संस्कृतभाषी ब्लॉग एक आधुनिक डिजिटल गुरुकुल






















Sanskritbhashi एक अत्यंत व्यापक और सुव्यवस्थित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो संस्कृत भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित है। यह ऑनलाइन पोर्टल विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को व्याकरण, दर्शन, महाकाव्य और कर्मकांड जैसे विविध विषयों पर प्रमाणिक पाठ्य सामग्री और ई-पुस्तकें उपलब्ध कराता है। इस मंच की विशिष्टता इसके बहुआयामी संसाधनों में है, जहाँ ऑडियो ट्यूटोरियल, वीडियो व्याख्यान और आधुनिक संस्कृत गीतों का अनूठा संग्रह मिलता है। यहाँ प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या के साथ-साथ समकालीन कहानियाँ और विद्वानों का परिचय भी प्रस्तुत किया गया है, जो परंपरा और आधुनिकता का संगम है। सरल नेविगेशन और विषयानुसार श्रेणियों के माध्यम से यह ब्लॉग घर बैठे संस्कृत सीखने और शोध करने के लिए एक विश्वसनीय सेतु का कार्य करता है। संक्षेप में, यह एक ऐसी विस्तृत पाठशाला है जो संस्कृत के प्रचार-प्रसार को तकनीक के माध्यम से सुलभ बनाती है।



संस्कृतभाषी ब्लॉग पर विशेष प्रस्तुति

संस्कृतभाषी ब्लॉग पर लघुसिद्धान्तकौमुदी को आधुनिक डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे विद्यार्थी को कक्षा जैसी अनुभूति प्राप्त हो। वहाँ निम्न सुविधाएँ उपलब्ध हैं—

1. मूल पाठ

  • शुद्ध पाठ (सूत्र सहित)

2. वृत्ति का सरल अर्थ

  • प्रत्येक सूत्र की व्याख्या स्पष्ट एवं छात्रोपयोगी शैली में

3. रूपसिद्धि

  • सूत्रों के प्रयोग से शब्द-निर्माण की क्रमबद्ध प्रक्रिया
  • उदाहरण सहित व्यावहारिक समझ

4. मानक उच्चारण हेतु ऑडियो

  • सूत्रों एवं वृत्ति का शुद्ध उच्चारण सुनने की सुविधा
  • छात्रों के लिए उच्चारण-दोष निवारण में सहायक

5. ब्लैकबोर्ड शिक्षण शैली के वीडियो

  • प्रत्येक सूत्र को ब्लैकबोर्ड पर लिखकर, क्रमबद्ध रूपसिद्धि के साथ समझाया गया है
  • ऐसा अनुभव होता है मानो विद्यार्थी कक्षा में बैठकर अध्ययन कर रहा हो

6. अभ्यास एवं मूल्यांकन

  • प्रत्येक पाठ के पश्चात् अभ्यास-प्रश्न
  • स्व-मूल्यांकन हेतु प्रश्नावली
  • प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से उपयोगी प्रश्न

संस्कृतभाषी ब्लॉग पर इसकी डिजिटल, ऑडियो-वीडियो युक्त और अभ्यास-सम्पन्न प्रस्तुति आधुनिक तकनीक और पारम्परिक विद्या का सुंदर समन्वय है। यह प्रयास विद्यार्थियों को स्वाध्याय, उच्चारण-शुद्धि और परीक्षा-तैयारी — तीनों में समान रूप से समर्थ बनाता है।

लघुसिद्धान्तकौमुदी के वीडियो ट्यूटोरियल का विस्तृत विवरण और लिंक आपको 'संस्कृतभाषी' ब्लॉग पर प्राप्त होंगे,। इस ग्रन्थ के अध्ययन के लिए मुख्य पृष्ठ का लिंक यह है: https://sanskritbhasi.blogspot.com/2020/12/blog-post_1.html

नीचे दिए गए वीडियो का विवरण और विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विषय विस्तार: ये ट्यूटोरियल वीडियो संज्ञा प्रकरण से लेकर हलन्तपुल्लिंग प्रकरण, समास और कृदन्त के कुछ महत्वपूर्ण भागों तक उपलब्ध हैं।
  • शिक्षण शैली (Blackboard Style): इन वीडियो की मुख्य विशेषता इनकी 'ब्लैकबोर्ड शिक्षण शैली' है। इसमें प्रत्येक सूत्र को ब्लैकबोर्ड पर लिखकर, उसकी क्रमबद्ध रूपसिद्धि (शब्द-निर्माण की प्रक्रिया) के साथ विस्तार से समझाया गया है।
  • अनुभव: यह वीडियो माध्यम विद्यार्थियों को श्रव्य-दृश्य सहायता प्रदान करता है, जिससे उन्हें ऐसा अनुभव होता है मानो वे साक्षात् कक्षा में बैठकर अध्ययन कर रहे हों,
  • वैज्ञानिक व्याख्या: सूत्रों के अर्थ और उनकी शब्दसिद्धि की वैज्ञानिक व्याख्या पर विशेष बल दिया गया है ताकि विद्यार्थी केवल रटने के बजाय व्याकरण की अंतर्ध्वनि को समझ सकें।
  • निर्माता: इन वीडियो ट्यूटोरियल्स का निर्माण जगदानन्द झा द्वारा किया गया है।

