रविवार, 20 अप्रैल 2014

देव पूजा विधि Part-7 अधिदेवता प्रत्यधिदेवता स्थापन

अधिदेवतास्थापनम्
        सूर्य के दाहिने भाग में-ॐ त्रयम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम्।। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योम्र्मुक्षीय मामृतात्। ॐ भूर्भुवः स्वः ईश्वर इहागच्छेह तिष्ठ ॐ ईश्वराय नमः ईश्वरमाहयामि स्थापयामि।।1।। इसी प्रकार सभी जगह नाम लेकर आवाहयामि स्थापयामि कहें। चन्द्र के दाहिने भाग में-ॐ श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रो पाश्र्वे नक्षत्राणि रूपमश्विनौ व्यात्तम्। इष्णन्निषाणामुम्मऽइषाण सर्वलोकम्मऽइषाण। ॐ भू. उमे इहा0 उमायै नमः उमामा. ।।2।। मंगल के दाहिने भाग में ॐ यदक्रन्दः पथमञ्जाय- मानऽउद्यन्त्समुद्रादुतवा पुरीषात्। श्येनस्य पक्षा हरिणस्य बाहूऽउपस्तुत्यम्महि जातन्तेऽर्वन्। ॐ भू. स्कन्द इहा. स्कन्दाय नमः स्कन्दमा. ।।3।। बुध के दाहिने भाग में-ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्प्त्रोस्थो विष्णोः स्यूरसि
विष्णोधु्र्रवोसि। वैष्णवमसि विष्णवेत्वा। ॐ भू. विष्णो इहा. विष्णवे नमः, विष्णुमा.।।4।। गुरु के दाहिने भाग में-ॐ आब्रह्मन्ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्रे राजन्यः शूरऽइषव्योतिव्याधी महारथो जायतान्दोग्घ्री
धेनुर्वोढानड्वा नाशुः सप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णू रथेष्ठाः। सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायतान्निकामे निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्यो
नऽओषधयः पच्यन्तां योगक्षेमो नः कल्पताम्। ॐ भू. ब्रह्मणे नमः ब्रह्माणमा0 ।।5।। शुक्र के दाहिने भाग में-ॐ सजोषाऽइन्द्र सगणो मरुद्भिः सोमम्पिब वृत्राहा शूरविद्वान्। जहि शँत्राू 1 रपमृधोनु दस्वाथाभ्यङ्कृणुहि विश्वतो नः। ॐ भू. इन्द्र इहा. इन्द्राय नमः इन्द्रमावा. ।।6।। शनि के दाहिने भाग में-यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा। स्वाहा धर्माय स्वाहा धम्र्मः पित्रो ॐ भू. यम इहा. यमाय नमः यममा.।।7।। राहु के दाहिने भाग में-ॐ कार्षिरसि समुद्रस्य त्वाक्षित्याऽउन्नयामि। समापोऽअद्मिरग्मतसमोषधीमिरोषधीः। ॐ भू. काल इहा. कालाय नमः कालमा.।। 8।। केतु के दाहिने भाग में ॐ चित्रावसोः स्वस्ति ते पारमशीय। ॐ भू. चित्रागुप्त इहा. ॐ चित्रागुप्ताय नमः चित्रागुप्तमावाहयामि।। 9।। इति अधिदेवता स्थापन।।
प्रत्यधिदेवतास्थापन
(अग्निरापो धरा विष्णुः शक्रेन्द्राणीपितामहः। पत्रागार्कक्रमाद्वामे
ग्रहप्रत्यधिदेवताः।। (स्कन्दपुरा.))
