अमरकोश का परिचय

 अमरकोश (मूल नाम: *नामलिंगानुशासन*) अमरकोश संस्कृत का सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध पद्यबद्ध शब्दकोश (थिसॉरस) है। इसकी रचना अमरसिंह ने लगभग चौथीछठी शताब्दी ईस्वी के बीच की थी। यह ग्रंथ मुख्य रूप से पर्यायवाची शब्दों, उनके लिंग तथा वर्गीकरण का व्यवस्थित निरूपण करता है। इसमें लगभग 1500 श्लोकों के माध्यम से लगभग 10,000 शब्दों का संकलन किया गया है। यह भाषा को अर्थपूर्ण और विस्तृत बनाने का कार्य करता है, जैसे पिता परिवार को समृद्ध करता है। यह काव्य, दर्शन और शास्त्रों में शब्दों की गहराई समझने में सहायक है।

प्रमुख विशेषताएँ

1. नामलिंगानुशासन (नाम + लिंग + अनुशासन):

यह केवल शब्दों के पर्याय ही नहीं देता, बल्कि प्रत्येक शब्द का लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग) भी स्पष्ट करता है, जो संस्कृत व्याकरण की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

2. पद्य-शैली (स्मरण में सरल):

यह ग्रंथ अनुष्टुप छंद में रचित है, जिससे इसे कंठस्थ करना आसान होता है। वर्तमान शिक्षा-पद्धति में इसे विद्यार्थियों को स्मरण कराया जाता है।

3. विषय-आधारित (वैज्ञानिक) वर्गीकरण:

अन्य कोशों की भाँति वर्णानुक्रम के स्थान पर इसमें शब्दों को विषयानुसार वर्गीकृत किया गया हैजैसे देवता, पृथ्वी, मनुष्य, वनस्पति आदि।

आचार, जीवन मूल्य, साहित्यिक कृतियां और कला शास्त्र में आचार ग्रंथ (नित्याचार) में नैतिक शब्दावली अमरकोश से आती है। साहित्य (महाभाष्य, भर्तृहरि) में पाणिनि नियम अनिवार्य हैं। कला शास्त्र (नाट्यशास्त्र) में संवाद-रचना अष्टाध्यायी पर आधारित है।

वैज्ञानिक क्षेत्रों (कृषि, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व, खगोल, गणित, ज्योतिष) में ये ग्रंथ संस्कृत-आधारित शास्त्रों को सुलभ बनाते हैं:

कृषि विज्ञान: वृक्षायुर्वेद में पौधों के नाम अमरकोश से, व्याकरण से विधियां।

भूगोल: महाभारत के भू-वर्णन में अष्टाध्यायी की संरचना।

इतिहास/पुरातत्व: पुराणों के वंशावलियां अमरकोश के शब्दों से।

खगोल/गणित: आर्यभट्टीय में सूत्र-शैली पाणिनि से प्रेरित है; ज्योतिष (बृहत्संहिता) में ग्रह-नाम अमरकोश से लिया गया है।

ये तथ्य प्राचीन टीकाओं (पतंजलि महाभाष्य, क्षीरस्वामिन टीका) से सिद्ध हैं, जो इन ग्रंथों को वेदों का 'अंग' मानते हैं।

4. व्यापकता और सर्वस्वीकार्यता:

यह वैदिक और लौकिक दोनों संस्कृत के लिए उपयोगी है तथा हिंदू, बौद्ध और जैन परंपराओं में समान रूप से प्रमाणिक माना गया है।

5. अव्यय और नानार्थ शब्द:

पर्यायवाची शब्दों के अतिरिक्त इसमें अव्यय तथा नानार्थ (अनेकार्थी) शब्दों के पृथक् वर्ग भी दिए गए हैं।

6. समृद्ध टीकाएँ:

अमरकोश पर 40 से अधिक टीकाएँ लिखी गई हैं, जिनमें क्षीरस्वामी और रामाश्रमी की टीकाएँ विशेष प्रसिद्ध मानी जाती हैं।

