धातु-परिचय: कृदन्त एवं तिङन्त क्रियापद व्यवस्था

१. धातु एवं क्रियापद का मौलिक वर्गीकरण

संस्कृत वाङ्मय में वाक्य का प्राण क्रिया को माना गया है। महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार "क्रियाप्रधानम् आख्यातम्" अर्थात् वाक्य में मुख्य अर्थ क्रिया का ही होता है। पाणिनीय व्याकरण में क्रिया के मूल स्रोत को 'धातु' कहा जाता है, जिससे तिङ् और कृत् प्रत्ययों के योग से विभिन्न प्रकार के क्रियापदों का निर्माण होता है।

१.१ धातु का स्वरूप: क्रियावाचक प्रातिपदिक (भूवादयो धातवः - अष्टाध्यायी १.३.१)

पाणिनीय अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के तृतीय पाद का पहला सूत्र धातु संज्ञा का निर्धारण करता है:

• सूत्र: भूवादयो धातवः (अष्टाध्यायी - १.३.१)
अर्थ: 'भू' आदि शब्द (जो पाणिनीय धातुपाठ में पठित हैं) यदि वे 'क्रिया' (action/doing/being) को प्रकट करते हैं, तो उनकी धातु संज्ञा होती.है।

क) क्रियावाचकता ही मुख्य लक्षण है

केवल धातुपाठ में लिखे होने से ही कोई शब्द धातु नहीं बनता, बल्कि उसका क्रियावाचक होना अनिवार्य है। उदाहरण के लिए, धातुपाठ में 'भू' (होना), 'पठ्' (पढ़ना), 'गम्' (जाना) आदि क्रिया के वाचक हैं। यदि 'भू' शब्द पृथ्वी (संज्ञा) के अर्थ में प्रयुक्त हो, तो उसकी धातु संज्ञा नहीं होगी, बल्कि प्रातिपदिक संज्ञा होगी। अतः 'क्रियावाचित्वं धातुत्वम्' - क्रिया को बताने वाले स्वभाव को ही धातु कहते हैं।

ख) धातुपाठ की व्यवस्था

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत की लगभग २००० धातुओं को १० गणों (जैसे भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि आदि) में विभाजित किया है। इन मूल धातुओं को व्याकरण की भाषा में 'उपदेश' कहा जाता है। मूल रूप में ये क्रियापद नहीं होते, बल्कि क्रिया के अमूर्त भाव (Root concepts) होते हैं। इनमें जब तक प्रत्यय नहीं जुड़ते, तब तक इनका वाक्य में प्रयोग नहीं किया जा सकता ("नापदं प्रयुञ्जीत" - बिना पद बनाए शब्द का प्रयोग न करें)।

१.२ तिङन्त क्रियापद: लकरार्थ में तिङ् प्रत्यय का अनुप्रयोग और उनकी सीमाएँ

जब इन मूल धातुओं से काल (Time) और मनोभाव (Mood) को दर्शाने के लिए १० लकारों के स्थान पर प्रत्यय लगाए जाते हैं, तो उन्हें तिङन्त क्रियापद कहते हैं।

• सूत्र: तिङ्शित्सार्वधातुकम् (अष्टाध्यायी - ३.४.११३) तथा लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (अष्टाध्यायी - ३.४.६९)
  • अनुप्रयोग: व्याकरण में मूल १८ तिङ् प्रत्यय (तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस् — त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महि) निश्चित किए गए हैं। ये १८ प्रत्यय तीनों पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) और तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में बँटे हैं।
  • उदाहरण: पठ् + तिप् = पठति (वह पढ़ता है)। यहाँ 'पठति' एक पूर्ण, स्वतंत्र आख्यात या तिङन्त क्रियापद है।

तिङ् प्रत्ययों की सीमाएँ (Limitations of Tiṅ Affixes)

यद्यपि तिङन्त क्रियापद वाक्य को पूर्ण करने के मुख्य साधन हैं, तथापि भाषा की अभिव्यक्ति में इनकी कुछ सीमाएँ हैं। इन सीमाओं के कारण ही पाणिनि को 'कृत् प्रत्ययों' की व्यवस्था करनी पड़ी:

  • १. लिंग भेद का अभाव (Gender Insensitivity): तिङ् प्रत्ययों की सबसे बड़ी सीमा यह है कि ये त्रिलिंगात्मक नहीं होते। 'पठति' का प्रयोग बालक के लिए भी होगा (बालकः पठति), बालिका के लिए भी (बालिका पठति) और मित्र के लिए भी (मित्रं पठति)। तिङ् रूप देखकर कर्ता के लिंग का पता नहीं लगाया जा सकता।
  • २. एक वाक्य में एक ही मुख्य तिङ् क्रिया की बाध्यता: नियम के अनुसार एक साधारण वाक्य में एक ही तिङ् (मुख्य क्रिया) हो सकती है। यदि कर्ता एक ही समय में एक साथ कई क्रियाएँ कर रहा है (जैसे: वह जाकर, खाकर, हँसकर सोता है), तो 'जाकर', 'खाकर', 'हँसकर' जैसी सहायक क्रियाओं को व्यक्त करने में तिङ् प्रत्यय पूरी तरह असमर्थ हैं।
  • ३. विशेषण बनने में असमर्थता (Inability to act as Participles): तिङ् प्रत्ययान्त पद कभी भी किसी संज्ञा का विशेषण नहीं बन सकते। यदि हमें कहना हो "पढ़ते हुए बालक को देखो", तो हम तिङ् रूप 'पठति' का प्रयोग नहीं कर सकते। वहाँ क्रिया को विशेषण बनाने की सीमा आ जाती है।
  • ४. कारक और वचनों के बंधनों की जटिलता: तिङ् प्रत्यय पुरुष और वचन से कड़े बंधे होते हैं। यदि कर्ता बहुवचन है, तो क्रिया को अनिवार्य रूप से बहुवचन (पठन्ति) होना पड़ेगा। भाषा को सरल और संक्षिप्त बनाने के लिए जहाँ कर्ता के वचन बदलने पर भी क्रिया अपरिवर्तित रहे (जैसे अव्यय रूप), वहाँ तिङ् काम नहीं आते।

निष्कर्ष (धातु परिचय के दृष्टिकोण से)

धातु से क्रियापद बनाने की यात्रा में तिङ् प्रत्यय जहाँ वाक्य को काल और पुरुष का ढांचा देते हैं, वहीं अपनी उपर्युक्त सीमाओं (लिंगहीनता, एक-वाक्य-एक-तिङ् नियम) के कारण सीमित हैं। इसी बिंदु पर कृत् प्रत्यय (जैसे क्त्वा, णमुल्, शतृ, क्तवतु) तिङ् प्रत्ययों के पूरक और सुदृढ़ विकल्प बनकर सामने आते हैं, जो धातुओं को अव्यय, विशेषण और नए स्वतंत्र क्रियापदों में बदल देते हैं।

१.३ कृदन्त क्रियापद की भूमिका: तिङ् के अतिरिक्त वाक्य पूर्ण करने, विशेषण बनने और अव्यय क्रियापद के रूप में कृत् प्रत्ययों की महत्ता

संस्कृत व्याकरण में धातुओं से पद बनाने के दो ही मार्ग हैं—तिङ् और कृत्। जैसा कि आचार्य पाणिनि ने सूत्र दिया है:

• सूत्र: कृदतिङ् (अष्टाध्यायी - ३.१.९३)
अर्थ: धातुओं से विहित वे प्रत्यय जो 'तिङ्' (१८ आख्यात प्रत्ययों) से भिन्न हैं, वे कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।

तिङ् प्रत्ययों की अपनी कुछ सीमाएँ हैं (जैसे लिंग का बोध न कराना, एक वाक्य में एक ही तिङ् का होना आदि)। इन सीमाओं को लांघकर भाषा को अधिक लचीला, संक्षिप्त और अभिव्यंजक बनाने में कृदन्त क्रियापदों की भूमिका अत्यंत क्रांतिकारी है। धातु परिचय के दृष्टिकोण से इसकी महत्ता को तीन मुख्य रूपों में समझा जा सकता है:

क) स्वतंत्र रूप से वाक्य पूर्ण करने की भूमिका (तिङ् के सुदृढ़ विकल्प)

लौकिक संस्कृत में यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि वाक्य को केवल 'तिङ्' (लकार) से ही पूर्ण किया जा सकता है। कृत् प्रत्ययों में कुछ प्रत्यय ऐसे हैं जो बिना किसी लकार के, अकेले ही वाक्य की मुख्य क्रिया बनकर वाक्य को पूर्ण अर्थ प्रदान करते हैं।

  • भूतकाल में (क्तवतु प्रत्यय): लङ् (अनद्यतन भूत) या लुङ् लकार के जटिल रूपों (जैसे अगात्, अपात्) के स्थान पर महर्षि पाणिनि ने 'क्तक्तवतू निष्ठा' (अष्टाध्यायी - १.१.२६) सूत्र से निष्ठा संज्ञक प्रत्ययों का विधान किया। 'क्तवतु' प्रत्ययान्त पद वाक्य को पूर्ण क्रियापद का बल देते हैं।
    उदाहरण: सः विद्यालयं गतवान् (वह विद्यालय गया)। यहाँ गतवान् (गम् + क्तवतु) मुख्य क्रियापद है, जो बिना तिङ् प्रत्यय के वाक्य को पूर्ण कर रहा है।
  • चाहिए या योग्यता के अर्थ में (कृत्य प्रत्यय): विधिलिङ् लकार के विकल्प के रूप में तव्यत्, अनीयर् और यत् प्रत्यय (कृत्य प्रत्यय) स्वतंत्र क्रियापद की भूमिका निभाते हैं।
    उदाहरण: मया ग्रन्थः पठनीयः (मुझे ग्रन्थ पढ़ना चाहिए)। यहाँ पठनीयः (पठ् + अनीयर्) मुख्य क्रियापद है।

ख) विशेषण रूपी क्रियापद बनने की भूमिका (Participles)

तिङ् प्रत्ययान्त रूप कभी विशेषण नहीं बन सकते, किन्तु कृत् प्रत्यय धातुओं को 'विशेषण-क्रियापद' में बदल देते हैं। जब कोई कर्ता मुख्य क्रिया को करते हुए साथ में कोई दूसरी क्रिया भी लगातार कर रहा हो, तब शतृ (परस्मैपद) और शानच् (आत्मनेपद) प्रत्यय उस कर्ता के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इनके रूप कर्ता के लिंग, विभक्ति और वचन के अनुसार बदलते हैं।

  • उदाहरण १: गच्छन् बालकः पतति (जाता हुआ बालक गिरता है)। यहाँ गच्छन् (गम् + शतृ) बालक की गतिमान अवस्था को दिखाने वाला क्रियापरक विशेषण है।
  • उदाहरण २: शयानं शिशुं पश्य (सोए हुए बच्चे को देखो)। यहाँ शयानम् (शीङ् + शानच्) शिशु का विशेषण क्रियापद है।

ग) अव्यय क्रियापद के रूप में महत्ता (Linguistic Flexibility)

संस्कृत का एक कड़ा नियम है कि एक साधारण वाक्य में एक ही मुख्य तिङ् क्रिया हो सकती है। यदि एक ही कर्ता कई क्रियाएँ एक के बाद एक कर रहा है, तो पाणिनि ने क्त्वा, ल्यप्, और तुमुन् जैसे कृत् प्रत्ययों का विधान किया है। 'कृन्मेजन्तः' (अष्टाध्यायी - १.१.३९) तथा 'क्त्वातोसुन्कसुनः' (अष्टाध्यायी - १.१.४०) सूत्रों से ये कृदन्त पद अव्यय बन जाते हैं।

  • अपरिवर्तनीय रूप: अव्यय होने के कारण इनके रूप कर्ता के बदलने पर भी नहीं बदलते (जैसे: बालकः पठित्वा गच्छति, बालिकाः पठित्वा गच्छन्ति)। इसमें 'पठित्वा' का रूप स्थिर रहता है।
  • वाक्य का विस्तार: ये प्रत्यय वाक्य में उप-वाक्यों (Subordinate clauses) को जोड़कर भाषा को संक्षिप्त करते हैं। यदि कृत् प्रत्यय न होते, तो "वह खाकर, पीकर, पढ़कर सोता है" के लिए हमें चार अलग-अलग तिङ् वाक्यों की आवश्यकता पड़ती। कृत् प्रत्ययों की सहायता से यह सः खादित्वा, पीत्वा, पठित्वा च स्वपिति जैसी सरल संरचना में समाहित हो जाता है।

धातु-परिचय के लिए कृदन्त का निष्कर्ष तालिका

कृत् प्रत्यय वर्ग मुख्य प्रत्यय धातु पर प्रभाव वाक्य में भूमिका
अव्यय कृदन्त क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, णमुल् रूप स्थिर हो जाता है पूर्वकालिक और निमित्तवाचक सहायक क्रियाएँ
विशेषण कृदन्त शतृ, शानच् रूप तीनों लिंगों में चलता है कर्ता की वर्तमान निरंतरता (सातत्य) दर्शाना
तिङन्त-विकल्प क्तवतु, तव्यत्, अनीयर् मुख्य क्रियापद का बल काल (भूत) और मनोभाव (चाहिए) में स्वतंत्र वाक्य पूर्ति

इस प्रकार, कृत् प्रत्ययों का निरूपण धातुओं की उस बहुआयामी शक्ति को प्रकट करता है, जिसके बिना संस्कृत भाषा की वाक्य-रचना अत्यंत दुरूह और सीमित हो जाती।

२. क्रिया की आवृत्ति, पौनःपुन्य और सातत्य (Repetitive Actions)

संस्कृत भाषा में जब कोई कर्ता किसी क्रिया को बार-बार दोहराता है, या उसमें निरंतरता (Continuity) और अत्यंत गहरा जुड़ाव होता है, तो महर्षि पाणिनि ने आख्यात (तिङ्) के अतिरिक्त कृदन्त प्रत्ययों के माध्यम से इसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति की व्यवस्था की है। इस प्रक्रिया को व्याकरण में 'आभीक्ष्ण्य' (पौनःपुन्य या बार-बार होना) कहा जाता है।

२.१ 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' (अष्टाध्यायी ३.४.२२)