सूर्य के बायें भाग में-ॐ अग्निन्दूतम्पुरोदधे हव्यवाहमुपब्रुवे। देवाँ 2 ऽआसादयादिह।। भू. अग्ने इहा. ॐ अग्नये नमः। अग्निमा. ।।1।।
सोम के बायें भाग में-ॐ आपो हिष्ठमयो भुवस्तानऊर्जे
दधातन। महेरणाय चक्षसे। ॐ आप इहागच्छत. अद्भ्यो नमः, अप.।।2।।
मंगल के बायें भाग में-ॐ स्योना पृथिवि नो भवानृक्षरानिवेशनी। यच्छानः शम्र्मसप्रथा।। ॐ भू. पृथिवि इहा. ॐ पृथिव्यै नमः पृथिवीं.।।3।।
बुध के बायें भाग में-ॐ इदम्विष्णुचक्रमे त्रोधा निदधे पदम् समूढमस्यपां सुरे स्वाहा।। ॐ भू. विष्णो इहा. ॐ विष्णवे नमः विष्णुमावा.।।4।।
गुरु के बायें भाग में-ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र हवे हवेसुहव र्ठ. शूरमिन्द्रम्। ह्नयामिशक्रम्पुरुहूतमिन्द्र र्ठ. स्वस्तिनो मघवा धात्विन्द्रः।। ॐ भू. इन्द्र इहा. ॐ इन्द्राय. इन्द्रम्. ।।5।।
शुक्र के बायें भाग में-ॐ आदित्यैरास्नासीन्द्राण्याऽउष्णीषः पूषासि धम्र्माय दीष्व।। ॐ भू. इन्द्राणि इहा. ॐ इन्द्राण्यै नमः इन्द्राणीम्.।।6।।
शनि के बायें भाग में-ॐ प्रजापते न त्वदेतान्न्यन्यो विश्वारूपाणि परिता बभूव। यत्कामास्ते जुहुमस्तन्नोऽअस्तु वयस्याम पतयो रयीणाम्।। ॐ भू. प्रजापते इहा. ॐ प्रजापतये नमः प्रजापतिम्. ।।7।।
राहु के बायें भाग में ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यो ये के च पृथिवीमनु। ये अन्तरिक्षे ये दिवि तेभ्यः सर्पेभ्यो नमः। ॐ भू. सर्पा इहागच्छत इह तिष्ठत ॐ सर्पेभ्यो नमः ॐ सर्पान्. ।।8।।
केतु के बायें भाग में-ॐ ब्रह्मयज्ञानं प्रथम्मपुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोवेनऽआवः।। सबुन्ध्याऽउपमाऽअस्य विष्टाः सतश्च योनिमसतश्च व्विवः। ॐ भू. ब्रह्मन् ! इ. ॐ ब्रह्मणे नमः। ब्रह्माणमावाहयामि।।9।। इति प्रत्यधिदेवतास्थापना विधि।।
पञ्चलोकपालस्थापन
(गणेशश्चम्बिका वायुराकाशश्चाश्विनौ तथा ग्रहाणामुत्तरे पञ्च- लोकपालाः प्रकीत्र्तिताः।। (स्कन्दपुरा.)।।)
राहु से उत्तर-ॐ गणानान्त्वा ॐ भू. गणपते इहा. ।।1।।
शनि से उत्तर ॐ अम्बेऽअम्बिकेऽम्बालिके न मा नयति कश्चन ससस्त्यश्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम्। ॐ भू. दुर्गे इहा. दुर्गाये. ।।2।।
रवि से उत्तर-ॐ आनोनियुद्भिः सतिनीभिरध्वर सहश्रिणीभिरुपयाहि यज्ञम्।। वायोऽअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः।। ॐ भू. वायो इहा. वायवे नमः।।3।।
राहू के दक्षिण-ॐ घृतङ्ग घृतपावानः पिबत वसाम्वसा पावानः पिबतान्तरिक्षस्य हविरसि स्वाहा दिशः प्रदिशऽआदिशो विदिशऽउद्दिशो दिग्भ्यः स्वाहा। ॐ भू. आकाश इहा. आकाशाय नमः।।4।।
केतु के दक्षिण-ॐ यावाङ्कशामधुमत्यश्विना सूनृतावती तया यज्ञम्मिमिक्षताम्। ॐ भू. अश्विनौ इहागच्छाताम् अश्विभ्यां नमः।।5।।
अथ प्रागादितः पीठसमन्ताद्दिक्पालानावाहयेत्-
पूर्व में-ॐ त्रातारमिन्द्र र्ठ. मवितारमिन्द्र हवे हवे सुहव शूरमिन्द्रम्। ह्नयामि शक्रम्पुरुहूतमिन्द्र र्ठ. स्वस्तिनो मघवा धात्विन्द्रः।। ॐ भू. इन्द्र इहा. इन्द्राय नमः।।1।।
