शनिवार, 4 फ़रवरी 2017

संस्कृत के आधुनिक गीतकारों की प्रतिनिधि रचनायें

 संस्कृत पुस्तकालय में पुस्तकों के साथ रहते हुए मेरा 19 वर्ष बीत चुका है। आज से कुछ वर्ष पूर्व आधुनिक संस्कृत साहित्य के वर्गीकरण के समय मेरी दृष्टि वार्णिक छन्दों में विपुल मात्रा में विरचित गीतिकाव्य की ओर आकृष्ट हुआ। गान शैली पर आश्रित इन पुस्तकों का एक अलग वर्गांक देते हुए अलग स्थान आरक्षित किया। काव्यशास्त्रकारों ने काव्य विवेचन में इस प्रकार की विधा का विवेचन नहीं किया है। गीतिकाव्यों में स्फुट पद्य, संदेश काव्य, प्रशस्ति,शास्त्रकाव्य, समस्या पूर्ति,अन्योक्ति,श्लेष काव्य, स्तोत्र काव्य तथा चित्रकाव्य लिखे गये। मैंने इस आलेख में वस्तुतः नवगीति का संकलन किया है,जो आधुनिक संस्कृत की नई विधा है। इसमें कुछ राग काव्य भी संकलित हैं। अनेक संगीतज्ञ संस्कृत विद्वानों ने राग काव्य के द्वारा संस्कृत भाषा को लोकप्रिय बनाने की दृष्टि से सरल गीतों की रचना की है। राजा विश्वनाथ कृत संगीत रघुनन्दन, रामवर्मा कुलशेखर कृत कुचेलोपाख्यान तथा अजामिलोपाख्यान,ओगेट्टी परीक्षित शर्मा कृत ललितगीती लहरी आदि राग काव्य प्राप्त होते हैं। राग काव्य एक अल्प ज्ञात कवि श्यामरामकवि की रचना भी प्रस्तुत है। भट्ट मथुरानाथ शास्त्री ने संस्कृत काव्य में नई प्रवृत्ति को जन्म दिया, जिसमें समाज के विभिन्न वर्गों या जनजीवन को गीतों का विषय बनाया गया है।
      मैं अपने इस आलेख में अनेक अल्पज्ञात तथा अति नवीन रचनाकारों के प्रतिनिधि संस्कृत नवगीति (संस्कृत गीत) के साथ-साथ संक्षिप्त जीवनी देने की कोशिश करुँगा। गीत चयन में गीतों की लोकोपयोगिता को ध्यान में रखना आवश्यक है। अतः कुछ अच्छी रचना रहते हुए भी उसे यहाँ सम्मिलित नहीं करने की विवशता भी है। इसी ब्लाग के अपने आलेख विद्वत्परिचयः 1,2,3 तथा 4 में जिन कवियों/ गीतकारों का परिचय दे चुका हूँ, पुनरावृत्ति दोष से बचने के लिए उनका केवल लिंक उपलब्ध करा दूँगा। आशा है, इसमें उन गीतकारों की मौन सहमति होगी।
    मेरे इस ब्लाग पर आपको जो भी लेख अच्छा और उपयोगी लगता हो, जरुर सूचित करते रहें।  ब्लाग पर प्रत्येक लेख का संशोधित और परिवर्धित संस्करण प्रकाशित होते हैं, अतः पाठकों को यहाँ बार बार आने की सलाह दी जाती है।

अभिराज राजेन्द्र मिश्र

इस ब्लाग के पृष्ठ    विद्वत्परिचयः 3    पर जीवनी दी गयी है।
साभार- वाग्वधूटी

वन्दे सदा स्वदेशम्!!
गङ्गा पुनाति भालं रेवा कटिप्रदेशम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!
काशीप्रयागमथुरावृन्दाटवीविशालाः
द्वारावतीसुकाञ्चीविदिशादितीर्थमालाः
सम्भूषयन्ति कामं यस्य प्रशान्तवेषम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!
सलिलं सुधामधुरितं पवनोऽपि गन्धवाही
चरितं विकल्पकलितं धर्मो दयावगाही
यत्प्राङ्गणं शबलितं कौतुहलैरशेषम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!

