शनिवार, 22 सितंबर 2018

लघुसिद्धान्तकौमुदी (विसर्गसन्‍धिपर्यन्तम्)


सूचना -  लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ने से पहले संस्कृत - शिक्षण - पाठशाला पर चटका लगायें। इसमें सरल भाषा में व्याकरण की आरम्भिक जानकारी दी गयी है। संस्कृत शिक्षण के लिए अभ्यास भी दिये गये हैं। इस चरण को पूरा करने के अनन्तर लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ें। ऐसा करने से इस पुस्तक की भाषा व नियमों को समझना अधिक आसान होगा।                       

                             नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
                              पाणिनीय प्रवेशाय लघु सिद्धान्तकौमुदीम्।
अइउण्।1। ऋलृक्। 2। एओङ्। 3।  ऐऔच्। 4। हयवरट्। 5। लण्। 6। ञमङणनम्। 7। झभञ्। 8। घढधष्। 9।जबगडदश्। 10। खफछठथचटतव्। 11। कपय्। 12। शषसर्। हल्।
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि । एषामन्त्या इतः । हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । लण्मध्येत्वित्संज्ञकः।

अ इ उण् आदि सूत्र महेश द्वारा प्राप्त हैं । ये सूत्र अण् आदि संज्ञाओं (प्रत्याहार) के लिए हैं। इन सूत्रों के अंतिम वर्ण इत् संज्ञा के लिए हैं। (इत् संज्ञा के बाद इत् संज्ञक वर्ण का लोप हो जाता है। इसका प्रयोजन आगे के सूत्र में बताया जाएगा) लण् सूत्र के बीच में आने वाला अ वर्ण भी इत्संज्ञक है। 

                                           अथ संज्ञाप्रकरणम्
हलन्‍त्‍यम्
उपदेशेऽन्‍त्‍यं हलित्‍स्‍यात् । उपदेश आद्योच्‍चारणम् । सूत्रेष्‍वदृष्‍टं पदं सूत्रान्‍तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र ।।

उपदेश अवस्था में अंतिम हल् की इत् संज्ञा हो। आदि उच्चारण को उपदेश कहते हैं। सूत्रों में जो पद दिखाई नहीं दे उसे दूसरे सूत्र से सभी जगह अनुवर्तन करना चाहिए।


इत्- इन 14 माहेश्वर सूत्रों में अंतिम वर्णों की इत् संज्ञा करने से 42 प्रत्याहार बनता है। कम शब्दों में अधिक शब्द कहने में इसका प्रयोग किया जाता है।
हकारादिषु- हयवर आदि व्यंजन वर्ण हैं। स्वर वर्ण की सहायता के विना व्यंजन वर्ण का उच्चारण नहीं हो सकता। अतः हयवर आदि व्यंजन वर्णों के उच्चारण के लिए इसे अकार सहित लिखा/ बोला गया है।
अदर्शनं लोपः
प्रसक्तस्‍यादर्शनं लोपसंज्ञं स्‍यात् ।
विद्यमान का नहीं दिखाई देना लोप संज्ञक होता है।
तस्‍य लोपः
तस्‍येतो लोपः स्‍यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः ।

उस इत् संज्ञक का लोप होता है। अ इ उण् का ण् आदि अण् प्रत्याहार बनाने के लिए है।
आदिरन्‍त्‍येन सहेता
अन्‍त्‍येनेता सहित आदिर्मध्‍यगानां स्‍वस्‍य च संज्ञा स्‍यात् यथाऽणिति अ इ उ वर्णानां संज्ञा । एवमच् हल् अलित्‍यादयः ।।

अंतिम इत् के सहित आदि वर्ण, अपने बीच के वर्णों की तथा अपनी (आदि) भी संज्ञा हो। इसी प्रकार अक्, अच्, हल्, आदि को भी समझना चाहिए।

विशेष- 
माहेश्वर सूत्रों के प्रारंभिक एवं अंतिम अक्षरों को लेकर प्रत्याहारों (शब्द संक्षेपों) को बनाया गया है। जैसे प्रथम सूत्र में अ और ण् को लेकर अण् प्रत्याहार सिद्ध होता है। इसी प्रकार अधोलिखित प्रत्याहार बनते हैं । आप तालिका में देख सकते हैं कि अन्य सूत्रों के अंतिम अक्षर को लेकर भी प्रत्याहार सिद्ध होते हैं। जैसे- प्रथम सूत्र के अ वर्ण के साथ पांचवे सूत्र का ट् वर्ण लेकर अट् प्रत्याहार बनता है। इसी प्रकार सातवें सूत्र के प्रारंभिक वर्ण म के साथ 12 वें सूत्र के अंतिम अक्षर य् साथ जोड़ने पर मय् प्रत्याहार बनता है । प्रत्याहार में उन सभी स्वर और व्यंजन की गणना होती है जो प्रत्याहार के दोनों अक्षरों के बीच आ जाते हैं।  
प्रत्याहार के लिए माहेश्वर सूत्र का प्रारंभिक अक्षर लेना आवश्यक नहीं होता। प्रत्याहार के लिए माहेश्वर सूत्र के इत्संज्ञक (अंतिम वर्ण) को छोड़कर कोई भी वर्ण लिया जा सकता है। जैसे यय् प्रत्याहार में  माहेश्वर सूत्र के पांचवे सूत्र के दूसरे अक्षर से लेकर बारहवें सूत्र के य् से पूर्व के वर्णों की गणना होती है।
पहले सूत्र से चौथे सूत्र तक में सभी स्वर वर्ण है। इसे अच् प्रत्याहार द्वारा कहा जाता है। 5 वें सूत्र से 14 वें सूत्र तक सभी व्यंजनों वर्ण हैं। 5 वें सूत्र के ह से 14 वें सूत्र के ल् को लेकर  हल् प्रत्याहार बनता है । इसमें सभी व्यंजन वर्णों का समावेश हो जाता है।
व्यंजन वर्णों के उच्चारण में सहायता के लिए अकार स्वर मिला हुआ है।  जैसे ह् + अ = ह आदि । यह अ स्वर वर्ण व्यंजन वर्ण के उच्चारण में सहायक है। स्वर की सहायता के बिना व्यंजन का उच्चारण नहीं किया जा सकता है।
छठे सूत्र के ल का अ इत्संज्ञक है। अर्थात् इस अ की इत्संज्ञा तथा लोप होता है। इसके फलस्वरूप ल प्रत्याहार बनता है।
आपने अबतक जाना कि माहेश्वर सूत्रों में सभी स्वर (अच्) और व्यंजनों (हल्) की गणना की गई है । यहां ह व्यंजन के अतिरिक्त किसी भी स्वर और व्यंजन की पुनरावृत्ति नहीं हुई है।  ह य व रट् इस पंचम सूत्र में तथा हल् इस 14 वें सूत्र में ह व्यंजन वर्ण दो बार आया है।। यह इसलिए ताकि अट् और शल् ये दो प्रत्याहार बन सकें। अट् प्रत्याहार के कारण अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि इस सूत्र के द्वारा अर्हेण में नकार को णकार हुआ और शल् प्रत्याहार के कारण शल इगुपधादनिटः क्सः सूत्र से अधुक्षत् रूप सिद्ध हुआ।  
                         हकारो द्विरूपात्तोऽयमटि शल्यपि वाञ्छता।

                         अर्हेणाधुक्षदित्येतद् द्वयं सिद्धं भविष्यति।। 
यहाँ आदि तथा अन्त्य शब्द विभिन्न प्रत्याहारों के सन्दर्भ में समझना चाहिए। इस प्रकार 14 सूत्रों से कुल 42 प्रत्याहार बनाये जाते हैं। पाणिनि ने अपने सूत्रों तथा कात्यायन के वार्तिक में अधोलिखित प्रत्याहारों का प्रयोग किया गया है- 
 प्रत्याहारों के नाम
अक्  
अण्   
एङ्   
चर्
झल्
यञ्
वल्
अच्  
अण्  
एच्
चय्
झस्
यण्
वश्
अट्   
इण्
ऐच्
छव्
झष्
यम्
शर्
अम्
इक्
खर्
जश्  
बश्
यय्  
शल्  
अल्
इच्
खय्
झय्
भष्
यर्  
हल्  
अश्
उक्   
ङम्  
झर्
मय्
रल्
हश्  
ऊकालोऽज्‍झ्रस्‍वदीर्घप्‍लुतः
उश्‍च ऊश्‍च ऊ३श्‍च वः। वां कालो यस्‍य सोऽच् क्रमाद् ह्रस्‍वदीर्घप्‍लुतसंज्ञः स्‍यात् । स प्रत्‍येकमुदात्तादि भेदेन त्रिधा ।


एक मात्रिक, द्वि मात्रिक तथा त्रि मात्रिक उकार के उच्चारण काल के समान जिस अच् का उच्चारण काल हो उसे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत संज्ञा हो। उन प्रत्येक ह्रस्व आदि अच् का उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित के भेद से तीन- तीन भेद होते हैं।
उच्‍चैरुदात्तः

तालु आदि भागों के स्थान में ऊपर वाले भाग से बोले जाने वाले अच् की उदात्त संज्ञा होती है।
नीचैरनुदात्तः

तालु आदि स्थानों में निचले भाग से बोले जाने वाले अच् की अनुदात्त संज्ञा होती है।
समाहारः स्‍वरितः

जिसमें उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म सम्मिलित हो, वह अच् को स्वरित संज्ञक होता हैं। 
स नवविधोऽपि प्रत्‍येकमनुनासिकत्‍वाननुनासिकत्‍वाभ्‍यां द्विधा ।।
वह अच् ह्रस्व तथा उदात्त आदि भेद के कारण 9 प्रकार का होते हुए अनुनासिक और अनुनासिक के भेद से दो-दो प्रकार के होते हैं।
मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः
मुखसहितनासिकयोच्‍चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्‍यात् । तदित्‍थम् – अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्‍येकमष्‍टादश भेदाः । वर्णस्‍य द्वादशतस्‍य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादशतेषां ह्रस्‍वाभावात् ।।

मुख सहित नासिका (नाक) से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक संज्ञक हो।
वह अच् इस प्रकार है- अ इ उ ऋ इन वर्णो में प्रत्येक वर्णों के 18-18 भेद होते हैं। ॡ वर्ण का 12 भेद होता है। उसमें दीर्घ का अभाव होता है। एच् प्रत्याहार में आए वर्ण के भी 12 भेद होते हैं। इसमें ह्रस्व का अभाव होता है।
१० तुल्‍यास्‍यप्रयत्‍नं सवर्णम्
ताल्‍वादिस्‍थानमाभ्‍यन्‍तरप्रयत्‍नश्‍चेत्‍येतद्द्वयं यस्‍य येन तुल्‍यं तन्‍मिथः सवर्णसंज्ञं स्‍यात् ।


तालु आदि स्थान तथा आभ्यंतर प्रयत्न यह दोनों जिस वर्ण के साथ तुल्य हो, वह परस्पर सवर्ण संज्ञक होता है। 
(वर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्‍यम्) । 

ऋ और ॡ वर्ण की परस्पर सवर्ण संज्ञा कहनी चाहिए।
अकुहविसर्जनीयानां कण्‍ठः । अ, कवर्ग, ह तथा विसर्ग का उच्चारण स्थान कंठ है।
इचुयशानां तालु ।              इचवर्गय तथा श का उच्चारण स्थान तालु है।
ऋटुरषाणां मूर्धा ।             ऋ, टवर्ग, र एवं ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है।
तुलसानां दन्‍ताः ।            ॡ, तवर्ग, ल एवं श का उच्चारण स्थान दांत है।
उपूपध्‍मानीयानामोष्‍ठौ ।      उ,पवर्ग तथा उपध्मानीय का उच्चारण स्थान होठ है।
ञमङणनानां नासिका च ।     ञ, म, ङ, ण, तथा न का उच्चारण स्थान नाक है।
एदैतोः कण्‍ठतालु ।               ए तथा ऐ का उच्चारण स्थान कंठ तालु है। 
ओदौतोः कण्‍ठोष्‍ठम्।             ओ, औ का उच्चारण स्थान कंठ और होठ है।
वकारस्‍य दन्‍तोष्‍ठम् ।            वकार का उच्चारण स्थान दांत और होठ है।
जिह्‍वामूलीयस्‍य जिह्‍वामूलम् ।   जिह्वामूलीय का उच्चारण स्थान जिह्वामूल है। 
नासिकाऽनुस्‍वारस्‍य ।              अनुस्वार का उच्चारण नाक है।
इति स्थानानि।                     यहाँ वर्णों के उच्चारण स्थान समाप्त हुए।

यत्‍नो द्विधा – आभ्‍यन्‍तरो बाह्‍यश्‍च । यत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य।
आद्यः पञ्चधा – आदि = आभ्यंतर प्रयत्न पांच प्रकार के होते हैं। 
स्‍पृष्‍टेषत्‍स्‍पृष्‍टेषद्विवृतविवृतसंवृत भेदात् । स्पृष्ट, ईषत्स्पृष्ट, ईषत् विवृत, विवृत, संवृत के भेद से।
तत्र स्‍पृष्‍टं प्रयत्नं स्‍पर्शानाम् ।          आभ्यन्तर प्रयत्न में स्पर्श- (कुचुटुतुपु) वर्ग की स्पृष्ट संज्ञा होती है।
ईषत्‍स्‍पृष्‍टमन्‍तःस्‍थानाम् ।              अन्तःस्थों (य, , , ल ) की ईषत्स्पृष्ट संज्ञा होती है।
ईषद्विवृतमूष्‍मणाम् ।                    ऊष्म (श,,,,ह) की ईषद्विवृत संज्ञा होती है।
विवृतं स्‍वराणाम् ।                      स्वर वर्णों की विवृत संज्ञा होती है।
ह्रस्‍वस्‍यावर्णस्‍य प्रयोगे संवृतम् ।     प्रयोग अवस्था में ह्रस्व ’ की विवृत संज्ञा होती है।
प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव ।         शब्द निर्माण का प्रक्रिया में ह्रस्व की संवृत संज्ञा होती है।

विशेष-  कुचुटुतुपु प्रत्येक वर्ग के आदि अक्षर को लेकर बनाया गया है। इसका क्रमशः अर्थ होता है - कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग और पवर्ग।
बाह्‍यप्रयत्‍नस्‍त्‍वेकादशधा –  बाह्य प्रयत्न 11 प्रकार का होता है।
विवारः संवारः श्‍वासो नादो घोषोऽघोषोऽल्‍पप्राणोमहाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्‍वरितश्‍चेति । 

