बुधवार, 28 नवंबर 2018

संस्कृत काव्य की परम्परा

लौकिक काव्य की उत्पत्ति
लौकिक संस्कृत साहित्य का आरंभ वाल्मीकि कृत रामायण से होता है। इसे आदि काव्य कहा गया है। क्रौंच वध की घटना से द्रवित हुए वाल्मीकि ने रामायण की रचना की। जिसमें सरसता, स्वाभाविकता, विविध रसों का समन्वय, समास विहीन वाक्य प्राप्त होते हैं। रामायण की कविता सुंदरी को यत्र तत्र अलंकारों से सजाया गया। इसमें ग्रथित अलंकार के कारण कविता के लावण्य में कहीं से कोई कमी नहीं आई, बल्कि यहां पर प्रयुक्त किए गए अलंकार काव्य सौंदर्य में बृद्धि करते दिखते हैं।
शैली की दृष्टि से लौकिक संस्कृत साहित्य को 4 भागों में विभाजित किया जा सकता है।
1.कालिदास (गुप्त काल) के पूर्व के काल-  पाणिनि, वररूचि, अश्वघोष, भास आदि
2. (गुप्त काल) कालिदास के पश्चात् अलंकृत शैली (शब्दचमत्कार) के काव्य, 12 वीं शताब्दी तक
3. द्वयर्थीय त्र्यर्थीय काव्य
4. आधुनिक काव्य – हायकू, गजल आदि छन्द
 लौकिक संस्कृत साहित्य के उपजीव्य मुख्य ग्रंथ हैं- वाल्मीकि कृत रामायण, व्यास कृत महाभारत तथा श्रीमद्भागवत। इसमें महाभारत तथा श्रीमद्भागवत को पुराण के अंतर्गत जबकि रामायण को महाकाव्य के अंतर्गत परिगणित किया जाता है।
महाकाव्य का लक्षण
महाकाव्य का लक्षण निर्धारण आचार्य भामह, दण्डी ने किया। भामह तथा दण्डी के अनुसार महाकाव्य उसे कहते हैं, जो सर्गों में बंधा हो। सर्गबन्धो महाकाव्यम्। इसके अतिरिक्त दण्डी इतिहास में प्रसिद्ध नायक देवता या धीर उदात्त गुणों वाला क्षत्रिय कुलीन क्षत्रिय नायक का होना अनिवार्य करते हैं। दण्डी अनलंकृत शैली का ध्यान रखते हैं। दोनों आचार्यों के सिद्धान्त का परिपाक आनन्दवर्धन के ध्वन्यालोक में मिलता है। विश्वनाथ के साहित्य दर्पण में समेकित स्वरूप प्राप्त होता है। इसके अनुसार जिस में सर्ग का निबंधन हो, वह महाकाव्य कहा जाता है। महाकाव्य का नायक देवता या उसके सदृश क्षत्रिय जिसमें धीरोदात्त गुण हो, कुलीन वंश का राजा हो, श्रृंगार, वीर, शांत में से कोई एक अंगी रस व कथा ऐतिहासिक या सज्जन आश्रित हो, ग्रंथ के आदि में मध्य में तथा अंत में मंगलाचरण किया गया हो, जिसमें 8 से अधिक सर्ग तथा प्रत्येक सर्ग का एक सुनिश्चित छंद हो, सर्ग के अंत में छंद परिवर्तन होता हो तथा आगामी कथा की सूचना मिलती हो उसे महाकाव्य कहते हैं। इसमें दिन, पर्वत, ऋतु, वन, सागर, मुनि, स्वर्ग आदि का वर्णन मिलता हो, इस प्रकार के काव्य महाकाव्य की श्रेणी में रखा गया है।
वाल्मीकि रामायण का उपजीव्य
रघुवंशमहाकाव्यम्-  कालिदास
 जानकीहरणमहाकाव्यम्- कुमार दास
 भट्टिकाव्य (रावणवधमहाकाव्य) - भट्टि
 महाभारत का उपजीव्य
किरातार्जुनीयम् - भारवि
 शिशुपालवधम् - माघ
नैषधीयचरितम् - श्रीहर्ष
बालचरितम् - भागवत
वेंकटनाथ-  यादवाभ्युदय -
बालभारत - अमरचन्द्र सूरि
काव्य का विकास
छठी शताब्दी गुप्त काल के बाद कविता अलंकार प्रधान और पांडित्य प्रदर्शन का साधन बन गई। ऐसा राज्याश्रय मिलने तथा अपने को अन्य से श्रेष्ठत साबित करने के कारण आरंभ हुआ। कालिदास के पूर्ववर्ती कवियों के काव्य में रसभरी शैली थी। इनकी कविता सीधी-साधी और अलंकार विहीन शैली में लिखी गई। इसमें अश्वघोष, बुद्धघोष तथा भास्कर नाम मुख्य रूप से लिया जाता है। कालिदास के काव्य में प्रसादमयी तथा प्रवाह पूर्ण भाषा का प्रयोग मिलता है। यहां हठात् अलंकार का प्रयोग नहीं किया गया है। इस समय तक महाकाव्य का विषय वस्तु विस्तृत होता था । कालिदास ने रघुवंश महाकाव्य में दिलीप से लेकर अग्निवर्ण तक 31 पीढ़ियों का वर्णन किया। कालिदास के बाद ज्ञान विज्ञान की विभिन्न शाखाओं, शास्त्रों, कलाओं, दर्शनों का विकास हुआ। जिसके कारण इसका प्रभाव काव्य पर भी पड़ा। राज्यसभा में रहने वाले कवियों ने शास्त्रों का प्रयोग अपने काव्यों में भी किया। जिसके कारण शास्त्रकाव्य, संधानकाव्य, यमक काव्य आदि अनेक प्रकार के काव्य उद्भूत होते चले गए। अधोलिखित महाकाव्य प्रसाद गुण संपन्न वैदर्भी रीति में लिखे गए। 