कजरी (रौति कोकिला!!)
रौति कोकिला मदालसा रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
क्षणं पल्लवे निलीय
मञ्जरीरसं निपीय
स्तौति सम्मुखं वसन्तकं रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
नन्दनन्दनं विहाय
कीर्तिनन्दिनी सुखाय
वेत्ति नेषदप्यनामयं रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
मन्दमन्दगर्जनेन
भूरिभूरि वर्षणेन
मेघमालिका महीयते रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
मृगी शाद्वलं चिनोति
शिखी नर्तनं करोति
केकिनी च दुर्मनायते रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
अश्रुपातमाचरन्ति
वत्सकान्न लालयन्ति
अन्तरेण हरिं धेनवो रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!


लेखक- ओम् प्रकाश ठाकुर


ओम्प्रकाश ठाकुर का जन्म 20 सितंबर 1934 को अलीपुर, पाकिस्तान में हुआ। पंजाब विश्वविद्यालय से 1946 ईस्वी में इन्होंने प्राज्ञ परीक्षा उत्तीर्ण की। तदनंतर दिल्ली विश्वविद्यालय से एम. ए. तथा दरभंगा विश्वविद्यालय से साहित्याचार्य की उपाधियां प्राप्ति की। 1977 ईस्वी में काशी की पंडित परिषद् ने इन्हें कविरत्न की उपाधि से अलंकृत किया। 1954 ईस्वी से आप दिल्ली प्रशासन के अंतर्गत शिक्षा विभाग में अध्यापन करते रहे। वहां से सेवा निवृत होकर दिल्ली के दौलतपुर ग्राम के एक विद्यालय में प्रधानाचार्य रहे। श्री ठाकुर ने अनेकों संस्कृत गीतियों का प्रणयन किया है। ठाकुर गीतावली में 40 गीतों का संकलन है। 1993 में देववाणी परिषद से प्रकाशित इंद्रधनु में विभिन्न विषयों पर बालों चित गीत प्राप्त होते हैं।


साभार- इन्द्रधनुः

1 भगवति वीणावादिनि! वन्दे
  शारदाभ्रनिर्मलपरिधाने !
    हंसासीने वीणापाणे!
      देवदनुजनरवन्दितचरणे!
        जय वरदायिनि विजयवितरणे!
          अनिशं तव वरिवस्याप्रवणा !
            भक्तास्ते विलसन्त्यानन्दे!

2 त्वां विद्यानां सकलकलानां
    परितो व्याततविमलविताना
      कति न जना भूमौ राजन्ते
        समुपार्जितविज्ञाननिधाना
          लसतु मनोमधुपोऽपि मदीयः
             रममाणः पदपद्मरन्दे

3 भुक्तिं यच्छसि दिशसि च मुक्तिं
    कथयसि विपदुन्मज्जनयुक्तिं
      ज्ञाननिधिस्तव जलधिगभीरः
         कस्तं तर्तुं शक्तो धीरः
           तव सम्पत्कणविचयशालिनः
                किं न रमन्ते भुवनालिन्दे

4 यच्च विलोक्यं भुवि कमनीयम्
    अगणितसुखसुविधारमणीयं
      तत्रमहिम्नां ते विस्तारः
        लभ्यो जातु न पारोऽवारः
           चकितखगोऽब्धावैति च पोते
              एमि पदाब्जे तव सुखकन्दे

5 वितर वितर मयि देवि कृपामयि!
    तव पदाब्जरतिमविचलभावां
       तत्प्रसरत्सौरभ - परिपूर्ण
          प्राङ्गणमखिल विलसुत जगतां
              तन्मयतामुयातु समस्तं
                 वीणायास्ते क्वणितेऽमन्दे।

