रविवार, 17 दिसंबर 2017

व्याकरणशास्त्र परम्परा

नोट- मैंने फेसबुक पर प्रति शनिवार एवं रविवार को संस्कृतशास्त्रालोचनम् व्याख्यानमाला संचालित कराया है। व्याख्यानमाला का आरंभ व्याकरणशास्त्र परम्परा से हुआ,क्योंकि यह सभी शास्त्रों का मुख है। श्रोताओं के आग्रह पर यहाँ व्याख्यान के विषय को व्यवस्थित कर लिखा रहा हूँ।

व्याकरण शास्त्र के प्राचीन आचार्य-

व्याकरण शास्त्र का मूल आधार वेद है। वेद में व्याकरण के स्वरूप का वर्णन प्राप्त होता है।
          चत्वारि श्रृंगा त्रयो अस्य पादा द्वे शीर्षे सप्त हस्तासो अस्य ।
          त्रिधा बद्धो वृषभो रोरवीति महोदेवा मर्त्याम् आविवेश ।। (ऋग्वेद 4:58:3)
इस मंत्र में शब्द को वृषभ नाम से कहा गया है। इस वृषभ के स्वरूप का लर्णन किया गया है-  
नामआख्यातउपसर्गनिपात ये चार सींग,  भूतकालवर्तमानकालभविष्यकाल ये तीन पैर, सुप् (सुजस् आदि)तिङ् (तिप्तस्झि आदि) दो सींग (शीर्षे) प्रथमादि्वतीयातृतीयाचतुर्थीपंचमीषष्ठीसप्तमी ये सातों विभक्तियां इसके हाथ हैं, उरस्कण्ठःशिरस् इन तीन स्थानों से यह बंधा हुआ आबाज कर रहा है।
रामायण के किष्किन्धा कांड में राम हनुमान के बारे में लक्ष्मण से कहते हैं-  
              नूनं व्याकरणं कृत्स्नमनेन बहुधा श्रुतम्।
              बहु व्याहरतानेन न किंचिदपशब्दितम्। किष्किन्धा काण्ड, तृतीय सर्ग, श्लोक 29
निश्चित रुप से इसने सम्पूर्ण व्याकरण को भी सुना है,क्योंकि इसने बहुत बोला परन्तु कहीं भी व्याकरण की दृष्टि से एक भी अशुद्धि नहीं हुई।
महाभाष्य में पतञ्जलि ने भी व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख करते हुए कहा है कि प्राचीन काल में संस्कार के बाद ब्राह्मण व्याकरण पढ़ते थे।
         "पुराकल्प एतदासीत् , संस्कारोत्तरकालं ब्राह्मणा व्याकरणं स्मधीयते ।" (महाभाष्य---1.1.1)
प्रश्न यह उठता है कि जब यह व्याकरण इतना प्राचीन है तो इसे सर्वप्रथम किसको किसने पढ़ाया? इसका उत्तर ऋक्तन्त्र 1.4 में मिलता है। व्याकरण के सर्व प्रथम प्रवक्ता ब्रह्मा थे।  ब्रह्मा वृहस्पतये प्रोवाच, वृहस्पतिरिन्द्राय, इन्द्रो भरद्वाजाय, भारद्वाजो ऋषिभ्यः। महाभाष्य के पस्पशाह्निक में शब्दों के बारे में प्रतिपादन करते हुए पतञ्जलि ने पुनः व्याकरणशास्त्र परम्परा का उल्लेख किया- वृहस्पतिरिन्द्राय दिव्यं वर्षसहस्रं प्रतिपदोक्तानां शब्दपारायणं प्रोवाच नान्तं जगाम, वृहस्पतिश्च प्रवक्ता, इन्द्रचाध्येता दिव्यं वर्षसहस्रमध्ययनकालो न चान्तं जगाम इति । इस परम्परा में अनेक आचार्यों का उल्लेख हुआ है। यह लगभग 10 हजार वर्ष की परम्परा है।
भरद्वाज-
भरद्वाज अंगिरस वृहस्पति के पुत्र तथा इन्द्र के शिष्य थे। युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार ये विक्रम सं. से 9300 वर्ष पूर्व उत्पन्न हुए। भरद्वाज काशी के राजा दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे।
भागुरि-  
भागुरि नाम का उल्लेख पाणिनि तथा पतंजलि ने किया है। न्यासकार ने इनके एक मत का उल्लेख किया है।
             वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयोः।
             आपं चैव हलन्तानां यथा वाचा निशा दिशा।।
पौष्करसादि-
महाभाष्यकारकार पतंजलि ने चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् में पुष्करसादि के पुत्र पौष्करसादि के मत का उल्लेख किया है।
काशकृत्स्न-
पाणिनिना प्रोक्तं पाणिनीयम्, आपिशलम्, काशकृत्स्नम् इस महाभाष्य के वचन के अनुसार तथा वोपदेव कृत कविकल्पद्रुम के अनुसार काशकृत्स्न नामक वैयाकरण का पता चलता है। वस्तुतः महाभाष्य व्याकरण ज्ञान का मूल ऐतिह्य स्रोत है।
                 इन्द्रश्चन्द्रः काशकृत्स्नाऽपिशली शाकटायनः ।
                 पाणिन्यमरजैनेन्द्राः जयन्त्यष्टौ च शाब्दिकाः।।
शन्तनु- 
सम्प्रति इनके द्वारा रचित फिट् सूत्र प्राप्त होता है। शन्तनु द्वारा विरचित होने कारण इसे शान्तनव व्याकरण भी कहा जाता हैं। प्रातिपदिक अर्थात् मूल शब्द को फिट् नाम से कहा गया। इन सूत्रों में प्रातिपदिक के स्वरों (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) का विधान किया गया है ।
गार्ग्य- अष्टाध्यायी में पाणिनि ने इस ऋषि के मत का उल्लेख अनेक सूत्रों में किया है।अड्गार्ग्यगालवयोः, ओतो गार्ग्यस्य आदि।
इस प्रकार पाणिनि ने अपने ग्रन्थ अष्टाध्यायी में शाकल्य, आपिशलि, काश्यप, चाक्रवर्मण, शाकटायन,व्याडि,शाकल्य आदि अनेक वैयाकरण आचार्यों के मत का उल्लेख किया है।