विवार, संवार, श्वास, नाद, घोष, अघोष, अल्पप्राण, महाप्राण, उदात्त, अनुदात्त और स्वरित। 
खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्‍च ।         खर् प्रत्याहार के अन्तर्गत वाले वर्ण विवार, श्वास और अघोष यत्न वाले होते हैं।
हशः संवारा नादा घोषाश्‍च ।               हश् प्रत्याहार के अन्तर्गत वाले वर्ण संवार, नाद और घोष यत्न वाले होते हैं।
वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्‍चाल्‍पप्राणाः । वर्गों के प्रथम, तृतीय तथा पंचम वर्ण और यण् प्रत्याहार (य, , , ल) अल्पप्राण कहलाते हैं।
वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्‍च महाप्राणाः । वर्गों का दूसरा, चौथा और शल् प्रत्याहार (श, , , ह) महाप्राण कहलाते हैं।
कादयो मावसानाः स्‍पर्शाः ।  क से लेकर म तक स्पर्श कहे जाते हैं। 
यणोऽन्‍तःस्‍थाः ।                यण् प्रत्याहार के वर्ण अन्तस्थ कहे जाते हैं।
शल ऊष्‍माणः ।                 शल् प्रत्याहार के वर्ण उष्म कहे जाते हैं।
अचः स्‍वराः ।                   अच् प्रत्याहार के वर्ण स्वर कहे जाते हैं।
ںक ں ख इति कखाभ्‍यां प्रगर्धविसर्गसदृशो जिह्‍वामूलीयः । 
ں ں ख इति कखाभ्‍यां प्रगर्धविसर्गसदृशो जिह्‍वामूलीयः । क एवं ख के पहले आधे विसर्ग के समान वर्ण जिह्वामूलीय कहे जाते हैं ।
 ںप ںफ इति पफाभ्‍यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्‍मानीयः । 
 ں ں एवं फ  के पहले आधे विसर्ग के समान वर्ण उपध्मामनीय कहे जाते हैं ।

अं अः इत्‍यचः परावनुस्‍वारविसर्गौ ।। अं अः में अच् के बाद का वर्ण अनुस्वार तथा विसर्ग हैं ।
११ अणुदित्‍सवर्णस्‍य चाप्रत्‍ययः
प्रतीयते विधीयत इति प्रत्‍ययः । अविधीयमानोऽणुदिच्‍च सवर्णस्‍य संज्ञा स्‍यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कु चु टु तु पु एते उदितः । तदेवम् – अ इत्‍यष्‍टादशानां संज्ञा । तथेकारोकारौ । ऋकारस्‍त्रशिंतः । एवं कारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधातेनाननुनासिकास्‍ते द्वयोर्द्वयोस्‍संज्ञा ।

जिसे विधान किया जाय उसे प्रत्यय कहा जाता है।  अविधीयमान अण् और उदित  अपने तथा अपने सवर्ण  की तथा अपने स्वरूप की संज्ञा होती है। इस सूत्र में कहा गया अण् प्रत्याहार बाद वाले णकार अर्थात लण् सूत्र से ग्रहीत होता है।  कु चु टु तु पु ये उदित कहे जाते हैं। इस प्रकार अ 18 प्रकार की संज्ञा वाला है। इसी प्रकार की इकार और उकार भी 18 प्रकार की संज्ञा वाला है। ऋ 30 प्रकार की संज्ञा वाला होता है। इसी प्रकार ॡ  भी  30 प्रकार की संज्ञा वाला होता है। एच् प्रत्याहार के वर्ण 12 संज्ञा वाले होते हैं । अनुनासिक और अननुनासिक के भेद से य् व् ल् दो-दो प्रकार के होते हैं।  इसीलिए अननुनासिक य् व् ल् की 2- 2 संज्ञा होगी।
१२ परः संन्निकर्षः संहिता
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्‍यात् ।।
वर्णों की अत्यन्त समीपता को संहिता कहते हैं।
१३ हलोऽनन्‍तराः संयोगः
अज्‍भिरव्‍यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्‍युः ।।
दो हलों के बीच में किसी अच् का व्यवधान न हो उसकी संयोग संज्ञा होती है।
१४ सुप्‍तिङन्‍तं पदम्
सुबन्‍तं तिङन्‍तं च पदसंज्ञं स्‍यात् ।।
सुबन्त और तिङ्न्त की पद संज्ञा होती है।


अपनी प्रगति जांचें


     इति संज्ञाप्रकरणम्
संज्ञाप्रकरणम् से जुड़ी कुछ ध्यातव्य बातें- इस प्रकरण में हमने वर्णों का परिचय एवं स्वर वर्णों के सभी भेद को जान लिया है। हमेशा यह ध्यान रखना होगा कि जब भी अ इ उ ए  आदि वर्णों के विषय में कहा जाय, उसके साथ ही दीर्घ एवं प्लुत स्वर भी सम्मिलित रहता है। अतः अ कहने का तात्पर्य आ भी है। इसी प्रकार अन्य स्वरों के बारे में भी समझना चाहिए। यहाँ हमने  वर्णों के उच्चारण स्थान एवं प्रयत्न के बारे में भी जाना। यह शुद्ध उच्चारण करने में सहायक है। सन्धि आदि करते समय वर्णों के स्थान व प्रयत्न एक होने पर सदृशतम आदेश होता है। सन्धि में वर्ण परिवर्तन का रहस्य, उच्चारण की वैज्ञानिकता में भी छिपी है। आप इसका भी अनुभव करेंगें।  इत्, लोप, सवर्ण, संहिता एवं संयोग आदि संज्ञा के नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। यह सम्पूर्ण शब्द शास्त्र का मूल आधार है। इसकी आवश्यता बार-बार पड़ेगी। प्रत्याहार के द्वारा अनेक वर्णों को कम वर्णों द्वारा कह पाते है। हम आज भी बोलचाल तथा अन्य व्यवहार में शब्दों को संक्षिप्त कर बोलते हैं। पाणिनि की यह अभूतपूर्व कल्पना एवं संरचना है,जिसके सहारे उन्होंने इतना विशाल व्याकरण शास्त्र लिखा। आप आगे देखेंगें कि इन प्रत्याहारों का प्रयोग वे कितने सूत्रों में करते हैं। कल्पना कीजिये यदि ये प्रत्याहार नहीं होते तो अष्टाध्यायी के इन सूत्रों को कैसे लिखा जाता? हमें कितने शब्द बार-बार याद करने पड़ते? माहेश्वर सूत्र में वर्णों के क्रम इस प्रकार रखा गया कि प्रत्याहार बनाने तथा उनके प्रयोग में सरलता आ गयी। माहेश्वर सूत्र को जितना जल्द हो याद कर लेना चाहिए। 
     सूत्र में हल् वर्णों का आरम्भ अन्तस्थ अर्थात् यण् प्रत्याहार के वर्णों से हुआ। उसके बाद प्रत्येक वर्ग का क्रमशः 5,4,3,2,1 वर्ण आया। अंत में उष्म वर्ण अर्थात् शल् प्रत्याहार के वर्ण आये। सूत्रों में वर्णों के क्रम तथा प्रत्येक सूत्र के अंतिम हल् वर्ण स्पष्ट रूप से याद हों,ताकि किसी प्रत्याहार का नाम सुनते ही तुरंत स्मरण हो जाय कि इसके बीच में कौन-कौन वर्ण आयेंगें। याद है न, यहाँ का कु चु टु तु पु ये पांचों वर्ग? ये वर्ग भी शब्द संक्षेपीकरण का अनुपम उदाहरण हैं। आगे हम इसी प्रकार से अन्य तरह के कुछ नये प्रत्याहारों से भी परिचित होंगें। प्रत्याहार के विषय में अपने मित्रों से चर्चा कर अभ्यास कीजिये।

                                                       अथाच्‍सन्‍धिः


१५ इको यणचि
इकः स्‍थाने यण् स्‍यादचि संहितायां विषये । सुधी उपास्‍य इति स्‍थिते ।।
इक् के स्थान पर यण् आदेश हो, अच् परे रहते संहिता के विषय में। सुधी उपास्‍य इस स्थिति में उ ई उ ये तीन इक् वर्ण हैं, उसमें से किस इक् को यण् हो? इसका समाधान अग्रिम सूत्र में करते हैं-
१६ तस्‍मिन्निति निर्दिष्‍टे पूर्वस्‍य
सप्‍तमीनिर्देशेन विधीयमानं कार्यं वर्णान्‍तरेणाव्‍यवहितस्‍य पूर्वस्‍य बोध्‍यम् ।।

सप्तम्यन्त के उच्चारण के द्वारा किया जाने वाला कार्य दूसरे वर्ण से व्यवधान रहित पूर्व वर्ण के स्थान पर होता है।
इको यणचि सूत्र में अचि सप्तमी निर्देश है। इस निर्देश के द्वारा विधीयमान यण् कार्य उस अच् के पूर्व वर्ण का होगा। इस अच् के पूर्व किसी वर्ण का यदि व्यवधान नहीं हो तो। सुधी उपास्‍य में अच् है उपास्य का उ । इसके व्यवधान रहित पूर्व वर्ण है सुधी का ई । अतः ई को ही यणादेश होगा। सुधी में  ई अच् को मानकर सु के उ को यण् नहीं हो सकता, क्योंकि यहाँ ध् वर्ण का व्यवधान है।
अव्यवहित-  व्यवधान रहित से तात्पर्य जिन दो वर्णों के बीच कार्य हो रहा हो, उसके बीच कोई अन्य वर्ण नहीं हो। इ उ ऋ ॡ के स्थान पर यण् के किस वर्ण का आदेश हो? इस शंका सा समाधान अग्रिम सूत्र में करते हैं-
१७ स्‍थानेऽन्‍तरतमः
प्रसङ्गे सति सदृशतम आदेशः स्‍यात् । सुध्‍य् उपास्‍य इति जाते ।।
यण् ,गुण आदि प्रसंग उपस्थित होने पर सबसे अधिक सदृश आदेश होता है। स्थानी इ के स्थान पर सदृशतम आदेश य् होने पर सुध्य् उपास्य यह हुआ।
१८ अनचि च
अचः परस्‍य यरो द्वे वा स्‍तो न त्‍वचि । इति धकारस्‍य द्वित्‍वेन सुध्‍ध्‍य् उपास्‍य इति जाते ।।

अच् से परे यर् को विकल्प से द्वित्व हो, यर् के बाद अच् बाद में नहीं हो तो। इस प्रकार सुध्य् + उपास्य के ध् को द्वित्व (दो वर्ण हो जाना) होकर सुध् ध् य् उपास्य हुआ।
१९ झलां जश् झशि
स्‍पष्‍टम् । इति पूर्वधकारस्‍य दकारः ।।

झल् को जश् हो झस् परे रहते। सुध् ध् य् उपास्य में झल् है ध् । ध् का सदृशम जश् आदेश हुआ द् । झश् ध् बाद में है। या ऐसे समझें- सुध् ध् य् उपास्य में ध् झश् बाद में रहते पूर्ववर्ती झल् ध् को जश् आदेश द् हुआ । सुद् ध् य् उपास्य रूप बना।
२० संयोगान्‍तस्‍य लोपः
संयोगान्‍तं यत्‍पदं तदन्‍तस्‍य लोपः स्‍यात् ।।
जिस पद के अंत में संयोग हो उसे लोप हो। सुद् ध् य् उपास्य विकल्प सु ध् य् उपास्य में अच् स् व्यवधान रहित वर्ण है- द् ध् य्  विकल्प ध् य् । इन वर्णों की संयोग संज्ञा होती है। 
२१ अलोऽन्‍त्‍यस्‍य
षष्‍ठीनिर्दिष्‍टोऽन्‍त्‍यस्‍याल आदेशः स्‍यात् । इति यलोपे प्राप्‍ते – 
षष्ठी द्वारा निर्देश किया गया (संयोगान्तस्य) अंतिम अल् के स्थान पर होता है। इससे य् का लोप प्राप्त होता है।
(यणः प्रतिषेधो वाच्‍यः)
संयोग के अंत में यण् के लोप का प्रतिषेध कहना चाहिए। इस प्रकार संयोगान्‍तस्‍य लोपः सूत्र द्वारा प्राप्त य् के लोप का निषेध हो गया।
 सुद्ध्युपास्‍यः । सुध्युपास्यः। मद्ध्‍वरिः । मध्वरिः । धात्त्रंशः । धात्रंशः।  लाकृतिः ।।
विशेष-   रूप सिद्धि में जब जिन सूत्रों की आवश्यकता हुई लघुसिद्धान्तकौमुदी में उसी क्रम में सूत्र रखे गये हैं। मूल ग्रन्थ अष्टाध्यायी है। यहाँ पाँच प्रकार के सूत्र हैं। संज्ञा, परिभाषा, विधि, नियमअतिदेश तथा अधिकार। यहाँ अधिकार सूत्रों की सीमा निश्चित की गयी है कि वह किस सूत्र तक होगी। इको यणचि आदि विधि सूत्रों में संहितायाम् सूत्र का अधिकार है। इसी प्रकार अनुवृत्ति को भी समझना चाहिए। इस प्रकार इको यणचि के साथ संहितायाम् भी जुड़ा रहता है। लघुसिद्धान्तकौमुदी में अधिकांश विधि सूत्र दिये गये हैं। सामान्यतः शब्द की सिद्धि के लिए संज्ञा तथा विधि सूत्र से काम चल सकता है। एक रूप की सिद्धि में अनेक सूत्र लगने, सूत्रों का अर्थ स्पष्ट करने तथा अन्य समस्या के समाधान में परिभाषाओं की आवश्यकता होती है। जब निर्धारित कार्य नहीं होता उसे विकल्प कहते हैं। आपको सूत्रों तथा श्लोकों में यण् सन्धियुक्त को पदों को ढूंढ़ कर सन्धि विच्छेद करने का अभ्यास चाहिए। 
२२ एचोऽयवायावः
एचः क्रमादय् अव् आय् आव् एते स्‍युरचि ।।
एच् को क्रमशः अय् अव् आय् आय् आदेश हो एच् के बाद अच् बाद में हो तो। संहिता के विषय में।
२३ यथासंख्‍यमनुदेशः समानाम्
समसम्बन्‍धी विधिर्यथासंख्‍यं स्‍यात् । हरये । विष्‍णवे । नायकः । पावकः ।।

सम सम्बन्धी (स्थानी तथा आदेश दोनों की संख्या समान ) विधि क्रमशः होती है। इस सूत्र में चार स्थानी तथा चार आदेश हैं। अतः स्थानी ए ओ ऐ औ के स्थान पर आदेश क्रमशः अय् अव् आय् तथा आव् आदेश होगा।
हरये ।
हरे + ए  में एच् ए के स्थान पर अच् ए बाद में रहने पर यथासंख्‍यमनुदेशः समानाम् के निर्देश से क्रमानुसार  अय् आदेश हुआ। हरय् + ए बना। परस्पर वर्ण संयोग होने पर हरये हुआ । इसी प्रकार अन्यत्र भी रूप सिद्ध करें। इसे संस्कृत में इस प्रकार लिखते हैं।
हरे + ए  इति स्थिते एचोऽयवायावः इत्यनेन एचः एकारस्य स्थाने अचि एकारस्य परत्वे स्थिते अयादयः आदेशः प्राप्तः यथासंख्‍यमनुदेशः समानाम् इति सूत्र सहकारेण एकारस्थाने अयादेशे कृते हरय्+ए इति स्थिते । परस्परवर्णसंयोगे हरये इति रूपं सिद्धम् ।
विष्‍णवे ।
विष्णो + ए  में एच् ओ के के स्थान पर अच् ए बाद में रहने पर अव् आदेश हुआ। विष्णव्+ए हुआ । परस्पर वर्ण संयोग होने पर विष्णवे बना।
नायकः ।
नै + अकः  में एच् ऐ के स्थान पर अच् ए बाद में रहने पर आय् आदेश हुआ। नाय्+अकः हुआ । परस्पर वर्ण संयोग होने पर नायकः बना। 
पावकः ।
पौ + अकः  में एच् औ के स्थान पर अच् अ बाद में रहने पर आव् आदेश हुआ। पाव्+अकः हुआ। परस्पर वर्ण संयोग होने पर पावकः बना। 
२४ वान्‍तो यि प्रत्‍यये
यकारादौ प्रत्‍यये परे ओदौतोरव् आव् एतौ स्‍तः । गव्‍यम् । नाव्‍यम् । 

