रविवार, 27 सितंबर 2015

सामुद्रिक शास्त्र


        जातक, रमल, केरलीय प्रश्न आदि अंगों की तरह सामुद्रिक शास्त्र भी ज्योतिषशास्त्र का एक अंग है। है। कतिपय आचार्यों का कथन है कि भगवान विष्णु ने सामुद्रिक नामक ब्राह्मण का अवतार लेकर जो फल कथन किया है उसे सामुद्रिक शास्त्र कहा गया है। कुछ अन्य लोगों का मत है कि समुद्र में शयन करने वाले भगवान विष्णु और लक्ष्मी के सौन्दर्य तथा शुभ लक्षणों को देखकर समुद्रदेव ने ही इस शास्त्र का निर्माण किया है -
                            पुरुषोत्तमस्य लक्ष्म्या समं निजोत्सङ्गमधिशयानस्य।
                             शुभलक्षणानि दृष्ट्वा क्षणं समुद्र: पुरा दध्यौ।।  (सामुद्रिकशास्त्र, १।३)
     अन्य आचार्यों का मत है कि समस्त शास्त्र भगवान शिव से उत्पन्न हैं और शिव ही त्रिभुवन गुरु हैं। अत: शंकर जी ने प्राणियों के शुभाशुभ लक्षणों का जो वर्णन पार्वती जी से किया था वही विषय सामुद्रिक शास्त्र के नाम से जाना गया है। वस्तुत: समुद्र अगाध है तथा प्राणियों के चिह्न (लक्षण) भी अगाध असंख्य हैं अत: जिस शास्त्र के द्वारा असंख्य लक्षणों का वर्णन प्राप्त होता है उस अंश को सामुद्रिक नाम दिया गया है। प्राणियों की आकृति, चिह्न, तिल, मशक आदि, हस्तरेखा, मस्तिष्क रेखा, पाद रेखा तथा अंग-प्रत्यंग का विवेच्य ही सामुद्रिक शास्त्र के नाम से जाना जाता है।
`यत्राकृतिस्तत्रगुणा: वसन्ति' अर्थात् जहाँ सुन्दर आकृति होती है वहीं गुणों का वास होता है। सुदर्शन पुरुष या स्त्री में सुन्दर गुण अवश्य रहते हैं यह लोक में देखा जाता है। आचार्य वराहमिहिर का कथन है कि उन्मान अङ्गुलात्मक ऊँचाई, मान (भारीपन), गति (गमन), संहति (घनता), सार, वर्ण, स्नेह (स्निग्धता), स्वर (शब्द), प्रकृति, सत्व, अनूक (जन्मान्तर गमन), क्षेत्र तथा मृजा (शरीरच्छाया) इनको अच्छी तरह जानने वाला (सामुद्रिक शास्त्र ज्ञाता) प्राणियों के शुभाशुभ फल कह सकता है -
                उन्मानमानगतिसंहतिसारवर्णस्नेहस्वरप्रकृतिसत्वमनूकमादौ ।
                क्षेत्रं मृजा च विधिवत् कुशलोऽवलोक्य सामुद्रविद्वदति यातमनागतं वा ।। बृहत्संहिता, पुरुषलक्षणाध्याय,
      संहिता ग्रन्थों में कहीं-कहीं प्रसंगवश पुरुष एवं स्त्रियों के लक्षण देर्विष नारद, वराहमिहिर, माणडव्य ऋषि तथा स्वामी र्काितकेय आदि ने कहा है जिसका उल्लेख सामुद्रिक शास्त्र में प्राप्त होता है। यहाँ वराहमिहिर, नारद, पाराशर तथा सामुद्रिक शास्त्र के आधार पर उन लक्षणों के फलों पर विचार किया जा रहा है।
पैर का लक्षण एवं फल - पसीने से रहित, कोमल तल वाले, कमलोदर के समान, परस्पर सटी हुई अंगुलियों से युक्त, ताम्रवर्ण के सुन्दर नखवाले, सुन्दर एड़ियों से युत, गरम, शिराओं से रहित, छिपी हुई पांव के गांठी वाले तथा कछुवे के पृष्ठ के समान पैर राजा का होता है। अर्थात् इन लक्षणों से युक्त जिनके पैर होते हैं वे राजा या राजा के सदृश होते हैं। जैसा कि सामुद्रिक शास्त्र का भी मत है।
