विद्वत्परिचयः 5

आजाद मिश्र मधुकर

उत्तरप्रदेशस्य देवरिया जनपदान्तर्गते वर्तते वत्सगोत्रीय-सरयूपारीण-मिश्रोपाधिधारिणां ब्राह्मणानां ग्रामः परसियामिश्रोऽभिधनः। तस्मिन् ग्रामे कृषिकर्मपरायणाद् मल्लविद्याव्यसनाश- निघटितावयवात् स्वर्गीयश्रीलल्लनमिश्राद् धर्मपत्न्यां दिवङ्गतायां श्रीमतीचन्द्रावती देव्यां द्वितीयः पुत्राः आजाद नामको बालः ऊनपञ्चाशदधिकैकोनविंशतिशततमे ईशवीये अक्टूबरमासस्य पञ्चविंशे दिनाङ्के (25.10.1949 ई.) जनिमलभत। बालकोऽसौ स्वग्रामस्य प्राथमिकपाठशालायां पञ्चमीं कक्षां समुत्तीर्य राजस्थानप्रान्तस्य अजमेर जनपदे अरावलीपर्वतमालावलयितस्य तीर्थगुरोः पुष्करस्य श्रीरमावैकुण्ठसंस्कृत- महाविद्यालये विधिवदष्टभिर्वर्षैः व्याकरणशास्त्रोऽधीती मिश्र आजादो विंशशताब्द्या ईसाया एकसप्ततितमे (1971 ई.) वर्षे वाराणसेय संस्कृतविश्वविद्यालयात् नव्य- व्याकरणाचार्यपरीक्षायां सर्वप्रथमं स्थानमवाप्य स्वर्णपदकं रजतपदकं च लब्ध्वान्।

आचार्यपरीक्षापफलप्रकाशनसमनन्तरमेव काश्यां श्रीअन्नपूर्णासंस्कृतविद्यालये ततो मासद्वयानन्तरं राजस्थानराज्यशासनस्य बीकानेरस्थिते श्रीशार्दूलसंस्कृतविद्यापीठेऽस्य आजादमिश्रस्य संस्कृतव्याख्यातृपदे नियुक्तिः समजनि। मिश्रवर्योऽयं तस्मिन् विद्यापीठेऽष्टौ वर्षाणि व्याकरणं संस्कृतसाहित्यं तथा तत्र स्थितेषु जैनस्थानकेषु कुमारश्रमणाः श्रमणाँश्च जैनदर्शनम् अध्यापयामास। ततोऽसौ मिश्रौ भारतशासनस्य राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थाने व्याख्यातृपदे नियुक्तिमवाप्य प्रयागस्थे गङ्गानाथझा शोधसंस्थाने ततो लखनऊनगरे केन्द्रीय संस्कृतविद्यापीठस्य संस्थापनवर्षादेव व्याकरणप्रवाचक पदे उपप्राचार्यप्राचार्यरूपेण च प्राध्यापनं शोधनिर्देशनं च निर्व्यूढवान्। प्रो. मिश्रः संस्थापकप्राचार्यरूपेण 6 जुलाई 2002 तमे दिनाङ्के भोपालमाजगाम। तत्र छात्रान् स्वयमध्यापयन्नसौ मिश्रवर्यो विधिवच्छिक्षणप्रशिक्षणव्यवस्थां विधिपूर्वम् अदातुकामादपि बरकत-उल्ला- विश्वविद्यालयात् तदीयामावण्टितां दशैकडमितां भूमिं (बलादादाय तत्र केन्द्रीयलोकनिर्माणविभागेन प्रायः पञ्चत्रिंशत्कोटि- रूप्यकैः वत्सराज मुख्यभवनं वातानुकूलितं वररुचिग्रन्थागारं, भवभूतिप्रेक्षागारं, दाक्षी (महिला छात्रवासं, कविभास्कर- च्छात्रवासं, भगवत्पादगोविन्द प्राचार्यसदनं, सुदामातिथिनिवासं, कर्मचारि हरिनिवासं च निर्मापयामास।

उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानस्य उ.प्र. हिन्दी संस्थानस्य च विशेषविविधपुरस्काराभ्याम्, आकाशवाण्याः सर्वश्रेष्ठसंस्कृतकवितापुरस्कारेण, म.प्र. लेखक संघस्य साहित्यकारसम्मानेन अभिनन्दनग्रन्थद्वयसम्मानेन च सभाजितस्य प्रो. मिश्रस्य अद्यावध् द्वाविंशतिः पुस्तकानि, पञ्चाशतोऽप्यधिकाः लेखाः, संस्कृतपत्रिकाणां सम्पादिताः चतुस्त्रिंशद् अङ्काश्च सन्ति प्रकाशितानि। प्रो. मिश्रेण विरचिताः सम्पादिताश्च प्रमुखा ग्रन्थाः यथा- 1. पंजाबी संस्कृतशब्दकोशः 2. बुन्देली संस्कृतशब्दकोशः, 3. मालवी संस्कृतशब्दकोशः, 4. संस्कृत के प्रत्ययों का भाषाशास्त्रीय पर्यालोचन, 5. राजपाथेयम्, 6. मधुकरगीतम्, 7. शास्त्रीयनिबन्धमञ्जूषा, 8. हिन्दीसंस्कृतनिबन्धमञ्जरी, 9. वैयाकरणसिद्धान्तरत्नाकरः (3 भागाः), 10. संस्कृतपीयूषम् (3 भागाः) पूर्वमाध्यमिक पाठ्यपुस्तकम्। पञ्चदशाधिकं पीएच्.डी. शोधप्रबन्धनिर्देशनं च।
अक्टूबर 2014 वर्षे सेवानिवृत्तः प्रो. मिश्रः सपत्नीको लखनऊनगरे निवसन् स्वकीयावासे प्रतिदिनं छात्रन् निःशुल्कं संस्कृतशास्त्राणि पाठयति, वैयाकरणसिद्धान्तरत्नाकरस्य कृदन्तप्रकरणं सम्पादयति तट्टीकते तथाच उ.प्र. संस्कृत संस्थानस्य परिशीलनम्इति संस्कृतशोधपत्रिकां सम्पादयति।
प्रख्यातभाषाशास्त्रिणः प्रो. आजादमिश्र मधुकरस्य संस्कृतग्रन्थलेखनं सम्पादनं संस्कृतसंस्थाकार्यं, प्रथितं वैदुष्यञ्चालोक्य उत्तरप्रदेशसंस्कृतसंस्थानम् एनम् एकसहस्राधिकलक्षद्वयरूप्यात्मकेन महर्षिव्यासपुरस्कारेण पुरस्कृतवान्।
                                                      हिन्दी
उत्तर प्रदेश के देवरिया जनद में परसिया मिश्र नामक गाँव है, जहाँ वत्सगोत्रीय सरयूपारीण मिश्र ब्राह्मणों की बस्ती है। वहाँ 25 अक्टूबर 1949 ई. को आजाद मिश्र का जन्म हुआ। इनके पिता लल्लन मिश्र अखाड़े के पहलवान किसान थे और इनकी माता चन्द्रावती देवी थीं। गाँव पर प्राथमिक शिक्षा प्राप्तकर इन्होंने अजमेर जनपद में स्थित तीर्थ गुरु पुष्कर में शास्त्री कक्षा तक अध्ययन किया। तत्पश्चात् वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय वाराणसी में अध्ययन करते हुए इन्होंने 1971 में नव्यव्याकरणाचार्य परीक्षा में सर्वाधिक अंक प्राप्त करके विश्वविद्यालय से स्वर्ण एवं रजत पदक प्राप्त किया।
आचार्य परीक्षा उत्तीर्ण करते ही शार्दूल संस्कृत विद्यापीठ, बीकानेर में 1971 ई. में प्रो. मिश्र की व्याख्याता पद पर नियुक्ति हो गयी, जहाँ 8 वर्षों तक व्याकरण शास्त्रा का प्राध्यापन किया। तदनन्तर डॉ.मिश्र ने भारतशासनाधीन राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में नियुक्ति प्राप्त कर 1979 से 1986 तक गङ्गानाथ झा शोध संस्थान इलाहाबाद में तत्पश्चात् लखनऊ केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ में आरम्भ काल से 2002 तक रीडर एवं प्राचार्य पद पर सेवा की। उसके बाद भोपाल में राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान का परिसर आरम्भ करने के लिए प्रो. मिश्र ने जून 2002 से वहाँ संस्थापक प्राचार्य के रूप में शिक्षण-प्रशिक्षण व्यवस्था एवं सांस्थानिक नव निर्माण कार्य निष्पादित कराया। पफलस्वरूप केन्द्रीय लोक निर्माण विभाग ने वहाँ लगभग रूपये पैंतीस करोड़ की लागत से मुख्य वत्सराज भवन, वातानुकूलित वररुचि ग्रन्थागार तथा भवभूति प्रेक्षागार, दाक्षी (महिला छात्रावास, कवि भास्कर छात्रावास, सुदामा अतिथि निवास, भगवत्पाद गोविन्द प्राचार्य सदन एवं कर्मचारी आवास का सुन्दर निर्माण किया है। इस प्रकार भोपाल-परिसर में पूर्ण विकास करके प्रो. मिश्र वहाँ से अक्टूबर 2014 में सेवानिवृत्त होकर अब लखनऊ गोमतीनगर 2/239 विराम खण्ड में सपत्नीक निवास करते हैं।
प्रो. मिश्र को उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान एवं उ.प्र. हिन्दी संस्थान लखनऊ से विविध, विशेष एवं नामित पाणिनि पुरस्कार, आकाशवाणी से सर्वश्रेष्ठ कविता पुरस्कार, मध्यप्रदेश लेखक संघ से साहित्यकार सम्मान प्राप्त हुए हैं। प्रो. मिश्र के सम्मान में अभिनन्दन ग्रन्थ के दो भाग प्रकाशित हैं।
प्रो. मिश्र के मार्गनिर्देशन में 15 से अधिक शोध्च्छात्रों को पीएच.डी. शोधेपाधि मिली है। इनके द्वारा रचित एवं संपादित बाईस स्थूलकाय ग्रन्थ प्रकाशित हैं, जिनमें प्रमुख हैं- 1. पंजाबी संस्कृत शब्दकोश, 2. बुन्देली संस्कृत शब्दकोश, 3. मालवी संस्कृत शब्द कोश, 4. संस्कृत के प्रत्ययों का भाषाशास्त्रीय पर्यालोचन, 5. वैयाकरणसिद्धान्तरत्नाकरः (3 भागद्ध, 6. संस्कृत पीयूषम् (3 भाग, पूर्वमाध्यमिक पाठ्यपुस्तक) 7. शास्त्रीय निबन्ध मञ्जूषा, 8. हिन्दी संस्कृत निबन्ध मञ्जरी, 9. राजपाथेयम्, 10. मधुकरगीतम् इत्यादि।
इन्होंने विभिन्न संस्कृत पत्रिकाओं के पैंतीस अंकों का कुशल सम्पादन किया है। वर्तमान में गोमतीनगर अपने आवास पर निःशुल्क छात्रों को संस्कृत शास्त्रों का अध्यापन करते हैं तथा उ.प्र. संस्कृत संस्थान की संस्कृत शोध पत्रिका परिशीलनम्का सम्पादन कर रहे हैं।
प्रख्यात भाषाशास्त्री प्रो. आजाद मिश्र मधुकरकी संस्कृत सेवा, उनके लेखन, सम्पादन एवं वैदुष्य को केन्द्रित कर उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान उन्हें रूपये दो लाख एक हजार के महर्षि व्यास पुरस्कार से सम्मानित किया।

