शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज

स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज        (1921-2036)
श्रीस्वामी जी का अवतार स्थल महमत्पुर गॉंव हैं जो विक्रम नौवतपुर के समीप अवस्थित है। 10 मार्च 1865 तदनुसार फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी शुक्रवार संवत् 1921 कुंभ के सूर्य में मघा नक्षत्र में नौवतपुर के समीप अवस्थित महमत्पुर गॉंव के कौण्डिन्य गोत्रीय आथर्वणिक ब्राह्मण कुल में श्री रामधनी शर्मा एवं श्रीमति रामसखी देवी के द्वितीय पुत्र के रूप में आप अवतरित हुए। वचपन में आप 'पारस' नाम से पुकारे जाते थे।  बभनलई ग्रा म के भारद्वाजगोत्रीय श्री नरसिंह नारायण शर्मा की पुत्री के साथ परिणय सूत्र में बंधकर आपका गृहास्थाश्रम में प्रवेश हुआ तथा एक पुत्ररत्न भी प्राप्त हुआ। इस तरह से गृहस्थाश्रम के मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण से आप मुक्त हुए।
स्वामी परमहंससूरि से मिलन
वचपन से ही संगीत के माध्यम से रामचरित मानस की सस्वर प्रस्तुति में आपकी अभिरूचि थी। एक दिन स्वामी परमहंस सूरि जी के स्वागत में गॉंव मे मानस प्रस्तुति का आयोजन हुआ। आपकी जब बारी आयी तो जनकपुर फुलवारी में भगवान राम एवं सीता जी के प्रथम मिलन प्रसंग "श्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी …………बरनत छवि जहॅ तहॅ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।" की प्रस्तुति से आपने परमहंससूरि जी को मुग्ध कर दिया। प्रस्थान के पूर्व स्वामी परमहंससूरि जी ने आपके बड़े भाई श्रीजुदागी शर्मा से आपको अपने लिया मांगा। घर गृहस्थी के कारण प्रारंभ में भाई को संकोच तो हुआ परंतु उन्होंने अपनी स्वीकृति देते हुए कहा कि पारस भी आपका ही है। कुछ समय बीता और स्वामी परमहंससूरि जी तरेत स्थान से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल गये। इधर पारस जी का मन स्वामी जी में ही लगा रहता था। एक बार पारस जी अस्वस्थ हुए और प्रतिदिन रोग बढ़ता ही
गया।चारमाह से शय्याबद्ध रहते हुए स्थिति ऐसी आ गयी कि सबलोग इनके जीवन से निराश हो गये। इनकी मॉं निराश होकर ऑसू बहाती हुई भगवान से निरोग होने के लिए प्रार्थनाा करती रहतीं। मॉं की स्थिति देखकर पारसजी ने उनसे कहा 'मुझे परमहंस स्वामी जी के शरण में दान कर देने से मेरा रोग
हट जायेगा।' असहाय मॉं ने पारस के प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दी। इसी बीच अचानक स्वामी परमहंससूरि जी का तरेत में पदापर्ण हुआ। पारस जी ने अपने पिता से स्वामी जी के दर्शन की ईच्छा प्रकट की। पिता ने तरेत ठाकुरवारी जाकर स्वामी परमहंससूरि जी को पारस की मरणासन्न स्थिति से
