गुरुवार, 9 मार्च 2017

किसलिए संस्कृत सीखना चाहिए?

मैं अपने इस लेख में संस्कृत के उस पक्ष की चर्चा करने जा रहा हूँ, जिसकी चर्चा समाज में  प्रायः वर्जित माना जाता है। वह है कामकला। अनादिकाल से स्त्रीपुरुष परस्पर आसक्त रहे हैं। अतएव दर्शन, साहित्य,पुराण आदि की तरह ही संस्कृत में कामकला से सम्बन्धित ढ़ेर सारी पुस्तकें लिखी गयी। वह भी क्यों भी नहीं कौटिल्य के अनुसार स्त्रीणाममैथुनं जरा अर्थात् मैथुन नहीं करने वाली स्त्री जल्दी ही बूढ़ी हो जाती है। काम की संतुष्टि मानसिक स्वास्थ्य का उत्तम प्रयोग है। चरक के अनुसार 16 वर्ष के पहले तथा 70 वर्ष के बाद व्यक्ति को मैथुन नहीं करना चाहिए। मजाक के रूप में कहूँ तो 10वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक आज की तरह मनोरंजन के लिए सिनेमा, टेलीविजन नहीं था। राजाओं के आमोद-प्रमोद के साधनों में आखेट एवं स्त्री से सम्भोग मुख्य थे। किसी स्त्री के साथ कैसे सम्भोग करें? सम्भोग करने की क्षमता कैसे बढ़ायें? स्त्रियों का श्रेणीकरण, मैथुन के पश्चात् आहार विहार आदि के लिए चिकित्सक और रतिशास्त्र विशेषज्ञ उनके लिए नित नये खोज में जुटे रहते थे। वह सारा अतिविस्तृत ज्ञान संस्कृत भाषा में उपलब्ध है। इन पुस्तकों में दिये गये उपायों का अपनाकर आप चरमसुख पा सकते हैं।  इसे जानने समझने के लिए आपको संस्कृत आना चाहिए। अन्यथा दीवालों पर लिखे इस्तहार के भ्रमजाल में फंसे रहेंगें। यह लेख युवाओं, युवतियों तथा नवविवाहित जोड़ों के लिए हैं। इस मार्गदर्शक लेख को पढें। यह प्रामाणित लेख है। लेख में जिन पुस्तकों का नाम दिया गया है, उसकी मूलप्रति खरीदें। देख लें कि उसमें संस्कृत है या नहीं। कामशास्त्र से सम्बन्धित संस्कृत में लिखी मूल पुस्तकों को पढ़ने के लिए आज से ही संस्कृत का प्रारम्भिक अध्ययन शुरु करें। केवल अनुवाद पढ़ने के अधिक लाभ नहीं मिलने वाला,क्योंकि आपको नहीं पता कि कि कौन सा अनुवाद प्रामाणिक है। संस्कृत के विना आपके लिए मेरा यह कामशास्त्र तथा वाजीकरण (घोड़े के समान अति वेगवान होकर स्त्री से सम्भोग कर उसे तृप्त करना) सम्बन्धित लेख मनोरंजक हो सकता है,ज्ञानप्रद नहीं। कई बार सामान्य सामाजिक धारणा के अनुसार संस्कृत भाषा को पूजा पाठ और ज्योतिष से ही जोड़कर देखा जाता है। जो भक्तिमार्गी हैं जो संस्कृत को अध्यात्म,  नैतिकता की भाषा मानते हैं, उन्हें इस लेख को पढकर निराशा होगी।
 इस लेख में मैं कतई यह नहीं कहूँगा कि संस्कृत आत्मसंयम सिखाने की भाषा है,वल्कि इसके विपरीत कि भौतिक विलास, मनोरंजन का चरमोत्कर्ष यदि पाना चाहते हैं तो संस्कृत भाषा सीखिये। यहाँ तो सुरापान (शराब पीना) से होने वाले लाभ को बताने वाला पुस्तक भी मिल जाएगा। ऐसी ही पुस्तक है-कादम्बरीस्वीकरण सूत्रम् । इस पुस्तक में  सुरापान करके मैथुन करने की विधि बतायी गयी है। आज तक संस्कृत भाषा को छोड़कर अन्य किसी भाषा का लेखक ने आपके लिए कामकला का प्रायोगिक सटीक वर्णन नहीं किया। सभी पुस्तकों का मूल आधार यही पुस्तकें हैं। उनके पास अधकचरा ज्ञान है,क्योंकि वे संस्कृत नहीं जानते। आपको केवल वात्स्यायन लिखित कामसूत्र के बारे में थोड़ी सी जानकारी ही पाते हैं। संस्कृत लेखकों की तरह और लोग अबतक धोखेबाज और चालबाज दोस्त को पहचानने का नुक्शा नहीं दिया। समस्या को विश्लेषण करने की क्षमता बढाने का उपाय नहीं सुझा पाया।
     हमें इस दुनियाँ में सुख चैन के साथ जीने की अभिलाषा है। ईश्वर प्रदत्त इन्द्रिय सुख भोगने की अभिलाषा है।यह शाश्वत है। हजारों वर्षों में मानव शरीर की बनावट नहीं बदली है। रति सुख की धारणा नहीं बदली।संस्कृत उसके लिए भी साहित्य उपलब्ध कराता है। हाँ, इस लेख को पढने के बाद फुटपाथ पर विकने वाला सस्ता साहित्य मत पढना। मैं विना सिर पैर वाला सस्ता ज्ञान नहीं देता। 
  कामशास्त्र की पुस्तकों में मुख्यतः 5 विषयों का वर्णन मिलता है। 1-स्त्री / पुरुष के अंगों से परिचय 2- स्त्री / पुरुष वशीकरण 3- रतिक्रीडा तथा उसके प्रकार 4- रतिज रोग और उसकी चिकित्सा 5- सौन्दर्यवर्धक औषधि।  अन्य भाषा की पुस्तक में परस्पर सम्बन्धित ये 5 विषय नहीं मिलते अतः वहाँ का ज्ञान अधूरा है।  
विषय विस्तार की दृष्टि से देखें तो कामशास्त्र की पुस्तकों में मुख्यतः 1- नायिका से प्रेम सम्बन्ध बढ़ाने (लड़की पटाने) का उपाय 2- स्त्री पुरूष के बीच सम्भोग कला का वर्णन जैसे- स्त्रियों को कामोन्मत्त कैसे बनाया जाय? चुम्बन, आलिंगन,ओठ चूसने, कुच मर्दन आदि की विधि। कुल मिलाकर (सम्भोग के छोड़कर) बाह्यरत को 11 भागों में बांटा गया है। 3-  नायिका (स्त्री) के प्रकार, परीक्षण, ऐसी निषिद्ध कन्या जिसके साथ सम्भोग नहीं करना चाहिए। नायिका के लिंगों की नाप जोख (लम्बाई गहराई) उसके अनुसार सम्भोग आदि 4-बाला, तरुणी,पौढा आदि को कैसे खुश करें ,उतका स्वभाव 5- वाजीकरण औषधियाँ, 6- स्त्री वशीकरण, सौन्दर्यवर्धक उवटन निर्माण एवं प्रयोग विधि 7- ऐसी स्त्री जिससे सम्भोग नहीं करना चाहिए। दूसरे पुरूष में आसक्त स्त्री, शीघ्र वश में आने वाली स्त्री आदि 8- आलिंगन, चुम्बन, नख दांत से क्षत करना, केश पकड़ कर चुम्बन लेने के प्रकार विधि आदि 9- मैथुन या संभोग करने के आसन। 