मूषक धाव

मार्जारः-
          मूषक! धाव मूषक! धाव
            त्वोमेषोऽहं गृहणामि
              क्षुधा बाधते मां तीव्रा
                त्वामत्तुम् अभिवांछामि।
मूषकः-
          सत्यमिदं कथितं भवता
            अस्माद्धेतोः धावामि
              वृक्षतलेऽहं बिलमध्ये
                विश्रमितुं क्षणमिच्छामि।
मार्जारः-
          मा विश मा विश बिलमध्ये
            परिहासादेतत् कथितम्
              मिथः प्रेमपूर्व लोके
                सर्वैः जीवैः वस्तव्यम्।
मूषकः-
          अद्य त्वं क्षुधितो भासि
            क्षुधितानां का मयार्दा ?
              विवरगतो हि विधास्येऽहम्

                अत्र चिन्तनं यदा कदा।

लेखक- केशव प्रसाद गुप्त

पिता- मसुरियादीन गुप्त
माता- श्रीमती बदामी देवी
जन्मतिथि- 02-03-1951
जन्मस्थान- ग्राम- उदाथू (गढवा) पत्रालय- गोहानी बडी
जनपद- कौशाम्बी
7 कृतियों में दो गीति काव्य कनीनिका,कल्लोलिनी प्रकाशित। एक प्रकाशनाधीन है। कल्लोलिनी का एक गीत संस्कृते वहति संस्कृतिधारा को मैंने आकाशवाणी लखनऊ के पूर्व ध्वनि मुद्रक से कम्पोज कराकर पुरस्कार वितरण समारोह में प्रस्तुति करा चुका हूँ। उसका विडियो यू ट्यूव पर उपलब्ध है।   कल्लोलिनी में  81 कुल मुक्त गीतियों का संकलन किया गया है। इसकी भाषा अत्यन्त सरल एवं हृदयग्राही है। इसमें देवी देवताओं की स्तुति, राष्ट्रीय भावना, वर्तमान सामाजिक परिवेश, मानवीय संवेदनाओं को गीतों में आवद्ध कर प्रस्तुत किया गया है।

पुस्तक नाम- कनीनिका

श्रावणमासे

श्रावणमासे कृष्णारात्रिः, दिशि दिशि विकरति रागं रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!
          प्रियं विना मे सदनं शून्यम्।
          तेन विना को हरति नु दैन्यम्??
दामिनि! विहरसि सदा घनाङ्के, नौमि सुतनु! ते भाग्यं रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!
          रिमझिम-रिमझिम मेघो वर्षति।
          तप्तं गात्रं सोऽपि न शमयति।।
स्वप्ने नयति सुदीर्घा रजनी, व्योमं विना विमानं रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!
          अहर्निशं मे हृदयं वेलति।
          अन्तर्ज्वाला स्वैरं खेलति।।
याहि सुनयने! प्रियतमदेशं, बोधय विगतविमोहं रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!
          पिव-पिव कुंजे रटति चातकः।
          श्रुत्वा तमापि न सरति वंचकः।।
चपले! सफलङ्कुरु मे नयनं, कुशलं प्रेषय कान्तं रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!
          निधाय हृदये कामिनिवार्ताम्।
          दृष्ट्वा नवाञ्च मन्मथयात्राम्।।
उपनय रागिणि! मे संन्देशं, पूरय विरहिणिकाङ्क्षा रे!
पूर्वा प्रवहति मन्दं मन्दं, हृदि हृदि जनयति कामं रे!!

            कल्लोलिनी
संस्कृते वहति संस्कृतिधारा, प्रियतम रहसि विचारय रे ।
मदयति मनः संस्कृतगीतं, मधुरं मधुरं श्रावय रे ।।
भाति भारती भारतदेशे
रटन्ति वटवो नवपरिवेशे।।

लेखिका- डॉ. नवलता

इस ब्लाग के पृष्ठ  विद्वत्परिचयः 2 पर जीवनी दी गयी है।

श्रावणमासे यमुनातीरे
खेलति राधा कुञ्जवने।

इह कदम्बशाखासु लम्बते
शुचिदोलासन्दानम् ।
तत्र राजते मुग्धा राधा शुभसुवर्णपटले ।।

गौरतनौ शोभते सुरुचिरं
हरितपीतपरिधानम्
क्वणति नूपुरं रुनझुन-रुनझुन दोलासंचलने।।

दोलापटले राधामभितः
राजन्ते प्रियसख्यः
सर्सर्सर् धूयते दुकूलं प्राचीदिक्पवने।।

दोलायते नन्दगापालो
मुदा नोदते दोलाम्
क्वचिदायाति च नीचैर्दोला पुनर्याति गगने।।

श्यामघटाच्छादिताश्चाम्बरे
नृत्यति वने मयूरः
गोकुलग्रामे भरितोनव उल्लासो जने जने।। 