अवगत कराया। स्वामी जी शीघ्र ही महमत्पुर पहुॅच गये एवं पारस जी के शरीर को अपने करकमल के स्पर्श से रक्षाकवच में बांध कर यह कहते हुए तरेत लौट गये 'पारस ठाकुरवारी आ जाओ'। मरणासन्न स्थिति वाला ठाकुरवारी जायेगा। यह सुनकर सब आश्चर्यचकित हो गये परंतु चमत्कार जैसा ही हुआ और पारस जी ने शीघ्र ही मरणशय्या छोड़ दिया तथा लड़खड़ाते ठाकुरवारी पहुॅच गये। "प्रभु पहिचानि परेउ धरि चरना" और स्वामी परमहंससूरि जी ने पारस जी को श्रीवैष्णव धर्म के पंचसंस्कार से दीक्षित कर 'पराङ्कुशाचार्य' नाम दे दिया। बाद में यही स्वामी पराङ्कुशाचार्य हो गये तथा "सरौती के स्वामी जी" के नाम से विख्यात हुए। दैवसंयोग से पिता परमपद हुए। पत्नी तथा पुत्र भी शनैः शनैः संसार छोड़ते गये। पारिवारिक बंधन ढ़ीला पड़ गया और जीवित मॉं पहले ही इन्हें परमहंस स्वामी जी की शरणागति में दान कर चुकी थी।
दिव्यदेश भ्रमण एवं भगवदचरित का अवगाहन
परमहंस स्वामी जी की पदछाया में रहते हुए पैंतीस वर्ष की अवस्था में श्रीपराङ्कुशाचार्य जी परमहंस स्वामी जी के साथ दक्षिण भारत के श्रीवैष्णव दिव्यदेश के दर्शन के लिये प्रस्थान कर गये। जहॉं पाञ्चरात्र शास्त्र विधि का पालन करते हुए पूर्ण परम्परा का निर्वाह होता हो एवं तदनुसार मंदिर में भगवान की पूजा होती हो उसे दिव्य देश कहते हैं। इस यात्रा का पहला लक्ष्य श्रीजगन्नाथ पुरी था। पहला चार्तुमास वहीं बीता। आंध्रप्रदेश के सिहाचलम अहोविलम मंगलगिरि तथा तिरूपति तिरूमला के दिव्यदेश का दर्शन करने में दूसरा चातुर्मास रास्ते में ही बीता। वहॉं से तमिलनाडु के मद्रास कांचीपुरम श्रीरंगम तथा आळवार तिरूनगरी के समीपस्थ स्थित सभी दिव्यदेश का दर्शन पूरा करने में तीसरा एवं चौथा
चातुर्मास रास्ते में बीता तथा पांचवा मुम्बई में बीता। वहॉं से छठे वर्ष में द्वारिका विन्दुसरोवर पुष्कर आदि की यात्रा पूरी हुई एवं सातवें वर्ष पुनः वृन्दावन का दर्शन करते तरेत पाली लौट आये। इस यात्रा में तिरूमला वेङ्कटेश भगवान तथा कांची के वरदराज भगवान एवं श्रीरंगम के रंगनाथ भगवान से विशेष सम्बन्ध बन गया। आळवार तिरूनगरी से लेकर श्रीरंगम तथा कांचीपुरम तक आळवार तथा पूर्वाचार्यों की भूमि होने के कारण श्रीवैष्णव परम्परा को गहराई से समझने का अवसर मिला जो सदा के लिये इनके मानसपटल पर अंकित हो गया। इसी स्वानुभूत आनन्द का बीज बाद में अर्चागुणगान रूपी सौरभपूर्ण कमल के रूप में प्रस्फुटित हुआ। रंगनाथ. वरदराज़ तथा वेङ्कटेश भगवान के दिव्यदेश की महिमा रूपी बाग बाटिका एवं वन में आळवार एवं पूर्वाचार्यों रूपी विहंगों के विहार करते सुमधुर वाणी से प्रफुल्लित हो श्रीपराङ्कुशाचायजी जीवन भर भगवद चरित के बाग बाटिका को दत्तचित्त माली की तरह
सींचते रहे। इनके जीवन के बाद के वर्षों में प्रत्येक वर्ष इन दिव्यदेशों की अनेकों बार अनगिनत यात्राएँ हुईं तथा इस तरह से श्रीपराङ्कुशाचार्य जी स्वयं एक चलन्त एवं जीवन्त तीर्थपुरी हो गये। ये जहॉं रहते समीपस्थ भक्तों को नित्य नवीन भगवदचरित के ही फूल के सुगंध एवं मृदु फल के सुस्वाद का आनन्द मिलते रहता।
सरौती ठाकुरवारी
