शनिवार, 18 जनवरी 2014

ब्रह्मसूत्र के भाष्यकारों की दृष्टि में ब्रह्म एवं जगत्

       ब्राह्मणों और आरण्यकों की सुविचारित मान्यताओं का सूत्रीकरण वेदान्त सूत्रों के रूप में किया। व्यास जी ने उपनिषदों के सार को पुराणों के अन्तर्गत उन आध्यात्मिक एवं दार्शनिक विचारों के रूप में संकलित किया जो स्मार्त प्रस्थान तथा नारायणीय धर्म मूलक वैष्णव प्रस्थान श्रीमद्भागवत् आदि के रूप में परिणत हुए। वेद व्यास ही एक ऐसे महर्षि कोटि के व्यास थे जिन्होंने ब्रह्मसूत्र के समान अत्यन्त महत्वपूर्ण वेदान्त दर्शन पर महान ग्रन्थ बनाया। 
    ब्रह्मसूत्र पर समय-समय पर अनेक भाष्य लिखे गए तथा वर्तमान में 11 भाष्य उपलब्ध हैं। ब्रह्म सूत्र पर वैष्णव सम्प्रदाय के 12वीं शताब्दी के आचार्य रामानुज के विचारों को विशिष्टाद्वैत के नाम से जाना जाता है। आचार्य शंकर के अद्वैतवाद के प्रतिवाद के रूप में विशिष्टाद्वैत का प्रचार एवं प्रसार हुआ। विशिष्टाद्वैत के आचार्यों की ब्रह्म विषयक धारणा शंकाराचार्य की अपेक्षा अतिशय उदार प्रतीत होती है। यह दर्शन चिद् (जीव) अचित् (प्रकृति) एवं ईश्वर से विशिष्ट होने के कारण ही विशिष्टाद्वैत कहलाया। जीव एवं प्रकृति जो क्रमशः चित् एवं अचित् तत्व हैं, ईश्वर अंशी के ही अंश हैं। दोनों में सेवक स्वामी सम्बन्ध है। जीव ईश्वर के अधीन है, ईश्वर स्वतन्त्रत है। विशिष्टाद्वैत में ब्रह्म एवं ईश्वर में कोई तात्विक भेद नहीं है। ब्रह्म से ही जगत उत्पन्न होता है और ब्रह्म में ही लीन हो जाता है। इस दर्शन का आधार ज्ञान-क्रिया एवं भक्ति है। विशिष्टाद्वैत दर्शन में जगत उतना ही सत्य है, जितना ईश्वर। रामानुज के अनुसार जिसमें वृहत्तम गुण हो वही ब्रह्म है; बृहत्त्व का अर्थ है- स्वरूप और गुणों का आतिशय्य। निखिल दोषों से रहित, असंख्य कल्याण-गुणों से युक्त, सर्वेश्वर पुरूषोत्तम ही ’ ब्रह्म’ शब्द का अभिधेय है और वही ’जिज्ञासा’ का कर्मभूत है। 
ब्रह्मशब्देन स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकातिशयासंख्येयकल्याणगुणगणः पुरूषोत्त्मोऽभिधीयते सर्वत्र बृहत्त्वगुणयोगेन ब्रह्मशब्दः। बृहत्त्वं च स्वरूपेण गुणैश्च यत्रानवधिकातिशयं सोऽयं मुख्योऽर्थः। स च सर्वेश्वर एव। अतः सर्वेश्वरो जिज्ञासाकर्मभूतं ब्रह्म। श्री भाष्य 1/1/1
