शनिवार, 30 अगस्त 2014

वाल्मीकि रामायण की टीका परम्परा और गोविन्दराज

        आजकल मै प्रतिदिन प्रातः वाल्मीकि रामायण का स्वाध्याय कर रहा हूँ। वर्ष 1990 के आसपास भी इसका नियमित पाठ करता था। तब मैं इसका मूल पाठ करता था। एक बार 2011 में संस्थान द्वारा प्रकाशित सटीक वाल्मीकि रामायण के हिन्दी अनुवाद पर चर्चा शुरु हुई। इसके अनुवाद के लिए रामायण पढ़े एक संस्कृत के विद्वान के नाम पर मैं सहमत हो गया था। आज 2014 में मुझे ज्ञान हुआ 2011 वाला निर्णय मेरे अल्पज्ञान का परिणाम था। दरअसल नौकरी पा जाने के लिए पढ़ना तथा ज्ञान हेतु पढ़ने में महान भेद है।
            संस्कृत विद्या के क्षेत्र में विद्यार्जन तथा शैक्षणिक प्रमाण पत्र अर्जन में और भी ज्यादा दूरी है। कला और प्राच्य विद्या गुरु की कृपा के बिना पल्लवित पुष्पित नहीं होती है। थोड़े बहुत कौशल आ जाय अलग बात है। प्राच्य विद्या का क्षेत्र बहु आयामी है। उदर पूर्ति की लालसा लिये तदनुरुप शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थियों से यह आशा कभी नहीं की जा सकती कि वह वाल्मीकि रामायण के टीकाओं का अनुशीलन करे। कम संस्कृत पढ़े लिखे तथा जिसने गुरुमुख से यथापरम्परा प्रस्थान त्रयी की व्याख्या अर्जित न किया हो, जिसने व्याकरण न पढ़ा हो। शास्त्र परम्पराओं (उत्तर तथा दक्षिण भारत के साहित्य तथा अन्य परम्परा) का ज्ञान न हो, वह उपजीव्य काव्यों तथा  इनकी टीकाओं के मर्म को नहीं जान सकता। मैंने यत्र तत्र टीका परम्परा की बहुतेरी आलोचना की है, कि यह केवल चीड़ फाड़ है और स्वतंत्र ज्ञान को आगे नहीं बढ़ने देती। प्रस्तुत प्रसंग में मैं ऐसा भी महसूस कर रहा हूँ कि टीका वह दीपक है, जिससे हम मूल पाठ के अर्थ को ढूढ़ते हैं।
          0 प्र0 संस्कृत संस्थान ने वाल्मीकि रामायण का तिलक, गोविन्दराजीय आदि कई टीकाओं सहित प्रकाशन किया है।
वाल्मीकि रामायण के तीन पाठ प्राप्त होते हैः-
1. दाक्षिणात्य पाठ
2. गौडीय पाठ
3. पश्चिमोत्तरीय पाठ
        इन तीन पाठों में केवल पाठ भेद ही नही प्राप्त होते अपितु कहीं-कहीं इसके सर्ग भी भिन्न  भिन्न है। इसकी 30 टीकाएं प्राप्त होती है। प्रमुख टीकाओं मेंः-
1. रामानुजीयम् 2. सर्वार्थ सार 3. रामायण दीपिका 4. बृहद विवरण 5. लधु विवरण 6. रामायण तत्वदीपिका 7. रामायण भूषण 8. वाल्मीकि हृदय 9. अमृत कतक 10. रामायण तिलक 11. रामायण शिरोमणि 12. मनोहर 13. धर्माकूतम् 14. तीर्थी 15. तनिश्लोकी 16. विषम पद विवृति।
गोविन्दराज ने वाल्मीकि रामायण पर रामायण भूषण नाम से व्याख्यान लिखा है। इसे गोविन्दराजीय या भूषण के नाम से भी कहा जाता है। जैसा कि उन्होंने अपनी टीका के प्रस्तावना श्लोक में लिखा है-
पूर्वाचार्यकृतप्रबन्धजलधेस्तात्पर्यरत्नावली-
ग्राहंग्राहमहं शठारिगुरुणा संदर्शितेनाघ्वना।
अन्यव्यकृतिजातरूपशकलैरायोज्य सज्जीकृतैः।
                        श्रीरामायणभूषणं विरचये पश्यन्तु निर्मत्सराः।। प्रस्तावना श्लोक 5।।
गोविन्दराज ने दाक्षिणात्य पाठ के आधार पर रामायण की व्याख्या की है। गोविन्दराज कांची निवासी कौशिक गोत्र में उत्पन्न वरदराज के पुत्र थे। इनके गुरु का नाम शठकोपदेशिक था। शठकोपदेशिक अहोविलनामक मठ के छठवें उत्तराधिकारी थे। इनका समय छठी शताब्दी माना गया है। ये विजय नगर के शासक रामराय के समकालीन थे। अपने व्याख्यान के प्रस्तावना श्लोक 2 में उन्होनें लिखा है कि
श्रीमत्यत्यंजनभूधरस्य शिखरे श्रीमारुतेः सन्निधा-
वग्रे वेंकटनायकस्य सदनद्वारे यतिक्ष्माभृतः।
नानादेशसमागतैर्बुधगणै रामायणव्याक्रियां
विस्तीर्णां रचयेति सादरमंह स्वप्नेस्मि संचोदितः।।प्रस्तावना श्लोक 2।।
मैं स्वप्न में भगवान वेंकटेश की प्रेरणा पाकर रामायण की व्याख्या कर रहा हूँ।
            गोविन्दराजीय व्याख्यान से पता चलता है कि गोविन्दराज बड़गलइ मत, जो रामानुजीय संम्प्रदाय का एक अंग है से प्रभावित थे और उस मत के आचार्य वेदान्त देशिक के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु थे। तिरूपति के पास रहते हुए गोविन्द राज रामायण का व्याख्यान सुनाते थे।
            अपने व्याख्यान के मंगलाचरण श्लोकों में ये शठकोप, लक्ष्मण योगी तथा अन्य मुनियों का स्मरण किया है। मैं स्वयं रामानुजीय परम्परा में दीक्षित हूँ। भगवान रामानुज और आलवारों के प्रति मेरी भी गहरी आस्था है। जब भी गुरु परम्परा से जुड़े तथ्य या रचनाएं मेरे सम्मुख होता है, पढ़ने और लिखने को आतुर हो जाता हूँ।
 यदि ये टीकाएँ वाल्मीकि रामायण के साथ न हो तो हम यह नहीं जान सकते कि प्रसिद्व वैयाकरण नागेश भटृ की तिलक टीका में मूल रामायणम् में 100 श्लोकों का पाठ है, जबकि गोविन्दराज अपनी भूषण टीका में 97 श्लोक हीं मानते हैं। भूषण टीका के रहस्य (गूढ़ार्थ) को जानने के लिए प्रबन्ध साहित्य का ज्ञान आवश्यक है।
सुस्पष्टमष्टादशकृत्व एत्य श्रीशैलपूर्णाद्यतिशेखरोयम्।
शुश्राव रामायणसंप्रदायं वक्ष्ये तमाचार्यपरंपरात्तम्।। प्रस्तावना श्लोक 6।।
वाल्मीकि रामायण की टीका एवं टीकाकार                                                      विशेष प्रतिपाद्य
1. भूषण                                  गोविन्द राज                         रामानुजीय सिद्वान्त के   अनुसार व्याख्या
2. तिलक                                  नागेश भटृ                                  व्याकरण तथा कतक मत,
3. रामायण शिरोमणि                                                               पुराणों से प्रमाण दिये गये हैं।
                                                                                           रामानन्द परम्परा, भूषण का  खण्डन
4. रामायण तत्वदीपिका         महेश्वर तीर्थ                     प्रतिकूल वचनों का अनुकूल  अर्थ किया गया है।