ई सन् 1910 की बात है। यातायात के साधन में प्रायः घोड़ा या बैल का ही प्रयोग होता था। व्यापारी लोग बैल के माध्यम से सामान एक जगह से दूसरे जगह ले जाते थे। एक दिन एक व्यापारी 'श्रीराम लक्ष्मण एवं सीता जी' के प्रस्तर विग्रह बेचने सरौती पहुॅचा। गॉंव के भक्तों में 'श्रीराघवेन्द्र सरकार' को गॉंव में ही रखने का विचार आया। पैसा चन्दा कर विग्रह खरीद लिये गये। श्रीराघव जी नामक एक भक्त ने कुछ जमीन ठाकुर जी के नाम दे दी। ठाकुरवारी के लिये मिट्टी एवं खपड़ा के दो तीन घर बनाये गये। ठाकुर जी की प्राणप्रतिष्ठा के लिये सुयोग्य संत का अन्वेषण होने लगा तथा तरेत के परमहंस स्वामी जी से इस पुनीत कार्य के लिये निवेदन किया गया। परमहंस स्वामी जी पधारे तथा अपने नियमवश गॉंव के बाहर ही बगीचा में ठहर गये। उन्होंने ने ही वृन्दावन से याज्ञिक तथा पुजारी आदि की व्यवस्था कर दी
थी। ई सन् 1912 में ठाकुर जी अपने ठाकुरवारी में विराज गये तथा विधिवत नित्य पूजा का शुभारंभ हो गया। परमहंस स्वामी जी ने एक 'यमुना गाय' . प्रसाद पकाने का एक बड़ा टोकना. ठाकुर जी के लिये एक पर्दा. तथा श्रीरामप्रपन्नाचार्य नामके एक पुजारी ठाकुर जी को अपनी तरफ से भेंट स्वरूप अपिर्त किये। ई सन् 1915 में परमहंस स्वामी जी का महाप्रयाण हो गया। श्रीपराङ्कुशाचर्य जी उदास रहने लगे। परमहंस स्वामी जी के श्रीवासुदेवाचार्य नाम के एक अन्य शिष्य जो 'नासिक स्वामी जी' के नाम से प्रसिद्ध थे कालान्तर में तरेत के स्थानाधीश बनाये गये।
           श्रीपराङ्कुशाचर्य जी पूर्व से ही गान एवं वादन विद्या में कुशल थे। इनका अधिकांश समय भगवान के भजन कीर्तन में ही बीतने लगा। सरौती के भक्तों को ठाकुरवारी के लिये एक अच्छे व्यवस्थापक की खोज थी। ये लोग मुकामा स्वामी जी के सम्मिलित प्रयास से श्रीपराङ्कुशाचर्य जी के पास पहुँचे तथा उन्हें सरौती लाने में सफल हो गये। श्रीपराङ्कुशाचर्य जी अब 'सरौती स्वामी जी' के नाम से जाने जाने लगे। पहले का ठाकुरवारी गॉंव से बाहर था तथा ठाकुर जी के पूवाभिमुखी होने के कारण गॉंव ठाकुर जी की पीठ की तरफ पीछे पड़ जा रहा था। कुछ भक्तों के मन में इसे गॉंव की प्रगति के लिये बाधक होने का भान होने लगा। इन लोगों ने श्रीस्वामी जी से अपनी मनसा प्रकट की। पहले
वाले ठाकुरवारी के पास ही ई सन् 1930 में तरेत स्थान की तरह यहॉं भी उत्तराभिमुख नये ठाकुरवारी का निर्माण हुआ तथा इस बार का ठाकुरवारी मिट्टी का न होकर ईंट एवं छत में लोहे की शहतीर आदि से पटाई करके विस्तृत जगमोहन के साथ पक्का बना। राघवेन्द्र सरकार अब नये ठाकुरवारी में पधारे.। यही ठाकुरवारी आज भी विराजमान है। समय बीतने के साथ श्रीस्वामी जी श्रीवैष्णव परम्परा में प्रगाढ़ होते गये तथा प्रतिवर्ष दक्षिण भारत के तिरूमला तिरूपति. कांचीपुरम. तथा श्रीरंगम की यात्रा अवश्य करने लगे। धीरे धीरे तिरूमला तिरूपति के वेंकटेश भगवान से अधिक जुड़ गये। फलतः ई सन् 1968 के वैशाख शुक्लपक्ष में सरौती में भी श्रीवेंकटेश भगवान के विग्रह को विधिवत प्राणप्रतिष्ठा के साथ पधरवाया