       शूर्पाकार, खुरदुरा, पाण्डुर नखवाला तथा वक्र नाड़ियों से युत, सूखे और विरल अंगुलियों वाले पैर दरिद्रता और दु:ख देते हैं। मध्य में उन्नत तथा पाण्डुर वर्ण के पांव सदैव यात्रा करने वाले व्यक्ति के होते हैं। कषाय (कृष्ण लोहित) पांव वंश नाश के सूचक है। जिसके पांव की कान्ति अग्नि में पकी हुई मिट्टी के समान हो वह ब्रह्मघाती होता है। यदि पांव का तल पीला हो तो व्यक्ति अगम्या स्त्री में रत होता है।
       जंघा का लक्षण एवं फल - विरल तथा सूक्ष्म रोमों से युत हाथी के सूँड़ के समान ऊरु वाले तथा पुष्ट एवं समान जानु वाले मनुष्य राजा या राजा के तुल्य होते हैं। कुत्ते या सियार के सदृश जंघा वाले मनुष्य धनहीन होते हैं। राजाओं की जंघाओं की रोमकूपों में एक-एक रोम, पण्डित एवं श्रोत्रिय के जंघाओं के रोमकूपों में दो-दो रोम तथा निर्धन एवं दु:खी जनों के जंघाओं के रोमकूपों में तीन या चार रोम होते हैं। मांसरहित जानु वाला मनुष्य प्रवास में मरता है। छोटे जानु वाला मनुष्य भाग्यशाली, अति विस्तीर्ण जानु वाला दरिद्र, नीचे जानुवाला स्त्रीजित, मांसयुत जानुवाला राज्यभोगी तथा बड़े जानुवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है।
वृषण लक्षण -  एक अण्डवाला मनुष्य पानी में डूबकर मरता है तथा विषम (छोटे-बड़े) अण्डवाला मनुष्य स्त्री लम्पट, समान अण्डवाला राजा, ऊपर को खिंचे अण्डवाला अल्पायु तथा लम्बे अण्डवाला मनुष्य सौ वर्ष पर्यन्त जीता है। यथा -
                   जलमृत्युरेक वृषणो विषमै: स्त्रीचञ्चल: समै: क्षितिप:।
                   ह्रस्वायुश्चौद्वद्धै: प्रलम्बवृषणस्य शतमायु: ।। (बृहत्संहिता, ६८।९)
कटि और उदर का लक्षण - सिंह के समान कटि वाला राजा, ऊंट के समान कटिवाला निर्धन, समान उदर वाला भोगी तथा घड़े के समान उदर वाला निर्धन होता है। सामुद्रिक शास्त्र में ऊंट के साथ-साथ कुत्ता, शृगाल तथा गधे के सदृश कटिवाला निर्धन होता है। यथा -
                           सिंहतुल्या कटिर्यस्य स नरेन्द्रो न संशय:।
                           श्वशृगालखरोष्ट्राणां तुल्या यस्य स निर्धन:।।
                           समोदरा भोगयुता विषमा निर्धना: स्मृता:।। - बृहत्संहिता, ६८।१८
नाभि का लक्षण एवं फल - गोल, ऊँची और विस्तीर्ण नाभिवाला मनुष्य सुखी होता है। छोटी, अदृश्य एवं अनिम्न नाभि दु:खदायक है। पेट के वलि के मध्य में स्थित और विषम नाभि शूली पर चढ़ाती है तथा निर्धन बनाती है। वामावर्त नाभि शठ और दक्षिणावर्त नाभि तत्त्वज्ञानी बनाती है। दोनों पाश्र्व में आयत नाभि दीर्घायु, ऊपर की ओर आयत नाभि ऐश्वर्य, नीचे की ओर आयत नाभि गायों-पशुओं से युक्त तथा कमल कोर की तरह नाभि राजा बनाती है।
