बुधवार, 20 दिसंबर 2017

उपहार में मिली पुस्तकें

कह नहीं सकता कि मैं बुद्धिजीवी समाज से हूं या नहीं, परंतु बुद्धिजीवी लोग मुझे बुद्धिजीवी ही मानते हैं। हो सकता है, उनमें से कुछ लोगों की यह धारणा मुझे बुद्धिजीवियों की पंक्ति में लाने की हो। वैसे भी एक बार एक राजनीति से जुड़ी महिला मुझे विद्वान् न मानते हुए मेरे द्वारा सम्पादित एक पत्रिका में से तथा एक दूसरी महिला ने एक पुस्तक से मेरा नाम हटवा चुकी है। तब से मैं भ्रमित भी हूँ और रह रहकर मुझे स्वयं पर सन्देह भी उठता है कि आखिर मैं क्या हूँ। मैं जब भी एकांत में होता हूं, इसपर सोचता हूं कि आखिर लेखक अपनी पुस्तकें मुझे उपहार में क्यों देते रहते हैं? उपहार में पुस्तकें पाना मेरे लिए सौभाग्य की बात होती है। मेरे लिए प्रिय वस्तुओं में पुस्तकों का स्थान सर्वोपरि है,अतः उपहार द्वारा प्राप्त पुस्तकें ज्ञानवर्धन के साथ आनंदवर्धन भी करती है।
        कुछ लोग मिलने पर और कुछ लोग डाक से भी पुस्तक भेजते हैं । इनमें से अधिकांश लेखकों का आग्रह होता है कि मैं उनकी कृतियों पर समीक्षा लिखूं। होना तो यह चाहिए कि जितना जल्द हो सके लेखक द्वारा प्राप्त पुस्तकों पर जल्द से जल्द समीक्षा लिखकर डाक से अथवा ईमेल से भेज दूं। परंतु प्रमादवश ऐसा नहीं हो पाया । मैंने भी निश्चय किया कि अपने ब्लॉग पर ही एक-एक कर क्रमशः पुस्तकों पर लिखता चलूँ। इनमें से अधिकांश पुस्तकें लेखकों की मौलिक रचना है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम पर लिखित समीक्षा पाठकों तक पहुंचाने का अधिक युक्ति युक्त माध्यम होगा।
   
       शक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद से 2003 में प्रकाशित कनीनिका में कुल 75 गीतों की रचना उपलब्ध है। पुस्तक में अंतिम गीत का शीर्षक कनीनिका है, जिसके आधार पर इस पुस्तक का नामकरण किया गया है। सरस्वती, विन्ध्यवासिनी आदि की स्तुति के पश्चात् श्रावणमासे कृष्णारात्रिः दिशि दिशि विकरति रागं रे,
 पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं हृदि हृदि जनयति कामं रे 
लिखकर कवि ऋतुओं पर मनोहारी गीतों का राग छेडकर पाठकों को मुग्ध करते है।  किसी विरहिणी की व्यथा कैसे उद्दीपित हो रही है, कवि उसके अन्तस् में उतरकर कह उठता है- प्रियं विना मे सदनं शून्यम्। केशव प्रसाद सरस राग के महान् गायक कवियों में से एक हैं। कवि ने पुरोवाक् में लिखते हुए अपनी इस उपलब्धि तक पहुँचने का वर्णन तो किया ही हैं ,साथ में पाठकों के लिए संदेश भी छोड़ जाते हैं। इन्होंने अपने गृह जनपद के प्रति अनुराग कौशाम्बीं प्रति में व्यक्त किया है। 
 प्रवहति यमुना रम्या सलिला। विलसति रुचिरा कौशाम्बिकला।।
2015 में प्रकाशित आचार्य लालमणि पाण्डेय की रचना संस्कृत गीतकन्दलिका का मूल स्वर आध्यात्मिक है।कवि गीतों के माध्यम से शारदा, गंगा की स्तुति कर प्रयाग तथा वृन्दावन तीर्थस्थलों के महिमा का गान करने लगते है। संस्कृतभाषा के कवि को संस्कृत की अत्यधिक चिंता है। सम्पूर्ण पुस्तक में  संस्कृत को लेकर कवि ने सर्वाधिक 8 गीतों की रचना की है। संस्कृत कवि सम्मेलन तथा अन्य मंच से कवि संस्कृत की रक्षा का आह्वान करते दिखते है।
शास्त्राणां नहि दर्शनन्न मनन्नाध्यापनं मन्थनम् --------सुधियः संरक्ष्यतां संस्कृतम्।।
  अभिनन्दनपत्र, स्वागत, श्रद्धांजलि आदि की परम्परा, पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा महेन्द्र सिंह यादव संयुक्त शिक्षा निदेशक पर आकर पूरी होती है। संस्कृत साहित्य की एक विधा समस्यापूर्ति की झलक भी हमें यहाँ देखने को मिलती है। समस्या पूर्ति कवित्व का निकष है। लालामणि पाण्डेय निःसन्देह सौदामिनी संस्कृत महाविद्यालय के संस्कृत कवि सम्मेलन रूपी उस निकष से गुजरते हुए  सौदामिनी राजते समस्या की पूर्ति करते है।
एका चन्द्रमुखी प्रिया रतिनिभा---  सौदामिनी राजते।।
 आत्मनिवेदन में कवि पुस्तक रचना का उद्येश्य संस्कृत का प्रचार लिखते हैं।
                         हीरालालं गुरुं नत्वा मानिकेन विभावितः।
                         संस्कृतस्य प्रचाराय कुर्वे कन्दलिकां मुदा।।