केशवराव सदाशिव शास्त्री मुसलगाँवकर

राष्ट्रपतिसम्मानेन सम्मानिताः आचार्याः केशवराव सदाशिवशास्त्रि-मुसलगाँवकरवर्याः, धर्मरत्न-धर्ममार्तण्डमहामहोपाध्यायादिभिः उपाधिभिर्विभूषितानां पण्डितप्रवराणां सदाशिवशास्त्रिामुसलगाँवकरवर्याणाम् आत्मजाः वर्तन्ते। डॉ. केशवरावमहोदयाः निःशुल्कसंस्कृताध्यापनाय आत्मानम् अर्पितवन्तः। इमे ग्वालियर, इन्द्रगढ़ (दतिया) मंगरोनी (शिवपुरी) कहानी (सिवनी) लखनादौन (सिवनी) उज्जयिनी प्रभृतिषु नगरेषु निःशुल्कं संस्कृतभाषां संस्कृतसाहित्यं च छात्रान् अध्यापितवन्तः। मध्यप्रदेशस्य एतानि नगराणि शैक्षणिकदृष्टड्ढा दुर्बलानि आर्थिकदृष्ट्या{पि मन्दानि सन्ति। सत्यामपि एतादृश्यां विकटतमायां परिस्थितौ मुसलगाँवकरमहोदयाः संस्कृतस्य प्रचाराय प्रसाराय च बद्धपरिकराः निःशुल्कं संस्कृतस्याध्यापनम् अकार्षुः। इमे मध्यप्रदेशशासनस्य माध्यमिकशिक्षाविभागे शिक्षाविद्रूपेण एकचत्वारिंशद् वर्षाणि यावद् शिक्षणकार्यमकुर्वन्।
इमे 2008 तमे ईसवीये वर्षे मध्यप्रदेशसर्वकारेण राजशेखरसम्मानेन सभाजिताः। एतेषां संस्कृतसेवा प्राप्त- विविधपुरस्कारैरपि ज्ञातुं शक्यते। संस्कृतभाषायाः प्रचाराय प्रसाराय च मध्यप्रदेशशासनेन 2012 इशवीये वर्षे उद्घोषितेन महाकविकालिदासम्मानेन 2013 वर्षस्य गणतन्त्रदिवसे इमे विभूषिताः। मुसलगाँवकरमहोदयैः विरचिताः ग्रन्थाः एवम्प्रकारेण सन्ति-
            1. संस्कृतमहाकाव्य की परम्परा                            2.आधुनिक संस्कृतकाव्य परम्परा
            3. नाट्य मीमांसा-प्रथम एवं द्वितीय भाग               4. कालिदासमीमांसा
            5. नाट्यपर्यालोचन                                            6. भवभूतिः(अनुवादितं पुस्तकम्)

मुसलगाँवकरमहोदयेन शिशुपालवध्महाकाव्यम्, नैषधीयचरितमहाकाव्यम्, दशरूपकम्, ध्वन्यालोकः, रसगंगाधरः, श्रीमद्भगवद्गीता, हर्षचरितम् प्रभृतिग्रन्थानामुपरि सर्वगम्या महनीया व्याख्यात्मिका टिप्पणी समुल्लिखिता वर्तते।
मुसलगाँवकरमहोदयानां पञ्चाशतोधिकानि शोधपत्राणि देशस्य प्रतिष्ठितासु पत्रपत्रिकासु प्रकाशितानि प्रमाणयन्ति संस्कृतभाषां प्रति निष्ठां संस्कृतसेवाञ्च। भारतस्य प्रतिष्ठितानां विश्वविद्यालयानां प्रचलितेषु पाठ्यक्रमेषु अनेन लिखितानां ग्रन्थानां सन्दर्भग्रन्थरूपेण प्रतिष्ठापनं प्रमाणीकरोति एतेषां संस्कृताय समर्पितजीवनम्।
                                                              हिन्दी
राष्ट्रपति सम्मान से सम्मानित आचार्य केशवराव सदाशिव शास्त्री के पिता पण्डितप्रवर सदाशिव शास्त्री मुसलगाँवकर थे, जिन्हें महामहोपाध्यायकी उपाधियां मिली थीं।
आचार्य केशवराव मुसलगाँवकर जी ने संस्कृत विद्या के परिवेश में अध्ययन आरम्भ करवेफ स्नातकोत्तर एवं शोधोपाधि प्राप्त की है। आचार्य जी मध्यप्रदेश शासन के माध्यमिक शिक्षाविभाग में इकलातीस वर्षों तक शिक्षण कार्य करके सेवानिवृत्त हुए हैं। उस शिक्षण अवधि में डॉ. केशवराव जी ने ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी सिवनी एवं उज्जयिनी के गाँवों में आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों को निःशुल्क संस्कृतभाषा एवं संस्कृत साहित्य का अध्यापन किया है। इस प्रकार आचार्यजी ने संस्कृत के प्रचार-प्रसार में महनीय योगदान किया है।
सरस्वती के समुपासक डॉ. केशवराव चिन्तनशील समीक्षक हैं। इनके द्वारा रचित निम्नांकित ग्रन्थ प्रकाशित हैं-
1. संस्कृत काव्य की परम्परा                     2. आधुनिक संस्कृतकाव्य परम्परा
3. नाट्यमीमांसा- 1-2 भाग                     4. कालिदास मीमांसा,
5. नाट्यशास्त्र पर्यालोचन,                        6. भवभूतिः (अनुवाद)
7. शिशुपालवधम्, नैषधीयचरितम्, दशरूपकम्, ध्वन्यालोकः, रसगंगाधरः, श्रीमद्भगवद्गीता एवं हर्षचरितम् की सरल व्याख्या एवं टिप्पणी।
8. आचार्य श्री के 15 से अधिक शोधपत्र प्रकाशित हैं।
भारत एवं विदेशों के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के संस्कृत पाठ्यक्रम में डा. मुसलगाँवकर की पुस्तकें संदर्भ ग्रन्थ के रूप में निर्धरित हैं।