अलंकृत शैली का महाकाव्य
अश्वघोष- बुद्धचरितम्, सौन्दरानन्दम्
कालिदास- रघुवंशम्, कुमारसंभवम्
कुमार दास – जानकीहरणमहाकाव्यम्
उद्भट -  कुमारसंभव        (अप्राप्त)
पद्मगुप्त- नवसाहसांकचरितम्
विल्हण- विक्रमांकदेवचरितम्
अभिनन्द- रामचरित महाकाव्य    10-11 शताब्दी
मंख (मंखक) - श्रीकंठचरित महाकाव्य
क्षेमेन्द्र- दशावतारचरित महाकाव्य
लोलिम्बराज- हरिविलास महाकाव्य
हरिश्चन्द्र- धर्मशर्माभ्युदयम् महाकाव्य
लक्ष्मीधर भट्ट- चक्रपाणिविजय महाकाव्य
कृष्णानन्द- सहृदयानन्द महाकाव्य    13वीं शती
अलंकारों में दो मुख्य अलंकार है उपमा और श्लेष। उपमा दो समान धर्म वाले के साथ जुड़कर परस्पर अभिमुख करता है। श्लेष का अर्थ है- दो का ऐसा चिपकना कि एक हो जाना और उस एक से दो या दो से अधिक की मनोरम प्रतीति कराना । इस प्रकार उपमा और श्लेष एक दूसरे के पूरक है। दक्षिणात्य कवियों में उत्प्रेक्षा, औदीच्यों में श्लेष, प्रतीची कवियों में केवल अर्थयोजन तथा गौड कवियों में अक्षराडंबर होता था।
अलंकार बहुल शैली
भारवि ने अपने किरातार्जुनीयम् में अलंकार बहुल शैली को अपनाया। आपने अपने काव्य में उपजाति, वैतालीय, द्रुतविलम्बित, प्रहर्षिणी, स्वागता,, मत्तमयूर आदि अनेक वृत्तों का प्रयोग किया। महाकाव्य के पद-पद पर सूक्तियाँ देखने को मिलती है।
सहसा विदधीत न क्रियाम्। 
हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः।
वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः।
अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता।
 कालिदास से माघ तक की यात्रा में जो शैली परिवर्तन हुआ उसमें भारवि इसके आरम्भकर्ता हैं।  इस ग्रंथ में एक अक्षर को लेकर भी श्लोक की रचना की गई। अर्थगौरव के लिए यह ख्यात तो है ही। इस ग्रंथ की इतनी ख्याति हुई कि इस पर अब तक 37 से अधिक टीकाएँ लिखी जा चुकी , जिसमें मल्लीनाथ की  घंटापथ टीका मुख्य है। महाकाव्य का वर्ण्य विषय राजनीति, धर्म नीति, युद्ध नीति आदि है। भारवि ने विपुल परिणाम वाले कथानक का परित्याग करते हुए महाभारत के लघु कथा को लेकर अर्जुन से इंद्र कील पर्वत पर किरात वेशधारी शंकर से युद्ध करते हैं। इस युद्ध अर्जुन शिव को प्रसन्न कर उनसे अस्त्र-शस्त्र प्राप्त करते हैं । मात्र इतनी कथानक को लेकर भारवि ने पर्वत, नदी, संध्या, ऋतु, प्रातःकाल आदि का वर्णन करते हुए 18 सर्गों का महाकाव्य लिख डाला। काव्य में चमत्कार पैदा करने के लिए एकाक्षर श्लोक तक लिखे गये-
            न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु।
            नुन्नोSनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्न नुत्। किरात. 15/14
अर्थ :  अनेकविध मुख वालों! (प्रमथगणों) यह नीच विचार का मनुष्य नहीं है, यह न्यूनता (बुराई) का समूल नष्ट करने वाला पुरुष से अतिरिक्त कोई देवता है। विदित होता है इसका स्वामी भी है। यह बाणों से आहत है तथापि अनाहत की तरह प्रतीत होता है। अत्यंत व्यथा से आक्रांत पुरुष को व्यथित करना दोषावह होता है। इस दोष से भी यह पुरुष मुक्त है।
इसी पञ्चदश सर्ग में तीन अर्थ को कहने वाला श्लोक भी प्राप्त होता है-
               जगतीशरणे युक्तो हरिकान्तः सुधासितः ।
               दानवर्षीकृताशंसो नागराज इवाबभौ ।। 15.45 ।।
एक अन्य श्लोक देखिये। इसमें महायमक अलंकार है। एक ही पद (विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा) चार बार आया है किन्तु प्रत्येक चरण का अर्थ भिन्न-भिन्न हैं।
       विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः।
       विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणा विकाशमीयुर्जगतीशमार्गणाः ॥ 15.52
1.जगतीश = पृथ्वी के स्वामी अर्जुन के, मार्गणाः = वाण,  विकासं = विस्तार को, ईयुः = प्राप्त हुए, अर्थात् अर्जुन के वाण चारों तरफ फैल गए
2.जगति = लोक में, ईशस्य = शंकर के, मार्गणः = शर, विकाश = विषम गति को प्राप्त हो गए अर्थात् खंडित हो गए।