डॉ. प्रशस्यमित्र शास्त्री संस्कृत के जाने-माने हास्य लेखक और कथाकार हैं। अनभीप्सितम्, आषाढस्य प्रथमदिवसे तथा अनाघ्रातं पुष्पं के बाद मामकीनं गृहम् कथा संग्रह वर्ष 2016 में अक्षयवट प्रकाशन 26 बलरामपुर हाउस, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ है । कथा लेखकों में प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी तथा बनमाली विश्वाल के बाद डॉ. शास्त्री मेरे पसंदीदा लेखक है। इनकी कथाओं में सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक समस्याओं का संघर्ष, वैयक्तिक उलझन, वृद्धजनों के प्रति उपेक्षा, संकीर्ण चिंतन आदि विषय वर्णित होते हैं। कथानक में सहसा मोड़ आता है जिससे पाठक रोमांचित हो उठता है। मामकीनं गृहम् में कुल 14 दीर्घ कथायें तथा 7 लघु कथाएं हैं। इसकी एक दीर्घ कथा है- विजाने भोक्तारं । इस कथानक में एक संस्कृत के धोती तथा शिखाधारी छात्र को विदेश से आई हुई एक छात्रा को पढ़ाने के लिए ट्यूशन मिल जाता है। इसकी जोरदार चर्चा कक्षा में होती है। एक दिन उसे अपने घर जाना पड़ता है । वह अपने स्थान पर दूसरे छात्र को ट्यूशन पढ़ाने हेतु भेजता है। यहां पर अभिज्ञानशाकुंतलम् और कालिदास पर रोचक चर्चा मिलती है । कहानी पढ़ते समय ऐसा लगता है कि विदेश से आई हुई छात्रा अपने दूसरे ट्विटर को पसंद करेगी, लेकिन अंततः धोतीधारी ट्विटर से उसकी शादी हो जाती है। पूरी कहानी संस्कृत शिक्षा, रूप सौंदर्य और सफलता के इर्द-गिर्द घूमती है। अंत में लेखक रूप-सौंदर्य के स्थान पर सफलता को प्रतिष्ठित करता है। यही कथा का सार है। 



रविवार, 17 दिसंबर 2017

व्याकरणशास्त्र परम्परा

नोट- मैंने फेसबुक पर प्रति शनिवार एवं रविवार को संस्कृतशास्त्रालोचनम् व्याख्यानमाला संचालित कराया है। व्याख्यानमाला का आरंभ व्याकरणशास्त्र परम्परा से हुआ,क्योंकि यह सभी शास्त्रों का मुख है। श्रोताओं के आग्रह पर यहाँ व्याख्यान के विषय को व्यवस्थित कर लिखा रहा हूँ।