डॉ. मुसलगाँवकर राष्ट्रपति सम्मान के अतिरिक्त मध्यप्रदेश शासन द्वारा सन् 2008 में राजशेखर सम्मानतथा सन् 2013 में कालिदास सम्मान’  सन् 2017 में उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान के विश्वभारती सम्मान तथा पद्मश्री सम्मान से सम्मानित हैं।  
जगन्नाथ पाठक


कविवराणामाचार्यजगन्नाथपाठकमहाशयानां जन्म 1934 ईशवीये वर्षे बिहारराज्यस्य ऐतिहासिके सासारामजनपदे अभूत्। प्राथमिकीं शिक्षां गृहनगरे एव संपाद्य एते काश्यामागमन्। काशीहिन्दूविश्वविद्यालये प्रवेशं प्राप्य इमे सर्वतन्त्रास्वतन्त्रोभ्यः कवितार्किकचक्रवर्तिभ्यः महामहोपाध्यायेभ्यः श्रीमहादेवशास्त्रिवर्येभ्यो अन्येभ्यश्च गुरुभ्यः 1957 वर्षे सर्वप्रथमं साहित्यशास्त्रार्थ इत्युपाधि्ं तथा च क्रमेण तत एव एम.ए.(हिन्दीद्ध 1964 वर्षे एम.ए.(संस्कृतम्द्ध 1965 वर्षे च उपाध्द्वियं प्राप्तवन्तः। तत्रौव काशीहिन्दूविश्वविद्यालये अनुसन्धानरता इमे 1968 वर्षे पी-एच.डी. इति शोधेपाधि्ं प्रापन्। ततः क्रमेण एभिः पाठकमहोदयैः विभिन्नासु भाषासु यथा संस्कृत-हिन्दी-आंग्ल (अँग्रेजी) पालि-प्राकृत-मैथिली-उर्दू-बंगभाषासु च नैपुण्यमवाप्तम्।