• सूत्र: आभीक्ष्ण्ये णमुल् च (अष्टाध्यायी - ३.४.२२)
पदच्छेद: आभीक्ष्ण्ये (सप्तम्यन्त), णमुल् (प्रथमान्त), च (अव्यय)।
अनुवृत्ति: इस सूत्र में पूर्व सूत्र से 'समानकर्तृकयोः पूर्वकाले' (अष्टाध्यायी - ३.४.२१) की अनुवृत्ति आती है।

सूत्र का अर्थ और व्याख्या: 'अभीक्ष्ण' का भाव ही 'आभीक्ष्ण्य' कहलाता है, जिसका अर्थ है—किसी क्रिया का बार-बार होना (Repetition/Frequency)। यह सूत्र विधान करता है कि जब दो क्रियाओं का कर्ता एक ही हो (समानकर्तृक) और उनमें से एक क्रिया बार-बार घटित हो रही हो, तो उस आवृत्ति वाचक धातु से णमुल् प्रत्यय होता है।

सूत्र में प्रयुक्त 'च' पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 'च' समुच्चयार्थक है, जो पूर्व सूत्र से क्त्वा प्रत्यय को भी यहाँ खींच लाता है। अर्थात्, क्रिया की बार-बार आवृत्ति दिखाने के लिए धातु से णमुल् और क्त्वा दोनों प्रत्ययों का विकल्प से प्रयोग किया जा सकता है।

२.२ क्त्वा प्रत्ययान्त द्वित्व रूप

जब 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' सूत्र से 'च' के बल पर क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, तो क्रिया की आवृत्ति दर्शाने के लिए उस पद को दो बार बोला या लिखा जाता है।

  • प्रत्यय स्वरूप: धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय जुड़ने पर 'क्' की इत्संज्ञा होकर लोप होता है और 'त्वा' शेष बचता है।
  • अव्यय संज्ञा: 'क्त्वातोसुन्कसुनः' (अष्टाध्यायी - १.१.४०) सूत्र से क्त्वा प्रत्ययान्त शब्दों की अव्यय संज्ञा होती है, जिससे इनके रूप तीनों लिंगों और वचनों में समान रहते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं उदाहरण

  1. पीत्वा पीत्वा: पा (पाने/पीना) + क्त्वा
  2. हसित्वा हसित्वा: हस् (हँसने/हँसना) + क्त्वा (यहाँ 'इट्' का आगम होता है)
  3. खादित्वा खादित्वा: खाद् (भक्षणे/खाना) + क्त्वा

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १: वह पानी पी-पीकर खाता है।
    संस्कृत: सः जलं पीत्वा पीत्वा खादति। (यहाँ पानी पीने की क्रिया बार-बार हो रही है)
  • उदाहरण २: वह हँस-हँस कर लोटपोट हो रहा है।
    संस्कृत: सः हसित्वा हसित्वा विलुठति।

२.३ णमुल् प्रत्ययान्त द्वित्व रूप

जब आवृत्ति के अर्थ में मुख्य रूप से णमुल् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, तब भी पद का द्वित्व होता है।

  • प्रत्यय स्वरूप: णमुल् प्रत्यय में 'ण्' (चुटू सूत्र से) और 'ल्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'अम्' शेष बचता है।
  • विशेष कार्य (वृद्धि): 'अचो ञ्णिति' (अष्टाध्यायी - ७.२.११५) सूत्र से धातु के अंतिम अच् (स्वर) को या उपधा-अकार को वृद्धि (जैसे: आ, ऐ, औ) हो जाती है।
  • अव्यय संज्ञा: 'कृन्मेजन्तः' (अष्टाध्यायी - १.१.३९) के नियम से णमुल् प्रत्ययान्त पद भी अव्यय बन जाते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं उदाहरण

  1. पायं पायं: पा + णमुल् → पा + अम् (आकारान्त होने से 'युक्' का आगम होकर) = पायं पायं
  2. हासं हासं: हस् + णमुल् → ह् (अ को वृद्धि 'आ') स् + अम् = हासम् → हासं हासं
  3. खादं खादं: खाद् + णमुल् → खाद् + अम् = खादम् → खादं खादं

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १: वह पानी पी-पीकर खाता है।
    संस्कृत: सः जलं पायं पायं खादति।
  • उदाहरण २: वह हँस-हँस कर लोटपोट हो रहा है।
    संस्कृत: सः हासं हासं विलुठति।

२.४ 'सर्वस्य द्वे' (अष्टाध्यायी ८.१.१) नियम: पदों के द्वित्व होने की पाणिनीय प्रक्रिया

आपके मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' सूत्र केवल प्रत्यय लगाता है, लेकिन इन शब्दों को दो बार (पीत्वा पीत्वा / पायं पायं) लिखने का आदेश कौन सा सूत्र देता है? यहाँ पाणिनीय प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है:

• सूत्र: सर्वस्य द्वे (अष्टाध्यायी - ८.१.१)
सम्बद्ध सूत्र: नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
  • द्वित्व की शास्त्रीय प्रक्रिया: अष्टाध्यायी के आठवें अध्याय का प्रथम सूत्र है 'सर्वस्य द्वे' जो अधिकार सूत्र है। इसके साथ जब 'नित्यवीप्सयोः' या आभीक्ष्ण्य (बार-बार होना) का प्रसंग आता है, तो यह नियम संपूर्ण पद को द्वित्व (double) करने का निर्देश देता है।
  • चूँकि 'पीत्वा' या 'पायं' शब्द से आवृत्ति (पौनःपुन्य) का अर्थ स्वतः तब तक पूरी तरह संप्रेषित नहीं होता जब तक उसे दोहराया न जाए, अतः 'सर्वस्य द्वे' नियम के सामर्थ्य से भाषा में 'पीत्वा पीत्वा' और 'पायं पायं' जैसे प्रामाणिक रूप सिद्ध होते हैं।

धातु परिचय हेतु सारांश तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय सिद्ध पद (द्वित्व के बाद) वाक्यात्मक अर्थ
पा (पाने) क्त्वा / णमुल् पीत्वा पीत्वा / पायं पायं पी-पीकर (लगातार/बार-बार)
हस् (हसने) क्त्वा / णमुल् हसित्वा हसित्वा / हासं हासं हँस-हँस कर (आवृत्ति के साथ)
खाद् (भक्षणे) क्त्वा / णमुल् खादित्वा खादित्वा / खादं खादं खा-खाकर (अत्यंत चाव से बार-बार)

३. पूर्वकालिक एवं उद्देश्यवाचक क्रियापद (Sequential & Purpose-Driven Actions)

३.१ पूर्वकालिक अव्यय (क्त्वा और ल्यप्)

संस्कृत वाक्य-संरचना में जब एक ही कर्ता (समान कर्ता) एक के बाद एक कई क्रियाएँ करता है, तो मुख्य क्रिया (Principal action) से पहले समाप्त होने वाली क्रियाओं को पूर्वकालिक क्रिया (Sequential/Prior Action) कहा जाता है। पाणिनि व्याकरण में इसके लिए क्त्वा और ल्यप् प्रत्ययों का विधान किया गया है, जो धातुओं को अव्यय क्रियापद में बदल देते हैं

क) मूल नियम और पाणिनीय सूत्र

• सूत्र: समानकर्तृकयोः पूर्वकाले (अष्टाध्यायी - ३.४.२१)
पदच्छेद: समानकर्तृकयोः (षष्ठ्यन्त/सप्तम्यन्त द्विवचन), पूर्वकाले (सप्तम्यन्त एकवचन)।
सूत्रार्थ: जहाँ दो या दो से अधिक क्रियाओं का आश्रय (कर्ता) एक ही हो, वहाँ बाद में होने वाली क्रिया (मुख्य क्रिया) की अपेक्षा पूर्वकाल (पहले के समय) में समाप्त होने वाली क्रिया वाचक धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है।

अव्यय संज्ञा सूत्र: क्त्वातोसुन्कसुनः (अष्टाध्यायी - १.१.४०) – इस सूत्र से क्त्वा प्रत्ययान्त शब्दों की अव्यय संज्ञा होती है। इनके रूप लिंग, विभक्ति या वचन के कारण कभी नहीं बदलते।

ख) उपसर्ग-रहित धातुओं में 'क्त्वा' का अनुप्रयोग

जब धातु के पूर्व में कोई उपसर्ग नहीं लगा होता, तब 'समानकर्तृकयोः पूर्वकाले' सूत्र से सीधे क्त्वा प्रत्यय जोड़ा जाता है। प्रत्यय का 'क्' भाग इत्संज्ञक होकर लुप्त हो जाता है और केवल 'त्वा' शेष रहता है।

  • १. इट्-आगम सहित (सेट् धातु): कुछ धातुओं में प्रत्यय जुड़ते समय 'इट्' (इ) का आगम होता है।
    खादित्वा: खाद् (भक्षणे) + क्त्वा → खाद् + इ + त्वा = खादित्वा (खाकर)
    हसित्वा: हस् (हसने) + क्त्वा → हस् + इ + त्वा = हसित्वा (हँसकर)
  • २. इट्-आगम रहित (अनिट् धातु): कुछ धातुओं में सीधे प्रत्यय जुड़ता है और धातु के स्वर या व्यंजन में संधि-कार्य होता है।
    पीत्वा: पा (पाने) + क्त्वा → पी + त्वा = पीत्वा (पीकर) (यहाँ 'घुमास्था...' सूत्र से आ-कार को ई-कार होता है)
    भुक्त्वा: भुज् (पालनाभ्यवहारयोः) + क्त्वा → भुक् + त्वा = भुक्त्वा (खाकर)
    गत्वा: गम् (गतौ) + क्त्वा → ग + त्वा = गत्वा (जाकर) (म-कार का लोप)

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी: वह खा-पीकर सो गया।
  • संस्कृत: सः खादित्वा पीत्वा च सुप्तवान्। (यहाँ खाने और पीने दोनों क्रियाओं का कर्ता 'सः' ही है, और ये दोनों क्रियाएँ सोने से पहले पूर्ण हो चुकी हैं।)

ग) सोपसर्ग धातुओं में 'ल्यप्' का अनुप्रयोग

यदि धातु से पूर्व कोई उपसर्ग (जैसे प्र, वि, उप, अनु आदि) जुड़ा हो, तो पाणिनि नियम के अनुसार 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय का आदेश हो जाता है।

• सूत्र: समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो L्यप् (अष्टाध्यायी - ७.१.३७)
सूत्रार्थ: उपसर्ग सहित धातु का जब समास (कृदन्त समास) होता है, बशर्ते वह नञ् (न/अ) से भिन्न हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश हो जाता है।
  • प्रत्यय स्वरूप: ल्यप् प्रत्यय में 'ल्' (लशक्वतद्धिते सूत्र से) और 'प्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'य' शेष बचता है।
  • अव्यय संज्ञा सूत्र: तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (अष्टाध्यायी - १.१.३८) के साहचर्य और 'मव्ययस्य' नियमों से ल्यप् प्रत्ययान्त पद भी सदा अव्यय ही होते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि

  • विज्ञाय: वि (उपसर्ग) + ज्ञा (जानना) + ल्यप् → वि + ज्ञा + य = विज्ञाय (विशेष रूप से जानकर)
  • उपगम्य: उप (उपसर्ग) + गम् (जाना) + L्यप् → उप + गम् + य = उपगम्य (पास जाकर) (यहाँ 'अनुदात्तोपदेश...' सूत्र से म-कार का लोप होता है)
  • प्रदाय: प्र (उपसर्ग) + दा (देना) + ल्यप् → प्र + दा + य = प्रदाय (देकर)
  • विहस्य: वि (उपसर्ग) + हस् (हँसना) + ल्यप् → वि + हस् + तुक् (त्) + य = विहस्य (विशेष रूप से हँसकर)

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी: वह जल के विषय में जानकर जाता है।
    संस्कृत: सः जलं विज्ञाय गच्छति।
  • हिन्दी: गुरु के पास जाकर शिष्य पढ़ता है।
    संस्कृत: शिष्यः गुरुम् उपगम्य पठति।

धातु परिचय के लिए तुलनात्मक सारांश तालिका

मूल धातु उपसर्ग विहित प्रत्यय निष्पन्न अव्यय पद हिन्दी अर्थ वाक्य में भूमिका
खाद् - क्त्वा खादित्वा खाकर उपसर्ग-रहित पूर्वकालिक क्रिया
पा - क्त्वा पीत्वा पीकर उपसर्ग-रहित पूर्वकालिक क्रिया
ज्ञा वि ल्यप् (क्त्वा स्थाने) विज्ञाय जानकर सोपसर्ग पूर्वकालिक क्रिया
गम् उप ल्यप् (क्त्वा स्थाने) उपगम्य पास जाकर सोपसर्ग पूर्वकालिक क्रिया

३.२ उद्देश्यवाचक क्रियापद (तुमुन् प्रत्यय)

संस्कृत वाक्य-संरचना में जब एक क्रिया किसी दूसरी मुख्य क्रिया के निमित्त, प्रयोजन अथवा उद्देश्य (Purpose) के लिए की जाती है, तो उसे उद्देश्यवाचक क्रिया कहा जाता है। हिन्दी भाषा में इसके लिए "के लिए" (जैसे: खाने के लिए, पढ़ने के लिए, जाने के लिए) चिह्नों का प्रयोग होता है। पाणिनि व्याकरण में इस निमित्तार्थक भाव को व्यक्त करने के लिए तुमुन् प्रत्यय का विधान किया गया है।

क) मूल नियम और पाणिनीय सूत्र

• सूत्र: तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् (अष्टाध्यायी - ३.३.१०)
पदच्छेद: तुमुन्-ण्वुलौ (प्रथमा द्विवचन), क्रियायाम् (सप्तम्यन्त एकवचन), क्रियार्थायाम् (सप्तम्यन्त एकवचन)।
सूत्रार्थ: जब उपपद (समीपवर्ती पद) में ऐसी क्रिया हो जो 'क्रिया के लिए क्रिया' (क्रियार्था क्रिया) हो, अर्थात् जो दूसरी मुख्य क्रिया का उद्देश्य या फल हो, तो उस भविष्यत् काल की अर्थवाची धातु से तुमुन् और ण्वुल् प्रत्यय होते हैं। यहाँ उद्देश्य को प्रकट करने के लिए 'तुमुन्' मुख्य प्रत्यय है।