व्याकरण शास्त्र के प्राचीन आचार्य-

व्याकरण शास्त्र का मूल आधार वेद है। वेद में व्याकरण के स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है।
          चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।
          त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवा मर्त्याम् आविवेश ।। (ऋग्वेद 4:58:3)
इस मंत्र में शब्द को वृषभ नाम से कहा गया है। इस वृषभ के स्वरूप का लर्णन किया गया है-  
नामआख्यातउपसर्गनिपात ये चार सींग,  भूतकालवर्तमानकालभविष्यकाल ये तीन पैर, सुप् (सुजस् आदि)तिङ् (तिप्तस्झि आदि) दो सींग (शीर्षे) प्रथमादि्वतीयातृतीयाचतुर्थीपंचमीषष्ठीसप्तमी ये सातों विभक्तियां इसके हाथ हैं, उरस्कण्ठःशिरस् इन तीन स्थानों से यह बंधा हुआ आबाज कर रहा है।
रामायण के किष्किन्धा कांड में राम हनुमान के बारे में लक्ष्मण से कहते हैं-  
              नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।
              बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्। किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्ग, श्लोक 29
निश्चित रुप से इसने सम्पूर्ण व्याकरण को भी सुना है,क्योंकि इसने बहुत बोला परन्तु कहीं भी व्याकरण की दृष्टि से एक भी अशुद्धि नहीं हुई।
महाभाष्य में पतञ्जलि ने भी व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्राचीन काल में संस्कार के बाद ब्राह्मण व्याकरण पढ़ते थे।
         "पुराकल्प एतदासीत् , संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्मधीयते ।" (महाभाष्य---1.1.1)
प्रश्न यह उठता है कि जब यह व्याकरण इतना प्राचीन है तो इसे सर्वप्रथम किसको किसने पढ़ाया? इसका उत्तर ऋक्तन्त्र 1.4 में मिलता है। व्याकरण के सर्व प्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा थे।  ब्रह्मा वृहस्पतये प्रोवाच, वृहस्पतिरिन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भारद्वाजो ऋषिभ्यः। महाभाष्य के पस्पशाह्निक में शब्दों के बारे में प्रतिपादन करते हुए पतञ्जलि ने पुनः व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख किया- वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम, वृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रचाध्येता दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो न चान्तं जगाम इति । इस परम्परा में अनेक आचार्यों का उल्लेख हुआ है। यह लगभग 10 हजार वर्ष की परम्परा है।
भरद्वाज-
भरद्वाज अंगिरस वृहस्पति के पुत्र तथा इन्द्र के शिष्य थे। युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार ये विक्रम सं. से 9300 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए। भरद्वाज काशी के राजा दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे।
भागुरि-  
भागुरि नाम का उल्लेख पाणिनि तथा पतंजलि ने किया है। न्यासकार ने इनके एक मत का उल्लेख किया है।
             वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः।
             आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा।।
पौष्करसादि-
महाभाष्यकारकार पतंजलि ने चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् में पुष्करसादि के पुत्र पौष्करसादि के मत का उल्लेख किया है।
काशकृत्स्न-
पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम्, आपिशलम्, काशकृत्स्नम् इस महाभाष्य के वचन के अनुसार तथा वोपदेव कृत कविकल्पद्रुम के अनुसार काशकृत्स्न नामक वैयाकरण का पता चलता है। वस्तुतः महाभाष्य व्याकरण ज्ञान का मूल ऐतिह्य स्रोत है।
                 इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नाऽपिशली शाकटायनः ।
                 पाणिन्यमरजैनेन्द्राः जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः।।
शन्तनु- 
सम्प्रति इनके द्वारा रचित फिट् सूत्र प्राप्त होता है। शन्तनु द्वारा विरचित होने कारण इसे शान्तनव व्याकरण भी कहा जाता हैं। प्रातिपदिक अर्थात् मूल शब्द को फिट् नाम से कहा गया। इन सूत्रों में प्रातिपदिक के स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) का विधान किया गया है ।
गार्ग्य- अष्टाध्यायी में पाणिनि ने इस ऋषि के मत का उल्लेख अनेक सूत्रों में किया है।अड्गार्ग्यगालवयोः, ओतो गार्ग्यस्य आदि।
इस प्रकार पाणिनि ने अपने ग्रन्थ अष्टाध्यायी में शाकल्य, आपिशलि, काश्यप, चाक्रवर्मण, शाकटायन,व्याडि,शाकल्य आदि अनेक वैयाकरण आचार्यों के मत का उल्लेख किया है।

नोट- इस अधोलिखित भाग का सम्पादन तथा विस्तार करना शेष है।

व्याकरण ग्रन्थ परम्परा                                       

लेखक                            समय                             ग्रन्थ का नाम
पाणिनि                         2000 वर्ष पूर्व               अष्टाध्यायी
शालातुरो नाम ग्रामः, सोभिजनोस्यास्तीति शालातुरीयः तत्र भवान् पाणिनिः। 
कात्यायन                      3000  
पतंजलि                                                           महाभाष्य
चन्द्रगोभि                      12000 पू0                चान्द्रव्याकरण
क्षपणक                          विक्रम के एक शती में       उणादि की व्याख्या लिखा
भर्तृहरि                          4 शती                           वाक्यपदीप
देवनन्दी/जिनेन्द्र              5 3700 सूत्र                  जैनेन्द्र व्याकरण का औदीच्य प्राच्य पाठ मिलता है।
भोजदेव                         सं01075                      सरस्वतीकण्ठाभरण 6400 सूत्र
दयापालमुनि                  1082                           रूपसिद्वि शाकटायनव्याकरण नवीनी
वर्धमान                         1120                           गणरत्नमहोदधि
लंकास्थ बौद्व धर्मकीर्ति     1140                           रूपावतार
हेमचन्द्रसूरि       (जैनावर्ष) 1145                          सिद्वहैमशब्दानुशासन इस पर स्वोपज्ञा टीका‘ 6000
श्लोेक
क्रमदीश्वर                                                          संक्षिप्तसार
नरेन्द्राचार्य                     1250                           सारस्वत व्याकरण अनुभूतिस्वरूप की टीका सारस्वतप्रक्रिया
बोपदेव                         1325                           मुग्धबोधव्याकरण

पाणिनि -          
गुणरत्नमहोदधि में वर्धमान
पतंजलि इह पुष्यमित्रं याजयामः
टीका                             परम्परा                         
रामचन्दाचार्य                1450वि0                     प्रक्रिया कौमुदी
भट्टोजि दीक्षित               1570-1650                 वैयाकरण सिद्वान्त कौमुदी
ज्ञानेन्द्र सरस्वती             1551                           तत्वबोधिनी
जयादित्यवामन                                                  काशिका
दयानन्द सरस्वती                                               अष्टाध्यायी भाष्य कृत 30 आचार्य

