्ञ करना, पढ़ना, दान लेना, कोई गृहस्थ यज्ञ कराने तथा पढ़ाने से तथा चैथा केवल पढ़ाने के माध्यम से परिवारादि का पालन-पोषण करे। किन्तु इन कर्मों को निःस्पृह होकर ही करना चाहिये।
वृहत्पराशर स्मृति में भी गृहस्थों के चार भेद कहे हैं - 1. वार्ता वृत्ति 2. शालीन वृत्ति 3. यायावर 4. घोर सन्यासी
आश्रमों के क्रम में वानप्रस्थ तीसरा आश्रम है। यह आश्रम गृहस्थाश्रम की समाप्ति तथा सन्यासाश्रम के मध्य ऐसा समय है जो सन्यासाश्रम में जाने से पूर्व उसका अभ्यास कराता है। जिस प्रकार द्वितीय आश्रम के कर्मों का ज्ञान प्रथम आश्रम के ज्ञानार्जन द्वारा प्राप्त होता है ठीक उसी प्रकार तृतीयाश्रम चतुर्थ आश्रम की पृष्ठभूमि तैयार करता है। वानप्रस्थाश्रम में व्यक्ति को ज्ञान तथा उपासना के द्वारा साधना करनी पड़ती है। वानप्रस्थाश्रम में व्यक्ति काम, क्रोध, मोहादि पर विजय प्राप्त करता है।
वानप्रस्थ आश्रम - स्मृतियों में गृहस्थाश्रम के अनन्तर तीसरे आश्रम के रूप में वानप्रस्थाश्रम का विधान किया गया है। इस आश्रम के लिए वैखानस अभिधान का भी प्रयोग किया गया है। वानप्रस्थाश्रम तप तथा संयम का जीवन था। इस आश्रम में झुर्री-वृद्धावस्था दिखाई देने लगे तब वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करें।  पुत्र तथा पौत्र का दर्शन के बाद वन को जाना चाहिये। पत्नी को पुत्र को सौंपकर या पत्नी के साथ, वैतानिक अग्नि तथा उपासना (गृहाग्नि) सहित वन में जाकर निवास करे। बिना जुती हुई भूमि पर स्वयं उत्पन्न (नीवार, वेणु, श्यामक) आदि अन्न से प×च महायज्ञ करें।  स्वाध्याय को नहीं छोड़ना चाहिये।  ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये।  मृग आदि का चर्म या पेड़ों का वल्कल धारण करे।
जटा, दाढ़ी-मूंछ एवं नख बढ़ाये अर्थात् क्षौर कर्म न करें।  प्रातः, मध्याु तथा सायं तीन समय स्नान करे।  वानप्रस्थ गांव से भी भोजन ला सकता है। उसको पत्तल पर अथवा एक ही पत्ते पर, हाथ अथवा मिट्टी के पात्र में रखकर आठ ग्रास भक्षण करे।  वानप्रस्थी तप के द्वारा शरीर को सूखा दे।  ग्रीष्म ऋतु में अग्नि का सेवन करे।  वर्षा ऋतु में गीली भूमि पर सोवें।  हेमन्त ऋतु में गीले वस्त्र पहनकर रहें।  रात्रि में भोजन करें तथा एक, दो, तीन दिन त्यागकर चैथे दिन भोजन करें।
पुष्प, फल, शाक तथा पत्ते खायें। शुक्ल पक्ष तथा कृष्ण पक्ष में चान्द्रायण व्रत के नियम से भोजन करें।  पत्थर से अन्नादि फोड़कर, कूटकर तथा सब भक्ष्य पदार्थों को दांतों से चबाकर खानेवाला बने।  तपस्या ही इस जीवन की प्रमुख क्रिया है। वानप्रस्थ की तपस्याएं तथा जीवनवृत्ति क्रमशः कठोर होती जाती हैं। तप का महत्त्व बताते हुए विष्णु स्मृति में कहा गया है - ‘‘इस सम्पूर्ण देव तथा के संसार के मूल में तप ही है, इसके मध्य तथा अन्त में तप ही हैं। यह तप द्वारा ही धारण किया जाता है।’’  वानप्रस्थी वायु का भक्षण करते हुए (उपवास रहकर) पूर्व उत्तर दिशा (ईशान कोण) की तथा तब तक चले जब तक शरीर का क्षय (मृत्यु) न हो जाए।