अव्यय संज्ञा सूत्र: कृन्मेजन्तः (अष्टाध्यायी - १.१.३९) – इस सूत्र के नियमानुसार जिन कृदन्त शब्दों के अंत में 'म्' (मकार) आता है, वे अव्यय कहलाते हैं। चूँकि तुमुन् में 'तुम्' शेष रहता है जिसका अंत मकार से होता है, अतः इसके रूप भी तीनों लिंगों और वचनों में सदा एकसमान (अपरिवर्तनीय) रहते हैं।

ख) प्रत्यय का स्वरूप और संधि-कार्य

तुमुन् प्रत्यय में 'उ' (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से) और 'न्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे केवल 'तुम्' जुड़ता है। धातु की प्रकृति के अनुसार यहाँ निम्नलिखित शास्त्रीय कार्य होते हैं:

  • १. इट्-आगम सहित (सेट् धातु):
    खादितुम्: खाद् (भक्षणे) + तुमुन् → खाद् + इ + तुम् = खादितुम् (खाने के लिए)
    पठितुम्: पठ् (व्यक्तायां वाचि) + तुमुन् → पठ् + इ + तुम् = पठितुम् (पढ़ने के लिए)
    हसितुम्: हस् (हसने) + तुमुन् → हस् + इ + तुम् = हसितुम् (हँसने के लिए)
  • २. गुण-कार्य और अनिट् व्यवस्था:
    गन्तुम्: गम् (गतौ) + तुमुन् → गम् + तुम् = गन्तुम् (जाने के लिए) (यहाँ म-कार को न-कार आदेश होता है)
    पातुम्: पा (पाने) + तुमुन् → पा + तुम् = पातुम् (पीने के लिए)
    शयितुम्: स्वप्/शीङ् धातु के संदर्भ में सोने के लिए शयितुम् पद बनता है।
    भोक्तुम्: भुज् (पालनाभ्यवहारयोः) + तुमुन् → भोक् + तुम् = भोक्तुम् (भोजन करने/खाने के लिए) (यहाँ 'चोः कुः' सूत्र से ज-कार को ग-कार और फिर क-कार होता है)

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

उद्देश्यवाचक कृदन्त पद वाक्य की मुख्य क्रिया (तिङ्) के सहायक के रूप में आते हैं और कर्ता के पुरुष या वचन बदलने पर भी अपने रूप को बदलते नहीं हैं।

  • वाक्य १ (एकवचन कर्ता के साथ):
    हिन्दी: वह खाने के लिए बैठता है।
    संस्कृत: सः खादितुम् (या भोक्तुम्) उपविशति।
  • वाक्य २ (बहुवचन कर्ता के साथ - अव्यय रूप का सातत्य):
    हिन्दी: वे सब पढ़ने के लिए विद्यालय जाते हैं।
    संस्कृत: ते पठितुम् विद्यालयं गच्छन्ति। (यहाँ कर्ता 'ते' बहुवचन है और मुख्य क्रिया 'गच्छन्ति' भी बहुवचन है, किन्तु उद्देश्यवाचक पद 'पठितुम्' अपरिवर्तित रहा।)
  • वाक्य ३ (समानकर्तृक प्रसंग):
    हिन्दी: राम जल पीने के लिए नदी पर गया।
    संस्कृत: रामः जलं पातुम् नदीं गतवान्।

धातु परिचय के लिए सारांश तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय निष्पन्न अव्यय पद हिन्दी अर्थ मुख्य उद्देश्यपरक वाक्य प्रयोग
खाद् तुमुन् खादितुम् खाने के लिए सः खादितुम् इच्छति।
पा तुमुन् पातुम् पीने के लिए सः जलं पातुम् गच्छति।
गम् तुमुन् गन्तुम् जाने के लिए सः गृहं गन्तुम् उद्यतः अस्ति।
पठ् तुमुन् पठितुम् पढ़ने के लिए अहं पठितुम् उपविशामि।

४. वर्तमानकालिक निरंतरता एवं विशेषण क्रियापद (Continuous Actions)

संस्कृत वाक्य-रचना में जब कोई क्रिया वर्तमान काल में जारी हो (Continuous action) और वह मुख्य क्रिया के साथ-साथ चल रही हो, तब महर्षि पाणिनि ने तिङ् प्रत्यय के बिना क्रिया की निरंतरता को व्यक्त करने के लिए शतृ और शानच् प्रत्ययों का विधान किया है।

ये प्रत्यय धातुओं को 'विशेषण-क्रियापद' (Participles) में बदल देते हैं। इसका अर्थ यह है कि ये पद वाक्य में क्रिया का अर्थ तो देते ही हैं, साथ ही कर्ता के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार अपने रूप को भी बदलते हैं।

४.१ शतृ प्रत्यय (परस्मैपद धातुओं के लिए)

परस्मैपद की धातुओं (जैसे पठ्, गम्, खाद्, हस् आदि) से वर्तमान काल में निरंतरता का बोध कराने के लिए शतृ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।

• सूत्र: लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (अष्टाध्यायी - ३.२.१२४)
सूत्रार्थ: लट् लकार (वर्तमान काल) के स्थान पर शतृ और शानच् प्रत्यय होते हैं, बशर्ते वे प्रथमा विभक्ति से भिन्न (अप्रथमा) किसी अन्य विभक्ति वाले शब्द के सामानाधिकरण (विशेषण) के रूप में प्रयुक्त हो रहे हों।
विशेष नोट: सूत्र 'तौ सत्' (अष्टाध्यायी - ३.२.१२७) से इन दोनों प्रत्ययों की 'सत्' संज्ञा होती है।
  • प्रत्यय स्वरूप: शतृ प्रत्यय में 'श्' (लशक्वतद्धिते सूत्र से) और 'ऋ' (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे केवल 'अत्' शेष बचता है, जो पुल्लिंग रूपों में 'न्' (अन्) के रूप में दिखाई देता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि (पुल्लिंग एकवचन)

  • गच्छन्: गम् (गतौ) + शतृ → गच्छत् → गच्छन् (जाता हुआ / जाते हुए)
  • हसन्: हस् (हसने) + शतृ → हसत् → हसन् (हँसता हुआ / हँसते हुए)
  • खादन्: खाद् (भक्षणे) + शतृ → खादत् → खादन् (खाता हुआ / खाते हुए)

ख) क्रिया-विशेषण रूप में द्वित्व (जाते-जाते, हँसते-हँसते)

जब वर्तमानकालिक निरंतरता में अत्यंत तीव्रता या सातत्य दिखाना हो (जैसे "वह जाते-जाते रुक गया"), तो 'सर्वस्य द्वे' (अष्टाध्यायी - ८.१.१) नियम से शतृ प्रत्ययान्त पद को दो बार लिखा जाता है।

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • वाक्य १ (सामान्य निरंतरता):
    हिन्दी: वह जाते-जाते रुक गया।
    संस्कृत: सः गच्छन् गच्छन् रुद्धवान् (या अतिष्ठत्)।
  • वाक्य २ (लिंग और वचन के अनुसार परिवर्तन):
    पुल्लिंग: पठन् बालकः गच्छति (पढ़ता हुआ बालक जाता है)।
    स्त्रीलिंग: पठन्ती बालिका गच्छति (पढ़ती हुई बालिका जाती है - यहाँ 'उगितश्च' सूत्र से ङीप् प्रत्यय होता है)।

४.३ क्रिया-विशेषण रूप में द्वित्व: चलते-चलते या जाते-जाते रुक जाने की संगति

जब वर्तमानकालिक कृदन्त प्रत्यय (शतृ) से युक्त पद वाक्य में किसी क्रिया की अत्यंत तीव्रता, सातत्य अथवा क्रिया के मध्य में ही किसी अन्य घटना के घटित होने को दर्शाते हैं, तो वहाँ क्रिया-विशेषणपरक भाव उत्पन्न होता है। लोकभाषा हिन्दी में इसे 'जाते-जाते', 'चलते-चलते' या 'हँसते-हँसते' के रूप में दुहराया जाता है। संस्कृत व्याकरण में इस प्रकार के प्रयोगों की पाणिनीय संगति अष्टाध्यायी के विशिष्ट नियमों पर आधारित है।

क) द्वित्व विधान संगति और मुख्य सूत्र

शतृ प्रत्ययान्त पद (जैसे गच्छन्, चलन्) जब वाक्य में दोहराए जाते हैं, तो उनके द्वित्व (double) होने की प्रक्रिया निम्नलिखित सूत्रों के सामंजस्य से सिद्ध होती है:

• अधिकार सूत्र: सर्वस्य द्वे (अष्टाध्यायी - ८.१.१)
सम्बद्ध सूत्र: नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी - ८.१.४)

सूत्रार्थ और संगति: 'नित्यवीप्सयोः' सूत्र स्पष्ट करता है कि 'नित्यता' (तदात्वे क्रियाप्रबन्धः - अर्थात् किसी क्रिया का लगातार जारी रहना या बीच में न टूटना) और 'वीप्सा' (व्याप्तुम् इच्छा - प्रत्येक अवयव में क्रिया का संबंध होना) प्रकट करने के लिए पद का द्वित्व होता है।

'चलते-चलते रुक गया' वाक्य में 'चलन् चलन्' पद कर्ता की गति की उस निरंतरता (नित्यता) को दिखाता है जिसके ठीक बीच में 'रुकने' की क्रिया संपन्न हुई। अतः 'सर्वस्य द्वे' के अधिकार से संपूर्ण शतृ-प्रत्ययान्त पद को दो बार कहने का नियम यहाँ पूर्णतः संगति पाता है।

ख) पद की व्याकरणिक स्थिति: विशेषण से क्रिया-विशेषण की ओर

यद्यपि शतृ प्रत्ययान्त पद मूलतः कर्ता के विशेषण होते हैं, किन्तु जब वे वाक्य में किसी मुख्य क्रिया की अवस्था या रीति (Manner of action) को स्पष्ट करते हैं, तब वे क्रिया-विशेषण (Adverbial participle) की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

  • विभक्ति नियम: क्रिया-विशेषण पदों में पाणिनि नियम के अनुसार सामान्यतः प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का प्रयोग संदर्भ के अनुसार स्थिर रहता है, तथा कर्ता के पुरुष या वचन का इस द्वित्व-पद के स्वरूप पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह मुख्य क्रिया की निरंतरता का द्योतक है।

ग) व्यावहारिक उदाहरण एवं वाक्य प्रयोग

  • १. चलते-चलते रुक जाना (गति की नित्यता):
    प्रकृति-प्रत्यय: चल् (चलने) + शतृ = चलत् → चलन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: चलन् चलन्।
    वाक्य प्रयोग: सः मार्गे चलन् चलन् अकस्मात् अतिष्ठत् (या रुद्धवान्)।
    अर्थ: वह मार्ग में चलते-चलते अचानक रुक गया।
  • २. जाते-जाते देखना (मार्ग की निरंतरता):
    प्रकृति-प्रत्यय: गम् (गतौ) + शतृ = गच्छत् → गच्छन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: गच्छन् गच्छन्।
    वाक्य प्रयोग: पथिकः गच्छन् गच्छन् मार्गपार्श्वे वृक्षान् पश्यति।
    अर्थ: राही जाते-जाते रास्ते के किनारे वृक्षों को देखता है।
  • ३. हँसते-हँसते बोलना (अवस्था का सातत्य):
    प्रकृति-प्रत्यय: हस् (हसने) + शतृ = hसत् → हसन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: हसन् हसन्।
    वाक्य प्रयोग: शिशुः हसन् हसन् मधुरं वदति।
    अर्थ: बच्चा हँसते-हँसते मीठा बोलता है।

धातु परिचय हेतु सारांश विवरण

हिन्दी क्रिया-विशेषण रूप प्रयुक्त मूल धातु शतृ प्रत्ययान्त रूप पाणिनीय द्वित्व पद वाक्य में शास्त्रीय संगति
चलते-चलते चल् (गतौ) चलत् चलन् चलन् क्रिया की नित्यता (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
जाते-जाते गम् (गतौ) गच्छत् गच्छन् गच्छन् मार्ग-क्रिया की निरन्तरता (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
हँसते-हँसते हस् (हसने) हसत् हसन् हसन् रीति/अवस्थावाचक सातत्य (अष्टाध्यायी - ८.१.४)

४.२ शानच् प्रत्यय (आत्मनेपद धातुओं के लिए)

आत्मनेपद की धातुओं (जैसे सेव्, लभ्, शीङ्, उप-विश आदि) से वर्तमान काल में निरंतरता या सातत्य का बोध कराने के लिए शानच् प्रत्यय का विधान किया गया है।

• सूत्र: लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (अष्टाध्यायी - ३.२.१२४)
सम्बद्ध सूत्र: आने मुक् (अष्टाध्यायी - ७.२.८२)
  • प्रत्यय स्वरूप: शानच् प्रत्यय में 'श्' (लशक्वतद्धिते से) और 'च्' (हलन्त्यम् से) की इत्संज्ञा होकर लोप होता है। केवल 'आन' शेष बचता है।
  • मुक्-आगम (मान): अकारान्त अङ्ग के बाद 'आन' आने पर सूत्र 'आने मुक्' (अष्टाध्यायी - ७.२.८२) से 'म्' का आगम होता है, जिससे यह 'मान' के रूप में बदल जाता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि (पुल्लिंग एकवचन)

  • शयानः: शीङ् (स्वप्ने/सोना) + शानच् → शे + आन → शयानः (सोता हुआ / सोते हुए)
  • उपविशमानः: उप + विश् (बैठना) + शानच् → उपविश + म् + आन = उपविशमानः (बैठता हुआ / बैठते हुए)
  • मोदमानः: मुद् (हर्षे/प्रसन्न होना) + शानच् → मोद + म् + आन = मोदमानः (प्रसन्न होता हुआ)

ख) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • वाक्य १ (सोते हुए क्रिया का सातत्य):
    हिन्दी: वह सोते हुए (सोता हुआ) खाता है।
    संस्कृत: सः शयानः खादति।
  • वाक्य २ (बैठते हुए देखना):
    हिन्दी: वह बैठते हुए देखता है।
    संस्कृत: सः उपविशमानः पश्यति।