कैयट                                         प्रदीप
अष्टाध्यायी के वृत्तिकार- व्याडि, कुणिः, माथुरः
वार्तिकभाष्यकार- हेलाराज- वार्तिकोन्मेष, राघवसूरि
व्याकरण के भाग
उणादि सूत्र, गणपाठ, धातुपाठ, शब्दानुशासन (खिलपाठ) परिभाषापाठ, फिट्सूत्र
व्याकरण के दर्शन ग्रन्थ
वाक्यपदीय        वृषभदेव ने स्वोपज्ञ टीका लिखी
पुष्यराज द्वितीय काण्ड पर टीका
हेलाचार्य तीनों पर लिखा परन्तु तृतीय पर उपलब्ध
मण्डन मिश्र        स्फोटसिद्वि
भरत मिश्र                      स्फोटसिद्वि त्रिवेन्द्रम से प्रकाशित
कौण्डभट्ट                       वैयाकरण भूषण सार
नागेश भट्ट          वैयाकरण सिद्वान्त मंजूषा
आधुनिक गुरूशिष्य परम्परा
गंगाराम त्रिपाठी
तरानाथ तर्क वाचस्पति
रामयश  त्रिपाठी             1884
गोपाल शास्त्री (त्रिपाठी) दर्शन केसरी
युधिष्ठिर मीमांसक

             
                                                
                                               लेखक- जगदानन्द झा
                                                  9598011847

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2017

संस्कृत प्रेमी डॉ. भीमराव अम्बेडकर

भीमराव रामजी आंबेडकर महान् संस्कृत प्रेमी थे यह हमें कई स्रोतों से पता चलता है। संस्कृत आयोग का प्रतिवेदन 1956-57 के दशम अध्याय क्रम 6 संस्कृत राजभाषा के रूप में पैरा से तथा अनेक समाचार पत्रों से यह सिद्ध होता है कि संस्कृत को राज्यभाषा बनाने के प्रस्ताव का समर्थन डॉ. आंबेडकर ने किया था। इनका जन्म 14 अप्रैल, 1891 में हुआ। इनकी जीवनी हमें अनेक स्रोतों से प्राप्त हो जाती है।  इस लेख का उद्येश्य उनके संस्कृत प्रेम से अवगत कराना है। वे अंग्रेजी, हिन्दी, मराठी, पालि, संस्कृत, गुजराती और जर्मन, फारसी, फ्रेंच विदेशी भाषाओं के जानकार थे। इनका परिनिर्वाण 6 दिसम्बर 1956 को हुआ । 
डॉ आंबेडकर राज्य की अपेक्षा समाज को अधिक महत्व देते थे। उनका मानना था कि समाज के लोकतांत्रिक होने से राज्य स्वतः लोकतांत्रिक हो जाएगा, परंतु राज्य के लोकतांत्रिक होने से समाज भी लोकतांत्रिक हो जाएगा यह आवश्यक नहीं । राज्य शक्ति संचालित है, सत्ता शक्ति में तानाशाही मनोवृति न्यूनाधिक रूप से अवश्य रहती है। यह परिणाम भी देखने को आ सकता है कि लोकतंत्र ही अधिनायक तंत्र का रूप ले ले। लोकतंत्र, चेतना का व्यवहार है। चेतना संस्कार, समूह मूलक है, अतः डॉ. अंबेडकर राजनीतिक स्वतंत्रता से अधिक अर्थ, धर्म, समाज आदि की स्वतंत्रता पर बल देते थे। साम्यवादियों की तरह वे धर्मच्युत समाज की स्थापना को महत्व नहीं देते थे। वे इस क्षेत्र में धर्म की लोकतांत्रिक संचेतना के प्रवाह की अनुभूति करते रहना चाहते थे। संस्कृत के लिए उनका यह विचार समसामयिक है। हमें सर्वप्रथम समाज को संस्कृतभाषी बनाना चाहिए क्रमशः राज्य सत्ता भी संस्कृतभाषा को अपनाने पर विवश होगी। १९२० का दशक वह समय था जब गाँधी भाषाई अस्मिता के आधार पर अंग्रेजों के विरूद्ध जनमत को संगठित किये थे। इस समय समग्र भारत को एक सूत्र में बांधने वाली भाषा की आवश्यकता थी। अंग्रेजी हमें दासता का बोध कराती है अतः इसे स्वीकार करना सम्भव नहीं था। हिन्दी का फैलाब सीमित था तथा कुछ प्रान्तों में विरोध भी था।
भाषा के आधार पर प्रान्तों के पुनर्गठन के बारे में डॉ. आंबेडकर का मत था कि राष्ट्रीय एकता के लिए संविधान में यह व्यवस्था होनी चाहिए कि हर राज्य की सरकारी भाषा वही हो, जो केंद्र सरकार की है।  उनके मत में भाषावार प्रांत अव्यवहारिक थे। 1 नवंबर 1956 को भाषावार प्रांत में के गठन से अल्प भाषा भाषी लोगों की शक्ति कम हो गई। गीता का उपदेश शुनि चैव स्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः का उदाहरण देते हुए डॉ. आंबेडकर कहते थे कि हिंदू दर्शन सर्वव्यापी आत्मा का सिद्धांत सिखाता है।
1947 में श्याम कृष्ण दर आयोग का गठन किया गया। दर आयोग ने भाषाई आधार पर राज्यों के पुनर्गठन का विरोध किया था। उसका मुख्य जोर प्रशासनिक सुविधाओं को आधार बनाने पर था। 22 दिसम्बर 1953 में न्यायाधीश फजल अली की अध्यक्षता में प्रथम राज्य पुनर्गठन आयोग का गठन हुआ। इस आयोग ने 30 सितंबर 1955 को अपनी रिपोर्ट में भाषा को भी राज्यों के पुनर्गठन का आधार बनाया। आज समूचा देश क्षेत्र और भाषा के आधार पर बंट चुका है।
अनेक समाचार पत्रों से यह सिद्ध होता है कि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाने का प्रस्ताव का समर्थन डॉ. आंबेडकर ने भी किया था। संस्कृत के पक्ष का समर्थन करते हुए नजीरुद्दीन अहमद ने सदन को संबोधित किया था कि जिस भाषा को हम एक ऐसे देश के लिए अपनाना चाहते हैं जहां की अनेक भाषाएं प्रचलित है, सर्वप्रथम उस भाषा को पक्षपात रहित होना चाहिए। साथ ही साथ वह किसी एक प्रदेश की अपनी भाषा न हो। सभी क्षेत्रों की सर्व साधारण भाषा हो तथा जिसे स्वीकार करने से किसी एक प्रदेश को तो लाभ हो,किंतु अन्य प्रदेशों के लिए वह कठिनाइयों उत्पन्न करें। लक्ष्मीकांत मैत्र, जोकि हिंदी के स्थान पर संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाए जाने वाले संशोधन के प्रचालक थे, उन्होंने परिषद से कहा कि यदि संस्कृत को स्वीकार किया जाता है तो सभी द्वेष तथा कटुता हो दूर जाएंगी तथा साथ ही साथ जो मनोवैज्ञानिक जटिलताएं इस समय उठ खड़ी हुई है वह भी समाप्त हो जाएंगी। तब इसके या उसके प्रभुत्व की भावना थोड़ी भी न रह जाएगी। यह तटस्थता अर्थात किसी एक विशेष प्रदेश की भाषा का न होना राष्ट्रभाषा का सर्वप्रथम एवं आवश्यक सिद्धांत माना गया है।

