गुरुवार, 15 जून 2017

संस्कृत काव्यशास्त्रकारों की सूची एवं परिचय

    काव्यशास्त्र एक प्राचीन शास्त्र है।, जिसे काव्यालंकार, अलंकारशास्त्र, साहित्यशास्त्र और क्रियाकल्प के नाम से अभिहित किया जाता है। वैदिक ऋचाओं में काव्यशास्त्र के उत्स दिखाई पड़ते हैं। काव्यशास्त्र का क्रमबद्ध सुसंगठित और सर्वांगपूर्ण समारंभ भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से होता है। भरतमुनि ने समस्त काव्य घटकों को अपने शास्त्र में स्थान दिया और उसकी विवेचना में नाट्य दृष्टि प्रधान हो गई। यही कारण था कि नाट्यशास्त्रीय परंपरा से अलग काव्यशास्त्रीय चिंतन का सूत्रपात हुआ।। उसके अनंतर भामह, दंडी, वामन, आनंदवर्धन, कुंतक जैसे मनीषी आचार्यों की श्रृंखला अपने विचारों से क्रमशः काव्यशास्त्रीय सिद्धांतों को परिपुष्ट करते रहे। व्यक्तिगत काव्य चिंतन और मौलिक काव्यदृष्टियों के कारण परवर्ती काल में अनेक काव्यशास्त्रीय संप्रदायों का उद्भव हुआ।। भरत से भामह तक जो काव्यशास्त्र अपनी शैशवावस्था में था, भामह से आनंदवर्धन तक आते-आते तरुणाई को प्राप्त हुआ।। 600 विक्रम संवत् (भामह) से 800 विक्रम संवत् आनंदवर्धन का काल साहित्यशास्त्रीय संपन्नता का काल माना जाता है। इन 200 वर्षों में ही विभिन्न संप्रदायों के मौलिक ग्रंथों का निर्माण हुआ। अलंकार, रीति, रस, ध्वनि इन चार संप्रदायों का उद्भव इन्हीं 200 वर्षों में हुआ। विवेचन की सुविधा को दृष्टि में रखते हुए तथा ध्वनि सिद्धांत को केंद्र में रखकर काव्यशास्त्रीय परंपरा को तीन भागों में बांटा जा सकता है।
1. पूर्व ध्वनि काल अज्ञात से आनंदवर्धन तक 800 विक्रम संवत् ध्वनि काल  2. आनंदवर्धन से मम्मट तक 800 से 1050 विक्रम संवत् तक उत्तर ध्वनि काल 3. मम्मट से जगन्नाथ तक 1050 से 1750 विक्रम तक पूर्व ध्वनि काल।
अग्नि पुराण को सम्मिलित करते हुए यह काल भरत मुनि के नाट्यशास्त्र से आरंभ होता है और इस काल के अंतिम आचार्य रुद्रट थे तथापि पूर्व ध्वनि काल के साहित्यकार में अलंकार संप्रदाय का प्रभुत्व था इस काल के गणमान्य आचार्यों में भामह, दंडी, उद्भट, वामन, रुद्रट की दृष्टि काव्य के बहिरंग विवेचन में लगी रही। इसीलिए रस अथवा ध्वनि को यह आचार्य विवेचित नहीं कर सके। भामह, दंडी उद्भट, रुद्रट ने काव्य में अलंकार की प्रधानता को स्वीकार किया तथा रस को भी अगर सवादलंकार के रूप में समाहित किया। दंडी ने तो काव्य की शोभाधायक समस्त धर्म अलंकार शब्द से वाच्य है कहकर अपना अंतिम निष्कर्ष दे दिया। आचार्य वामन ने सीमित क्षेत्रों में रहते हुए भी अपनी मौलिकता का परिचय दिया और अलंकार को स्वीकार किया। उन्होंने काव्य में अलंकार को ग्रहण किया लेकिन स्पष्टतः सौन्दर्य काव्य का अलंकार सौन्दर्य को माना। सौन्दर्य का सृजन गुण करते हैं। उपमादि अलंकार उसकी शोभा में वृद्धि करते हैं। काव्यात्मा की चर्चा के प्रसंग में उन्होंने इसी सत्य का उद्घाटन किया। वामन के अनुसार काव्य की आत्मा रीति है। रीति विशिष्ट पद संघटना है। अतः वामन ने भामह, दंडी, रुद्रट की अपेक्षा अलंकार को एक व्यापक भूमि प्रदान की। भामह और वामन के ने दो संप्रदायों के प्रवर्तक दृष्टि को जन्म दिया। भामह की प्रतिष्ठा अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक के रूप में हुई और वामन रीति संप्रदाय के जन्मदाता माने जाते हैं। अलंकार संप्रदाय की अपेक्षा रीति संप्रदाय को अधिक अंतर्मुखी माना जाता है। वामन उस अंतरतम को नहीं प्राप्त कर सके, जिसे आनंदवर्धन ने प्राप्त किया, क्योंकि वामन ने गुण को ही प्रधानता देकर विराम ले लिया। वस्तुतः वामन ने गुणों को आश्रय की दृष्टि से विचार नहीं किया, इसीलिए वह अपनी ध्वन्यात्मक अनुभूति को अभिव्यक्ति नहीं दे सके। रस को साहित्य की आत्मा घोषित करने वाले आनंदवर्धन के लिए वामन ने ही इस प्रकार की पृष्ठभूमि का निर्माण किया।