ब्लॉग पर प्रत्येक प्रकरण (जैसे संज्ञा, सन्धि, कारक, समास आदि) के लिए अलग-अलग लिंक भी दिए गए हैं, जहाँ उनसे संबंधित वीडियो और पाठ्य सामग्री प्राप्त की जा सकती है,


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संस्कृत प्रतिभा खोज : सेवा की यात्रा

 संस्कृत-सेवायाः यात्रा

 

संस्कृतं, प्रतिभा, भाषा,

जीवनस्यैव दर्शनम्।

संस्काराणां सरित् पुण्या

युगे–युगे प्रवहन्ती सा॥

 

चिराकालात् समायाता

सेवायाः प्रथमः क्षणः।

मञ्चे बालस्वरैर्जातं

शास्त्रप्रेम्णः शुभं धनम्॥

 

नेत्रयोः दीप्तिरानन्दः

कण्ठेषु वेदनिःस्वनः।

अद्यापि देववाणी सा

बालचित्ते विराजते॥

 

निर्णायकत्वरूपेण

दृष्टा परम्परा चिरा।

श्लोकैः कण्ठगतैर्बालैः

दीप्ता संस्कृतदीपिका॥

 

जनपदात् मण्डलान्तं च

राज्यस्तरपर्यन्तकम्।

शिक्षकः, संयोजकश्च

नानारूपेण सेवितम्॥

 

पञ्जीकरण-मंचयोजना

प्रश्नपत्रं समयक्रमः।

 विगतो मे श्रमः शान्तः

अग्रे छात्रजयध्वनिः॥

 

दूरदेशात् समायाता

बालाः साशङ्कमानसाः।

एकवाक्येन शान्तास्ते

सेवा सैव मम प्रिया॥

 

गीतैः भाषणवादैश्च

गुञ्जितं संस्थानाङ्गणम्।

अद्यापि देववाणी सा

नवनिर्माणहेतुकम्॥

 

यदा सम्मानिता बालाः

हर्षेण पूरिताननाः।

तदा ज्ञातं मया सत्यं

सेवायामेव जीवनम्॥

 

नायं केवलमायोजनम्

एषा साधनसंस्कृतिः।

संस्कृतेन समालम्ब्य

विस्तीर्णो मम जीवनः॥

 

यदि अस्यां ज्ञानसरित्यां

मम बिन्दुरपि स्थितः।

तर्हि जीवनसाफल्यम्

इत्येव मम निश्चयः॥


लेखकः - जगदानन्द झा, लखनऊ

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अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता : स्मृति, साधना और ज्ञान-परम्परा का उत्सव

 कल्पना कीजिए एक ऐसी चुनौती की, जो मनुष्य की स्मरण-शक्ति, अनुशासन और ज्ञान की सीमाओं को परखती हो।

एक ऐसी परीक्षा, जिसमें किताब सामने रखकर पढ़ना नहीं, बल्कि ग्रंथ को अपने भीतर जीना पड़ता हो।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता ठीक इसी प्रकार की एक असाधारण बौद्धिक साधना है।

यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस प्राचीन धारा का उत्सव है, जिसमें ज्ञान को केवल संग्रह नहीं, संस्कार माना गया है।

 अष्टाध्यायी : संस्कृत व्याकरण का महाग्रंथ

पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सबसे प्रामाणिक और सुव्यवस्थित ग्रंथ है।

लगभग चार हज़ार सूत्रों से युक्त यह रचना सदियों से भारतीय बौद्धिक परम्परा की रीढ़ रही है।

प्रश्न स्वाभाविक है

क्या इतने विशाल ग्रंथ को कोई हूबहू, क्रमबद्ध और शुद्ध उच्चारण के साथ कंठस्थ कर सकता है?

इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का मंच है यह प्रतियोगिता।

 

 प्रतियोगिता का उद्देश्य : केवल परीक्षा नहीं, परम्परा का संवर्धन

इस प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में छिपे हुए असाधारण प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें सम्मान देना है।

यह समझना आवश्यक है कि यह केवल अंकों की दौड़ नहीं है। यह उस कंठस्थ पाठ परम्परा का उत्सव है,

जिसमें ज्ञान को पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया जाता है।

 

 मूल्यांकन प्रणाली : 100 अंकों का सुविचारित ढाँचा

प्रतियोगिता का संपूर्ण मूल्यांकन 100 अंकों के पैमाने पर किया जाता है।

इन अंकों का विभाजन अत्यंत अर्थपूर्ण है

* 70 अंक कंठस्थ पाठ (स्मृति की शुद्धता और क्रम)