कानून मंत्री डॉ. आंबेडकर उन लोगों में शामिल हैं जो संस्कृत को भारतीय संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के हक में हैं। पीटीआई के संवाददाता से डॉ. आंबेडकर ने पूछा कि संस्कृत में गलत क्या है? संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के संबंध में संशोधन बिल पर संविधान सभा तब विचार करेगी जब सदन में आधिकारिक भाषा का प्रश्न आएगा। संशोधन बिल कहता है कि संघ की आधिकारिक भाषा संस्कृत होनी चाहिए। ये जानना दिलचस्प होगा कि डॉ. आंबेडकर भी चाहते थे कि संस्कृत को भारत की आधिकारिक भाषा बनाने के समर्थन में ऑल इंडिया अनुसूचित जाति फेडरेशन की कार्यकारी कमेटी 10 सितंबर, 1949 के दिन एक प्रस्ताव पास करे, लेकिन कार्यकारी कमेटी के युवा सदस्यों द्वारा विरोध की धमकी देने के कारण उसने उस प्रस्ताव को वापस ले लिया। बहरहाल एलके मिश्रा द्वारा पेश संशोधन बिल सभा में तीखी बहस के बाद दुर्भाग्यवश गिर गया और इस प्रकार भारत को भाषाई रूप से एकता के सूत्र में पिरोने का बाबासाहेब का सपना अधूरा ही रह गया।
साथ ही वह इस प्राचीन भाषा में मौजूद ज्ञान के भंडार से आम भारतीयों को जोड़े रखना चाहते थे। डॉ. आंबेडकर का संस्कृत से लगाव दिखावा नहीं था। आर्य और अनार्य, ऊंची और निम्न जातियों के संबंध में यूरोप के सिद्धांतों की सच्चाई को जानने की उत्कंठा ने उनमें संस्कृत में रुचि पैदा की थी। इसके लिए उन्होंने वेद सहित कई मौलिक स्रोतों का स्वयं और खुले मन से अध्ययन किया।जब संविधानसभा में राजभाषा के सम्बन्ध में चर्चा हो रही थी तभी डॉ़ आंबेडकर और पण्डित लक्ष्मीकान्त मैत्रा परस्पर संस्कृत में ही वार्तालाप कर रहे थे। यह समाचार 15 सितम्बर,1941 के 'आज' नामक हिन्दी समाचार पत्र में 'डॉ़ आंबेडकर का संस्कृत में वार्तालाप' नाम से छपा था। इससे पहले प्रयाग से प्रकाशित 'दि लीडर' नामक अंग्रेजी समाचार पत्र के मुखपृष्ठ पर 13 सितम्बर,1941 को  प्रकाशित हुआ था। दिल्ली के राष्ट्रीय अभिलेखागार में शताधिक वषों से संरक्षित पत्रिकाओं और समाचारपत्रों को देखने से यह महत्वपूर्ण समाचार प्राप्त हुआ।
5 अगस्त 1949 में कांग्रेस कार्य समिति ने डॉ़ राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में दो भाषाओं के शिक्षण का निर्णय लिया।