हन्त मेऽन्तस्थव्रणानां का कथा।
प्रतिपलं संजायते नव्या व्यथा।
         
प्रतिपदं पाषाणसंवृत्ता सृतिः,
जीवनस्योच्चावचे स्खलिता गतिः,
दूरतोऽपि न दृश्यते हि पदक्रमः,
              गम्यतां न ज्ञायते कीदृक्पथा।।1।।

उत्तङ्गावर्तघातैराहतम्,
सर्वतोऽन्तर्बाह्यमामूलं क्षतम्,
जलधिमग्नं यानवन्मे मानसं
              गतप्रत्याशं हतं हा सर्वथा।।2।।

पाय्यते सर्वैः भुङ्जगेभ्यः पयः,
भूतले वृद्धिं गतो वै दुर्णयः,
भीषणासूत्तालसागरवीचिषु,
            सम्प्रवातानां यथा महती प्रथा।।3।।

निर्मनुष्यप्रान्त एको नीरवः,
दहन्तीवैतेऽप्यनुष्णा वायवः,
गण्डके भूयः प्रवृत्ताः पिण्डकाः,
             औषधालेपः कथं क्रियते वृथा।।4।।

ध्वान्तनभसीवाकृतीनां सङ्करः,
नैव जाने कः स्वकीयः कः परः,
साम्प्रतं सुमनश्चयः शूलायते,
            दंशदक्षानां पुनर्भोः का कथा।।5।।

शीतलो गरलायते मलयानिलः,
सकलजलराशिर्यथा पङ्काविलः,
स्वातिरप्यनृतायते रे चातक!
         क्वचिदपि प्राणाभिलाषं मा कृथा।।6।।

राजते रङ्गमयी होली।
शोभते रङ्गमयी होली।।

व्रजवीथीषु गोपिकाबालाः
करधृतधारायन्त्रगुलालाः।
अञ्जितरागा कृष्णराधिकासङ्गमयी होली।।

परिरम्भते पादपो लतिकाम्।
गायन्तीह सहृदयाः रसिकाम्।
मदनयशः प्रतनोति शिवप्रियसङ्गमयी होली।।

चुम्बति कलिं रसज्ञो भृङ्गः।
कण्डूयते प्रियां मातङ्गः।
गृहोद्यानविपिनेषु राजतेऽनङ्गमयी होली।।

हासविलासविनोदितचित्ता-
ननुरञ्जयति वसन्ते मत्तान्।
ढक्काढोलवेणुमञ्जीरमृदङ्गमयी होली।।

युगपदेव वासन्तीं सुषमाम्
पत्रक्षरावस्थितिं विषमाम्
दिशत्यहो लोकाय द्विपथोत्सङ्गमयी होली।।

अपनोद्यतां समेषां तोदः।
हृदि-हृदि लसतु केशरामोदः।

लोके भूयो भातु प्रेमतरङ्गमयी होली।।


लेखक- श्यामरामकवि

श्यामराम कवि की जीवनी अध्यावधि अप्राप्त है। कैटलॉगर्स कैटलॉग्रम में भी इनके बारे में अथवा गीतपीतवसनम् के बारे में कोई सूचना प्राप्त नहीं होती है। इन्होंने अपने ग्रंथ में जयदेव विरचित गीतगोविंद का अनुसरण किया है। इसके आधार पर माना जा सकता है कि इनकी स्थिति जयदेव के बाद रही है। गीतपीतवसनम् में कुल 10 सर्ग हैं। श्रीकृष्ण को आराध्य मानकर अनेक रागों में गीत लिखे गए हैं। इस पुस्तक का प्रकाशन प्रभात शास्त्री के संपादन में 1974 में हुआ है। ग्रंथ के अंतिम में इन्होंने अपने बारे में सिर्फ इतनी सूचना ही दी है-
                       माता यस्य धराधरेन्द्रतनयातुल्याऽन्नपूर्णा कृती
                                     तातो यस्य महायशो दशरथो निष्ठावशिष्ठाऽधिकः।
                       राधामाधवकेलिकौशलकथां कान्तां कवीनां मुदे
                                     काव्यं भव्यमिदं तकार स नवं श्रीश्यामरामः कविः।।