5. अहोबल स्वामी       तनिश्लोकी                                रहस्य एवं पाण्डित्य, द्रविड़ भाषा में लिखे                                                                                                                    रामायण की  व्याख्या का अनुवाद

मंगलवार, 26 अगस्त 2014

कितने व्यास कितने संकुचित

क्या तुम वही व्यास हो, जिसकी मां मत्स्यगंधा और पिता पराशर थे। कहा जाता है कि एक द्वापरयुगीन काला वर्ण वाला, यमुना के द्वीप में पैदा हुआ। बाद में वह बदरी वन में तपस्या किया। यदि तुम वही व्यास हो तो निश्चित है, तुम्हारा नाम पाराशर्य और कृष्णद्वैपायन रहा होगा। वेदों को विभाजित करने के कारण लोगों ने तुम्हारा नाम वेद व्यास रखा होगा। कहा जाता है कि तुमने ही अठ्ठारह पुराण, ब्रह्मसूत्र सहित एक लक्ष वाले महाभारत की भी रचना कर डाली। तुम जरूर क्रान्तिदर्शी रहे होगे परन्तु यह देखो, तुम्हारे नाम पर कितना बवाल उठ खड़ा हुआ है। लोगों ने तुम्हारे नाम व्यास को पद नाम मान लिया, क्योंकि कुछ सुयोग्य लोग तुम्हारे ही नाम से अनेकों पुराण, उप पुराण तथा औपोपपुराण लिख डाले। सब ने तुम्हारे कृतियों का व्यास किया। जहां चाहा, जिस रूप में चाहा, अपनी रचना धुसेर डाली। उस समय वह जरूर व्यास बने फिरते होंगें, जैसे आज लोग अनधिकृत होते हुए भी लालवत्ती वाली गाड़ी लिये घूमते हैं। मनु तो मनुस्मृति। याज्ञवल्क्य तो याज्ञवल्क्य स्मृति। बहुतेरे ऋषियों ने आचार संहिता बनायी, फिर तुम भी तो आज कल के लोगों की तरह युगद्रष्टा जो ठहरे। इस चक्कर में काशी चले गये। अपने नाम से स्मृति ग्रन्थ लिखने। तुमने इतनी सारी पोथी लिखी उसमें धर्म, राजनीति, आचार, भूगोल सबका वर्णन किया, बखूवी किया। यहां तक किया कि महाभारत मानवता का विश्वकोश हो गया।
                    अष्टादशपुराणानि कृत्वा सत्यवतीसुतः।
                    पश्चात् भारतमाख्यानं चक्रे तदुपबृंहितम्॥ मत्स्य पु053/70
 देखो न, लोग कहते फिर रहे हैं यन्न भारते तन्न भारतम्। व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्।
                     अचतुर्वदनो ब्रह्मा द्विबाहुरपरो हरिः ।
                     अभाललोचनः शम्भुर्भगवान् बादरायणः ॥
भगवान बादरायण व्यास के चार मुख नहीं हैं, फिर भी वे ब्रह्मा है; दो बाहु है, फिर भी हरि है; मस्तिष्क पर तीसरा नेत्र नहीं है, फिर भी वे शम्भु है ।
                     धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
                    यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत क्वचित्।।
 हे भरत श्रेष्ठ इस ग्रंथ में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संबंध में जो बात है, वही अन्यत्र भी है, जो इसमें नही है, वह कहीं भी नही है।
            फिर तुम काशी क्यों गये? क्या इसलिए कि पण्डितों के सामने पण्डिताई बघारते। इसलिए कि काशी में प्रतिष्ठित होने पर तुम्हारी रचना को भारतीय जनमानस मार्गदर्शक मान लेता। आचार शास्त्र सर्वमान्य होता। लेकिन हा हत भाग! तुम्हें वहां से खदेड़ दिया गया। अरे चिरंजीवी तुम तो जान ही गये होगे। यहाँ पर तुलसी दास भी प्रताडि़त हुए थे। रामानन्द ही एक ऐसा वैरागी साधू निकला, जिसने अपने स्थानीय शिष्य और जिस जाति के लोग वहां आज भी बहुसंख्यक हैं के साथ झंडा ऊँचा किया। जाति पाति पूछे नहि कोई। हरि को भजै सो हरि का होई! मैं दावे के साथ कहता हूं तुम यदि मत्स्यगंधा पुत्र थे तो धीवर बन्धुओं को साथ ले लिये होते। कोई भी बाल वाॅका नही कर पाता। तुम्हें काशी छोड़कर राम नगर की ओर नहीं जाना पड़ता। तुम चिरंजीवी हो। अब सब कुछ जान समझ रहे होगे कि प्रजातंत्र में भी संख्या बल का ही महत्व है। बुद्धिबल आज भी हार जाता है।
            वैसे भी तुम्हारे कर्मक्षेत्र पर बहुत विवाद है। आज तुम सर्वाधिक विवादित लेखकों में से एक होते जा रहे हो। लोग लाख सफाई देते फिरें परन्तु तुम्हारा जन्म जिस ग्रह नक्षत्रों में हुआ होगा, उसमें सर्वक्षेत्र विवाद सहित का भी योग रहा होगा। तुम्हारे अविवादित मां पिता तथा जन्म, स्थान, रचना विवादित होने से समस्त कार्य विवाद के घेरे में है।
            सर्व प्रथम तुम्हारे जन्म तिथि पर ही विवाद कोई मोक्षदा एकादशी तो कोई गुरू पूर्णिमा को। दावे तो बहुत बड़े किये जाते हैं कि तुम्हारे जन्म के समय सभी ग्रह लग्न अनुकूल थे। यदि ऐसा था तो अपनी जन्मतिथि बताओ। तुमसे सम्भव नहीं तो ज्योतिषी को बुलाकर गणना करा डालो। पांच हजार वर्ष कोई ज्यादा पुराना समय थोड़े ही है। वैसे रहने दो तुम्हारे जयन्ती पर ही अब कौन विचार करते हैं ?
            जब चाहा जहां चाहा तुम्हारी जयन्ती मना डाली। मेरठ में अलग तो उत्तराखण्ड,बुन्देलखण्ड और वाराणसी में अलग-अलग। तुम्हारे सोच के विपरीत लोग तुम्हारे ही नाम पर राज्याश्रय से चिपके हैं। तुम्हें भी वहां वहां धुमायेंगें जहां-जहां तुम्हारे चरण रज पड़े होगें। अब तो गंगा का जल दूषित हो गया हैं। यमुना सर्वाधिक प्रदूषित है। गंगा यमुना त्रिवेणी धाम में आकर प्रदूषण को और गहरा कर गया। क्या ये कम है कि गंगा यमुना संस्कृति के किनारे लोग तुम्हारे नाम पर गीत गायें। ज्ञान के प्रतीक अब तो उस कमण्डल को रखना छोड़ दो। तुम्हारा कमण्डलू भगीरथ का तो हो भी नहीं सकता, कितना कुछ रखने को मिलेगा उस कमण्डल में ? जाओ व्यास जाओ, बदरिकाश्रम चले जाओ, वहां-वहां जाओ जहां-जहां लोग स्वयं को विस्तीर्ण करना चाहते हैं और तुम्हें संकुचित
            कुछ कथावाचक रोज रोज ऊँचे सिंहासन पर बैठकर ध्वनियंत्र से तुम्हारे संदेश का विस्तार कर रहे है। कुछ विद्वान् लिख लिख कर तुम्हें बढ़ा रहे हैं। लेकिन तुम हो कि संकुचित हुए जा रहे हो। व्यास कथा के नाम पर ठीक उसी प्रकार की कथा होने लगी जैसे सत्यनारायण व्रत कथा। लीलावती, कलावती की कथा तो सुनायी जाती है, परन्तु एक पंक्ति में तुम्हें समेट कर फिर से दूसरी कथा शुरू कर दी जाती है।
            देखो तुम्हारे लिखे संदेश को जन-जन तक पहुंचाने के लिए कितने लोग लगे हैं कैसे-कैसे उद्यम करते है? बड़े-बड़े होर्डिंग, वैनरों से पटा शहर, विशाल मंच, बड़े नामधारी आयोजक, पगड़ी बांधे सबसे आगे बैठते हैं। जैसे सर्पदंश की भविष्य वाणी उनके लिये ही की गयी हो। तितीक्षा के प्रतिमूर्ति आयोजक खूब धन धान्य सुतान्वितः का आशीर्वाद पाते हैं। लो मैं भी न अपनी काली कलम से मन को भी काला कर बैठा। तुम्हारी तरह तन काला मन गोरा थोड़े मेरा और उनका होगा।