गया। नये विग्रह पूर्व से विराजते हुए राघवेन्द्र सरकार के साथ उसी गर्भगृह में उसी वेदी पर लक्ष्मणजी की वाईं ओर विराज कर भक्तों को दर्शन लेगे। दर्शन की यही व्यवस्था आज भी यहॉं विराजमान है।
भारत में मुगलों ने हिन्दु मन्दिरों तथा हिन्दु संस्कृति को सर्वाधिक दिव्यचरितामृत स्वामीश्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज 106 क्षति पहुँचायी। हिन्दु मन्दिरों को तोड़फोड़ कर नष्ट किया गया तथा गॉंव के गॉंव हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया गया। मुगलों के अत्याचार ने सर्वाधिक उत्तर भारत को प्रभावित किया। दक्षिण में भी श्रीरंगम की व्यवस्था को इनलोगों ने नष्ट ही कर दिया था तथा हजारों की संख्या में यहॉं श्रीवैष्णव जन भगवान रंगनाथ की रक्षा में अपनी जान गंवा दिये थे। उत्तर भारत में ऊँचे शिखर के साथ दूर से दिखने वाले मन्दिर को आसानी से चिह्नित कर नष्ट किया जाता था। परिणाम स्वरूप यहॉ नये मन्दिरों के निर्माण में सावधानी बरती जाने लगी तथा मन्दिर भी आवासीय घरों की तरह बिना
शिखर के बनने लगे। इसी शैली पर तरेत तथा सरौती के ठाकुरवारी भी बने थे। गर्भगृह के ऊपर मात्र एक बंगलानुमा संरचना बना दी जाती थी तथा उसमें सार्वजनिक प्रवेश वर्जित रहता था। श्रीस्वामी जी के ई सन् 1980 में महाप्रयाण के बाद सरौती के भक्त गण 1990 के दशक में सरौती के ठाकुरवारी में भी गर्भगृह के ऊपर शिखर आदि जोड़कर इसका जीर्णोद्धार किया।
ठाकुरजी के गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर श्रीस्वामी जी की प्रतिमा भी स्थापित की गयी। इसतरह से श्रीस्वामी जी के काल के धरोहर संरचना में काफी परिवर्तन कर दिया गया।
मातृ प्रेम
श्रीस्वामी जी अपनी मॉं से अंत तक जुड़े रहे। श्रीस्वामी जी महमत् पुर जाते थे परन्तु अपने घर नहीं जाते थे। मॉं वृद्धा हो गयीं थीं। मॉं को जब एकबार इनके आगमन का पता चला तो लड़खड़ाते दीवार के सहारे इनके ठहराव स्थल पर पहुँच गयीं एवं बोलीं 'मॉं को क्यों भूल गये बेटा'। श्रीस्वामी जी ने मॉं को साष्टांग प्रणाम कर घर पहुँचाया तथा इसके बाद जब कभी भी इस क्षेत्र में आते तो अपनी मॉं का दर्शन अवश्य करते थे। मॉं जब परमपद कर गयीं तो स्वयं आचार्य बनकर इन्होंने नारायणवलि संपन्न
कराया। रघुनाथपुर निवासी श्रीराजदेव शर्मा जी ने बताया कि श्रीस्वामी जी कहा करते थे 'गऊ एवं मॉँ मेें कोइे दोष नहीं होता है।' स्वामी जी ने अपनी मॉं का श्राद्ध बिन्दुसरोवर में भी किया था।
श्रीस्वामी जी के धार्मिक कृत्य एवं पुस्तकों का प्रणयन
श्रीवैष्णव मत में संस्कार करने के अतिरिक्त श्रीस्वामी जी गॉंवों में 'श्रीमद्भागवत्' तथा 'हरिवंश' की कथा सुनाया कराते थे। श्रीस्वामी जी की कृपा से अनेकों निःसंतान लोगों को 'हरिवंश' की कथा सुनने से संतान की प्राप्ति हुई है। भक्तों के बीच श्रीस्वामी जी ने कथा सुनाने में 'भागवत सप्ताह' का बंधन नहीं रखा। सुविधानुसार वे सबको एक दो या तीन दिनों की भागवत कथा सुनाया करते थे। इनके पास भागवत की संस्कृत मूल वाली ही पुस्तक सदा विराजमान रहती थी। श्रीस्वामी जी ने अपने आध्यात्मिक अनुभव का लाभ अपने तक सीमित नहीं रखकर निम्नांकित पुस्तकों का प्रणयन किया जिससे भक्तगण भी