 संरचना (त्रिकांड)

अमरकोश तीन कांडों (खंडों) में विभाजित है

1. स्वर्गादिखंड (प्रथम): देवता, स्वर्ग, काल, दिशा, आकाश, शब्द, नाट्य, पातालभोगी, नरक ,जल से संबंधित शब्द।

2. भुवर्गादिखंड (द्वितीय): पृथ्वी, नगर, मनुष्य, पशु तथा भूमि के भेद।

3. सामान्यादिखंड (तृतीय): विशेषण, सामान्य शब्द, नानार्थ एवं व्याकरणिक अव्यय।

इस प्रकार यह ग्रंथ केवल शब्द-संग्रह नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा के अध्ययन के लिए एक सुव्यवस्थित, प्रामाणिक और स्मरणीय ज्ञान-कोश है।
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संस्कृतभाषी ब्लॉग एक आधुनिक डिजिटल गुरुकुल






















Sanskritbhashi एक अत्यंत व्यापक और सुव्यवस्थित डिजिटल प्लेटफॉर्म है, जो संस्कृत भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए समर्पित है। यह ऑनलाइन पोर्टल विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को व्याकरण, दर्शन, महाकाव्य और कर्मकांड जैसे विविध विषयों पर प्रमाणिक पाठ्य सामग्री और ई-पुस्तकें उपलब्ध कराता है। इस मंच की विशिष्टता इसके बहुआयामी संसाधनों में है, जहाँ ऑडियो ट्यूटोरियल, वीडियो व्याख्यान और आधुनिक संस्कृत गीतों का अनूठा संग्रह मिलता है। यहाँ प्राचीन ग्रंथों की व्याख्या के साथ-साथ समकालीन कहानियाँ और विद्वानों का परिचय भी प्रस्तुत किया गया है, जो परंपरा और आधुनिकता का संगम है। सरल नेविगेशन और विषयानुसार श्रेणियों के माध्यम से यह ब्लॉग घर बैठे संस्कृत सीखने और शोध करने के लिए एक विश्वसनीय सेतु का कार्य करता है। संक्षेप में, यह एक ऐसी विस्तृत पाठशाला है जो संस्कृत के प्रचार-प्रसार को तकनीक के माध्यम से सुलभ बनाती है।



संस्कृतभाषी ब्लॉग पर विशेष प्रस्तुति

संस्कृतभाषी ब्लॉग पर लघुसिद्धान्तकौमुदी को आधुनिक डिजिटल रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे विद्यार्थी को कक्षा जैसी अनुभूति प्राप्त हो। वहाँ निम्न सुविधाएँ उपलब्ध हैं—

1. मूल पाठ

  • शुद्ध पाठ (सूत्र सहित)

2. वृत्ति का सरल अर्थ

  • प्रत्येक सूत्र की व्याख्या स्पष्ट एवं छात्रोपयोगी शैली में

3. रूपसिद्धि

  • सूत्रों के प्रयोग से शब्द-निर्माण की क्रमबद्ध प्रक्रिया
  • उदाहरण सहित व्यावहारिक समझ

4. मानक उच्चारण हेतु ऑडियो

  • सूत्रों एवं वृत्ति का शुद्ध उच्चारण सुनने की सुविधा
  • छात्रों के लिए उच्चारण-दोष निवारण में सहायक

5. ब्लैकबोर्ड शिक्षण शैली के वीडियो

  • प्रत्येक सूत्र को ब्लैकबोर्ड पर लिखकर, क्रमबद्ध रूपसिद्धि के साथ समझाया गया है
  • ऐसा अनुभव होता है मानो विद्यार्थी कक्षा में बैठकर अध्ययन कर रहा हो

6. अभ्यास एवं मूल्यांकन

  • प्रत्येक पाठ के पश्चात् अभ्यास-प्रश्न
  • स्व-मूल्यांकन हेतु प्रश्नावली
  • प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से उपयोगी प्रश्न

