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प्रतिपलं तव संस्मरणम् (हुलासगंज संस्मरण 2)


हुलासगंज में मैं 
26 जनवरी 1983 को पहुंचा था। 
मुझे याद है, उस दिन चारों ओर झण्डोत्तोलन हो रहा था। गाँव से पहले दरभंगा और फिर दरभंगा से डॉ. वेंकटेश शर्मा के साथ पटना पहुंचा। वही वेंकटेश शर्माजो मेरे बड़े भाई के मित्र और व्याकरण के दिग्गज विद्वान् हैं। उनकी शास्त्रार्श शैली अद्भुत थी। उस समय वे हुलासगंज संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे। बाद में इनके साथ अनेक दुखद घटनायें जुडती चली गयी। मुझे याद हैजब मैं दरभंगा से पटना जाने वाली बस में अपने बड़े भाई महानंद झा जी के साथ जा रहा था। वेंकटेश शर्मा जी हमसे कुछ दूरी पर बस में खड़े थे। लंबे कद काठी के कारण उन्हें बस में पहचानना बिल्कुल आसान था। मैंने एक बार जोर से उनका नाम लेकर उन्हें पुकारा भी था। पटना में किसी परिचित के यहां वह पहुंचे और हम लोगों को वहीं छोड़ कर किसी काम से बाहर चले गए थे। दोपहर का समय था। उस घर का दृश्य आज भी मुझे याद है। बार-बार जोर से खांसने वाला खाट पर लेटा एक बूढ़ा व्यक्तिचारों ओर मक्खियों का अंबारकुछ छोटे- छोटे बच्चेजो अपने बर्तन में खाना खा रहे थे। बहुत गन्दा माहौल था,जिसे मैं 34 साल बाद भी नहीं भूल पाया। घंटे 2 घंटे बाद हम लोग वहां से विदा हुए और हुलासगंज आ पहुंचे। वहाँ से फतूहा, हिलसा, इस्लामपुर होते हुलासगंज तक आया था। हुलासगंज तक आने का बस ही एकमात्र साधन था। गया की ओर से आना हो या पटना की ओर से, बस ही एकमात्र सहारा है।

हुलासगंज में  हमारे दो भाई कुलानंद झा और महेश झा संस्कृत शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहले से ही वहां रह रहे थे। हम लोगों का सामान महाविद्यालय परिसर के छात्रावास में तथा रात्रि शयन आश्रम परिसर में बने उच्च विद्यालय छात्रावास में होता था। छात्रावास मिट्टी की दीवार और घास फूस से छाए हुए छप्पर से बने थे। उस समय महेश झा के दो प्रमुख मित्र थे। घनश्याम शर्मा और मृत्युंजय शर्मा घनश्याम शर्मा मोटे हृष्ट पुष्ट थे और मृत्युंजय बिल्कुल दुबले और मंद आवाज वाले। मृत्युंजय आज भी हुलासगंज से जुड़े हैंजबकि घनश्याम के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। अस्तु