सितम्बर 1949 में भाषा-नीति को लेकर राष्ट्रनायकों के बीच बहुत चर्चा हुई। इंडियन शिड्यूल्ड कास्ट फेडरेशन की अखिल भारतीय कार्यकारी समिति की गोष्ठी में डॉ़ आंबेडकर ने राजभाषा 'संस्कृत हो' यह प्रस्ताव पारित करने का महान् प्रयत्न किया। परन्तु श्री बी़ पी़ मौर्य आदि युवा कार्यकर्ताओं ने उसका बहुत विरोध किया और सभा त्याग की भी घोषणा कर दी। इस कारण से डॉ़ आंबेडकर ने अपना प्रस्ताव वापस ले लिया। उसके बाद उसी दिन शाम को पत्रकार गोष्ठी बुलाकर उन्होंने अपना विचार व्यक्त किया।
संविधान सभा में कांग्रेस दल के सदस्यों ने भाषानीति के सन्दर्भ में 21,22,23,24,25 सितम्बर,1949 को गोष्ठी की। अन्त में, 25 सितम्बर को मुंशी-आयंगर सूत्र के सन्दर्भ में मतदान किया गया। पक्ष और विपक्ष में 77-77 बराबर मत प्राप्त हुए। 'हिन्दुस्तान' पत्रिका में प्रकाशित तत्कालीन वार्ता के अनुसार मतदान के समय अध्यक्ष पद पर आसीन श्री सत्यनारायणन् ने अपना निर्णायक मत नहीं दिया।
अन्त में यह निर्णय लिया गया कि संविधान सभा में यदि मतदान हो तो सभी अन्त:साक्ष्य अनुसार मतदान करें। 16 सितम्बर,1949 के अंग्रेजी समाचारपत्र ट्रिब्यून में संस्कृत के सन्दर्भ में सम्पादकीय भी छपा।
संविधान सभा में प्रो. निजामुद्दीन मोहम्मद संस्कृत-परक प्रस्ताव के उपस्थापक और प्रमुख थे। उन्होंने संविधानसभा में संस्कृत के पक्ष में भाषण भी दिया। प्रस्ताव के पक्ष में हस्ताक्षर करने वालों में अनेक लोग तमिलनाडु प्रदेशवासी और दक्षिणवासी भी थे। 
उन दिनों संस्कृतज्ञों ने भी कुछ प्रयास किए। 25सितम्बर,1949 को अंग्रेजी समाचार पत्र दि स्टेट्समैन में प्रकाशित वार्ता के अनुसार डॉ़ सारस्वत महोदय की अध्यक्षता में हुई संस्कृतज्ञों की अखिल भारतीय सभा में 'संस्कृत को राजभाषा बनाने की अभियाचना की गई ।
अन्त में संविधान की आठवीं अनुसूची में संस्कृत की प्रविष्टि की गई,राजभाषा हिन्दी के विकास हेतु प्रमुखतया संस्कृत से शब्द लिए जाएंगे, केन्द्र सरकार के विविध विभागों, मन्त्रालयों तथा संस्थानों में ध्येय वाक्य संस्कृत भाषा में हों । आम्बेडकर ने जिस संस्कृत को राजभाषा का सम्मान दिलाने का प्रयास किया वही काम द्वापर में व्यास ने तथा त्रेता में वाल्मीकि ने किया था। संस्कृत को जब- जब उद्धार की आवश्यकता हुई। ईश्वर ने किसी अब्राह्मण को इसका निमित्त बनाया।
                                                                                    लेखक- जगदानन्द झा
                                                                                    सम्पर्क- 9598011847    

