मंगलवार, 25 नवंबर 2014

ज्योतिष विद्या

ज्योतिष शास्त्र भगवान् वेद का प्रधान अंग चक्षु कहा गया है। यह शास्त्र केवल वेदों का ही नेत्र नहीं है अपितु यह लोक का भी नेत्र है।  यज्ञयागादि अनुष्ठानों के लिये काल को प्रकाशित करने के कारण ज्योतिष शास्त्र की नेत्र संज्ञा है। ज्योतिषशास्त्रवेत्ता को भूत, भविष्य के साथ अतीन्द्रिय पदार्थों का भी प्रत्यक्ष बोध हो जाता है।  भविष्य जानने की इच्छा सभी युगों में मनुष्यों के मन में सर्वदा प्रबल रही है जिसकी परिणति यह फलित ज्योतिष है। कृषि, व्यापार, उद्योग, यज्ञ, सदाचार, धर्म, नौकरी, तथा जीवन यात्रा हेतु शुभकाल निर्णय के लिये ज्योतिष ही एकमात्र साधन है। ज्योतिष शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए उणादि आचार्यों ने `द्युतेरिसिन्नादेश्च ज:कहकर इस शब्द की निष्पत्ति किया है। अर्थात् ``द्युत् दीप्तौ'' धातु से इसिन् प्रत्यय तथा दकार को जकारादेश करके ज्योतिष् या ज्योति: शब्द बना, पुन: ``अर्शआदिभ्यो अच्'' (५।२।१२७) से अच् प्रत्यय करके ज्योतिष अकारान्त शब्द निर्मित हुआ है। पुन: ``तदधिकृत्य कृतो ग्रन्थ:'' इस पाणिनीय सूत्र से अण् प्रत्यय करने पर ज्यौतिष शब्द निष्पन्न होता है जिसका अर्थ होगा ज्योतिष सम्बन्धी सिद्धान्त या ग्रन्थ।
 इसे ज्योतिष शास्त्र से कर्मों करने के लिए श्रेष्ठ काल तथा उत्तम मुहूर्त जाना जा सकता है । कृषि आदि कर्मों में जौ, चना, मटर, गेहूँ, धान आदि का काल अलग-अलग है। इसी तरह मुहूर्त की उपयोगिता यज्ञादि कर्म के लिये है। शुभ समय जानने के लिये कालमान का जानना आवश्यक होता है। काल भी शुभाशुभ मिश्रित रहता है जैसे सृष्टि निर्माण में ब्रह्मा जी ने अच्छे बुरे दोनों को मिलाकर अर्थात् गुणदोषमयी सृष्टि बनायी है, उसी प्रकार काल भी गुणदोष युक्त है। कोई भी काल न तो सर्वथा निर्दोष है और न ही सर्वथा गुणवान। जैसा कि आचार्य बृहस्पति का कथन है
                    स्वभावादेव कालोऽयं शुभाशुभसमन्वित:।
                    अनादि निधनो सर्वो न निर्दोषो न निर्गुण:।। (बृहस्पति संहिता१/१४)
         ऐसी स्थिति में शुभाशुभ काल का निर्धारण आवश्यक हो जाता है। भारतीय ज्योर्तिवदों ने त्रुटि से लेकर प्रलय अर्थात् कल्पान्त पर्यन्त गणनाओं को सूक्ष्म विधि से निकालने का स्तुत्य कार्य किया है। भारतीय मनीषी आदिकाल से ही लौकिक एवं पारलौकिक सुख प्राप्ति हेतु यज्ञानुष्ठान करना अपना परम कर्तव्य मानते रहे हैं। कौन यज्ञ कब सम्पादित किये जायें इसका ज्ञान सूर्य एवं चन्द्रमा की गति, स्थिति एवं भिन्न भिन्न तिथियों नक्षत्रों पर आधारित थी, यही कारण है कि वशिष्ठादि ऋषियों ने इस शास्त्र को काल विधायक शास्त्र कहा है।
           क्रतुक्रियार्थं श्रुतय: प्रवृत्ता: कालाश्रयास्ते क्रतवो निरुक्ता:।
           शास्त्रादमुष्मात्किल कालबोधो वेदाङ्गताऽमुष्य तत: प्रसिद्धा।। (वशिष्ठ संहिता १/४)
ऋषियों ने नक्षत्रों, ग्रहों एवं राशियों का ज्योतिष नामकरण किया।