उस समय स्वामी जी रमाना पर गए हुए थे। संतों के बाहर जाने को रमाना कहा जाता है। एक गांव से दूसरे गांव, दूसरे गांव से तीसरी गांव अहर्निश घूमते रहना। घूमते रहना। रमण करते रहनासंतों का स्वभाव होता है। स्वामी जी से काफी दिनों तक  मेरी मुलाकात  नहीं हो पाई। एक दिन पता चला कि स्वामी जी आज हुलासगंज आने वाले हैं । मुख्य द्वार के बाहर सभी छात्र उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं भी पंक्तिबद्ध हो खडा हो गया। स्वामी जी घोड़े से पधारे। सभी छात्रों के साथ मैंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। मुझे नहीं याद है कि स्वामी जी के साथ मेरी बातचीत कब हुई। समय बीतता चला गया। वहाँ के छात्र श्वेत कटिवस्त्र तथा कौपीन पहनते थे। मुझे याद नहीं मुझे सर्वप्रथम कब और किसने अंगवस्त्र के लिए कटिवस्त्र दिया। कभी-कभी स्वामी जी छात्रों को कटिवस्त्र बांटा करते थे। एक धोती को बीच से फाड़कर एक कटिवस्त्र बनता था। 12 से 15 वर्ष के आयु के बच्चों के लिए यह वस्त्र पर्याप्त होता था। महेश को अच्छा कटिवस्त्र मिल जाया करता था। स्वामी जी उसे अधिक स्नेह करते थे। बच्चे कटिवस्त्र के नीचे हाफ पैंट पहने रहते थे। कक्षा में हमलोग धोती पहनते थे। इस प्रकार वहां के पोशाक में अधोवस्त्र के लिए कटिवस्त्र तथा ऊपर के शरीर को ढ़कने के लिए शर्ट या अन्य कोई वस्त्र पहना जा सकता था। 
हम नियत दिनचर्या का पालन करते हुए धीरे-धीरे उस व्यवस्था में घुल मिल गये। मेरा नामांकन श्री स्वामी परांकुशाचार्य संस्कृतोच्च विद्यालय के प्रथमा प्रथम वर्ष कक्षा  में हो गया। कक्षा 7-8 को प्रथमा कहा जाता है। इस विद्यालय में उस समय प्रधानाध्यापक श्री नन्द कुमार शर्मा सहित पाँच अन्य अध्यापक थे। भागलपुर निवासी श्री शिवनन्दन शर्मा साहित्य के अध्यापक थे  । वे हमें रघुवंशमहाकाव्यम् तथा अमरकोश पढ़ाते थे। उन्होंने ही श्लोकों का शुद्ध उच्चारण करना सिखाया। उचैली, गया निवासी श्री नरेश शर्मा हितोपदेश पढ़ाते थे।  श्री नन्द कुमार शर्मा ज्योतिष की पुस्तक शिशुबोध तथा आयुर्वेद की पुस्तक स्वस्थेतिवृत्तम् पढ़ाते थे। मोकर, पटना निवासी श्री अनिल शर्मा लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ाते थे। अध्यापन के लिए योग्य छात्र नहीं मिलने के कारण वे लघुसिद्धान्तकौमुदी के अजन्तपुल्लिँगप्रकरण तक ही पढ़ाने में सक्षम थे। जब हमलोग इसे आगे पढ़ने के लिए तैयार हो गये तब वे मेरे बड़े भैया श्री विमलेश झा विमल से हलन्तपुँल्लिङ्ग प्रकरण पढ़ना आरम्भ किये। रुस्तमपुर, जहानाबाद निवासी श्री राम ध्यान सिंह इतिहास, भूगोल, सामाजिक अध्ययन विषय पढ़ाते थे। जिस दिन इन्हें पढ़ाने की इच्छा नहीं होती होती थी, उस दिन नदी किनारे शहर बसने के कारण पर निबंध लिखने को बोल देते थे। रुस्तमपुर हुलासगंज से 6 किलोमीटर दूर गांव है। ये प्रतिदिन पैदल वहाँ से आते जाते थे। सर्दी के मौसम में छात्रों के पैसे से मूली खाने का इन्हें शौक था। इनके पास पैसे की तंगी हमेशा बनी रहती थी। छात्रों से उधारी भी लिया करते थे। झुनाठी, पटना निवासी श्री वीरेन्द्र शर्मा गणित तथा अंग्रेजी पढ़ाते थे। प्रथमा कक्षा में रहते आप अंग्रेजी के शब्दों की स्पेलिंग तथा उसका हिन्दी अर्थ याद कराते रहे। ये काफी गुस्सा करते थे। पाठ याद नहीं करने अथवा किसी प्रकार की गलती के लिए इनका डंडा (सपाका) तैयार रहता था। दो चार छात्र इनके डंडे की व्यवस्था में प्रतिदिन नियुक्त होता था। श्री शिवकुमार शर्मा संस्कृत उच्च विद्यालय में आधुनिक विषय के अध्यापक थे। उन्होंने बहुत श्रम पूर्वक ट्रांसलेशन सिखाया। मध्यमा (कक्षा 9-10) कक्षा में उन्होंने अर्थशास्त्र पढ़ाया था। आज भी उसके कतिपय सिद्धान्त याद हैं। उनके इतना समर्पित अध्यापक विरले ही होते हैं। कक्षा के भीतर और बाहर वे स्वभाव से अत्यंत ही कठोर, अनुशासनप्रिय थे । उनकी अनुमति के बिना एक भी पत्ता नहीं हिलता था। अध्यापन कार्य के अतिरिक्त ये छात्रावास की व्यवस्था, खेती बाड़ी, निर्माण कार्य, भोजन बनाने, वर्तन धोने, सब्जी काटने आदि में छात्रों की पारी लगाने आदि का काम करते थे। प्रतिदिन रात्री में दो छात्र इनका हाथ पांव दबाते थे। विद्यालय में शैक्षणिक वातावरण था। प्रतिदिन कक्षायें नियमित संचालित होती थी। प्रातः 10 बजे सामुहिक प्रार्थना होती थी। सायं काल समाहारः साम्नां श्लोक से हयग्रीव की स्तुति के बाद कक्षाओं का समापन होता था। मध्यमा कक्षा में जाने के बाद मैं शिक्षक के निर्देश पर प्रथमा के छात्रों को पढ़ा देता था।   श्री राम ध्यान सिंह को छोड़कर सभी शिक्षक आवासीय परिसर में रहते थे अतः कक्षायें सुचारु चला करती थी। प्रतिपद तथा अष्टमी तिथि को विद्यालय में अवकाश होता था। वहाँ की शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ थी। सप्ताहांत में प्रत्येक कक्षा के छात्र एकत्र होकर श्लोकान्त्याक्षरी प्रतियोगिता किया करते थे।  प्रत्येक कक्षा में 12 से 15 आवासीय छात्र थे। कुछ स्थानीय छात्र भी वहाँ पढ़ने आते थे। प्रतिदिन प्रातः 4 बजे जागरण की घंटी बजने के साथ सभी छात्र मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होकर वेंकटेश सुप्रभातम् का गायन किया करते थे। इसकी ध्वनि हुलासगंज से 3 किलोमीटर दूर लाट गांव तक सुनाई पड़ती थी। हमलोग लाट गाँव जाया करते थे। यहाँ लाट नामक एक विशाल पथ्थर का स्तम्भ था, जो कि खेत में लम्बवत् पड़ा था। इसे हमलोग अपने हाथों से नापा करते थे। कहा जाता था कि इसे पहले सिरे से दूसरे सिरे तथा दूसरे सिरे से पहले सिरे तक नापने पर कभी भी समान माप नहीं मिलता। इसे रात में कोई राक्षस ले जा रहा था, प्रातः कुम्भकार द्वारा घड़ा बनाने की आवाज सुनकर इस शिलाखण्ड को वहीं छोड़ गया। हुलासगंज बराबर तथा नागार्जुनी पहाड़ी से घिरा हुआ है। इस इलाके में इस प्रकार का विशाल शिलाखण्ड मिलना आश्चर्य की बात नहीं है। जब मैं विद्यालय के प्रथम तल पर खड़े होकर दक्षिण दिशा की ओर देखता था तो वहाँ से बराबर की पहाड़ी साफ - साफ दिखती थी। राजगीर भी वहाँ से दिखाई देता था।चर्चा वेंकटेश सुप्रभातम् की कर रहा था। इसी मंदिर प्रांगण में प्रत्येक दिन रात्रीकालीन आरती में भगवान् लक्ष्मी नारायण की स्तुति करने तथा् तनयन पढ़ने के लिए सभी अध्यापक, छात्र तथा संत एकत्र होते थे। इसके बाद भोजन करने जाते थे। प्रत्येक अष्टमी तथा प्रतिपद् की रात्री को स्तोत्र पाठ करने हमलोग मंदिर में एकत्र होते थे। इन स्तोत्रों में आलवन्दार स्तोत्र मुख्य था। स्तोत्र पाठ का फल यह हुआ कि मैं संस्कृत छन्दों को आसानी से समझने लगा। श्लोकों की यति को समझना मेरे लिए आसान हो गया।
छात्रों में ऐसे शिक्षकों के लिए उपनाम रखने की परंपरा रही है। हम लोग भी अपने अध्यापकों के उपनाम रख लिए थे, जो आपसी बातचीत में प्रयोग किए जाते थे। श्री शिवकुमार शर्मा की दाँतें बाहर की ओर निकली हुई थी। हम लोगों ने उनका नाम बसुला रखा। श्री नरेश शर्मा के हाथ टेढ़े थे। वे कहा करते थे कि हाथों में गोली लगने के कारण ऐसा हो गया। उनकी अनेक मधुर स्मृतियां आज भी याद है। अध्यापकों की योग्यता, कक्षाध्यापन की शैली आदि पर आगे यथासमय लिखता रहूँगा। श्री शिवकुमार शर्मा जी ने मेरी प्रातः कालीन ड्यूटी में मुख्य द्वार से घुड़साल तक की सड़क और उस भूभाग पर प्रातः प्रातः झाड़ू लगाने का काम आबंटित किया। महेश झा उच्च विद्यालय परिसर के ठीक सामने के रास्ते पर झाड़ू लगाते थे। मुझे याद है कि वह नारियल का झाड़ू नहीं था। झाडू का आकार छोटा होने के कारण काफी झुककर सफाई करनी पड़ती थी। झाडू लगाते अंग्रेजी के अध्यापक का चेहरा सामने आ जाता था। मन में हमेशा भय बना रहता था कि कहीं ये कान पकड़कर विद्यालय के प्रथम तल से नीचे न फेंक दे। जब वे गुस्सा होते थे तब दाँत भींचकर कान में नाखून दबा देते थे। 
हुलासगंज प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण था। मंदिर परिसर के पार्श्वभाग, महाविद्यालय परिसर में कास उगे हुए थे। उस समय उच्च विद्यालय मंदिर परिसर में ही था। उसके पीछे कुछ आम के पेड़ थे।  यहां के एक संत, जिनका नाम कमलनयन शर्मा था वानिकी का काम देखा करते थे। यही गोपालन भी करते थे। उस समय कहा जाता था कि इन्हें हनुमान की सिद्धि प्राप्त है। संत कमलनयन शर्मा की यथाप्रसंग विस्तृत चर्चा करूंगा। अभी बस इतना ही कि उन्होंने आश्रम से संबन्धित सम्पूर्ण भूभाग को वनाच्छादित कर रखा था। यहां काजू ,अमरुद, आम, नीबू, नारियल आदि के बागान थे। मैं जिस क्षेत्रफल पर झाड़ू लगाता था, वहां काजू के दो अमरुद के वृक्ष थे। उसी के बीच में एक हैंडपंप लगा था, जिस पर छात्र  भोजन करने के बाद अपनी थाली की सफाई, स्नान, कपडों की धुलाई आदि किया करते थे। उस समय तक हुलासगंज में शौचालय का निर्माण नहीं हुआ था। हम लोग शौच के लिए आश्रम परिसर से काफी दूर खुले में जाया करते थे। जिन बर्तनों में भोजन बनाया जाता था, उसकी सफाई बडे छात्र तथा छोटे छात्र सब्जी काटने से लेकर हर छोटा बडा काम किया करता था। हमारी दिनचर्या अत्यंत ही नियमित और अनुशासनबद्ध थी। 