    इस लेख में यहाँ कुछ ही काव्यशास्त्रकारों की जीवनी एवं उनकी रचनायें उपलब्ध करायी गयी है। शेष काव्यशास्त्रकारों के नाम पर क्लिक करने पर एक नयी कड़ी खुलेगी। आप वहाँ जाकर उनके बारे में विस्तृत जानकारी पा सकेंगें।
1. आचार्य भरत  2. मेधाविन्  3. धर्मकीर्ति  4. भट्टि  5. भामह  6. दण्डि 7. वामन  8. रुद्रट   9. रुद्रभट्ट  10. आनन्दवर्धन 11. उद्भट 12.महिमभट्ट 13. मुकुलभट्ट  14. भट्टतौत 15. क्षेमेन्द्र  16. कुन्तक  17. भट्ट नायक 18. शारदातनय 19. शिंगभूपाल 20. विद्याधर  21. विद्यानाथ  22.राजशेखर 23. राजानक रुय्यक  24. ममम्ट  25. अप्पय दीक्षित 26. कर्णपूर   27. धनञ्जय    28. जयदेव  29. देवेश्वर  30. हेमचन्द्र   31. अमरचन्द्र  32. केशव मिश्र  33. सागर नन्दी  34. वाग्भट्ट प्रथम  35. वाग्भट्ट द्वितीय   36. भानुदत्त मिश्र   37. रूपगोस्वामी  38.रामचन्द्र गुणचन्द्र  39. विश्वना 40. अभिनवगुप्त  41. भोजराज   42. आशाधर भट्ट  43. नागेश भट्ट   44. जगन्नाथ  45. विश्वेश्वर पाण्डेय
आचार्य भरत
संस्कृत काव्यशास्त्र के प्राचीन आचार्य में आचार्य भरत का नाम अत्यंत आदर के साथ लिया जाता है। इनके द्वारा लिखित एक मात्र काव्यशास्त्रीय ग्रंथ नाट्यशास्त्र प्राचीनतम उपलब्ध कृतियों में से एक है। यह कृति नाट्यशास्त्र विषय के साथ ही समस्त ललित कलाओं का विश्वकोश है। यह ग्रन्थ 36 अध्यायों में विभक्त है। इसमें कुल 5000 श्लोक है। काव्य के लक्षण ग्रंथों में पहला स्थान नाट्यशास्त्र को प्राप्त होता है। काव्यमीमांसा में राजशेखर ने भरत मुनि के साथ-साथ सहस्राक्ष सुवर्णनाभ, प्रचेतायन, पुलस्त्य, पराशर इत्यादि अनेक साहित्य के आचार्यों का नामोल्लेख किया है। भरत ने भी नाट्यशास्त्र में नंदीकेश्वर का उल्लेख किया है। किंतु इनमें से किसी भी आचार्य की कृति आज उपलब्ध नहीं है। अतः भरत विरचित नाट्यशास्त्र ही काव्यशास्त्र का सर्व प्राचीन तथा प्रमुख ग्रंथ है। आचार्य भरत को भारतीय आलोचकों के साथ-साथ पाश्चात्य आलोचकों ने भी मुक्त कंठ से प्रशंसा की। नाट्यशास्त्र का लक्ष्य नाटक की रचना तथा अभिनय है, फिर भी इसमें काव्यशास्त्र के समस्त अंगों का सर्वांगीण एवं सूक्ष्म विवेचन किया गया है। आचार्य भरत ने सर्वप्रथम यह प्रतिपादित किया कि काव्य का प्रमुख तत्व रस है और यह विभाव, अनुभाव और व्यभिचारी (संचारी) भावों से निष्पन्न होता है। बाद के आचार्यों ने नाट्यशास्त्र को आधार बनाकर काव्यशास्त्रीय ग्रंथों की रचना की।
 आचार्य भरत और उनका काल
नाट्यशास्त्र पर अब तक हुए पर्याप्त अनुसंधान के बाद भी इस ग्रंथ के रचना का समय ज्ञात नहीं हो सकता है, परंतु इतना ज्ञात है कि इसकी रचना भास और कालिदास के पहले हो चुकी थी, क्योंकि इन काव्यकारों की रचना में इस ग्रंथ की जानकारी उपलब्ध होती है। युधिष्ठिर मीमांसक ने भरत मुनि का समय 500 ईसवी पूर्व से 1000 ईसवी तक के बीच में माना है। हर प्रसाद शास्त्री ने भी भरतमुनि को 2000 ईसवी पूर्व स्वीकार किया है। डॉ. कीथ का मानना है कि वह 300 ईसवी के लगभग रहे होंगे। मैकडोनल 600 ईसवी मानते हैं। भारतीय परंपरा के अनुसार आचार्य भरत का समय वैदिक काल के बाद तथा पुराण काल के पहले माना जाता है। इससे यह सिद्ध होता है कि नाट्यशास्त्र की रचना कालिदास से पहले हो चुकी थी कालिदास का समय ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी है। इसलिए भरत को ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी या इसके पूर्व का माना जाना चाहिएय़
नाट्यशास्त्र में कुल 36 अध्याय हैं। दृश्यकाव्य इसका प्रधान विषय है फिर भी इसमें दृश्य तथा श्रव्य दोनों भेदों का वर्णन किया गया है।