संस्कृतभाषी ब्लॉग पर इसकी डिजिटल, ऑडियो-वीडियो युक्त और अभ्यास-सम्पन्न प्रस्तुति आधुनिक तकनीक और पारम्परिक विद्या का सुंदर समन्वय है। यह प्रयास विद्यार्थियों को स्वाध्याय, उच्चारण-शुद्धि और परीक्षा-तैयारी — तीनों में समान रूप से समर्थ बनाता है।

लघुसिद्धान्तकौमुदी के वीडियो ट्यूटोरियल का विस्तृत विवरण और लिंक आपको 'संस्कृतभाषी' ब्लॉग पर प्राप्त होंगे,। इस ग्रन्थ के अध्ययन के लिए मुख्य पृष्ठ का लिंक यह है: https://sanskritbhasi.blogspot.com/2020/12/blog-post_1.html

नीचे दिए गए वीडियो का विवरण और विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:

  • विषय विस्तार: ये ट्यूटोरियल वीडियो संज्ञा प्रकरण से लेकर हलन्तपुल्लिंग प्रकरण, समास और कृदन्त के कुछ महत्वपूर्ण भागों तक उपलब्ध हैं।
  • शिक्षण शैली (Blackboard Style): इन वीडियो की मुख्य विशेषता इनकी 'ब्लैकबोर्ड शिक्षण शैली' है। इसमें प्रत्येक सूत्र को ब्लैकबोर्ड पर लिखकर, उसकी क्रमबद्ध रूपसिद्धि (शब्द-निर्माण की प्रक्रिया) के साथ विस्तार से समझाया गया है।
  • अनुभव: यह वीडियो माध्यम विद्यार्थियों को श्रव्य-दृश्य सहायता प्रदान करता है, जिससे उन्हें ऐसा अनुभव होता है मानो वे साक्षात् कक्षा में बैठकर अध्ययन कर रहे हों,
  • वैज्ञानिक व्याख्या: सूत्रों के अर्थ और उनकी शब्दसिद्धि की वैज्ञानिक व्याख्या पर विशेष बल दिया गया है ताकि विद्यार्थी केवल रटने के बजाय व्याकरण की अंतर्ध्वनि को समझ सकें।
  • निर्माता: इन वीडियो ट्यूटोरियल्स का निर्माण जगदानन्द झा द्वारा किया गया है।

ब्लॉग पर प्रत्येक प्रकरण (जैसे संज्ञा, सन्धि, कारक, समास आदि) के लिए अलग-अलग लिंक भी दिए गए हैं, जहाँ उनसे संबंधित वीडियो और पाठ्य सामग्री प्राप्त की जा सकती है,


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संस्कृत प्रतिभा खोज : सेवा की यात्रा

 संस्कृत-सेवायाः यात्रा

 

संस्कृतं, प्रतिभा, भाषा,

जीवनस्यैव दर्शनम्।

संस्काराणां सरित् पुण्या

युगे–युगे प्रवहन्ती सा॥

 

चिराकालात् समायाता

सेवायाः प्रथमः क्षणः।

मञ्चे बालस्वरैर्जातं

शास्त्रप्रेम्णः शुभं धनम्॥

 

नेत्रयोः दीप्तिरानन्दः

कण्ठेषु वेदनिःस्वनः।

अद्यापि देववाणी सा

बालचित्ते विराजते॥

 

निर्णायकत्वरूपेण

दृष्टा परम्परा चिरा।

श्लोकैः कण्ठगतैर्बालैः

दीप्ता संस्कृतदीपिका॥

 

जनपदात् मण्डलान्तं च

राज्यस्तरपर्यन्तकम्।

शिक्षकः, संयोजकश्च

नानारूपेण सेवितम्॥

 

