शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

संस्कृत क्षेत्र की चुनौतियाँ तथा समाधान-3

       कार्य छोटे-छोटे है पर दृष्टि नहीं जाती। संस्कृतज्ञों से परीक्षा, रोजगार, पुरस्कार आदि के प्रपत्र भी हिन्दी या अन्य भाषा में भरायी जाती है। यहाँ संस्कृत में करने में परेशानी क्या है? धन्यवाद गीता प्रेस को जिसने संस्कृत वाङ्मय को सुलभ बनाने का कार्य किया। रेलवे स्टेशन से लेकर छोटे-छोटे कस्बे तक अपनी पहुँच बनायी। संस्कृत कला, संस्कार और मानव मूल्यों की भाषा है। यह जितना कोमल भावों, उदात्त मूल्यों द्वारा मानव को पोषित करता है, अन्य नहीं। इसके उदात्त सन्देश को एकत्र कर समाज के सम्मुख रखें। आज की शिक्षा से मानव, दानवीय जीवन की ओर अग्रसर है। धनलोलुपता के कारण राष्ट्र, राष्ट्र के मानव खतरे में है। कहीं आतंकवाद तो कहीं अन्य अमानवीय कृत्य। क्या मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य  ट्रेनिंग के अनुसार एक मशीन बनकर कार्य निष्पादन है। करुणा, ममता, सेवा भाव, मैत्री आदि प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं ? विदेशी शरीर को सुख भोग का साधन मात्र समझते हैं। वहाँ वर्जना शब्द नहीं है। परिणामतः परस्पर अविश्वास, पाशविक कृत्य के लिए हिंसा देखी जाती है।
आवश्यक धन एवं संसाधनों के अभाव में हम खुद या कुछ संस्थाएँ अपनी सार्वत्रिक पहुँच नहीं बना सकते। उपाय जरुर ढूढ़ सकते हैं, जिससे हमारी पहुँच, मेरा सन्देश सर्वत्र जाय। संस्कृतज्ञों के लिए जरुरी मंत्र है ऐक्य। हम जिस भी सुर में गायें जो भी गायें सन्देश एक हो।
         कुछ स्वार्थी तत्वों ने हमें बदनाम किया है। वे संस्कृत ग्रन्थों के कुछ उद्वरणों को लेकर समूचे वाङ्मय को खारिज करने पर तुले हैं। उनसे सावधान। उनसे अनुरोध है कि सार-सार गहि रहे थोथा देई उराईकार्यक्रम वजनदार करें। इसकी धमक दूर तक जाती है। शक्ति संचय कर एक दिशा में मोड़े। सुनामी का रुप दें। सभी अपसंस्कृतियां डूब जाएगीं। फुटकर आवाज दब जाती है।
     2011 की जनगणना केवल 14 हजार संस्कृतभाषी ? । संस्कृत क्षेत्र में रोजगार कितने कर रहे हैं?  क्या उनकी मातृभाषा  संस्कृत नहीं हो सकती ? क्या मैं पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय से एक प्रोजेक्ट नहीं ले सकते। धर्मशास्त्रों, स्मृति ग्रन्थों में स्वच्छता के बारे में बहुतेरे दिशा निर्देश मिलते है।
    संस्कृत भाषा को आधुनिक भाषा की श्रेणी में रखा जाय। आज के परिवेश के अनुकूल पाठ्यक्रम बनायें जायें। इनका शिक्षण वैज्ञानिक रीति से हो। बच्चों द्वारा घर आये अतिथियों को ए0 बी0 सी0 डी0 सुनवाना निन्दनीय है। इस प्रथा के जगह श्लोक सुनाने की परम्परा हो। नियुक्ति में अयोग्य एवं अनुत्साही को स्थान न दें। संस्कृत डिग्री की सहारा लेकर लोग नौकरी तो पाते हैं, परन्तु प्रतिबद्धता नहीं होती है। आरम्भिक कक्षा में अध्यापनरत संस्कृत डिग्री धारी शिक्षकों को चिहिनत कर प्रतिबद्धता के पाठ पढ़ाये जायें। नियमित परीक्षा हो। नियत समय पर हो। संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान् और निरक्षर मंदिर के पुजारी के बीच जनता भेद समझ सके, इसके लिए दैनिक उपयोगी मंत्रों, श्लोकों से आम जन को परिचित कराया जाय। सरकारें अन्य भाषा के शिक्षकों को तो नियुक्त करती है। संस्कृत शिक्षकों की नहीं। संस्कृत विद्यालयों में वर्ष 1995 से शिक्षकों की नियुक्ति ही नहीं की गयी है। शान्ति, परस्पर मैत्री आदि सद्गुणों से युक्त सद्प्रसंग संग्रहीत कर ग्रन्थ निर्माण हो। सरल भाषा युक्त बाल साहित्य निर्माण हो।