सन्यासाश्रम मानव जीवन का अन्तिम आश्रम है। अतएव इसमें प्रविष्ट होने के पूर्व मानव को अपने जीवन के सभी आवश्यक उत्तरदायित्वों से निवृत्त हो जाना चाहिए। प्रथम दो आश्रमों में ज्ञानार्जन तथा पुत्रोत्पादन के द्वारा क्रमशः ऋषि ऋण तथा पितृ ऋण से मुक्त होने की व्यवस्था है। द्वितीयाश्रम में भी देव ऋण यज्ञादिकों के द्वारा चुकाया जा सकता है। इसके लिये तृतीय आश्रम भी सहायक है। प्रजापति आदि यज्ञों की समाप्ति के उपरान्त ही सन्यास ग्रहण किया जा सकता है।
सन्यासाश्रम आचार - अपने वय के तीसरे भाग को इस प्रकार (तपश्चर्यादि) के द्वारा वन में बिताकर वय के चैथे भाग में सब विषयों का त्यागकर सन्यासाश्रम में प्रवेश करे।  सन्यास ग्रहण करते समय गृहस्थ प्रजापति की इष्टि कर अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति निर्धनों में बांट दे।  सन्यास आश्रम में प्रवेश लेने के उपरान्त पुत्रों के प्रति स्नेह तथा उनके पालन पोषण आदि की वृत्ति को त्याग दे।  प्रव्रज्या लेने पर त्रिदण्ड धारण करे, जिस पर अङगुल मात्र तथा श्यामा गौ के केशों से बनी रज्जु लिपटी हों, जिसमें ग्रन्थि सम हों।  शौच के समय तथा आसन के निमित्त कौपीन तथा शीत निवारणार्थ कंथा (गुदड़ी) ग्रहण करें।
किसी वस्तु का स×चय न करे, चरण पादुका सदैव अपने पास रखे।  इस आश्रम वस्त्र के स्थान पर केवल एक कौपीन धारण करना विहित था।  सामान्य नियम यह था कि वह वर्षाकाल में एक स्थान पर रहता था, किन्तु किसी ग्राम में एक रात्रि से अधिक निवास नहीं करता था।  अग्नियों को अपने में आरोपित कर भिक्षा के लिए ग्राम में प्रवेश करें।  यदि भिक्षा न मिले तो दुःख न करे।  सात घरों में भिक्षा मांगे।  किसी दूसरे सन्यासी से भिक्षा न मांगे।  जब सेवक भोजन कर लें, भोजन के पात्रों को हटा दिया गया हो तब भिक्षा मांगे।  पात्रों को स्वयं धोये।  विनम्रतापूर्वक मांगने से प्राप्त भिक्षा का परित्याग करे।  बड़, पीपल, अगस्त्य, तंेदुक, कनेर, कदम्ब के पत्तों में भोजन न करे।  (भोजन एवं पात्र प्रक्षालन के बाद) सन्यासी आचमन तथा ध्यान कर स्तुति करे तथा बाकी बचा समय, जप, दान, इतिहास-अध्ययन में बिताए  फिर सन्ध्या कर (किसी आच्छादित) घर में रात्रि का समय बिताए तथा अपने कमलरूपी हृदय में अविनाशी आत्मा का ध्यान करे।
वृहत् पराशर ने सन्यासी के चार भेद कहे हैं - 1. कुटीचक 2. बहूदक 3. हंस 4. परमहंस
1.       कुटीचक - कुटीचक सन्यासी अपने गृह में ही सन्यास धारण करता है। शिखा, जनेऊ, त्रिदण्ड, कमण्डलु, धारण करता है तथा अपने पुत्र,   कुटुम्बियों से भिक्षा मांगकर खाता है। अपने पुत्रों द्वारा निर्मित कुटिया में रहता है। योग मार्ग के जानने वाले कुटीचक मोक्ष प्राप्ति के साधनों में लगे रहते थे।