अध्ययनानन्तरं डॉ. पाठकमहोदयाः कतिचिद् वर्षेषु बिहारप्रान्ते अध्यापनं विधय इमे केन्द्रीयसर्वकारीयायां सेवायां प्राथम्येन राष्ट्रियसंस्थानान्तर्गते श्रीलालबहादुरशास्त्रा केन्द्रीयसंस्कृतविद्यापीठे साहित्यविषयस्य प्राध्यापका अभूवन्। साहित्यशास्त्रामध्यापन्तः एते दशवर्षाणि यावत् प्राध्यापकपदे स्थित्वा राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थानस्य इदानीं मानितविश्वविद्यालयरूपेण परिवर्तितेषु परिसरेषु गंगानाथझापरिसरे ऽपि शोधप्रकाशनस्य महद् दायित्वं निभालयन्तः तत्रौव एते साहित्यस्य प्रवाचका भूत्वा पंचवर्षाणि यावत् स्थित्वा च संस्थानसेवायां प्राचार्यरूपेण वृताः संजाताः। ततः संस्थानस्य जम्मूस्थितस्य श्रीरणवीरपरिसरस्य प्राचार्यत्वं पंचवर्षाणि यावत् धरयन्त इमे सार्धद्वयवर्षपर्यन्तं पुनश्च प्रयागस्थस्य श्रीगंगानाथझापरिसरसस्य प्राचार्यत्वमपि निर्वहन्तः 1994 वर्षे सेवातो निवृतिं प्रापन्।
आचार्यपाठकमहोदयाः अध्यापनकालादेव काव्यरचनायां व्यापृता आसन्। वैलक्षण्यमेतेषाम् इदमस्ति यत् भारते सन्ति बहुविधः विद्वान्सः कवयश्च, परन्तु  एतादृशः कोपि नोपलभ्यते यस्य समाना गतिः विभिन्नसु भाषासु काव्यरचनासु चास्ति। पाठकमहाशयाः यथा संस्कृते तथैव हिन्द्याम्, उर्दूभाषायांच काव्यमकुर्वन्। डॉ. जगन्नाथपाठकानां मौलिककाव्यानि सन्ति-कापिशायनी 1980 वर्षे मृद्वीका 1983 वर्षे पिपासा 1987 वर्षे विच्छित्तिवातायनी 1992 वर्षे आर्यासहस्रारामम् 1995 वर्षे। अनूदिताः रचनाः दीवानेग़ालिबस्य संस्कृतपद्यानुवादः ग़ालिबकाव्यम् इत्याद्याः। संक्षिप्तेऽस्मिन् परिचये अनेकासु भाषासु निबद्धानां काव्यानामनूदितानां ग्रन्थानां महती संख्या वर्तते। यतोहि अहर्निशं प्रयतमानाः इमे शताधिकानि लघुबृहत्कायरूपाणि काव्यानि रचितवन्तो अनूदितवन्तश्च। विभिन्नासु शोधपत्रिकासु एतेषां शोधनिबन्धः प्रकाशिताः सन्ति। पाठकमहोदयानां मार्गनिर्देशने पंच शोधछात्राः विद्या-वारिधि(पी-एच.डी.) इत्युपाधिं प्रापन्।
आचार्यपाठकवर्याः नवदेहलीस्थ साहित्य अकादमीद्वारा, राजस्थानसंस्कृत-अकादमीद्वारा तथा च उत्तरप्रदेश- संस्कृतसंस्थानद्वारा विशिष्टवैशिष्ट्यपुरस्कारेण बहुधा सभाजिताः आसन्।
विभिन्नेषु विश्वविद्यालयेषु इमे शास्त्र-चूडामणिरूपेण सम्मान्याचार्य(विजिटिंग प्रोफेसर)रूपेण च संपृक्ताः आसन्।
                                                     हिन्दी
कविवर आचार्य जगन्नाथ पाठक का जन्म बिहार प्रान्त के ऐतिहासिक सासाराम जनपद में 1934 में हुआ। प्राथमिक शिक्षा गृहनगर में प्राप्त कर आप काशी आगये। काशी आकर यहाँ काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्रवेश प्राप्त कर आपने सर्वतन्त्रस्वतन्त्र पं. महादेवशास्त्री एवं अन्य गुरुओं के सानिध्य में शास्त्राभ्यास करके सर्वप्रथम 1957 में साहित्य शास्त्राचार्य की उपाधि् प्राप्त की। क्रमशः आपने यहीं से 1964 एवं 1965 में एम.ए.(हिन्दी) तथा एम.ए.(संस्कृत) की उपाधि भी प्राप्त की। 1968 में आपको काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की पी-एच.डी. शोधोपाधि् प्राप्त हुयी। इसके अनन्तर अध्ययन एवं शोध में व्यसन होने के कारण आचार्य पाठक ने क्रमशः हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेजी, पालि-प्राकृत, मैथिली, उर्दू, बंगला, आंशिक पर्शियन आदि भाषाओं में निपुणता प्राप्त कर ली।
आचार्य पाठक कुछ वर्षों तक बिहार में अध्यापन के पश्चात् राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान के अन्तर्गत श्री लालबहादुर शास्त्री केन्द्रीय संस्कृत विद्यापीठ में साहित्य विषय के प्राध्यापक नियुक्त हुये। दश वर्षों तक अध्यापन के पश्चात् आप मानित विश्वविद्यालय के रूप में परिवर्तित प्रयागस्थ डॉ. गंगानाथ झा परिसर में प्रवाचक(रीडर) होकर शोध एवं प्रकाशन के दायित्व को निभाया। पाँच वर्षों तक प्रवाचक रहने के बाद आपका संस्थान सेवा में प्राचार्य के रूप में चयन हुआ। पुनः पाँच वर्षों तक आप श्री रणवीर परिसर जम्मू के प्राचार्य रहे। इसके अनन्तर आपका प्राचार्य के रूप में एक बार पुनः गंगानाथ झा परिसर इलाहाबाद में स्थानान्तरण हुआ। ढाई वर्ष बाद आप यहीं से 1994 में सेवानिवृत हुये।
आचार्य पाठक अध्यापन काल से ही काव्य रचना में व्यापृत रहे। भारत में इनके सदृश विलक्षण कवि विरले मिलेंगे जो हिन्दी संस्कृत और उर्दू आदि भाषाओं में समान रूप से काव्य रचना में प्रवृत्त हों। आचार्य पाठक के मौलिक काव्य है- कापिशायनी(1980) मृद्वीका(1983) पिपासा(1987) विच्छित्ति वातायनी(1992) आर्या सहस्रारामम्(1995) इनकी अनूदित रचनायें है- दीवानेगालिबस्य संस्कृतपद्यानुवादः, गालिबकाव्यम् इत्यादि।
इस संक्षिप्त परिचय में अनेक भाषाओं में निबद्ध काव्यों एवं अनूदित काव्यों का विवरण अपर्याप्त होगा, क्योंकि अहर्निश रचना में प्रयत्नशील कवि की शताधिक काव्य एवं अनुवाद प्रकाशित और अप्रकाशित हैं।
विभिन्न शोध पत्रिकाओं में आपके अनेक प्रबन्ध प्रकाशित हुये हैं। आपके मार्ग-निर्देशन में पाँच शोध छात्रों ने विद्यावारिधि(पी-एच.डी.) की उपाधि प्राप्त की है।
आचार्य पाठक साहित्य अकादमी नई दिल्ली, राजस्थान संस्कृत अकादमी तथा उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा विशिष्ट वैशिष्ट पुरस्कार से बहुधा सभाजित थे। आचार्य पाठक विभिन्न विश्वविद्यालयों में शास्त्रचूड़ामणि एवं विजिटिंग-प्रोफेसर के रूप में सम्बद्ध रहे हैं।
आचार्य जगन्नाथ पाठक को उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व की मीमांसा करके उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान उन्हें रूपये पाँच लाख एक हजार के साथ सर्वोच्च विश्वभारती पुरस्कार से सम्मानित किया है।

