मंगलवार, 4 मार्च 2014

देव पूजा विधि Part-17 कुश कण्डिका

        होम के अनुसार यथा परिमित तीन कण्ठ युक्त कुण्ड अथवा स्थण्डिल का निर्माण करना चाहिए। कुण्ड के अभाव में बालू से मेखला सहित स्थण्डिल का प्रयोग भी किया जा सकता है। स्थण्डिल मिट्टी से निर्मित 24 अंगुलियों का होना चाहिए। प्रत्येक कण्ठ की ऊँचाई दो या चार अंगुल होना चाहिए।
कुण्ड अथवा स्थण्डिल भूमि को तीन-तीन कुशों से परिसमूहन कर उन कुशाओं को ईशान कोण में छोड़ दें। वम्यह अमृतबीज उच्चारण करते हुए जल मिश्रित गाय के गोबर से कुण्ड का उपलेपन करना चाहिए। श्रुव के मूल द्वारा एक-एक क्रम से तीन रेखा करते हुए ह्रींइस मायाबीज का उच्चारण कर अनामिका एवं अंगुष्ठा द्वारा कुण्ड से मिट्टी निकाल दें। ऊपर से आच्छादित कांस्य पात्र में अग्नि लाकर कुण्ड अथवा स्थण्डिल के आग्नेय कोण में रखकर हुं फट्उच्चारण करें। तदनन्तर ओं अग्निन्दूतं पुरोदधे हन्यवाहमुपब्रुवे। देवां असादयादिह इस मंत्र को बोलकर अपनी ओर कर अग्नि स्थापित करें। जिस पात्र से अग्नि लाया गया हो उस पर अक्षत एवं जल छोड़ दें। तदनन्तर अग्नि प्रज्वलित करें।
अग्नि का ध्यान-ॐ चत्वारि शृंगा त्रायो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य त्रिधा बद्धो बृषभो रोरवीति महोदेवो मत्र्याँ आविवेश।
ॐ भूर्भुवः स्वः अग्ने वैश्वानर शाण्डिल्यगोत्र शाण्डिलासित देवलेति त्रिप्रवरान्वित भूमिमातः वरुणपिता मेषध्वज प्राङ्मुख मम सम्मुखो भव।
इससे (वरद नामक ) अग्नि की प्रतिष्ठा कर ॐ भूभुर्वः स्वः अग्नये नमः इससे (बर्हि) अग्नि की पञ्चोपचार पूजा कर प्रार्थना करें ॐ अग्निं प्रज्जवलितं वन्दे जातवेदं हुताशनं हिरण्यवर्णममलं समृद्धं विश्वतोमुखम्। पुनः पुष्पमाला चन्दन आदि लेकर ॐ अद्येत्यादि देशकालौ सङ्कीत्र्यं कर्तव्यामुकहोमकर्मणि कृताकृतवेक्षणरूपब्रह्मकर्म कर्तुमममुकगोत्रममुकशर्माणं वा पञ्चाशत्कुशनिर्मितं प्रदक्षिणग्रन्थिकं ब्रह्माणमेभिः पुष्प-चन्दन-ताम्बूलवासोभिब्र्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे। ब्रह्मा कहे-वृतोऽिस्म। आचार्य-यथाविहितं कर्म कुरु। ब्रह्मा-करवाणि।
तदनन्तर अग्नि की दाहिनी ओर परिस्तरण भूमि को छोड़कर ब्रह्मा के बैठने के लिए शुद्ध आसन देकर ॐ अस्मिन्नमुक होमकर्मणि त्वं मे ब्रह्मा भव। ब्रह्मा-भवानि। यदि ब्रह्म लक्षणयुक्त ब्राह्मण न मिले तो पचास (50) कुशाओं द्वारा ब्रह्मा का निर्माण कर लें। ब्रह्मा अग्नि की प्रदक्षिणा करें।
आचार्य अग्नि की दक्षिण ओर कुशरूप आसन और उत्तर ओर प्रणीता पात्र स्थापन के लिए दो कुश रखे। तथा प्रणीतापात्र को आगे कर उसको जल से पूर्ण कर और दो कुशाओं से उस पात्र को ढककर कुशरूप प्रथम आसन पर रख ब्रह्मा का मुख देख द्वितीय कुशरूप आसन पर उस प्रणीता पात्र को रखे।
परिस्तरण-पुनः हाथ में 16 कुशा लेकर 4-4 कुश अग्निकोण से ईशान कोण तक, ब्रह्मा से लेकर वेदी तक, नैऋृत्य कोण से वायव्य कोण तक एवं अग्नि से प्रणीता पर्यन्त सोलह कुशाओं का परिस्तरण करे।