कामशास्त्र के ग्रन्थ                                ग्रन्थकार
कामसूत्र                                   वात्स्यायन
कादम्बरीस्वीकरण सूत्रम्          पुरुरव
अनंगरंग                                  कल्याणमल्ल
रतिरहस्य                                तेजोक के पुत्र
रसचन्द्रिका                             विश्वेश्वर
कामतन्त्र ग्रन्थ                        श्रीनाथ भट्ट
पौरुरव मनसिज सूत्र मंजरी       परुरवस्
स्मरदीपिका                            इम्मदी प्रौढ़ देवराय
इसमें भिन्न- भिन्न अंगों प्रत्यंगों में भिन्न - भिन्न पक्षों की तिथियों में मैथुन से सम्बन्धित क्रिया कलाप का वर्णन किया गया है।
स्मरदीपिका मंजरी                 मीननाथ
कादम्बरस्वीकरण कारिका        भरत
रतिमंजरी                                जयदेव
रतिकल्लोलिनी                       दीक्षित सामराज
कामकुंजलता                      ढुंढिराज शास्त्री के सम्पादन में कुल 12 पुस्तकों का संकलन
इन पुस्तकों का संक्षिप्त परिचय तथा वर्ण्यविषय क्रमशः प्रस्तुत करूँगा। तबतक में अनंगरंग के इन श्लोकों आनन्द लें।
स्निग्धा घनाः कुंचितनीलवर्णाः
           केशाः प्रशस्ताः तरुणीजनानाम्।
प्रेमप्रवृद्ध्यै विधिनैव मन्दं
           ग्राह्या जनैः चुम्बन-दानकाले।।
चुम्बन के समय विधि पूर्वक तरुणी के केश पर हाथ फेरने से प्रेम में वृद्धि होती है।

मुखे मुखं बाहुयोगे स्वबाहुं
             जंघाद्वये जंघयुगं निविश्य।
गच्छेत् पतिश्चेदिति कौर्मकं स्यात्
             उर्ध्वोरुयुग्मं परिवर्तिताख्यम्।
स्त्री के मुख में अपन मुख बाहु में बाहु, जंघाओं में जंघा लपेटकर रमण करें। यह कूर्मासन है। दोनों जंघाओं को ऊपर करके सम्भोग किया जाय तो यह परिवर्तितासन होगा।