पेट के वलियों का लक्षण और फल -  एक वलि (उदर की रेखा) वाले मनुष्य का शस्त्र से मरण, दो वलि वाले मनुष्य बहुत स्त्रियों को भोगने वाले, तीन वलि वाले उपदेशक, चार वलि वाले बहुत पुत्रों से युक्त और वलिरहित उदर वाले राजा या तत्सदृश होते हैं। विषम (छोटी-बड़ी) वलि वाले अगम्या स्त्री में गमन करने वाले तथा सीधी वलि वाले मनुष्य सुखी तथा परस्त्री से विमुख होते हैं।
हृदय का लक्षण एवं फल - राजाओं का हृदय ऊंचा, विस्तीर्ण एवं कम्प से रहित होता है। निर्धनों का हृदय विपरीत लक्षणों (नीचा, कुश, सकम्प) तथा कठोर रोम से युक्त तथा शिराओं से व्याप्त होता है। समान (न ऊंची, न नीची) छाती वाले धनी, छोटी छाती वाले पुरुषार्थ से रहित, विषम छाती वाले निर्धन तथा शस्त्र से मृत्यु पाने वाले होते हैं।
ग्रीवा तथा पृष्ठ का लक्षण एवं फल - चपटी ग्रीवा वाला पुरुष निर्धन, सूखी हुई नाड़ियों से युत ग्रीवा वाला निर्धन, महिष के समान ग्रीवा वाला शूर और बैल के समान ग्रीवा वाला शस्त्र से मरण पाने वाला होता है तथा शंख के समान ग्रीवा वाला राजा और लम्बी ग्रीवा वाला बहुत खाने वाला होता है। अभग्न और रोम रहित पीठ धनी व्यक्तियों की तथा भग्न और रोगों से युत पीठ निर्धन व्यक्ति की होती है।
कांख का लक्षण एवं फल - पसीने से रहित, पुष्ट, ऊंची, सुगन्धयुत, समान तथा रोमों से व्याप्त कांख धनी व्यक्तियों की होती है तथा पसीने से युक्त, अपुष्ट, नीची, दुर्गन्धयुक्त, विषम और रोमरहित कांख निर्धन व्यक्तियों की होती है।
कन्धे का लक्षण एवं फल - मांसहीन, रोमों से युत, भग्न तथा छोटे निर्धन के कन्धे होते हैं तथा विस्तीर्ण, अभग्न और परस्पर सटे हुए कन्धे सुखी और बली पुरुषों के होते हैं।
बाहु का लक्षण एवं फल - हाथी की सूड़ के समान वर्तुलाकार, जानुपर्यन्त लम्बे, सम तथा मोटे बाहु राजा के होते हैं तथा रोमों से युत तथा छोटे बाहु निर्धन के होते हैं।
अंगुली और हांथ का लक्षण एवं फल - लम्बी अंगुलियों वाले मनुष्य दीर्घायु, सीधी अंगुलियों वाले सुभग, पतली अंगुलियों वाले बुद्धिमान, चपटी अंगुलियों वाले दूसरे के सेवक, मोटी अंगुलियों वाले निर्धन तथा बाहर को झुकी हुई अंगुलियों वाले शस्त्र से मृत्यु पाने वाले होते हैं। वानर के समान हाथ वाले धनी तथा बाघ के समान हाथ वाले पापी होते हैं। निगूढ़, दृढ़ तथा सुश्लिष्ट सन्धियों से युत मणिबन्ध (हांथ की कलाई) वाले राजा तथा छोटे संधि सहित मणि बन्ध वाले दरिद्र होते हैं। नीची हथेली वाले पिता के धन से रहित, वर्तुलाकार नीची हथेली वाले धनी तथा ऊंची हथेली वाले दानी, विषम हथेली वाले दुष्ट तथा निर्धन, लाख के समान लाल वर्ण की हथेली वाले धीर, पीली हथेली वाले अगम्या स्त्री में गमन करने वाले तथा रूखी हथेली वाले निर्धन होते हैं। यव रेखा से युत अंगुष्ठ मध्य या अंगुष्ठमूल वाले पुत्रवान होते हैं। जिनके अंगुली के पर्व लम्बे हों वे भाग्यशाली तथा दीर्घायु होते हैं।
नखों का लक्षण एवं फल - तुष (भूसी) के समान रेखाओं से युत नख वाले नपुंसक, कुत्सित एवं वर्णहीन नख वाले, दूसरे के मुख को देखने वाले तथा ताम्र वर्ण के नख वाले सेनापति होते हैं।