धातु परिचय के लिए वर्तमानकालिक सातत्य तालिका

मूल धातु धातु का पद विहित प्रत्यय निष्पन्न पद (पुल्लिंग) स्त्रीलिंग रूप हिन्दी अर्थ
गम् परस्मैपद शतृ गच्छन् गच्छन्ती جاتا हुआ
हस् परस्मैपद शतृ हसन् हसन्ती हँसता हुआ
शीङ् (सोना) आत्मनेपद शानच् शयानः शयाना सोता हुआ / सोते हुए
उप-विश् आत्मनेपद शानच् उपविशमानः उपविशमाना बैठता हुआ / बैठते हुए

५. भूतकाल एवं विधि (चाहिए) के अर्थ में तिङ् का विकल्प

संस्कृत वाक्य-संरचना में भूतकाल (Past Tense) तथा विधि (चाहिए/Should) के अर्थ को प्रकट करने के लिए क्रमशः लङ् लकार (जैसे: अभवत्, अस्वपत्) तथा विधिलिङ् लकार (जैसे: पठेत्, गच्छेत्) जैसे आख्यात (तिङ्) पदों का विधान है। किन्तु भाषा को सरल, सुबोध और संक्षिप्त बनाने के लिए महर्षि पाणिनि ने कृदन्त प्रत्ययों के अंतर्गत ऐसे सुदृढ़ विकल्प दिए हैं, जो बिना किसी तिङ् प्रत्यय के भी स्वयं वाक्य के मुख्य क्रियापद की भूमिका निभाते हैं।

५.१ भूतकालिक कृदंत (क्तवतु/क्त)

भूतकाल की क्रिया को व्यक्त करने के लिए लङ्, लुङ् या लिट् लकारों के तिङन्त रूपों के स्थान पर क्तवतु (कर्तृवाच्य में) तथा क्त (कर्मवाच्य/भाववाच्य में) प्रत्ययों का स्वतंत्र क्रियापद के रूप में बहुतायत से प्रयोग होता है।

• संज्ञा सूत्र: क्तक्तवतू निष्ठा (अष्टाध्यायी - १.१.२६)
सूत्रार्थ: 'क्त' और 'क्तवतु' इन दोनों प्रत्ययों की व्याकरण में 'निष्ठा' संज्ञा होती है।
काल विधाता सूत्र: भूते (अष्टाध्यायी - ३.२.८४) तथा निष्ठातयोः के साहचर्य से भूतकाल के अर्थ में धातुओं से निष्ठा (क्त, क्तवतु) प्रत्यय होते हैं।

तिङ् के विकल्प के रूप में महत्ता: तिङ् प्रत्ययों में भूतकाल के रूप (जैसे: अगात्, अभूत्) थोड़े जटिल होते हैं, जबकि निष्ठा प्रत्यय लगाकर बने रूप अत्यंत सरल होते हैं। इनके रूप कर्ता या कर्म के लिंग और वचन के अनुसार चलते हैं।

क) क्तवतु प्रत्यय (कर्तृवाच्य - Active Voice)

इसमें 'क्' और 'उ' की इत्संज्ञा होकर लोप होता है, 'वत्' शेष बचता है जो पुल्लिंग प्रथमा एकवचन में 'वान्' हो जाता है।

  • सुप्तवान्: स्वप् (शये/सोना) + क्तवतु → सुप् (सम्प्रसारण होकर) + इ (आगम) + वान् = सुप्तवान् (सो गया)। (यह लङ् लकार के रूप अस्वपत् का सटीक विकल्प है)
  • गतवान्: गम् (गतौ/जाना) + क्तवतु → ग + वान् = गतवान् (चला गया)। (यह लङ् लकार के रूप अगच्छत् का सटीक विकल्प है)

ख) क्त प्रत्यय (कर्मवाच्य/भाववाच्य - Passive/Impersonal Voice)

इसमें 'क्' का लोप होकर केवल 'त' शेष बचता है। अकर्मक धातुओं से यह भाववाच्य में प्रयुक्त होता है।

  • सुप्तम्: स्वप् + क्त = सुप्तम् (सोया गया - भाववाच्य)
  • गतः: गम् + क्तः = तः → गतः (गया - कर्मवाच्य/भाववाच्य)

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १ (क्तवतु - स्वतंत्र मुख्य क्रियापद):
    हिन्दी: वह खा-पीकर सो गया।
    संस्कृत: सः खादित्वा पीत्वा च सुप्तवान्। (यहाँ 'सुप्तवान्' बिना तिङ् के वाक्य पूर्ण कर रहा है)
  • उदाहरण २ (लङ् लकार का विकल्प):
    हिन्दी: वह घर गया।
    संस्कृत: सः गृहं गतवान्। (तिङन्त रूप सः गृहं अगच्छत् के समानार्थक)

५.२ कृत्य प्रत्यय (तव्यत्, अनीयर्, यत्)

'चाहिए' या 'योग्य' (Should/Ought to) के अर्थ में विधिलिङ् लकार के स्थान पर जिन कृत् प्रत्ययों का विधान किया गया है, उन्हें कृत्य प्रत्यय कहा जाता है। ये सदैव कर्मवाच्य या भाववाच्य में ही प्रयुक्त होते हैं।

• सूत्र: तव्यत्तव्यानीयरः (अष्टाध्यायी - ३.१.९६) तथा कृत्याश्च (अष्टाध्यायी - ३.१.९५)
सूत्रार्थ: धातुओं से चाहिए और योग्यता के अर्थ में तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय होते हैं। (यत्, ण्यत्, क्यप् भी कृत्य संज्ञक हैं)।
वाच्य नियम: तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः (अष्टाध्यायी - ३.४.७०) – कृत्य प्रत्यय केवल भाव (Impersonal) और कर्म (Passive) में ही होते हैं, कर्ता में नहीं। अतः इनके प्रयोग में कर्ता हमेशा तृतीया विभक्ति में होता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि

  • तव्यत् प्रत्यय: 'त्' का लोप होकर 'तव्य' शेष रहता है।
    गन्तव्यम्: गम् + तव्यत् = गन्तव्यम् (जाना चाहिए - नपुंसकलिंग प्रथमा एकवचन, भाववाच्य)।
    पठितव्यम्: पठ् + इ + तव्यत् = पठितव्यम् (पढ़ना चाहिए)।
  • अनीयर् प्रत्यय: 'र्' का लोप होकर 'अनीय' शेष रहता है।
    पठनीयम्: पठ् + अनीयर् = पठनीयम् (पढ़ने योग्य / पढ़ना चाहिए)।
    गमनीयम्: गम् + अनीयर् = गमनीयम् (जाने योग्य / जाना चाहिए)।

ख) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १ (भाववाच्य में विधिलिङ् का विकल्प):
    हिन्दी: मुझे जाना चाहिए।
    संस्कृत (कृदन्त): मया गन्तव्यम् (या गमनीयम्)। (तिङन्त रूप अहं गच्छेयम् का विकल्प)।
  • उदाहरण २ (कर्मवाच्य में विधिलिङ् का विकल्प):
    हिन्दी: राम को ग्रन्थ पढ़ना चाहिए।
    संस्कृत (कृदन्त): रामेण ग्रन्थः पठितव्यः (या पठनीयः)। (तिङन्त रूप रामेण ग्रन्थः पठ्येत का सरल विकल्प)।

धातु परिचय के लिए तिङ्-विकल्प सारांश तालिका

मूल धातु विहित कृत् प्रत्यय निष्पन्न कृदन्त रूप वाच्य व्यवस्था वैकल्पिक तिङन्त (लकार) रूप
स्वप् (सोना) क्तवतु सुप्तवान् कर्तृवाच्य अस्वपत् (लङ् लकार)
गम् (जाना) क्तवतु गतवान् कर्तृवाच्य अगच्छत् (लङ् लकार)
गम् (जाना) तव्यत् गन्तव्यम् भाववाच्य गच्छेत् / गम्येत (विधिलिङ्)
पठ् (पढ़ना) अनीयर् पठनीयः / पठनीयम् कर्म / भाव पठेत् / पठ्येत (विधिलिङ्)

६. भाववाचक कृदन्त और क्रियाओं के नाम (Gerunds/Verbal Nouns)

संस्कृत भाषा में जब किसी क्रिया को उसके काल या पुरुष के बंधन से मुक्त करके केवल एक 'गतिविधि', 'भाव' या 'संज्ञा' (Noun) के रूप में व्यक्त करना हो, तो उसे भाववाचक कृदन्त कहते हैं। लोकभाषा में जब हम "खाना", "पीना", "पढ़ना" या "खेलना" शब्दों का प्रयोग किसी वाक्य की मुख्य क्रिया की तरह नहीं, बल्कि एक विषय या गतिविधि के नाम (जैसे: Eating, Drinking) की तरह करते हैं, तब पाणिनि व्याकरण में विशिष्ट भाव-प्रत्ययों का आश्रय लिया जाता है।

६.१ ल्युट् (अनम्) प्रत्यय का विधान

धातुओं से उनके शुद्ध क्रिया-भाव को संज्ञा रूप देने के लिए महर्षि पाणिनि ने मुख्य रूप से ल्युट् प्रत्यय का विधान किया है। इसके द्वारा निष्पन्न शब्द सदा नपुंसकलिंग एकवचन में प्रयुक्त होते हैं।

• सूत्र: नपुंसके भावे क्तः (अष्टाध्यायी - ३.३.११४) तथा ल्युट् च (अष्टाध्यायी - ३.३.११५)
सूत्रार्थ: धातु के अर्थ मात्र को प्रकट करने के लिए (अर्थात क्रिया के भाव को संज्ञा बनाने के लिए) धातु से नपुंसकलिंग में 'क्त' और 'ल्युट्' प्रत्यय होते हैं।
  • प्रत्यय स्वरूप और संधि-कार्य: ल्युट् प्रत्यय में 'ल्' (लशक्वतद्धिते से) और 'ट्' (हलन्त्यम् से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'यु' शेष बचता है। इसके पश्चात् सूत्र 'युवोरनाको' (अष्टाध्यायी - ७.१.१) से 'यु' के स्थान पर 'अन्' (अनम्) आदेश हो जाता है।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि:

  • खादनम्: खाद् (भक्षणे) + ल्युट् → खाद् + अन् + सु (नपुंसकलिंग) = खादनम् (खाना / Eating)
  • पानम्: पा (पाने) + ल्युट् → पा + अन् → पानम् (पीना / Drinking)
  • हसनम्: हस् (हसने) + ल्युट् → हस् + अन् → हसनम् (हँसना / Laughing)
  • कूर्दनम्: कूर्द् (कूर्दने) + ल्युट् → कूर्द् + अन् → कूर्दनम् (कूदना / Jumping)
  • पठनम्: पठ् (व्यक्तायां वाचि) + ल्युट् → पठ् + अन् → पठनम् (पढ़ना / Reading)
  • क्रीडनम्: क्रीड् (विहारे) + ल्युट् → क्रीड् + अन् → क्रीडनम् (खेलना / Playing)

६.२ व्यावहारिक प्रयोग: वाक्यों में गतिविधियों का एक साथ चलना

जब किसी प्रसंग या उत्सव (जैसे पिकनिक, मेला आदि) में कई गतिविधियाँ संज्ञा के रूप में एक साथ चल रही हों, तो इन ल्युट्-प्रत्ययान्त पदों को आपस में 'च' (और) अव्यय से जोड़कर वाक्य की मुख्य क्रिया के साथ संबद्ध किया जाता है।

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी वाक्य: पिकनिक में खाना-पीना, हँसना-कूदना, पढ़ना-खेलना सबकुछ साथ-साथ चल रहा था।
  • संस्कृत अनुवाद: आमोदयात्रायाम् (पिकनिक में) खादनं पानं, हसनं कूर्दनं, पठनं क्रीडनम् च सर्वं सहैव चलति स्म (या अचलत्)।

इस प्रयोग की व्याकरणिक विशेषता:

यहाँ 'खादनम्', 'पानम्' आदि पद किसी काल के अधीन नहीं हैं। ये वाक्य के उद्देश्य (Subject) या गतिविधियों की सूची की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जिनकी मुख्य क्रिया अंत में प्रयुक्त 'चलति स्म' (चल रहा था) है। इस प्रकार ल्युट् प्रत्यय धातुओं को अत्यंत सहजता से संज्ञापदों में रूपांतरित कर देता है।

धातु परिचय के लिए भाववाचक संज्ञा तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय 'युवोरनाको' आदेश निष्पन्न संज्ञा पद व्यावहारिक हिन्दी अर्थ
खाद् ल्युट् अन् खादनम् खाने की क्रिया / खाना
पा ल्युट् अन् पानम् पीने की क्रिया / पीना
हस् ल्युट् अन् हसनम् हँसने की क्रिया / हँसना
कूर्द् ल्युट् अन् कूर्दनम् कूदने की क्रिया / कूदना

७. कृदन्त पदों में समाहार द्वन्द्व समास (Compound Verbal Forms)

७.१ 'चार्थे द्वन्द्वः' (अष्टाध्यायी २.२.२९) एवं समाहार नियम

संस्कृत व्याकरण में जब दो या दो से अधिक कृदन्त पदों (जो प्रत्यय लगकर संज्ञा या अव्यय बन चुके हैं) के अर्थ को एक समूह या समुदाय के रूप में दिखाना हो, तो वहाँ समाहार द्वन्द्व समास होता है।

• सूत्र: चार्थे द्वन्द्वः (अष्टाध्यायी - २.२.२९)
समाहार नियम: जब 'च' के अर्थ में विद्यमान सुबन्त पदों का समूह (समाहार) प्रधान होता है, तो वह समाहार द्वन्द्व कहलाता है।
लिंग और वचन विधान: द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् (अष्टाध्यायी - २.४.२) आदि नियमों तथा स नपुंसकम् (अष्टाध्यायी - २.४.१७) एवं एकवद्भाव नियमों के सामर्थ्य से समाहार द्वन्द्व समास से बना समस्त पद सदा नपुंसकलिंग एकवचन में ही प्रयुक्त होता है।

७.२ व्यावहारिक उदाहरण

जब भूतकालिक कृदन्त या क्रियापरक संज्ञाएँ आपस में मिलकर एक ही संयुक्त क्रिया-व्यापार या अवस्था के समूह को दर्शाती हैं, तो उनके समाहार द्वन्द्व के रूप इस प्रकार बनते हैं:

१. कृताकृतम् (कर करके और न करके / आधा-अधूरा कार्य)

  • लौकिक विग्रह: कृतं च अकृतं च, तयोः समाहारः = कृताकृतम्
  • व्याकरण: कृ (करणे) + क्त = कृतम्। न कृतम् = अकृतम्। दोनों निष्ठा पदों का समाहार द्वन्द्व होकर नपुंसकलिंग एकवचन रूप सिद्ध होता है।
  • वाक्य प्रयोग: सः कार्यं कृताकृतम् कृत्वा गतः। (वह कार्य को करके-अनकरके अर्थात् आधा-अधूरा छोड़कर ही चला गया।)

२. शयितोत्थितम् (सोना और उठना / सोकर उठने की निरंतर क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: शयितं च उत्थितं च, तयोः समाहारः = शयितोत्थितम्
  • व्याकरण: स्वप्/शीङ् धातु से क्त प्रत्यय होकर 'शयितम्' (सोया हुआ) तथा उद् + स्था + क्त से 'उत्थितम्' (उठा हुआ) बनता है।
  • वाक्य प्रयोग: ज्वरकारणात् तस्य शयितोत्थितम् कष्टकरं जातम्। (बुखार के कारण उसका सोना और उठना कष्टप्रद हो गया है।)

७.३ 'आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये' (अष्टाध्यायी २.१.७२)

जब दो तिङन्त क्रियापद (आख्यात) आपस में जुड़कर किसी क्रिया की निरंतरता (क्रियासातत्य) या तात्कालिक अवस्था को प्रकट करते हैं, तो महर्षि पाणिनि ने उनके लिए मयूरव्यंसकादि गण के अंतर्गत एक विशेष समास विधान किया है।

• सूत्र: आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये (अष्टाध्यायी - २.१.७२)
सूत्रार्थ: क्रिया की निरंतरता (सातत्य) अर्थ प्रकट हो रहा हो, तो एक आख्यात (तिङ् क्रियापद) का दूसरे आख्यात के साथ समास होता है, और वह तत्पुरुष (मयूरव्यंसकादि) समास के अंतर्गत अव्यय समस्त पद की तरह व्यवहार करता है।

खादताशिखतम् के स्थान पर प्रामाणिक पाणिनीय उदाहरण:

१. पिबतखादता (पीने और खाने की निरंतर क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: पिबत च खादत च इति सततम् प्रवृत्तिः = पिबतखादता
  • व्याकरण: पा (पीना) धातु का लोट् लकार मध्यम पुरुष बहुवचन रूप 'पिबत' तथा खाद् (खाना) का रूप 'खादत' है। इन दो आख्यातों का क्रिया की निरंतरता में समास होकर महाभाष्यकार के अनुसार 'पिबतखादता' (अव्ययवद् रूप) बनता है।
  • वाक्य प्रयोग: उत्सवे पिबतखादता प्रावर्तत। (उत्सव में लगातार पीना और खाना चलता रहा।)

२. उत्पचविपचा (लगातार पकाने की क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: उत्पच च विपच च इति सततम् प्रवृत्तिः = उत्पचविपचा
  • व्याकरण: उद् + पच् (लोट् मध्यम पुरुष एकवचन 'उत्पच') तथा वि + पच् ('विपच') का क्रियासातत्य अर्थ में समास होता है।
  • वाक्य प्रयोग: यज्ञशालायाम् उत्पचविपचा अभवत्। (यज्ञशाला में लगातार भोजन पकाने की क्रिया चलती रही।)

३. छिन्धिभिन्दी (काटने और तोड़ने की तीव्र क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: छिन्धि च भिन्धि च इति सततम् प्रवृत्तिः = छिन्धिभिन्दी
  • व्याकरण: छिद् (काटना) धातु का लोट् मध्यम पुरुष एकवचन 'छिन्धि' तथा भिद् (तोड़ना) का 'भिन्धि' रूप है।
  • वाक्य प्रयोग: युद्धक्षेत्रे छिन्धिभिन्दी अभवत्। (युद्धक्षेत्र में लगातार काटने और तोड़ने की मारामारी चलती रही।)

धातु परिचय हेतु समाहार एवं आख्यात-समास तालिका

समस्त पद समास का प्रकार विग्रह स्वरूप प्रकट होने वाला क्रिया-भाव
कृताकृतम् समाहार द्वन्द्व कृतं च अकृतं च किसी कार्य की दुविधा या अधूरी अवस्था
शयितोत्थितम् समाहार द्वन्द्व शयितं च उत्थितं च सोने और जागने का दैनिक चक्र
पिबतखादता आख्यात-समास पिबत च खादत च खान-पान की अनवरत गतिविधि
छिन्धिभिन्दी आख्यात-समास छिन्धि च भिन्धि च काटने-तोड़ने की आक्रामक निरंतरता

८. धातु-परिचय के अनिवार्य पूरक तत्व

८.१ १० गण व्यवस्था: भ्वादि से चुरादि तक धातुओं का विभाजन

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत भाषा की लगभग २००० मूल धातुओं को उनकी प्रकृति, विकरण (प्रत्यय और धातु के बीच आने वाला तत्व) तथा रूपात्मक समानताओं के आधार पर १० मुख्य गणों में विभाजित किया है। प्रत्येक धातु के परिचय में उसके गण का उल्लेख करना परम आवश्यक है:

  • १. भ्वादिगण (भू आदि): यह सबसे बड़ा गण है। इसमें 'भू' (होना) पहली धातु है। इसमें सूत्र 'कर्तरि शप्' (अष्टाध्यायी - ३.१.६८) से 'शप्' (अ) विकरण लगता है। (जैसे: पठति, भवति)।
  • २. अदादिगण (अद् आदि): इसमें 'अद्' (खाना) पहली धातु है। सूत्र 'अदिप्रभृतिभ्यः शपः' (अष्टाध्यायी - २.४.७२) से यहाँ विकरण 'शप्' का लुक (लोप) हो जाता है। (जैसे: अत्ति, वक्ति)।
  • ३. जुहोत्यादिगण (हु आदि): इसमें 'हु' (दान और हवन) पहली धातु है। सूत्र 'जुहोत्यादिभ्यः श्लुः' (अष्टाध्यायी - २.४.७५) से यहाँ विकरण का 'श्लु' (लोप होकर धातु को द्वित्व) हो जाता है। (जैसे: जुहोति, ददाति)।
  • ४. दिवादिगण (दिव् आदि): इसमें 'दिव्' (क्रीड़ा/चमकना) पहली धातु है। सूत्र 'दिवादिभ्यः श्यन्' (अष्टाध्यायी - ३.१.६९) से यहाँ 'श्यन्' (य) विकरण लगता है। (जैसे: दीव्यति, नृत्यति)।
  • ५. स्वादिगण (सु आदि): इसमें 'सु' (अभिषव/रस निकालना) पहली धातु है। सूत्र 'स्स्वादिभ्यः श्नुः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७३) से यहाँ 'श्नु' (नु) विकरण जुड़ता है। (जैसे: सुनोति, आप्नोति)।
  • ६. तुदादिगण (तुद् आदि): इसमें 'तुद्' (व्यथा देना) पहली धातु है। इसमें सूत्र 'तुदादिभ्यः शः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७७) से 'श' (अ) विकरण लगता है, किन्तु इसमें धातु के स्वर को गुण-कार्य नहीं होता। (जैसे: तुदति, लिखति)।
  • ७. रुधादिगण (रुध् आदि): इसमें 'रुधँ' (आवरण/रोकना) पहली धातु है। सूत्र 'रुधादिभ्यः श्नम्' (अष्टाध्यायी - ३.१.७८) से यहाँ धातु के भीतर उपधा में 'श्नम्' (न) का आगम होता है। (जैसे: रुणद्धि, भिनत्ति)।
  • ८. तनादिगण (तन् आदि): इसमें 'तनुँ' (विस्तार करना) पहली धातु है। सूत्र 'तनादिकृञ्भ्यः उः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७९) से यहाँ 'उ' विकरण लगता है। (जैसे: तनोति, करोति)।
  • ९. क्र्यादिगण (क्री आदि): इसमें 'क्रीञ्' (द्रव्य विनिमय/खरीदना) पहली धातु है। सूत्र 'क्र्यादिभ्यः श्ना' (अष्टाध्यायी - ३.१.८१) से यहाँ 'श्ना' (ना) विकरण जुड़ता है। (जैसे: क्रीणाति, जानाति)।
  • १०. चुरादिगण (चुर् आदि): इसमें 'चुरँ' (चोरी करना) पहली धातु है। सूत्र 'सत्यापपाश...चुरादिभ्यो णिच्' (अष्टाध्यायी - ३.१.२५) से यहाँ स्वार्थ में 'णिच' (इ) प्रत्यय लगता है, जिसके बाद शप् होता है। (जैसे: चोरयति, कथयति)।
  • ८.२ पद-व्यवस्था: परस्मैपद, आत्मनेपद और उभयपद का निर्धारण

    धातुओं से तिङ् प्रत्यय जोड़ते समय वे १८ प्रत्ययों में से किस वर्ग में जाएँगी, इसका निर्धारण पाणिनीय पद-व्यवस्था से होता है। प्रत्येक धातु के सामने उसका पद लिखना अनिवार्य होता है:

    • परस्मैपद (Parasmaipada): जिन धातुओं के रूप 'तिप्, तस्, झि...' प्रत्यय लगकर बनते हैं, वे परस्मैपद कहलाती हैं। इसका मूल नियम है—'शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्' (अष्टाध्यायी - १.३.७८), अर्थात् आत्मनेपद के नियमों से बची हुई धातुओं से परस्मैपद होता है। (जैसे: पठति, गच्छति)।
    • आत्मनेपद (Ātmanepada): जिन धातुओं के रूप 'त, आताम्, झ...' प्रत्यय लगकर बनते हैं, वे आत्मनेपद कहलाती हैं। इसके मुख्य पाणिनीय नियामक सूत्र निम्नलिखित हैं:
      • अनुदात्तङित आत्मनेपदम् (अष्टाध्यायी - १.३.१२): जिस धातु के उपदेश में अनुदात्त स्वर या 'ङ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उससे आत्मनेपद होता है। (जैसे: शीङ् → शेते, सेव् → सेवते)।
      • भावकर्मणोः (अष्टाध्यायी - १.३.१३): भाववाच्य और कर्मवाच्य के वाक्यों में सभी धातुओं से अनिवार्य रूप से आत्मनेपद के ही प्रत्यय लगते हैं।
    • उभयपद (Ubhayapada): कुछ धातुएँ दोनों पदों में चलती हैं। इनका पद-निर्धारण इस पाणिनीय सूत्र से होता है:
      • स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले (अष्टाध्यायी - १.३.७२): जिस धातु के उपदेश में स्वरित स्वर या 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उससे तब आत्मनेपद होता है जब क्रिया का फल सीधे कर्ता को मिल रहा हो (कर्त्रभिप्राय)। यदि क्रिया का फल किसी अन्य को मिले, तो उसी धातु से परस्मैपद हो जाता है। अतः ये धातुएँ उभयपदी कहलाती हैं। (जैसे: कृ धातु → करोति / कुरुते; यज् धातु → यजति / यजते)।

    धातु परिचय हेतु व्यावहारिक निदर्शन तालिका

    मूल धातु (उपदेश रूप) धातु का अर्थ निर्धारित गण पद व्यवस्था लट् लकार रूप (प्रथम पुरुष एकवचन)
    भू (सत्तायाम्) होना भ्वादि (१) परस्मैपद भवति
    शीङ् (स्वप्ने) सोना अदादि (२) आत्मनेपद शेते
    कृ (करणे) करना तनादि (८) उभयपद करोति / कुरुते
    चुर् (स्तेये) चुराना चुरादि (१०) उभयपद चोरयति / चोरयते

    ८.३ सेट्, अनिट् और वेट् व्यवस्था: प्रत्यय लगाते समय 'इट्' (इ) आगम के नियम

    संस्कृत व्याकरण में जब धातुओं के पीछे अर्धधातुक प्रत्यय (जैसे क्त्वा, तुमुन्, क्तवतु, तव्यत् आदि) लगाए जाते हैं, तो कुछ धातुओं और प्रत्ययों के बीच में 'इट्' (इ) का आगम होता है, जबकि कुछ में नहीं होता। धातु परिचय ग्रंथ में प्रत्येक धातु की पहचान इस 'इट्' आगम के आधार पर तीन श्रेणियों में की जाती है: सेट्, अनिट् और वेट्।

    क) त्रिविध शास्त्रीय व्यवस्था

  • १. सेट् (स + इट् = इट् सहित): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम अनिवार्य रूप से होता है, उन्हें सेट् धातु कहते हैं।
    उदाहरण: हस् + क्त्वा = हसित्वा। यहाँ 'हस्' और 'त्वा' के बीच में 'इ' का आगम हुआ है। उसी प्रकार खाद् + तुमुन् = खादितुम्
  • २. अनिट् (अन् + इट् = इट् रहित): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम कभी नहीं होता, उन्हें अनिट् धातु कहते हैं।
    उदाहरण: पा + क्त्वा = पीत्वा। यहाँ 'पा' और 'त्वा' के बीच कोई 'इ' नहीं आया। उसी प्रकार गम् + तुमुन् = गन्तुम्
  • ३. वेट् (वा + इट् = विकल्प से इट्): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम विकल्प से (अर्थात् इच्छा होने पर हो भी सकता है और नहीं भी) होता है, उन्हें वेट् धातु कहा जाता है।
    उदाहरण: नश् (नष्ट होना) + क्त्वा = नशित्वा (इट् सहित) अथवा नंष्ट्वा (इट् रहित)। यहाँ दोनों रूप शुद्ध माने जाते हैं।
  • ख) मुख्य पाणिनीय सूत्र एवं नियम