यकारादि प्रत्यय परे रहते ओ और औ को अव् तथा आव् आदेश हो। 
गव्यम् ।
गो + यम् में यकारादि प्रत्यय यम् का य परे रहते ओ के स्थान पर अव् आदेश हुआ। गव्+यम् हुआ । परस्पर वर्ण संयोग होने पर गव्यम् रूप बना। इसी प्रकार नाव्यम् में नौ+यम्, औ को आव् आदेश, नाव्यम् रूप बना। 
(अध्‍वपरिमाणे च) । गव्‍यूतिः ।।
२५ अदेङ् गुणः
अत् एङ् च गुणसंज्ञः स्‍यात् ।।

अत् और एङ् की गुण संज्ञक हों। सूत्र के अत् का अर्थ स्पष्ट करने के लिए आगामी सूत्र है-
२६ तपरस्‍तत्‍कालस्‍य
तः परो यस्‍मात्‍स च तात्‍परश्‍चोच्‍चार्यमाणसमकालस्‍यैव संज्ञा स्‍यात् ।।

त् वर्ण जिस वर्ण के बाद हो और त् वर्ण के बाद जो बोला जाने वाला वर्ण हो, वह अपने समकाल (उच्चारण काल) की संज्ञा का बोधक हो। सूत्र में तपरः की दो व्याख्या है। 1. तपरः 2. तात्परः। तपरः का अर्थ है त् वर्ण जिस वर्ण के बाद हो। तात्परः का अर्थ है त् वर्ण के बाद जो वर्ण हो। अत् शब्द में त् अ के बाद में है। इसका समकाल ह्रस्व अ है। अतः यह अ अपने दीर्ध आ तथा प्लुत अ का बोधक नहीं होगा। अदेङ् गुणः में अत् के त् वर्ण के बाद एङ् है, अतः एङ् से दीर्घ ए ओ का ही बोध होगा प्लुत ए ओ का नहीं।
२७ आद्गुणः
अवर्णादचि परे पूर्वपरयोरेको गुण आदेशः स्‍यात् । उपेन्‍द्रः । गङ्गोदकम् ।।

उप + इन्द्रः में अवर्ण है उप का अ, अच् परे है इन्द्रः का इ, पूर्व का अ तथा पर के इ के स्थान पर ए गुण एकादेश होगा। उपेन्द्रः बना। इसी प्रकार गङ्गोदकम् में गङ्गा + उदकम्, आ + उ = ओ, गङ्गोदकम् रूप सिद्ध हुआ।
उपेन्द्रः में अ, इ तथा ए का उच्चारण स्थान समान है, अतः स्थानेन्तरतमः से ए गुण एकादेश होगा। गङ्गोदकम् में आ + उ का  स्थान सादृश्य ओ है।

विशेष- जिस सन्धि में एकादेश का विधान किया गया है, वहाँ एकः पूर्वपरयोः का अधिकार है। एक के स्थान पर एक आदेश करने का कोई अर्थ नहीं है। एकादेश जब भी होगा दो वर्णों का ही होगा। उन दोनों पूर्व तथा पर वर्णों के बीच व्यवाधान भी नहीं होना चाहिए। यह नियम पूर्व में कहा जा चुका है। अतः आगे जब भी एकादेश कहा जाय, उसका अर्थ होगा पूर्व तथा पर वर्ण का एकादेश।   
२८ उपदेशेऽजनुनासिक इत्
उपदेशेऽनुनासिकोऽजित्‍संज्ञः स्‍यात् । प्रतिज्ञानुनासिक्‍याः पाणिनीयाः । लण्‍सूत्रस्‍थावर्णेन सहोच्‍चार्यमाणो रेफो रलयोः संज्ञा ।।

उपदेश में अनुनासिक अच् की इत् संज्ञा हो । कौन स्वर वर्ण अनुनासिक है कौन नहीं, यह पाणिनीय परम्परा के आचार्यों की प्रतिज्ञा से ज्ञात होता है । लण्‍ सूत्र में स्थित अवर्ण के साथ उच्चारित किया जाना वाला र् वर्ण र् तथा ल् की बोधक  संज्ञा है ।।
२९ उरण् रपरः
ऋ इति त्रिंशतः संज्ञेत्‍युक्तम् । तत्‍स्‍थाने योऽण् स रपरः सन्नेव प्रवर्तते । कृष्‍णर्द्धिः । तवल्‍कारः ।।

ऋ 30 प्रकार की संज्ञाओं वाला है, यह संज्ञा प्रकरण में कहा जा चुका है। ऋ के स्थान पर किये जाने वाले अणादेश के तुरन्त बाद र् भी साथ में हो। ऋ वर्ण के स्थान पर होने वाला जो अण् (अ इ उ ) वह र् पर वाले होते हैं। लण् सूत्र के ल का अ उपदेशेऽजनुनासिक इत् सूत्र से इत्संज्ञक होने के कारण र प्रत्याहार बनेगा। इसमें आदि वर्ण र् तथा अंत वर्ण ल् का ग्रहण होने से र प्रतायाहार में र् तथा ल् दोनों वर्णों का ग्रहण होगा। इस प्रकार र पर में हो कहने से ल् का भी ग्रहण होगा। इस सूत्र में र प्रत्याहार है।
कृष्‍णर्द्धिः । कृष्ण + ऋद्धि  यहाँ ण के बाद का अ के परे अच् ऋद्धि का ऋकार है। आद् गुणः से अ तथा ऋ के स्थान पर गुण एकादेश अ हुआ। स्थानेन्तरतमः से अ के बाद र् बाद में आया। कृष्ण अर् द्धि वर्ण संयोग कृष्‍णर्द्धिः रूप बनेगा।
३० लोपः शाकल्‍यस्‍य
अवर्णपूर्वयोः पदान्‍तयोर्यवयोर्लोपो वाऽशि परे ।।

अवर्ण पूर्व वाले पदान्त यकार तथा वकार का लोप हो विकल्प से अश् परे रहते।
३१ पूर्वत्रासिद्धम्
सपादसप्‍ताध्‍यायीं प्रति त्रिपाद्यसिद्धात्रिपाद्यामपि पूर्वं प्रति परं शास्‍त्रमसिद्धम् । हर इहहरयिह । विष्‍ण इहविष्‍णविह ।।

अष्टाध्यायी के अध्याय सात पाद 1 ( सपादसप्ताध्यायी 7.1) के सूत्र प्रति तीन पादों (त्रिपादी) में स्थित सूत्र असिद्ध होते हैं।  तीनों पादों में भी पूर्व सूत्र के प्रति बाद वाले सूत्र असिद्ध होते हैं। अर्थात् सवा सात अध्याय के सूत्र तथा त्रिपादी के सूत्र यदि एक स्थान पर प्रवृत्त हों तो त्रिपादी में स्थित सूत्र का कार्य नहीं होता है। त्रिपादी के सूत्रों में भी पहले वाले सूत्र तथा बाद वाले सूत्र में बाद वाले सूत्र का कार्य नहीं होगा। जैसे- हरे + इह में ए को अय् आदेश होकर हरय् + इह हुआ। लोपः शाकल्यस्य से पदान्त यकार  के पूर्व अवर्ण है,  इह का इ बाद में है, जो कि अश् प्रत्याहार में आता है। सूत्र घटित होने से य् का विकल्प से लोप हो गया। हर इह बना। हर इह में आद् गुणः से गुण क्यों नहीं हो सकता? इस शंका के समाधान में पूर्वत्रासिद्धम् सूत्र आता है। आद् गुणः सपादसप्ताध्यायी का सूत्र है। आद्गुणः के समक्ष त्रिपादी के सूत्र लोपः शाकल्‍यस्‍य का कार्य नहीं हो सकता है। लोपः शाकल्‍यस्‍य के असिद्ध होने से  आद् गुणः को हरय् इह ही दिख रहा है। अतः यहाँ गुण नहीं हुआ। यकार का लोप नहीं होने पर हरयिह रूप बनेगा। इसी प्रकार विष्णो + इह में अव् आदेश कर रूप बनाना चाहिए।
३२ वृद्धिरादैच्
आदैच्‍च वृद्धिसंज्ञः स्‍यात् ।।
आत् तथा ऐच् की वृद्धि संज्ञा हो। तपरस्तत्कालस्य से आत् में तपर तथा ऐच् तकार के बाद में  होने से यहाँ दीर्घ आ ऐ औ का  ही ग्रहण होगा। प्लुत का नहीं। जहाँ आ वृद्धि होगी वहाँ रपर तथा लपर भी होगा।
३३ वृद्धिरेचि
आदेचि परे वृद्धिरेकादेशः स्‍यात् । गुणापवादः । कृष्‍णैकत्‍वम् । गङ्गौघः । देवैश्वर्यम् । कृष्‍णौत्‍कण्‍ठ्यम् ।।
अवर्ण से एच् परे रहने पर पूर्व पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो। यह वृद्धि गुण सन्धि का अपवाद है।
वृद्धिरेचि सूत्र में आद्गुणः से पञ्चम्यन्त आत् का अनुवर्तन होता है । एक पूर्वपरयोः का अधिकार होने से पूर्व तथा पर के स्थान पर यह चला आ रहा है। । आद्रुणः से यहाँ गुण प्राप्त था। अलग से सूत्र बनाकर वृद्धि का विधान करना सिद्ध करता है कि यह गुण सन्धि का अपवाद है। । 
कृष्णैकत्वम्। यहाँ  कृष्णस्य एकत्वम् षष्ठी तत्पुरूष समास है। कृष्ण + एकत्वम् में अवर्ण है कृष्ण का अकार, इसके एच् परे है एकत्वम् का एकार। पूर्व अ तथा पर ए, दोनों के स्थान पर एक वृद्धि आदेश ऐ (अ + ए = ऐ) होगा। कृष्ण + ऐकत्वम् कृष्णैकत्वम् रूप बना।  यहाँ अकार और एकार का उच्चारण स्थान क्रमशः कण्ठ और तालु है अतः वही कण्ठ तालु उच्चारण स्थान वाला ऐकार एकादेश होगा । इसी प्रकार गङ्गा ओघः में आकारस्य ओकारस्य च कण्ठ ओष्ठ स्थान वाला औकार एकादेश होगा। इसी प्रकार  देवैश्वर्यम् एवं कृष्णौत्कण्ठयम् में भी समझना चाहिए । 
३४ एत्‍येधत्‍यूठ्सु
अवर्णादेजाद्योरेत्‍येधत्‍योरूठि च परे वृद्धिरेकादेशः स्‍यात् । (पररूपगुणापवादः) उपैति । उपैधते । प्रष्‍ठौहः । एजाद्योः किम् ? उपेतः । मा भवान्‍प्रेदिधत् ।
अवर्ण से परे एजादि धातु सम्बन्धी एति, एधति तथा ऊठ् परे रहने पर वृद्धि एकादेश हो। यह सूत्र उप +एति, उप + एधते आदि में  एङि पररूपम् से प्राप्त पररूप तथा प्रष्ठ + ऊह जैसे स्थलों पर आद्गुणः से प्राप्त गुण का अपवाद है। उप +एति में अ तथा ए को वृद्धि एकादेश ऐ होकर उपैति बना। एति क्रिया इण् गतौ धातु से निष्पन्न है। इसी प्रकार उप + एधते तथा प्रष्ठ + ऊहः में भी वृद्धि एकादेश हुआ।
एजाद्योः किमिति- सूत्र से एति, एधति का विशेषण एजादि इस कारण से रखा गया कि उप + इतः जैसे स्थल पर इस सूत्र से वृद्धि नहीं हो। इतः इण् धातु से निष्पन्न है। यदि एजादि विशेषण नहीं लगाया जाय तो प्रकृत सूत्र से यहाँ वृद्धि होने लगेगा। यहाँ वृद्धि न होकर गुण अभीष्ट है। अतः इण् धातु का विशेषण एजादि लगाया ।  गुण होकर उपेतः रूप बनेगा।  इसी प्रकार प्रेदिधत् में  प्र + इदिधत् में गुण होगा वृद्धि नहीं। 

विशेष- 
व्याकरण में सूत्रों के नियमों को स्मरण रखना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही सूत्रों (नियमों) के विश्लेषण का भी। विश्लेषण के पश्चात् ही उचित अनुचित का बोध हो सकता है। हम निर्णय तक पहुँच पाते हैं। विश्लेषण के बाद ही सही निष्कर्ष तक पहुँचा जा सकता है। कई स्थलों पर सूत्रों में बाध्य बाधक भाव है। उसका सही निर्णय तब हो पाता है जब हम उसके बारे में गहरी छानबीन करते हैं। व्याकरण में इसे परिष्कार कहा जाता है। रूपों की सिद्धि तक का भाग प्रक्रिया कहलाता है। एजाद्योः किम् जैसे प्रश्न परिष्कार या विश्लेषण के लिए है। ग्रन्थकार इस प्रकार के प्रश्न के द्वारा हमें सूत्रों के प्रत्येक अनुबन्धों (शर्तों) की उपयोगिता से परिचित कराता हैं। आपको आगे कई स्थलों पर इस प्रकार के प्रश्न मिलेंगें। आप भी सूत्रार्थ के किसी एक अंश को हटाकर उससे होने वाले प्रभाव को परख सकते हैं।
(अक्षादूहिन्‍यामुपसंख्‍यानम्) । अक्षौहिणी सेना । 
अक्ष शब्द परे ऊहिनी होने पर वृद्धि एकादेश हो । अक्ष + ऊहिनी में अ तथा ऊ के स्थान पर औ वृद्धि  एकादेश होकर अक्षौहिणी रूप बना । 
(प्रादूहोढोढ्येषैष्‍येषु) । प्रौहः । प्रौढः । प्रौढिः । प्रैषः । प्रैष्‍यः । 
प्र उपसर्ग के पश्चात् ऊह, ऊढ, ऊढि, एष तथा एष्य बाद में हो तो वृद्धि एकादेश हो। प्रौह, प्रौढ, । प्रौढि में गुण प्राप्त था, जिसे बाधकर इससे बृद्धि हुई। प्रैषः प्रैष्‍यः में वृद्धिरेचि से वृद्धि करने पर भी यही रूप बनता पुनः इस सूत्र द्वारा अलग से विधान करने के प्रयोजन पर विचार करना चाहिए।  
(ऋते च तृतीयासमासे) । सुखेन ऋतः सुखार्तः । तृतीयेति किम् ? परमर्तः । 
अवर्ण से ऋत शब्द परे रहते पूर्व पर के स्थान पर वृद्धि एकादेश हो तृतीया समास में। सुखार्त का लौकिक विग्रह करते हैं- सुखेन ऋतः । सुख + ऋत इस स्थिति में पूर्व पर के स्थान पर वृद्धि तथा रपर आदेश हुआ। सुखार्तः बना। यदि तृतीया समास से कोई भिन्न समास होगा तो वहाँ वृद्धि नहीं होगी। जैसे परमश्चासौ ऋतः में कर्मधारय समास है। अतः परम + ऋत में गुण होगा वृद्धि नहीं।
(प्रवत्‍सतरकम्‍बलवसनार्णदशानामृणे) । प्रार्णम्वत्‍सतरार्णम्इत्‍यादि ।।