पुस्तक- गीतपीतवसनम्


सखि हे विरचितरासविलासम्।
स्मरति मधुरमुरलीधरमिह हि
मनो मम सुललितहासम्
           ध्रुवपदम्
तरुणतमालविमलनवदलसकमलनवजलधरनीलम्।
मदनवशीकृतनवयुवतीजनकृतमुखचुम्बनलीलम्।।1।।
चटुलपटीरतिलकमभिनवपरिकलितवलिततडिदम्बुदमालम्।
पीतवसनरुचिविजितरुचिरविरुचिततडिदम्बुदमालम्।।
वलितविलोलविलसदङ्गुलिदलश्रुतिसुखरितवेणुम्।
मनुजदनुजमुनिविबुधगणस्पृहणीयचरणगतरेणुम्।।
अमलकमलदलविमलनयनयुगलं सभसेन सलीलम्।
चकितचमूरुरुचिरनयनारदनच्छदखण्डनशीलम्।।
बलहमहारजनैररुणानि युवतिवसनानि हरन्तम्।
तरुणतपनतनयातटभुवि सह हरिणदृशा विहरन्तम्।।

लेखक- श्री भि. वेलणकर


श्री भि. वेलणकर का जन्म सारन्द ग्राम, जिला- रत्नागिरी, महाराष्ट्र में 1915 ईस्वी में हुआ। इनकी शिक्षा मुंबई के विल्सन कॉलेज में हुई। 1947 ईस्वी में एम.ए में सर्वप्रथम स्थान तथा स्वर्ण पदक आपने प्राप्त किया। मध्य प्रदेश के डाक तार विभाग में उच्च पद पर कार्य कर सेवानिवृत्ति के पश्चात् मुंबई में आपने निवास किया। यहीं से गीर्वाणसुधा संस्कृत मासिक का संपादन करते रहे। आज भी यह पत्रिका निरन्तर प्रकाशित हो रही है। आपने संस्कृत में गीति या राग काव्य, मुक्तक, खंडकाव्य, लहरी, नाट्य, गीतिनाट्य, गद्य की विविध विधाओं में विपुल मात्रा में रचनाएं की हैं। अपने अनेकों बार नाटकों का अभिनय भी करवाया है।

गीतिकाव्य के क्षेत्र में आपने अधोलिखित ग्रंथों की रचना की है-

जीवनसागरः, जयमंगला, जवाहरचिंतनम्, जवाहरजीवनम्, बालगीतम्, प्रीतिपथे स्वैरविहारः, नैमित्तिकम्, निसर्गगीतम्, विरहलहरी, स्वच्छंदम् तथा संस्कृतनाट्यगीतम्।

आपको संगीत का अच्छा ज्ञान था अतः अपनी गीतियों की स्वरलिपि आपने स्वयं तैयार की तथा उसका गायन भी करवाते रहे। विरह लहरी में इस प्रकार के 25 से अधिक गीत हैं। यह गीत पंडित जवाहरलाल नेहरु के मृत्यु के बाद 1964 ईस्वी में लिखे गए। इन सभी में नेहरू जी के चिंतन को गीतों में डालकर प्रस्तुत किया गया। आप की रचनाएं सूचना प्रधान या अनुवादात्मक अधिक हैं और उसमें रसाभाव देखने को मिलता है।