अर्थ- अर्जुन के असंख्य वाण सर्वत्र व्याप्त हो गए जिससे शंकर के वाण खंडित कर दिए गए इस प्रकार अर्जुन के रण कौशल को देख दानव को मारने वाले शंकर के गण आश्चर्य में पड़ गए। शंकर और तपस्वी अर्जुन के युद्ध को देखने के लिए शंकर के भक्त लोग आकाश में आ पहुंचे ।
 इस प्रकार अलंकृत शैली के कथानक संक्षिप्त होता चला गया। अत्यधिक श्लेष प्रयोग से कविता कामिनी मूर्छित होती चली गई। अलंकारों की प्रधानता के कारण हीं इसे अलंकृत शैली का महाकाव्य कहा गया है। यही स्थिति माघ के शिशुपाल वध तथा नैषधीयचरितम् में देखने को मिलता है । 
माघ के शिशुपालवधम् में कालिदास की उपमा भारवि का अर्थ गौरव दंडी का पद लालित्य एक साथ देखने को मिलता है।
             उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्।

             दण्डिनः पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणाः।।
   पुष्पेषु जाती नगरेषु काञ्ची नारीषु रम्भा पुरुषेषु विष्णुः ।
   नदीषु गङ्गा नृपतौ च रामः काव्येषु माघः कविकालिदासः।।

नवसर्गे गते माघे नवशब्दो न विद्यते ।
किरातार्जुनीयम् की तरह शिशुपालवधम् का उपजीव्य महाभारत है। शिशुपालवधम् की कथा श्रीमद् भागवत आदि पुराणों में भी प्राप्त होती है। कवि ने कृष्ण चरित के एक छोटे से प्रसंग को अपनी कल्पना द्वारा महाकाव्य में परिणत किया। इसमें किरातार्जुनीयम् की शैली दिखाई देती है।
उद्भट इनकी प्रशंसा करते हुए लिखते हैं कि
            तावद्भा भारवेर्भाति यावन्माघस्यनोदयः।
यह वीर रस प्रधान काव्य है, परंतु बीच-बीच में श्रृंगारिक का वर्णन भी किया गया है। विप्रलम्भ के कुछ प्रयोग भी मिलते हैं। अन्य अंगरस भी प्रासंगिक रूप से ग्रहण किए गए हैं । युद्ध के प्रसंग में रौद्र और वीभत्स का प्रयोग किया गया है ।
सेना का प्रयाण, अस्त्र शस्त्रों की झनझनाहट, हाथियों की चिगघाड़, योद्धाओं का द्वन्द्व युद्ध, कबन्धों का नृत्य, वीरों के लिए देवांगनाओं की प्रतीक्षा आदि युद्ध वर्णन बहुत सुंदर और प्रभावोत्पादक हुआ है। जैसे-

बवृंहिरे गजपतयो महानकाः प्रदध्वनुर्जयतुरगा जिहेषिरे।
शिशुपालवधम् में सभी महत्वपूर्ण अलंकारों का प्रयोग किया गया है। उन्नीसवें सर्ग में सर्वतोभद्र, मुरजबन्ध, गोमुत्रिकाबन्ध, एकाक्षरपाद, प्रतिलोमानुलोमपाद, श्लोकप्रतिलोम यमक आदि अनेक प्रकार के यमक का प्रयोग किया है। कुछ उदाहरण देखें-
एकाक्षरपाद
      जजौजोजाजिजिज्जाजी तं ततोऽतिततातितुथ् ।
      भाभोऽभीभाभिभूभाभूरारारिररिरीररः ।। 19.3 ।।
सर्वतोभद्र
        स का र ना ना र का स
        का य सा द द सा य का ।
        र सा ह वा वा  ह सा र
        ना द वा द द वा द ना ।। 19.27 ।।
इसे के आगे के श्लोक में मुरजबन्ध का प्रयोग किया गया है-
              लोलासिकालियकुला यमस्यैव स्वसा स्वयं ।
              चिकीर्षुरुल्लसल्लोहवर्मश्यामा सहायतां ।। 19.28 ।।
इन्हें चित्रों में प्रदर्शित करने पर अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। कालिदास ने 6 मुख्य छंदों का प्रयोग किया।भारवि ने 11 या 12 तथा माघ ने 16 मुख्य छन्दों का प्रयोग किया है। इस प्रकार के काव्यों की रचना बहुत अधिक मात्रा में मिलती है। मैं यदा कदा अपने फेसबुक पर पोस्ट के माध्यम से उसे रखते रहता हूँ।
इसी प्रकार का एक ग्रंथ मंख का श्रीकंठचरित है।
नैषधीयतरितम् ग्रंथ के अंत में महाकवि श्रीहर्ष ने लिखा है कि वे कन्नौज और वाराणसी के महाराज विजय चंद्र और जयचंद के सभापंडित थे। वे कान्यकुब्जेश्वर से पान के दो बीडे और आसन पाते थे तथा समाधि में ब्रह्म का साक्षात्कार करते थे। उनका काव्य मधु की वृष्टि करने वाला है और तर्कों में उनकी उक्तियां शत्रु को परास्त करने वाली है। इस पद से यह पता चलता है की श्रीहर्ष का समय विक्रम की 11वीं शताब्दी है। यह न्याय वेदांत आदि अनेक शास्त्रों पर पूर्ण अधिकार रहते थे।
            ताम्बूलद्वयमासनं च लभते यः कान्यकुब्जेश्वराद्
            यः साक्षात्कुरुते समाधिषु परं ब्रह्म प्रमोदाऽर्णवम् ।   
            यत्काव्यं मधुवर्षि, धर्षितपरास्तर्केषु यस्योक्तयः

            श्रीश्रीहर्षकवेः कृतिः कृतिमुदे तस्याऽभ्युदीयादियम् ॥22/153
यहीं पर श्रीहर्ष डिम-डिम घोष पूर्वक कहते हैं कि मैंने अपने ग्रंथ में जहां-तहां गांठ बांध रखा है।  स्वयं को पंडित मानने वाले खल,जो गुरु परम्परा के प्रति श्रद्धालु नहीं हैं, इससे खेल नहीं सकें। यह पांडित्य पूर्ण शैली या अलंकृत शैली का पूर्ण उत्कर्ष है।
               ग्रन्थग्रन्थरिहक्वचिद्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नानमया
                प्रज्ञम्मन्यमना हठेन पठती माऽस्मिन्खलः खेलतु।
                श्रद्धाराद्धगुरुश्थलीकृतदृढग्रन्थिः समासादय-
                त्वेत्काव्यरसोर्मिमज्जनसुखव्यासज्जनं सज्जनः।। नैषध. 22/252
            उदिते नैषधे काव्ये क्व माघः क्व च भारविः।।
यह पांडित्य पूर्ण शैली या अलंकृत शैली का पूर्ण उत्कर्ष है। 855 में कश्मीर में लिखा गया। हरविजय में भी यही अलंकृत शैली का उत्कर्ष देखने को मिलता है ।
श्लेष शैली के महाकाव्य
भारवि- किरातार्जुनीयम्
गउडवहो- वाक्पतिराज
रत्नाकर- हरविजयम्
मंखक- श्रीकंठचरितम्
भट्टि- भट्टिकाव्यम्
हेमचन्द्र- कुमारपालचरितम्
विद्यामाधव- पार्वतीरुक्मिणीयम्
हरिदत्त सूरि- राघवनैषधीयम्
श्लेष बहुल काव्य अथवा अनेकसंधान काव्य
आठवीं शताब्दी के बाद 12वीं शताब्दी तक द्वयर्थीय तथा त्र्यर्थीय  काव्य के निर्माण में कवि संलग्न हुए। इसमें- धनंजय           का    द्विसंधान, 
विद्या माधव    का    पार्वती रुक्मणीय, 
हरदत्त सूरी    का     राघवनैषधीयम्, 
कविराज सूरी   का   राघवपाण्डवीयम्,
संध्याकरनन्दी  का   रामचरित आदि ग्रंथ हैं।