प्रातः 4:00 बजे उठकर मंदिर जाकर वेंकटेश सुप्रभातम्  का सामूहिक पाठ करना। पाठ याद करने के लिए बैठ जाया करते थे। सुबह छात्रों को जगाने का काम छात्रावास के छात्रावास अधीक्षक श्री शिवकुमार शर्मा जी कराते थे। शिवकुमार शर्मा जी का कठोर अनुशासन था। प्रातः 4:00 बजे से लेकर रात्रि 9:00 बजे तक जब तक कि छात्र सो नहीं जाएहर एक पर उनकी पैनी दृष्टि होती थी। प्रातः कालीन नित्यक्रिया कर घर से लाये जलपान को करना और दैनिक आवृत्ति के लिए बैठ जाना। उच्च विद्यालय परिसर में समय-समय पर घंटी बजाई जाती थी। प्रत्येक घंटी का समय के साथ अलग अलग तात्पर्य होता था। यदि 4:00 बजे की घंटी है तो यह जागरण के लिए होती थी। 9:00 बजे की घंटी प्रातःकालीन भोजन करने के लिए10:00 बजे की घंटी स्कूल जाने के लिए, स्कूल के प्रत्येक कालांश के लिए घंटी बजती रहती थी। अध्यापक बदलते रहते थे और अंतिम घंटी 4:00 बजे की बजती थी। तब हम सायंकालीन विद्यालयीय प्रार्थना कर अपने छात्रावास परिसर को चले जाते थे। 4:30 पुनः घंटी बजती थी अमनिया करने के लिए। चावल की साफ सफाई को अमनिया कहा जाता था। यहाँ के भण्डार गृह में भूसा युक्त चावल रखा था। प्रतिदिन दो छात्र भूसे से चावल अलग करते उच्च विद्यालय के प्रथम तल पर लम्बवत् फैलता था, ताकि छात्र इसकी दोनों तरफ बैठकर अमनिया कर सकें। यह प्रक्रिया प्रतिदिन की थी। कभी कभी गेहूँ की भी अमनिया की जाती थी। सर्दियों के रात के भोजन में रोटी का प्रबन्ध होता था। रोटी बनाने के लिए भी बारी- बारी से छात्रों को लगाया जाता था। अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए कार्य करने का हमलोग अभ्यस्त हो चुके थे। समय और दिनचर्या का साहचर्य घंटी के साथ हो चुका था। हम इसके अभिन्न अंग बन चुके थे। 
एक दिन की घटना है । हम चारों भाई (महेश, कुलानन्द,महानन्द और मैं) महाविद्यालय के छात्रावास में सोए हुए थे, तभी आश्रम में स्थित उच्च विद्यालय के छात्रावास की ओर से जोर जोर से आवाज आ रही थी, आग लग गई है। महाविद्यालय के छात्रों के साथ हमलोग उस दिशा की ओर दौड़ पडे। वहां पहुंच कर देखा, स्थिति अत्यंत ही भयावह थी।  उच्च विद्यालय के छात्रावास में कुल 3 कक्ष थे। इसके साथ ही भोजनालय भी लगा हुआ था। मिट्टी की दीवारें और घास फूस से निर्मित छप्पर वाले इस छात्रावास में आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं दिया। उच्च विद्यालय के छात्रावास से आग की ऊँची लपटें निकल रही थी। कक्षा 6 से 8 तक के छात्र बदहवास इधर उधर भाग रहे थे। कोई अपनी जली किताबें, बर्तन आदि को देखकर रो रहा था तो कोई भयावह मंजर को देखकर भयभीत था। सभी छात्रों के कपड़े, रजाई सब कुछ जल चुके थे। उच्च विद्यालय के अध्यापक श्री शिवकुमार शर्मा जी की तत्परता से कोई हताहत नहीं हुआ। सभी सुरक्षित बाहर निकल चुके थे। आग किसने लगायी या कैसे लगी इसपर कयास ही लगते रहे। कोई कहता कि छात्रावास के पार्श्वभाग से किसी ने आल लगायी तो किसी का तर्क था कि बिजली के शार्टशर्किट से आग लगी। अंततः आग लगने के कारण को खोजा नहीं जा सका। अंततः निर्णय हुआ कि इस मिट्टी और घास से निर्मित छात्रावास को पक्के भवन में बदला जाय। मुझे अभी भी याद है कि मेरे सहपाठी उचौली निवासी अवधेश शर्मा की लघुसिद्धान्तकौमुदी आधी जल गयी थी। कुछ दिनों तक छोटे बच्चों का छात्रावास उच्च विद्यालय का बरामदा बना रहा। महाविद्यालय का दो कक्षों का छात्रावास भी फूस से निर्मित था। भय के कारण महाविद्यालय के छात्र भी घास से निर्मित छात्रावास को छोडकर महाविद्यालय के पक्के कक्ष में रहने आ गये। उस समय तक महाविद्यालय में कुल 4 कमरे बने हुए थे। उनमें से एक कक्ष में महाविद्यालय के अध्यापक डॉ. वेङ्कटेश शर्मा, श्री विमलेश झा तथा श्री रामचन्द्र मिश्र रहते थे। शेष कक्ष या बरामदे में पढ़ाई होती थी। जल्द ही हम आग लगने की घटना को घटना को भूल गये। हम पूर्ववत् अपनी दिनचर्या में लग गये।
हुलासगंज में रहनेवाले अधिकांश छात्र गया, जहानाबाद, औरंगाबाद तथा पटना के निवासी थे। उच्च विद्यालय के अध्यापक श्री शिवनन्दन शर्मा के कारण कुछ भागलपुर के छात्र भी वहाँ रहकर अध्ययन करते थे। इक्के दुक्के छात्र नबादा तथा नालन्दा जनपद के थे। 1985 तक गया जिले के अन्तर्गत ही जहानाबाद तथा अरवल जिला आता था। अगस्त 1986 में गया से अलग होकर जहानाबाद जिला बना तथा अगस्त 2001 में जहानाबाद से अलग होकर अरवल जिला बना। इन जनपदों के विभिन्न गांवों से आकर पढ़ने वाले छात्रों के साथ रहते हुए दक्षिण बिहार का भूगोल, रहन सहन आदि से मैं भलीभाँति परिचित हो गया था। कक्षा 6 से वहाँ रहने के कारण मगही बोली ठीक उसी प्रकार बोलना सीख गया था जैसा कि उस क्षेत्र के स्थानीय छात्र बोला करते थे। कभी -कभी मेरे मगही उच्चारण में भी मैथिली भाषा का टोन पहचान लिया जाता था। 
आश्रम में बहुतायत में फलदार वृक्ष लगे थे। इसका कतिपय संस्मरण आज भी याद है। अल्पावधि की छुट्टियों में यहाँ के आसपास के जनपदों के छात्र अपने घर चले जाते थे। दूरस्थ जनपद का रहने के कारण मैं दीपावली, होली, नवरात्र आदि के अवकाश में घर नहीं जा पाता था। जाड़े में बेर फलता है। मंदिर परिसर के पीछे बेर का पेड़ था। बाल स्वभाव के कारण हमलोग संत कमलनयन दास से छिपकर बेर तोड़ लेते थे। एक दिन संत कमलनयन दास कहीं से घूमते बेर के पास पहुँचे तथा उसकी तना झुका देखकर समझ गये कि हमलोगों में से किसी ने बेर तोड़ा है। गुस्से में आकर संत कमलनयन ने उस पेड़ को काट डाला। वे यहीं नहीं रूके। स्वामी जी के सम्मुख ही हमलोगों से मगही में कहा कि जाओ अब पेड़ और झुक गया है। अब बेर तोड़ने में असुविधा नहीं होगी। वे परम दयालु संत भी थे। उनके लगाये नींबू के पेड़ से नींबू तोड़कर हमलोगों के बीच बांटा जाता था। उसे हमलोग अचार बनाते थे। काजू के सरस फूल को चूसना उन्होंने ही सिखाया। ग्रीष्मवकाश में हमें खट्टे मीठे आम मिल जाते थे। श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन 
गांव से शिर पर धान की बोरी लाना
माध्यमिक विद्यालय के छात्रावास के लिए तार का पेड़ काटा जाना
महाविद्यालय परिसर पर वृक्षारोपण तथा कटीले तार से घेराबन्दी