जयमन्त मिश्र

 महामहोपाध्याय डा. जयमन्त मिश्र का जन्म 1925 में हुआ। इनके एक पुत्र एवं चार पुत्रियां हैं। इन्होंने संस्कृत और मैथिली भाषा के लिए कई महत्वपूर्ण काम भी किया है। इन्हें राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ द्वारा महामहोपाध्याय’, ‘राष्ट्रपति पुरस्कार’, व्यास सम्मान, ‘कालिदास सम्मान’, और वाणभट्ट पुरस्कारसहित कई सम्मानों से सम्मानित किया जा चुका है। वे 1995 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से भी सम्मानित हुए. डा. मिश्र 1980 से 1985 तक कामेश्वर सिंह दरभंगा संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति रहे.
          संस्कृत में महामानवचम्पूऔर मैथिली में कविता कुसुमांजलि’ (मैथिली कविता संग्रह) और महाकवि विद्यापतिनामक पुस्तक उनकी महत्वपूर्ण कृतियाँ हैं।


श्रीनिवास रथ

























श्रीराम पाण्डेय


कमलेशदत्त त्रिपाठी


नलिनी शुक्ला


उमारमण झा


वि.कृष्णमूर्ति घनपाठी 


प्रो.रामचन्द्र पाण्डेय                                        
 बी.34/118-38, मानस नगर,
दुर्गाकुण्ड, वाराणसी-221005  दूरभाष/फैक्स- 0542-2310707 
  मो.  09415203658,                      
शैक्षणिक अनुभव-(33वर्ष)-

व्याख्याता-ज्योतिष- केन्द्रियसंस्कृतविद्यापीठ,जम्मू(राष्ट्रियसंस्कृतसंस्थान, नईदिल्ली),1973-1980

रीडर- ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी । 1980-1991

प्रोफेसर-ज्योतिषविभाग- काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। 1991-2004  

शोधनिर्देशन30, 25शोध उपाधि प्राप्त ।


प्रशासनिक अनुभव-

अध्यक्ष- ज्योतिष विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी। 1986-2003

संकायप्रमुख- संस्कृतविद्याधर्मविज्ञानसंकाय, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।1991,1993-1995


सम्मानित पद-

पीठाध्यक्ष- सवाई जयसिंह ज्योतिर्विज्ञान पीठ, ज.रा.राजस्थान संस्कृतविश्वविद्यालय, जयपुर, 2006-2009 

सदस्य- पञ्चाङ्गसुधारसमिति, भारत सरकार, 1998-2000 

अध्यक्ष- सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थान, वाराणसी।

सचिव/प्रबन्धक- नैसर्गिक शोध संस्था, वाराणसी। 

अध्यक्ष-भारतीय वैज्ञानिकों की विश्वस्तरीय मान्यता प्रतिष्ठापन समिति,

कोषाध्यक्ष- पट्टाभिराम वेदमीमांसानुसन्धान केन्द्र, वाराणसी। 5वर्ष


सम्पादक-

प्रधान सम्पादक-विश्वपञ्चाङ्ग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी ।1986-1995

प्रधान सम्पादक- काशिका ट्रिनीडाड पञ्चाङ्ग, 2वर्ष

सम्पादक- भारतीयवाङ्मय का वृहद् इतिहास, उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ ।

सम्पादक- नैसर्गिकी अर्धवार्षिक पत्रिका ।


शोध सहायक- सर्व भारतीय काशिराज न्यास, 1967-1973


संगोष्ठियों मे प्रतिभागिता (अध्यक्ष, मुख्यवक्ता, वक्ता)-

राष्ट्रिय- 55

अन्तरराष्ट्रिय- 12

संगोष्ठी आयोजन- 6

प्रकाशन-

पुस्तक-14

लेख-60

संयुक्त प्रकाशन- वामनपुराण, कूर्म पुराण

शैक्षणिक योग्यता-

आचार्य(सिद्धान्त ज्योतिष) वा.संस्कृतविश्वविद्यालय, वाराणसी, प्रथम श्रेणी, दो स्वर्णपदक प्राप्त ,   1965

विद्यावारिधि(पी-एच.डी), सिद्धान्त ज्योतिष, 1969,सं.वि.वि.वाराणसी। (शोधप्रबन्ध प्रकाशित)

आचार्य ( फलित ज्योतिष ) प्रथम श्रेणी, वा.सं.वि.वि., वाराणसी। 1971

सम्मान-

राष्ट्रपति सम्मान-संस्कृत, महामहिम राष्ट्रपति द्वारा,राष्ट्रपतिभवन, नई दिल्ली । 2009

भास्कराचार्यसम्मान, दिल्ली संस्कृत अकादमी, नई दिल्ली, 2011

ब्रह्मर्षि सम्मान- महामहिम राष्ट्रपति द्वारा, राष्ट्रपति भवन, नईदिल्ली,( अ.भा.प्रा.ज्यो.संस्थान, द्वारा प्रयोजित।) 2011

आर्यभट सम्मान- राजभवन, जयपुर, अ.भा.प्रा.ज्यो.संस्थान, जयपुर । 2007

विशिष्ट सम्मान- उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ। 2007

विशिष्ट सम्मान - उत्तरप्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ, 2004