पूर्णतया लाभान्वित हुए तथा होते रहेंगे।
1। ब्रह्ममेध संस्कार एवं नारायण वलि पद्धति। 2। अर्चागुणगान।3श्रीपरमहंस स्वामी राजेन्द्रसूरि जी महाराज की संक्षिप्त जीवनी प्रथम भाग। 4।साम्प्रदायिक पश्नोत्तर स्त्री एवं मंत्र परमहंस स्वामी जी की जीवनी द्वितीय भाग। 5। राम रहस्य एवं हिंसा।परमहंस स्वामी जी की जीवनी तृतीय भाग 6। महाप्रयाण परमहंस स्वामी जी की जीवनी चतुर्थ भाग। 7। श्रीसीताराम परिचय एवं मानस शंका समाधान। 8। एक नारायण ही उपास्य क्यों। 9। ध्रुव प्रह्लाद चरित्र । 10। सुदामा चरित्र।
जब भी स्वामीजी बालाजी के दर्शन को जाते थे तो वहॉं बीसो मन लड्डू का भोग लगवा कर स्थानीय मठों में बॉंटते थे तथा सरौती लाते थे। तिरूमला के संत लोग स्वामी जी की श्रद्धा देखकर अवाक् रहते थे तथा इस बात का उल्लेख करते थे कि स्वामी जी के चश्मा रखने वाले कवर में साक्षात लक्ष्मी बसती हैं। पता नहीं एक छोटे चश्मे के खोल से कितने रूपये स्वामी जी खर्च करते रहते थे क्योंकि लड्डू भोग में ही उस जमाने में पन्द्रह सोलह हजार रूपए लगा देते थे। बाकी श्रीवैष्णव संत के सम्मान के खर्च अलग ही रहता था। सरौती लौटने पर समस्त श्रीवैष्णव गॉंवों मे श्री स्वामी जी बालाजी के लड्डू का प्रसाद निश्चित रूप से उपलब्ध कराते रहते थे।
श्रीस्वामी जी के बारे में भक्तों के संस्मरण सुमन
आथर्वणं सुमनसां प्रवरमहान्तं कौन्डिन्यवंशमनधं करूणालयन्तम्।।
राजेन्द्रदेशिकपदे विनिवेशयन्तं श्रीमत् पराङ्कुडामुनिं प्रणतोऽस्मि नित्यम्।।
श्री रंगदेशिक स्वामी के चरणाश्रित परमहंस स्वामी श्री राजेन्द्रसूरि जी के पदछाया में रहने वाले अथर्ववेदी पुण्यवान कौडिन्य ऋषि के अथरव कुल के पुष्प सा सुकोमल गुरू स्वामी पराङ्कुश जी की सदा वन्दना करता हूँ। सरौतीस्वामी जी ने हजारो गॉंवों को श्रीवैष्णव मत में समाश्रित कर लाखों भक्तों का उद्धार किया। इनके सभी भक्तों के अपने अपने दिव्य संस्मरण हैं। सबों को एकत्रित करना संभव नहीं है। कुछेक संस्मरण सुमन ही यहॉं अर्पित हो सके हैं।
पंडित श्रीमाधव शर्मा जी द्वारा संग्रहित संस्मरण
विद्याज्ञानवयः पूज्यं श्रीपराङ्कुशमाश्रितम्।
शिष्योपशिष्यान् पाठयन्तं माधवार्यं नमाम्यहम्।।
श्रीमाधव शर्मा जी का जन्म ई सन् 1921 में जलालपुर गॉंव में हुआ था। बचपन में ही सरौती स्वामी जी से श्रीवैष्ण्व संस्कार से सुसंस्कृत हो खैरा संस्कृत विद्यालय में पढ़ने आ गये थे। इनको पंडित गदाधार जी का स्नेह प्राप्त था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा खैरा में हुई तथा खैरा विद्यालय बंद हो जाने के बाद ये पंडित गदाधर जी के साथ पटना गये और वहीं से व्याकरण में आचार्य की शिक्षा पूरी की। गृहस्थजीवन स्वीकार करते हुए सकूराबाद भवन निर्माण में निपुणता वास्तुकला के ज्ञान सम्बन्धि एक घटना है। सरौती ठाकुरवारी में 18 फीट लंबा एवं 18 फीट चौड़ा जगमोहन का निर्माण होना था। श्रीस्वामी जी ने 12 पत्थर के पाये के सहारे अपने निर्देश में इसका निर्माण कराया। गया से एक कारीगर फर्श में संगमरमर लगाने आया था परन्तु वह देर से काम करके ज्यादा समय लगाकर ज्यादा मजदूरी का लालची हो गया था। श्रीस्वामी जी ने सरौती के पास से ही किसी अब्दुल नामके कारीगर को बुलाया और अपनी