महाविद्यालय परिसर में सब्जी की खेती





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इतनी यादें मत आया कर (हुलासगंज संस्मरण 1)


लिखना मेरा स्वभाव रहा है। बचपन से ही हर बात पर लेखनी चलाने का शौक। श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य के नाम से निर्मित संस्कृत उच्च विद्यालय तथा महाविद्यालय में मैं पढ़ चुका हूँ। यह जहानाबाद जिले के हुलासगंज में अवस्थित है। आज भी सोते जागते उठते बैठते हमेशा हुलासगंज की याद आती है। वे बीते दिन याद आते हैं,जब मैं कक्षा प्रथमा और मध्यमा में वहां पर रहा था। यह बुद्ध, महावीर, आर्यभट्ट, वाणभट्ट तथा वाग्भट्ट जैसे विद्वानों की कर्मस्थली रही है। यहाँ से 40 कि. मी. दूर गया हिन्दुओं का पवित्र प्राचीन तीर्थस्थल है। दूसरी ओर संसार को अपने ज्ञान से आलोकित करने वाला नालन्दा तथा पौराणिक आख्यानों को समेटे मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह। अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमा यहाँ के प्रत्येक गाँव में विखरे पडे हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र आस्था, ज्ञान विज्ञान, कला,दर्शन तथा राजनीति का केन्द्र रहा है। 
       मगध क्षेत्र में वैष्णव संतों द्वारा संस्कृत के द्वारा सामाजिक क्रान्ति और अपने बचपन के बीते उन दिनों सोचते-सोचते सारे विचार एक साथ मिश्रित हो जाते हैं। कुछ सुखद घटनायें तो कुछ दुखद घटनायें मुझे आन्दोलित करतीं हैं। वहाँ के सन्तों का अनन्य स्नेह, उनके व्यक्तित्व का अनुकरण हममें रोमांच भर देता है। हुलासगंज से मेरा बौद्धिक कम, भावात्मक लगाव अधिक रहा है। आखिर वहीं मेरा बचपन बीता। जीवन की खट्टी मीठी यादें, मेरे बाल सखा, मेरे गुरु, मेरे उपास्य इष्टदेव, वहाँ का तत्कालीन प्राकृतिक वैभव सब मिलकर मुझे लिखने ही नहीं देता और लिखे विना रहने भी नहीं देता। मैं बेचैन हूँ, सब कुछ व्यतिक्रम। आपको भी इसी क्रम में पढ़ना पड़ेगा।

पृष्ठभूमि

मैं हुलासगंज का संस्मरण लिखूँ  इसके पूर्व रामानुज सम्प्रदाय का दक्षिण बिहार तक आगमन का संक्षिप्त इतिहास बताना जरुरी समझता हूँ। दक्षिण बिहार में राजेंद्र सुरी के शिष्य श्री स्वामी परांकुशाचार्य सर्वप्रथम भुमिहार वैष्णव संत हुए। इनकी कर्मभूमि मगध के वर्तमान चारों जनपद तथा पटना प्रमंडल के कुछ जनपद थी। राजेंद्र सुरी के गुरु रंगदेशिक स्वामी वृंदावन के महान श्रीवैष्णव संत थे। उत्तर भारत में रामानुज वैष्णव सम्प्रदाय के विस्तार का श्रेय इन्हीं राजेंद्र सुरी को जाता है। श्री परमहंस स्वामी राजेन्द्र सूरि जी महाराज की जीवनी नामक एक पुस्तक श्री परांकुश संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद्, हुलासगंज, गया, बिहार से प्रकाशित है। कृष्णप्रपन्नाचारी द्वारा लिखित दिव्यचरितामृतम् पुस्तक में गुरु परम्परा का विस्तृत इतिहास उपलब्ध है।
उत्तर भारत में रामानुज सम्प्रदाय की स्थापना
वरवरमुनि स्वामी (उन्हें मामला मुनि, राम्या जमत्री भी कहा जाता था) ने समस्त भारत को आठ भागों में बांटकर आठ पीठों की स्थापना की। सभी पीठों की अध्यक्षता उनके ही शिष्यों ने की। यह कंडदै अन्नान ही थे, जिन्होंने उत्तर भारत के वृंदावन में, गोवर्धन पीठ के कार्यभार को लिया। यही कारण है कि इस पीठ को अन्नान पीठ भी कहा जाता है। उत्तर भारत में रामानुज सम्प्रदाय का प्रसार वैष्णव संतों की विविध शाखा के माध्यम से हुआ तथापि मुख्य द्वार वृंदावन के गोवर्धन पीठ को माना जाता है। दक्षिण भारत से उत्तर भारत (वृन्दावन) तक रामानुज सम्प्रदाय की गुरु शिष्य परम्परा तथा वृन्दावन से दक्षिण बिहार तक की परम्परा को जानने का मुख्य स्रोत तनया है। 
रामानुज परम्परा में तनया का विशेष महत्व है,यूँ तो इसका गायन गुरु के सश्रद्ध नमन के लिए किया जाता है,परन्तु इससे आचार्य शिष्य परम्परा को समझने में भी अत्यन्त सहायता मिलती है। वन्दे गुरु परम्पराम्। ऐतिह्य साक्ष्य के लिए यहाँ गुरु परम्परा उद्धृत है।
वाधूलवंश कलशाम्बुधिपूर्णचन्द्रं श्री श्रीनिवासगुरूवर्यपदाव्जभृङ्गम्।
श्रीवाससूरी तनयं विनयोज्जवलन्तं श्रीरंगदेशिकमहं शरणं प्रपद्ये।।
भारद्वाजान्वावय धृततनुममलम् वैष्णवेषु अग्रगण्यम् ।
श्रीमत्रंगार्यवर्यांमलपदकमले न्यस्तविश्वात्मभारम् ।।
तद्पादाम्भोज भृङ्गम् तद्मृत कृपया प्राप्तसंमंत्र- राजम्।
श्रीमत् राजेन्द्रसूरि वरगुणनिलयं धामराशिमश्रयेऽहम्।।
कौडिण्यगोत्र सरसीरूह बालभानुम्।
 श्रीरंगदेशिक पदाब्जरसैक भृङ्गम्।।
श्रीराजेन्द्रसूरि चरणाश्रितमप्रमेयम्।
 श्रीमत् पराङ्कुशगुरूं शरणं प्रपद्ये ।
राजेन्द्राचार्य / परमहंस सूरि का वृन्दावन में आगमन
श्री राजेन्द्रयतीन्द्रपादयुगले सद्भक्तिमानवहम्
राजेन्द्र सूरी परमहंस का जन्म 22 मार्च 1853 मंगलवार को नैमिषारण्य से 67 KM उत्तर पूर्व मिश्र की मिठौली नामक ग्राम जिला खीरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। इनके पिता का नाम अयोध्या मिश्र था। माँ के द्वारा संतों की सेवा में यथोचित सत्कार की कमी से खिन्न होकर ये वृन्दावन चले गये। दक्षिण से ब्रज में आए आये रंगदेशिक स्वामी के पढ़ने-लिखने की व्यवस्था श्रीनिवासाचार्य ने की । उस समय गद्दी पर श्रीनिवासाचार्य विद्यमान थे। श्रीरंगदेशिक स्वामी का जैन परिवार से सम्बन्ध तथा श्री राधाकृष्ण जैन की पुत्री से विधिवत् इनके विवाह की कथा प्रचलित है। दूसरे कथानक के अनुसार श्रीवैष्णव शास्त्रों की भक्ति और विद्वानों से प्रभावित होकर, दो धनी भाइयों, राधा-कृष्ण (लक्ष्मीदास) और मथुरा के गोविंद दास, श्री रंगादेशिक स्वामी के अनुयायी बन गए।  रंगदेशिक स्वामी अपने स्वसुर श्रीराधाकृष्ण के साथ श्रीरंगनाथ भगवान् के दर्शन करने गए। गोदाम्मा की तीसरी इच्छा थी कि वे  वृन्दावन में वास करें। श्रीरंगनाथ भगवान् से मंदिर स्थापना की अनुमति प्राप्त कर उनकी मूर्ति की व्यवस्था की गयी । मद्रास से 40 कि.मी. दूर पेरुम्बदूर में भगवान् श्रीरंगनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसी के बाद स्वसुर राधाकृष्ण के साथ विधि विधान से अर्चना पूजन करते हुए श्रीरंगदेशिक स्वामी  श्रीरंगनाथ जी को लेकर वृन्दावन आ पहुँचे। सर्वप्रथम वृन्दावन पहुँचकर अक्रूर घाट के पास भतरोंड़ बगीची में पश्चात् प्रतिष्ठा होने तक लक्ष्मीनारायण मंदिर में रहे। दोनों भाईयों (श्रीलक्ष्मीचंद तथा गोविंद) के सहयोग से रंगदेशिक स्वामी तमिलनाडु में श्रीविल्लिपुत्तुर के अंदल मंदिर की शैली का अनुसरण करते हुए  7 वर्ष में मंदिर बनवाया। गोदारंगमन्नार भगवान साक्षात् लक्ष्मी-नारायण के अवतार हैं। । मंदिर का काम 1845 में शुरू हुआ और इस मंदिर की स्थापना  25/10/1851 को श्रीरंगदेशिक स्वामी के हाथों से हुई थी। 7 परकोटों में जड़ा हुआ मंदिर तथा सुवर्ण-इन्द्रासन आदि दर्शकों को चमत्कृत कर देते हैं। साठ फुट ऊँचा सोने का खम्भा देखते ही बनता है। कहा जाता है कि उस समय मंदिर निर्माण में 45 लाख रूपये खर्च हुए थे। मंदिर में श्री गोदा रंगमन्नार भगवान विग्रह विराजित है । महत्वपूर्ण मान्यताए देवताओं अंदल, रंगनाथ स्वामी, और गरुड़ (भगवान के पार्षद) की हैं। मंदिर अब श्री रंग मंदिर, वृंदावन के रूप में जाना जाता है।
रंगदेशिक स्वामी के शिष्य का नाम परमहंस सुरी है। परमहंस सूरी सैकडों शिष्यों के साथ विचरण करते हुए तरेत पधारे। यहाँ रहते हुए आश्रम की स्थापना की। इनके अनेकों प्रभावशाली शिष्यों में दो प्रमुख संत हुए 1-परांकुशाचार्य 2- वासुदेवाचार्य। वासुदेवाचार्य कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे,जबकि परांकुशाचार्य भूमिहार ब्राह्मण।

