शुक्रवार, 23 मई 2014

जगद्यात्रा

      संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह इसलिए के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ने के बाद छात्र/छात्राओं को अगली कक्षाओं में संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता। समाज में संस्कृत के प्रति अच्छी धारणा पैदा किये जाने पर ही इसके विकास की कल्पना की जा सकती है। अभी संस्कृत शिक्षा की पैरवी करने वाले सामाजिकों का अभाव है। जब तक जनमानस में संस्कृत की स्वीकार्यता पर्याप्त मात्रा में नही बढ़ायी जाती सांस्थानिक स्तर पर सभासंगोष्ठी करने का कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। पुनि-पुनि चन्दन की कहावत वाले कार्यक्रमों में वही गिने-चुने वक्ता और श्रोता होते हैजो इस क्षेत्र से जुड़े है।
            इस ग्रीष्मावकाश में हर मुहल्ले-गाँव के सामाजिक स्थलों पर स्थानीय अभिभावकों एवं छात्रों की सभा कर संस्कृत शिक्षा के लाभउद्येश्य व प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। समाज के अनेक तबकांे को इस शिक्षा के बारे में जानकारी मुहैया कराने एवं उसके लिए माहौल निर्मित करने के लिए कक्ष और फाइल से बाहर निकलकर धरातल पर कार्य करना होगा।
जन जागरुकता के लिए SMS, ई-मेलसोशल मीडियापत्र लेखन द्वारा अपने परिचितों को संदेश भेजनाग्राम मोहल्ले की गलियों में सभायें आयोजित करना व्यक्तिगत और सामूहिक रुप से जन सम्पर्क अभियान चलानासमाचारदीवार पर संस्कृत को अपनाने हेतु प्रेरक वाक्यों को लिखा जाना आदि कार्य किये जा सकते है।
            किसी एक क्षेत्र का चुनाव कर संस्कृत शिक्षा के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने इसके लिए उचित माहौल तैयार करने का सकारात्मक असर आएगा। कुछ वर्षो बाद संस्कृत शिक्षार्थियों एवं संस्कृत के पैरोकारों की संख्या में वृद्धि होगी।
            अभी-अभी सम्पन्न हुए लोक सभा चुनाव में चयनित सांसदो को संस्कृत में शपथ लेने के लिए एक प्रेरक अभियान चलाने की आवश्यकता है। प्रत्येक सांसदीय क्षेत्र के संस्कृतज्ञ अपने संसदीय क्षेत्र से चयनित सांसदों से संस्कृत में शपथ लेने का आग्रह करें तो निश्चय ही संस्कृत की उच्च स्तर पर स्वीकार्यता का सन्देश जन-जन तक जाएगा। यह एक मौका है। SMS, मेलफोनपत्रव्यक्तिगत एवं सामुहिक आग्रह द्वारा इसे सम्भव किया जा सकता है।