कणाद सम्मान-  मेरठ, वेद-ज्योतिष अनुसन्धान संस्थान, मोदीनगर, उ.प्र.1998


अन्य कार्य-

नैसर्गिक शोध संस्था की स्थापना ।

प्रायोगिक ज्योतिष शिक्षण का प्रारम्भ,  जम्मू,वाराणसी,जयपुर ।

ज्योतिष प्रयोगशाला एवं लघु तारामण्डप की स्थापना, जम्मू, वाराणसी, जयपुर ।    



विश्वनाथ शास्त्री दातार

शैक्षणिक अनुभव
मीमांसान्याय और प्राचीन राजशास्त्र-अर्थशास्त्र के प्रकांड विद्वान
कुंवर अनन्त नारायण सिंह को पुराण प्रवचन के माध्यम से दीक्षा दी
प्राचीन राजशास्त्र के शिक्षक संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय,वर्ष 1981 में सेवानिवृत्त ।
सम्मान-
संस्कृत में उच्चकोटि के कार्यो के लिए उन्हें वर्ष 1990 में राष्ट्रपति पुरस्कार
लाल बहादुर राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ [नई दिल्ली] द्वारा 15 फरवरी 1994 में महामहोपाध्याय की उपाधि
विद्याभूषणउडुपी मदुराचार्य तंजावर पुरस्कार
वेद पंडित पुरस्कार 1984  में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,लखनऊ
विशिष्ट पुरस्कार 2002 में  उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान,लखनऊ
पुनः महर्षि बाल्मीकि पुरस्कार,
पौरोहित्य कर्मकांड पुरस्कार 2001 में वीर हनुमान मंदिर,राजस्थान
म.म.पं सदाशिव मुसलगांव स्मृति पुरस्कार, 2004
अनेक ग्रंथ प्रकाशित, 88 वर्ष में निधन

रामशंकर अवस्थी

उत्तरप्रदेशस्य कानपुरदेहातजनपदस्य औनहाँ नाम्नि ग्रामे द्विचत्वारिंशदधिकैकोनविंशतिशततमेऽब्दे नवम्बरमासस्य पञ्चदश्यां तिथौ डॉ. अवस्थिनो जन्म बभूव ।  तस्य पिता श्री राजनाथ अवस्थी माता च श्रीमती कौशल्यादेवी आसीत् । स बाल्यकालशिक्षां ग्रामस्य प्राथमिकपाठशालायां जूनियरहाईस्कूले च अविन्दत् । तदनु स उत्तरप्रदेशबोर्डसञ्चालितपरीक्षाद्वयोः सफलतां अलभत (1957- 1961) ‘पं. रामप्रसादसार्वजनिक उत्तरमाध्यमिकविद्यालयरूरा इति नाम्नः शिक्षानिकेतने शिक्षां गृहीत्वा कृषिवर्गस्य छात्रो भूत्वा कृषिवर्गस्य स्नातकोपाधिमग्राहयत् तम् आगराविश्वविद्यालयः (1964)। स स्नातकोत्तरोपाधिं जग्राह हिन्दीभाषायां (1970), संस्कृतभाषायां (1976), विद्यावारिधिरुपाधिश्च (पी-एच.डी.) समवाप्यत तेन छत्रपतिशाहूजीमहाराजविश्वविद्यालयकानपुरात् (1999)
चतुर्दशवर्षाणि गमयित्वा हृदये जनकनिध्नस्य वज्राघातम् विषेहे । किञ्चत्कालापगमे गृहे शून्यतायाः घनतामसं हित्वा तस्य जनन्यपि द्युलोकं जगाम। द्वितीयं वज्राघातं सोढ्वा स बभूव कविः। श्रीअयोध्यासिंहसार्वजनिक- इण्टरकालेजकाशीपुरकानपुरदेहात आह्नयत् तं शिक्षकरूपेणकार्यभारं ग्रहीतुम्। दशवर्षाणि यावत् स शिक्षादानं चकार सहायकशिक्षकरूपेण तदनु स संस्कृतप्रवत्तफा बभूव।
संस्कृतसेवायै समर्पणभावं नीत्वा डॉ. अवस्थी व्यरचयत्- पञ्चमहाकाव्यानि- 1. आहुतिः स्वातन्त्रययज्ञे 2. चिद्विलासः 3. कारगिलयुद्धम् 4. दामिनी पर्यस्फुरत् 5. वनदेवी, चतुःखण्डकाव्यानि- 1. रात्रिर्गमिष्यति 2. सूर्यसेनः 3. अजीजनबाई 4. विक्रमादित्यदायादाः, गीतकाव्यम्- यामिनी यास्यति, मुक्तककाव्यम्- हिमाद्रिशतकम्, नाटकानि- 1. विश्वमित्राम् 2. सुदर्शनचरितम् 3. देवीचन्द्रगुप्तम्, गद्यकृतिद्वयी- 1. सीतावनवासः 2. ध्रणिबन्ध्नः, कथासघ्ग्रहद्वयम्- 1. तरंगिणी 2. परिमलः, आत्मकथा- जीवनस्मृतिः, व्याकरणम्- 1. भ्वादिगणप्रकाशः 2. धातुमञ्जरी। (योगः = 21 ग्रन्थाः)। वाग्विदांवरसम्मानम् (हिन्दीसाहित्यसम्मेलन- प्रयागः-2009), साहित्य अकादमीपुरस्कारः (वनदेवी, 2015), राष्ट्रपतिपुरस्कारः (द सर्टीपिफकेट आपफ आनर 2016), विशिष्ट पुरस्कारः (उ.प्र.संस्कृतसंस्थानम्), बाणभट्टपुरस्कारः (उ.प्र. संस्कृतसंस्थानम्), दिल्लीराज्यस्य कतिपयाः प्रथमपुरस्काराश्च (संस्कृत अकादमी, दिल्ली)।
यू.जी.सी. निर्देशितप्रदेशस्तरीयैकीकृतनवीनपाठ्यक्रमानुसारेण (2012) छत्रपतिशाहूजीमहाराजविश्वविद्यालय बी.ए. प्रथमवर्षस्य संस्कृतद्वितीयप्रश्नपत्रो डॉ. अवस्थिप्रणीतात् यामिनी यास्यति’ (इति) गीतिकाव्यात् किञ्चदंशस्य चयनमक्रियत। प्रसारभारत्याह्नाने हैदराबादे महानिदेशकेनायोजिते सर्वभाषाकविसम्मेलने’ (1998) संस्कृतकविरूपेण भागं गृहीत्वा स संस्कृतभवस्य प्रतिनिधित्वं चकार। प्राकाशयन् तस्य रचनाः संस्कृतप्रतिभा-संस्कृतमञ्जरी-परिशीलनम्- सागरिका (इति नामधेयाः) पत्रिकाः।