श्रीस्वामी परांकुशाचार्य जी 
श्रीस्वामी परांकुशाचार्य जी का जन्म 10 मार्च 1865 तदनुसार फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी शुक्रवार संवत् 1921 को नौवतपुर के समीप अवस्थित महमत्पुर गॉंव के कौण्डिन्य गोत्रीय आथर्वणिक ब्राह्मण कुल में श्री रामधीन शर्मा एवं श्रीमती रामसखी देवी के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ।  बचपन में आप पारसनाम से पुकारे जाते थे। समयानुसार बभनलई ग्राम के भारद्वाजगोत्रीय श्री नरसिंह नारायण शर्मा की पुत्री के साथ परिणय सूत्र में बंधकर आपका गृहास्थाश्रम में प्रवेश हुआ तथा एक पुत्ररत्न भी प्राप्त हुआ। इस तरह से गृहास्थाश्रम के मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण से आप मुक्त हुए। बचपन से ही संगीत के माध्यम से रामचरित मानस की सस्वर प्रस्तुति में आपकी अभिरूचि थी। एक दिन स्वामी परमहंस सूरि जी के स्वागत में गॉंव मे मानस प्रस्तुति का आयोजन हुआ। प्रस्थान के पूर्व स्वामी परमहंससूरि जी ने आपके बड़े भाई श्रीजुदागी शर्मा से आपको अपने लिया मांगा। घर गृहस्थी के कारण प्रारंभ में भाई को संकोच तो हुआ परंतु उन्होंने अपनी स्वीकृति देते हुए कहा कि पारस भी आपका ही है।
दक्षिण भारत की यात्रा
कुछ समय बीता और स्वामी परमहंससूरि जी तरेत स्थान से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल गये। इधर पारस जी का मन स्वामी जी में ही लगा रहता था। एक दिन पारस जी अस्वस्थ हुए और दिन- प्रतिदिन रोग बढ़ता ही गया। स्थिति ऐसी आ गयी कि सबलोग इनके जीवन से निराश होने लगे। इसी बीच अचानक स्वामी परमहंससूरि जी का तरेत में पदापर्ण हुआ। पारस उन्हें देखते ही स्वस्थ हो गये। इनकी अनेक रोचक कहानियां प्रसिद्ध हैं। 

श्रीस्वामी परांकुशाचार्य  और उनकी शिष्य परम्परा
हजारो गॉंव के लोग श्रीस्वामी जी से दीक्षा प्राप्त कर श्रीवैष्णव बने। श्रीस्वामी जी के संरक्षण में हजारों श्रीवैष्णव संस्कृत शिक्षा प्राप्त कर गृहस्थ जीवन अपनाते हुए अध्यापन आदि कार्य में लग गये। कुछेक शिष्यों ने विरक्त जीवन को चुना एवं  श्रीवैष्णव मत के प्रचार प्रसार में जीवन दानी हो गये। संवत् 2036 फाल्गुन कृष्ण नवमी को परांकुशाचार्य इहलोक की लीला पूर्ण कर परलोक सिधारे।  अधिक जानकारी के लिए श्रीस्वामी परांकुशाचार्य  पर चटका लगायें।  श्रीस्वामी जी के शिष्यों में रङ्गरामानुजाचार्य का महत्तम स्थान है, मेरे आप दीक्षा गुरु हैं। मेरी जीवन गाथा इन्हीं से जुडती है,अतः श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य की जीवन गाथा यहॉं प्रस्तुत करना अपरिहार्य है।