हथेली की रेखा एवं अंगुलियों का लक्षण एवं फल - स्निग्ध एवं गहरी हस्तरेखा वाले धनी, रूखी तथा ऊंची रेखा वाले निर्धन, हाथ में विरल अंगुली वाले निर्धन तथा सघन अंगुली वाले धनसंचयी होते हैं। जिसके हाथ में मणिबन्ध से निकल कर तीन रेखा अंगुलियों की ओर जायँ वह राजा होता है। दो मछली के चिह्न से युक्त हथेली वाला सदावत्र्त करने वाला होता है। यदि हाथ में वङ्का के समान रेखा हो तो धनी, मछली के समान हो तो विद्वान् तथा शंख, छत्र, पालकी, हाथी, घोड़ा और कमल के समान रेखा हो तो राजा होता है। यदि कलश, मृणाल, पताका या अंकुश के समान हाथ में रेखा हो तो भूमि में धन गाड़ने वाला होता है। रस्सी की तरह हाथ में रेखा हो तो अति धनी, स्वस्तिक रेखा हो तो ऐश्वर्यशाली होता है। यदि चक्र, तलवार, फरशा, तोमर, बर्छी, धनुष या भाला के समान हाथ में रेखा हो या चिह्न हो तो सेनापति और ऊखल के समान रेखा हो तो याज्ञिक होता है। मकर (घड़ियाल), ध्वजा और कोष्ठागार की तरह हांथ में रेखा हो तो बहुत धनी तथा वेदी की तरह ब्रह्मतीर्थ (अंगुष्ठमूल) हो तो अग्निहोत्री होता है। वापी, देव मन्दिर का चिह्न या त्रिभुज हो तो र्धािमक तथा अंगुष्ठमूल में जितनी स्थूल रेखा हो उतने पुत्र और जितनी सूक्ष्म रेखा हों उतनी कन्यायें होती हैं। जिनकी तर्जनी के मूल तक तीन रेखा गयी हों वे सौ वर्षपर्यन्त जीते हैं। छोटी रेखा होने पर अनुपात से आयु की कल्पना करनी चाहिए। जिनके हाथ में टूटी हुई रेखा हों वे वृक्ष या उच्च स्थान से नीचे गिरते हैं। अधिक रेखायुत हाथ या रेखा रहित हाथ वाले निर्धन होते हैं।
ठोढ़ी, दांत और ओष्ठ का लक्षण एवं फल - अतिकृश और दीर्घ ओष्ठ वाले निर्धन और मांसयुत अधरवाले धनी होते हैं। विम्ब फल के समान लाल और वक्रता से रहित अधर वाले राजा, छोटे अधर वाले राजा तथा फटे, खण्डित, वर्णरहित और रूखे अधर वाले धनहीन होते हैं। स्निग्ध, घन, तीक्ष्ण और सम दांत शुभ होते हैं।
जीभ तथा तालु का लक्षण एवं फल - लाल, लम्बी, चिकनी तथा समान जीभ वाले भोगी होते हैं। सपेâ, काली और रूखी जीभ वाले निर्धन होते हैं। इसी प्रकार तालु का भी लक्षण एवं फल जानना चाहिए।
मुख का लक्षण एवं फल - सुन्दर, वर्तुलाकार, निर्मल, चिकना और समान मुख राजाओं का होता है। इससे उलटा कुरूप, वक्राकार, मलिन, रूखा और विषम मुख भाग्य रहित का होता है। स्त्री के समान मुख वाले सन्तान हीन, गोलमुख वाले शठ, लम्बे मुख वाले निर्धन, भयानक मुख वाले धूर्त, निम्नमुख वाले पुत्रहीन, छोटे मुख वाले कृपण, सम्पूर्ण तथा सुन्दर मुख वाले भोगी होते हैं।
दाढ़ी का लक्षण एवं फल - आगे से बिना फटे, चिकनी, कोमल और नीचे को झुकी हुई दाढ़ी शुभ होती है तथा लाल रूखी और अल्प दाढ़ी वाले चोर या घूंस लेने वाले होते हैं।