मंगलवार, 31 अक्तूबर 2017

कालिदास की कृतियों में छन्दों का विधान

छठी शताब्दी से लेकर आज तक कालिदास के ऊपर बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा जा चुका है फिर भी कालिदास के बारे में बहुत कुछ कहना और सुनना शेष रह जाता है। संस्कृत साहित्य में वाल्मीकि के बाद कालिदास एक ऐसे कवि हैं, जिनके काव्यों का अनेक भाषाओं में अनुवाद है और समालोचकों के द्वारा प्रशंसित भी हुआ ।
आप सब कालिदास की जीवनी तथा उनकी रचनाओं से लगभग परिचित होंगे। मैंने कालिदास साहित्य में नवप्रवेशी के लिए अपने व्याख्यान का विषय चुना है- कालिदास के काव्यों में छन्दों का विधान। छन्द को वृत्त भी कहा जाता है।
 आज के इस व्याख्यान का संबंध दो विषयों से है।
1.     कालिदास का काव्य
2.     छन्द शास्त्र
छन्द शास्त्र की संक्षिप्त जानकारी देने के पश्चात् हम देखेंगें कि कालिदास ने अपने काव्यों तथा नाटकों में इसका प्रयोग कहाँ-कहाँ तथा किस रूप में किया है। काव्य में अनेक रस के प्रयोग किए जाते हैं। प्रत्येक रस के लिए अलग-अलग छन्दों का विधान किया है। प्रत्येक छन्द का अपना एक रस और गति होती है। वर्ण के सुनिश्चित क्रम तथा यति इसके आधार पर काव्य में संगीतात्मकता उत्पन्न होती है। छन्द के कारण ही पद्यात्मक काव्य हमें सुनने में मधुर लगने लगता है। कालिदास ने रघुवंशम् तथा कुमारसंभवम् दो महाकाव्यों, मेघदूत ऋतुसंहार दो खंड काव्य तथा मालविकाग्निमित्रम्, अभिज्ञानशाकुन्तलम् एवं विक्रमोर्वशीयम् तीन नाटक लिखा है। उन्होंने अपने नाटकों में भी यत्र-तत्र छंदोबद्ध श्लोकों की रचना की है। छन्दों के नियमन अथवा परिज्ञान के लिए अनेक ग्रंथ उपलब्ध है, जिनमें पिंगलाचार्य कृत वैदिक छन्दः सूत्र से लेकर सुवृत्ततिलक, वृत्त रत्नाकर, वृत्तमंजरी आदि अनेक ग्रंथ प्राप्त होते हैं। छन्दों के बारे में विस्तारपूर्वक जानकारी के लिए मेरे ब्लॉग संस्कृतभाषी पर लिखित लेख संस्कृत काव्यों में छन्द को पढ़ें ।
कुछ महत्वपूर्ण छन्द, जिनका प्रयोग महाकवि कालिदास ने अपने काव्यों में किया है, उनके नाम, विषय, भाव या रस के बारे में चर्चा करना अपेक्षित है।
छन्द शास्त्र में वर्ण की गणना लघु और गुरु से की जाती है। लघु से अभिप्राय ह्रस्व स्वर एवं गुरु का अर्थ दीर्घ स्वर से है।  दीर्घ स्वर में दो मात्राएं होती है।  ह्रस्व का संकेत सरल रेखा । अथवा पूर्ण विराम तथा दीर्घ का संकेत अंग्रेजी का S अक्षर होता है। संयुक्त वर्ण, विसर्ग, जिह्वामूलीय, मूल्य उपध्मानीय, चिह्नों से पूर्व और अनुस्वार से युक्त लघु वर्ण भी गुरु संज्ञक होता है, किंतु पाद के अंत में स्थित लघुवर्ण को कहीं गुरु तो कहीं लघु माना जाता है। जैसे उपजाति छन्द का यह श्लोक- संचारपूतानि दिगन्तराणि के णि वर्ण के इ को गुरू मान लिया जाता है।
छन्द में यति के नियम
छन्दोमञ्जरी के अनुसार जिस स्थान पर जीभ सुविधापूर्वक विश्राम करती है, उसे यति कहते हैं। विश्राम, विच्छेद, विराम यति के पर्यायवाची शब्द हैं। संस्कृत के छन्द लक्षण ग्रंथों में 2046 छन्दों के लक्षण प्राप्त होते हैं, जिसमें काव्य में प्रायः 70 छन्दों का प्रयोग मिलता है। कालिदास ने छोटे छोटे छन्दों को प्राथमिकता दी है। इन्होंने सर्वाधिक उपजाति तथा अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त इन्होंने प्रहर्षिणी, वंशस्थ, पुष्पिताग्रा, तोटक, रथोद्धता, वैतालीय, मत्तमयूर, नाराच, हरिणी, द्रुतविलंबित, मन्दाक्रान्ता, वसन्ततिलका, शिखरिणी, आर्य, मालिनी, शार्दूलविक्रीडित,
उपजाति
इंद्रवज्रा तथा उपेंद्रवज्रा छन्दों के मेल से उपजाति छन्द बनता है।
अनुष्टुप्
             श्लोके षष्ठं गुरुर्ज्ञेयं सर्वत्र लघु पञ्चमम् ।
             द्विचतुः पादयोर्ह्रस्वं सप्तमं दीर्घमन्ययोः ॥
अथवा
             लघु स्यात् पंचमं यत्र गुरुषष्ठं तु सप्तमम्।
             द्वितुर्यपादयोर्ह्रस्वमष्टाक्षरमनुष्टुभम्।।
एक श्लोक में चार चरण होते हैं। इस छन्द के प्रत्येक चरण में आठ वर्ण होते हैं। प्रत्येक पाद छठा वर्ण गुरु और पाँचवाँ लघु होता है ।  2 एवं 4 चरण में सातवाँ वर्ण ह्रस्व और 1 एवं 3 चरण में गुरु होता है। यह छन्द अर्धसमवृत्त है ।
इस छन्द का उपयोग महाकाव्य के आदि में कथा के प्रारंभ में वैराग्य शतक उपदेश में तथा काव्य में प्रयुक्त विभिन्न चरणों के अंत में किया जाता है।