  श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य का आविर्भाव एवं शिक्षा   
                                                                    

                    तनया                            
श्रीराजेन्द्रयतीन्द्रपादयुगले  सद्भक्तिमानन्वहम्
कौण्डिन्यकुले पराङ्कुशमुनिर्जातोमहाब्धौविधुः।
तत्पादाश्रित लब्धबोध निखिलं श्रीरङ्गरामानुजम्
श्रीमत्काश्यपवंशजं गुरूवरं भक्त्या सदासंश्रये।।
कश्यप कुल में प्रादुर्भूत श्री स्वामी रङ्गरामानुज की भक्ति का आश्रय लेता हूँ जो परमहंस स्वामी राजेन्द्र सूरि जी की भक्ति में प्रवीण पूर्णचंद्रमा की तरह अवतरित श्रीकौण्डिन्य गोत्रिय स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी के चरणाश्रित होकर समस्त वेदशास्त्र के ज्ञान में निष्णात हुए हैं।
         श्री स्वामी रङ्गरामानुज जी का आविर्भाव वि. संवत् 1989 आश्विन शुक्ल एकादशी तदनुसार 10 अक्टूवर 1932 को धनिष्ठा नक्षत्र में वर्तमान जिला जहानाबाद के मिर्जापुर गॉंव में हुआ है। दीक्षा लेने के पूर्व इनके बचपन का नाम  श्री रूपदेव था। इनके पिता श्रीरामसेवक शर्मा जी के दो पुत्र हैं : श्री विशुनदेव शर्मा एवं श्री रूपदेव जी। गॉंव में तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई के बाद पारिवारिक परिस्थितिवश ये खेती एवं गोपालन में पिताजी की सहायता करने में लग गये। दिन में विश्राम की अवधि में गॉंव में ही स्थापित स्वामी श्री पराङ्कुशाचार्य पुस्तकालयसे पुस्तकें लेकर पढ़ते रहते थे। पढ़ाई लिखाई के प्रति अभिरूचि देखकर पिताजी ने इन्हें शकुराबाद के उच्च विद्यालय में भेज दिया। वहॉं के प्रधानाध्यापक श्री उदित नारायण शर्मा एवं संस्कृत शिक्षक श्री गिरिराज शर्मा की इनपर विशेष कृपा रहती थी। एक बार छुट्टी के दिनों में जब ये शकुराबाद से गॉंव मिर्जापुर आये हुए थे तब गॉंव में स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य की कथा चल रही थी। नित्य कथा सुनने में इनकी अभिरूचि देखकर गॉंव वालों ने स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी से इन्हें शिक्षा प्राप्ति हेतु सरौती ले जाने के लिये प्रार्थना की । करीब 15 वर्ष की अवस्था में ये सरौती आश्रम में आ गये एवं यहाँ के 82 वर्षीय स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी से दीक्षित होकर रङ्गरामानुज नाम प्राप्त किये। सरौती संस्कृत विद्यालय के छात्र के रूप में प्रथमा. मध्यमा. उपशास्त्री. शास्त्री के उपरान्त व्याकरण एवं न्याय में आचार्य की शिक्षा पूरी की। अलौकिक मेधा के कारण ये व्याकरण एवं न्याय में स्वर्णपदक से सम्मानित हुए। श्री मधुकांत जी से न्याय पढने हेतु दरभंगा जाना पड़ता था। कुछ काल वहॉं रहकर पुनः सरौती आ जाते थे। शिक्षा प्राप्त करने हेतु अन्य विद्वान से कालक्षेप करने के निमित्त श्रीवैष्णवों की सेवा के लिये प्रसिद्ध श्रीकिशोरी जी के पीरमुहानी पटना स्थित आश्रम में भी कुछ काल के लिये ये ठहरा करते थे। तरेत स्थान के यशस्वी एवं न्याय के ख्यातिलब्ध ज्ञाता श्री प्रसिद्धनारायण शर्मा से भी इन्होंने तरेत में ही रहकर न्याय के गूढ़ तत्वों को समझा था। इसतरह से न्याय में आचार्य की पढ़ाई पूरी हुई थी।
 सरौती स्वामी जी की चरण सेवा में रहते हुए श्रीमुख से वेदान्त की महत्ता के बारे सुनकर इन्होंने भी श्रीस्वामी जी से वेदान्त अध्ययन की जिज्ञासा प्रकट की।  इनकी अभिरूचि से प्रसन्न होकर स्वामी जी ने इनको उच्च शिक्षा हेतु बाराणसी भेज दिया। वारणसी में आपने श्री नीलमेघाचार्य से वेदान्त की तथा अन्य गुरुओं से ज्योतिष एवं मीमांसा की शिक्षा प्राप्त की। श्री नीलमेघाचार्य वेदान्त के ख्यातिलब्ध आचार्य थे। उनकी जीवनी यहाँ प्रस्तुत है।
श्रीवैष्णव दर्शन के शिक्षक  श्री नीलमेघाचार्य  (1901-1965)

     पंडित को0नीलमेघाचार्य का जन्म फरवरी सन् 1901 में कोडिपाक्कम् ग्राम दक्षिणी अर्काट जिला मद्रास में हुआ था। इनके पिता का नाम वरददेशिकाचार्य था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा तंजौर जिला के तिरुवैयार संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। सन् 1922 में इन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से व्याकरण शिरोमणि परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। बाद  के वर्षों में इन्होंने कोयियालम् स्वामी जी के आश्रम में श्री भाष्य और गीता भाष्य का अध्ययन किया। वहां से अध्ययन पूर्ण कर रीवा राजगुरु के विद्यालय में वर्षपुष्कर (अजमेर) की संस्कृत पाठशाला में वर्ष तथा रामानुजकूर शोलापुर में वर्ष तक वेदांत और व्याकरण का अध्यापन किये। पुनः तिरुपति के श्री वेंकटेश्वर ओरिएंटल कॉलेज में 10 वर्ष तक व्याकरण के अध्यापक रहे। वहां से वाराणसी में आकर रामानुज विद्यालय में 10 वर्ष तथा वृंदावन के वैष्णव संस्थान में वर्ष तक अध्यापन कर अंत में 1959 में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय संप्रति संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में रामानुज वेदांत के प्राध्यापक नियुक्त होकर अंत समय तक यही कार्य करते रहे। ग्रीष्मावकाश में जब आप अपनी जन्मभूमि में विश्राम कर रहे थे 26 जून 1965 इसवी में आपका अकस्मात स्वर्गवास हो गया। तमिल के साथ ही साथ आपका संस्कृत और हिंदी भाषा पर पूरा अधिकार था। न्यायसिद्धांतञ्जनवेदार्थसंग्रहन्यासविंशतिन्यासतिलकयतिराजविंशति और परमपदसोपान का हिंदी अनुवाद आपने किया। इसके अतिरिक्त आपने अष्टश्लोकी,श्रीगुरुपरंपरा प्रभाव और वेदांतकारिकावली का संपादन किया है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आपके विद्वता पूर्ण लेख प्रकाशित होते रहे हैं। आपने विष्णुसहस्त्रनामरहस्यत्रयसार और गीतार्थसंग्रह का भी हिंदी व्याख्या के साथ संपादन किया है। अपने जीवन के अंतिम काल में न्याय सिद्धांत जन पुस्तक के-परीक्षणों की टिप्पणी यह लिख चुके थे परंतु में परीक्षेत की टिप्पणी लिखते समय अकस्मात् परम पद को प्राप्त हो गए। वेदांत देशिक जो न्यायसिद्धांजन के रचयिता है, उन्होंने भी इस पुस्तक को पूर्ण नहीं कर सके। विडंबना है कि स्वयं वेदांतदेशिक अभाव का निरूपण नहीं कर सके और चल बसे। इसी प्रकार विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रगल्भ पंडित यामुनमुनि के ग्रंथ सिद्धित्रय के आत्मसिद्धिईश्वरसिद्धि और सम्वित्सिद्धि इन तीनों के प्रकरण अपूर्ण है। भट्ट पराशर के ग्रंथ तत्वरत्नाकर का प्रमेय प्रकरण भी अधूरा रह गया। नीलमेघाचार्य का पूरा जीवन भारतीय दर्शन विशेषकर रामानुज संप्रदाय के अध्ययन अध्यापन में व्यतीत हुआ। एक बार करपात्री जी के तरफ से श्रीवैष्णवों के विरोध में कुछ बात छपी थी तो श्रीनीलमेघाचार्य ने त्रिदंडी श्रीविष्वकसेनाचार्य की तरफ से एक पुस्तक का प्रणयन कर करपात्री जी को करारा उत्तर दिया था। काशी के विद्वत्तमंडली में इनका बहुत ही आदर सम्मान था। भाषा एवं विषय में बिना किसी अशुद्धि के किसी भी सभा मे धाराप्रवाह संस्कृत बोलकर विद्वानों प्रतिद्वन्दियों को अचंभित एवं श्रोताओं को मुग्ध किये रहते थे।