अग्नि कोण में ॐ त्वन्नोऽअग्ने तव देव पायुभिम्र्मघोनो रक्षतन्वश्च वन्द्य। त्रातातोकस्य तनये गवामस्य निमेष रक्षमाणस्तव व्रते। ॐ अग्ने इहा. अग्नये. ।2
दक्षिण में-ॐ यमाय त्वांगिरस्वते पितृमते स्वाहा। स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मः पित्रो।। ॐ भू. यम इहा. यमा0 ।।3।।
नैर्ऋति कोण में-ॐ असुन्वन्तमयजमानमिच्छस्तेनस्येत्यामन्विहितस्करस्य अन्यमस्मदिच्छसातऽइत्या नमो देवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु।। भू. निर्ऋते इहा.।।4।।
पश्चिम में-ॐ तत्त्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविर्भिः।। अहेडमानो वरुणेहवोध्यरुश समानऽआयुः प्रमोषीः।। ॐ भू. वरुण इहा ।।5।।
वायु कोण में-ॐ आनोनियुद्भिः शतिनीभिरध्वर सहश्रिणीभिरुपयाहि यज्ञम्। वायोऽअस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः। ॐ भू. वायो इहा. ।। 6।।
उत्तर में-ॐ वय ँ सोमव्रते तव मनस्तनूषु बिभ्रतः प्रजावन्तः सचेमहि।। ॐ भू सोम इहा. ।।7।।
ईशान कोण में-ॐ तमीशानञ्जगतस्तस्थुषस्पतिन्धियञ्िजन्वमवसेहूमहे वयम्।। पूषा नो यथावेदसामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॐ भू. ईश्वर इहा.।।8।।
पूर्व और ईशान के मध्य ऊपर में-ॐ अस्मे रुद्रामेहनापर्वतासो वृत्राहत्त्येभरहूतौ सजोषाः।। यः श सतेस्तुवते धायिपज्ज इन्द्रज्येष्ठाऽअस्मा2ऽअवन्तु देवाः। ॐ भू. ब्रह्मन्0 ब्रह्मणे0।।9।।
निर्ऋतिपश्चिम के मध्य नीचे में -ॐ स्योना पृथिवी नो भवानृक्षरानिवेशनी यच्छानः शर्म सप्रथाः। ॐ भूर्भुवः स्वः अनन्त इहागच्छ इह तिष्ठ अनन्ताय नमः। अनन्तमावाहयामि।।10।।
पुनः यजमान हाथ में अक्षत लेकर ॐ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्टं यज्ञ समिमं दधातु। विश्वेदेवा सऽइह मादयन्तामो3म्प्रतिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः आदित्यादिनवग्रहाः साङ्गाः सपरिवाराः सवाहना अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता-विनायकादिपंचलोकपाल-वास्तोष्पतिक्षेत्रा-
धिपतीन्द्रादि- दशदिक्पालसहिताः सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु। अक्षत छोड़ दें।
श्रीसूर्यध्यान-पद्मासनः पद्मकरो द्विबाहुः पद्मद्युतिः सप्ततुरंगवाहनः।                                       
दिवाकरो लोकगुरुः किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देवः।।
चन्द्रध्यान- ॐ श्वेताम्बरः श्वेतविभूषणश्च श्वेतद्युतिर्दण्डधरो द्विबाहुः।                                      
चन्द्रोऽमृतात्मा वरदः किरीटी मयि प्रसादं विदधातु देवः।।
भौमध्यान-         रक्ताम्बरो रक्तवपुः किरीटी चतुर्भुजो मेषगमो गदाधृक्।
                        धरासुतः शक्तिधरश्च शूली सदा मम स्याद्वरदः प्रशान्तः।।
बुधध्यान-          ॐ पीताम्बरः पीतवपुः किरीटी चतुर्भुजी दण्डधरश्च हारी।
                        चम्र्मांसिभृत् सोमसुतः सदा में सिंहाधिरूढो वरदो बुधोऽस्तु।।
बृहस्पतिध्यान-पीताम्बरः पीतवपुः किरीटी चतुर्भुजो देवगुरुः प्रशान्तः।