प्र वत्‍सतर कम्‍बल वसन ऋण दश के बाद ऋण शब्द होने पर वृद्धि एकादेश हो। प्र + ऋणम् में अ + ऋ = आर् । प्रार्णम् बना।
३५ उपसर्गाः क्रियायोगे
प्रादयः क्रियायोगे उपसर्गसंज्ञाः स्‍युः । प्र परा अप सम् अनु अव निस् निर् दुस् दुर् वि आङ् नि अधि अपि अति सु उत् अभि प्रति परि उप – एते प्रादयः ।।
प्रादि का क्रिया के साथ योग होने पर उपसर्ग संज्ञा हो। प्र परा अप सम् अनु अव निस् निर् दुस् दुर् वि आङ् नि अधि अपि अति सु उत् अभि प्रति परि उप ये प्रादि हैं।
३६ भूवादयो धातवः
क्रियावाचिनो भ्‍वादयो धातुसंज्ञाः स्‍युः ।।

क्रिया वाचक भू आदि की धातु संज्ञा हो।
३७ उपसर्गादृति धातौ
अवर्णान्‍तादुपसर्गाद्दकारादौ धातौ परे वृद्धिरेकादेशः स्‍यात् । प्रार्च्छति ।।
अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु के परे रहते पूर्व पर के स्थान में वृद्धि एकादेश हो।

प्र + ऋच्छति यहाँ पर ऋच्छति में ऋच्छ भूवादि गण पठित है। इसे भूवादयो धातवः से धातु संज्ञा हुई। ऋच्छति क्रिया के साथ प्र है, अतः प्र को उपसर्गाः क्रियायोगे से उपसर्ग संज्ञा हुई। प्र + ऋच्छति में अवर्णान्त उपसर्ग है प्र का अ, इसके परे ऋकारादि धातु है ऋच्छति का ऋ । पूर्व अ पर ऋ के स्थान में वृद्धि हुई आ । उरण् रपरः से आ के बाद र् आने पर रूप बना प्रार्च्छति । इसी प्रकार अन्य ऋकारादि धातु के साथ उपसर्गों का रूप बनाना चाहिए।
३८ एङि पररूपम्
आदुपसर्गादेङादौ धातौ पररूपमेकादेशः स्‍यात् । प्रेजते । उपोषति ।।

अवर्णान्त उपसर्ग से एङादि धातु परे रहने पर पररूप एकादेश हो। प्र + एजते यहाँ पर वृद्धिरेचि से वृद्धि प्राप्त है परन्तु इसे बाधकर इस सूत्र से पूर्व अ तथा पर ए के स्थान पर पररूप एकादेश होगा ए। प्रेजते रूप बनेगा। इसी प्रकार उपोषति में उप + ओषति में पररूप एकादेश ओ होकर उपोषति रूप बनेगा। 
३९ अचोऽन्‍त्‍यादि टि
अचां मध्‍ये योऽन्‍त्‍यः स आदिर्यस्‍य तट्टिसंज्ञं स्‍यात् । 

अचों के मध्य जो अंतिम अच् वह जिसके आदि में हो उस समुदाय की टि संज्ञा होती है।
(शकन्‍ध्‍वादिषु पररूपं वाच्‍यम्) । तच्‍च टेः । शकन्‍धुः । कर्कन्‍धुः। मनीषा । आकृतिगणोऽयम् । मार्त्तण्‍डः ।।

शकन्धु आदि में वाक्य के टि को पररूप होता है। शक + अन्धु में शक में दो अच् हैं, इसमें अंतिम अच् है क के पश्चात् अ । वह अकेले है। अतः वही आदि, मध्य और अंत होगा। अ स्वयं के आदि में है। उस अ की टि संज्ञा हुई। शकन्ध्वादि से शक + अन्धु में पूर्व अ तथा पर अ को पररूप अन्धु के अ की तरह हो गया। मनस् + ईशा में टि संज्ञक अंग होगा, अस् । अस् तथा ई दोनों के स्थान पर पररूप होगा ई। मनीषा सिद्ध होगा।
४० ओमाङोश्‍च
ओमि आङि चात्‍परे पररूपमेकादेशः स्‍यात् । शिवायों नमः । शिव एहि ।।

अवर्ण से ओम् तथा आङ् परे रहते पररूप एकादेश हो। 
४१ अन्‍तादिवच्‍च
योऽयमेकादेशः स पूर्वस्‍यान्‍तवत्‍परस्‍यादिवत् । शिवेहि ।।

 शिवाय + ओम् में अवर्ण से ओम् बाद में रहने पर पररूप होकर शिवायों बना। शिवेहि की सिद्धि करते है। शिव + आ + इहि इस स्थिति में आद् गुणः सूत्र से आ तथा इ को गुण होकर ए हुआ। शिव एहि यहाँ पर आ दृश्य नहीं होने पर अन्तादिवच्च सूत्र प्रवृत्त हुआ।  आ तथा इ का जो यह ए एकादेश है वह पूर्व आ शब्द अन्त के समान होगा। अर्थात् आ एक ही वर्ण है अतः यही पूर्व, पर तथा मध्य है। आ आदि के समान भी होगा। अब ओमाङोश्च से पर में आ होने के कारण शिव + एहि में आङ् (आ) परे रहने पर पररूप एकादेश हुआ। शिवेहि रूप बना।
४२ अकः सवर्णे दीर्घः
अकः सवर्णेऽचि परे पूर्वपरयोर्दीर्घ एकादेशः स्‍यात् । दैत्‍यारिः । श्रीशः । विष्‍णूदयः । होतॄकारः ।।
अक् से सवर्ण अच् परे रहने पर पूर्व पर के स्थान में दीर्ध एकादेश हो।

दैत्यारिः। दैत्य + अरिः में य के अ तथा अरिः के अ का सवर्ण दीर्ध एकादेश आ हुआ। अ तथा आ का उच्चारण स्थान एक होने से तुल्यास्य प्रयत्नं सूत्र से सवर्ण ग्राहकता होती है। श्री + ईश, ई + ई = ई । विष्णु + उदय, उ + उ = ऊ। होतृ + ऋकार, ऋ +ऋ  = ऋ  में भी सवर्ण दीर्ध होकर श्रीशः, विष्णूदयः, होतॄकारः रूप बनेगा।
४३ एङः पदान्‍तादति
पदान्‍तादेङोऽति परे पूर्वरूपमेकादेशः स्‍यात् । हरेऽव । विष्‍णोऽव ।।
पदान्त एङ् से अत् परे रहने पर पूर्वरूप एकादेश हो।

हरे + अव में पदान्त एङ् है हरे का ए, अत् परे में है अ।  पूर्व ए तथा पर अ के स्थान पर पूर्व के समान ए एकादेश हुआ । हरेऽव बना। इसी प्रकार विष्णो + अव में पूर्वरूप होकर विष्णोऽव बना। 
४४ सर्वत्र विभाषाः गोः
लोके वेदे चैङन्‍तस्‍य गोरति वा प्रकृतिभावः पदान्‍ते । गोअग्रम्गोऽग्रम् । एङन्‍तस्‍य किम् ? चित्रग्‍वग्रम् । पदान्‍ते किम्गोः ।।
लोक और वेद में पदान्त में एङन्त गो शब्द को अत् परे रहते प्रकृति भाव हो विकल्प से । गो + अग्रम् में पदान्त में एङन्त गो के ओ को अग्रम् के अ परे रहने पर प्रकृतिभाव (यथा स्थिति) हुआ। गोअग्रम् बना। गो शब्द एङन्त होता ही है, पुनः सूत्र में एङन्त गो शब्द क्यों कहा? समास में गो के ओ को ह्रस्व होकर उ हुआ।  चित्रगु + अग्रम् में पदान्त उ तथा अ का प्रकृतिभाव नहीं हो अतः एङन्त गो कहा। यहाँ ओ नहीं होने से प्रकृतिभाव नहीं होगा। गो अस्, यहाँ सुबन्त अस् मिलने पर ही पद कहलाएगा। गो पदान्त नहीं होने से प्रकृतिभाव नहीं होगा।
४५ अनेकाल्शित्‍सर्वस्‍य
इति प्राप्‍ते ।।

अनेकाल् (जिसमें अनेक अल् हो) तथा शित् (जिसका शकार इत् हो) ऐसा आदेश सम्पूर्ण स्थानी के स्थान पर होता है।
४६ ङिच्‍च
ङिदनेकालप्‍यन्‍त्‍यस्‍यैव स्‍यात् ।।

ङित् (जहाँ ङकार की इत्संज्ञा हुई हो) तथा अनेकाल् आदेश स्थानी के अन्त्य वर्ण के स्थान पर ही हो।
४७ अवङ् स्‍फोटायनस्‍य
पदान्‍ते एङन्‍तस्‍य गोरवङ् वाऽचि । गवाग्रम्गोऽग्रम् । पदान्‍ते किम् ? गवि ।।
पदान्त में एङन्त गो शब्द को अवङ् आदेश हो अच् परे रहते विकल्प से। गो + अग्रम् इस स्थिति में पदान्त में एङन्त गो के ओ को अच् अग्रम् के अ परे रहने पर अवङ् आदेश प्राप्त हुआ ।  अवङ् आदेश अनेक अल् वाला है तथा इसमें ङ् की इत्संज्ञा होने के कारण यह ङित् है। अनेकाल्शित् सर्वस्य के अनुसार अनेकाल् आदेश सम्पूर्ण गो के स्थान पर प्राप्त है। अवङ् ङित् होते हुए अनेकाल् आदेश है, अतः ङिच्च अनेकाल्शित् को बाधित कर अंतिम वर्ण ओ के स्थान पर आदेश करने का निर्देश दिया। ग् + अव + अग्रम् में दीर्घ होकर गवाग्रम्  बना। विकल्प पक्ष में एङः पदान्तादति से पूर्वरूप होकर गोऽग्रम् बना।
गो + इ (इ सप्तमी विभक्ति) यहाँ गो शब्द पदान्त में नहीं है। यहाँ अवङ् आदेश होने पर गव + इ गुण होकर गवे रूप बन जाता, जो अभीष्ट नहीं है। अतः सूत्र में पदान्त कहा। गो + इ में अवादेश होता है। एङन्त अनुबन्ध का कारण चित्रगु + अग्रम् में दिया गया है।
४८ इन्‍द्रे च
गोरवङ् स्‍यादिन्‍द्रे । गवेन्‍द्रः ।।
इन्द्र शब्द परे रहते गो शब्द को अवङ् आदेश हो। गो + इन्द्र इस स्थिति में ओ को अवङ् आदेश हुआ। ङ् की इत् संज्ञा लोप, ग् + अव + इन्द्र हुआ। आद् गुणः से अ तथा इ का गुण एकादेश ए हुआ। गवेन्द्रः रूप बनेगा।

४९ दूराद्धूते च
दूरात्‍सम्‍बोधने वाक्‍यस्‍य टेः प्‍लुतो वा ।।

दूर से पुकारने में वाक्य के टि को प्लुत हो विकल्प से।
५० प्‍लुतप्रगृह्‍या अचि नित्‍यम्
एतेऽचि प्रकृत्‍या स्‍युः । आगच्‍छ कृष्‍ण ३ अत्र गौश्‍चरति ।।  

अच् परे रहते प्लुत और प्रगृह्य संज्ञक को प्रकृतिभाव हो।
आगच्‍छ कृष्‍ण + अत्र गौश्‍चरति में अचोन्त्यादि टि से  ण के अ की टि संज्ञा हुई। दूराद्धूते च से दूर से पुकारने वाले इस वाक्य के टि को विकल्प से प्लुत हुआ। प्‍लुतप्रगृह्‍या अचि नित्‍यम् से प्लुत संज्ञक अ से अच् बाद में होने के कारण प्रकृतिभाव हुआ।  आगच्‍छ कृष्‍ण ३ अत्र गौश्‍चरति बना।
५१ ईदूदेद् द्विवचनं प्रगृह्‍यम्
ईदूदेदन्‍तं द्विवचनं प्रगृह्‍यं स्‍यात् । हरी एतौ । विष्‍णू इमौ । गङ्गे अमू ।।

ईत् ऊत् तथा एत् (ईकारान्त ऊकारान्त तथा एकारान्त) द्विवचन की प्रगृह्य संज्ञा हो।

हरी में ई, विष्‍णू में ऊ तथा गङ्गे में एकारान्त द्विवचन है। अतः इस सूत्र से हरी एतौ । विष्‍णू इमौ । गङ्गे अमू में ई, ऊ तथा ए की प्रगृह्यसंज्ञा हुई। प्रगृह्यसंज्ञा होने से प्लुतप्रगृ०से प्रकृतिभाव हुआ। 
५२ अदसो मात्
अस्‍मात्‍परावीदूतौ प्रगृह्‍यौ स्‍तः । अमी ईशाः । रामकृष्‍णावमू आसाते । मात्‍किम् ? अमुकेऽत्र ।।

अदस् शब्द के अवयव स्वरूप मकार से परे ईकारान्त तथा ऊकारान्त की प्रगृह्य संज्ञा हो।
अदस् शब्द से अमी बनता है। अमी का ईकार तथा ईशा के ई में सवर्ण दीर्घ प्राप्त था, जिसे बाधकर अदसो मात् से ईकारान्त अदस् शब्द की प्रगृह्य संज्ञा हुई।  प्रगृह्यसंज्ञा होने से प्लुतप्रगृ०से प्रकृतिभाव हुआ। अमी ईशाः रूप बना। इसी प्रकार रामकृष्‍णावमू आसाते में यण् न होकर प्रगृह्यसंज्ञा तथा  प्रकृतिभाव हुआ। सूत्र में मात्= मकार से परे यदि नहीं कहते तो ईदूदेद् सूत्र से एत् की भी अनुवृत्ति आती। अदस् शब्द के अवयव स्वरूप एकार के बाद भी प्रगृह्यसंज्ञा का विधान होता। वस्तुतः अदस् शब्द के म के बाद ए कहीं नहीं आता। अतः मात् ग्रहण किया। 
५३ चादयोऽसत्‍वे
अद्रव्‍यार्थाश्‍चादयो निपाताः स्‍युः ।।