* 20 अंक उच्चारण की शुद्धता, स्पष्टता और पाठ की गति

* 10 अंक ग्रंथ से संबंधित सामान्य ज्ञान

यह विभाजन स्पष्ट करता है कि इस प्रतियोगिता का केंद्र बिंदु स्मरण-शक्ति है, किन्तु उसके साथ उच्चारण और बौद्धिक समझ भी उतनी ही आवश्यक है।

 

 चयन प्रक्रिया : तीन चरणों की कठिन परीक्षा

प्रतिभागियों की परीक्षा तीन चरणों में होती है,

जो उनके ज्ञान को विभिन्न कोणों से परखती है।

पहला चरण

निर्णायक किसी एक सूत्र का उच्चारण करते हैं और प्रतिभागी को वहीं से आगे पाठ सुनाना होता है।

दूसरा चरण

प्रसिद्ध और सबसे कठिन मानी जाने वाली शलाका परीक्षा।

तीसरा चरण

ग्रंथ पर आधारित प्रश्न-उत्तर का संक्षिप्त दौर।

 शलाका परीक्षा : ज्ञान की अग्नि-परीक्षा

शलाका परीक्षा प्राचीन गुरुकुलीय परम्परा से जुड़ी हुई विधि है।

इसमें प्रतिभागी से ग्रंथ का कोई भी पृष्ठ खोलने को कहा जाता है।

निर्णायक किसी भी स्थान पर उंगली या शलाका रखते हैं और वहीं से पाठ प्रारंभ करना होता है।

यहाँ अनुमान या स्मृति-भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं होती। यह परीक्षा वास्तव में प्रतिभागी के सम्पूर्ण कंठस्थ ज्ञान की कसौटी है।

 निर्णायक मंडल की भूमिका

पूरी प्रतियोगिता का मूल्यांकन दो विषय-विशेषज्ञ न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जाता है।

प्रतिभागी का परीक्षण कितनी देर चलेगा, यह पहले से निर्धारित नहीं होता। यह पूरी तरह निर्णायकों के विवेक और प्रतिभागी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।

तीसरे चरण में

ग्रंथ से संबंधित पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं,

जिनके लिए कुल 10 अंक निर्धारित हैं।

 

 सफलता का मार्ग : तीन स्तंभ

इस प्रतियोगिता में सफलता

तीन मूल स्तंभों पर टिकी होती है

1. अष्टाध्यायी का अक्षरशः कंठस्थ होना

2. शुद्ध, स्पष्ट और संतुलित उच्चारण

3. ग्रंथ और उसके संदर्भों की गहरी समझ

इसके अतिरिक्त,

मुख्य राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुँचने से पहले प्रतिभागियों को एक ऑनलाइन क्वालिफाइंग परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी होती है।

 अंत में एक विचार

इस प्रतियोगिता के लिए आवश्यक अथक परिश्रम, स्मरण-साधना और अनुशासन हमें एक मूल प्रश्न पर सोचने के लिए विवश करता है

क्या ज्ञान केवल जानकारी है? या वह ऐसा तत्व है, जो हमारे चिंतन, स्मृति और अस्तित्व का एक अविभाज्य अंग बन जाना चाहिए?

अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता इसी प्रश्न का जीवंत उत्तर है।

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संस्कृत प्रतिभा खोज की अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता

 अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता

 स्मृति, साधना और भारतीय ज्ञान-परम्परा का जीवंत उत्सव

भारतीय ज्ञान-परम्परा में स्मरण (कंठस्थ पाठ) को केवल अध्ययन का माध्यम नहीं, बल्कि बौद्धिक और आध्यात्मिक साधना माना गया है।

इसी परम्परा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का कार्य उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता के माध्यम से किया जा रहा है।

यह प्रतियोगिता स्मृति, अनुशासन और शास्त्रीय ज्ञान की एक असाधारण परीक्षा है,

जो प्रतिभागियों की बौद्धिक क्षमता की सीमाओं को चुनौती देती है।

अष्टाध्यायी : संस्कृत व्याकरण की आधारशिला

पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सर्वाधिक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित ग्रंथ है।

लगभग चार हज़ार सूत्रों से युक्त यह ग्रंथ केवल नियमों का संकलन नहीं,

बल्कि भाषा-विज्ञान की एक अद्भुत बौद्धिक संरचना है।

इसी ग्रंथ को अक्षरशः, क्रमबद्ध और शुद्ध उच्चारण के साथ कंठस्थ करना इस प्रतियोगिता की मूल चुनौती है।

 प्रतियोगिता का उद्देश्य

इस प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं है,

बल्कि

* पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में छिपी प्रतिभाओं को पहचानना

* कंठस्थ पाठ की प्राचीन परम्परा को सुदृढ़ करना

* स्मरण, उच्चारण और बौद्धिक समझ का संतुलित विकास करना

यह मंच उन साधकों के लिए है

जो ज्ञान को केवल पढ़ते नहीं,

बल्कि उसे अपने चिंतन और व्यक्तित्व का हिस्सा बनाते हैं।

 मूल्यांकन प्रणाली (Scoring System)

प्रतियोगिता का मूल्यांकन 100 अंकों के स्पष्ट और सुविचारित ढाँचे पर आधारित है

* 70 अंक कंठस्थ पाठ (स्मरण की शुद्धता और निरंतरता)