            अब इस फैशन के दौड़ में तुम शास्त्र से उपर उठ चुके हो। लोग तुम्हें भी आधुनिक देखना चाहते हैं। बदरिकाश्रम न जा सको तो आओ तुम भी साथ हो जाओ। कुछ लोग मिलकर तुम्हारे नाम से (व्यास जी) अपना धंधा चमकायें। अवसर मिला कुछ कमाये। फिर ये मौका मिले न दुबारा।

सोमवार, 25 अगस्त 2014

हास्य काव्य परम्परा तथा संस्कृत के हास्य कवि

नव रस में एक रस हास्य सर्वतो आनन्दकर रहा है। जीवन में हर प्राणी हंसना चाहता है। प्राचीन राजा खुद को प्रसन्न रखने के लिए साथ में विदूषक को रखा करते थे। ऋग्वैदिक सूक्त से लेकर आज के कवि आचार्य वागीश शास्त्री, डा0 प्रशस्य मि़त्र शास्त्री, डा0 शिवस्वरुप तिवारी तक हास्य की एक अविच्छिन्न परम्परा संस्कृत साहित्य में प्राप्त होती है। हास्य व्यंग्य द्वारा भी उत्पन्न होता है। शास्त्रकारों ने शब्दशक्ति के रुप में व्यंजना को स्वीकार किया है। हास्य गद्य एवं पद्य उभय रुप में प्राप्त होते हैं तथा यह अनेकविध है। कुछ हास्य कथाएँ भी प्राचीन संस्कृत लेखकों ने लिखी हैं परन्तु उसे विशुद्ध हास्य कथा भी नहीं कहा जा सकता।
 हिन्दी साहित्य में इस विधा का प्रयोग स्वतंत्र रुप से किया जाने लगा है। इसका लघुतम रुप चुटकुला है। संस्कृत लेखकों ने भी अपनी रचनाओं में समसामयिक विषयों को समावेश करते हुए अनेकविध हास्य रचनाओं को जन्म दिया।
  साहित्यिक तथा भाषायी दृष्टि से डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री, तथा डा0 शिवस्वरुप तिवारी की रचना प्रौढ़ नहीं हैं, लेकिन इनकी रचना इतनी सरल है कि अन्य भाषाभाषी भी सहजतया इसके अर्थ को समझ सकें। अभी तक संस्कृत की हास्य विधा कवि सम्मेलनों तथा संस्कृत  पत्रिकाओं तक ही सीमित थी। संस्कृत के प्रौढ़ रचनाकारों ने भी अनेक विधाओं पर रचना की है। दूसरे वर्ग के रचनाकार आधुनिक समसामयिक समस्याओं व व्यवस्थाओं पर लेखन करते रहे हैं। आज का सहृदय समाज में व्याप्त कुरीति, भ्रष्टाचार, स्वार्थ लोलुपता आदि पर जिस कवि के चुटीले अंदाज पर तालियां पीटा करता है, कवि जिस चुटीली कविता को सुनकर व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता हैः उस चुटीले अंदाज वाली सरल कविता की कमी को डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री ने पूर्ण किया। हंसते-हंसाते अपनी व्यंग्य कविता द्वारा किसी पर शब्द बाण छोड़ना प्राचीन परम्परा के परिपालक कवियों को आज भी रास नहीं आता। आज भी वे कवि प्राचीन राजाओं तथा देवी देवताओं की स्तुति में ही अपनी काव्य वाणी खर्चकर प्रसन्न होते है। कवि कर्म की दो धारा संस्कृत में फूट पड़ी है। एक वे जो पूर्ववर्ती कवियों की रचनाओं का अनुसरण करते हैं, जिनकी संख्या नगण्य रह गयी है। दूसरी धारा के कवि स्वतंत्रता आन्दोलन से जुड़े प्रसंगों, उनके नायकों, कश्मीर समस्या, दुःखितों, वंचितों की समस्या, गजलों का रुपान्तरण आदि पर मुखर होकर लिख रहे हैं। इनकी चर्चा हमने एक पृथक् लेख आधुनिक संस्कृत लेखक तथा उनकी रचनाएं में विस्तार पूर्वक किया है।
      प्रस्तुत प्रसंग को आधुनिक संस्कृत की एक विधा हास्यतक सीमित रखना उचित है।
            अल्पज्ञात नाम डा0 शिवस्वरुप तिवारी की एक मात्र रचना सुहासिका की सभी काव्य रचनाओं का प्रसारण आकाशवाणी लखनऊ से हो चुका है। सुहासिका में संकलित काव्य जितने मनोरम, आनन्दवर्धक तथा स्वस्थ हास्य युक्त है, उतना ही लेखक द्वारा लिखित प्राक्कथन भी।
       ग्रन्थारम्भ में गणेश वन्दना भी हास्य से ही शुरु की गयी है-
     नमस्तस्मै गणेशाय योऽतिभीतः पलायते।
      मूषकं वाहनं वीक्ष्य प्लेगाशंकाप्रपीडि़तः।।
