लिंगानुशासन (शब्दों के लिंग ज्ञान करने का शास्त्र)

जैसे हिन्दी के वाक्य प्रयोग में लिंग का ज्ञान आवश्यक हो जाता हैं, वैसे ही संस्कृत भाषा के वाक्य प्रयोग में भी लिंग का ज्ञान आवश्यक है। यह प्रश्न तब और जटिल हो जाता है, जब किसी वस्तु का लिंग ज्ञान शारीरिक विशेषताओं से नहीं हो पाता। प्राणियों में लिंग का ज्ञान करना सरल होता है, परंतु निर्जीव वस्तुओं में लिंग का ज्ञान अत्यंत ही कठिन होता है। प्राचीन काल में मानव जड़ पदार्थ में भी चेतन पदार्थ के समान लिंग का व्यवहार करते थे। वैदिक ग्रंथों में एक ही शब्द के लिए अनेक लिंगों के प्रयोग किए गए। अभी भी एक शब्द का अनेक लिंग होता है। जैसे तटः, तटी, तटम् । अमृत के लिए पीयूषम्, अमृतम् (नपुंसक) तथा सुधा (स्त्री लिंग) का प्रयोग होता है। सूर्य की किरण के पर्याय मयूखः, अंशुः (पु.) मरीचिः (स्त्री. पु.) दीधितिः (स्त्री) का अलग- अलग लिंग होता है। बाद में अभिधान कोष, अमर कोष जैसे ग्रंथों तथा वृद्ध व्यवहार से लिंगों का निर्धारण शुरू हुआ। इसके लिए अनेक लिंगानुशासन ग्रंथों की रचना की गई। स्मरणीय है कि शब्दों के लिंग निर्धारण में व्याकरण शास्त्र की उपयोगिता लगभग शून्य है। संस्कृत भाषा के शब्दों में वस्तु के लिंग (स्त्रीत्व, पुंस्त्व) चेतनता या जड़ता का सम्बन्ध नहीं होता। यहाँ शब्दों के आंशिक अर्थ विस्तार के कारण भी लिंग परिवर्तन देखा जाता है। जैसे- नपुंसक लिंग में सरस् शब्द तालाब या छोटी झील के अर्थ में प्रयुक्त होता है, परन्तु बड़ी झील के लिए इसी शब्द के स्त्रीलिंग का शब्द सरसी का प्रयोग होता है। इसके उलट स्थिति हिन्दी भाषा में देखने को मिलती है। यहाँ छोटी वस्तु के लिए स्त्रीलिंग और बड़े के लिए पुल्लिंग का प्रयोग कर दिया जाता है। कुछ शब्द ऐसे भी हैं जो पुरूष तथा स्त्री दोनों के लिए एक ही लिंग में प्रयुक्त होते हैं। जैसे- शिवा शब्द गीदड़ और गीदड़ी दोनों के लिए एक समान प्रयुक्त होता है। अब चुंकि संस्कृत भाषा लोक व्यवहार में सीमित है, अतः  लिंग ज्ञान के लिए आज मुख्यतः चार स्रोत उपलब्ध हैं।
1.  व्याकरण ग्रंथों के साथ खिल भाग में सूत्रात्मक पाणिनीय लिंगानुशासन का पाठ। हर्षवर्धन कृत लिंगानुशासन।
2. अमरकोश जैसे ग्रंथों में शब्दों के साथ ही लिंग का ज्ञान कराया गया है।
3. पुस्तकों में शब्दों के लिए किये गये लिंगों के प्रयोग । 
4. पाणिनि का कृत प्रत्यय
पाणिनि का लिंगानुशासन अष्टाध्यायी के खिल भाग में प्राप्त होता है। महाभाष्य के चतुर्थ अध्याय प्रथमपाद में शब्दों के लिंग निर्धारण पर रोचक चर्चा मिलती है। स्त्रियाम् इस पाणिनि सूत्र पर लिखित श्लोक वार्तिक पर महाभाष्य में विचार किया गया।
                                   स्तनकेशवती स्त्री स्याल्लोमशः पुरुषः स्मृतः।
                                   उभयोरन्तरं यच्च तदभावे नपुंसकम्।
                                   लिंगात् स्त्रीपुंसयोर्ज्ञाने भ्रुकुंसे टाप् प्रसज्यते।
                                   नत्वं खरकुटीः पश्य खट्वावृक्षौ न सिद्यतः।।
                                   नापुंसकं भवेत् तस्मिन् तदभावे नपुंसकम्।
स्तन और केश वाली स्त्री तथा रोएँ (रोम) वाला पुरुष कहा जाता है और जिनमें इन दोनों का भेद का अभाव हो वह नपुंसक कहलाता है। शब्दों में लिंग निर्धारण करने के लिए यदि इस प्रकार का आधार माना जाए तब  वेशधारी नट में स्तन आदि शारीरिक चिह्न होता है। अतः इस शब्द को स्त्रीलिंग मानते हुए टाप् प्रत्यय होना चाहिए। नटा इस प्रकार का स्त्री वाचक शब्द हो जाएगा। अतः अचेतन पदार्थों में इस आधार पर लिंग का निर्धारण नहीं किया जा सकता। इस प्रकार की समस्या के समाधान के लिए पाणिनि ने प्रकृति तथा प्रत्यय के आधार पर लिंग का निर्णय कर इस विषय को स्पष्ट किया। इन्होंने 5 प्रकार के अधिकार सूत्रों की रचना की।
                                      संख्या
1 स्त्री अधिकार                34
2 पुलिंग अधिकार             83
3 नपुंसक अधिकार            52
4 स्त्रीपुंस अधिकार            5
5 पुंनपुंसक अधिकार          14