रामानुजाचार्य के अनुसार ब्रह्म सत्य है। वस्तुतः ब्रह्म निष्फल, निष्क्रिय, शान्त, निरवद्य और निरंजन है अर्थात् ब्रह्म शब्द का तात्पर्य ही है समस्त दोषों से रहित, समस्त कल्याणकारी गुणों का आगार पुरूषोत्तम। यही ब्रह्म जब माया से आच्छन्न हो जाता है, तब ईश्वर कहलाता है। जगत की सृष्टि स्थिति और लय का कारण यही ईश्वर है। वेदान्त में स्थूल, सूक्ष्म चिद्चिद् सभी परब्रह्म के शरीर है और सभी का करण ब्रह्म है तथा जीव उसका कार्य है। जीव की तरह ही ब्रह्म को शरीरी कहा गया है अतः जीव के समान सुख-दुख आदि भोगों में अनिवार्य रूप से आसवत होगा। शरीरी जीवों में शरीरगत वालत्व, स्थविरत्व आदि विकारों के न होते हुए भी धातु वैषम्य से सुख-दुख होते देखा जाता है। श्रुति के अनुसार- ’’न ह वैसशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपह् तिरस्ति अशरीरं वा बसन्तं न प्रियाप्रिये स्पृरातः।’’ 
ब्रह्म के अतिरिक्त सम्पूर्ण जगत कार्यरूप होने से मिथ्या है- ऐतदात्म्यमिदं सर्वतत्सत्यम्- ’’नेहनानास्ति किंचन् मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेवपश्चति’’ यह सारा जगत ब्रह्मात्मक है, वह ब्रह्म ही सत्य है, ’’इस ब्रह्म एवं जगत में कोई भेद नहीं है, जो लोग इसमें भेद देखते हैं वे बार-बार मृत्यु को प्राप्त होते हैं। ब्रह्म ही जीव भाव से समस्त शरीरों में जीवत्व की अनुभूति करते हैं इसलिए वह तो मिथ्या हो ही नहीं सकता।’’ 
वस्तुतः जीव ब्रह्म से भिन्न तो है नहीं इसलिए वह स्वभाव से विशुद्ध है, फिर भी कृपाणादि में प्रतिबिम्बित मुख में जैसे मलिनता आदि दोष दीखते हैं, वैसे ही विशुद्ध जीव में दोष आरोपित होते हैं, इसलिए उसकी काल्पनिक अविद्याश्रयता भी होती है। प्रतिबिम्बगत मलिनता आदि की तरह जीवगत दोष भी भ्रांतिमात्र ही है यदि ऐसा न हो तो जीव की कभी मुक्ति हो ही नहीं सकती। 
जीव और ब्रह्म का स्वाभाविक भेद है, शारीरिक भेद धातु वैषम्य के कारण जो जीव को सुख-दुखादि का अनुभव होता है, उसका शरीरी होना नहीं हैं, अपितु पुण्य-पाप रूप कर्म ही उसका कारण होता है। 
रामानुजाचार्य ने सृष्टि को ब्रह्म की भाँति ही सत्य माना है। सृष्टि या जागत का उपादान कारण ब्रह्म है। उनके मतानुसार सृष्टि और प्रलय से तात्पर्य ब्रह्म के स्थूल एवं सूक्ष्म रूपापन्न होने से है। सृष्टि तथा प्रलय केवल सापेक्ष है और उसी एक ब्रह्मरूपी कारणात्मक तत्व का द्योतन करते हैं। 
आचार्य रामानुज ने श्रीभाष्य में कहा है- ’’अतः सर्वावस्थं ब्रह्म चिद्चिद् वस्तु शरीरमिति सूक्ष्म चिद्चिद् वस्तुशरीरं ब्रह्मकारणं, तदेव ब्रह्म स्थूल चिद्चिद् वस्तु शरीरं जगदाख्यं कार्यमिति।’’ प्रलय काल में विषयों के अभाव में जीव जगत् दोनों सूक्ष्म रूप धारण कर लेते हैं। उस समय ब्रह्म इन सूक्ष्म जीव जगत से (चित् तथा अचित्) से विशिष्ट रहता है। सृष्टि दशा में ये दोनों व्यक्त रूप अर्थात् स्थूल रूप धारण कर लेते हैं। फलतः इस अवस्था में ब्रह्म स्थूल चित् तथा अचित् से विशिष्ट रहता है। तात्पर्य यह है कि उत्पत्ति, स्थिति, और विनाशशील होते हुए भी जगत सत्य ही है। डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन् ने रामानुज की सृष्टि सम्बन्धी धारणा के विषय में लिखा है- जब प्रभु की इच्छा से सृष्टि की रचना प्रारम्भ होती है, तब प्रकृति सूक्ष्म अवस्था से स्थूल अवस्था में परिणत हो जाती है, और आत्माएं उन भौतिक शरीरों में प्रविष्ट हो जाती है, जो उन्हें उससे पूर्व के जन्मों में किए गए पुण्य या पाप कर्मों के अनुसार प्राप्त होते हैं। इस प्रकार आत्माओं तथा प्रकृति के सम्पर्क से मुक्त ब्रह्म व्यक्त होकर कार्यावस्था में आ जाता है। 
डा0 उमेश मिश्र के अनुसार ’’पहले महत् की उत्पत्ति होती है, इससे अहंकार उत्पन्न होता है। जिसके तीन भेद हैं- वैकारिक, तैजस्य और भूतादि। वैकारिक और भूतादि से छः ज्ञानेन्द्रियाँ (मनसहित) और कर्मेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं।
आर0जी0 भण्डारकर के अनुसार - ’’सृष्टि से पूर्व परमात्मा का शरीर सूक्ष्म रूप में उपस्थित रहता है तथा सृष्टि के समय यह विद्यमान जगत् के रूप में विकसित होता है। इस सन्दर्भ में डा0 दास गुप्ता का विचार है- ’’कार्य कारण की केवल बदली हुई अवस्था है और इसीलिए जड़ और जीव रूप से प्रकट जगत जो ईश्वर की देह है, इसे केवल इसलिए कार्य माना है, यह कार्य रूप से प्रकटावस्था के पूर्व ईश्वर में सूक्ष्म और निर्मल अवस्था में विद्यमान था। 
स्पष्ट है कि श्रीरामानुजाचार्य कार्य की सत्ता करण में निहित मानते हैं। रामानुज की सृष्टि विषयक धारणा को डा0 सर्वपल्ली राधाकृष्णन् एवं डा0 दास गुप्ता दोनों ने ही सत्कार्यवाद आधारित माना है। ’’रामनुज सत्कार्यवाद के सिद्धान्त को स्वीकार करते हैं। प्रत्येक कार्य यह संकेत करता है कि उसका उपादान (भौतिक) कारण पहले से विद्यमान था।
आचार्य वल्लभ ने ब्रह्म को सविशेष माना है। उनके अनुसार सविशेष श्रुतियाँ सोपाधिक या अपर- ब्रह्म का नहीं, अपित मुख्य और पर- ब्रह्म का प्रतिपादन करती हैं। वे ब्रह्म की कोई उपाधि नहीं स्वीकार करते अतः ब्रह्म के औपाधिक रूप या धर्म का कोई प्रश्न ही नहीं उठता। ब्रह्म ’सर्ववेदान्तप्रत्यय’ अर्थात् समस्त वेदों का अर्थभूत है। अनेक रूपों का निरूपण करने वाली श्रुतियों से उसका ही ज्ञान होता है- ’’अनेकरूपनिरूपकैः सर्ववेदान्तैः प्रत्ययो ज्ञानं तत्तथा।’’ वल्लभ ने विशुद्ध ब्रह्म को ही उपास्य माना है तथा सविशेष और निर्विशेष दोनों ही श्रुतियों को ब्रह्म परक माना है। इन द्विविध श्रुतियों के आग्रह पर विशुद्ध ब्रह्म का स्वरूप सविशेष और विरूद्धधर्माश्रय सिद्ध होता है- ’अचिन्त्यानन्तशक्तिमान’ और ’सर्वभवनसमर्थ’ ब्रह्म के स्वरूप में श्रुति के द्विविध कथन कोई विरोध उत्पन्न नहीं करते-