द्रव्य भिन्न अर्थ में च आदि निपात संज्ञक हों। जिन शब्दों में लिंग तथा संख्या का अन्वय (बोध) होता है, उसे द्रव्य कहते हैं।  लिङ्गसंख्यान्वयित्वं द्रव्यत्वम् ।
५४ प्रादयः
एतेऽपि तथा ।।

प्र आदि की भी निपात संज्ञा हो।
५५ निपात एकाजनाङ्
एकोऽज् निपात आङ्वर्जः प्रगृह्‍यः स्‍यात् । इ इन्‍द्रः । उ उमेशः । ’वाक्‍यस्‍मरणयोरङित्आ एवं नु मन्‍यसे । आ एवं किल तत् । अन्‍यत्र ङित् - आ ईषदुष्‍णम् ओष्‍णम् ।।

आङ् को छोड़कर एक अच् रूप निपात की प्रगृह्य संज्ञा होती है।  इ इन्‍द्रः का इ चादि गण में पठित है, अतः चादयोऽसत्‍वे से निपात संज्ञा,  निपात एकाजनाङ् से प्रगृह्‍य संज्ञा तथा प्लुतप्रगृह्या से प्रकृतिभाव हुआ। इसी प्रकार उ उमेशः में भी। यहाँ सवर्ण दीर्घ प्राप्त था, जिसे चादयोऽसत्‍वे से बाध हो गया। वाक्य तथा स्मरण अर्थ में आ को प्रयोग होता है। वह आङ् नहीं है अतः आ एवं नु मन्‍यसे इस वाक्य में भी प्रकृतिभाव हुआ। जहाँ आङ् का आ होगा वहाँ प्रगृह्य संज्ञा नहीं होगी। जैसे ओष्णम्  का आ आङ् का आ है। अतः आ + उष्णम् में गुण होगा, प्रगृह्य संज्ञा नहीं।
एक कारिका से स्पष्ट हो जाता है कि कहाँ पर "आ" का प्रयोग और कहाँ पर "आङ्" का प्रयोग होता है।
                        ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः ।
एतमातं ङितं विद्यात् वाक्यस्मरणयोरङित् ॥

इस कारिका के अनुसार चार अर्थों में आङ् शब्द का  प्रयोग होता है,,जबकि दो अर्थों में "आ" का।
५६ ओत्
ओदन्‍तो निपातः प्रगृह्‍यः स्‍यात् । अहो ईशाः ।।

ओदन्त निपात की प्रगृह्य संज्ञा होती है। 
अहो अद्रव्यवाची शब्द है, अतः इसे चादयोऽसत्‍वे से निपात संज्ञा तथा ओदन्त निपात होने से ओत् सूत्र से प्रगृह्य संज्ञा हुई। अहो के ओ की प्रगृह्य संज्ञा होने से प्लुतप्रगृह्या से प्रकृतिभाव होता है। अहो ईशाः बना। प्रगृह्य संज्ञा तथा प्रकृतिभाव होने के कारण एचोऽयवायावः से प्राप्त ओ को अवादेश नहीं होगा।  
५७ सम्‍बुद्धौ शाकल्‍यस्‍येतावनार्षे
सम्‍बुद्धिनिमित्तक ओकारो वा प्रगृह्‍योऽवैदिके इतौ परे । विष्‍णो इतिविष्‍ण इतिविष्‍णविति ।।

सम्बुद्धि के ओकार की विकल्प से प्रगृह्य संज्ञा हो इति शब्द परे रहते जो कि वेद का विषय नहीं हो।
संबोधन के एकवचन को सम्बुद्धि कहते हैं। विष्णु शब्द के एकवचन सम्बोधन में विष्णो रूप बनता है। विष्णो इति में एचोऽयवायावः से अवादेश प्राप्त था, जिसे सम्बुद्धौ शाकल्यस्य से प्रगृह्यसंज्ञा तथा प्लुतप्रगृह्या से प्रकृतिभाव हो जाता है। विकल्प पक्ष में  एचोऽयवायावः से अवादेश तथा लोपः शाकल्यस्य से व् का लोप होकर विष्ण इति बना। लोपः शाकल्यस्य के विकल्प पक्ष में विष्णविति रूप बनेगा। सूत्र में वेद से भिन्न इति शब्द होने पर ही प्रगृह्यसंज्ञा का नियम किया गया है, अतः ब्रह्मबन्धो इत्यब्रवीत् जैसे वैदिक शब्द में यह सूत्र नहीं लगेगा।

५८ मय उञो वो वा
मयः परस्‍य उञो वो वाऽचि । किम्‍वुक्तम्किमु उक्तम् ।।

मय् से परे उञ् के उकार को विकल्प से व होता है, अच् परे रहते ।

किमु उक्तम् का विग्रह है- किम् उ उक्तम् । यहाँ मय् से परे उञ् के उकार को विकल्प से व् होकर किम् व् उक्तम् हुआ। वर्ण संयोग करने पर किम्वुक्तम् रूप बनेगा। यह सूत्र विकल्प से उ को व् करता है अतः विकल्प पक्ष में चादयोऽसत्वे से निपात संज्ञा, निपात एकाच् सूत्र से  प्रगृह्य संज्ञा, प्लुतप्रगृह्या से प्रकृतिभाव होकर किमु उक्तम् बनेगा। 
५९ इकोऽसवर्णे शाकल्‍यस्‍य ह्रस्‍वश्‍च
पदान्‍ता इको ह्रस्‍वा वा स्‍युरसवर्णेऽचि । ह्रस्‍वविधिसामर्थ्यान्न स्‍वरसन्‍धिः । चक्रि अत्रचक्रय्‍त्र । पदान्‍ता इति किम् - गौर्यौ। 

असवर्ण अच् परे रहते पदान्त इक् को विकल्प से ह्रस्व हो।

चक्री + अत्र में चक्री पद के अंत में ई को असवर्ण अच् अत्र के अ परे रहने पर ह्रस्व होगा। चक्रि अत्र रूप बनेगा। विकल्प पक्ष में इको यणचि से ई को य् होने पर चक्रय्त्र रूप बनेगा । शब्द के द्विवचन में पद के अंत में जहां ई होता हो, वहाँ ईदूदेद् सूत्र को लगाना चाहिए। चक्रि अत्र में बी  इको यणचि से यण् प्राप्त है। परन्तु प्रस्तुत सूत्र द्वारा ह्रस्व किया जाना व्यर्थ हो जाएगा। अतः किये जा चुके ह्रस्व कार्य के अनन्तर यण् नहीं होगा। गौरी + औ में गौरी का ई पद के अंत में नहीं होने है, क्योंकि सुप्तिङन्तं पदम् से यहाँ सुबन्त औ तक की पद संज्ञा होगी। अतः यहाँ ह्रस्व नहीं होकर यण् होगा।  
६० अचो रहाभ्‍यां द्वे
अचः पराभ्‍यां रेफहकाराभ्‍यां परस्‍य यरो द्वे वा स्‍तः । गौर्य्‍यौ । 

अच् से परे रेफ (र्) तथा हकार हो तथा उससे परे यर् को द्वित्व विकल्प से हो।
अच् से परे रेफ (र्) तथा हकार हो तथा उससे परे यर् को द्वित्व विकल्प से हो।

गौरी + औ में यण् करने के पश्चात् गौर् + य् + औ इस स्थिति में अच् है औ उसके बाद रेफ है र् उसके बाद के यर् (य्) को विकल्प से द्वित्व होगा। गौर् + य् + य् + औ । वर्ण संयोग होने से गौर्य्यौ रूप बनेगा। विकल्प पक्ष में यथावत् गौर्यौ बनेगा। इसी प्रकार कार्य्य, ऊर्द्ध्वम् आदि में भी द्वित्व किया हुआ रूप देखा जा सकता है।
(न समासे) । वाप्‍यश्वः ।।

असवर्ण अच् परे रहते समास में पदान्त इक् को ह्रस्व नहीं हो।

वाप्याम् अश्वः वाप्यश्वः समस्त पद है। वापी आम् अश्व सु । समास में सुप् का लोप हो जाने पर वापी अश्व इस स्थिति में भी इकोऽसवर्णे से ह्रस्व प्राप्त था, परन्तु इस वार्तिक द्वारा निषेध हो जाता है। इसी प्रकार सुध्युपास्यः आदि में भी समझना चाहिए।
६१ ऋत्‍यकः
ऋति परे पदान्‍ता अकः प्राग्‍वद्वा । ब्रह्‍म ऋषिःब्रह्‍मर्षिः । पदान्‍ताः किम् ? आर्च्छत् ।।

ऋत् (ह्रस्व ऋकार) परे रहते पदान्त अक् को विकल्प से ह्रस्व हो।
ब्रह्मा + ऋषि इस अवस्था में ऋषि के ऋ बाद में होने के कारण ब्रह्मा इस पद के अंत वर्ण आ को ह्रस्व अ हो गया। ब्रह्म  ऋषि रूप बना। ब्रह्म + ऋषि में आद् गुणः सूत्र से गुण प्राप्त हुआ। चुंकि प्रस्तुत सूत्र द्वारा ह्रस्व का विशेष विधान किया गया अतः यहाँ गुण करने पर प्रकृत सूत्र का पाठ व्यर्थ चला जाएगा। यदि गुण करना अभीष्ट होता तो ब्रह्मा + ऋषि इस अवस्था में भी किया जा सकता था। अतः यहाँ गुण नहीं होगा।
            ऋत्यकः द्वारा ह्रस्व का विधान विकल्प से किया गया है अतः विकल्प पक्ष में  ब्रह्मा + ऋषि इस अवस्था में आद् गुणः से गुण होकर ब्रह्मर्षिः रूप बनेगा।

            आचार्य सूत्र के प्रत्येक पद की सार्थकता को बताने के लिए प्रश्न के द्वारा समाधान दिखाते हैं। यहाँ भी पदान्त विशेषण की सार्थकता पर ध्यानाकर्षण करते हुए समाधान प्रस्तुत करते हैं। यदि पदान्त ऐसा नहीं कहते तो आ + ऋच्छत् का आ अक् प्रत्याहार के अन्तर्गत आता है। यहाँ भी ह्रस्व होने लगाता, जो कि वांछित नहीं है। आ + ऋच्छत् में आ उपसर्ग है।  स्वतंत्र उपसर्ग पद नहीं होता है,बल्कि यह किसी सुबन्त या तिङन्त के साथ प्रयुक्त होकर पद कहलाता है। अतः आ + ऋच्छत् में पिरकृत सूत्र की प्रवृत्ति नहीं होकर आटश्च से वृद्धि होकर आर्च्छत् रूप बनता है।

इत्‍यच्‍सन्‍धिः

पुनः स्मरण

मुख्य सूत्र                 कार्य                    उदाहरण
इको यणचि                  यण्             सुध्युपास्यः, मध्वरिः, धात्रंशः
एचोऽयवायावः              अयादि        हरये, विष्‍णवे, नायकः, पावकः
आद्गुणः                       गुण           उपेन्‍द्रः, गङ्गोदकम्

वृद्धिरेचि                       वृद्धि          कृष्‍णैकत्‍वम्, गङ्गौघः, देवैश्वर्यम्


सन्धि के बारे में मुख्य सिद्धान्त- 

                                         अथ हल् सन्‍धिः


६२ स्‍तोः श्‍चुना श्‍चुः
सकारतवर्गयोः शकारचवर्गाभ्‍यां योगे शकारचवर्गौ स्‍तः । रामश्‍शेते । रामश्‍चिनोति । सच्‍चित् । शार्ङ्गिञ्जयः। 
सकार तथा तवर्ग का शकार तथा चवर्ग के साथ योग होने पर सकार के स्थान पर शकार तथा तवर्ग के स्थान पर चवर्ग हो।
सकार तथा तवर्ग का शकार तथा चवर्ग के साथ पूर्व या पर में कहीं भी योग होगा को स् को श् तथा तवर्ग के स्थान पर यथासंख्य चवर्ग आदेश होगा। रामस् + शेते में स् के बाद शकार होने से स् को श् आदेश हुआ। रामश्शेते बना। आप वा शरि सूत्र के नियम से रामः शेते भी लिख सकते है। इसे हम विसर्ग सन्धि में पढ़ेंगे। इसी प्रकार अन्य उदाहरण-
रामस् + चिनोति में स् को श् आदेश हुआ रामश्चिनोति बना।
सत् + चित्         में त् को च् आदेश हुआ सच्चित् बना।
शार्ङ्गिन् + जय   में न् को ञ् आदेश हुआ शार्ङ्गिञ्जय बना।
श्चुत्व नियम का निषेध-
६३ शात्
शात्‍परस्‍य तवर्गस्‍य श्चुत्‍वं न स्‍यात् । विश्‍नः । प्रश्‍नः ।।
शकार से परे तवर्ग का शकार और चवर्ग नहीं हो।
विश् + न में शकार के बाद न (तवर्ग) होने पर स्तोः श्चुना श्चुः से न को श्चुत्व ञ् प्राप्त था, इस सूत्र से श्चुत्व का निषेध हो गया। इसी प्रकार प्रश्नः में भी।
इस निषेध सूत्र से ज्ञात होता है कि श् चवर्ग के पूर्व या बाद तवर्ग, स हो या स् तवर्ग के बाद श् या चवर्ग हो। दोनों ही स्थिति में श्चुत्व होगा। पूर्व या पर किसी भी स्थिति में होने पर श्चुत्व प्राप्त नहीं होता तो यह सूत्र निषेध नहीं करता।  
६४ ष्‍टुना ष्‍टुः
स्‍तोः ष्‍टुना योगे ष्‍टुः स्‍यात् । रामष्‍षष्‍ठः । रामष्‍टीकते । पेष्‍टा । तट्टीका । चक्रिण्‍ढौकसे ।।
सकार तथा तवर्ग का षकार तथा टवर्ग के साथ योग होने पर सकार के स्थान पर षकार तथा तवर्ग के स्थान पर  टवर्ग हो। 
इस सूत्र में भी सकार और तवर्ग का षकार और टवर्ग के साथ यथासंख्य योग होने पर यथासंख्य कार्य का नियम लागू नहीं होता है। रामस्+ षष्ठः में सकार तथा षकार का योग होने पर इस सूत्र से स् को ष् आदेश हुआ। रामष्षष्ठः रूप बना। इसी प्रकार
पेष् + ता में तकार को टकार आदेश होकर = पेष्टा
तत् + टीका में तकार को टकार आदेश होकर = तट्टीका