तदनन्तर अग्नि के उत्तर भाग से पश्चिम में पवित्राी के लिए तीन कुश, पुनः दो कुश रखे। प्रोक्षणी पात्र, आज्य स्थाली (कटोरा), संमार्जन कुश पांच, उपयमन कुश सात, समिधा तीन, श्रुवा, घृत, पूर्णपात्र, उसी ओर शमी तथा पलाश मिश्रित लाजा (धान का लावा) सिल, कन्या का भाई, सूप, दृढ़पुरुष एवं आलेपन आदि सामग्री को रखे।
पवित्राकरण-अधोलिखित प्रक्रिया से पवित्राी बनावे। दो कुश  के  ऊपर तीन कुश को रखकर दो कुशाओं से मूल कां घुमाकर, उन तीन कुशाओं को तोड़कर, दो कुशाओं को ग्रहण करता हुआ तीन कुशाओं का परित्याग करे। उन्हीं दो कुशाओं की पवित्राी बनावे। पवित्राी वाले हाथ से प्रणीता पात्र के जल को तीन बार प्रोक्षणी पात्र में डाले। अनामिका और अंगूठे से पवित्राी को पकड़ कर तीन बार प्रोक्षिणी पात्र के जल केा प्रादेश मात्रा (एक वित्ता) उछाले। तथा प्रणीता के जल से प्रोक्षणी का प्रोक्षण करे और उक्त प्रोक्षणी के जल से वेदी के पास स्थापित सभी वस्तुओं का सिंचन करे अग्नि-प्रणीता के मध्य में प्रोक्षणीपात्र रख दे। तदनन्तर घी के कटोरे में घी रखे। उसे अग्नि पर तपावे और जलती हुई तृण (लकड़ी) से उस घी के कटोरे की प्रदक्षिणा करे। पुनः एक बार उलटी प्रदक्षिणा करे। पश्चात् उस वेदी की अग्नि में श्रुव का प्रतपन करे।
तत्पश्चात् संमार्जन कुश के अग्र भाग से श्रुवा के निचले भाग को पोछें और कुशा के अग्र भाग से श्रुवा के ऊपरी भाग का संमार्जन करे तथा प्रणीता पात्र के जल से छिड़के और संमार्जन कुश का अग्नि में प्रक्षेप करे। पुनः श्रुवा को तपाकर दाहिनी ओर रख दे तथा आज्यपात्र को अग्नि से उतार कर प्रणीता पात्र के पश्चिम भाग में रखता हुआ अनामिका एवं अँगूठे से पवित्राी पकड़कर प्रोक्षणी की तरह उछाले और उस आज्य को देखकर उसमें यदि तिनका आदि पड़ गया हो तो उसको निकाल दे। पुनः प्रोक्षणी के समान उसको अग्नि के पश्चिम भाग में रखकर सात उपयमन कुशाओं को बायें हाथ में लेकर तथा तीन समिधाओं को दाहिने हाथ में ग्रहण कर प्रजापति का मन से ध्यान करता हुआ खड़ा हो उन तीन समिधाओं का मौन होकर अमन्त्राक अग्नि में प्रक्षेप करे।
श्रुव पूजन-ॐ आवाहयाम्यहं देवं श्रुवं शेवधिमुत्तमम्। स्वाहाकार स्वधाकार-वषट्कारसमन्वितम्।
हाथ में अक्षत, पुष्प और जल लेकर संकल्प करें-संकल्प-देशकालौ संकीत्र्य अस्मिन् अमुक-देवता-मन्त्र-जपकृतपुरश्चरण-दशांश-हवनाख्ये कर्मणि इदं सम्पादितं समिच्चरुतिलाज्यादि-हविर्द्रव्यं विहितसंख्याहुतिपर्याप्तं या याः वक्ष्यमाणदेवतास्तस्यै तस्यै देवतायै न मम। यथासंख्यं यथादैवतमस्तु, यह बोलते हुए अक्षत, जल भूमि पर छोड़ दें।

तत्पश्चात् बैठकर पवित्राी सहित हाथ से जल द्वारा ईशान कोण से आरम्भ कर पुनः ईशान कोण तक अग्नि के चारों ओर जल घुमाता हुआ एक बार उस जल केा विपरीत घुमावे तथा दोनों पवित्रियों को प्रणीता पात्र में स्थापित कर अपना दाहिना घुटना मोड़ कुश द्वारा ब्रह्मा का स्पर्श करता हुआ प्रज्वलित अग्नि में श्रुवा से घृत की आहुति देवे। यजमान भी द्रव्य त्याग करे।