राघव पांडवीयम में राम और नल के जीवन चरित्र को प्रत्येक पद में प्रतिष्ठित किया गया है।

त्र्यर्थीय काव्य में राजचूड़ामणि दीक्षित का राघवयादवपाण्डवीयम्,
चिदम्बर सुमति का राघवपाण्डवयादवीय आदि है। ये ग्रंथ शब्द चमत्कार प्रधान ग्रंथ कहे जाते हैं। इस प्रकार की रचना हृदय और मस्तिष्क को रससिक्त नहीं करते, अतः कालिदास जैसे सुकुमार कवि की चर्चा युगों युगों से होती आ रही है।
संस्कृत महाकाव्यों की सूची

लेखक- जगदानन्द झा

सोमवार, 12 नवंबर 2018

संस्कृत बाल साहित्य

  स्वतंत्रता आंदोलन के समय पीढ़ी को राजनीतिक चेतना के लिए ही नहीं जगाया गया बल्कि साहित्य चेतना का भी उदय हुआ। यह वही दौर था जब संस्कृत में बाल साहित्य अपना आकार लेने लगा था। बच्चों तक संस्कृत शिक्षा पहुंचाने के लिए उनके योग्य साहित्य के सृजन पर ध्यान दिया गया। मैंने परिशीलनम् पत्रिका का बाल साहित्य विशेषांक प्रकाशित करने का उपक्रम शुरू करायाजो अभी प्रकाशनाधीन है। मैंने अपने यहां बाल पुस्तकालय का एक अलग से सेल गठित कियाजो अभी बहुत अधिक परवान नहीं चढ़ पाया। देश में अभी तक बच्चों के लिए एक भी संस्कृत पुस्तकालय नहीं हैजहाँ बच्चे अपने लायक संस्कृत की पुस्तकोंपत्रिकाओंदृश्य श्रव्य संसाधनों द्वारा ज्ञान में बृद्धि कर सकें। हमें बाल साहित्यकारों की समस्त रचनायें एकत्र प्राप्त हो सके। मैंने कुछेक छात्रों को संस्कृत बाल साहित्य पर शोध करने के लिए प्रेरित भी किया। आशा है आने वाले दिनों में इस दिशा में ठोस कदम उठाये जा सकेंगें।
संस्कृत क्षेत्र में बच्चों के लिए शैक्षिक सामग्री सृजन करने तथा कार्यक्रम संचालित करने वाले लोगों को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि यह पीढ़ियों को जगाने का काम हैजिसे तन्मयता से किया जा रहा है। हालाँकि अबतक किये अधिकांश काम व्यक्तिगत संस्थाओं और व्यक्तिगत रूचि के कारण हुए हैं। इन संस्थाओं के नाम आगे यहाँ दिये जायेंगें। बाल साहित्य प्रकाशन में सरकारी योगदान बहुत ही कम है। संस्कृत शिक्षा प्राप्त अभिभावकों तथा शिक्षकों के लिए बच्चों को समझने तथा उसके मनोविज्ञान,  विकासअधिकार, कल्पना,  संस्कार, अपराध तथा शोषण आदि विषयों को समझने के लिए साहित्य नहीं लिखा गया  है। बच्चों के लिए थोड़े बहुत कहानियाँ, कवितायें मिल जाती है। 
आधुनिक संस्कृत साहित्य के इतिहास में बाल साहित्य को लेकर बहुत अधिक सामग्री अभी तक नहीं उपलब्ध होती है। बच्चों के लिए वैज्ञानिक कथा लेखन तथा अन्य विधाओं मैं लेखन अभी शैशवावस्था में है। इधर कुछेक बाल साहित्य स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित हुई है। बाल साहित्य लेखक के रूप में लेखक भी प्रकाश में आये हैं। अधिकांश लेखकों की रचनाओं में कुछेक बाल गीत मिल जाते हैं। जैसे हरिदत्त शर्मा की रचनाओं में। बच्चों के लिए मनमोहक कलेबर में पुस्तकें प्रकाशित हुई है परन्तु इसकी अधिक विक्री नहीं हो पाती। कारण इस प्रकार के पुस्तकों के प्रकाशन में अत्यधिक धन खर्च होता है, जिससे इसका मूल्य बढ़ जाता है। समाज की भाषा हिन्दी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषायें हैं। बचपन से संस्कृत माध्यम में शिक्षा दिये जाने की व्यवस्था नहीं है अतः इसके खरीरदार भी नहीं होते।              जब से संस्कृत भाषा का आंदोलन शुरू हुआ तब से संस्कृत के प्रचारकों ने बच्चों को केंद्र में रखकर बाल साहित्य की रचनाएं आरंभ की। इसमें पंडित वासुदेव दिवेदी शास्त्री का अवदान बहुमूल्य है। बाल साहित्य को संस्कृत की मुख्यधारा में लाने का श्रेय पंडित वासुदेव द्विवेदी शास्त्री को जाता है। आपने न केवल प्रभूत बाल साहित्य की सर्जना की अपितु अनेक साहित्यकारों को इसके लिए प्रेरित भी किया। इनके द्वारा विरचित गीत  आज  हर विद्यालय के उत्सव में  बच्चों द्वारा गाया जाता है। आपने साहित्य की सभी विधाओं में बाल साहित्य की रचना की है। आपकी रचनाओं की सूची संलग्न है । आप द्वारा रचित वर्णमाला गीतावलि (हँसते खेलते संस्कृत) में पहले वर्णों से परिचय कराया गया है अनन्तर स्वर तथा व्यंजन वर्णों के गीत दिये गये हैं। इस गीत के आरम्भ में दो अक्षर वाला वर्ण पुनः तीन अक्षर वाला वर्ण है। क्रियाओं से परिचय कराने के लिए अकारदि क्रम से क्रिया पद दिये गये हैं। जैसे-
अ  अन्नम्         आ आम्रम्     इ इक्षुः      ई ईशः       उ उष्ट्रः        ऊ  उर्णा
अ अरविन्दम्    आ आगारः    इ इवारुः   ई ईशानी    उ उलूखम्    ऊ  ऊर्णायुः
अ अस्ति          आ आस्ते      इ इच्छति                  उ उदयति  
यहाँ प्रेरणार्थक क्रिया के गीत भी हैं।
क कारयति     ख खादयति   ग गूहयति   घ घ्रापयति