       रङ्गरामानुजाचार्य जी तिंगल मत के श्रीवैष्णव थे अतः तिंगल मतावलम्बी होने के कारण प्रारंभ में शंका थी कि बडगल समर्थक श्री नीलमेघाचार्य इन्हें श्रीवैष्णव विशिष्टाद्वैत दर्शन के अध्ययन हेतु शायद स्वीकार न करें। संयोगवश एक बार तरेत स्थानाधीश स्वामी श्रीवासुदेवाचार्य जी काशी में पधारे। तरेत स्वामी  जी भी रङ्गरामानुजाचार्य पर अत्यंत स्नेह रखते थे, अतः उन्होंने इनसे इनकी पढ़ाई लिखाई की जानकारी ली। जब रङ्गरामानुजाचार्य जी ने श्री नीलमेघाचार्य से श्रीवैष्णवदर्शन पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए अपनी शंका से भी उनको अवगत कराया तब श्रीस्वामी जी तुरत ही इनको साथ लेकर श्रीनीलमेघाचार्य जी के पास पहुँच गये। प्रारंभ में श्रीनीलमेघाचार्य जी ने बताया कि तिंगल एवं बडगल में सिद्वान्ततः मतभेद के कारण अच्छा होगा कि ये किसी तिंगल मत के विद्वान से ही श्रीवैष्णव दर्शन पढ़ें।  तरेत स्वामी जी ने अनुरोध किया कि आप नीलमेघ हैं और मेघ बिना भेदभाव के पृथ्वी पर जल वर्षाता है। आप  कृपा करके अपनी ज्ञान की वर्षा इनपर कीजिये। श्रीनीलमेघाचार्य जी ने रङ्गरामानुजाचार्य को अपना विद्यार्थी स्वीकारते हुए कुछ आवश्यक नियमों के पालन से इन्हें अवगत कराया : 
1. नित्य द्वादश तिलक लगाकर आना होगा। 
2. प्रतिदिन प्रातः बिना अन्न ग्रहण किये फलाहार रहकर ही पढ़ने के लिये आना होगा। पढ़ाई के बाद ही           अन्न ग्रहण करना होगा। 
3. बडगल परंपरा के  पाठ से ही नित्य पढ़ाई प्रारंभ भी होगी तथा समाप्त भी होगी।  परंपरा पाठ के समय      बारम्बार जमीन पर आठों अंग से लेटकर साष्टांग करना तथा पुनः खड़ा होकर साष्टांग करते रहना होगा। 
4. परंपरा पाठ के बाद ही नित्य पढ़ाई शुरू होगी।

विद्यार्थियों के साथ स्वयं श्री नीलमेघाचार्य जी भी इन नियमों का पालन करते थे। प्रारंभ के चार छः दिन श्रीरूपदेव जी को शारीरिक कष्ट का अनुभव हुआ परन्तु शीघ्र ही ये इसके अभ्यासी हो गये तथा 1957 से 1962 तक इन्होंने श्रीनीलमेघाचार्य जी से रहस्यत्रय सार’ ‘अधिकरण सारावली’  ‘न्याय सिद्धाञ्जन तथा श्रीभाष्य का अध्ययन किया।
         एक गृहस्थ वैष्णव परिवार के दो पुत्र एवं एक पुत्री के अभिभावक थे तथा परिवार के भरण पोषण के लिये धन की निरन्तर आवश्यकता पड़ती थी। इसी कारण से सरौती स्वामी जी रङ्गरामानुजाचार्य को श्रीनीलमेघाचार्य जी को भुगतान करने हेतु प्रतिमाह कुछ धनराशि उपलब्ध करा दिया करते थे। इसके अतिरिक्त श्रीरूपदेव जी के स्वयं के खर्च के लिये आवश्यक राशि अलग से भेजते रहते थे।
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य पर रोग का आक्रमण
        एक बार कर्मकाण्ड कराने पंडित श्रीमाधव जी के सहायक के रूप में रङ्गरामानुजाचार्य सोन नदी के पश्चिम वरूही गॉंव गये थे। वहीं ये ज्वर से पीड़ित हो गये तथा पालकी की सवारी से इन्हें सरौती लाया गया। सरौती आने पर ज्वर के साथ विषम चेचक के चपेट में आ गये। महीनों उपचार के बाद स्वस्थ हुए।
बचपन से त्यागी एवं सहिष्णु प्रवृति के होने के कारण काशी अध्ययन की अवधि में भोजन एवं अन्य सुविधायों से श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी उदासीन रहे। साथ रहने वाले छात्रों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करते थे। फलस्वरूप प्रायः भोजन में कमी हो जाती थी। कभी दाल पीकर सो जाना तथा कभी भूखे रह जाना इनका स्वभाव हो गया था। जाड़े में एक ही कम्बल को आधा विछाकर आधा ओढ़कर अपना काम चला लिया करते थे। शरीर कमजोर होने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर हुआ तथा इन्हें टी बी रोग ने धर दबोचा। ये काशी छोड़कर तरेत आ गये। सरौती स्वामी जी को जब यह ज्ञात हुआ तो विशेष व्यवस्था से इन्हें सरौती बुला लिये। सरौती ठाकुरवारी के तत्कालीन  व्यवस्थापक सरौती गॉंव के प्रपन्न श्रीवैष्णव श्री रघुराज जी को पटना भेजकर पटना के प्रसिद्ध डा टी एन बनर्जी से तीन वर्षों तक इनकी टी बी का उपचार कराया। शुरू के नौ महीने पटना में ही रहे तथा जब रोग के ठीक होने के लक्षण दिखने लगे तो ये पुनः सरौती वापस आ गये। यहॉं एक कमरे में शांत चित्त से शय्यासीन रहे तथा श्रीस्वामी जी ने इनकी सेवा सुश्रुषा की उचित व्यवस्था कर दी। जब श्रीस्वामी जी सरौती में रहते थे तो नित्य प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 3 बजे चुपचाप इनके कमरे में आकर इनकी नाड़ी की गति का निरीक्षण कर लौट जाते थे। करीब तीन वर्षों के बाद स्वस्थ होने पर सरौती ठाकुरवारी के स्थानीय संस्कृत विद्यालय में ये अध्यापक के रूप में कार्यरत हो गये। 
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य और इनका योगदान
        स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी का इनपर बहुत ही स्नेह रहता था। 101 वर्षीय श्रीस्वामी जी चाहते थे कि श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी सरौती स्थान के संचालन में सहायता करे तथा इसकी जिम्मेदारी भी लें परन्तु त्यागी प्रवृति के होने के कारण इन्होंने श्रीस्वामी जी के चरणों में निवेदन कर इस तरह के कार्य से अपने को वंचित रखा। तत्पश्चात् श्रीस्वामी जी ने इन्हें शंख चक्र प्रदान करते हुए श्रीवैष्णव धर्म के प्रसार के लिये गॉंवों में भ्रमण करने को कहा। शुरू  में शारीरिक कमजोरी के कारण ये भ्रमण से हिचकिचाये परन्तु श्रीस्वामी जी ने इन्हें एकाध मील ही चलकर गॉंवों में जाने की  राय दी। बाद में श्रीरघुराज जी ने इनके लिये एक घोड़ी की व्यवस्था कर दी। यहीं से बिहार में ये श्रीवैष्णव धर्म के अग्रणी प्रचारक के रूप में एक उदीयमान सूर्य के रूप में उभरे। 82 वर्ष की अवस्था होने पर भी श्रीवैष्णव व्योम में यह सूर्य आज भी अध्यात्म मार्ग के  एक कुशल गुरू के रूप में भवरोग से ग्रस्त जनमानस को प्रकाश की राह दिखा रहे हैं।
        ई सन् 1969 में इन्होंने हुलासगंज  के पास  शुकियांवा गॉंव में ज्ञानयज्ञके साथ भागवत कथासे लोगों को लाभान्वित किया। यज्ञ में बचे हुए धन को जब ग्रामीण इनको देने लगे तो इन्होंने धन को स्वीकार करने से मना करते  हुए राय दी कि अगर संभव हो तो यहॉं एक संस्कृत विद्यालय का शुभारंभ करें। गॉंव वालों ने हुलासगंज के पास नदी के किनारे कुछ जमीन की व्यवस्था कर श्रीपराङ्कुश संस्कृत विद्यालयकी शुभारंभ कर दी। इसी के साथ यहॉं श्रीलक्ष्मीनारायण मन्दिरकी भी स्थापना हुई। पर्ण कुटीर के साथ यह आश्रम इनका आवास भी हो गया।