2.       बहूदक - बहूदक सन्यासी के त्रिदण्ड, कमण्डलु, कषाय वस्त्र पहनते हैं। सात ब्राह्मण के यहां से भिक्षा मांगते हैं। मांस, नमक एवं बासी भोजन नहीं लेता है।
3.       हंस - सन्यासी जटा धारण करने वाले, त्रिपुण्डधारी, अनिश्चित घरों से मधुकरी लेकर भोजन करने वाले तथा कौपीन खण्ड एवं टूंबी धारण करते हैं।
4.       परमहंस - किसी वृक्ष के नीचे, शून्यगृह या श्मशान में निवास करने वाले, नग्न या वस्त्रधारी परमहंस सन्यासी संसार के सत्यासत्य एवं द्वैताद्वैत आदि द्वन्द्वों एवं उलझनों से परे होते हैं। इनमें समदृष्टि होती है। आत्मवत् सबको समझते हैं। किसी भी वर्ण के यहां भिक्षा लेना इनके लिये धर्मविरूद्ध नहीं है।
आश्रम व्यवस्था एक ही व्यक्ति के विभिन्न कार्यों में पूर्वापर निश्चित करके उसे इस बात का ज्ञान कराती है कि वह अपने जीवन को एक ऐसे क्रम मेें आबद्ध कर दे जिससे उसके अनेक सामाजिक दायित्वों की पूर्ति आयु के विभिन्न स्तरों में हो सके। व्यक्ति की आयु को चार भागों में बांटकर उसको इस बात का अवसर दिया जाता था वह अपने ऋणों को यथावत् पूर्ण कर सके। चारों आश्रमों को दो प्रकार से विभाजित किया जा सकता है। पूर्वार्ध एवं उत्तरार्द्ध। पूर्वार्ध ब्रह्मचर्य तथा गृहस्थाश्रम आते हैं। उत्तरार्द्ध में वानप्रस्थ तथा सन्यास आश्रम आते हैं। इससे प्रतीत होता है कि मनुष्य के आचार के अन्तर्गत उसके दैनिक दिनचर्या का समावेश किया गया है जिससे मनुष्य स्वच्छ एवं सुन्दर जीवन-यापन कर सके तथा अन्त में मोक्ष प्राप्ति कर सके।

घ. आचार-महत्त्व

आचार के महत्त्व का प्रतिपादन संस्कृत साहित्य में प्राचीन काल से विस्तृत रूप में किया गया है।
स्मृतियों में आचार का सर्वप्रथम प्रतिपादन मनुस्मृति में किया गया है। आचार का महत्त्व बताते हुए मनु कहते हैं कि - ‘‘आचार परम धर्म है, इसलिए आत्मवान् द्विज को इसमें सदा निरत रहना चाहिये।’’  आचार से च्युत वेद के फल को प्राप्त नहीं करता है।  आचार को धर्म का मूल माना है।
विष्णु स्मृति में दीर्घजीवी होने का रहस्य बताते हुए कहा है कि - ‘‘सब लक्षणों से हीन होने पर भी सदाचारवान्, श्रद्धावान् तथा ईष्र्या न करने वाला व्यक्ति सौ वर्षों तक जीवित रहता है।’’  आचार से आयु, गति तथा अक्षय धन की प्राप्ति होती है। आचार से अलक्षण का नाश होता है।
बृहत्पराशर स्मृति के अनुसार आचारवान् मनुष्य इस लोक में तथा परलोक दोनों ही लोकों में श्रेष्ठ है।  आचार की वृक्ष रूप में कल्पना की  है जिसमें ‘‘आचार रूपी वृक्ष की जड़ शास्त्र, श्रुति कृत्यों में शाखा के रूप में, नियोग को पर्ण रूप में तथा यश प्राप्ति के पुष्प के समान है।  आचार-वृक्ष का फल स्वर्ग है, उनमें स्वाद मुक्ति है अतः अनन्त फलदायी तत्व आचार का यत्नपूर्वक पालन करना चाहिए।  आचार के महत्त्व को बृहत्पराशर स्मृति में स्पष्ट करते हुए कहा गया है कि - जो दुर्जन व्यक्ति होते हैं वे क्लेश के भागी होते हैं, निरन्तर रोगों से घिरे रहते हैं तथा अल्पायु होते हैं किन्तु आचारवान् पुरुष इसके विपरीत सुखभागी होते हैं।  आचारवान् मनुष्य के पास आयु, वित्त, पुत्र, सुख धर्म तथा शाश्वत ईशलोक में विद्वज्जनों के द्वारा आदर प्राप्त करते हैं।