    • मूल आगम सूत्र: आर्धधातुकस्येड्वलादेः (अष्टाध्यायी - ७.२.३५)
    सूत्रार्थ: 'वल्' प्रत्याहार (य् को छोड़कर सभी व्यंजन जैसे त, थ, व, म आदि) से शुरू होने वाले आर्धधातुक प्रत्ययों के परे रहते अंग को 'इट्' (इ) का आगम होता है। यह मूल रूप से सभी धातुओं को सेट् बनाने का नियम है।
    • निषेध सूत्र (अनिट् नियम): एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् (अष्टाध्यायी - ७.२.१०)
    सूत्रार्थ: जो धातुएँ अपने 'उपदेश' (मूल रूप) में एकाच् (एक स्वर वाली) हों और साथ ही अनुदात्त स्वर वाली हों, उन्हें वलादि आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर भी 'इट्' का आगम नहीं होता। इसी सूत्र के बल पर 'पा' (पीत्वा) और 'गम्' (गत्वा) जैसी धातुएँ अनिट् सिद्ध होती हैं।

    विकल्प सूत्र (वेट् नियम): उतो वृद्धिर्लुकि हलि के साहचर्य में स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्युदितो वा (अष्टाध्यायी - ७.२.४४) आदि सूत्रों से उदित् (जिनके अंत में 'उ' की इत्संज्ञा हुई हो) धातुओं में विकल्प से 'इट्' होता है।

    धातु परिचय हेतु 'इट्' व्यवस्था सारांश तालिका

    मूल धातु धातु की श्रेणी प्रत्यय प्रयोग निष्पन्न कृदन्त पद 'इ' आगम की स्थिति
    हस् (हसने) सेट् हस् + क्त्वा हसित्वा अनिवार्य 'इ' आगम
    खाद् (भक्षणे) सेट् खाद् + तुमुन् खादितुम् अनिवार्य 'इ' आगम
    पा (पाने) अनिट् पा + क्त्वा पीत्वा 'इ' आगम का पूर्ण निषेध
    गम् (गतौ) अनिट् गम् + तव्यत् गन्तव्यम् 'इ' आगम का पूर्ण निषेध
    नश् (अदर्शने) वेट् नश् + क्त्वा नशित्वा / नंष्ट्वा 'इ' आगम विकल्प से

    निष्कर्ष एवं उपसंहार

    पाणिनीय व्याकरण की यह समग्र समीक्षा स्पष्ट करती है कि संस्कृत भाषा में क्रियापदों का विन्यास केवल तिङन्त (लकार व्यवस्था) तक ही सीमित नहीं है। तिङ् प्रत्ययों की अपनी कुछ प्राकृतिक सीमाएँ हैं, जैसे—लिंग भेद का सर्वथा अभाव होना, एक वाक्य में एक ही मुख्य क्रिया का आबद्ध होना तथा क्रिया को विशेषण या संज्ञा रूप देने में सर्वथा असमर्थ होना।

    महर्षि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में कृत् प्रत्ययों की रचना करके क्रिया की अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व विस्तार और क्रांतिकारी लचीलापन प्रदान किया है। हमने देखा कि:

    • 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' और 'सर्वस्य द्वे' नियमों से क्त्वा और णमुल् प्रत्ययों का द्वित्व रूप क्रिया की आवृत्ति (बार-बार होना) को कितनी सहजता से प्रकट करता है।
    • शतृ-शानच् प्रत्यय वर्तमान काल की निरंतरता को दर्शाते हुए क्रिया को कर्ता के विशेषण में रूपांतरित कर देते हैं, तथा ल्युट् प्रत्यय क्रिया को शुद्ध संज्ञा का रूप (Gerunds) दे देता है।
    • समास के क्षेत्र में, समाहार द्वन्द्व और 'आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये' जैसे नियम दो अलग-अलग क्रिया-भावों को एक ही समस्त पद में पिरोकर भाषा को संक्षिप्त और अत्यंत अभिव्यंजक बनाते हैं।
    • अंत में, सेट्, अनिट् और वेट् की 'इ' आगम व्यवस्था धातुओं के आर्धधातुक रूपांतरण को गणितीय सटीकता प्रदान करती है।

    अतः, किसी भी धातु के वैज्ञानिक परिचय (धातु-परिचय) में इन कृदन्त और आख्यात नियमों का सम्यक् ज्ञान होना अनिवार्य है। कृत् प्रत्यय तिङन्त के पूरक और सुदृढ़ विकल्प दोनों हैं, जिनके बिना संस्कृत वाक्य-रचना और लोक-व्यवहार सर्वथा दुरूह हो जाता।

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    हिन्दी-संस्कृत शब्दकोश: ज्ञान परम्परा और प्रौद्योगिकी

    भारतीय ज्ञान-परम्परा में शब्दकोशों का स्थान

    भारतीय ज्ञान-परम्परा में भाषा को ज्ञान, संस्कृति और सभ्यता का प्रमुख संवाहक माना गया है। वैदिक ऋषियों से लेकर आधुनिक विद्वानों तक ज्ञान के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार का सर्वाधिक प्रभावी माध्यम भाषा ही रही है। भाषा की शुद्धता, उसके अर्थ-विस्तार तथा शब्द-सम्पदा के संरक्षण में शब्दकोशों का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। वस्तुतः शब्दकोश केवल शब्दों और उनके अर्थों का संग्रह नहीं होता, अपितु वह किसी भाषा की सांस्कृतिक चेतना, बौद्धिक विकास, सामाजिक परिवर्तन और वैज्ञानिक प्रगति का दर्पण भी होता है। प्रत्येक शब्द अपने साथ इतिहास, परम्परा, प्रयोग और विचार की एक दीर्घ यात्रा लेकर चलता है; शब्दकोश उस सम्पूर्ण विरासत को व्यवस्थित रूप से सुरक्षित रखने का कार्य करता है।

    संस्कृत भाषा के विकास में कोश-परम्परा का इतिहास अत्यन्त प्राचीन एवं समृद्ध है। वैदिक युग में कठिन वैदिक पदों के अर्थ स्पष्ट करने के उद्देश्य से निघण्टु और निरुक्त जैसे ग्रन्थों की रचना हुई, जिन्होंने भारतीय कोश-विज्ञान की आधारशिला रखी। इसके पश्चात् आचार्य अमरसिंह कृत अमरकोश ने संस्कृत कोश-परम्परा को एक नवीन दिशा प्रदान की। विषयानुसार वर्गीकृत पर्यायवाची शब्दों का उसका अद्वितीय विन्यास आज भी संस्कृत अध्ययन का अनिवार्य अंग माना जाता है। कालान्तर में अभिधानचिन्तामणि, त्रिकाण्डशेष, हारावली, शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यम् तथा वामन शिवराम आप्टे जैसे विद्वानों द्वारा निर्मित विविध कोशों ने संस्कृत शब्द-संपदा को और अधिक समृद्ध एवं व्यवस्थित किया। इन कोशों ने केवल शब्दों के अर्थ ही नहीं, बल्कि उनके व्याकरणिक स्वरूप, व्युत्पत्ति, प्रयोग, पर्याय, सन्दर्भ तथा शास्त्रीय प्रमाणों का भी सुविस्तृत निरूपण किया, जिसके कारण संस्कृत कोश-परम्परा विश्व की सर्वाधिक विकसित कोश-परम्पराओं में गिनी जाती है।

    समय के साथ समाज, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, प्रशासन, चिकित्सा, वाणिज्य तथा संचार के क्षेत्रों में तीव्र परिवर्तन हुए। इनके परिणामस्वरूप भाषा में भी निरन्तर नवीन शब्दों एवं पारिभाषिक शब्दावली का प्रवेश हुआ। आज का शब्दकोश केवल साहित्यिक या शास्त्रीय शब्दों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि वह आधुनिक जीवन के विविध क्षेत्रों की आवश्यकताओं को भी समान रूप से अभिव्यक्त करता है। सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बैंकिंग, विधि, चिकित्सा, पर्यावरण, मीडिया तथा अन्य समकालीन विषयों से सम्बन्धित हजारों नवीन शब्दों ने शब्द-संपदा का अभूतपूर्व विस्तार किया है। ऐसी स्थिति में शब्दकोशों का निरन्तर परिमार्जन एवं अद्यतन होना अनिवार्य हो गया है, जिससे भाषा समय की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित होती रहे।

    वर्तमान डिजिटल युग ने कोश-विज्ञान को एक नया आयाम प्रदान किया है। जहाँ परम्परागत मुद्रित शब्दकोश ज्ञान के स्थायी भण्डार रहे हैं, वहीं डिजिटल शब्दकोशों ने त्वरित खोज, सरल उपलब्धता, निरन्तर संशोधन तथा नवीन शब्दों के समावेश की अभूतपूर्व सुविधा प्रदान की है। फलतः आज शब्दकोश केवल एक संदर्भ-ग्रन्थ न रहकर भाषा-अध्ययन, अनुवाद, शोध, अध्यापन तथा व्यवहारिक प्रयोग का एक सशक्त डिजिटल उपकरण बन चुका है।

    इसी समृद्ध भारतीय कोश-परम्परा से प्रेरणा ग्रहण करते हुए प्रस्तुत 'अभिनव व्यावहारिक हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश' का निर्माण किया गया है। इसका उद्देश्य संस्कृत की शास्त्रीय प्रामाणिकता को अक्षुण्ण रखते हुए आधुनिक जीवन की व्यवहारिक शब्दावली को एक ही मंच पर उपलब्ध कराना है, जिससे संस्कृत अध्ययन अधिक सरल, सुलभ, प्रासंगिक और समयानुकूल बन सके।

    डिजिटल हिन्दी–संस्कृत शब्दकोश की आवश्यकता

    वर्तमान युग सूचना एवं प्रौद्योगिकी का युग है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति न्यूनतम समय में अधिकतम एवं प्रामाणिक जानकारी प्राप्त करना चाहता है। शिक्षा, अनुसंधान, अनुवाद तथा प्रशासन जैसे विविध क्षेत्रों में डिजिटल संसाधनों का उपयोग निरन्तर बढ़ रहा है। ऐसे परिवेश में भाषा-अध्ययन और शब्द-संदर्भ के पारम्परिक साधनों को भी समयानुकूल रूप प्रदान करना आवश्यक हो गया है। संस्कृत जैसी समृद्ध एवं वैज्ञानिक भाषा के प्रभावी अध्ययन, अध्यापन और व्यवहारिक प्रयोग के लिए एक आधुनिक डिजिटल हिन्दी–संस्कृत शब्दकोश आज की अनिवार्य आवश्यकता है।

    यद्यपि मुद्रित शब्दकोश ज्ञान के अत्यन्त विश्वसनीय एवं स्थायी स्रोत हैं, तथापि उनकी अपनी व्यावहारिक सीमाएँ हैं। आकार में बड़े एवं भारयुक्त होने के कारण उन्हें सदैव साथ रखना सरल नहीं होता। किसी शब्द की खोज में समय भी अपेक्षाकृत अधिक लगता है और एक बार प्रकाशित हो जाने के पश्चात् उनमें नवीन शब्दों या संशोधनों को तत्काल सम्मिलित करना सम्भव नहीं होता। परिणामस्वरूप बदलते समय के साथ अनेक आधुनिक शब्द, पारिभाषिक अभिव्यक्तियाँ तथा नवीन प्रयोग उनमें स्थान नहीं पा पाते।

    डिजिटल शब्दकोश इन सीमाओं का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें किसी भी शब्द को कुछ ही क्षणों में खोजा जा सकता है, जिससे अध्ययन, अध्यापन, लेखन, अनुवाद तथा शोधकार्य अधिक सरल, तीव्र और सुविधाजनक हो जाता है। यह सुविधा विशेष रूप से विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों, प्रतियोगी परीक्षार्थियों तथा संस्कृत-अध्येताओं के लिए अत्यन्त उपयोगी है, जिन्हें बार-बार शब्दों के अर्थ एवं उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्दों का संदर्भ लेना पड़ता है।

    एक अन्य महत्त्वपूर्ण आवश्यकता आधुनिक पारिभाषिक शब्दावली की है। पारम्परिक संस्कृत कोश मुख्यतः साहित्य, दर्शन, धर्म एवं शास्त्रीय विषयों पर केन्द्रित रहे हैं। आधुनिक विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, चिकित्सा, बैंकिंग, प्रशासन, विधि, पर्यावरण तथा समकालीन सामाजिक जीवन से सम्बन्धित अनेक शब्द या तो उनमें उपलब्ध नहीं हैं अथवा अत्यन्त सीमित रूप में मिलते हैं। इसके अतिरिक्त दैनिक व्यवहार में प्रचलित तद्भव, देशज तथा विदेशी मूल के अनेक शब्द भी सामान्यतः पारम्परिक कोशों में नहीं मिलते। वर्तमान समय की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसे शब्दों के उपयुक्त एवं प्रामाणिक संस्कृत प्रतिशब्दों का एक व्यवस्थित संग्रह अत्यन्त आवश्यक है।

    डिजिटल माध्यम की सबसे बड़ी विशेषता उसका निरन्तर विकसित होते रहने का स्वभाव है। मुद्रित शब्दकोशों के विपरीत डिजिटल शब्दकोश में समय-समय पर नवीन शब्दों, पारिभाषिक शब्दावली, संशोधित प्रविष्टियों तथा व्याकरणिक परिमार्जनों को सहजता से जोड़ा जा सकता है। इससे शब्दकोश सदैव अद्यतन बना रहता है और भाषा के विकास के साथ निरन्तर समृद्ध होता रहता. है। इस प्रकार डिजिटल हिन्दी–संस्कृत शब्दकोश केवल एक संदर्भ-ग्रन्थ नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा के आधुनिकीकरण, उसके व्यवहारिक प्रसार तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा को डिजिटल युग से जोड़ने का एक सशक्त माध्यम है।

    शब्दकोश निर्माण का उद्देश्य

    इस हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश के निर्माण का मूल उद्देश्य संस्कृत भाषा के अध्ययन, अध्यापन एवं व्यवहारिक प्रयोग को अधिक सरल, सुलभ और प्रभावी बनाना है। इसे विशेष रूप से विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों, अनुवादकों तथा संस्कृत-अध्येताओं की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। गृहकार्य, निबन्ध-लेखन, अनुवाद, भाषण, शोधकार्य अथवा दैनिक अध्ययन के समय उपयुक्त संस्कृत शब्दों की खोज में आने वाली कठिनाइयों का सहज समाधान प्रस्तुत करना इसका प्रमुख लक्ष्य है।