पाणिनि ने टाप् डाप् और चाप् यह तीन आकारान्त तीन ईकान्त एक ऊकारान्त ऊङ् तथा एक ति स्त्री वाचक प्रत्यय का विधान किया। आकारान्त से अश्वा,क्षत्रिया ईकारान्त से मानुषी, देवी,तरुणी,नर्तकी,कुमारी,हयी ऊकान्त से कुरूः,श्वश्रूः  प्रत्यय एवं ति से युवति शब्द बनाया गया। यहाँ कृदन्त का शतृ प्रत्ययान्त तद्धित का ईयसुन् प्रत्ययान्त शब्दों के स्त्री वाची शब्द का भी स्त्री प्रत्यय प्रकरण में विधान गया है। पुमान् इस अधिकार सूत्रों के द्वारा अधिकतर कृदन्त तथा तद्धित प्रत्ययों को रखकर पुलिंगवाची शब्दों का पार्थक्य दिखाया गया है। अधिकतर पुल्लिंगवाची शब्द नामबोधक तथा भावबोधक होते हैं।

लिंगानुशासन के अन्य ग्रन्थकार

लिंगानुशासन के बारे में अमर सिंह का अतुलनीय योगदान है। कहा जाता है कि इन्होंने एक व्याकरण ग्रंथ की रचना की थी। अमरकोश के तीसरे कांड के पञ्चम वर्ग में लिंगादि संग्रह किया गया है। अमर सिंह के अमरकोश को यदि व्याकरण के रूप में देखा जाए तो यह एक व्याकरण ग्रन्थ भी सिद्ध होता है। यहां पर्यायवाची शब्दों के साथ-साथ शब्दों के लिंग का भी ज्ञान कराया गया है।
समाहृत्यान्यतन्त्राणि संक्षिप्त्यैः प्रतिसंस्कृतैः।
सम्पूर्णमुच्यते वर्गैर्नामलिङ्गानुशासनम्।
प्रायशो रूपभेदेन साहचर्याच्च कुत्रचित्।
स्त्रीनपुंसकं ज्ञेयं तद्विशेषविधेः क्वचित्।
लिंगानुशासन पर पद्यबद्ध रचनाएं प्राप्त होती है। इनमें से कुछ रचनाकारों की रचनाएं पूर्ण मिलती है, परंतु अधिकतर की रचनाएं पूर्ण प्राप्त नहीं होती है। इस प्रकार देवनन्दी, शंकर, हर्षवर्धन, दुर्गसिंह, वामन, पाल्यकीर्ति, बुद्धिसागर, हेमचंद्रसूरी, वोपदेव, हेलाराज, रामसूरि, वेंकटरंग ये लिंगानुशासन के प्रमुख प्रवचनकर्ता रहे हैं।
         वामन तथा हर्षवर्धन लिंगानुशासन के सर्व प्राचीन आचार्य हैं। इन दोनों ने शब्द निर्माण प्रक्रिया के स्थान पर शब्दों का लिंग बोध कराने के लिए लिंगानुशासन की रचना की।

लिंगानुशासन की आवश्यकता- 
1. काक्यों में विशेष्य विशेषण के प्रयोग के समय शब्दों का लिंग जानना आवश्यक हो जाता है। जो लिंग और वचन विशेष्य का होता है, वही लिंग और वचन विशेषण का भी होता है।
अपवाद-  कुछ शब्द अजहल्लिंग होते हैं। ये शब्द अन्य लिंग के विशेष्य के रूप में प्रयुक्त होने पर भी अपने लिंग का त्याग नहीं करता है। जैसे- रमा एका कृपणं बालिका अस्ति। यहाँ बालिका का विशेषण कृपण है, परन्तु वह अपने लिंग को नहीं छोड़ता।


क्रमशः-


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