* 20 अंक उच्चारण की स्पष्टता, शुद्धता और पाठ की गति

* 10 अंक ग्रंथ से संबंधित सामान्य ज्ञान

यह संरचना यह दर्शाती है कि

स्मरण-शक्ति इस प्रतियोगिता का केंद्र है, किन्तु उसके साथ उच्चारण और वैचारिक समझ भी अनिवार्य है।

 चयन प्रक्रिया : तीन चरणों में परीक्षा

प्रतियोगिता की चयन प्रक्रिया

तीन क्रमिक चरणों में संपन्न होती है

 1. सूत्र-प्रारम्भ चरण

निर्णायक किसी एक सूत्र का उच्चारण करते हैं और प्रतिभागी को वहीं से आगे पाठ सुनाना होता है।

 2. शलाका परीक्षा

यह प्रतियोगिता का सबसे कठिन और निर्णायक चरण माना जाता है।

ग्रंथ का कोई भी पृष्ठ खोलकर किसी भी स्थान से पाठ प्रारम्भ कराया जाता है।

यह चरण प्रतिभागी के सम्पूर्ण कंठस्थ ज्ञान की वास्तविक परीक्षा है।

 3. प्रश्न-उत्तर चरण

ग्रंथ पर आधारित पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनके लिए कुल 10 अंक निर्धारित हैं।

 निर्णायक मंडल की भूमिका

पूरी प्रतियोगिता का मूल्यांकन दो विषय-विशेषज्ञ न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जाता है।

* परीक्षा की अवधि पूर्व-निर्धारित नहीं होती

* समय का निर्धारण प्रतिभागी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है

* निर्णय पूरी तरह विषयगत विशेषज्ञता और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होता है

मुख्य प्रतियोगिता तक पहुँचने की प्रक्रिया

राज्य-स्तरीय मुख्य प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले प्रतिभागियों को एक ऑनलाइन क्वालिफाइंग परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। इसी प्रारंभिक चरण के माध्यम से योग्य प्रतिभागियों का चयन किया जाता है।

 सफलता के मूल आधार

इस प्रतियोगिता में सफलता तीन मूल स्तंभों पर आधारित है

1. अष्टाध्यायी का पूर्ण और क्रमबद्ध कंठस्थ पाठ

2. शुद्ध, स्पष्ट और संतुलित उच्चारण

3. ग्रंथ और उसके संदर्भों की गहरी समझ

 निष्कर्ष : ज्ञान की सही परिभाषा

अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता हमें एक गहरे प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है

क्या ज्ञान केवल सूचना है, या वह ऐसा तत्व है जो स्मृति, साधना और अस्तित्व में रच-बस जाए?

यह प्रतियोगिता भारतीय ज्ञान-परम्परा के इसी जीवंत उत्तर का प्रतिनिधित्व करती है। 

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तिङन्त नियम एवं भ्वादि की रूप सिद्धि - अध्ययन निर्देशिका



यहाँ पाणिनीय व्याकरण के अंतर्गत तिङन्त प्रकरण और विशेष रूप से भ्वादिगण की प्रक्रिया का विस्तृत विवेचन किया गया है। इसमें इत्संज्ञा, लोप और पद संज्ञा से संबंधित मूलभूत सूत्रों की व्याख्या की गई है, जो संस्कृत धातुओं के शुद्ध रूप को समझने के लिए आवश्यक हैं। पाठ में लट् लकार के प्रयोग, परस्मैपद और आत्मनेपद के वर्गीकरण तथा विभिन्न पुरुषों और वचनों के निर्धारण संबंधी नियमों को स्पष्ट किया गया है। 'भू' धातु के उदाहरण के माध्यम से शप् विकरण, गुण कार्य और अवादेश जैसी संधिवत् प्रक्रियाओं को समझाते हुए 'भवति' आदि रूपों की सिद्धि दिखाई गई है। यहाँ पर आप ऑडियो पोडकॉस्ट के माध्यम से रूपसिद्धि को सुन सकते हैं।  अंततः, यह लेख व्याकरणिक सूत्रों के माध्यम से क्रिया पदों के निर्माण की एक व्यवस्थित और चरणबद्ध पद्धति प्रस्तुत करता है। 


'भवति' रूप की सिद्धि की प्रक्रिया

१. धातु संज्ञा एवं लकार विधान:

सबसे पहले 'भू सत्तायाम्' धातु की 'भूवादयो धातवः' सूत्र से धातु संज्ञा होती है। वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' (सूत्र ३७६) से 'भू' धातु से परे 'लट्' लकार आता है।

२. अनुबन्ध लोप (लट्):

'लट्' में '' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से और '' की 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' सूत्र से इत् संज्ञा होती है। इसके बाद 'तस्य लोपः' (सूत्र ८) से इन इत् संज्ञक वर्णों का लोप हो जाता है, जिससे केवल 'ल्' शेष बचता है। स्थिति होती है: भू + ल्।