भ्रष्टाचार की स्तुति निम्न पद्यों से कवि ने किया है-
            उत्कोचः परमं मित्रं धूर्तता धर्मसंगिनी।
            स्वार्थस्तु गुरुर्यस्य भ्रष्टाचारं भजाम्यहम्।
भ्रष्टाचार के त्रिविध रुप और भ्रष्टाचारियों की पहचान, लक्षण को जितने सरल शब्दों में यहाॅ प्रस्तुत किया है, इसकी सानी बहुत कम देखने को मिलती है। सुहासिका का प्रथम भाग हास्य व्यंग्य को समर्पित है। चाय स्तोत्रम् से लेकर क्वचिन्मर होते हुए उत्कोचसलिला तक कुल 29 विषयों की काव्यधारा में हरेक समसामयिक जीवन्त विषय पर चुटकी ली गयी है।
            डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री हास्य के क्षेत्र में सर्वज्ञात कवि हैं। इन्होंने पद्य के अतिरिक्त गद्य में भी रचना की है। अनभीप्सितम् पुस्तक पर इन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त है। इनकी लगभग प्रत्येक कृति पुरस्कृत है। हास्य संयोजन इतना तीव्र है कि पाठक लोटपोट  हो जाय। 2013 में प्रकाशित हास्यम् सुध्युपास्यम् के रचनाकाल में मेरी उनसे उनके ही आवास रायबरेली में भेंट हुई थी। कवि सम्मुख श्रोता देख कब चूकता है। घंटे भर उनकी यात्रा का भरपूर आनन्द लेता रहा। मंगलाचरण विटपस्थ कालिदासेभ्यो नमःसे करते हैं। इसमें उन नायकों को आड़े हाथ लिया है जो सत्ता को अपने मनमाफिक चलाते है।
                   कश्मीरपण्डित जनान् न हि चिन्तयन्ते।
                            लेहस्थ बौद्वजनतां न विचारयन्ते।
                    किं चाल्पसंख्यकपदेन न ते गृहीताः।
                           पृच्छामि तांस्तु विटपस्थित कालिदासान्।
 इस ग्रन्थ में राजनीति, प्रेम सम्बन्ध, पति, पत्नी पर बहुशः चुटकी ली गयी है। लेखक ने भी इन विषयों का पृथक् पृथक् प्रकरण बनाया है। इनकी भाषा इतनी सरल है कि संस्कृत का नूतन अभ्यासी को भी पढ़ते ही अर्थबोध हो जाय। विषय वर्णन के पश्चात् अंतिम पद्य में रहस्य खोलकर व्यंग्य मिश्रित हास्य घोलना कोई इनसे सीखे। मैं भी सरल और सहज हिन्दी लिखने में विश्वास करता हॅू। भाव सम्प्रेषण में पाण्डित्य की क्या आवश्यकता?
            कहीं कहीं तो ये हास्य उत्पादन की पीठिका इतना लम्बा बांधते है कि उब होने लगती है। जैसे अद्भुत सम्वाद। वस्तुतः यह एक नवीन विधा भी है, जो अंतिम पंक्ति में लिखित अधस्तात् क्रमशश्चोध्वं पठन्तु कृपया जनाः से हास्योत्पत्ति करते हैं। प्रेमिका प्रकरण में राजनैतिक चिह्नों को जोड़कर अर्थध्वनि उत्पन्न किया गया, जो संस्कृत जगत् में सर्वथा नूतन प्रयोग है।
            यथा त्वं भाजपा चिह्नं प्रिय! मह्यं प्रदत्तवान्।
            अहं कांग्रेसचिह्नं तत् तुभ्यं दत्तवती तथा।।
            नर्मदा पुस्तक में एकविंशी शताब्दी समायाति में आधुनिक व्यवस्था, सामाजिक विषमता आदि पर तीखा हमला बोला है-
            श्वानो गच्छति कारयानके
                                   मार्जारः पर्यड्के शेते
            किन्तु निर्धनो मानवबालः
                               बुभुक्षितो रोधनं विधत्ते।
            बाढ़ की विभिषिका का वर्णन करते हुये लिखते है
            एतमेव जलप्रलयं द्रष्टुम्
            नेता सपरिवारम् उड्डयते।

यहाँ मेरा उद्देश्य शोध पत्र लेखन नहीं है, न ही एक पुस्तक से दो बनाना। उद्येश्य है संस्कृत में लिखे जाने वाले हास्य व्यंग्य विधा से आपको परिचित कराना। थोड़ी सूचना देना और आपसे अनुरोध करना कि संस्कृत में भी उच्च कोटि के साहित्य उपलब्ध हैं। संस्कृत में आज भी निरंतर लिखे जा रहे है। इसका अपना पाठक वर्ग तैयार हो। इसमें मेरा भी योगदान हो और आपमें भी संस्कृत साहित्य को पढ़ने की रुचि जगे। इति शम्।