आचार ही चारों वर्णों के धर्मों का पालन करने वाला है। आचार के बिना किये गये धर्म कथनमात्र ही है क्योंकि जो मनुष्य आचार से भ्रष्ट हैं उनसे धर्म विमुख हो जाता है।
वसिष्ठ स्मृति में भी आचारहीन व्यक्ति की निन्दा की गई है तथा सदाचारी व्यक्ति को श्री एवं धन से युक्त तथा दीर्घजीवी बताया गया है।  आचार से हीन मनुष्य का वेदाध्ययन अग्निहोत्र तथा दक्षिणा किसी भी प्रकार से उद्धार नहीं कर सकते हैं।
छहों वेदांगों सहित वेद भी आचारहीन मनुष्य को पवित्र नहीं कर सकते।  आचार सभी का धर्म है, आचार से हीन मनुष्य इस लोक तथा परलोक दोनों में नष्ट होता है।  छल-कपट के साथ करने वाले मायावी पुरुष को पढ़े हुए वेद पाप से पार नहीं सकते हैं, किन्तु शुद्धाचारी मनुष्य को श्रद्धापूर्वक पढ़े हुए वेद के दो अक्षर भी पवित्र कर देते हैं।  आचार से हीन मनुष्य लोक में निन्दित, सदा दुःखी, रोगी तथा अल्प अवस्था वाला होता है।  जो द्विज मनु द्वारा कहे गये दस लक्षण वाले धर्मों को अध्ययन करते हैं तथा अध्ययन करके उसका आचरण करते हैं वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण में भी आचार के महत्त्व का प्रतिपादन करते हुए कहा गया है कि सभी लक्षणों से युक्त होने पर भी जो मनुष्य आचार से वर्जित है। वह विद्या तथा इच्छित फल को प्राप्त नहीं कर पाता है। आचारहीन पुरुष नरक को प्राप्त करते हैं। आचारहीन ब्राह्मण अल्पायु को प्राप्त करते हैं। आचारहीन राक्षस होते हैं। आचारहीन मनुष्य को छः अङगों सहित वेद भी पवित्र नहीं कर सकते हैं। आचारहीन मनुष्य द्वारा किये गये सभी धार्मिक कार्य मिथ्या होते हैं।
इस प्रकार विभिन्न ग्रन्थों के अनुशीलन से हमें ज्ञात होता है कि आचार ही जीवन का सर्वस्व है अर्थात आचार ही परम धर्म है इसलिए मनु ने मनुष्य को निरन्तर धर्म का स×चय करने का आदेश दिया है।  विष से अमृत का, बालक से भी उत्तम वचनों का, शत्रु से भी श्रेष्ठ आचरण का तथा अपवित्र स्थान से भी स्वर्ण (बहुमूल्य वस्तु) का (गुणग्राही बुद्धि से) ग्रहण कर लेना चाहिए।

आचार का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है इस कारण मानव जीवन के किसी भी अङगों से अछूता नहीं है क्योंकि धार्मिक, आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, शारीरिक आदि सभी प्रकार के विकास में मनुष्य को आगे ले जाने वाली क्रियाएं, व्यवहार, ज्ञान सभी को आचार अपने अंदर समेटे हुए हैं।