३. तिङ् प्रत्यय विधान:

कर्ता अर्थ में, प्रथम पुरुष एकवचन की विवक्षा में 'तिप्तस्झि...' (सूत्र ३७७) सूत्र द्वारा 'ल्' के स्थान पर 'तिप्' आदेश होता है।

४. अनुबन्ध लोप (तिप्):

'तिप्' के अन्तिम 'प्' की 'हलन्त्यम्' (सूत्र २) से इत् संज्ञा और 'तस्य लोपः' से लोप होने पर 'ति' शेष रहता है। स्थिति होती है: भू + ति।

५. सार्वधातुक संज्ञा एवं शप् विकरण:

'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' (सूत्र ३८८) सूत्र से 'ति' की सार्वधातुक संज्ञा होती है। इसके बाद 'कर्तरि शप्' (सूत्र ३८९) सूत्र से धातु और प्रत्यय के बीच 'शप्' विकरण आता है। 'शप्' के 'श्' की 'लशक्वतद्धिते' से और 'प्' की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल '' शेष बचता है। स्थिति होती है: भू + अ + ति।

६. गुण कार्य:

'शप्' (अ) के सार्वधातुक होने के कारण 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' (सूत्र ३९०) सूत्र द्वारा इगन्त अङ्ग 'भू' के '' को गुण '' आदेश होता है। स्थिति होती है: भो + अ + ति।

७. अवादेश एवं वर्ण सम्मेलन:

एचोऽयवायावः (स्रोतों में इसका नाम नहीं पर प्रक्रिया 'अवादेश' के रूप में वर्णित है) के नियमानुसार '' के स्थान पर 'अव्' आदेश होता है।

*   भ् + अव् + अ + ति = भवति

इस प्रकार, परस्पर वर्ण संयोग होने पर 'भवति' रूप सिद्ध होता है।

 

विशेष बिन्दु:

*   'भू' धातु के '' की इत् संज्ञा इसलिए नहीं होती क्योंकि वह अनुनासिक नहीं है।

*   'ति' की परस्मैपद संज्ञा 'लः परस्मैपदम्' (सूत्र ३७८) से होती है, क्योंकि 'भू' धातु से आत्मनेपद का कोई निमित्त नहीं है।

*   'ति' की प्रथम पुरुष संज्ञा 'तिङस्त्रीणि त्रीणि...' (सूत्र ३८३) और एकवचन संज्ञा 'तान्येकवचन...' (सूत्र ३८४) सूत्रों से होती है।

 

संस्कृत व्याकरण: पाणिनीय तिङन्त नियम एवं भ्वादि प्रक्रिया - अध्ययन निर्देशिका

यह अध्ययन निर्देशिका पाणिनीय व्याकरण के तिङन्त प्रकरण, विशेष रूप से इत्संज्ञा के नियमों और भ्वादि गण की प्रक्रिया को समझने के लिए तैयार की गई है। इसमें मूल सूत्रों की व्याख्या, पद-सिद्धि की प्रक्रिया और व्याकरणिक संज्ञाओं का विस्तृत विवरण दिया गया है।

भाग 1: लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रश्नावली)

निर्देश: निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर स्रोत सामग्री के आधार पर 2-3 वाक्यों में दें।

  1. 'पद' संज्ञा से क्या अभिप्राय है?
  2. 'उपदेश' शब्द का पाणिनीय व्याकरण में क्या अर्थ है?
  3. 'न विभक्तौ तुस्माः' सूत्र किस प्रकार 'हलन्त्यम्' सूत्र का अपवाद है?
  4. 'इत्संज्ञा' करने वाले किन्हीं दो सूत्रों के नाम और उनके कार्य बताइये।
  5. आत्मनेपद और परस्मैपद में मुख्य अंतर क्या है?
  6. 'शप्' प्रत्यय को 'विकरण' क्यों माना जाता है और इसका क्या कार्य है?
  7. 'झोऽन्तः' सूत्र का प्रयोग कहाँ और क्यों किया जाता है?
  8. 'अतो दीर्घो यञि' सूत्र का क्या महत्व है?
  9. क्रियाफल का 'कर्तृगामी' और 'परगामी' होना पद व्यवस्था को कैसे प्रभावित करता है?
  10. 'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' सूत्र का कार्य स्पष्ट करें।

 