पञ्जीकरण-मंचयोजना

प्रश्नपत्रं समयक्रमः।

 विगतो मे श्रमः शान्तः

अग्रे छात्रजयध्वनिः॥

 

दूरदेशात् समायाता

बालाः साशङ्कमानसाः।

एकवाक्येन शान्तास्ते

सेवा सैव मम प्रिया॥

 

गीतैः भाषणवादैश्च

गुञ्जितं संस्थानाङ्गणम्।

अद्यापि देववाणी सा

नवनिर्माणहेतुकम्॥

 

यदा सम्मानिता बालाः

हर्षेण पूरिताननाः।

तदा ज्ञातं मया सत्यं

सेवायामेव जीवनम्॥

 

नायं केवलमायोजनम्

एषा साधनसंस्कृतिः।

संस्कृतेन समालम्ब्य

विस्तीर्णो मम जीवनः॥

 

यदि अस्यां ज्ञानसरित्यां

मम बिन्दुरपि स्थितः।

तर्हि जीवनसाफल्यम्

इत्येव मम निश्चयः॥


लेखकः - जगदानन्द झा, लखनऊ

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अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता : स्मृति, साधना और ज्ञान-परम्परा का उत्सव

 कल्पना कीजिए एक ऐसी चुनौती की, जो मनुष्य की स्मरण-शक्ति, अनुशासन और ज्ञान की सीमाओं को परखती हो।

एक ऐसी परीक्षा, जिसमें किताब सामने रखकर पढ़ना नहीं, बल्कि ग्रंथ को अपने भीतर जीना पड़ता हो।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता ठीक इसी प्रकार की एक असाधारण बौद्धिक साधना है।

यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस प्राचीन धारा का उत्सव है, जिसमें ज्ञान को केवल संग्रह नहीं, संस्कार माना गया है।

 अष्टाध्यायी : संस्कृत व्याकरण का महाग्रंथ

पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सबसे प्रामाणिक और सुव्यवस्थित ग्रंथ है।

लगभग चार हज़ार सूत्रों से युक्त यह रचना सदियों से भारतीय बौद्धिक परम्परा की रीढ़ रही है।

प्रश्न स्वाभाविक है

क्या इतने विशाल ग्रंथ को कोई हूबहू, क्रमबद्ध और शुद्ध उच्चारण के साथ कंठस्थ कर सकता है?

इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का मंच है यह प्रतियोगिता।

 

 प्रतियोगिता का उद्देश्य : केवल परीक्षा नहीं, परम्परा का संवर्धन

इस प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में छिपे हुए असाधारण प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें सम्मान देना है।

यह समझना आवश्यक है कि यह केवल अंकों की दौड़ नहीं है। यह उस कंठस्थ पाठ परम्परा का उत्सव है,

जिसमें ज्ञान को पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया जाता है।

 

 मूल्यांकन प्रणाली : 100 अंकों का सुविचारित ढाँचा

प्रतियोगिता का संपूर्ण मूल्यांकन 100 अंकों के पैमाने पर किया जाता है।

इन अंकों का विभाजन अत्यंत अर्थपूर्ण है

* 70 अंक कंठस्थ पाठ (स्मृति की शुद्धता और क्रम)

* 20 अंक उच्चारण की शुद्धता, स्पष्टता और पाठ की गति

* 10 अंक ग्रंथ से संबंधित सामान्य ज्ञान

यह विभाजन स्पष्ट करता है कि इस प्रतियोगिता का केंद्र बिंदु स्मरण-शक्ति है, किन्तु उसके साथ उच्चारण और बौद्धिक समझ भी उतनी ही आवश्यक है।

 

 चयन प्रक्रिया : तीन चरणों की कठिन परीक्षा

प्रतिभागियों की परीक्षा तीन चरणों में होती है,

जो उनके ज्ञान को विभिन्न कोणों से परखती है।

पहला चरण

निर्णायक किसी एक सूत्र का उच्चारण करते हैं और प्रतिभागी को वहीं से आगे पाठ सुनाना होता है।