एक स्वर तथा व्यंजन वाले अनेक शब्द एवं क्रियायें, बारहखडी़ (स्वराक्षरी) के गीत ङभी दिये गये हैं। सबसे अंत में संयुक्ताक्षर एवं संख्यावाची संस्कृत शब्द की तालिका दी गयी है। इस प्रकार कोई बी शिशु संस्कृत माध्यम से खेल खेल में संस्कृत वर्णमाला सीख जाता है। इसके साथ ही वह दैनिक व्वहार में आन वाले शब्दों तथा क्रियाओं से भी परिचित हो जाता है। यूट्यूब पर संस्कृत वर्णमाला गीत की भरमार है।
 पंडित दिगंबर महापात्र ने पं. शास्त्री से प्रभावित होकर बाल साहित्य की रचना की। लखनऊ में डॉ. वीरभद्र मिश्र और लखीमपुर में आचार्य बाबूराम अवस्थी बाल साहित्य के सृजन में संलग्न हुए। आचार्य बाबूराम अवस्थी ने संस्कृत को समाज से जोड़ा। संस्कृत लोकगीतों का प्रणयन किया। बाल गीत लिखे। आज भी लखीमपुर में दशहरा मेले का आयोजन होता हैजिसमें संस्कृत कवि सम्मेलन का आयोजन किया जाता है। डॉ. वीरभद्र मिश्र का सम्पूर्ण कृतित्व महराजदीन पाण्डेय के सम्पादन में राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली से दो खंडों में प्रकाशित होकर आ चुका है। वीरभद्र रचनावली के प्रथम खंड में बाल रचनाओं का संकलन दिया गया है। वीरभद्र मिश्र संस्कृत के अनन्य साधक और प्रचारक थे। मैंने  #संस्कृतसर्जना ई-पत्रिका में इनका संस्मरण प्रकाशित किया था। आपने 1977 से 2000 ईस्वी तक सर्वगंधा नामक पत्रिका का प्रकाशन किया। आपके परिवार की भाषा संस्कृत है। रचनावली में उनके द्वारा लिखी गई कविताओं, काव्य, नाटक, गन्धवहः ( सर्वगंधा में प्रकाशित संपादकीय का संकलन) व्यंग चित्र और भद्रकोष आदि संकलित है। आप संपूर्ण जीवन संस्कृत को आधुनिक ज्ञान से पुष्ट करने का काम किया। आप प्रयोग वादी आचार्य थे। इसका दिग्दर्शन हमें इनकी रचनाओं से भी मिलता है। बाल कविता में उन्होंने नवीन विधान किया। आपने चल मम घोटक, दुग्धं पिव रे, चलति विडालः आदि लगभग 40 शिशु गीतों की भी रचना की। पत्रकारिता में भी उन्होंने नए मानदंड स्थापित किए। भद्रकोष में आज के प्रचलन में प्रयुक्त होने वाले शब्दों का संस्कृत शब्द दिया है। इसी प्रकार महाराष्ट्र में भि. वेलणकर का बालगीतम्, आन्ध्र प्रदेश में 1930 में जन्मे ओगेटि परीक्षित शर्मा का ललितगीतलहरी एवं परीक्षिन्नाटकचक्रम् प्रसिद्ध हुआ।
इच्छाराम द्विवेदी ने बाल गीतांजलिकेशव चंद्र सेन महान एकता पुस्तक में बच्चों के लिए शिशु कथा लिखी है। दिगंबर महापात्र की रङ्गरुचिरम् तथा ललितलवङ्गम् पुस्तक में शिशुओं के लिए बाल कविता लिखी है।
हरिदत्त शर्मा ने उत्कलिकाबालगीतालीगीतकन्दलिका मैं बच्चों के गाने लायक गीतों की रचना की है। अभिराज राजेंद्र मिश्र ने कनीनिकामृद्विका में बाल गीत तथा कान्तारकथा में वन्यजीवों पर आधारित कहानियां लिखी है। जनार्दन हेगड़े,  विश्वासकेशवचन्द्र दाश,  हरेकृष्ण मेहर  आदि ने प्रभूत योगदान किया। 
संस्कृत के विकास के लिए आवश्यक है कि बाल विकास पर ध्यान दिया जाय। जब बच्चों के स्कूल में शीतावकाश हो जाता है तब बाल रचना कार्यशाला किये जाने की आवश्यकता है। मैंने देखा है कि बच्चे कितनी तन्मयता और उत्साह के साथ गीतकहानियाँपत्रलेखनअभिनय पूर्वक गीत गायनक्रीडा आदि को सीखते हैं। इस अवसर पर बच्चों को छोटी छोटी कविता, कहीनियाँ लिखने को प्रेरित किया जा सकता है। लिखी कविताओं को चित्रों से सजाया जा सकता है। इन चित्रित कविताओं के प्रकाशन में अधिक खर्च नहीं आएगा।  अस्तु।
जब भी बाल साहित्य की चर्चा होती है, बरबस पंचतंत्र की कथा याद आती है। विश्वास ने भी पंचतंत्रकथा पुस्तक लिखी है। बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के लिए नीति कथा प्रकाशित किये गये। संस्कृत के लगभग प्रत्येक महाकाव्य में बाल प्रसंग मिल जाता है । रामायण में भगवान श्री राम के बाल रूप की कथा, लव कुश का वर्णन तथा महाभारत में पांडवों कौरवों और अभिमन्यु का वर्णन मिलता है। इसी प्रकार परवर्ती कवि ने भी अपने साहित्य में छिटपुट रूप से बाल रूप का वर्णन किया है। रघुवंशम् में वर्णन आता है कि जब रघु अपने धायी की उंगली पकड़कर चलने लगे। प्रणाम करने की शिक्षा से नम्र होने लगे।
उवाच धात्र्या प्रथमोदितं वचो ययौ तदीयामवलम्ब्य चाङ्गुलिम्।
अभूच्च नम्रः प्रणिपातशिक्षया  पितुर्मुदं तेन ततान सोऽर्भकः ॥
 गोस्वामी तुलसीदास भी अपनी काव्य रचना आरंभ करते समय बंदऊँ बाल रुप सोई रामू लिखते हैं। बाल रूप, बाल स्वभाव किसे नहीं पसंद है? बीसवीं शताब्दी में संस्कृत भाषा में स्वतंत्र बाल साहित्य की रचना होने लगी। बाल कविता, बाल कथा, बाल नाटक, बाल गीत की पुस्तकें अब सचित्र उपलब्ध हैं।  कुछ साहित्यकारों ने हिंदी तथा अन्य भाषाओं में लिखित बाल साहित्य का संस्कृत में अनुवाद किया है। संस्कृत बाल साहित्य पर  ऑनलाइन भी प्रभूत सामग्री उपलब्ध है। इस आलेख में मैं संस्कृत बाल साहित्य पर अब तक किए गए कार्यों का ब्यौरा प्रस्तुत करूँगा। साथ ही कुछ बाल कविता, बाल गीत आदि भी उपस्थित करूंगा।
अंतरजाल पर उपलब्ध बाल साहित्य
नोट- जिन शब्दों को अधोरेखांकित किया गया है, उस पर क्लिक करने से आप सम्बन्धित लिंक पर पहुँच जायेंगें।
वेदिकासंस्कृत रैम्स नाम से यूट्यूब पर एक चैनल है, जिसमें बच्चों के गीत उपलब्ध होते हैं। इसे लिंक पर जाकर सुना जा सकता है।
भार्गवीवर्धन ने भी यूट्यूब पर कुछ वीडियो पोस्ट किया है, जहां पर वह बच्चों से संस्कृत गीत गाती हुई दिख रही है।
संस्कृत बाल साहित्य को समर्पित ब्लॉग के लिंक पर जायें।