साभार- जवाहरचिन्तनम्

युवकान् प्रति
किं वचनैरिह ? कृतिः समर्था
केवलशब्दा गदिता व्यर्थाः
                युवकाः ! प्रवसत पृथिवीगोले
                पश्यत भुवनं संगतमूले
                भवतां नयने दक्षविलोले
                मधुरेयं गाथा
        न कोऽपि पूर्णो न वाऽपि मुक्तः
            सर्वः स्वार्थे प्रसादभक्तः
            जगतीरङ्गे यो हि विरक्तः
नेयं तस्य कथा
            स्वदेश एव श्रेष्ठा वसुधा
            मन्यन्तां सर्वे स्नेहान्धाः
            तत्वं जानन्त्येव ते बुधाः
अभिमानो हि वृथा
            भारतीयजनता प्रतीक्षते
            भव्यदिव्यतप उत्कर्षकृते
            कृतज्ञतायों सुकृति रमते
माकाङ्क्षा व्यर्था
            चमत्कृतिर्न च भूति साधनं
            तरुणैः कार्यं श्रमस्वेदनं
            कुरुते नित्यमनुग्रहदानं

तेन यशः श्रीः पथा


लेखक- शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी


डॉ. शिवदत्त शर्मा चतुर्वेदी का जन्म जयपुर राजस्थान के पानो का दरीबा में 16 अप्रैल 1934 को हुआ था इनके पिता का नाम महामहोपाध्याय पंडित गिरिधर शर्मा चतुर्वेदी था उन्होंने व्याकरण आचार्य तथा साहित्य आचार्य की उपाधि प्राप्त करने के उपरांत काशी हिंदू विश्वविद्यालय के संस्कृत संस्कृत विद्या धर्म विज्ञान संकाय में अपना योगदान दिया। इनके द्वारा लिखित व प्रकाशित कुल 7 कृतियां हैं तथा कुल 28 पुस्तकों का संपादन व दो पुस्तकों का अनुवाद किया। इस प्रकार इन्होंने अपने जीवन काल में विपुल साहित्य की रचना की।

शैवी
ननु जनतंत्रमिदम्
ननु जनतंत्रमिदम्
पारतंत्र्यमनुभूतं सम्प्रति सुस्वातन्त्रयमिदम्                         
ननु जनतन्त्रमिदम्।
        राजतन्त्रसंस्था सा काचिद्
        दूरे गता गता
        कुलक्रमाधारा सा निखिला
        समये न संमता।
बहुमतधाराप्रवाहपतितं
सज्जनतन्त्रमिदम्
ननु जनतन्त्रमिदम्
           सेवा समय-समीर स्वर-
          सौभाग्यसारसंतृप्तम्
          सेवा सुखसंसारोन्मीलन-
           सर्वसाम्यसंपुष्टम्।
सरलं गणितमिदम्

ननु जनतन्त्रमिदम्।


 लेखिका-मनोरमा

संस्कृत-गीतमालिका
सुप्रभातम्
उदयति सूर्यः
विकिरति किरणान्।
अरूणिमकालः आयातः।
विगलति तिमिरः, प्रसरति आभाः
परितः पतति सूर्यप्रकाशः।
गंधितपुष्पं सुगन्धिं नीत्वा
मन्दं वाति सुवातः।
उदयति सूर्यः
विकिरति किरणान्।
अरूणिमकालः आयातः।

मुदितविहंगाःसर्वे जाताः
क्षीणा भूता गता निराशा
मुदितं गगनं धराप्रसन्ना
शोभनकाल आयातः।
उदयति सूर्यः
विकिरति किरणान्।
अरूणिमकालः आयातः।
स्वागत-गानम्
स्वागतगानं भवतामद्य
स्निग्धवचोभिर्गायामः।
स्नेहाविष्टं भवदागमनं
स्नेहाविष्टा इयं सभा
अस्यां सुन्दरशुभवेलायां
स्वागतगानं गायामः।।
स्वागतगानं भवतामद्य
स्निग्धवचोभिर्गायामः।
धन्या वेला सुखदायाता
मुदिता सर्वा आशा जाता।
प्रभुणा महती कृपा दर्शिता
पुष्पाञ्जलैः अर्चयामः।।
स्वागतगानं भवतामद्य