    यह शब्दकोश केवल शब्दों के अर्थ बताने तक सीमित नहीं है, बल्कि संस्कृत को व्यवहारोपयोगी भाषा के रूप में स्थापित करने का एक विनम्र प्रयास भी है। इसी उद्देश्य से इसमें दैनिक जीवन में प्रचलित हिन्दी, तद्भव, देशज तथा आवश्यक विदेशी मूल के शब्दों के लिए यथासम्भव उपयुक्त एवं प्रामाणिक संस्कृत प्रतिशब्दों का संकलन किया गया है। साथ ही शिक्षा, प्रशासन, सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, चिकित्सा, विज्ञान तथा अन्य समकालीन विषयों की व्यवहारिक शब्दावली को भी इसमें समाहित किया गया है, जिससे संस्कृत केवल शास्त्रों की भाषा न रहकर आधुनिक जीवन की अभिव्यक्ति का भी प्रभावी माध्यम बन सके।

    शब्दकोश के निर्माण में शास्त्रीय प्रामाणिकता और आधुनिक आवश्यकताओं के मध्य संतुलन बनाए रखने का विशेष प्रयास किया गया है। एक ओर पाणिनीय व्याकरण तथा पारम्परिक संस्कृत कोशों की मान्यताओं का यथासम्भव अनुसरण किया गया है, तो दूसरी ओर वर्तमान समय की भाषिक आवश्यकताओं, प्रचलित प्रयोगों तथा डिजिटल माध्यम की उपयोगिता को भी समान महत्त्व दिया गया है। इस प्रकार यह शब्दकोश परम्परा और आधुनिकता के समन्वित स्वरूप का प्रतिनिधित्व करता है।

    इस शब्दकोश की संरचना ऐसी रखी गई है कि यह न तो इतना विशाल हो कि सामान्य उपयोगकर्ता के लिए दुरूह और समयसाध्य बन जाए, और न ही इतना संक्षिप्त कि उसकी व्यावहारिक आवश्यकताओं की पूर्ति न कर सके। इसमें अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा दैनिक व्यवहार के लिए सर्वाधिक उपयोगी और प्रचलित शब्दों का चयन किया गया है, जिससे यह विद्यार्थियों और सामान्य पाठकों के लिए एक संतुलित, प्रामाणिक एवं व्यवहारिक संदर्भ-ग्रन्थ के रूप में उपयोगी सिद्ध हो सके।

    शब्द-संग्रह की विशेषताएँ

    किसी भी शब्दकोश की उपयोगिता उसके शब्द-संग्रह की व्यापकता, प्रामाणिकता तथा व्यवहारिकता पर निर्भर करती है। इसी दृष्टि से इस हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश में वर्तमान जीवन के विविध आयामों से सम्बन्धित ८,५०० से अधिक व्यावहारिक हिन्दी शब्दों एवं उनके प्रामाणिक संस्कृत प्रतिशब्दों का समावेश किया गया है। शब्दों के चयन में यह विशेष ध्यान रखा गया है कि वे अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा दैनिक व्यवहार में सर्वाधिक उपयोगी हों और सामान्य पाठक उन्हें सहजता से खोज एवं प्रयोग कर सकें।

    इस शब्दकोश की एक प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें कठिन एवं अल्पप्रचलित तत्सम शब्दों की अपेक्षा लोक-प्रचलित हिन्दी, तद्भव तथा व्यवहार में प्रचलित शब्दों को मुख्य प्रविष्टियों के रूप में स्थान दिया गया है। उदाहरणार्थ सिलबट्टा, दातून, छछूँदर जैसे दैनिक जीवन में प्रयुक्त शब्दों को भी इसमें सम्मिलित किया गया है, ताकि उपयोगकर्ता अपने परिचित शब्दों के माध्यम से उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्द तक सरलता से पहुँच सकें। जहाँ किसी शब्द के अमानक रूप प्रचलित हैं, वहाँ उनके स्थान पर मानक हिन्दी रूप को आधार बनाया गया है; जैसे घोड़सवार के स्थान पर घुड़सवार शब्द की प्रविष्टि प्रस्तुत की गई है।

    भाषा के व्यवहारिक स्वरूप को ध्यान में रखते हुए दैनिक जीवन में प्रयुक्त विविध क्रियाओं का भी पर्याप्त समावेश किया गया है। इससे हिन्दी से संस्कृत अनुवाद, वाक्य-रचना तथा व्यवहारिक संस्कृत लेखन अधिक सहज और स्वाभाविक बनता है। इसके अतिरिक्त समाज में व्यापक रूप से प्रचलित देशज, आगत तथा विदेशी मूल के अनेक शब्दों—जैसे स्टेशन, कंप्यूटर, पुलिस, तलाक आदि—के लिए भी यथासम्भव उपयुक्त एवं प्रामाणिक संस्कृत प्रतिशब्द प्रदान किए गए हैं।

    आधुनिक ज्ञान-विज्ञान एवं बदलती सामाजिक आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए इस शब्दकोश में सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन, बैंकिंग एवं वित्त, चिकित्सा विज्ञान, शिक्षा, गृह-उपकरण, वस्त्र-परिधान, पाक-कला तथा अन्य समकालीन विषयों से सम्बन्धित व्यवहारिक एवं पारिभाषिक शब्दावली का भी समुचित समावेश किया गया है। इस प्रकार यह शब्दकोश केवल पारम्परिक संस्कृत शब्द-संपदा का परिचायक नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन की भाषिक आवश्यकताओं का भी विश्वसनीय संदर्भ-ग्रन्थ है, जो शास्त्रीयता और व्यवहारिकता—दोनों का संतुलित समन्वय प्रस्तुत करता है।

    शब्द-रूपों का मानकीकरण

    इस हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश के निर्माण एवं परिमार्जन में पाणिनीय व्याकरण की परम्परा तथा अष्टाध्यायी के सिद्धान्तों का यथासम्भव अनुसरण किया गया है। शब्दों के रूप, वर्तनी तथा व्याकरणिक संकेतों का निर्धारण शास्त्रीय मानकों के अनुरूप किया गया है, जिससे शब्दकोश की प्रामाणिकता एवं भाषिक शुद्धता अक्षुण्ण बनी रहे। साथ ही, जहाँ आवश्यक हुआ है, वहाँ व्यवहारिक उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए ऐसे रूपों का चयन किया गया है जो विद्यार्थियों एवं सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए अधिक सुगम एवं प्रचलित हैं।

    इसी उद्देश्य से कुछ कठिन प्रातिपदिकों के स्थान पर उनके प्रचलित प्रथमा-विभक्ति रूपों को मुख्य प्रविष्टि के रूप में स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ स्वामिन्, वाजिन्, कर्तृ तथा छेत्तृ जैसे प्रातिपदिकों के स्थान पर क्रमशः स्वामी, वाजी, कर्ता तथा छेत्ता रूपों का प्रयोग किया गया है। इससे शब्दों की खोज, अध्ययन एवं व्यवहारिक प्रयोग अधिक सरल हो जाता है, जबकि उनकी व्याकरणिक शुद्धता भी सुरक्षित रहती है।

    संस्कृत शब्दों के लेखन में वर्गीय पञ्चमाक्षरों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का प्रयोग पाणिनीय व्याकरण के अनुसार किया गया है। अतः संस्कृत से हिन्दी खोज करते समय शब्दों को उनके शुद्ध रूपों में लिखना अपेक्षित है। उदाहरणार्थ सङ्गतः, काञ्चनम्, हण्डिका, गङ्गा, पञ्च, दण्डः आदि शब्दों की खोज करते समय यथास्थान वर्गीय पञ्चमाक्षरों का प्रयोग करने पर अधिक शुद्ध एवं अपेक्षित परिणाम प्राप्त होंगे। यह व्यवस्था संस्कृत शब्दों की मूल वर्तनी एवं व्याकरणिक स्वरूप को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अपनाई गई है।

    यद्यपि इस शब्दकोश का प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों एवं सामान्य उपयोगकर्ताओं के लिए संस्कृत अध्ययन को सरल बनाना है, तथापि इसकी प्रत्येक प्रविष्टि को यथासम्भव शास्त्रीय मानकों के अनुरूप रखने का प्रयास किया गया है। परिणामस्वरूप यह शब्दकोश एक ओर पाणिनीय व्याकरण की परम्परा का सम्मान करता है, तो दूसरी ओर व्यवहारिक उपयोग की दृष्टि से भी समान रूप से उपयोगी सिद्ध होता है।

    प्रविष्टियों की संरचना

    इस शब्दकोश की प्रत्येक प्रविष्टि को इस प्रकार व्यवस्थित किया गया है कि उपयोगकर्ता को शब्द का अर्थ ही नहीं, अपितु उसका व्याकरणिक स्वरूप भी सहज रूप से ज्ञात हो सके। प्रत्येक संज्ञा शब्द के साथ उसका व्याकरणसम्मत लिंग—[पुं.] (पुल्लिंग), [स्त्री.] (स्त्रीलिंग) अथवा [नपुं.] (नपुंसकलिंग)—स्पष्ट रूप से अंकित किया गया है। इसी प्रकार विशेषण, सर्वनाम, अव्यय आदि पदों का भी पृथक् वर्गीकरण किया गया है, जिससे शब्द के उचित प्रयोग एवं अनुवाद में सुविधा हो।

    जहाँ किसी हिन्दी शब्द के एक से अधिक संस्कृत प्रतिशब्द उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें पाइप चिह्न (|) द्वारा पृथक्-पृथक् प्रदर्शित किया गया है। इससे उपयोगकर्ता प्रसंग, अर्थ एवं शैली के अनुरूप उपयुक्त पर्याय का चयन कर सकता है। विशेषणों को अनुवाद एवं प्रयोग की सुविधा के लिए उनके प्रचलित प्रथमा-विभक्ति, विसर्गयुक्त रूपों में प्रस्तुत किया गया है।

    क्रियापदों के लिए परम्परागत लट्-लकार (जैसे— पठति, लिखति, गच्छति) के रूपों के स्थान पर व्याकरणसम्मत भाववाचक कृदन्त (Verbal Noun) रूपों (जैसे— पठनम्, लेखनम्, गमनम्) का प्रयोग किया गया है। इससे शब्दकोश का स्वरूप अधिक व्यवस्थित एवं अनुवादोपयोगी बनता है। ऐसे कृदन्त रूपों के साथ लिंग का कोई निर्देश नहीं दिया गया है।

    प्रत्येक क्रियापद के साथ कोष्ठक में उसकी मूल औपदेशिक धातु, उपसर्गयुक्त धातु अथवा जहाँ आवश्यक हो वहाँ नामधातु का भी उल्लेख किया गया है। धातुओं के निरूपण में धातुपाठ के मानक औपदेशिक रूपों का अनुसरण किया गया है। भ्रम की सम्भावना वाले एकाक्षरी धातुओं को भी उनके पूर्ण औपदेशिक रूप—जैसे इण्, इङ् आदि—में स्पष्ट रूप से अंकित किया गया है तथा ध्वन्यात्मक अथवा संज्ञा-शब्दों से निष्पन्न धातुओं के साथ [नामधातु] का पृथक् संकेत दिया गया है। इससे शब्दों की व्युत्पत्ति, निर्माण-प्रक्रिया तथा व्याकरणिक आधार को समझने में सुविधा होती है और यह शब्दकोश केवल अर्थ-संग्रह न रहकर संस्कृत व्याकरण के अध्ययन का भी एक उपयोगी साधन बन जाता है।

    ऐप का उपयोग

    इस शब्दकोश का मोबाइल अनुप्रयोग (ऐप) उपयोगकर्ता को सरल, त्वरित एवं सुविधाजनक खोज का अनुभव प्रदान करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। ऐप में द्वि-दिशात्मक (⇄) खोज की सुविधा उपलब्ध है, जिसके माध्यम से उपयोगकर्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार हिन्दी → संस्कृत अथवा संस्कृत → हिन्दी मोड का चयन कर सकता है। इससे एक ही मंच पर दोनों प्रकार की खोज सहज रूप से सम्भव हो जाती है।

    हिन्दी शब्दों की खोज को अधिक सरल बनाने के लिए नुक्तायुक्त वर्णों (जैसे— क़, ख़, ग़, ज़, फ़ आदि) को सामान्य देवनागरी वर्णों के साथ समन्वित किया गया है। अतः यदि उपयोगकर्ता फ़ल, फल, ज़िला, जिला, क़ानून अथवा कानून जैसे किसी भी रूप में शब्द लिखता है, तो ऐप उसे उसी शब्द की उपयुक्त प्रविष्टि तक पहुँचा देता है। इससे विभिन्न प्रकार के लेखन-रूपों के कारण खोज में कोई कठिनाई नहीं होती।

    संस्कृत शब्दों की खोज करते समय शुद्ध वर्तनी का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है। विशेषतः वर्गीय पञ्चमाक्षरों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का प्रयोग पाणिनीय व्याकरण के अनुसार किया जाना चाहिए। उदाहरणार्थ सङ्गतः, काञ्चनम्, हण्डिका, गङ्गा आदि शब्दों की खोज उनके शुद्ध संस्कृत रूपों में करने पर अपेक्षित परिणाम प्राप्त होंगे। यह व्यवस्था शब्दों की प्रामाणिक वर्तनी एवं व्याकरणिक स्वरूप को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से अपनाई गई है।

    ऐप में पसंदीदा (Favourite) सुविधा भी उपलब्ध है, जिसके माध्यम से उपयोगकर्ता बार-बार उपयोग में आने वाले अथवा महत्त्वपूर्ण शब्दों को अपनी व्यक्तिगत सूची में सुरक्षित रख सकता है। इससे आवश्यक शब्दों को पुनः खोजने की आवश्यकता नहीं रहती और अध्ययन, अध्यापन तथा अनुवाद के समय कार्य अधिक सुविधाजनक एवं समय-सापेक्ष हो जाता है।

    इन सुविधाओं के कारण यह डिजिटल शब्दकोश केवल शब्दों की खोज का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृत भाषा के अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा व्यवहारिक प्रयोग के लिए एक सरल, आधुनिक और उपयोगकर्ता-अनुकूल साधन के रूप में विकसित किया गया है।