’’न च विरूद्धवाक्यानां श्रवणात् तन्निद्र्धारार्थं विचारः। उभयोरपि प्रामणिकत्वेनैक- तरनिद्र्धारस्याशक्यत्वात् अचिन्त्यानन्तशक्तिमति सर्वभवनसमर्थे ब्रह्मणि विरोधाभावाच्च।’’- अणुभाष्य 1/1/1 
आचार्य वल्लभ के अनुसार ब्रह्म को निर्द्धर्मक नहीं माना जा सकता; धर्मरहित मानने पर तो वह अनुपास्य, अप्राप्य और अफल हो जाएगा -
’’निर्द्धर्मकत्वे सर्वेषामनुपास्योऽप्राप्योऽप्राप्योऽफलश्च स्यात्।’’ 
त.दी.नि. 1/67 पर ’प्रकाश’। 
वल्लभ ने ’अस्थूल’ आदि वाक्यों में लौकिक धर्मों का निषेध कर ब्रह्म की लोक से विलक्षणता बतायी है। श्रुति सर्वत्र लौकिक का निषेध और अलौकिक का विधान करती है। इस प्रकार जगद्वैलक्षण्य अर्थात् ब्रह्म की जगत से भिन्नता होने से ब्रह्म में लौकिक धर्मों का ही निषेध मानना चाहिए, तत्प्रकारक स्वरूप-धर्मों का नहीं। - 
’तथा च जगद्वैलक्षण्यबोधनेन तत्प्रकारका धर्मा निशिध्यन्ते, न तु तत्सदृशाः स्वरूपधर्मा अपि......’ - अणुभा. 3/2/22
’अथातो’ ब्रह्मजिज्ञासा’ से ब्रह्मत्व की जिज्ञासा होने पर ’जन्माद्यस्य तयः से उसका जो लक्षण प्रस्तुत किया गया है, वह भी जगत्कर्तृत्वादिरूप ही है, इसलिए ब्रह्म में अप्राकृत दिव्य गुणों की स्वीकृति श्रुति के सर्वथा अनुकूल है। 
वल्लभ के अनुसार ब्रह्म परस्पर विरूद्ध धर्मों का आश्रय है, वह एक ही साथ परस्पर विरूद्ध धर्माें का ही आश्रय बन सकता है, इसलिए उसे ’अनन्तमूर्ति कहते हैं। वह एक साथ विरोधी गुणों और क्रियाओं का आश्रय है, अतः उसे युक्ति से नहीं जाना जा सकता। वह आत्मतत्व चिद्रूप है। यह चिद्रूपता परिस्थितिजन्य आगन्तुक धर्म नहीं है, अपितु ब्रह्म का स्वभाव ही है। उनके अनुसार ब्रह्म केवल ज्ञान ही नहीं अपितु ज्ञानवान भी है। वह सत् चित और आनन्द स्वरूपभूत धर्म है- ’’सच्चिदानन्द स्पमिति। ब्रह्मेति धर्मिनिर्देशः परब्रह्मवाचकः।’’ वह अक्षरब्रह्म पुरूषोत्तम का अधिष्ठान है, अतः प्रतिष्ठा स्वरूप भी है। आनन्द ब्रह्म का धर्म है अतः ’आनन्द’ पद से गुणी अर्थात ब्रह्म का निर्देश किया जाता है - 
’’यदप्युक्तं निर्विशिष्टं ब्रह्मात्र विवक्षितमिति, तदप्युक्तम्। आनन्दगुणस्य ब्रह्माणो विवक्षितत्वात्। एतएवोत्तरत्र केवलेन गुणवचनेन गुणी निर्दिश्यते। भा.भा. 1/1/19