स्निग्धवचोभिर्गायामः।

लेखक - सच्चिदानन्द काण्डपाल

पुस्तक - अलकनन्दा
यात्रा
प्रियतम! नास्ति पथाभिज्ञानम्।
सततगते रति तीव्र लालसा
स्मृत्वा चरणं विस्तृणोमि यत्
कण्टकपूर्ण-विषमपथि सहसा
सोढुं क्षणमिव रोधयामि तत्।
एवं तनुते गते वितानम्
प्रियतम! नास्ति पथाभिज्ञानम्।
घन तमसावृत मम्बरमस्ति
विषमसृतिः शक्तिर्मयि नास्ति
प्रबल प्रभज्जन पूर्ण पयोदो
वर्षति शिशर जलं संध्यास्ति।
ज्वलतितदपि ममान्तर्तज्ञानम्
प्रियतम! नास्ति पथाभिज्ञानम्।
मुहुश्चकासित चपला मे पथि
तिमिर ततिं किल पुनराभरते
मार्गो वृहदीषत् पाथेयं
स्मारं स्मारं विकली कुरूते।
पुनरपि दृष्यति ममाभिमानम्।
प्रियतम! नास्ति पथाभिज्ञानम्।
सततमगच्छमहमेकाकी
कोऽपि मया न कदाप्यनुदृष्टः
किच्चित्पद लक्षण मपहाय
सहचर एव न मार्गे दृष्टः।
धृत्वा यामि श्रुतमिवज्ञानम्
प्रियतम! नास्ति पथाभिज्ञानम्।

वासुदेव द्विवेदी शास्त्री

इस ब्लाग के पृष्ठ  विद्वत्परिचयः 3 पर जीवनी दी गयी है। आपने छोटे-छोटे बच्चों के लिए वर्णमाला गीतम्, भारतराष्ट्र गीतम्, बाल कवितावलिः सहित अनेक ग्रन्थों की रचना की।

              स्वागत-गीतम्
महामहनीय मेधाविन्, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।
गुरो गीर्वाणभाषायाः, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।।
दिनं नो धन्यतममेतत्, इयं मङ्गलमयी वेला।
वयं यद् बालका एते, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः॥
न काचिद् भावना भक्तिः, न काचित् साधना शक्तिः।
परं श्रद्धा-सुमाञ्जलिभिः, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।
किमधिकं ब्रूमहे श्रीमन् निवेदनमेतदेवैकम्।
न बाला विस्मृतिं नेयाः त्वदीयं स्वागतं कुर्मः॥

        सैन्य-गीतम्
सादरं समीयताम्,
वन्दना विधीयताम्,
श्रद्धया स्वमातृभू-समर्चना विधीयताम् ।। 1।।
आपदो भवन्तु वा, विद्युतो लसन्तु वा,
आयुधानि भूरिशोsपि मस्तके पतन्तु वा,
धीरता न हीयताम्, वीरता विधीयताम्,
निर्भयेन चेतसा पदं पुरो निधीयताम्।। ।। 2।। सादरं0
प्राणदायिनी इयम्, त्राणदायिनी इयम्।
शक्ति-मुक्ति-मुक्तिदा सुधाsनपायिनी इयम्,
एतदीय-वन्दने,
 सेवनेsभिनन्दने।।
साभिमानमात्मनो जीवनं प्रदीयताम्।। ।। 3।। सादरं0

काली प्रसाद शास्त्री

              होली-गीतम्
यमुना-पुलिने क्रीडति श्यामो होलायाम्।
इतो याति राधा सखिभिः सह
तत आयाति सबलरामो होलायाम्।। यमुना
सुन्दरकरधृतसाभ्रगुलालः
कुङ्कुमकेशररञ्जितभालः
युवतिजनैःसहितो गोपालः
जयति जयति राधे श्यामो होलायाम्। यमुना
पीतवसनधारी वनमाली
राधायाः शाटी हरताली
चलति द्वयोः तुल्या पिचकाली