सम्पदानन्द मिश्र ने संस्कृत बाल साहित्य परिषद् नाम से संस्था गठित की। उनकी अभिरुचि बाल साहित्य पर अधिक है। आपने बाल साहित्य पर शनैः शनैः आदि कई रचनाएं की है, जो प्रकाशित है। आप बाल साहित्य लेखकों की कार्यशाला का भी आयोजन कर चुके हैं।  उनके वेबसाइट का लिंक पर जायें।
इस लिंक में बच्चों के लिए संस्कृत में कहानियां दी गई है। प्रतीत होता है की इन कविताओं को बच्चों ने ही लिखा है।
इस लिंक में संस्कृत के छोटे-छोटे वाक्य दिए गए हैं। इसी वेबसाइट के लिंक में आम बोलचाल में बार बार प्रयोग करने वाले शब्दों को दिया गया है।
गूगल ग्रुप पर संस्कृते लघु कथाः का लिंक का प्राप्त होता है। यहां 2-3 छोटी-छोटी कहानियां दी गई है। लेखक अभी कहानी लिखने का प्रयास कर रहा है।
चित्रकथा (कार्टून) में संस्कृत रामायण पढ़ने के लिए लिंक पर चटका लगाकर उसके साइट पर जायें।
प्रज्ञा जरे ने यूट्यूब पर बच्चों के लिए  वर्णमाला गीत है। वेदिका के नाम से भी वर्णमाला गीत है। यहीं पर पर शरीर के अवयव के गीत, बाद्य, वाहन, मास,ऋतु आदि पर विडियो उपलब्ध है। संस्कृत प्रमोशन फान्डेशन ने भी बच्चों के लिए संस्कृत ट्युटोरियल में प्रत्येक कक्षा के लिए विडियो बनाया है। यूट्यूब पर बलदेवानन्द सागर की आवाज में कहानियाँ, अक्षर गीत, संख्या गीत के साथ विभिन्न प्रकार के एनिमेटेड संस्कृत गीत आदि उपलब्ध है। 
सोशल मीडिया पर बच्चों के कार्यक्रम
मेरे अनेक मित्र सोशल मीडिया विशेषकर फेसबुक ग्रुप पर बच्चों की गीत प्रतियोगिता कराते रहते हैं। इसके लिए परितोषिक भी दिया जाता है। ग्रुप के सदस्य गीतों, कहानियों का यहाँ प्रचार भी करते हैं। यहाँ फेसबुक समूह का नाम अंकित किया जा रहा है। इसमें बच्चों द्वारा गाये गीत प्रचूर मात्रा में मिलेंगें, जो हमें अच्छे भविष्य के संकेत देते हैं। 
1. शिशु संस्कृतम्
 2. सरलं संस्कृतम्
3. विश्वसंस्कृतकुटुम्बकम्
4.  संस्कृतरसास्वादः
इस प्रकार के अन्य भी समूह हैं। दिग्दर्शन के लिए कुछ का लिंक यहाँ दे दिया है।      
संस्कृत बाल साहित्य के प्रकाशक संस्थायें          स्थान
1. राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्   नई दिल्ली
2. अर्वाचीन संस्कृत साहित्य परिषद्                     बड़ोदरा 
3. संस्कृत भाषा प्रचारिणी सभा                         नागपुर
4. चिन्मय मिशन                                          चेन्नई
5. उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान                          लखनऊ
6. सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थानम्                  वाराणसी
7. संस्कृतभारती                                          बेंगलूरु, USA, गोआ, नई दिल्ली
8. श्री अरविन्दो आश्रम                                  पदुच्चेरी
9. साहित्य एकेडमी                                      नई दिल्ली
10. लोकभाषा प्रचार समिति                          पुरी (उड़ीसा)
11. दिल्ली संस्कृत अकादमी                           दिल्ली
12. राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान                             नई दिल्ली
बाल साहित्य पर श्री अरविन्दो आश्रम बहुत पहले से काम करते रहा है। यहाँ पर श्रीमाता के सान्निध्य में जगन्नाथ वेदालंकार तथा नरेन्द्र ने सरलसंस्कृतसरणिः पुस्तक लिखा। लोकभाषा प्रचार समिति से अनेक प्रकार के शिशु साहित्य प्रकाशित हुए। यहाँ से प्रकाशित  मधुरं संस्कृतम् पुस्तक के गीतों को हर बालक गा रहा है। इसमें अनेक रचनाकारों के गीतों का संकलन है। कुछ प्रसिद्ध गीत का लेखक नाम तथा गीत का नाम अधोलिखित है-
डॉ. श्रीधरभास्कर वर्णेकर          लोकहितं मम करणीयम्
श्री मंजूनाथ शर्मा                     पठत संस्कृतम्
श्री नारायण भट्ट                      सुन्दरसुरभाषा     (मुनिवरविकसित
श्री नारायण भट्ट                      चिरनवीना संस्कृता एषा
पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री          सादरं समीहताम्
श्री ल.म. चक्रदेव                     मम माता देवता
श्री जनार्दन हेगड़े                     मृदपि च चन्दनम्
बाल इस लिंक के अतिरिक्त मेरे यूट्यूब चैनल पर भी अनेक बाल गीत मिलते हैं। आप मेरे चैनल Jagdanand Jha पर भी पधारें। यहाँ संस्कृतेन संभाषणं कुरु तथा संस्कृत बाल साहित्य पर मेरा उद्बोधन सुना जा सकता है।
बाल साहित्य के लेखकों और उनकी रचनाओं के बारे में विस्तार किया जाता रहेगा।
   1934 में अलीपुर पाकिस्तान में जन्मे ओम प्रकाश ठाकुर इंद्रधनुः में बाल गीतों की रचना की। प्रस्तुत है इनकी कुछ पंक्तियाँ-
मूषक! धाव मूषक! धाव
त्वोमेषोऽहं गृहणामि
क्षुधा बाधते मां तीव्रा
त्वामत्तुम् अभिवांछामि।
आपने क्रीत दास ईशप के विद्रोह की कथा को पुस्तक की शीर्षक से अलंकृत कर ईसप कथा निकुञ्जम् की रचना भी की, जिसमें कुल 111 लघुकथा दी गयी है। यह बच्चों के लिए उपयोगी साहित्य है।
डॉ. नवलता, डॉ. मनोरमा, विश्वास, डॉ. केशव प्रसाद गुप्त, प्रो. हरिदत्त शर्मा, प्रो. इच्छाराम द्विवेदी, प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी, डॉ. राजकुमार मिश्र सहित अनेको कवियों तथा साहित्यकारों ने अपनी सारस्वत लेखनी से बाल साहित्य की श्री में वृद्धि की है।