                दधाति दण्डञ्च कमण्डलुञ्च तथाऽक्षसूत्रां वरदोऽस्तु मह्यम्।।
शुक्रध्यान-    ॐ श्वेताम्बरः श्वेतवपुः किरीटी चतुर्भुजो दैत्यगुरुःप्रभावान्।
                 तथाक्षसूत्राञ्च कमण्डलुञ्च दण्डञ्च विभ्रद्वरदोऽस्तु मह्यम्।।
शनैश्चरध्यान-ॐ नीलद्युतिः शूलधरः किरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरो धनुष्मान्।
                        चतुर्भुजः सूर्यसुतः प्रशान्तः सदास्तु मह्यं वरदोऽल्पगामी।।
राहुध्यान-          ॐ नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी करालवक्त्राः करवालशूली।
                        चतुर्भुश्चक्र-धरश्च राहुः सिंहाधिरूढो वरदोऽस्तु मह्यम्।।
केतुध्यान-          धूम्रो द्विबाहुर्वरदो गदाभृत् गृधासनस्थो विकृताननश्च।
                        किरीटकेयूरविभूषितो यः स चास्तु मे केतुरयं प्रशान्त्यै।।
ॐ अन्ये किरीटनः कार्या वरदाभयपाणयः।। ॐ भूर्भुवः स्वः सांगेभ्यः सपरिवारेभ्यः सायुधेभ्यः सशक्तिकेभ्यः अधिदेवता-प्रत्यधिदेवता- विनायकादिपञ्चलोकपाल-वास्तोष्पतिक्षेत्राधिपतीन्द्रादिदशदिक्पालसहितेभ्यो नवग्रहेभ्यो नमः आसनार्थे पुष्पाक्षतान् समर्पयामि।
इसी प्रकार-ओं भूर्भुवः स्वः सांगेभ्यः. पादयोः पाद्यं समर्पयामि। ॐ भूर्भुवः स्वः सांगेभ्यः हस्तयोरध्र्यं समर्पयामि। ओं भूर्भुवः स्वः सांगेभ्यः. अघ्र्याङ्गमाचमनीयं समर्पयामि।। स्नानं।। आचमनं।। वस्त्रां। यज्ञोपवोतं.।। गन्धं।। अक्षतं।। पुष्पं।। दूर्वांकुरं।। धूपमाघ्रापयामि।। दीपं दर्शयामि।। नैवेद्यं निवेदयामि।। हस्तप्रक्षालनं. ।। आचमनं. ।। फलं।। ताम्बूलं।। दक्षिणाद्रव्यं. नीराजनं समर्पयामि।। मन्त्रापुष्पाञ्जलिं समर्पयामि।।
क्षमापनम्
                        मन्त्राहीनं  क्रियाहीनं  भक्तिहीनं सुरेश्वराः!।
                        यत्पूजितं मया देवाः। परिपूर्णं तदस्तु मे।।1।।
                        ॐ यत्कृतं पूजनं देवाः।! भक्ति-श्रद्धा-विवर्जितम्।
                        परिगृह्णन्तु  तत्सर्वं   सूर्याद्या  ग्रहनायकाः।।2।।
पुष्पाञ्जलि-ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिापुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतो
बुधश्च। गुरुश्च शुक्रश्च शनिश्च राहुः केतुश्च सर्वे प्रदिशन्तु शं मे।।1।।
                        सूर्यः   शौर्यमथेन्दुरुच्चपदवीं   सन्मङ्गलं  मङ्गलः
                        सद्बुद्धिञ्च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुक्रः सुखं शं शनिः।।
                        राहुर्बाहुबलं   करोतु   सततं केतुः कुलस्योन्नतिम्
                        नित्यं प्रीतिकरा भवन्तु मम ते सर्वेऽनुकूला ग्रहाः।।2।।
हाथ जोड़कर प्रणाम करें-
            ॐ आयुश्च वित्तञ्च तथा सुखञ्च धर्मार्थलाभौ बहुपुत्रतां च।
            शत्राुक्षयं राजसु पूज्यताञ्च तुष्टा ग्रहाः क्षेमकरा भवन्तु।।

हाथ में जल लेकर ॐ अनया पूजया आवाहिता देवाः प्रीयन्ताम्।