कान का लक्षण एवं फल - मांसरहित कान वाले दु:खी होते हैं तथा चपटे कान वाले अधिक भोगी, छोटे कान वाले कृपण, शंकु के समान आगे से तीखे कान वाले सेनापति, रोमयुक्त कान वाले दीर्घायु, बड़े कान वाले धनी, नाड़ियों से युत कान वाले क्रूर तथा लम्बे और पुष्ट कान वाले सुखी होते हैं।
कपोल और नासिका का लक्षण एवं फल - ऊंचे गाल वाले धनी और मांस युत गाल वाले राजा के मन्त्री होते हैं। तोते के समान नासिका वाले भोगी और सुखी, मांसरहित नासिका वाले दीर्घायु, कटी हुई नासिका वाले अगम्या स्त्री में गमन करने वाले, लम्बी नासिका वाले भाग्यशाली, ऊपर खिची हुई नासिका वाले चोर, चपटी नासिका वाले स्त्री के हाथ से मृत्यु पाने वाले, आगे से टेढ़ी नासिका वाले धनी, दाहिने ओर झुकी नासिका वाले अधिक खाने वाले तथा कठोर तथा सीधी और छोटे छिद्रों से युत सुन्दर पुट वाली नासिका वाले बड़े भाग्यशाली होते हैं।
आंख का लक्षण एवं फल - कमल दल के समान नेत्र वाले धनी, लाल नेत्रान्त वाले लक्ष्मीवान् , शहद के समान पीले नेत्र वाले धनी, बिल्ली के समान (कंजे) नेत्र वाले पापी, हरिण के समान गोल और अचल नेत्र वाले चोर, नील नेत्र वाले क्रूर, हाथी के समान नेत्र वाले सेनापति, गहरे नेत्र वाले ऐश्वर्यशाली तथा नील कमल दल के समान नेत्र वाले विद्वान होते हैं। अति काले तारा वाले नेत्र उखाड़े जाते हैं। मोटे नेत्रवाले मन्त्री, कपिल वर्ण के नेत्र वाले भाग्यशाली, दीन नेत्र वाले निर्धन तथा चिकने और स्थूल नेत्र वाले धनी तथा भोगी होते हैं।
भौंह का लक्षण एवं फल - मध्य में ऊंची भ्रू वाले अल्पायु, बड़ी और ऊंची भ्रू वाले अतिसुखी, विषम (एक में बड़ी तथा दूसरे में छोटी) भ्रू वाले निर्धन, बाल चन्द्र की तरह झुकी हुई भ्रू वाले धनवान् , लम्बी तथा परस्पर बिना मिली भ्रूवाले धनी, टूटी हुई भ्रूवाले निर्धन तथा मध्य में नत भ्रूवाले मनुष्य अगम्या स्त्री में गमन करने वाले होते हैं।
(शंख कनपटी) तथा ललाट का लक्षण एवं फल - ऊँची तथा बड़ी (शंख कनपटी) वाले धनी तथा नीची कनपटी वाले पुत्र तथा धन से रहित होते हैं। टेढ़े ललाट वाले धनी, सीप के समान विशाल ललाट वाले आचार्य, नाड़ियों से व्याप्त ललाट वाले पाप में रत, ललाट के मध्य में ऊँची नाड़ी वाले धनी और ललाट में स्वस्तिक की तरह रेखा वाले धनाढ्य होते हैं। निम्न ललाट वाले वध, बन्धन के भागी और पाप कर्म में रत, ऊंचे ललाट वाले राजा तथा गोल ललाट वाले कृपण होते हैं।
ललाट रेखा का लक्षण एवं फल - ललाट में तीन रेखा वाले सौ वर्ष जीते हैं, चार रेखा वाले राजा होते हैं तथा ९५ वर्ष जीते हैं। ललाट में टूटी हुई रेखा वाले अगम्या स्त्री में गमन करने वाले और ९० वर्ष जीते हैं। रेखाओं से रहित ललाट वाले ९० वर्ष जीते हैं तथा केशान्त तक रेखा वाले अस्सी वर्ष जीते हैं। पांच रेखा युत ललाट वाले सत्तर वर्ष जीते हैं, ललाट में स्थित सब रेखाओं के अग्रभाग मिले हों तो साठ वर्ष की आयु होती है। छ:, सात आदि बहुत रेखाओं से युत ललाट वाले पचास वर्ष जीते हैं। यदि ललाट में टेढ़ी रेखा हो तो चालीस वर्ष आयु होती है। यदि ललाट में भ्रू से लगी रेखा हो तो तीस वर्ष की आयु होती है। यदि ललाट के वाम भाग में टेढ़ी रेखा हो तो बीस वर्ष की आयु होती है। छोटी रेखा हो तो बीस वर्ष से कम जीता है। यदि एक या दो रेखा से युत ललाट हो तो बीस वर्ष से कम आयु होती है। बीच में बुद्ध्यानुसार आयु की कल्पना करनी चाहिए।