उपजाति छन्द का प्रयोग वंश वर्णन, तपस्या तथा नायक नायिका का सौंदर्य वर्णन में किया जाता है।
अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग लंबी कथा को संक्षिप्त करने तथा उपदेश देने में यथा- आरम्भे सर्गबन्धस्य कथा विस्तारसंग्रहे ।
समोपदेशवृतान्ते सन्तः शंसन्त्यनुष्टुभम् । (सुवृत्त तिलक 3/16)  वंशस्थ छन्द का प्रयोग वीरता के प्रकरण में चाहे युद्ध अथवा युद्ध की तैयारी हो रही हो, वैतालीय छन्द का प्रयोग करुण रस में, द्रुतविलंबित छन्द का प्रयोग समृद्धि के वर्णन में, रथोद्धता छन्द का प्रयोग जिस कर्म का परिणाम खेद (पश्चाताप) के रूप में परिणत हो। (वह खेद कामक्रीडा, दुष्कर्मजनित भी हो सकता है।) मंदाक्रान्ता छन्द का प्रयोग प्रवास, विपत्ति तथा बर्षा के वर्णन में, मालिनी छन्द का प्रयोग सफलता के साथ पूर्ण होने वाले सर्ग के अंत में, प्रहर्षणी छन्द का प्रयोग हर्ष के साथ पूर्ण होने वाले सर्ग के अंत में, हरिणी छन्द का प्रयोग नायक का उत्थान अथवा सौभाग्य के वर्णन में, वसंततिलका छन्द का प्रयोग कार्य की सफलता पर, ऋतु वर्णन में वस्तु के उपभोग के प्रसंग में किया जाता है
छन्द निर्धारण हेतु सूत्र
            यमाताराजभानसलगा: अथवा यमाताराजभानसलगम्
यमाता, मातारा, ताराज,
यगण - यमाता     = ।ऽऽ आदि लघु
मगण - मातारा    = ऽऽऽ सर्वगुरु
तगण - ताराज     = ऽऽ । अन्तलघु
रगण - राजभा     = ऽ ।ऽ मध्यलघु
जगण - जभान     = ।ऽ । मध्यगुरु
भगण - भानस     = ऽ ॥ आदिगुरु
नगण - नसल      = ॥ । सर्वलघु
सगण - सलगाः    = ॥ऽ अन्त्यगुरु
जिस गण के आदि में,मध्य तथा अंत में जो  मात्रा लगायी जाती है, उसी के आधार पर इन्हें आदिलघु या आदिगुरु आदि कहा गया है । जिसमें सभी वर्ण गुरु हैं, उन्हें सर्वगुरु कहा जाता है। अतः मगणसर्वगुरु कहलाया और सभी लघु होने से नगणसर्वलघु कहलाया ।
        मस्त्रिगुरुः त्रिलघुश्च नकारो भादिगुरुः पुनरादिर्लघुर्यः ।
        जो गुरुमध्यगतो र-लमध्यः सोऽन्तगुरुः कथितोऽन्तलघुतः ॥
वंशस्थ
जतौ तु वंशस्थमुदीरितं जरौ
इस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः जगण, तगण, जगण और रगण के क्रम से 12 वर्ण होते हैं । पद्य में लक्षण और उदाहरण देखिए:
तथा समक्षं दहता मनोभवं पिनाकिना भग्नमनोरथा सती ।
निनिन्द रुपं हृदयेन पार्वती प्रियेषु सौभाग्यफला हि चारुता ।। कुमार 5.1 ।।
उदाहरण:
तथास      मक्षंद       हताम        नोभवं
। ऽ ।         ऽ ऽ ।       । ऽ ।           ऽ । ऽ
जतौतु     वंशस्थ      मुदीरि       तं जरौ
उपजाति          अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।
      अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा
      हिमालयो नाम नगाधिराजः ।
     पूर्वापरौ तोयनिधीवगाह्य 
     स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः॥ कुमारसंभवम् 1.1॥
अनुष्टुप् 
      वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
      जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥ रघुवंशम्1.1॥
प्रहर्षिणी
निर्दिष्टां कुलपतिना स पर्णशालां अध्यास्य प्रयतपरिग्रहद्वितीयः ।
तच्छिष्याध्ययननिवेदितावसानां संविष्टः कुशशयने निशां निनाय ।।रघुवंशम् 1.95 ।
पुष्पिताग्रा
अथ विधिमवसाय्य शास्त्रदृष्टं दिवसमुखीवितमञ्चिताक्षिपक्ष्मा
कुशलविरचितानुकूलवेषः क्षितिपसमाज्ञमगात्स्वयंवरस्थम्।। रघु 5-76 ।।
तोटक,रथोद्धता,वैतालीय,मत्तमयूर,हरिणी,द्रुतविलंबित,मालिनी,शार्दूलविक्रीडित,शिखरिणी,वसन्ततिका,
मन्दाक्रान्ता,(मेघदूतम्) का उदाहरण शीघ्र प्रस्तुत किया जाएगा।

रघुवंश के 2, 5, 6, 7, 13, 14, 16, 18 सर्ग में एवं कुमार संभव के 1,3 एवं 7 वें सर्ग में उपजाति छन्द का प्रयोग किया गया है। रघुवंश के 14, 10, 12, 15 एवं 17 वें  सर्ग में अनुष्टुप् छन्द का प्रयोग किया गया है। कुमारसंभव में भी इस छन्द का प्रयोग किया गया है। सुंदरी छन्द को वियोगिनी भी कहा जाता है, जिसका प्रयोग मृत्यु गीतों के अवसर पर किया जाता है। कुमारसंभव के चतुर्थ एवं रघुवंश के अष्टम सर्ग में इसका प्रयोग किया गया है। द्रुतविलंबित छन्द का प्रयोग रघुवंश के नवम सर्ग एवं कहीं-कहीं नाटकों में  किया गया है। कुमारसंभव के आठवें और रघुवंश के 19 में सर्ग में रथोद्धता छन्द का प्रयोग किया गया है। रघुवंश के ही 11 में सर्ग में स्वागता छन्द का प्रयोग हुआ है। मेघदूतम् में मंदाक्रांता का प्रयोग किया गया है।