नन्दन पत्रिका में जय प्रकाश भारती ने हिन्दी में बाल कथायें लिखी थी। इसका मधुर शास्त्री ने संस्कृत में अनुवाद किया है। इसे संकलित कर बाल- नैतिक- कथाः नाम से पुस्तकाकार में लेखक ने प्रकाशित किया। दिल्ली संस्कृत अकादमी से प्रकाशित ते के आसन् डायनासोराः भी बच्चों के लिए ज्ञानबर्द्धक है। इस संस्था ने संस्कृत बाल साहित्य सर्जकों को प्रोत्साहित किया है।
संस्कृत में चंदा मामा, संस्कृत चंद्रिका जैसी बाल पत्रिकाओं का भी प्रकाशन हुआ। उपर्युक्त लेखकों से मेरा व्यक्तिगत लगाव है। बच्चों को आकर्षित करने के लिए संस्कृत में कॉमिक्स में प्रकाशित किये जा रहे हैं। यह ऑनलाइन तथा प्रिंट दोनों स्वरुप में मिलते हैं। सम्भाषण संदेशः पत्रिका में बच्चों के लिए कुतुककुटी (कॉमिक्स) तालक्कुटी, बालमोदनी का एक एक नियमित स्तंभ प्रकाशित होता है। यह बच्चों के लिए बहुत उपयोगी पत्रिका है।
पंडित वासुदेव द्विवेदी शास्त्री ने जिस हेतु पीढ़ी को जगाया, उसे मूर्त रूप संस्कृतभारती नामक संस्था ने दिया। इस संस्था ने बच्चों को केंद्र में रखकर विभिन्न प्रांतों से 50 से अधिक बाल साहित्य प्रकाशित किया। इसमें उन संस्कृत सेवाव्रती विद्वानों का महनीय योगदान है, जिन्होंने अपना सर्वस्व प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा पाने वाले बच्चों के लिए लगाया। आज के दिन इस संस्था के द्वारा किए गए कार्यों की मुक्त कंठ से प्रशंसा करता हूं। संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान ने बाल साहित्य को डिजिटल रूप दिया।
डॉ. सम्पदानन्द मिश्र आज बरबस याद आ रहे हैं। आपके द्वारा लिखित एवं प्रकाशित बाल साहित्य आधुनिक रचनाकारों के मार्गदर्शन हेतु पर्याप्त है। चित्ताकर्षक कलेवर में प्रकाशित आप की रचना किस बच्चे का मन नहीं मोहता? संस्कृतसर्जना त्रैमासिकी ई पत्रिका में मैंने आपका एक साक्षात्कार प्रकाशित किया था, जिसमें बाल साहित्य पर विशेष ध्यान केंद्रित किया गया है। इसी पत्रिका में प्रो. प्रभुनाथ द्विवेदी का चतुरः काकः तथा अन्य बाल कविता भी प्रकाशित हुई। इस विषय पर आपसे घंटों बातचीत होती है । आपने संस्कृत बाल साहित्य परिषद् का गठन किया तथा कार्यशालाओं, संगोष्ठियों का भी आयोजन किया। मैंने अपने ब्लॉग में इनका सादर उल्लेख किया है।
मेरे अभिन्न मित्रों में प्रोफेसर मदन मोहन झा संस्कृत बाल साहित्य को नए आयाम दे रहे हैं। अभी तक किसी रचनाकार ने बच्चों के लिए शब्दकोश पर ध्यान नहीं दिया था। इस कमी को प्रो. मदनमोहन झा ने पूरा किया। आपने हिन्दी संस्कृत चित्रकोश नाम से एप बनाया।
संस्कृत बाल साहित्य
पुस्तक का नाम                       लेखक/ अनुवादक/ संकलनकर्ता
1.   बाल गीतावलिः                           पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
2.   संस्कृत गानमाला                         पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
3.   सरल संस्कृतगद्यसंग्रह                   पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
4.   हास्यविनोद कथासंग्रह                  पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
5.    हास्य विनोदवाटिका                   पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
6.   संस्कृतप्रहसनम्                           पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
7.   कौत्सस्य गुरुदक्षिणा                     पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
8.   बाल निबंधमाला                         पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
9.   बाल विनोदमाला                         पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
10.    बालनाटकम् भाग 1-2              पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
11.    वर्णमाला गीतावलिः                 पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
12.    भारतराष्ट्रगीतम्                       पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
13.    भोजराज्ये संस्कृतसाम्राज्यम्        पं. वासुदेव द्विवेदी शास्त्री
14.    बाल एकता                             केशव चंद्र सेन
15.    रङ्गरुचिरम्                            दिगम्बर महापात्र
16.    ललितलवङ्गम्                        दिगम्बर महापात्र
17.    उत्कलिका                               हरिदत्त शर्मा
18.   बालगीताली                           हरिदत्त शर्मा
19.    गीतकन्दलिका                         हरिदत्त शर्मा
20.   कनीनिका                               अभिराज राजेन्द्र मिश्र
21.    मृद्विका                                   अभिराज राजेन्द्र मिश्र
22.    कान्तारकथा                            अभिराज राजेन्द्र मिश्र
23.    बालगीतम्                              भि. वेलणकर
24.    इंद्रधनुः                                  ओम् प्रकाश ठाकुर
25.    ईसप कथा निकुञ्जम्                  ओम् प्रकाश ठाकुर
26.    कथामंदाकिनी                          ओम् प्रकाश ठाकुर
27.    बालकथाकौमुदी                       विश्वास
28.    बाल बाटिका                           विश्वास
29.    भारतीय स्वतंत्रता संघर्षगाथा    सत्यदेव चौधरी
30.   लक्ष्य वेधकः बुद्धिमान्                   सत्यदेव चौधरी
31.    हास्यमञ्जरी                             सम्पदानन्द मिश्र
32.   शनैः शनैः                                सम्पदानन्द मिश्र
33.   सप्तवर्णचित्रपतङ्गः                   सम्पदानन्द मिश्र