वर्षत्यानन्द ग्रामो होलायाम्।।

अज्ञात

सखि! श्यामला जने जने मुदावहा
घनावली समागताऽधुना
पादपेषु पल्लवेषु कुञ्जवल्लरीवनेषु,
भूतलेsखिलेऽभिरामतां वितन्वती,
घनवाली समागताsधुना
सखि! श्यामला
मन्दमन्दमारुतेन कुञ्जकोकिलारुतेन,
शीतशीकरेण सर्वलोक-हर्षदा,
घनावली समागताsधुना
सखि! श्यामला
मत्तबर्हिणो वनेषु मत्तपक्षिणो द्रुमेषु,
मुग्धबालकाः प्रफुल्लिता गृहे गृहे,
घनावली समागताsधुना
सखि! श्यामला
नो तमो भुवं जहाति नो दिनं दिनं विभाति,
भानुभानवो दिवङ्गता पलायिता,
घनावली समागताsधुना
सखि! श्यामला जने जने मुदावहा,
घनावली समागताऽधुना।
प्रो. हरिदत्त शर्मा
प्रोफेसर हरिदत्त शर्मा का जन्म हाथरस, उत्तर प्रदेश में 27 सितंबर 1948 ईसवीं को हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित लहरी शंकर शर्मा था। M.A, आचार्य, डी. फिल., डिप्लोमा जर्मन तथा रसन की उपाधि लेकर आपने संस्कृत विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अपनी सेवाएं दी। आपने अनेक देशों का शैक्षिणिक भ्रमण किया तथा शिल्पाकार्न  यूनीवर्सिटी, बैंकाक,थाईलैंड में अभ्यागत आचार्य रहे हैं।  आप उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,लखनऊ तथा दिल्ली संस्कृत अकादमी तथा राष्ट्रपति सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार आदि से पुरस्कृत हो चुके हैं। अबतक आपके 32 से अधिक शोध पत्र,10 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। आपने आधुनिक संस्कृत काव्य सर्जना के क्षेत्र में ख्याति अर्जित की है. आपने चार गीतिकाव्य उत्कलिका, गीतकंदलिका तथा लसल्लतिका तथा बालगीताली की रचना की। बालगीताली में बाल गीतों का संकलन है।  

साभार- बालगीताली (बाल गीतों का संकलन )

रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका !
आयातः पुत्तलिकाजीवी
खेलं दर्शयते                    ।          
ग्राम-बालिका बाल-समूहः।
तां दिशं श्रयते     ।।
यत्र दर्श्यते पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
तां नर्तयति हि सूत्रधारकः
उच्चैरासीनः                     ।
मुखात् कलध्वानं करोति सः
संगीते लीनः                   ।।
मधुरं गायति पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
वदति किमपि सा भावैर्भरिता
यथा निपुणवनिता           ।
रोदिति हसति च क्रुध्यति बहुलम्
आशा संवलिता   ।।
भावं व्यनक्ति पुत्तलिका।
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
सा पतिगृहं कदाचिद् याति च
पतिप्रेमरक्त्ता                  ।
रुष्टा पुनरायाति निजगृहं
प्रणयमानसक्त्ता  ।।
मानं जहाति पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
अस्ति तया सह पुरुषपुत्तलः
घनश्मश्रुधारी                 ।
तौ सहैव चाभिनयं कुरुतः
नरश्चापि नारी    ।।
निपुणं नटति हि पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
जन्म विवाहोत्सवमारचयति
बहुकर्मसु लग्ना    ।
गृहयुद्धं कुरुते पत्या सह
वाक्कलहे मग्ना     ।।
भृशं विवदते पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
काष्ठ-पत्र-वस्त्रादि-निर्मिता
अस्ति सजीवेव    ।
आकृतिरस्या अतिमनोहरा
रूपाजीवेव                     ।।
निपुणं पश्यति पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
सदादृश्यते सुस्मितवदना
तूलिकया रचिता ।
विविध-वर्ण-संयोग-सुन्दरी
मणिभूषणखचिता           ।।
अधिकं चकास्ति पुत्तलिका
रुचिरं नृत्यति पुत्तलिका
सुचिरं नृत्यति पुत्तलिका