भाग 2: उत्तर कुंजी

  1. उत्तर: सूत्र 'सुप्तिङन्तं पदम्' के अनुसार, सुबन्त (शब्द रूप) और तिङन्त (धातु रूप) की पद संज्ञा होती है। जब किसी धातु में तिङ् प्रत्यय जुड़ जाते हैं, तभी उसे व्याकरण की दृष्टि से 'पद' माना जाता है।
  2. उत्तर: उपदेश का अर्थ 'आद्योच्चारण' है, जिसका तात्पर्य आचार्य पाणिनि द्वारा मूलतः पढ़े गए धातु, प्रत्यय आदि के मूल स्वरूप से है। उदाहरण के लिए, 'मिद्' धातु की उपदेशावस्था 'ञिमिदा' है।
  3. उत्तर: 'हलन्त्यम्' सूत्र उपदेश के अंतिम व्यंजन की इत्संज्ञा करता है, किन्तु 'न विभक्तौ तुस्माः' इसे रोकता है। यह नियम कहता है कि यदि विभक्ति प्रत्ययों (जैसे तिङ् या सुप्) के अंत में त-वर्ग, सकार या मकार हो, तो उनकी इत्संज्ञा नहीं होगी।
  4. उत्तर: 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' उपदेशावस्था में अनुनासिक स्वरों की इत्संज्ञा करता है, जबकि 'हलन्त्यम्' अंतिम व्यंजन (हल्) की इत्संज्ञा करता है। इत्संज्ञा के बाद 'तस्य लोपः' से उस वर्ण का लोप हो जाता है।
  5. उत्तर: आत्मनेपद (अपने लिए) का प्रयोग तब होता है जब क्रिया का फल स्वयं कर्ता को प्राप्त हो (जैसे 'यज्ञमहं करिष्ये'), जबकि परस्मैपद (दूसरे के लिए) का प्रयोग तब होता है जब क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर किसी अन्य को मिले।
  6. उत्तर: 'शप्' प्रत्यय धातु और तिङ् प्रत्यय के बीच में आता है, इसलिए इसे विकरण कहा जाता है। 'कर्तरि शप्' सूत्र से कर्ता अर्थ में सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर धातु से शप् होता है, जिसमें '' शेष बचता है।
  7. उत्तर: यह सूत्र प्रत्यय के अवयव '' के स्थान पर 'अन्त्' आदेश करता है। उदाहरण के लिए, 'भव + झि' की स्थिति में '' को 'अन्त्' होकर 'भवन्ति' रूप सिद्ध होता है।
  8. उत्तर: यह सूत्र अदन्त अंग (जिसके अंत में '' हो) को दीर्घ करता है, यदि उसके बाद 'यञ्' प्रत्याहार से शुरू होने वाला सार्वधातुक प्रत्यय हो। इसी नियम से 'भव+मि' परिवर्तित होकर 'भवामि' बनता है।
  9. उत्तर: यदि क्रिया का फल कर्ता को मिले (कर्तृगामी), तो 'स्वरितञितः...' सूत्र से आत्मनेपद होता है। यदि फल परगामी (किसी और को मिले) हो, तो परस्मैपद का विधान किया जाता है।
  10. उत्तर: यह एक संज्ञा सूत्र है जो धातु के अधिकार में कहे गए 'तिङ्' प्रत्ययों और जिनमें 'श्' की इत्संज्ञा हुई हो (शित्), उनकी 'सार्वधातुक' संज्ञा करता है। इसी संज्ञा के आधार पर आगे शप् आदि कार्य होते हैं।

 

भाग 3: निबंधात्मक प्रश्न (अभ्यास हेतु)

निर्देश: निम्नलिखित विषयों पर विस्तृत लेख लिखें (उत्तर अपेक्षित नहीं हैं)।

  1. पाणिनीय व्याकरण में 'इत्संज्ञा' की प्रक्रिया और इसके विभिन्न सूत्रों का सोदाहरण विवेचन कीजिए।
  2. 'भू' धातु के लट् लकार (वर्तमान काल) के रूपों की सिद्धि प्रक्रिया को सूत्रों के साथ विस्तार से समझाइये।
  3. आत्मनेपद और परस्मैपद व्यवस्था के नियमों का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए। इसमें 'अनुदात्तङित' और 'स्वरितञित' सूत्रों की भूमिका स्पष्ट करें।
  4. 'उपदेश' और 'अनुबन्ध लोप' की अवधारणा को समझाते हुए स्पष्ट करें कि ये शुद्ध धातु और प्रत्यय निर्माण में कैसे सहायक हैं।
  5. तिङ् प्रत्ययों के विभाजन (पुरुष और वचन) की व्यवस्था और मध्यम तथा उत्तम पुरुष के प्रयोग के विशेष नियमों (युष्मद्-अस्मद् उपपद) की व्याख्या करें।

 

भाग 4: पारिभाषिक शब्दावली (Glossary)

शब्द

परिभाषा

उपदेश

आचार्य पाणिनि, कात्यायन या पतंजलि द्वारा किया गया मूल व्याकरणिक उच्चारण।

इत्संज्ञा

वह संज्ञा जिसके होने पर 'तस्य लोपः' सूत्र से उस वर्ण का लोप (अदर्शन) हो जाता है।

अनुबन्ध लोप

इत्संज्ञा और उसके बाद वर्ण के लोप की संयुक्त प्रक्रिया।

सार्वधातुक

तिङ् प्रत्ययों और 'शित्' (जिनमें '' की इत्संज्ञा हो) प्रत्ययों को दी गई संज्ञा।

विकरण

धातु और प्रत्यय के बीच में जुड़ने वाला तत्व, जैसे 'शप्'