दूसरा चरण

प्रसिद्ध और सबसे कठिन मानी जाने वाली शलाका परीक्षा।

तीसरा चरण

ग्रंथ पर आधारित प्रश्न-उत्तर का संक्षिप्त दौर।

 शलाका परीक्षा : ज्ञान की अग्नि-परीक्षा

शलाका परीक्षा प्राचीन गुरुकुलीय परम्परा से जुड़ी हुई विधि है।

इसमें प्रतिभागी से ग्रंथ का कोई भी पृष्ठ खोलने को कहा जाता है।

निर्णायक किसी भी स्थान पर उंगली या शलाका रखते हैं और वहीं से पाठ प्रारंभ करना होता है।

यहाँ अनुमान या स्मृति-भ्रम की कोई गुंजाइश नहीं होती। यह परीक्षा वास्तव में प्रतिभागी के सम्पूर्ण कंठस्थ ज्ञान की कसौटी है।

 निर्णायक मंडल की भूमिका

पूरी प्रतियोगिता का मूल्यांकन दो विषय-विशेषज्ञ न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जाता है।

प्रतिभागी का परीक्षण कितनी देर चलेगा, यह पहले से निर्धारित नहीं होता। यह पूरी तरह निर्णायकों के विवेक और प्रतिभागी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।

तीसरे चरण में

ग्रंथ से संबंधित पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं,

जिनके लिए कुल 10 अंक निर्धारित हैं।

 

 सफलता का मार्ग : तीन स्तंभ

इस प्रतियोगिता में सफलता

तीन मूल स्तंभों पर टिकी होती है

1. अष्टाध्यायी का अक्षरशः कंठस्थ होना

2. शुद्ध, स्पष्ट और संतुलित उच्चारण

3. ग्रंथ और उसके संदर्भों की गहरी समझ

इसके अतिरिक्त,

मुख्य राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुँचने से पहले प्रतिभागियों को एक ऑनलाइन क्वालिफाइंग परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी होती है।

 अंत में एक विचार

इस प्रतियोगिता के लिए आवश्यक अथक परिश्रम, स्मरण-साधना और अनुशासन हमें एक मूल प्रश्न पर सोचने के लिए विवश करता है

क्या ज्ञान केवल जानकारी है? या वह ऐसा तत्व है, जो हमारे चिंतन, स्मृति और अस्तित्व का एक अविभाज्य अंग बन जाना चाहिए?

अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता इसी प्रश्न का जीवंत उत्तर है।

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संस्कृत प्रतिभा खोज की अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता

 अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता

 स्मृति, साधना और भारतीय ज्ञान-परम्परा का जीवंत उत्सव

भारतीय ज्ञान-परम्परा में स्मरण (कंठस्थ पाठ) को केवल अध्ययन का माध्यम नहीं, बल्कि बौद्धिक और आध्यात्मिक साधना माना गया है।

इसी परम्परा को जीवित रखने और आगे बढ़ाने का कार्य उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता के माध्यम से किया जा रहा है।

यह प्रतियोगिता स्मृति, अनुशासन और शास्त्रीय ज्ञान की एक असाधारण परीक्षा है,

जो प्रतिभागियों की बौद्धिक क्षमता की सीमाओं को चुनौती देती है।

अष्टाध्यायी : संस्कृत व्याकरण की आधारशिला

पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत व्याकरण का सर्वाधिक प्रामाणिक और सुव्यवस्थित ग्रंथ है।

लगभग चार हज़ार सूत्रों से युक्त यह ग्रंथ केवल नियमों का संकलन नहीं,

बल्कि भाषा-विज्ञान की एक अद्भुत बौद्धिक संरचना है।

इसी ग्रंथ को अक्षरशः, क्रमबद्ध और शुद्ध उच्चारण के साथ कंठस्थ करना इस प्रतियोगिता की मूल चुनौती है।