नाट्यशास्त्र का विषयवस्तु
इसमें नाट्य की उत्पत्ति, नाटक के लक्षण, स्वरूप, नाट्य मंडप, उनके भेद, प्रेक्षागृहों की रचना, प्रेक्षा भवन, यवनिका, रंग देवता की पूजा, तांडव नृत्य की उत्पत्ति तथा इसके उपकरण, आठों रसों का विवेचन, पूर्वरंग, नांदी, प्रस्तावना, रस का स्थायी भाव, अनुभाव, विभाव तथा व्यभिचारी भाव, आंगिक, वाचिक, सात्विक तथा आहार्य, हस्त अभिनय, शरीराभिनय, अभिनय की गति, धनुर्विज्ञान का प्रदर्शन, व्यायाम, स्त्रियों द्वारा पुरुष तथा पुरुष द्वारा स्त्रियों का अभिनय, पांचाली, आवंती, दाक्षिणात्या और मागधी इन चार प्रवृतियों का विवेचन, छंदों के भेद, अलंकारों के स्वरूप तथा इसके भेद, भाषा का विधान, किस पात्र को संस्कृत में बोलना है और किस पात्र को प्राकृत में, सात स्वर, रूपक तथा उसके  10 भेद, नाटक की कथा वस्तु की रचना, प्रेमियों के प्रकार, स्त्रियों के वश में करने के पांच उपायों, चित्राभिनय, आरोही, अवरोही, स्थायी एवं संचारी भाव का वर्णन, वीणा की विधि, बांसुरी के स्वरों का विवरण, ताल और लय का भेद, गायक तथा वादक की योग्यता, संगीत के आचार्य तथा शिष्य की योग्यता, वाद्यों का विवेचन, मृदंग, प्रणव, दर्दुर तथा अवनद्ध वाद्य, (चमड़ा मढ़े हुए वाद्य) का वर्णन, अंतःपुर की सेविकाओं और राज सेविकाओं के गुण, सूत्रधार, पारिपार्श्विक, नट, पिट, चेट, नायिका आदि के गुण, विधि पात्रों की भूमिका,ऋषियों के नाम, उनके द्वारा किए गए प्रश्न, नट बंशों की उत्पत्ति का इतिहास और नाट्यशास्त्र का माहात्म्य का वर्णन किया गया है।
नाट्यशास्त्र की टीका

काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में नाट्यशास्त्र लोकप्रिय रचनाओं में से एक है। अतः इस पर अनेक टीकाएं लिखी गई, परंतु अभी केवल अभिनवगुप्त कृत अभिनव भारती एक टीका उपलब्ध होती है। इसका दूसरा नाम नाट्यवेदविवृत्ति भी है। अभिनवगुप्त की टीका में अनेक प्राचीन टीकाकारों के नाम और उनके मतों का उल्लेख प्राप्त होता है, परंतु वर्तमान में इनमें से कोई भी टीका उपलब्ध नहीं है। यहां पर उद्भट, भट्ट लोल्लट, शंकुक, भट्ट नायक, राहुल, भट्टमंत्र, कीर्तिधर, हर्षवार्तिक और मातृगुप्त के टीकाओं का वर्णन मिलता है। इनमें से कुछ वास्तविक नाम है तो कुछ काल्पनिक।