शिर का लक्षण एवं फल - गोल शिर वाले गायों से युत, छत्र की तरह ऊपर से विस्तीर्ण शिर वाले राजा, चपटे शिर वाले पिता-माता के घातक और शिरस्त्राण के समान शिर वाले दीर्घायु होते हैं। घड़े के समान शिर वाले पापी और निर्धन, निम्न शिर वाले प्रतिष्ठित तथा अति निम्न शिर वाले अनर्थकारी होते हैं।
केश का लक्षण एवं फल - एक रोम कूप में एकएक काले, स्निग्ध, थोड़े से कुटिल, बिना फूटे अग्रभाग वाले, कोमल तथा घने केश हों तो सुखी या राजा होता है। एक रोम छिद्र में अनेक, विषम, कपिल, मोटे, फूटे अग्रभाग वाले, रूखे, छोटे, बहुत कुटिल और बहुत घने केश निर्धनों के होते हैं।
स्वर का लक्षण एवं फल - हाथी, बैल, रथ समूह, भेरी, मृदंग, िंसह या मेघ के समान स्वर वाले राजा तथा गर्दभ, जर्जर (विकृत) और रूखे स्वर वाले धन और सुख से हीन होते हैं।
ये सभी लक्षण पुरुषों के तथा स्त्रियों के समान रूप से समझने चाहिए। स्त्रियों के कुछ विशेष लक्षण इस प्रकार हैं। जिस कन्या के पांव स्निग्ध, ऊंचे, आगे से पतले और लाल नखों से युक्त, समान, सुन्दर, पुष्ट और छिपे हुए गुल्फ वाले, मिली हुई अंगुली वाले तथा कमल की कान्ति के समान कान्ति वाले हों वह जिस पति का वरण करती है वह राजा होता है।
     जिस स्त्री के पांव की कनिष्ठिका या अनामिका भूमि का स्पर्श न करे, अंगूठे से लम्बी तर्जनी हो वह व्यभिचारिणी और अति पापिनी होती है। छोटी गरदन वाली निर्धन, बहुत लम्बी गरदन वाली कुलक्षय करने वाली तथा मोटी गरदन वाली स्त्री क्रूर प्रकृति की होती है। जिस स्त्री के नेत्र केकर (कञ्जा), पीले, श्याम या चञ्चल हों वह बुरे स्वभाव वाली होती है तथा जिसके हंसने के समय गालों में गढ्ढे पड़ जाते हों वह व्यभिचारिणी होती है। जिस स्त्री का ललाट लम्बा हो वह देवर को, उदर लम्बा हो तो श्वसुर को, और कटि प्रदेश लम्बा हो तो पति के लिये घातक होती है तथा जिसके ऊपर के ओठ में अधिक रोम हों और जो बहुत लम्बी हो वह पति के लिये शुभ देने वाली नहीं होती है।
जिस स्त्री के ऊपर का ओष्ठ ऊंचा हो या केशों के अग्रभाग रूखे हों वह कलहप्रिया होती है। अधिकतर कुरूपा स्त्रियों में दोष और सुन्दरी में गुण होते हैं। जैसा कि वराहमिहिराचार्य का कथन है -
                    या त्तूत्तरोष्ठेन समुन्नतेन रूक्षाग्रकेशी कलहप्रिया सा।
                   प्रायो विरूपासु भवन्ति दोषा यत्राकृतिस्तत्र गुणा वसन्ति।। बृहत्संहिता, स्त्रीलक्षणाध्याय, २३
इस प्रकार शुभाशुभ लक्षणों का विधिवत अवलोकन कर शुभाशुभ फलों को जानना चाहिए।