चक्रिन् + ढौकसे में नकार को णकार आदेश होकर = चक्रिण्ढौकसे रूप बनेगा।
६५ न पदान्‍ताट्टोरनाम्
पदान्‍ताट्टवर्गात्‍परस्‍यानामः स्‍तोः ष्‍टुर्न स्‍यात्। षट् सन्‍तः । षट् ते । पदान्‍तात्‍किम् ? ईट्टे । टोः किम् ? सर्पिष्‍टमम् ।
पदान्त टवर्ग से परे नाम भिन्न शब्द के सकार तथातवर्ग के स्थान पर ष्टुत्व नहीं हो।
षट् सन्‍तः । षड् + सन्तः में सकार को ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व प्राप्त था। षड् पद के बाद सकार होने से न पदान्तात् सूत्र से ष्टुत्व का बाध हो गया। षड् + सन्तः में डकार को खरि च से चर् (टकार) हो जाने पर षट् सन्तः रूप बनता है। इसी प्रकार षड् + ते में षड् पद के बाद तवर्ग ते होने से कारण इस सूत्र से ष्टुत्व का निषेध हो गया। डकार का चर्त्व टकार होकर षट् ते रूप बना। 
आचार्य पाणिनि के सूत्रों में किये गये प्रत्येक अनुबन्धों की समीक्षा कर उसकी उपयोगिता बताते हैं। न पदान्तात् सूत्र में पदान्त ग्रहण क्यों किया गया? उत्तर देते हैं- इट् + ते में तिङन्त ते है, जिसकी सुप्तिङन्तं पदम् से पद संज्ञा होती है। यदि यहाँ पदान्त नहीं कहा जाता तो इट् के टकार के बाद तकार होने से ष्टुत्व का निषेध हो जाता। इस प्रकार की अनिष्ट आपत्ति से बचने के लिए इस सूत्र में पदान्त कथन किया गया। इट् + ते में तकार का ष्टुत्व टकार होकर इट्टे रूप सिद्ध हुआ।

इसी प्रकार सूत्र में टवर्ग ग्रहण की उपयोगिता का उदाहरण सर्पिष्‍टमम् देते हैं। यदि पदान्त से परे नाम से भिन्न सकार तवर्ग के ष्टुत्व का निषेध किया जाता तो सर्पिष् +तमम् जैसे स्थल पर भी ष्टुत्व का निषेध हो जाता। अतः सूत्र में टवर्ग से परे कहा गया। सर्पिष्‍ +तमम् में ष्टुना ष्टुः से तकार को ष्टुत्व होकर सर्पिष्टमम् रूप बना।
(अनाम्‍नवतिनगरीणामिति वाच्‍यम्) । षण्णाम् । षण्‍णवतिः । षण्‍णगर्यः ।।
नाम, नवति, नगरी को छोड़कर ष्टुत्व का निषेध हो।

षण्णाम् । षण्‍णवतिः । षण्‍णगर्यः । षड् + नाम, षड् + नवति, षड् + नगर्यः में ष्‍टुना ष्‍टुः से नाम, नवति तथा नगर्यः के नकार को ष्टुत्व णकार प्राप्त था, जिसे न पदान्ताट्टोरनाम् से ष्टुत्व का निषेध हो रहा था। ष्टुत्व निषेध होने से अनिष्ट रूप बन रहे थे,जबकि ष्टुत्व होने पर ही इच्छित रूप बन सकता है। अतः अनाम्नवति० वार्तिक द्वारा नाम, नवति तथा नगरी को छोड़कर  ष्टुत्व निषेध का विधान किया। इस प्रकार षड् + नाम में नकार को ष्टुत्व णकार होकर षड् + णाम हुआ । षड् के डकार को प्रत्यये भाषायां नित्यम् सूत्र से णकार हुआ षण्णाम् रूप बना । इसी प्रकार षड् + नवति  में नकार को ष्टुत्व णकार तथा डकार को यरोऽ नुनासिके०से णकार हुआ षण्‍णवतिः रूप बना ।
६६ तोः षि
न ष्‍टुत्‍वम् । सन्‍षष्‍ठः ।।
तवर्ग का षकार परे रहते ष्टुत्व नहीं हो।

सन्‍षष्‍ठः । सन् + षष्ठः इस अवस्था में ष्‍टुना ष्‍टुः से सन् के नकार को ष्टुत्व प्राप्त हुआ। प्रकृत सूत्र से सन् + षष्ठः में तवर्ग नकार से षकार परे रहने पर ष्टुत्व का निषेध हो गया । सन्षष्ठः यथावत् रूप बना। 
६७ झलां जशोऽन्‍ते
पदान्‍ते झलां जशः स्‍युः । वागीशः ।।
पदान्त में झल् के स्थान पर जश् हो। वाक् + ईशः में पदान्त झल् है वाक् का क् , इसे जश् हुआ ग् । वाग् + ईशः = वागीशः रूप बना।
विशेष-

जश्त्व सन्धि 1. पदान्त (झल्) वर्णों का 2. अपदान्त (झल्) वर्णों का में होता है। यहाँ आपने पदान्त झल् के जश्त्व के बारे में पढ़ा है। अपदान्त जश्त्व के बारे में सुध्युपास्यः सिद्ध करते समय झलां जश् झसि इस सूत्र को पढ़ चुके हैं।
६८ यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा
यरः पदान्‍तस्‍यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्‍यात् । एतन्‍मुरारिःएतद् मुरारिः ।
पदान्त में यर् के स्थान पर विकल्प से अनुनासिक हो अनुनासिक परे रहते। 
एतन्‍मुरारिः। एतद् + मुरारिः इस दशा में एतद् इस पद के अंत में यर् वर्ण है दकार। इस दकार को अनुनासिक मुरारिः के मकार परे रहते अनुनासिक वर्ण नकार हो जाएगा। यहाँ पर द् को अनुनासिक न् आदेश उच्चारण स्थान की समानता के कारण हुआ।  एतन्मुरारिः रूप बना। विकल्प पक्ष में एतद्मुरारिः रहेगा। इसी प्रकार धिक् + मनः  आदि बनाकर देखें 
 (प्रत्‍यये भाषायां नित्‍यम्) । तन्‍मात्रम्। चिन्‍मयम् ।।
अनुनासिक से प्रारम्भ होने वाले प्रत्यय परे रहते पदान्त यर् के स्थान पर नित्य अनुनासिक हो।
तन्‍मात्रम्। तद् + मात्रम् इस अवस्था में तद् एक पद है तथा इसके आगे मात्रच् प्रत्यय का मकार है, जो कि अनुनासिक है।  अनुनासिक से प्रारम्भ होने वाला मात्रच् प्रत्यय के मकार, तद् इस पदान्त यर् के बाद में है। अतः द् के स्थान पर  अनुनासिक वर्ण होगा नकार। तन्मात्रम् रूप बनेगा। इसी प्रकार चित् + मयम् में पदान्त यर् चित् के बाद मयट् प्रत्यय का म होने से चिन्मयम् रूप बनेगा। कई लोग संस्कृत वाङ्मय शब्द अशुद्ध लिखते है। यहाँ वाक् + मयम् शब्द है। ककार को ङकार होकर वाङ्मय रूप बनेगा।
६९ तोर्लि
तवर्गस्‍य लकारे परे परसवर्णः । तवर्गस्‍य लकारे परे परसवर्णः । तल्‍लयः । विद्वाँल्‍लिखति । नस्‍यानुनासिको लः ।
लकार परे रहते तवर्ग के स्थान पर परसवर्ण हो।

तल्लयः। तद् + लयः इस स्थिति में तवर्ग के दकार से परे लयः का लकार रहने पर दकार के स्थान पर पर सवर्ण आदेश प्राप्त हुआ। तुल्‍यास्‍यप्रयत्‍नं सवर्णम् के अनुसार दकार तथा लकार का एक उच्चारण स्थान है (ॡतुलसानां दन्‍ताः । ॡ, तवर्ग, ल एवं श का उच्चारण स्थान दांत है।) अतः दकार के स्थान पर स्थान साम्य आदेश लकार होगा। तल्लयः रूप बनेगा। इसी प्रकार विद्वान् + लिखति में नकार के अनुनासिक होने से इसके स्थान पर अनुनासिक लँकार आदेश हुआ। विद्वाँल्लिखति बना।
७० उदः स्‍थास्‍तम्‍भोः पूर्वस्‍य
उदः परयोः स्‍थास्‍तम्‍भोः पूर्वसवर्णः ।।
उद् उपसर्ग पूर्वक स्था और स्तम्भ धातुओं को पूर्वसवर्ण हो।

७१ तस्‍मादित्‍युत्तरस्‍य
पञ्चमीनिर्देशेन क्रियमाणं कार्यं वर्णान्‍तरेणाव्‍यवहितस्‍य परस्‍य ज्ञेयम् ।।
पंचमी विभक्ति के निर्देश के द्वारा किया जाना वाला कार्य दूसरे वर्ण के व्यवधान रहित पर वर्ण को हो।

इस सूत्र को समझने के लिए उदः स्थास्तम्भोः सूत्र तथा तस्मादित्युत्तरस्य इन दोनों सूत्रों को समझना अनिवार्य है। परिभाषा के अनुसार उदः इस पञ्चम्यन्त पद के निर्देश द्वारा जिस कार्य का विधान बाद के पद के स्थान में किया गया हो, वह कार्य पर पद के आदि वर्ण के स्थान में हो। 
७२ आदेः परस्‍य
परस्‍य यद्विहितं तत्तस्‍यादेर्बोध्‍यम् । इति सस्‍य थः ।।
पर पद के स्थान में जो विहित कार्य वह पर पद के आदि वर्ण को हो। 
७३ झरो झरि सवर्णे
हलः परस्‍य झरो वा लोपः सवर्णे झरि ।।
हल् से परे झर् का लोप हो सवर्ण झर् के परे रहते विकल्प से।

७४ खरि च
खरि झलां चरः । इत्‍युदो दस्‍य तः । उत्‍थानम् । उत्तम्‍भनम् ।।
खर् परे रहते झल् के स्थान पर चर् हो।
उत्‍थानम् । उद् +थ + थानम् में दकार हल् से परे थकार झर् है। इसके बाद सवर्ण झर् है शानम् का थकार, अतः पूर्व थकार का विकल्प से लोप होगा। लोप हो जाने पर उद् + थानम् होगा।

उद् + थानम् तथा उद् +थ + थानम् दोनों रूपों में खर् (थकार) के परे रहते (दकार) झल् के स्थान पर सदृशतम  चर् आदेश तकार होगा। लोप पक्ष में उत् + थानम् = उत्थानम् तथा विकल्प पक्ष में उत् +थ + थानम् = उत्थथानम् रूप बनेगा। इसी प्रकार उद् थ तम्भनम् में उत्तम्भनम् तथा उत्थ्तम्भनम् रूप बनेगा।
विशेष-

यह सूत्र झल् वर्णों को चर् करता है अतः इसे चर्त्व सन्धि कहते हैं। हल् सन्धि का यह महत्वपूर्ण सूत्र है।
७५ झयो होऽन्‍यतरस्‍याम्
झयः परस्‍य हस्‍य वा पूर्वसवर्णः । नादस्‍य घोषस्‍य संवारस्‍य महाप्राणस्‍य तादृशो वर्गचतुर्थः । वाग्‍घरिःवाग्‍हरिः ।।
झय् परे रहते हकार को पूर्वसवर्ण हो विकल्प हो।
७६ शश्‍छोऽटि
झयः परस्‍य शस्‍य छो वाऽटि । तद् शिव इत्‍यत्र दस्‍य श्‍चुत्‍वेन जकारे कृते खरि चेति जकारस्‍य चकारः । तच्‍छिवःतच्‍शिवः । 
झय् से परे शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो अट् परे रहते।

तच्‍छिवः, तच्‍शिवः । तद् + शिवः इस अवस्था में स्तोः श्चुना श्चुः से तद् के दकार का श्चुत्व जकार हुआ। तज् + शिवः रूप बना। खरि च सूत्र से तज् के जकार को चकार हुआ तच् + शिवः रूप बना। अब शश्‍छोऽटि से तच् इस पद के अंत के अंतिम  वर्ण च् के परे शिवः का शकार होने से शकार को विकल्प से छकार हुआ। तच्छिवः रूप बना। जिस बार शश्‍छोऽटि शकार को छकार नहीं होगा उस पक्ष में तच्शिवः रूप बनेगा।
(छत्‍वममीति वाच्‍यम्) तच्‍छ्लोकेन ।।
अम् परे रहते पदान्त झय् से परे शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो।

तच्‍छ्लोकेन । तद् + श्लोकेन में  तद् के दकार को स्तोः श्चुना श्चुः से श्चुत्व जकार हुआ तथा जकार को खरि च से चकार होकर तच् + श्लोकेन हुआ। तद् श्लोकेन में पद है- तच्, इसके अंत में झय् का चकार है, इस पदान्त झय् से परे है श्लोकेन का शकार है। इस शकार से परे अम् है लकार। ऐसी स्थिति में शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो गया।  वर्ण सम्मेलन होकर तच्‍छ्लोकेन बना। 
७७ मोऽनुस्‍वारः

मान्‍तस्‍य पदस्‍यानुस्‍वारो हलि । हरिं वन्‍दे ।।

मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार हो हल् परे रहते।
हरिं वन्‍दे । हरिम् + वन्दे में मान्त पद हरिम्  है, हल् परे है वन्दे का वकार अतः हरिम् इस पद को मोऽनुस्‍वारः से अनुस्वार प्राप्त हुआ। अलोऽन्त्यस्य के अनुसार हरिम् क् अंतिम अल् मकार के स्थान पर अनुस्वार होकर हरिं वन्‍दे रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार व्याघ्रं हन्ति। मधुरं खादति आदि में अनुस्वार होता है।


७८ नश्‍चापदान्‍तस्‍य झलि

नस्‍य मस्‍य चापदान्‍तस्‍य झल्‍यनुस्‍वारः । यशांसि । आक्रंस्‍यते । झलि किम् ? मन्‍यते ।।

अपदान्त नकार तथा मकार से झल् परे रहते उसके स्थान पर अनुस्वार हो।
यशांसि । जो पद के अंत में नहीं हो उसे अपदान्त कहते हैं। यशान् + सि में यशान् का नकार पद के अंत में नहीं है। यशस् शब्द का पद है यशांसि। अपदान्त यशान् के नकैर को झल्  (स्) परे रहते अनुस्वार हो गया। यशांसि रूप बना। इसी प्रकार आक्रम् + स्यते में मकार को अनुस्वार होकर आक्रंस्यते रूप बना। अन्य उदाहरण- पयांसि, नमांसि आदि ।
झलि किम् ? ग्रन्थकार प्रश्न करते हुए प्रत्येक अनुबन्ध की उपयोगिता दिखाते हैं। यहाँ प्रश्न हुआ कि यदि सूत्र में झल् परे रहने पर ऐसा नहीं कहते अर्थात् अपदान्त नकार तथा मकार के स्थान पर अनुस्वार हो। इतना मात्र कहते तो क्या होता? उसका उत्तर मन्‍यसे इस उदाहरण से दे रहे हैं। मन् + यसे में अपदान्त मन् के नकार को अनुस्वार होकर मंन्यसे ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । अतः सूत्र में झलि कहा। झलि कहने से यसे का यकार झल् प्रत्याहार में नहीं आता अतः यहाँ अनुस्वार नहीं होता।
सारांश-