शुक्रवार, 22 अगस्त 2014

संस्कृत क्षेत्र की चुनौतियाँ तथा समाधान-3

       कार्य छोटे-छोटे है पर दृष्टि नहीं जाती। संस्कृतज्ञों से परीक्षा, रोजगार, पुरस्कार आदि के प्रपत्र भी हिन्दी या अन्य भाषा में भरायी जाती है। यहाँ संस्कृत में करने में परेशानी क्या है? धन्यवाद गीता प्रेस को जिसने संस्कृत वाङ्मय को सुलभ बनाने का कार्य किया। रेलवे स्टेशन से लेकर छोटे-छोटे कस्बे तक अपनी पहुँच बनायी। संस्कृत कला, संस्कार और मानव मूल्यों की भाषा है। यह जितना कोमल भावों, उदात्त मूल्यों द्वारा मानव को पोषित करता है, अन्य नहीं। इसके उदात्त सन्देश को एकत्र कर समाज के सम्मुख रखें। आज की शिक्षा से मानव, दानवीय जीवन की ओर अग्रसर है। धनलोलुपता के कारण राष्ट्र, राष्ट्र के मानव खतरे में है। कहीं आतंकवाद तो कहीं अन्य अमानवीय कृत्य। क्या मनुष्य के जीवन का चरम लक्ष्य  ट्रेनिंग के अनुसार एक मशीन बनकर कार्य निष्पादन है। करुणा, ममता, सेवा भाव, मैत्री आदि प्राकृतिक गुणों का विकास नहीं ? विदेशी शरीर को सुख भोग का साधन मात्र समझते हैं। वहाँ वर्जना शब्द नहीं है। परिणामतः परस्पर अविश्वास, पाशविक कृत्य के लिए हिंसा देखी जाती है।
आवश्यक धन एवं संसाधनों के अभाव में हम खुद या कुछ संस्थाएँ अपनी सार्वत्रिक पहुँच नहीं बना सकते। उपाय जरुर ढूढ़ सकते हैं, जिससे हमारी पहुँच, मेरा सन्देश सर्वत्र जाय। संस्कृतज्ञों के लिए जरुरी मंत्र है ऐक्य। हम जिस भी सुर में गायें जो भी गायें सन्देश एक हो।
         कुछ स्वार्थी तत्वों ने हमें बदनाम किया है। वे संस्कृत ग्रन्थों के कुछ उद्वरणों को लेकर समूचे वाङ्मय को खारिज करने पर तुले हैं। उनसे सावधान। उनसे अनुरोध है कि सार-सार गहि रहे थोथा देई उराई। कार्यक्रम वजनदार करें। इसकी धमक दूर तक जाती है। शक्ति संचय कर एक दिशा में मोड़े। सुनामी का रुप दें। सभी अपसंस्कृतियां डूब जाएगीं। फुटकर आवाज दब जाती है।
     2011 की जनगणना केवल 14 हजार संस्कृतभाषी ? । संस्कृत क्षेत्र में रोजगार कितने कर रहे हैं? क्या उनकी मातृभाषा  संस्कृत नहीं हो सकती ? क्या हम पेयजल और स्वच्छता मंत्रालय से एक प्रोजेक्ट नहीं ले सकते। धर्मशास्त्रों, स्मृति ग्रन्थों में स्वच्छता के बारे में बहुतेरे दिशा निर्देश मिलते है। संस्कृत भाषा को भविष्योन्मुख बनाने के लिए अधोलिखित उपाय की आवश्यकता है।
1. संस्कृत भाषा को आधुनिक भाषा की श्रेणी में रखा जाय।
 2. आज के परिवेश के अनुकूल पाठ्यक्रम बनायें जायें।
 3. इनका शिक्षण वैज्ञानिक रीति से हो।
 4. बच्चों द्वारा घर आये अतिथियों को ए0 बी0 सी0 डी0 सुनवाना निन्दनीय है। इस प्रथा के जगह श्लोक सुनाने की परम्परा हो। 
 5. नियुक्ति में अयोग्य एवं अनुत्साही को स्थान न दें।
 6. संस्कृत डिग्री की सहारा लेकर लोग नौकरी तो पाते हैं, परन्तु प्रतिबद्धता नहीं होती है। आरम्भिक कक्षा में अध्यापनरत संस्कृत डिग्रीधारी शिक्षकों को चिहिनत कर प्रतिबद्धता के पाठ पढ़ाये जायें।
 7. परीक्षा नियमित और नियत समय पर हो।
 8. जनता संस्कृत के प्रौढ़ विद्वान् और कम पढ़े मंदिर के पुजारी के बीच का भेद समझ सके, इसके लिए दैनिक उपयोगी मंत्रों, श्लोकों से आम जन को परिचित कराया जाय।
 9. सरकारें अन्य भाषा के शिक्षकों को तो नियुक्त करती है। संस्कृत शिक्षकों की नहीं। संस्कृत के पारम्परिक विद्यालयों की दशा सुधारी जाय।
 10.  शान्ति, परस्पर मैत्री आदि सद्गुणों से युक्त सद्प्रसंग संग्रहीत कर अनेक ग्रन्थ का निर्माण हो।
11.  सरल भाषा युक्त बाल साहित्य निर्माण हो।