वह जीव का संस्कर्ता लब्धव्य या प्राप्य रूप है अतः उसको सर्वथा अचिन्त्य अचाक्षुष और वाङ्मनसागोचर नहीं माना जा सकता। वह साकार तो है परन्तु सशरीर नहीं है। वह हिरण्य अर्थात् आनन्दमयत्व स्वरूप वाला है- ’’आनन्द एव ब्रह्मणि रूपस्थानीयः।’’ उन्होंने यथाअवसर परमसत्ता को पुरूषोत्तम, भगवान, ब्रह्म, परमात्मा, श्रीकृष्ण, हरि आदि विभिन्न नामों से सम्बोधित किया है। ब्रह्म सर्वात्मक है, अतः गुणों की भी आत्मा है, गुणों का सर्जक है। गुण ब्रह्मात्मक हैं, ब्रह्म गुणात्मक नहीं हैं। ब्रह्म में किसी प्रकार के भेद की शंका नहीं करनी चाहिए, वह एक अखण्ड और पूर्ण सत्ता है। 
आचार्य वल्लभ ’जन्माद्यस्य यतः’ तथा ’शास्त्रयोनित्वात्’ इन दो सूत्रों को एक सूत्र मानकर यह अर्थ करते हैं कि इस जगत का उद्भव, स्थिति और विनाश जिससे होता है, वह ब्रह्म है, शास्त्र (वेद) इस विषय में प्रमाण हैं- 
शास्त्रे योनिः शास्त्रयोनिः शास्त्रोक्तकारणत्वादित्यर्थः -अुणभा. 1/1/2
ब्रह्म का कर्तृत्व अलौकिक है, क्योंकि वह देहादिअभ्यासजन्य नहीं है। ब्रह्म सृष्टि का कत्र्ता होने के साथ साथ उसका अभिन्ननिमित्तोपादान कारण भी है। जिस प्रकार लूता अपने जाल का निमित्तकारण भी है, और उपादानकारण भी, उसी प्रकार ब्रह्म भी इस प्रपंच का उपादान कारण और निमित्त कारण दोनों ही है। श्रुति ’आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्। नान्यत् किंचन मिषत्’ (ऐ. 1/1/1); ’सदेव सोम्योदमग्र आसीदेकमेवाद्वितीयम्’ (छां 6/2/1) इत्यादि केवल ब्रह्म का ही सत्यत्व प्रतिपादित करती है। ब्रह्म के अतिरिक्त और कोई तत्व है ही नहीं अतः ब्रह्म से भिन्न किसी वस्तु का उपादान अथवा निमित्तकारणत्व है ही नहीं-
जगतः समवायि स्यात् तदेव च निमित्तकम्। 
कदाचिद्रमते स्वस्मिन् प्रपंचेऽपि क्वचित्सुखम्।।
त.दी.नि 1/69
वल्लभ सृष्टि को ब्रह्म का वास्तविक परिणाम मानते हैं जो आभासवाद या प्रतिबिम्बवाद के सर्वथा विपरीत है। वल्लभ सृष्टि का प्रयोजन लीला ही स्वीकार करते हैं। जिस प्रकार संसार में राजा आदि मृगया करते हैं, मांसाहरण अथवा अन्य किसी प्रयोजन से नहीं अपितु केवल मनोरंजन मात्र के लिए’ उसी प्रकार ब्रह्म भी लीला के लिए ही इस सारे प्रपंच का विस्तार करता है। वल्लभ के अनुसार उपाधि रहित ब्रह्म ही सृष्टि का कर्ता है और कर्ता को स्वतंत्र होना अवश्यक है। ब्रह्म ही तन्तुनाभ की तरह इस सृष्टि का अभिन्न-निमित्तेपादान कारण है; साधारण कारण भी वही है। यह सृष्टि ब्रह्म का वास्तविक परिणाम है, अतः ब्रह्म की ही भाँति सत्य और पारमार्थिक है।