जनपद कानपुर देहात (उत्तर प्रदेश) के अन्तर्गत दृष्टिगोचर अवनिहृद् (=औनहाँ) नामक ग्राम में 15 नवम्बर सन् 1942 को डा. रामशंकर अवस्थी का जन्म हुआ था। आपके पिता का नाम श्री राजनाथ अवस्थी तथा माता का नाम श्रीमती कौशल्यादेवी था। आपने बाल्यकाल की शिक्षा प्राथमिक पाठशाला ओनहाँ एवं जूनियर हाईस्कूल औनहाँ में प्राप्त की। तदनु पं. रामप्रसाद सार्वजनिक इण्टर कालेज रूरा में जुलाई 1955 में कृषि वर्ग के छात्रा के रूप में कक्षा 9 में प्रवेश प्राप्त किया। इसी विद्यालय में अध्ययनरत रहते हुए आपने यू.पी. बोर्ड इलाहाबाद से 1957 में हाईस्कूल परीक्षा तथा 1961 में इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण की। आपने आगरा विश्वविद्यालय से सन् 1964 में स्नातक उपाधि (बी.एस.सी.एजी.) (बैचलर आपफ साइंस इन एग्रीकल्चर) ग्रहण की। आपने छत्रापतिशाहू जी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर से हिन्दी में (1970 में) तथा संस्कृत में (1976 में) स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। आप इसी विश्वविद्यालय से सन् 1999 में विद्यावारिधि (पी एच-डी.) उपाधि से विभूषित हुए।
चौदह वर्ष की आयु में आपको पिता के निध्न का तथा उसके वुफछ समय पश्चात् माता की मृत्यु का वज्राघात सहना पड़ा। माता के शाश्वत वियोग ने आपको कविजीवन प्रदान किया। आप श्री अयोध्या सिंह सार्वजनिक इण्टर कालेज काशीपुर कानपुर देहात में सहायक अध्यापक के रूप में 10 वर्षों तक तथा प्रवक्ता (संस्कृत) पद पर 23 वर्षों तक कार्यरत रहकर सन् 2003 में सेवानिवृत्त हुए।
संस्कृतसेवा के लिए समर्पण-भाव लेकर डॉ. अवस्थी ने 1. आहुतिः स्वातन्त्रययज्ञे, 2. चिद्विलासः,
3.कारगिलयु(म्, 4. दामिनी पर्यस्पुफरत्5. वनदेवी, 6. रात्रिर्गमिष्यति, 7. सूर्यसेनः, 8. अजीजनबाई, 9. विक्रादित्यदायादाः, 10. यामिनी यास्यति,11. हिमाद्रिशतकम्, 12. विश्वमित्राम्, 13. सुदर्शनचरितम्, 14. देवीचन्द्रगुप्तम्, 15. सीतावनवासः, 16. धरणिबन्धः, 17. तरर्घिंणी, 18. परिमलः, 19. भ्वादिगणप्रकाशः, 20. धतुमञ्जरी, 21. जीवनस्मृतिः (योग= 21 ग्रन्थ) की रचना की तथा हिन्दी की सेवा करते हुए- 1. श्रीरामगाथा 2. बलिदान 3. लोकमंगल 4. शबरी
यू.जी.सी. निर्देशित प्रदेश स्तरीय एकीकृत नवीन पाठ्यक्रम 2012 के अनुसार छत्रापति शाहूजी महाराज विश्वविद्यालय कानपुर के बी.ए. प्रथम वर्ष संस्कृत द्वितीय प्रश्नपत्रा में संस्कृत कवि के रूप में डॉ. अवस्थी द्वारा प्रणीत ग्रन्थ यामिनी यास्यतिसे कुछ अंश चयनित किया गया है। आपने मानस सर्घैंम विशिष्टसम्मान, वाग्विदांवर सम्मान, साहित्य अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति पुरस्कार, बाणभट्ट पुरस्कार, विशिष्ट पुरस्कार, संस्कृत अकादमी दिल्ली के कुछ प्रथम पुरस्कार प्राप्त किए हैं। आपने प्रसारभारती वेफ आह्नान पर हैदराबाद में आयोजित सर्वभाषा कविसम्मेलन’ (1998) में संस्कृत कवि के रूप में भाग लिया। संस्कृतप्रतिभा, संस्कृतमञ्जरी, परिशीलनम्, सागरिका आदि पत्रिकाओं में आपकी रचनायें छपती रहती हैं।
डॉ. रामशंकर अवस्थी की उत्कृष्ट संस्कृतकाव्य सेवा एवं उनके विशिष्ट वैदुष्य को देखते हुए उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान आपको दो लाख एक हजार रूपये के वाल्मीकि पुरस्कार से सम्मानित किया है।