बुधवार, 20 अगस्त 2014

संस्कृत क्षेत्र की चुनौतियाँ तथा समाधान-2

संस्कृत भाषा का भाषाई इतिहास-
         संस्कृत भाषा के शास्त्रीय पक्ष का इतिहास प्राप्त होता है। लोग लिख भी रहे हैं परन्तु अब इसका राजनैतिकभौगोलिकआर्थिक इतिहास लिखे जाने की आवश्यकता है। भाषा के उत्थान और पतन के कारण एवं कारक तत्वों की भी पड़ताल करनी होगी ताकि नई पीढ़ी भाषाई विकास-पतन से परिचित हो सके। नई योजना के निर्माण के समय उनसे सीख ले सके। क्या कारण था कि बुद्व के समय पालि जनभाषा होते हुए भीधर्म प्रसार में सहायक होते हुए भी परवर्ती बौद्ध लेखकों को संस्कृत में लिखने पर विवश होना पड़ा।
            संस्कृत में शास्त्रीय दिशा देने वाले बहुतेरे गुरूजन हैं। कुछेक के पास किताबी ज्ञान के अतिरिक्त  अपना अनुभव सिद्व ज्ञान भी है। वे संस्कृत के बाधक तत्वों को उजागर करें। वे अपनी जीवनी लिखेंजिससे आगामी पीढ़ी को उनके अनुभव का लाभ मिल सके। आज अधिकांश संस्कृत के शीर्ष संस्थाओं के अध्यापकोंअधिकारियों में कलह है। कुलपति जैसे महत्वपूर्ण पद रिक्त हैं। अनुदान की धनराशि का एक बड़ा भाग लौटा दिया जाता है। यह सब बंद होना चाहिए। यहां पैसे की खातिर आपसी कलह और द्वेष हैं संस्कृत के लिए नहीं। इन समस्याओं को शासक हल नही करते। फूट डालो राज करो में उन्हें भी सुविधा होती है। हानि तो संस्कृत का होता है। अन्यथा आपसी कलह इतने नहीं होते। जरूरत है हर क्षेत्र में प्रतीक संस्थाप्रतीक संस्थाप्रतीक पुरूष का। जो अनुकरणीय होंमानवैभव से परे सर्वश्रेष्ठ हों। संस्कृत के लिए एक आन्दोलन की आवश्यकता है वेतन जीवी की अपनी सीमा और समस्या है। व्याख्यान अन्य कार्यक्रमों को यू ट्यूब पर डालें। अब समय बदला हैं। लोगों को घर बैठे टी0वीतथा अन्य माध्यमों से जानकारी मिलती हैं। यहां 40 लोग हैं इसे यदि यू ट्यूब पर डालें तो वर्ष भर में 100 लोग देखें। प्रति व्यक्ति खर्च देखें। सिनेमा जगत में संस्कृत का विकृत रूप देखने को मिलता है। हमारी सामग्री लेकर हमें ही दूर रखा है। वहां निर्माण से ज्यादा प्रमोशन पर खर्च होता है। आडियों विडियो घर-घर जाता है। संस्कृत में निरन्तर भ्रमण शील लोगों का अभाव है। पर्यटक स्थल तो जायेंगे परन्तु संस्कृत संस्थाओं व्यक्तियों व्यक्ति तक सुधि लेने भी नहीं जाते। पास के संस्थानों में तो जायें। संस्कृत में निहित ज्ञान सम्पदा से बच्चों को परिचित कराने के लिए छोठी-छोटी पुस्तकें लिखे जाने की आवश्यकता है। इसमें संस्कृत ग्रन्थों में उपलब्ध कहानियां हों। इसकी भाषा जो भी हो परन्तु कथ्य संस्कृत हो। आंचलिक संस्कृतियां को समेटने वाली कथा संस्कृत में अभाव है। अभी तक हम भाषा के विकास के लिए दीर्घ कालीन या अल्पकालीन नीति भी नहीं बना सके हैं। शिक्षा और संस्कार में फर्क है। रैदास के अजीविका का साधन कुछ और था जबकि रूचि का क्षेत्र कुछ और। हम बचपन में हीरोजगार परक ज्ञान के अतिरिक्त संस्कार परक ज्ञान की उपलब्धता सुनिश्चित करें तो परिणाम सुखद होगा। हमने अपने को युगानुकूल परिवर्तन नहीं किया।
संस्कृत भाषा का भौगोलिक विस्तार
        भारत के कोई भूभाग नहीं जहाँ सभी जातियों में संस्कृत के विद्वान पैदा न हुए हो। वे सभी हमारे पूर्वज रहे है। उन्होनें अपनी चिन्तधारा द्वारा सामाजिक समासत्ता स्थापित की। देश के आजादी में संस्कृतज्ञों का महान योगदान रहा है।
            यह देखना है कि संस्कृत भाषा की स्वीकार्यता किन-किन क्षेत्रों में कितनी हैवर्ष 1950 के पूर्व राज्यों के राजघरानों तथा अन्य अनेक शिक्षा केन्द्रों मठों द्वारा संस्कृत को संरक्षण प्राप्त था। प्रायः भारत के अनेक जनपद में एक अच्छा गुरुकुल एवं गुरुशिष्य परम्परा थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् गुरुकुलों में छात्र संख्या में कमी आती गयी वहाँ का प्रबन्धतन्त्र कमजोर हुआ। साकारी स्तर पर अनेक विद्यालयों प्रायः अनेक प्रान्तों में संस्कृत विश्वविद्यालय खेले गयेजिसकी संख्या आज 14 हो गयी है। परन्तु उच्च शिक्षा केन्द्रों में छात्र संख्या अत्यल्प रही बल्कि इतना कम की किसी आधुनिक पाठ्यक्रम के एक महाविद्यालय में उतनी ही छात्र संख्या हो। कारण संस्कृत का उद्गम स्थल स्रोत ही सूखते गये। वे गुरुकुल यह महसूस नहीं कर पायें अब देश जिस स्थिति में है उसे बदलकर हजार वर्ष पूर्व की स्थिति पैदा नहीं की जा सकती। वर्तमान सामाजिक स्थिति के अनुकूल जनसम्पर्क प्रचार माध्यम शैक्षणिक विषयों के आधुनिकी कारण एवं लेखन की आवश्यकता हैफलतः विश्वविद्यालय तो खुले परन्तु उसमें अध्ययेता नहीं मिले। अध्येता मिला तो उपेक्षित परित्यक्त जनसमूह अध्ययनार्थ आये। उनसे संस्कृत का कल्याण सम्भव नहीं है। मध्यकाल में आर्थिक रुप से कमजोर लोगों की भाषाशिक्षा संस्कृत थी। आर्थिक समस्या दूर होने पर बुद्विमान बालकों ने शास्त्रों को ठीक से अधिगम किया।