भामह
       आचार्य भरतमुनि के बाद भामह को काव्यशास्त्र के क्षेत्र में द्वितीय स्थान प्राप्त है। इन्होंने काव्यालंकार नामक अलंकारशास्त्रीय ग्रन्थ की रचना की। भरत यदि नाट्यशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं तो भामह भारतीय अलङ्कारशास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं। काव्यशास्त्र की उन्नत परम्परा का आरम्भ भामह से हुआ। परवर्ती काव्यशास्त्र के सभी आचार्यों ने काव्यालंकार को प्रमाण के रूप में उपस्थापित किया। इनके पूर्ववर्ती आचार्यों में मेधाविन् के नाम का निर्देश प्राप्त होता है, परन्तु अभी तक इनकी कोई भी कृति सम्मुख नहीं आ सकी है। भामह, नेमिसाधु तथा राजशेखर ने मेधाविष्ट का उल्लेख किया है। नवम शताब्दी ई. में कश्मीर के राजा जयादित्य की राजसभा के सभापति आचार्य उद्भट ने भामह के ग्रन्थ पर भामह विवरण नामक से टीका लिखी थी, जो अभी तक उपलब्ध नहीं हुआ है। यह इन्हें काश्मीर का निवासी सिद्ध करता है। उद्भट ने अलंकार पर काव्यालंकार सारसंग्रह  नामक एक स्वतंत्र ग्रन्थ की रचना की थी, जो अभी प्रकाशित है। प्रतिहारेन्दुराज ने इस ग्रन्थ पर लघुविवृत्ति नामक टीका लिखी थी इसमें भामहविवरण का उल्लेख प्राप्त होता है।  विशेषोक्तिलक्षणे च भामहविवरणे भट्टोद्भटेन --- निरूपितः। अभिनवगुप्त ने अनेक स्थलों पर भामह विवरण का उल्लेख किया है। काव्यालंकार के अंतिम श्लोक से ज्ञात होता है कि इनके पिता का नाम रक्रिल गोमिन् था।
            अवलोक्य मतानि सत्कवीनामवगम्य स्वधिया च काव्यलक्ष्म:।। 
            सुजनावगमाय भामहेन ग्रथितं रक्रिलगोमिसुनुनेदम्।।
भामह का काल दण्डी से पूर्व माना जाता है। इन्होंने अपने ग्रन्थ का आरम्भ सार्वसार्वज्ञ की स्तुति से करते हैं,जिससे  इन्हें बौद्ध मतावलम्बी माना जा सकता है ।

         संस्कृत के अन्य विद्वानों के काल की अनिश्चितता की तरह भामह का काल पर भी विद्वान् एक मत नहीं हैं। आचार्य भामह का समय छठी शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना जाता है, जिसके साक्ष्य में यह तर्क दिया जाता है कि उन्होंने अपने काव्यालंकार के पंचम परिच्छेद में न्याय निर्णय का वर्णन करते हुए दिङ्नाग के प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् इस प्रत्यक्ष लक्षण को उद्धृत किया है। दिङ्नाग का समय 500 ईसवी के आसपास माना जाता है। दिङ्नाग के बाद उनके व्याख्याकार धर्मकीर्ति का समय 620 ईसवी के लगभग माना जाता है। धर्मकीर्ति ने दिङ्नाग के प्रत्यक्षं कल्पनापोढम् लक्षण में अभ्रान्तम् पद जोड़ दिया गया है। किंतु भामह के ग्रंथ में दिए गए प्रत्यक्ष लक्षण में और अभ्रान्तम् पद नहीं है। इससे यह सिद्ध होता है कि भामह दिङ्नाग परवर्ती और धर्मकीर्ति के पूर्ववर्ती रहे होंगे। आनंदवर्धन ने भी भामह का समय बाणभट्ट के पूर्ववर्ती बताया है। बाणभट्ट का समय सातवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध है, इस दिशा में भामह का समय पांचवी छठी शताब्दी के मध्य में निर्धारित किया जा सकता है।
भामह कृत काव्यालंकार का विषय विवेचन
काव्यालंकार की प्रथम हस्तलिखित ग्रन्थ को प्रो. रंगाचार्य ने ढूढा। श्री के. पी. त्रिवेदी ने प्रतापरुद्रयशोभूषण के परिशिष्ट में इसे प्रकाशित किया। पुस्तक कुल छः परिच्छेद में विभाजित है। काव्य प्रयोजन, काव्यदोष, गुणत्रय ( माधुर्य, ओज और प्रसाद) का विवेचन, द्वितीय तथा तृतीय परिच्छेदों में अलंकार निरूपण, काव्यगत दोष निरूपण,  काव्य में ग्राह्य एवं त्याज्य शब्दों का निर्देश इसके वर्ण्य विषय हैं।
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                                                        जगदानन्द झा