34.  लोकगीताञ्जलिः                        बाबूराम अवस्थी

35.    अभिनवा संकृत-नाट्य-मञ्जरी     अनन्त गोपाल देशपाण्डे
36.    अस्माकं पतङ्गिका          सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
37.   भुट्टाकम्                         सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
38.   चुन्नी मुन्नी च                   सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
39.   दोला                             सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
40.   गोधूमाः                         सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
41.   गोलगप्पकम्                   सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
42.   गुल्ली दण्डः च                 सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
43.   हर्षः जातः                      सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
44.   हिक् हिक् हिक्का               सम्पादक- कृष्णचन्द्र पाण्डेय, अनुवाद- रंजीत वेहरा
45.   आत्माभिव्यक्तिः                 बुद्धदेव शर्मा
46.  बालगीतम्                         शशिपाल शर्मा
47.   बालकथा                           संकलनकर्ता- पुलियालिल रमेश
48.   बालगीतम्                         कृष्णलाल
49.   बालकथासप्तति                   जनार्दन हेगड़े
50.    बालकथा स्रवन्ती                जनार्दन हेगड़े
51.   अभिनवा संस्कृत नाट्य मंजरी  अनन्त गोपाल देशपाण्डे
52.    बालगीतम् अङ्कगीतम्          कृष्णलाल
53.    बालकथाः                            माधुरी
54.    बालनैतिक कथाः                  मधुर शास्त्री
55.    बालेभ्यः महाभारतनीतिकथाः मनु, अनुवादक- विद्वान् उदयन
56.   बालनाटकानि                       पूजा लाल
57.   बालश्लोकाः                          श्री अरविन्दो आश्रम
58.   भस्मासुरवधम्                      भास्कर केशव धोक
59. बोधकथाः                            अशोक कौशिक, अनुवादक- संजीव
60. चमत्कारिकः दूरभाषः             ऋषिराज जानी
61. चपलः चिन्टुः                        चारुहास पंडित, प्रभाकर वडेकर
62. डयते कथमाकाशे                  राजकुमार मिश्र
63. दशावतारकथाः                    पी. रमेश
64. दुहिता                                वरदा वसा
65. एकदा                                 केशवचन्द्र दाश
66. एहि, हसाम                         संस्कृतभारती
67. गीत संस्कृतम्                       संस्कृतभारती
68. अदृश्यम्                              राधिका रंजन दाश
69. कथा विचित्राः                      राधिका रंजन दाश


यहां अधिक नहीं लिखते हुए पं. दिगम्बर महापात्र रचित इस कविता से अपनी बात पूर्ण करता हूं-
पठ रे सुत!
देव-भाषितम्
ज्ञानगर्भितं चारुभाषितम्
पाणिनेर्मुनेः रङ्गीकृतम्
अमृतायितं मृदुसंस्कृतम्
गौरवायितम् । पठ...........
लेखक- जगदानन्द झा, लखनऊ
 कृपया विना अनुमति लेख को कापी नहीं करें।