अनुस्वार सन्धि दो स्थितियों में होती है। 1. कोई भी व्यंजन वर्ण बाद में होने पर पदान्त म् वर्ण को नित्य अनुस्वार होता है। 2. झल् परे रहते अपदान्त न् तथा म् वर्णों का अनुस्वार होता है। मोऽनुस्‍वारः हल् सन्धि का यह महत्वपूर्ण सूत्र है।
विशेष-
काव्यों में प्रयोग देखें*

श्रिय: प्रसूते विपद: रुणद्धि यशांसि दुग्धे मलिनं प्रमार्ष्टि ।
संस्कारसौधेन परं पुनीते शुद्धा हि बुद्धि: किल कामधेनु: ।।
शुद्ध बुद्धि निश्चय ही कामधेनु जैसी है क्योंकि वह वैभव पैदा करती है; आने वाली विपत्ति से बचाती है; यश  रूपी दूध में मलिनता को धो डालती है और दूसरों को अपने पवित्र संस्कारों से पवित्र करती है।

यन्नन्दने कल्पमहीरुहाणां छायासु विश्रम्य रतिश्रमेण ।
गायन्ति मे शौर्यरसोर्जितानि गीर्वाणसारङ्गदृशो यशांसि ॥४२॥ विक्रमाङ्कदेवचरितम्
यह जो सम्भोग से थकी हुई मृगनयनी देवियाँ नन्दन वन में कल्पवृक्ष की छाया में विश्राम कर मेरे वीर रस से परिवर्द्धित यशो का गान कर रही है।
७९ अनुस्‍वारस्‍य ययि परसवर्णः

स्‍पष्‍टम् । शान्‍तः ।।

अनुस्वार के स्थान में परसवर्ण हो, यय् परे रहते
शान्‍तः। शां + तः में शां के अनुस्वार को यय् (तः) तकार परे रहने पर परसवर्ण हो गया। अनुस्वार का स्थान साम्य परसवर्ण तवर्ग का पंचमवर्ण नकार होगा।

विशेष-

शाम् + तः में मकार को नश्चापदान्तस्य से अनुस्वार तथा अनुस्वार को इस सूत्र से परसवर्ण (नकार) होने पर शांतः रूप बना। अन्य उदाहरण-  शङ्का, गुण्ठितः, गङ्गा, अञ्चितः आदि
यस्य न स्वदते दृश्यमदृश्यं स्वदते हृदि ।
सबाह्याभ्यन्तरं शान्तः स वितीर्णो भवार्णवात्।। योगवासिष्ठः
सर्वविकल्पहीनः शुद्धो बुद्धोऽजरामरः शान्तः।
अमलः सकृद्विभातश्चेतन आत्मा खवद्व्यापी ।। परमार्थसारम्

८० वा पदान्‍तस्‍य

त्‍वङ्करोषि, त्‍वं करोषि ।।

पदान्त अनुस्वार के स्थान पर विकल्प से परसवर्ण हो, यय् परे रहते।

त्‍वङ्करोषि। त्वम् + करोषि में  त्वम् और करोषि ये दो पद हैं । इन दोनों पदों में से त्वम् इस पद के मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर त्वं हो गया। यह अनुस्वार बाद में स्थित वर्ण के करोषि के ककार समान होगा। इस अनुस्वार वर्ण को तुल्यास्यप्रयत्नं सूत्र के अनुसार विकल्प से परसवर्ण होगा। त्वं का अनुस्वार परवर्ती ककार के पंचम वर्ण के समान होकर  त्‍वङ्करोषि हो जाएगा। विकल्प पक्ष में त्वं करोषि ही रहेगा।

पोषणं स्वेन रूपेण वैकुण्ठे त्वं करोषि च ।

भूमौ भक्तविपोषाय छायारूपं त्वया कृतम् ॥ श्रीमद्भागवतपुराणम्/माहात्म्य 
भवांल्लिखति ताञ्चक्रे भवाञ्शेतेऽप्यनीदृशः ।
भवाण्डीनं त्वन्तरसि त्वङ्करोषि सदार्चनम् ॥ गरुडपुराणम्
विशेष-
पूर्व में अनुस्वार तथा बाद में यय् प्रत्याहार का वर्ण होने पर अनुस्वार के स्थान पर परसवर्ण हो जाता है। इसे परसवर्ण सन्धि भी कहा जाता है। परसवर्ण सन्धि दो स्थितियों में होती है। 
1. अपदान्त अनुस्वार के बाद यय् परे रहने पर नित्य अनुस्वार होता है जबकि 
2. पदान्त अनुस्वार के बाद यय् परे रहने पर विकल्प से अनुस्वार होता है।  

८१ मो राजि समः क्‍वौ

क्विबन्‍ते राजतौ परे समो मस्‍य म एव स्‍यात् । सम्राट् ।।

क्विप् प्रत्ययान्त राज् धातु परे रहते सम् के मकार के स्थान पर म् ही हो।

सम्राट् । सम् + राट्  में राट् यह क्विप् प्रत्ययान्त शब्द है। उसके परे रहते सम् के मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार प्राप्त था। उसका निषेध इस सूत्र के होकर सम् के मकार को मकार ही रह गया। सम्राट्  रूप बना।

८२ हे मपरे वा

मपरे हकारे परे मस्‍य मो वा । किम् ह्‍मलयति, किं ह्‍मलयति ।

मकार है परे जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प से मकार हो।
यहाँ तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -

1. मकार के स्थान पर विकल्प से मकार होता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनः मकार हो।  यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् + म् ।

किम् ह्‍मलयति, किं ह्‍मलयति । किम् + ह्मलयति में हे मपरे वा से हकार के परे ह्म का मकार पर है ऐसे हकार किं के अनुस्वार के परे रहते  मोऽनुस्वारः से प्राप्त अनुस्वार को बाधकर कर विकल्प से मकार कर दिया। किम् ह्मलयति बना। विकल्प पक्ष में मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर  किं ह्मलयति बना।

(यवलपरे यवला वा)। किय्ँ ह्‍यः, किं ह्‍यः । किव्ँ ह्‍वलयति, किं ह्‍वलयति । किल्ँ ह्‍लादयति, किं ह्‍लादयति ।।

यकार, वकार, लकार है परे है जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प से य्ँ , व्ँ, ल्ँ आदेश हो।
यवलपरे वार्तिक में तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -
1. मकार के स्थान पर विकल्प से य्ँ , व्ँ, ल्ँ आदेश  होता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनः य / व/ ल हो।  यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् + य / व/ ल ।

यहाँ स्थानी मकार अनुनासिक है अतः आदेश य् व् ल् भी अनुनासिक होगा। किम् + ह्यः, किम् + ह्‍वलयति, किम् + ह्‍लादयति में ह्यः, ह्‍वलयति तथा ह्‍लादयति के हकार  के परे क्रमशः य,र, तथा ल है। ऐसा हकार किम् के मकार के परे होने पर किम् के मकार को क्रमशः अनुनासिक सहित य्ँ , व्ँ, ल्ँ होकर किय्ँ ह्‍यः, किव्ँ ह्‍वलयति,  किल्ँ ह्‍लादयति बना। विकल्प पक्ष में मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर किं ह्‍यः, किं ह्‍वलयति, किं ह्‍लादयति बने।

८३ नपरे नः

नपरे हकारे मस्‍य नो वा । किन् ह्‍नुते, किं ह्‍नुते ।।

नकार है परे जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प से नकार हो।
यहाँ भी तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -
1. मकार के स्थान पर विकल्प से नकार होता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनः नकार हो।  यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् + न् ।

किम् + ह्नुते। यहाँ मकार से परे हकार और इस हकार के बाद नकार है अतः किम् के मकार को विकल्प से नकार हो गया किन् ह्नुते बना। नकार विकल्प पक्ष में मोऽनुस्‍वारः से अनुस्वार होकर किं + ह्नुते बना।

 डः सि धुट्

डात्‍परस्‍य सस्‍य धुड्वा । 

डकार से परे सकार को धुट् आगम विकल्प से हो।
  
 आद्यन्‍तौ टकितौ

टित्‍कितौ यस्‍योक्तौ तस्‍य क्रमादाद्यन्‍तावयवौ स्‍तः ।। षट्त्‍सन्‍तःषट् सन्‍तः ।।

टित् तथा कित् आगम क्रमशः स्थानी के आदि तथा अन्त में अवयव स्वरूप हो। टित् आगम आदि में तथा कित् आगम अन्त में होगा।
षट्त् सन्तः, षट् सन्तः। षड् + सन्तः इस स्थिति में षड् के डकार से परे सकार को धुट् का आगम हो गया। धुट् में उकार तथा टकार की इत्संज्ञा होती है अतः यह टित् है। टित् होने के कारण आद्यन्‍तौ टकितौ सूत्र के अनुसार इसका आगम सकार के आदि में होगा। षड् + ध्  + सन्तः  बना। खरि च से धकार को चर्त्व होकर तकार तथा डकार को टकार होकर षट् + त्  + सन्तः बना। परस्पर वर्ण सम्मेलन होकर षट्त्सन्तः बना। धुट् का आगम विकल्प से होता है। विकल्प पक्ष में  षड् + सन्तः के डकार को चर्त्व होकर षट्सन्तः बना।
विशेष-
अध्ययनकर्ताओं को व्याकरण के आगम और आदेश को समझना चाहिए। ये दोनों पारिभाषिक शब्द हैं। शत्रुवदादेशः मित्रवदागमः के अनुसार -
आगम मित्र के समान होता है। आगम जिस वर्ण को लक्षित कर होता है वह आगम उस वर्ण के पास में आकर बैठ जाता है। वह कहाँ बैठे? पहले या बाद में इसके बारे में आपने आद्यन्तौ टिकितौ के निर्देश को जान लिया। उदाहरण - डः सि धुट् तथा ङणोः कुक् टुक् शरि  से होने वाले धुट्, कुक् तथा टुक् आगम हैं।
आदेश शत्रु के समान होता है। यह आदेश दो प्रकार का होता है। एकादेश तथा सामान्य आदेश ।
उदाहरण - एकः पूर्वपरयोः(6.1.84) यह सूत्र एकादेश अधिकार का विधान करता है। यदि पूर्व पर के स्थान में एक ही आदेश होता तो वह एकादेश कहा जाता है। एकादेश अधिकार में अच् सन्धि आता है। आद्गुणः (6.1.87), वृद्धिरेचि (6.1.88), एत्येधत्यूठ्सु (6.1.89) आदि द्वारा किया जाने वाला एकादेश हैं। ।

सामान्य आदेश-  इको यणचि (6.1.77), एचोऽयवायावः (6.1.78), अवङ् स्फोटायनस्य (6.1.123) आदि सामान्य आदेश के उदाहरण हैं । यह आदेश अच् तथा हल् दोनों वर्णों के स्थान पर होता है। अच् के स्थान में होने वाले आदेश को अजादेश कहा जाता है तथा हल के स्थान में होने वाले आदेश को हलादेश। इको यणचि आदि अजादेश के तथा समः सुटि (8.3.5) हलादेश के उदाहरण हैं। 

 ङ्णोः कुक्‍टुक् शरि

वा स्‍तः । प्राङ्क् षष्ठः, प्राङ् षष्ठः। 

शर् परे रहते ङकार तथा णकार को क्रमशः कुक् तथा टुक् का आगम हो, विकल्प से।

कुक् और टुक् के ककार की हलन्त्यम् से तथा उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत् संज्ञा तथा तस्य लोपः स् लोप हो जाता है। क् तथा ट् शेष रहता है।

प्राङ्क् षष्ठः। प्राङ् + षष्ठः में शर् (षष्ठः का आदि षकार) परे रहते प्राङ् के ङकार को ङ्णोः कुक्‍टुक् शरि से कुक् का आगम हुआ। कुक् के ककार तथा उकार का अनुबन्धलोप हुआ। कुक् कित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ से कित् ङकार के अन्त्य में आया। प्राङ् + क्+  षष्ठः हुआ। वर्णसम्मेलन कर प्राङ्क् षष्ठः बना। ङ्णोः कुक्‍टुक् शरि विकल्प से कित् करता है। विकल्प पक्ष में प्राङ् षष्ठः रूप बना। इसी प्रकार सुगण्‍ + षष्‍ठः में णकार को टित् का आगम होकर सुगण्‍ट् षष्‍ठः तथा विकल्प पक्ष में सुगण् षष्‍ठः बना।
(वा.) चयो द्वितीयाः शरि पौष्‍करसादेरिति वाच्‍यम् । प्राङ्ख् षष्‍ठः, प्राङ्क्षष्‍ठः, प्राङ् षष्‍ठः । सुगण्‍ठ् षष्‍ठः सुगण्‍ट् षष्‍ठः, सुगण् षष्‍ठः ।।

चय् के स्थान पर द्वितीय वर्ण हो शर् परे रहते पौष्करसादि आचार्य के मत में।
प्राङ्ख् षष्‍ठः। ङ् + षष्ठः में शर् (षष्ठः का आदि षकार) परे रहते प्राङ् के ङकार को ङ्णोः कुक्‍टुक् शरि से कुक् का आगम हुआ। कुक् के ककार तथा उकार का अनुबन्धलोप होने पर प्राङ् + क् +  षष्ठः हुआ। चयो द्वितीयाः शरि पौष्‍करसादेरिति वाच्‍यम् से  शर् (ष) परे रहते चय् (क्) के स्थान पर द्वितीय वर्ण ख् हुआ। प्राङ् + ख् +  षष्ठः हुआ। वर्ण सम्मेलन कर प्राङ्ख्षष्ठः बना। चयो द्वितीयाः शरि विकल्प से द्वितीय वर्ण करता है अतः विकल्प पक्ष में प्राङ्क् षष्ठः पूर्ववत् बनेगा। इसी प्रकार सुगण्ठ्षष्ठः  समझना चाहिए।
इस तरह एक शब्द के तीन रूप बनते हैं- प्राङ्ख् षष्‍ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण पक्ष), प्राङ्क्षष्‍ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण का अभाव पक्ष) , प्राङ् षष्‍ठः (कुक् आगम अभाव पक्ष) । सुगण्‍ठ् षष्‍ठः(कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण पक्ष), सुगण्‍ट् षष्‍ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण का अभाव पक्ष), सुगण् षष्‍ठः(कुक् आगम अभाव पक्ष) ।
८७ नश्च

नान्‍तात्‍परस्‍य सस्‍य धुड्वा । सन्‍त्‍सः, सन्‍सः ।।

नकारान्त पद से परे रहते सकार को धुट् का आगम विकल्प से हो।
सन्‍त्‍सः, सन्‍सः । सन् + सः यहाँ पर पद है सान् । इस पह के अंत में नकार है अतः यह नान्त पद है। इस नान्त पद से परे सः के सकार को धुट् का आगम विकल्प से हुआ। धुट् टित् है अतः यह सकार के पूर्व होगा। सन् + धुट् + सः हुआ। धुट् में उकार तथा टकार का अनुबन्ध होने पर ध् शेष रहा सन् + ध् + सः हुआ। खरि च से धुट् के धकार को चर्त्व उसी वर्ण का तकार होकर सनत्सः बना। धुट् विकल्प पक्ष में सन्सः बना।