            यूपीसरकार वर्ष 13-14 में यहाँ 10 हजार मदरसों के लिए रु 1,300 करोड़ दिया। हैं।  संस्कृत छात्रों को रोजगार नहीं दिया जा रहा है। संगठन के अभाव में छिटपुट आन्दोलन हो रहा है। यही हाल शिक्षा शास्त्री के छात्रों के साथ भी है। संस्कृत का जितना नुकसान मुगलकाल में नहीं हुआ उससे कहीं अधिक नुकसान मैकाले शिक्षा प्राप्त अधिकारियों ने किया है। घंटे दो घंटे के आयोजन से न तो जन चेतना जागृत होनी है न ही किसी समस्या का समाधान निकलना है। चुनौती का विषय विस्तृत है ।इस पर अहर्निश चिन्तन और समाधान की आवश्यकता है।
संस्था/संगठन
      आज संस्कृत भाषा सिर्फ भाषा और साहित्य तक सिमट गया अन्य विषयों की चर्चा पाठ्यक्रमों में भी नहीं की जाती है। किसी दूसरे द्वारा लिखित कविताओं को आजीवन अन्य भाषा में वांचने के सहारे अपनी उदरपूर्ति करने वाले ग्रन्थ जीवी संस्कृत सैनिकों एवं संस्थाओं द्वारा संस्कृत के विकास की अपेक्षा करना बेमानी है। हमे इस सोच वाले व्यक्तियों को तलाशना होगा जो इस प्रकार की योजना बनायें। लोगों को जोड़ सकें। ऐसी संस्था चाहिए। पृथक संस्था तथा समूह हो। कितने संस्कृत लोग पढ़े दुराचारी है और जेल में बंद है बस यही भर प्रचार कर लें। हमने कितनी संस्था बनायी। हितों की रक्षा के लिए आन्दोलन किये। बुद्विजीवियों को प्रशंसक बनाया। गोरक्षपीठरामानन्द का प्रसार गाँव-गाँव भिक्षाटन का उसी का खाकर अपना सन्देश दिया ऐसे कार्यकर्ता चाहिए। अब तो अपना पैसा देकर हम अन्य भाषा का विज्ञापन तक रख देते है। आपने इसका प्रतिरोध किया। ध्यान दिया। स्वभाषा की शर्त रखी। पर्यटन स्थल या अन्य क्षेत्र में। संस्कृत की दृष्टि विकसित करनी होगी। अपने परिवेश जुड़े और जुड़ने वाले लोगों में अपनी उपस्थिति दर्जं करायें विक्रेता या अन्य लोंगों में।संस्कृत ग्रन्थों में वर्णित परिधानों के रंगस्वरुप आदि के आधार पर वस्त्र सज्जा निर्मित किया जा सकते हैं।
          मैं कहता हूँ संस्कृत को अनुवाद की भाषा नही सम्वाद की भाषा बनाइये। मैं अपने मित्रों से भाषायी विकास के मुद्दे पर आंशिक सहमत होते हुए भी व्यापक परिधि के दृष्टिगत पूर्णतः असहमत हूॅ। एक मित्र का सुझाव था अनुवाद प्रतियोगिता करायी जाय। कोई एक संस्था कितने लोगों के बीच यह प्रतियोगिता करा पायेगी। इसके स्थान पर ऐसा क्यों न किया जाय कि प्रत्येक विद्यालय से प्रकाशित होने वाले वार्षिक पत्रिका में बच्चे संस्कृत में लेख लिखें।   विद्यालयों में तीन भाषा पढ़ायी जाती है हिन्दीअंग्रेजीसंस्कृत। हिन्दी अंग्रेजी विभाग तो उसमें होते है परन्तु संस्कृत नहींआखिर क्योंहमें विद्यालयों को एक गाइड लाइन भिजवाना चाहिए। आखिर प्रत्येक व्यक्ति और भाषा को समान अवसर दिये जाने के अधिकार से संस्कृत भाषा को वंचित क्यों रखा जाता है। हममें आत्मविश्वास की कमी है। चिन्तकों की कमी है। नित नये प्रयोग की कमी है। नववर्ष तो संस्कृतज्ञ याद रखते हैपरन्तु संस्कृत दिवस नहीं। कितना एसएमएसभेजा जाता है। प्रत्येक संस्कृतज्ञ अपने परिचितों को संस्कृत दिवस पर एसएमएसभेजें तो संख्या करोड़ों में हो। व्यापक आधार सृजित करने के लिए खुद कार्य करें। संदेशथीमसोच मुहैया करायें। उन्हें सक्षम बनायें कि हर व्यक्ति संस्थागत रुप ले ले। तभी ज्यादा क्षेत्र कवर कर पायेंगें।
आप खुद संस्कृत का ग्राहक बनों संस्कृत आपकी समस्या नहीं दूसरे की समस्या है वे सीखें।
लेखक               
        हमारे पास इस प्रकार का कोई डाटा भी उपलब्ध नहीं है कि संस्कृत भाषा में लेखकों की संख्या बढ़ रही है या घट रही है। प्रतिवर्ष प्रकाशित होने पुस्तकों की संख्या कितनी हैउसकी गुणवत्ता कैसी हैसंस्कृत अध्येताओं की संख्या की स्थिति क्या है। हम यहाँ केवल कक्षा में जाने वाले संस्कृतज्ञों की चर्चां नही कर रहे।
            नई तकनीकि के कारण चायनीजजापानीअंग्रेजीजर्मन आदि भाषाओं ने ज्यादा विस्तार पाया है। असली दो चुनौतियाँ है। संरक्षण की 2 आम बोलचाल के करीब तथा जनोपयोगी संस्कृत की। संस्कृत में भी कुछ लेखकों ने अपनी साहित्यिक कृति (मैं सिर्फ साहित्यिक कहा दर्शन आदि नही) संस्कृत के आम बोलचाल भाषा में लिख रहे है। देवनागरी में यूनीकोड देर से आया। अब कम्प्यूटर द्वारा भाषा आम पाठक तक पहुँचा है।
            संस्कृत की कविता ऐसी हो कि श्रोता को शब्दार्थ की आवश्यकता न हो। जब भाव का सम्प्रेषण ही नही हो पाएगा तो काव्य का आनन्द ही नहीं मिलेगा। साहित्य सृजन के समय यह भी ध्यान रहे पहले कुछ लोगों के लिए काव्य रचे जाते थे परन्तु अब काव्य आम जन के लिए लिखा जाता है। आज का आम जन उसमें अपने जैसा सामाजिक वातावरण और नायक को ढूढ़ता है।
            हम लोग व्याख्यानकार्यशाला का बहुतेरे आयोजन करते है और करके भी भूल जाते है। आने वाली पीढ़ी के लिए सिर्फ यदा कदा पत्रिका छाप दी जाती है। क्या यह पर्याप्त है। क्या इस पर लघु वृत्त चित्र नही बनायें जा सकते है?
नोट- इस विषय पर मेरा आगामी लेख पढ़ने के लिए यहाँ चटका लगायें