अङ्ग

वह प्रकृति (धातु या शब्द) जिसके बाद कोई प्रत्यय लगाया गया हो।

प्रत्याहार

वर्णों के समूह को संक्षिप्त रूप में कहने की विधि (जैसे 'यञ्' या 'तिङ्')

आत्मनेपद

क्रिया का वह रूप जहाँ फल कर्ता को प्राप्त होता है; इसमें ', आताम्, ' आदि प्रत्यय लगते हैं।

परस्मैपद

क्रिया का वह रूप जहाँ फल दूसरों को मिलता है; इसमें 'तिप्, तस्, झि' आदि प्रत्यय लगते हैं।

विधिसूत्र

वे सूत्र जो कोई विधान या कार्य (जैसे लोप, गुण, दीर्घ) करते हैं।

निषेध सूत्र

वे सूत्र जो किसी विधि या नियम के लागू होने को रोकते हैं (जैसे 'न विभक्तौ तुस्माः')

तिङ्

धातुओं के अंत में लगने वाले 18 प्रत्यय जो पुरुष और वचन का बोध कराते हैं।

इदित् / ऊदित्

वे धातु जिनमें क्रमशः '' या '' की इत्संज्ञा हुई हो।

समानाधिकरण

जब दो शब्द एक ही अर्थ या कारक को प्रकट करते हों।

 


'भवतः' (भू धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, द्विवचन) रूप की सिद्धि की प्रक्रिया :

१. धातु संज्ञा एवं लकार विधान:

  • 'भू सत्तायाम्' धातु की 'भूवादयो धातवः' सूत्र से धातु संज्ञा होती है।
  • वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' (सूत्र ३७६) से 'भू' धातु से परे 'लट्' लकार आता है।
  • 'लट्' के '' और 'ट्' का अनुबन्ध लोप होने पर 'ल्' शेष रहता है (भू + ल्)।

२. तिङ् प्रत्यय विधान:

  • कर्तृवाच्य में, प्रथम पुरुष द्विवचन की विवक्षा में 'तिप्तस्झि...' (सूत्र ३७७) सूत्र द्वारा 'ल्' के स्थान पर 'तस्' प्रत्यय प्राप्त होता है।
  • 'तिङस्त्रीणि त्रीणि...' (सूत्र ३८३) और 'तान्येकवचन...' (सूत्र ३८४) सूत्रों से इसकी क्रमशः 'प्रथम पुरुष' और 'द्विवचन' संज्ञा होती है।
  • स्थिति: भू + तस्

३. सार्वधातुक संज्ञा एवं शप् विकरण:

  • 'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' (सूत्र ३८८) से 'तस्' प्रत्यय की सार्वधातुक संज्ञा होती है।
  • 'कर्तरि शप्' (सूत्र ३८९) सूत्र से कर्ता अर्थ वाले सार्वधातुक प्रत्यय ('तस्') के परे रहते धातु और प्रत्यय के बीच 'शप्' विकरण आता है।
  • 'शप्' के '' (लशक्वतद्धिते से) और 'प्' (हलन्त्यम् से) की इत् संज्ञा होकर 'तस्य लोपः' से लोप हो जाता है और केवल '' शेष बचता है।
  • स्थिति: भू + अ + तस्

४. गुण एवं अवादेश कार्य:

  • शप् (अ) के सार्वधातुक होने के कारण 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' (सूत्र ३९०) सूत्र द्वारा इगन्त अङ्ग 'भू' के '' को गुण '' आदेश होता है।
  • पुनः 'एचोऽयवायावः' (प्रक्रियानुसार) से '' के स्थान पर 'अव्' आदेश होता है।
  • स्थिति: भ् + अव् + अ + तस् = भवतस्

५. सकार का रुत्व-विसर्ग (पद सिद्धि):

  • 'न विभक्तौ तुस्माः' (सूत्र २) के अनुसार 'तस्' के अन्तिम 'स्' की इत् संज्ञा नहीं होती क्योंकि यह विभक्ति (तिङ्) का अंग है।
  • अन्तिम 'स्' का रुत्व और विसर्ग होने पर 'भवतः' रूप सिद्ध होता है।

संक्षेप में प्रक्रिया: भू + लट् भू + तस् भू + शप् + तस् भू + अ + तस् भो + अ + तस् भव् + अ + तस् भवतस् भवतः

'भवन्ति' (भू धातु, लट् लकार, प्रथम पुरुष, बहुवचन) रूप की सिद्धि

१. धातु संज्ञा एवं लकार विधान:

  • 'भू सत्तायाम्' धातु की 'भूवादयो धातवः' सूत्र से धातु संज्ञा होती है।
  • वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' (सूत्र ३७६) से 'भू' धातु से परे 'लट्' लकार आता है।
  • 'लट्' के '' और 'ट्' का अनुबन्ध लोप (इत् संज्ञा) होने पर केवल 'ल्' शेष रहता है। स्थिति: भू + ल्

२. तिङ् प्रत्यय विधान:

  • प्रथम पुरुष बहुवचन की विवक्षा में 'तिप्तस्झि...' (सूत्र ३७७) सूत्र द्वारा 'ल्' के स्थान पर 'झि' प्रत्यय प्राप्त होता है।
  • इस प्रत्यय की 'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' (सूत्र ३८८) से सार्वधातुक संज्ञा होती है।