इसी प्रकार नान्त पदों से धुट् का आगम कर और शब्द बनायें। यथा- विद्वान् + सीदति आदि। 

८८ शि तुक्

पदान्‍तस्‍य नस्‍य शे परे तुग्‍वा । सञ्छम्‍भुः, सञ्च्‍छम्‍भुः, सञ्च्‍शम्‍भुः, सञ्शम्‍भुः ।।

शकार परे रहते पदान्त नकार को तुक् का आगम विकल्प से हो।
सन् + शम्भुः इस स्थिति में आद्यन्तौ टकितौ सूत्र के निर्देशानुसार न् के बाद शि तुक् सूत्र से विकल्प से तुक् आगम हुआ। सन् + तुक् + शम्भुः हुआ। तुक् में उक् का अनुबन्ध लोप हुआ। सन् + त् + शम्भुः हुआ। स्तोः श्चुना श्चुः सूत्र से तकार को श्चुत्व चकार पुनः नकार को ञकार होकर सञ् + च् + शम्भुः हुआ। शश्छोऽटि सूत्र से झय् (चकार) के बाद श को विकल्प से  छकार होकर सञ्च्छम्भुः बना। शि तुक् से तुक् के अभाव पक्ष में सञ्छम्भुः बना। शश्छोऽटि से छ के अभाव पक्ष एवं शि तुक् से तुक् आगम के पक्ष में सन् + त् + शम्भुः में श्चुत्व होकर सञ्च्शम्भुः बना।   तुक् के अभाव पक्ष में सन् + शम्भुः में केवल श्चुत्व कार्य होकर सञ्शम्भुः रूप बना।  


सन् + शम्भुः                               शि तुक् सूत्र से तुक् आगम विकल्प से
 सन् + तुक् + शम्भुः                     आद्यन्तौ टकितौ सूत्र से न् के बाद
 सन् + त् + शम्भुः                       अनुबन्ध लोप
 सञ्च् + शम्भुः                           स्तोः श्चुना श्चुः सूत्र से श्चुत्व
 सञ्च्छम्भुः                                  शच्छोऽटि सूत्र से श को छ विकल्प से
 सञ्छम्भुः                                  तुक् के अभाव पक्ष में-
 सञ्च्शम्भुः                                  छ के अभाव पक्ष एवं तुक् आगम के पक्ष में
 सञ्शम्भुः                                  तुक् के अभाव पक्ष में     

८९ ङमो ह्रस्‍वादचि ङमुण् नित्‍यम्

ह्रस्‍वात्‍परे यो ङम् तदन्‍तं यत्‍पदं तस्‍मात्‍परस्‍याचो ङमुट् । प्रत्‍यङ्ङात्‍मा । सुगण्‍णीशः । सन्नच्‍युतः ।।

ह्रस्व स्वर से परे जो ङम् (ङ् ण् न्) वह ङम् है जिसके अंत में ऐसा पद , उस पद से परे अच् को ङमुट् का आगम नित्य हो। 

ङमुट् में टकार तथा उकार की इत्संज्ञा होती है । ङम् शेष बचता है। यह ङम् प्रत्याहार है । इसमें ङ ण तथा न वर्ण आते हैं। ङ् ण् न् को ङ् ण् न् यथासंख्य होते हैं। अतःङुट्, णुट्, नुट् आगम क्रमशः होंगें।

प्रत्यङ् + आत्मा इस स्थिति में  ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम् सूत्र से नित्य ङमुट् का आगम होगा यह आगम आद्यन्तौ टकितौ सूत्र से आ के पूर्व होगा । प्रत्यङ् + ङमुट् + आत्मा में टकार तथा उकार का अनुबन्ध लोप होकर प्रत्यङ्ङात्मा बना। इसी प्रकार सुगण् + ईशः में णुट् का आगम तथा सन् + अच्युतः में नुट् का आगम होकर क्रमशः सुगण्‍णीशः तथा सन्नच्‍युतः रूप बनता है।    
प्रयोग-
                यावद् देहे चिदान्दः प्रत्यङ्ङात्मा विराजते।

                तावदेव जगत्सर्व प्रतिभाति मनोहरम्।।
९० समः सुटि

समो रुः सुटि ।।

सम् के मकार को रु आदेश हो सुट् परे रहते।

९१ अत्रानुनासिकः पूर्वस्‍य तु वा

अत्र रुप्रकरणे रोः पूर्वस्‍यानुनासिको वा ।।

इस रु के प्रकरण में रु से पूर्व वर्ण को विकल्प से अनुनासिक हो।

९२ अनुनासिकात्‍परोऽनुस्‍वारः

अनुनासिकं विहाय रोः पूर्वस्‍मात्‍परोऽनुस्‍वारागमः ।।

अनुनासिक को छोड़कर रु से पूर्व वर्ण को अनुस्वार आगम हो।

९३ खरवसानयोर्विसर्जनीयः

खरि अवसाने च पदान्‍तस्य रेफस्‍य विसर्गः ।

खर् परे रहते अवसान में पदान्त रकार को विसर्ग हो।

(संपुंकानां सो वक्तव्‍यः) । सँस्‍स्‍कर्ता, संस्‍स्‍कर्ता ।।

सम्, पुम् और कान् शब्दों के विसर्ग के स्थान पर सकार हो।


९४ पुमः खय्‍यम्‍परे

अम्‍परे खयि पुमो रुः । पुँस्‍कोकिलः, पुंस्‍कोकिलः ।।

अम् परक खय् परे रहते पुम् के स्थान में रु हो । अलोऽन्त्यस्य से पुम के अन्त्य वर्ण म् के स्थान पर रु होगा।

९५ नश्‍छव्‍यप्रशान्

अम्‍परे छवि नान्‍तस्‍य पदस्‍य रुः। न तु प्रशान्‍शब्‍दस्‍य ।।

अम् परक छव् परे रहते नान्त पह के स्थान पर रु होता है, प्रशान् शब्द को छोड़कर।

९६ विसर्जनीयस्‍य सः

खरि । चक्रिँस्त्रायस्‍व, चक्रिंस्‍त्रायस्‍व । अप्रशान् किम् ? प्रशान्‍तनोति । पदस्‍येति किम् ? हन्‍ति ।।

खर् परे रहते विसर्ग को सकार आदेश हो।

९७ नॄन् पे

नॄनित्‍यस्‍य रुर्वा पे ।।

नृन् को विकल्प से रु हो पकार परे रहते।

९८ कुप्‍वोः ͝     ͝͝   पौ च

कवर्गे पवर्गे च विसर्गस्‍य  ॅॅ क ॅॅ पौ स्‍तः, चाद्विसर्गः । नॄँ ͝͝   पाहि, नॄःँ  पाहि, नॄःंपाहि । नॄन्‍पाहि ।।

कु तथा पु परे रहते विसर्ग को क्रमशः जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय हो।

९९ तस्‍य परमाम्रेडितम्

द्विरुक्तस्‍य परमाम्रेडितम् स्‍यात् ।।

जो हो बार कहा गया है, उसके बाद वाले भाग की आम्रेडित संज्ञा हो।

१०० कानाम्रेडिते

कान्नकारस्‍य रुः स्‍यादाम्रेडिते । काँस्‍कान्, कांस्‍कान् ।।

आम्रेडित परे रहते कान् शब्द के नकार को रु हो।

१०१ छे च

ह्रस्‍वस्‍य छे तुक् । शिवच्‍छाया ।।

छकार परे रहते ह्रस्व वर्ण को तुक् का आगम हो।

१०२ पदान्‍ताद्वा

दीर्घात् पदान्‍तात् छे तुग्‍वा । लक्ष्मीच्‍छाया, लक्ष्मीछाया ।।

छकार परे रहते पदान्त दीर्घ को तुक् का आगम विकल्प से हो।

इति हल्‍सन्‍धिः ।
  

                                              अथ विसर्गसन्‍धिः


१०३ विसर्जनीयस्‍य सः

खरि । विष्‍णुस्‍त्राता ।।

खर् परे रहते विसर्जनीय के स्थान पर सकार आदेश हो।

विष्‍णुस्‍त्राता । विष्णुः + त्राता में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से खर् (त्राता के तकार) परे रहने पर विसर्ग को स् हुआ। विष्णुस्त्राता बना।

१०४ वा शरि

शरि विसर्गस्‍य विसर्गो वा । हरिः शेते, हरिश्‍शेते ।।

शर् परे रहते विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग आदेश हो।
हरिः शेते, हरिश्शेते । हरिः + शेते में वा शरि सूत्र से हरिः के विसर्ग को शर् (शेते का शकार) परे रहते विकल्प से विसर्ग हुआ। हरिः शेते बना। विसर्ग के अभाव पक्ष में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से विसर्ग को स् होकर हरिस् + शेते हुआ। स्तोः श्चुना श्चुः से हरिश् के सकार को श्रुत्व शकार होकर हरिश्शेते बना।
काव्य में प्रयोग-
कमले कमला शेते हरश्शेते हिमालये।

क्षीराब्धौ च हरिश्शेते मन्ये मत्कुणशङकया ।।

१०५ ससजुषो रुः

पदान्‍तस्‍य सस्‍य सजुषश्‍च रुः स्‍यात् ।।

पदान्त सकार तथा सजुष् के सकार के स्थान पर रु हो।

१०६ अतो रोरप्‍लुतादप्‍लुतादप्‍लुते

अप्‍लुतादतः परस्‍य रोरुः स्‍यादप्‍लुतेऽति । शिवोऽर्च्यः ।।

अप्लुत अत् से परे रू को उ हो, अप्लुत अत् परे रहते।
शिवोऽर्च्यः। शिवर् + अर्च्यः में व् का अ अप्लुत अ है, उसके बाद र् है और र् के बाद अर्च्यः का अप्लुत अ है, इसलिए यहाँ र् को उत्व हो गया है।
सिद्धि इस प्रकार है- 
शिव सु अर्च्यः                सुप्तिङन्तं पदम् से शिव सु की पद संज्ञा
शिव स् अर्च्यः                 सु के उकार का अनुबन्ध लोप
शिव रु अर्च्यः                ससजुषो रुः सूत्र से पदान्त स् को रु
शिव र् अर्च्यः                 रु के उकार का अनुबन्ध लोप
शिव उ अर्च्यः                 अतोरोरप्लुतादप्लुते सूत्र से र् को उत्व
शिवो अर्च्यः                   आद्गुणः सूत्र से गुण
शिवोऽर्च्यः                     एङः पदान्तादति सूत्र से पूर्वरूप 


१०७ हशि च

तथा । शिवो वन्‍द्यः ।।

अप्लुत अत् से परे रहते रु को उ आदेश हो, हश् परे रहते।

शिवो वन्द्यः। शिव सु वन्द्यः में सु का अनुबन्ध लोप शिव + स् + वन्द्यः हुआ। ससजुषो रुः सूत्र से स् को रु आदेश हुआ। शिव् + रु + वन्द्यः हुआ। रु के उकार का अनुबन्ध लोप शिव + र् + वन्द्यः हुआ। यहाँ शिव का अकार अप्लुत अत् है अतः हशि च सूत्र से  हश् (वन्द्यः का वकार) परे रहते र् को उत्व हुआ। शिव + उ + वन्द्यः हुआ। आद्गुणः सूत्र से अ + उ का गुण एकादेश होकर शिवो वन्द्यः बना।  
वेद में प्रयोग-

हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।

१०८ भोभगोअघोअपूर्वस्‍य योऽशि

एतत्‍पूर्वस्‍य रोर्यादेशोऽशि । देवा इह, देवायिह । भोस् भगोस् अघोस् इति सान्‍ता निपाताः । तेषां रोर्यत्‍वे कृते ।।

भोस् भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक रु को यकार आदेश हो अश् परे रहते।

देवा इह । देवा + स् + इह में ससजुषो रुः से स् को रु आदेश, देवा + रु + इह हुआ। रु के उकार का अनुबन्ध लोप   देवा + र् + इह हुआ। भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि सूत्र से य् का आदेश, देवा + य् + इह हुआ । लोपः शाकल्यस्य सूत्र से य् का विकल्प से लोप होकर देवा इह बना। विकल्प के अभाव पक्ष में देवा + य् + इह में वर्ण सम्मेलन कर देवायिह बना।

१०९ हलि सर्वेषाम्

भोभगोअघोअपूर्वस्‍य यस्‍य लोपः स्‍याद्धलि । भो देवाः । भगो नमस्‍ते । अघो याहि ।।

भोस् भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक य का लोप हो हल् परे रहते।



अभ्यास-

पुनः रमते. एषः विष्णुः. हरि: चरितम् में सन्धि का प्रयोग करें। 

११० रोऽसुपि

अह्‍नो रेफादेशो न तु सुपि । अहरहः । अहर्गणः ।।

अहन् शब्द के नकार को रेफ आदेश हो, सुप् परे न रहते।

१११ रो रि

रेफस्‍य रेफे परे लोपः ।।

रेफ परे रहते रेफ का लोप हो।

११२ ढ्रलोपे पूर्वस्‍य दीर्घोऽणः

ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्‍याणो दीर्घः । पुना रमते । हरी रम्‍यः । शम्‍भू राजते । अणः किम् ? तृढः । वृढः । मनस् रथ इत्‍यत्र रुत्‍वे कृते हशि चेत्‍युत्‍वे रोरीति लोपे च प्राप्‍ते ।।

लोप निमित्तक ढकार तथा रेफ रहते पूर्व अण् वर्ण को दीर्घ होता है। 

११३ विप्रतिषेधे परं कार्यम्

तुल्‍यबलविरोधे परं कार्यं स्‍यात् । इति लोपे प्राप्‍ते । पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्‍यस्‍यासिद्धत्‍वादुत्‍वमेव । मनोरथः ।।

समान बल वाले सूत्र के एक साथ प्रवृत्त होने पर बाद वाले सूत्र का कार्य हो।

११४ एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि

अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्‍तस्‍य लोपो हलि न तु नञ्समासे । एष विष्‍णुः । स शम्‍भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनञ्समासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र ।।

ककार रहित एतद् तथा तद् शब्द का जो सु, उसका लोप होता है, हल् परे रहते, नञ् समास को छोड़कर।

११५ सोऽचि लोपे चेत्‍पादपूरणम्

स इत्‍यस्‍य सोर्लोपः स्‍यादचि पादश्‍चेल्‍लोपे सत्‍येव पूर्येत । सेमामविड्ढ प्रभृतिम् । सैष दाशरथी रामः ।।


सः पद के सु का लोप हो अच् परे रहते यदि लोप करने से पाद की पूर्ति हो रही हो तब।
इति विसर्गसन्‍धिः ।।
इति पञ्चसन्‍धिप्रकरणम् ।

सन्धि के बारे में मुख्य सिद्धान्त - 
                                        

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