देखरेख में संगमरमर विछाने का काम पूरा कराया। इसीतरह से जगमोहन के ऊपर एक बंगला बनना था परन्तु किसी कारीगर को उसकी छावनी कैसे की जाय समझ मे नहीं आर हा था। श्रीस्वामी बाहर गये हुए थे। सरौती लौटने पर उन्होंने स्वयं ही उसका उपाय निकाल कर छावनी का कार्य पूरा कराया।
घोड़े की सवारी
सरौती स्वामी जी एक बार अपने गुरू परमहंस स्वामी जी के साथ भारत यात्रा पर थे। महाराष्ट्र में किसी भक्त ने परमहंस स्वामी जी को एक घोड़ा समर्पित किया। परमहंस स्वामी जी तो पैदल ही चलते थे इसलिये घोड़े का उपयोग दिव्यचरितामृत स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज 124
मात्र सामान वगैरह ढ़ोने में हो रहा था। एक दिन परमहंस स्वामी जी ने पराङ्कुशाचार्य जी को घोड़े पर बांह पकड़ कर बैठा दिया और कहा कि डरने की कोई बात नहीं है। उसदिन से घुड़सवारी करना श्रीस्वामी जी को अपने गुरू का प्रसाद हो गया एवं सरौती स्थानाधीश के रूप में ये 'घोडावाले स्वामी' जी के नाम से भी प्रसिद्ध हो गये थे। रात के समय को अनावश्यक सो कर या जाग कर व्यतीत करने से बचने के लिये श्रीस्वामी जी अधिकांशतः रात में ही चलते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी था कि दिन में भक्तों के बीच रहकर उनको लाभान्वित करते थे। इनके घोड़े की विशेषता थी कि जब श्रीस्वामी जी रात में राह भूल जाते थे तो अपने घोड़ा पर ही छोड़ देते थे और स्वयंमेव ईच्छित स्थल पर पहुँच जाते थे। घोड़े की दूसरी विशेषता थी कि जब श्रीस्वामी जी अपने गंतव्य स्थल पर पहुँचते थे तो घोड़ा 'धैवत ध्वनि' से गॉंववाले को श्रीस्वामी जी के आगमन की सूचना दे देता था।
नये घोड़े का नियंत्रण ओड़विगहा गॉंव की एक अनोखी घटना है। एक भक्त नया घोड़ा खरीदा था। संयोग से श्रीस्वामी जी वहॉं पधार गये और उसने श्रीस्वामी जी को घोड़े पर चढ़कर आशीर्वाद देने का निवेदन किया। श्रीस्वामी जी जैसे ही घोड़े पर सवार हुए कि वह वायु गति से भागने लगा। सभी कसनी आदि विखरने की स्थिति में आ गये। लोगों को लगा कि आज श्रीस्वामी जी को घोड़ा से
गिरकर अवश्य ही गंभीर चोट लगेगी परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। घोड़ा थककर जब रूका तो लोगों ने देखा कि श्रीस्वामी जी उसके गर्दन के पास चिपके हुए हैं। घोड़ा से उतरकर श्रीस्वामी जी ने अपने गुरू बड़ेमहाराज परमहंस स्वामी के आशीर्वाद का स्मरण किया।
प्रेत का कल्याण