३. शप् विकरण का आगम:

  • 'कर्तरि शप्' (सूत्र ३८९) सूत्र से धातु (भू) और प्रत्यय (झि) के बीच 'शप्' विकरण आता है।
  • 'शप्' के '' और '' का अनुबन्ध लोप होने पर '' शेष बचता है। स्थिति: भू + अ + झि

४. झकार को अन्त् आदेश:

  • सूत्र 'झोऽन्तः' (सूत्र ३९१) के अनुसार प्रत्यय के अवयव 'झ्' के स्थान पर 'अन्त्' आदेश होता है।
  • 'झि' के '' के साथ मिलकर यह 'अन्ति' हो जाता है। स्थिति: भू + अ + अन्ति

५. गुण एवं अवादेश कार्य:

  • शप् (अ) के परे रहते 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' (सूत्र ३९०) सूत्र द्वारा इगन्त अङ्ग 'भू' के '' को गुण '' आदेश होता है।
  • पुनः अवादेश प्रक्रिया (एचोऽयवायावः) द्वारा '' के स्थान पर 'अव्' आदेश होता है।
  • स्थिति: भ् + अव् + अ + अन्ति = भव + अन्ति

६. पररूप सन्धि एवं रूप सिद्धि:

  • 'अतो गुणे' सूत्र के अनुसार, 'भव' के अपदान्त '' और 'अन्ति' के '' के स्थान पर पररूप एकादेश (दोनों '' मिलकर एक '' हो जाते हैं) होता है।
  • इस प्रकार वर्ण सम्मेलन होने पर 'भवन्ति' रूप सिद्ध होता है।

संक्षेप में प्रक्रिया: भू + लट् भू + झि भू + शप् + झि भू + + अन्ति भो + + अन्ति भव् + + अन्ति भव + अन्ति भवन्ति

'भवसि' और 'भवथः' (भू धातु, लट् लकार, मध्यम पुरुष) की सिद्धि प्रक्रिया

समान प्रारंभिक प्रक्रिया (दोनों रूपों के लिए)

१. धातु संज्ञा एवं लकार: 'भू सत्तायाम्' धातु की 'भूवादयो धातवः' से धातु संज्ञा होती है। वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' (सूत्र ३७६) से 'लट्' लकार आता है। २. अनुबन्ध लोप: 'लट्' में '' और '' की इत् संज्ञा और लोप होने पर केवल 'ल्' शेष रहता है। ३. पुरुष निर्धारण: सूत्र 'युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः' (सूत्र ३८५) के अनुसार, जब 'युष्मद्' (तुम) शब्द उपपद के रूप में हो, तब मध्यम पुरुष का विधान किया जाता है।

 

१. 'भवसि' की सिद्धि (मध्यम पुरुष, एकवचन)

  • प्रत्यय विधान: मध्यम पुरुष एकवचन की विवक्षा में 'तिप्तस्झि...' (सूत्र ३७७) सूत्र द्वारा 'ल्' के स्थान पर 'सिप्' प्रत्यय आता है।
  • अनुबन्ध लोप: 'सिप्' के 'प्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत् संज्ञा और लोप होने पर 'सि' शेष रहता है।
  • विकरण (शप्): 'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' (सूत्र ३८८) से 'सि' की सार्वधातुक संज्ञा होती है और 'कर्तरि शप्' (सूत्र ३८९) से धातु और प्रत्यय के बीच 'शप्' (अ) आता है।
  • गुण एवं अवादेश: 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' (सूत्र ३९०) से 'भू' के '' को गुण '' और फिर अवादेश होकर 'भव्' बन जाता है।
  • सम्मेलन: भव् + अ + सि को जोड़ने पर 'भवसि' रूप सिद्ध होता है।

२. 'भवथः' की सिद्धि (मध्यम पुरुष, द्विवचन)

  • प्रत्यय विधान: मध्यम पुरुष द्विवचन की विवक्षा में 'ल्' के स्थान पर 'थस्' प्रत्यय आता है।
  • विकरण एवं गुण कार्य: 'सि' की तरह ही यहाँ भी 'शप्' का आगम, 'भू' को गुण और अवादेश प्रक्रिया होती है, जिससे 'भव' अङ्ग तैयार होता है (भव + थस्)।
  • सकार का रुत्व-विसर्ग: 'थस्' एक विभक्ति प्रत्यय है, इसलिए 'न विभक्तौ तुस्माः' (सूत्र २) के कारण इसके अंतिम 'स्' की इत् संज्ञा नहीं होती।
  • अंतिम सकार को रुत्व और विसर्ग होने पर 'भवथः' रूप सिद्ध होता है।

संक्षेप में प्रक्रिया:

  • भवसि: भू + लट् भू + सिप् भू + + सि भो + + सि भव् + + सि = भवसि

भवथः: भू + लट् भू + थस् भू + + थस् भो + + थस् भव् + + थस् भवतस् भवथः


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