 प्रतियोगिता का उद्देश्य

इस प्रतियोगिता का उद्देश्य केवल परीक्षा आयोजित करना नहीं है,

बल्कि

* पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में छिपी प्रतिभाओं को पहचानना

* कंठस्थ पाठ की प्राचीन परम्परा को सुदृढ़ करना

* स्मरण, उच्चारण और बौद्धिक समझ का संतुलित विकास करना

यह मंच उन साधकों के लिए है

जो ज्ञान को केवल पढ़ते नहीं,

बल्कि उसे अपने चिंतन और व्यक्तित्व का हिस्सा बनाते हैं।

 मूल्यांकन प्रणाली (Scoring System)

प्रतियोगिता का मूल्यांकन 100 अंकों के स्पष्ट और सुविचारित ढाँचे पर आधारित है

* 70 अंक कंठस्थ पाठ (स्मरण की शुद्धता और निरंतरता)

* 20 अंक उच्चारण की स्पष्टता, शुद्धता और पाठ की गति

* 10 अंक ग्रंथ से संबंधित सामान्य ज्ञान

यह संरचना यह दर्शाती है कि

स्मरण-शक्ति इस प्रतियोगिता का केंद्र है, किन्तु उसके साथ उच्चारण और वैचारिक समझ भी अनिवार्य है।

 चयन प्रक्रिया : तीन चरणों में परीक्षा

प्रतियोगिता की चयन प्रक्रिया

तीन क्रमिक चरणों में संपन्न होती है

 1. सूत्र-प्रारम्भ चरण

निर्णायक किसी एक सूत्र का उच्चारण करते हैं और प्रतिभागी को वहीं से आगे पाठ सुनाना होता है।

 2. शलाका परीक्षा

यह प्रतियोगिता का सबसे कठिन और निर्णायक चरण माना जाता है।

ग्रंथ का कोई भी पृष्ठ खोलकर किसी भी स्थान से पाठ प्रारम्भ कराया जाता है।

यह चरण प्रतिभागी के सम्पूर्ण कंठस्थ ज्ञान की वास्तविक परीक्षा है।

 3. प्रश्न-उत्तर चरण

ग्रंथ पर आधारित पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं, जिनके लिए कुल 10 अंक निर्धारित हैं।

 निर्णायक मंडल की भूमिका

पूरी प्रतियोगिता का मूल्यांकन दो विषय-विशेषज्ञ न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जाता है।

* परीक्षा की अवधि पूर्व-निर्धारित नहीं होती

* समय का निर्धारण प्रतिभागी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है

* निर्णय पूरी तरह विषयगत विशेषज्ञता और निष्पक्ष मूल्यांकन पर आधारित होता है

मुख्य प्रतियोगिता तक पहुँचने की प्रक्रिया

राज्य-स्तरीय मुख्य प्रतियोगिता में भाग लेने से पहले प्रतिभागियों को एक ऑनलाइन क्वालिफाइंग परीक्षा उत्तीर्ण करनी होती है। इसी प्रारंभिक चरण के माध्यम से योग्य प्रतिभागियों का चयन किया जाता है।

 सफलता के मूल आधार

इस प्रतियोगिता में सफलता तीन मूल स्तंभों पर आधारित है

1. अष्टाध्यायी का पूर्ण और क्रमबद्ध कंठस्थ पाठ

2. शुद्ध, स्पष्ट और संतुलित उच्चारण

3. ग्रंथ और उसके संदर्भों की गहरी समझ

 निष्कर्ष : ज्ञान की सही परिभाषा

अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता हमें एक गहरे प्रश्न पर विचार करने के लिए प्रेरित करती है

क्या ज्ञान केवल सूचना है, या वह ऐसा तत्व है जो स्मृति, साधना और अस्तित्व में रच-बस जाए?

यह प्रतियोगिता भारतीय ज्ञान-परम्परा के इसी जीवंत उत्तर का प्रतिनिधित्व करती है। 

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