       
        हुलासगंज में स्थित आश्रम तथा महाविद्यालय का चित्र। पूरा परिसर वनाच्छादित दिख रहा है।

हुलासगंज में सर्व प्रथम लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण  हुआ। मंदिर के आगे जगमोहन का विस्तार ई सन् 1988 में हुआ। मेरे जाने के पूर्व 1- श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य संस्कृत उच्चविद्यालय  2-श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य संस्कृत महाविद्यालय  3- पराङ्कुशाचार्य आयुर्वेदिक दातव्य औषधालय का निर्माण हो चुका था। 
    मैं हुलासगंज में वर्ष 1983 से 1989 तक रहा। उसके बाद हुलासगंज भी यहाँ से जुड़ाव लगा रहा। वर्ष 2017 तक मैं देश के अनेक धार्मिक स्थलों, संस्कृत विद्या के केन्द्रों, भारत के अनेक भूभाग की सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति से परिचित हो चुका हूँ। अब मैं हुलासगंज का संस्मरण लिखने बैठा हूँ । इसे लिखने में कई वर्ष लग सकते हैं। अब विवरणात्मक लेखन के स्थान पर समीक्षात्मक लेखन होगा। अपने उन अनुभवों, हुलासगंज में व्यतीत किये की चर्चा प्रतिपलं तव संस्मरणम् (हुसालगंज संस्मरण 2) नामक दूसरे लेख में करुँगा। उसमें वहां के सन्तों, गुरुजनों, शिक्षा की स्थिति, शिक्षकों की योग्यता, छात्रों की स्थिति, हुलासगंज के विकास में महत्वपूर्ण व्यक्तियों का योगदान, सामाजिक वातारण तथा मित्रों के संस्मरण आदि की रोचक जानकारी दूँगा । 
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य विरचित पुस्तकें एवं पत्रिका: 
स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य द्वारा पूर्व में प्रकाशित पुस्तकों का नवीन संस्करण के प्रकाशन के अतिरिक्त श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी ने गीता तथा कर्मकांड पर पुस्तकें प्रकाशित की हैं। सन् 1980? से इन्होंने हुलासगंज से वैदिक वाणीएक त्रैमासिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन किया है। इनके द्वारा प्रणीत पुस्तकें निम्नवत् हैं।

 1. अर्थपञ्चकतत्व विमर्श             2. लघुस्तोत्र मञ्जरी 
 3. विशिष्टाद्वैत तत्वदिग्दर्शन        4. गीतापञ्चप्रसुन
5.  गीतारहस्य चन्द्रिका              6. स्तोत्र चन्द्रिका  
7. उपदेशमाला                         8. श्रीरामकथा रसायन 
9. गीताप्रवचन पीयूष.               10. वास्तुकर्म प्रकाश 
11.चौलादिविवाह चन्द्रिका         
12. श्राद्ध चन्द्रिका 
13. अर्चिरादिमार्ग

 ‘ज्ञानयज्ञ’  एवं धार्मिक कृत्य
        सन् 1968 में सरौती श्रीस्वामी जी की अध्यक्षता में श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी ने पहला ज्ञानयज्ञभोजपुर शिकरहटा में संपन्न किया। तबसे त्रिदिवसीय या पंचदिवसीय ज्ञानयज्ञके द्वारा हजारों गॉंवों को आप लाभान्वित करते रहे हैं। आपके द्वारा प्रत्येक वर्ष एक या दो ज्ञानयज्ञ अवश्य ही संपन्न होते रहे हैं। पंचदिवसीय ज्ञानयज्ञ’  ‘अयोध्याएवं वृन्दावनमें भी संपन्न हुए। अयोध्या’ के ज्ञान यज्ञ में मैं लखनऊ से गया था।  अर्द्धकुंभ या पूर्णकुंभ के अवसर पर आपका हरिद्वार’ ‘उज्जैन’ ‘नासिकतथा प्रयागराजमें बाड़ा भी जाता है, जहॉं ज्ञानयज्ञएवं धार्मिक प्रवचन से भक्तों को लाभान्वित होने का मौका मिलता है। मकर कुंभ के अवसर पर प्रत्येक वर्ष प्रयागराज में करीब एक माह की अवधि का बाड़ा लगता है।
यज्ञस्थल पर श्रीमद्भागवत पारायण एवं कथा’ ‘हरिनाम का अखंड कीर्तनतथा संत विद्वानों के प्रवचन से लगभग एक माह की अवधि मै आकर्षक धार्मिक वातावरण बना रहता है।  संतानहीन लोगों को हरिवंशपुराणसुनाया जाता है जिससे अनेकों को लाभान्वित होते देखाा गया है।  पृथक यज्ञमंडप में यज्ञाग्नि प्रज्वलित कर प्रत्येक दिन श्रीविष्णुसहस्रनामसे हवन दी जाती है। अगर त्रिदिवसीययज्ञ है तो प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्रनामसे कम से कम एक आवृति अवश्य पूरी की जाती है। इसी तरह से तीनों दिन होम की आवृति चलती है। पचदिवसीययज्ञ में पांच दिन यज्ञमंडप में श्रीविष्णुसहस्रनामका होम चलता है।
सम्प्रति स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी महाराज के संरक्षण में प्रमुख रूप से
(१) श्रीराम संस्कृत महाविद्यालय, सरौती, रामपुर चौरम अरवल (बिहार)।
(२) श्री वेंकटेश परांकुश संस्कृत महाविद्यालय, अस्सी, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
(३) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(४) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य संस्कृत उच्च विद्यालय, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(५) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य प्रेस, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(६) स्वामी परांकुशाचार्य संस्कृत महाविद्यालय, मेहन्दिया, अरवल (बिहार)।
(७) श्री परांकुश संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद् हुलासगंज, गया (बिहार)। शिक्षण संस्थाएँ सञ्चालित हैं।
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