एक बार रात्रि में घोड़ा पर सवार होकर श्रीस्वामी जी नहर किनारे किसी गॉंव को जा रहे थे। वहॉं एकान्त में एक फूस की झोपड़ी दिखी। श्रीस्वामी जी के साथ पैदल चलने वाले विद्याथी का दल कुछ दूर पीछे छूट चुका था। फूस की झोपड़ी से एक महिला बीमार बच्चे को गोद में लेकर आई और श्रीस्वामी जी से उसके लिये दवा मांगने लगी। इन्होंने बच्चे को घोड़ा के समीप लाने को संत का इसी तरह से उपचार हुआ करता है। ऐसा देखा जाता था कि जब कभी भी बड़े महाराज परमहंस स्वामी जी को अपने शरीर पर वायुदोष उत्पन्न होने का आभास होता था तो वे ऊंचे स्वर में भजन गाते थे। इससे शरीर पर कुपित वायुदोष शांत हो जाता था।
आयुर्वेद
वर्षात के चार माह साधु संत एक ही स्थान पर टिक जाते हैं और इसे चातुमास करना कहा जाता है। श्रीस्वामी जी भी सरौती में चार माह रहकर आयुवेदिक रस रसायन चूर्णादि औषधियों का भी निर्माण कराते थे। इसके लिये आयुर्वेद की पुस्तके पहले से ही मंगा कर रखते थे। सहयोगियों को ककहरा की तरह आयुर्वेद के गूढ़ तत्वों को बताते थे। सरौती में 'रसराज सुन्दरम' 'निघन्टु रत्नाकर' 'पारद संहिता' 'सुश्रुत संहिता' 'चरक वाग्भट संहिता' 'वैद्यकशब्द निघन्टु' 'सम्पूर्ण मदनपाल निघन्टु' 'अष्टाकर रहस्य' 'धनवन्तरि भावप्रकाश' 'सम्पूर्ण भैषज्य रत्नावली' 'माधव निदान' 'शार्गंधर संहिता' 'चिकित्सा चन्द्रोदय' 'भैषज्य रत्नावली' आदि पुस्तकें से लोगों को पढ़ाते थे। वैद्यों को अथवा रोगियों को औषधियॉं निःशुल्क बांटी जाती थी। मिर्जापुर के च्यवन बाबू श्रीस्वामी जी की देखरेख में बारह वर्षों में 'मकरध्वज' नामकी एक दवा बनाये थे जो मरनासन्न व्यक्ति को भी कुछ देर के लिय पुनः होश में लाने में सामर्थ्य थी।
जिसका आयुर्वेद की पुस्तकों में उल्लेख नहीं था वैसी दवायें भी श्रीस्वामी जी अपनी मनीषा से बनवाते थे। आठ दस तरह के नमक के रस से सरौती में 'मदनविलास' नामकी एक ऐसी ही औषधि बनती थी जो विषम अपच में भी लाभ करती थी। बाहर भ्रमण के अन्तराल साथ के विद्यार्थियों को रास्ते में मिलने वाली जड़ी बूटी की पहचान कराते हुए उनके गुणदोष से अवगत कराते चलते थे।
   115 वर्ष की लम्बी अवधि वाले जीवन के अंतिम तीन वर्ष श्रीस्वामी जी ने हुलासगंज 'श्रीलक्ष्मी नारायण' मन्दिर में ही भगवान के लीला गुणों के स्मरण  करने में बिताये। श्रीस्वामी जी महाराज नम्माळवार के अंश से ही अवरित थे। जिस कमरे में हुलासगंज आश्रम में ये रहते थे उस कमरे के ठीक सामने दरवाजा पर एक बकुला वृक्ष विद्यमान था। यह वृक्ष आज भी है। हुलासगंज की अंतिम तीन वर्षों की अवधि में प्रायः ये ऑंखें बंद किये रहते थे। जब भगवदप्रसाद सामने आये तो ऑंखे खोल उसे ग्रहण

करते थे। अपने महाप्रयाण के तीन दिन पूर्व अपने भक्तों को 'श्रीमन्नारायण' का कीर्तन करने को कहा। द्वयमंत्र की अनुगुंज में स्वामी जी स्तोत्र रत्न के पद 21 गुनगुनाते रहे। अंततः 10 फरवरी सन् 1980 तदनुसार वि संवत् 2036 फाल्गुन कृष्ण नवमी रविवार अनुराधा नक्षत्र मकर के सूर्य की गोधूलि वेला में दिव्यपार्षदों के साथ भगवान स्वयं आकर श्रीस्वामी जी महाराज को वैकुण्ठ लोक ले गये।
साभार-- दिव्यचरितामृतम्