नोट- इस अधोलिखित भाग का सम्पादन तथा विस्तार करना शेष है।

व्याकरण ग्रन्थ परम्परा                                       

लेखक                            समय                             ग्रन्थ का नाम
पाणिनि                         2000 वर्ष पूर्व               अष्टाध्यायी
शालातुरो नाम ग्रामः, सोभिजनोस्यास्तीति शालातुरीयः तत्र भवान् पाणिनिः। 
कात्यायन                      3000  
पतंजलि                                                           महाभाष्य
चन्द्रगोभि                      12000 पू0                चान्द्रव्याकरण
क्षपणक                          विक्रम के एक शती में       उणादि की व्याख्या लिखा
भर्तृहरि                          4 शती                           वाक्यपदीप
देवनन्दी/जिनेन्द्र              5 3700 सूत्र                  जैनेन्द्र व्याकरण का औदीच्य प्राच्य पाठ मिलता है।
भोजदेव                         सं01075                      सरस्वतीकण्ठाभरण 6400 सूत्र
दयापालमुनि                  1082                           रूपसिद्वि शाकटायनव्याकरण नवीनी
वर्धमान                         1120                           गणरत्नमहोदधि
लंकास्थ बौद्व धर्मकीर्ति     1140                           रूपावतार
हेमचन्द्रसूरि       (जैनावर्ष) 1145                          सिद्वहैमशब्दानुशासन इस पर स्वोपज्ञा टीका‘ 6000
श्लोेक
क्रमदीश्वर                                                          संक्षिप्तसार
नरेन्द्राचार्य                     1250                           सारस्वत व्याकरण अनुभूतिस्वरूप की टीका सारस्वतप्रक्रिया
बोपदेव                         1325                           मुग्धबोधव्याकरण

पाणिनि -          
गुणरत्नमहोदधि में वर्धमान
पतंजलि इह पुष्यमित्रं याजयामः
टीका                             परम्परा                         
रामचन्दाचार्य                1450वि0                     प्रक्रिया कौमुदी
भट्टोजि दीक्षित               1570-1650                 वैयाकरण सिद्वान्त कौमुदी
ज्ञानेन्द्र सरस्वती             1551                           तत्वबोधिनी
जयादित्यवामन                                                  काशिका
दयानन्द सरस्वती                                               अष्टाध्यायी भाष्य कृत 30 आचार्य

कैयट                                         प्रदीप
अष्टाध्यायी के वृत्तिकार- व्याडि, कुणिः, माथुरः
वार्तिकभाष्यकार- हेलाराज- वार्तिकोन्मेष, राघवसूरि
व्याकरण के भाग
उणादि सूत्र, गणपाठ, धातुपाठ, शब्दानुशासन (खिलपाठ) परिभाषापाठ, फिट्सूत्र
व्याकरण के दर्शन ग्रन्थ
वाक्यपदीय        वृषभदेव ने स्वोपज्ञ टीका लिखी
पुष्यराज द्वितीय काण्ड पर टीका
हेलाचार्य तीनों पर लिखा परन्तु तृतीय पर उपलब्ध
मण्डन मिश्र        स्फोटसिद्वि
भरत मिश्र                      स्फोटसिद्वि त्रिवेन्द्रम से प्रकाशित
कौण्डभट्ट                       वैयाकरण भूषण सार
नागेश भट्ट          वैयाकरण सिद्वान्त मंजूषा
आधुनिक गुरूशिष्य परम्परा
गंगाराम त्रिपाठी
तरानाथ तर्क वाचस्पति
रामयश  त्रिपाठी             1884
गोपाल शास्त्री (त्रिपाठी) दर्शन केसरी
युधिष्ठिर मीमांसक

             
                                                
                                               लेखक- जगदानन्द झा
                                                  9598011847