मंगलवार, 19 अगस्त 2014

संस्कृत प्रचारक संस्थाओं के लिए दृष्टि पत्र

1. संस्कृत प्रसारक संस्थाएँ अपने भवन के प्रत्येक कक्ष का नामकरण संस्कृत के महापुरुषों के नाम से करें। प्रत्येक कक्ष       के द्वार पर महापुरुषों के नाम लिखाये जायें।
2. प्रचारक संस्थाओं में स्थित वनस्पतियों, पेड़ों आदि के नाम संस्कृत में लिखवाकर प्रदर्शित करें।
3. अपने-अपने परिसर में प्रेरणादायी संस्कृत सूक्तियों की पट्टिकाएं यत्र-तत्र प्रदर्शित करें।
4. संस्कृत केे प्रति वहां के कर्मचारियों में दृष्टि विकसित करने हेतु संस्कृत वैचारिक अधिष्ठान प्रशिक्षण कराये जाये,          ताकि उनमें संस्कृत के प्रचार-प्रसार के प्रति दृष्टि, लक्ष्य, संसाधनों के समुचित प्रयोग के निर्णय का सामथ्र्य             विकसित     हो सके। वे वैचारिक अधिष्ठान के रुप में कार्य कर सके। संस्कृत जगत उनसे सुपरिचित हो तथा इस           क्षेत्र की  ऐतिहासिकता, घटनाओं के बारे में इन्हें पुष्ट जानकारी रहे।
5. यथासंभव संस्कृत के विद्वानों के साथ संस्कृत में पत्राचार किया जाय। उन विषयों को छोड़कर, जिसमें वित्तीय              व्यवस्था सम्मिलित हो। यथा- सूचना, आमंत्रण विषयक आदि।
6. संस्थाएं अपने अपने प्रदेश के संस्कृत के शैक्षणिक संगठन एवं विद्वानों का भौगोलिक आधार पर विवरण तैयार             कराये।
7. देश के संस्कृत सेवी संस्थाओं, विद्वानों,इस क्षेत्र में कार्यशील व्यक्तियों की सूची तैयार करायी जाय, जिसमें उनके             कार्यस्थल एवं आवास के पते, दूरभाष संख्या, ई-मेल, वेबसाइट (यदि संचालित कर रहे हों तो) का एकत्र               संग्रहण कराया जाय।
8. संस्थान के गतिविधियों के प्रचार-प्रसारार्थ (सूचनाओं के प्रसारण) व्यवस्था निर्मित की जाय। इन्हें जन सम्पर्क,          संस्था सम्पर्क, पत्रकारिता के क्षेत्र में सम्पर्क (विशेषतः संस्कृत एवं आॅनलाइन प्रसारित होने वाली) की व्यवस्था       निर्मित की  जाय।
9. जिस लक्ष्य को लेकर कार्य किये गये उसके परिणाम का विश्लेषण तथा अनुवर्तन।
10.कार्यक्रमों को अलग-अलग मंडलों में आयोजित किया जाना।
     सार्वजनिक उपयोग के लिए ई बुक्स, अन्तर्जाल पर लेखन, संस्कृत के अप्लीकेशन, टूल्स निर्मित करने वाले को             पुरस्कृत किया
1. प्रकाशन
1.1 पुस्तक प्रकाशन
1.1.1 संस्कृत वाङ्मय के विविध विषयों पर अलग-अलग छात्र संस्करण पुस्तक लिखाया जाय। कई विषयों के उपविभाग की भी आवश्यकता है।
1.1.2 संस्कृत के लगभग सभी विषयों की एकत्र जानकारी देने वाला एक पुस्तक प्रकाशित हो।
1.1.3 संस्कृत षड्दर्शन पर एक पुस्तक प्रकाशित हो।
1.1.4 संस्कृत शास्त्रों पर पुस्तकें प्रकाशित करायी जाय।
1.1.5 लेखकों से संस्कृत पुस्तकों के प्रकाशनार्थ पाण्डुलिपियां आमंत्रित हो।
1.1.6 बच्चों के उपयोगी संस्कृत हिन्दी, हिन्दी संस्कृत कोश प्रकाशित हो।
1.2 उपर्युक्त का ई-बुक्स भी तैयार कराये जायें।
1.3 पुस्तकों के आॅनलाइन विक्रय की व्यवस्था पर विचार किया जाय।
1.4 प्रकाशित पुस्तकों के परिचायत्मक विवरण सहित सूची पत्र प्रकाशित किया जाय।                                       1.5 पुस्तक क्रेताओं को सूचीबद्व कर निःशुल्क पुस्तक सूची भेजी जाय। अन्य प्रकाशकों के ई-मेल आई0डी0 पर          पुस्तक  के चित्र के साथ परिचायत्मक विवरण, मूल्य, छूट आदि के विवरण भेजे जायें।
1.5.1 अन्तः कार्य के क्रम 7 की सूची की अनुसार उन्हें भी नवीन पुस्तक, पत्रिका प्रकाशन की सूचना, लेख आमंत्रण             आदि प्रेषित किया जायें।
1.6 संस्कृत में उपलब्ध बाल कथा साहित्य को हिन्दी भाषा में अनुदित कराया जाय।
1.7 अन्य भाषा में उपलब्ध बाल कथा साहित्य को संस्कृत में अनुवाद हेतु 30 वर्ष से कम आयु वर्ग के छात्रों को                 विज्ञापन के माध्यम से आमंत्रित किया जाय। योग्य पाये जाने पर प्रति पृष्ठ की दर से पारिश्रमिक देकर प्रकाशन           कराया जाय।
 2.  संस्कृत के अध्येता ही नहीं, आग्रहकर्ता का भी निर्माण हो।
2.1  संस्कृत के हित चिन्तकों को चिहिनत कर उनके चिन्तनधारा का प्रायोगिक परीक्षण किया जाय। परानुभूति              का लाभ लें।
3       अन्तर्जाल पर संस्कृत को बढ़ावा देने वाले व्यक्तियों, संस्थाओं को सूचीबद्ध कर प्रोत्साहन दिया जाय।
3.1   ऐसे व्यक्ति जो अन्तर्जाल द्वारा संस्कृत के संरक्षण एवं प्रचार-प्रसार के क्षेत्र में कार्य कर रहे हों उन्हें पुरस्कार                प्रक्रिया में सम्मिलित किया जाय।
3.2   बेवसाइट को जनोपयोगी बनायें। इसमें अध्ययन सामग्री को भी जोड़ें । (सम्प्रति यह केवल सूचनात्मक है।)
3.3   वेबसाइट पर संस्कृत के प्रशिक्षण (ट्यूटर) पुरोहित, ज्योतिषी आदि को सूचीबद्ध करने के लिए उनका                          परीक्षण करा लिया जाय।       
3.4    संस्था में उपलब्ध पुस्तकों एवं पाण्डुलिपियों की सूची को आॅनलाइन किया जाय।
4.      संस्कृत सम्भाषण शिविर
4.      संस्कृत सम्भाषण शिविर के लिए अनुकूल क्षेत्र विशेष को चिहिनत किया जाय।
4.1    अनुकूल एक क्षेत्र के निवासियों में तब तक सम्भाषण शिविर चलाये, जबतक कि 70    प्रतिशत से अधिक                  आबादी संस्कृत बोलने में सक्षम न हो जाय।
4.2  संस्कृत सम्भाषण शिविर के उदेश्यों की पूर्ति एवं जन उपलब्धता के लिए दृश्य श्रव्य संसाधन अन्य टूल्स                  विकसित किये जायें। सहज और सरल साहित्य आदि भी (यथा  संस्कृत की पत्रिकाएं आदि) उपलब्ध कराये जायें।
4.3       संस्कृत सम्भाषण प्रशिक्षण पाठ्यक्रम एवं पाठ्योपकरण का निर्माण हो।
4.4       प्रशिक्षित प्रशिक्षकों को सुनिश्चित अवधि (दीर्घ अवधि तब तक के लिए जब तक कि लक्ष्य प्राप्त न हो जाय)          के लिए नियोजित किया जाय।

            संस्कृत के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के बारे में यदि आपने कोई सर्वहितकारी कार्ययोजना बनायी है और विश्वास हो कि न्यून जन धन संसाधन के वावजूद यदि इसे लागू किया जाय तो इसके टिप्पणी अनुच्छेद में जाकर अनुमानित व्ययाकलन के साथ अपनी कार्य योजना से अवगत करायें।

             लेख की रेटिंग करना नहीं भूलें।
                 जगदानन्द झा