    प्रामाणिकता एवं संदर्भ

    किसी भी शब्दकोश की विश्वसनीयता उसके स्रोतों की प्रामाणिकता तथा शब्द-चयन की वैज्ञानिक प्रक्रिया पर आधारित होती है। प्रस्तुत हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश के निर्माण में पारम्परिक संस्कृत कोश-परम्परा, मानक व्याकरण-ग्रन्थों तथा आधुनिक पारिभाषिक स्रोतों का समन्वित उपयोग किया गया है। प्रत्येक प्रविष्टि के चयन, सत्यापन तथा मानकीकरण में यथासम्भव शास्त्रीय प्रमाणों एवं समकालीन भाषिक आवश्यकताओं का सम्यक् ध्यान रखा गया है।

    इस शब्दकोश के निर्माण में संस्कृत कोश-साहित्य के प्रमुख एवं प्रमाणभूत ग्रन्थों—अमरकोश, अभिधानचिन्तामणि, त्रिकाण्डशेष, हारावली, शब्दकल्पद्रुम, वाचस्पत्यम्, आप्टे संस्कृत–हिन्दी कोश, निघण्टु तथा निरुक्त—का आवश्यकतानुसार परामर्श लिया गया है। इन ग्रन्थों में उपलब्ध शब्दों, पर्यायों, व्युत्पत्तियों एवं व्याकरणिक सूचनाओं के आधार पर अनेक प्रविष्टियों का सत्यापन एवं परिमार्जन किया गया है।

    आधुनिक विषयों की पारिभाषिक शब्दावली के लिए भारत सरकार के केंद्रीय हिन्दी निदेशालय, वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग (CSTT) तथा संस्कृत के समकालीन साहित्य एवं व्यवहारिक शब्दावली से सम्बन्धित अन्य प्रामाणिक प्रकाशनों का भी उपयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त व्यवहारिक संस्कृत के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले 'संस्कृतभाषी' ब्लॉग पर उपलब्ध व्यावहारिक शब्द-सूचियों, संख्या-प्रयोगों तथा अन्य भाषिक सामग्रियों से भी आवश्यक मार्गदर्शन प्राप्त किया गया है।

    इन सभी शास्त्रीय एवं आधुनिक स्रोतों के समन्वित अध्ययन के आधार पर प्रस्तुत शब्दकोश का निर्माण किया गया है। तथापि भाषा एक सतत् विकासशील प्रक्रिया है; अतः नवीन शब्दों, संशोधनों तथा उपयोगकर्ताओं के सार्थक सुझावों के आलोक में इस डिजिटल शब्दकोश का निरन्तर परिमार्जन एवं अद्यतन किया जाता रहेगा, जिससे इसकी प्रामाणिकता, उपयोगिता एवं समकालीनता निरन्तर बनी रहे।

    भविष्य की दिशा

    संस्कृत भाषा का विकास एक सतत् प्रक्रिया है। आधुनिक विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, प्रशासन तथा समाज में निरन्तर नए-नए विचारों और अवधारणाओं का समावेश हो रहा है, जिसके परिणामस्वरूप नवीन शब्दों एवं पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता भी निरन्तर बढ़ रही है। डिजिटल स्वरूप में उपलब्ध होने के कारण इस हिन्दी–संस्कृत शब्दकोश का नियमित परिमार्जन एवं अद्यतन किया जाना सम्भव है। भविष्य में इसमें नवीन हिन्दी शब्दों, समकालीन पारिभाषिक शब्दावली तथा व्यवहार में प्रचलित संस्कृत प्रतिशब्दों का क्रमशः समावेश किया जाता रहेगा, जिससे यह समय की आवश्यकताओं के अनुरूप निरन्तर समृद्ध एवं उपयोगी बना रहे

    इस शब्दकोश के विकास में उपयोगकर्ताओं की सहभागिता को भी महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। यदि किसी प्रविष्टि में संशोधन, नवीन शब्द के समावेश अथवा किसी व्याकरणिक अथवा भाषिक सुधार की आवश्यकता अनुभव हो, तो विद्वानों, अध्यापकों, शोधार्थियों तथा सामान्य उपयोगकर्ताओं से प्राप्त सुझावों का स्वागत किया जाएगा। उपयुक्त एवं प्रमाणिक सुझावों पर विचार कर उन्हें आगामी संस्करणों एवं अद्यतनों में समाहित करने का प्रयास किया जाएगा।

    भविष्य में इस शब्दकोश को केवल शब्दार्थ-संग्रह तक सीमित न रखते हुए संस्कृत के अन्य डिजिटल संसाधनों के साथ भी क्रमशः समन्वित करने का लक्ष्य है। इस दिशा में पारिभाषिक शब्दावली, विषयवार शब्द-संग्रह, शिक्षणोपयोगी सामग्री तथा संस्कृत-अध्ययन के अन्य डिजिटल साधनों का विकास एवं विस्तार भी प्रस्तावित है। हमारा विश्वास है कि निरन्तर परिमार्जन, विद्वत्सहयोग तथा आधुनिक प्रौद्योगिकी के समन्वय से यह शब्दकोश संस्कृत के विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों, अनुवादकों तथा संस्कृत-प्रेमियों के लिए एक अधिकोत्कृष्ट प्रामाणिक, समृद्ध और उपयोगी डिजिटल संदर्भ-स्रोत के रूप में विकसित होता रहेगा।

    उपसंहार

    संस्कृत केवल भारत की प्राचीन भाषा ही नहीं, अपितु भारतीय ज्ञान-विज्ञान, दर्शन, साहित्य और सांस्कृतिक विरासत की प्रमुख संवाहिका है। इसके संरक्षण, संवर्धन तथा समकालीन जीवन में पुनः प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक है कि संस्कृत अध्ययन के साधन समयानुकूल, सरल एवं सहज उपलब्ध हों। प्रस्तुत हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश इसी दिशा में किया गया एक विनम्र प्रयास है, जिसका उद्देश्य संस्कृत को केवल अध्ययन की भाषा न बनाकर व्यवहार, अनुवाद, अध्यापन और अनुसंधान की भी एक सशक्त भाषा के रूप में स्थापित करना है।

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    हिंदी संस्कृत शब्दकोश भाग 1 अ से औ तक के शब्द

     अ से अः तक के हिंदी संस्कृत शब्द

    हिन्दी शब्दसंस्कृत शब्द और व्युत्पत्ति निर्देश
    अँगुलीअङ्गुलिः [स्त्री.]
    अँगूठाअङ्गुष्ठः [पुं.] | वृद्धाङ्गुलिः [स्त्री.]
    अंकचिह्नम् [नपुं.] | सङ्ख्याचिह्नम् [नपुं.] | लक्षणम् [नपुं.] | रूपकभागः [पुं.]
    अंकितचिह्नितः [विशेषण] | लाञ्छितः [विशेषण]
    अंकुरअङ्कुरः [पुं.] | प्ररोहः [पुं.]
    अंकुरनाअङ्कुरणम् [नपुं.] (अङ्कुर् [नामधातु])
    अंगअवयवः [पुं.] | अङ्गम् [नपुं.]
    अंग फड़कनाअङ्गस्फुरणम् [नपुं.] (अङ्ग + स्फुर् [धातु])
    अंगरखाअङ्गरक्षिका [स्त्री.]
    अंगारअङ्गारः [पुं.] | दग्धकाष्ठखण्डम् [नपुं.] | अलातम् [नपुं.] | उल्मुकम् [नपुं.]
    अंगीकारअङ्गीकरणम् [नपुं.] | स्वीकारः [पुं.] | प्रतिग्रहः [पुं.] | प्रतिपत्तिः [स्त्री.] | आदानम् [नपुं.]
    अंगीठीअङ्गारपात्रम् [नपुं.] | अङ्गारधानिका [स्त्री.] | हसेंट [स्त्री.] | अङ्गारशकटी [स्त्री.]
    अंगुलअङ्गुलम् [नपुं.] | अष्टयवपरिमाणम् [नपुं.]
    अंगूठीअङ्गुलीयकम् [नपुं.] | ऊर्मिका [स्त्री.] | मुद्रिका [स्त्री.]
    अंगूरद्राक्षाफलम् [नपुं.] | मृद्वीका [स्त्री.]
    अंगोछाअङ्गोञ्छः [पुं.] | गात्रमार्जकपटः [पुं.] | गात्रमार्जनी [स्त्री.]
    अंग्रेजआङ्ग्लः [पुं.] | आङ्ग्लदेशीयः [पुं.]
    अंग्रेजीआङ्ग्लभाषा [स्त्री.]
    अंचलअञ्चलम् [नपुं.] | वस्त्रप्रान्तः [पुं.]
    अंजनअञ्जनम् [नपुं.] | कज्जलम् [नपुं.]
    अंजामपरिणामः [पुं.] | फलम् [नपुं.] | अन्तः [पुं.] | पाकः [पुं.]
    अंजीरअञ्जीरः [पुं.] | अञ्जीरम् [नपुं.]
    अंजुमनसभा [स्त्री.] | परिषद् [स्त्री.]
    अंडकोषअण्डकोशः [पुं.] | वृषणः [पुं.]
    अंडजअण्डजः [पुं.] | अण्डोद्भवः [पुं.]
    अंड-बंडप्रलापः [पुं.] | अनर्थकवचनम् [नपुं.] | व्यर्थः [विशेषण] | अव्यवस्थितः [विशेषण]
    अंडाअण्डम् [नपुं.]
    अंडानुमाअण्डाकारः [विशेषण] | अण्डसादृशः [विशेषण]
    अंतअवसानम् [नपुं.] | समाप्तिः [स्त्री.] | मृत्युः [पुं.] | नाशः [पुं.] | सीमा [स्त्री.] | प्रान्तः [पुं.] | परिणामः [पुं.]
    अंतःकरणअन्तरिन्द्रियम् [नपुं.] | मनः [नपुं.] | मानसम् [नपुं.] | चित्तम् [नपुं.]
    अंतड़ीअन्त्रम् [नपुं.] | शिरा [स्त्री.]
    आंतअन्त्रम् [नपुं.] | शिरा [स्त्री.]
    अंतरभेदः [पुं.] | दूरता [स्त्री.] | अन्तरालम् [नपुं.] | अपरः [विशेषण] | अन्यः [विशेषण]
    अंतरात्माआत्मा [पुं.] | देही [पुं.] | शरीरी [पुं.] | मानसम् [नपुं.] | चित्तम् [नपुं.] | मनः [नपुं.]
    अंतरालमध्यप्रदेशः [पुं.] | अभ्यन्तरम् [नपुं.] | परिवेष्टितस्थानम् [नपुं.]
    अंतरिक्षखम् [नपुं.] | गगनम् [नपुं.] | आकाशः [पुं.] | शम् [नपुं.] | अम्बरम् [नपुं.]
    अंतर्गतअन्तःस्थः [विशेषण] | अन्तर्भूतः [विशेषण] | समाविष्टः [विशेषण] | सम्मिलितः [विशेषण] | हृदयस्थः [विशेषण] | मानसिकः [विशेषण]
    अंतर्द्धानलोपः [पुं.] | अदर्शनम् [नपुं.] | तिरोधानम् [नपुं.] | अदृश्यः [विशेषण] | गुप्तः [विशेषण]
    अंतर्राष्ट्रीयअन्ताराष्ट्रियः [विशेषण] | अंतर्राष्ट्रीयः [विशेषण]
    अंतर्वतीअन्तर्वत्नी [स्त्री.] | सगर्भा [स्त्री.]
    अंत्येष्टिअन्तिमसंस्कारः [पुं.] | शवदाहः [पुं.] | अन्त्येष्टिः [स्त्री.]
    अंदरअन्तरे [अव्यय] | मध्ये [अव्यय] | गर्भे [अव्यय] | अभ्यन्तरे [अव्यय] | अन्तः [अव्यय]
    अंदरसापिष्टिकः [पुं.]
    अंदाजअनुमानम् [नपुं.] | मूल्यनिरूपणम् [नपुं.]
    अंदाजाअनुमानम् [नपुं.] | ऊहा [स्त्री.] | अनुमानः [पुं.]
    अंधड़प्रकम्पनः [पुं.] | झंझावातः [पुं.] | वात्या [स्त्री.]
    अंधविश्वासनिर्विवेकः [विशेषण] | तर्कशून्यः [विशेषण] | अन्धविश्वासः [पुं.]
    अंधाअन्धः [विशेषण] | नेत्रहीनः [विशेषण] | मूर्खः [विशेषण] | अनेत्रः [विशेषण]
    अंधाधुंधविचारहीनता [स्त्री.] | अतिशयम् [विशेषण/क्रियाविशेषण]
    अंधेरअन्यायः [पुं.] | उपद्रवः [पुं.] | अत्याचारः [पुं.] | बलात्कारः [पुं.]
    अंधेराअन्धकारः [पुं.] | तिमिरम् [नपुं.] | तमिस्रम् [नपुं.]
    अंधेरीअन्धकारमयी [स्त्री.]
    अंशभागः [पुं.] | खण्डः [पुं.] | शकलम् [नपुं.] | देशः [पुं.] | अवयवः [पुं.] | अङ्गम् [नपुं.] | लाभांशः [पुं.] | भाज्याङ्कः [पुं.] | रिक्थांशः [पुं.]
    अऋणीअनृणी [विशेषण]
    अकंटकनिष्कण्टकः [विशेषण] | निर्विघ्नः [विशेषण] | निरन्तरायः [विशेषण] | शत्रुशून्यः [विशेषण]
    अकड़गर्वः [पुं.] | दर्पः [पुं.] | धृष्टता [स्त्री.] | आग्रहः [पुं.]
    अकर्मकुकार्यम् [नपुं.] | पापम् [नपुं.]
    अकर्मककर्मरहितः [विशेषण]
    अकसरप्रायः [अव्यय] | बहुधा [अव्यय] | बहुशः [अव्यय]
    अकसीरलाभप्रदमौषधम् [नपुं.] | रसायनम् [नपुं.]
    अकस्मात्सहसा [अव्यय] | एकपदे [अव्यय] | अतर्कितम् [अव्यय] | दैवात् [अव्यय] | हठात् [अव्यय]
    अकाजक्षतिः [स्त्री.] | हानिः [स्त्री.] | व्यर्थम् [अव्यय]
    अकाट्यअखण्डनीयः [विशेषण] | अप्रत्याख्येयः [विशेषण] | अबाध्यः [विशेषण]
    अकारणनिष्कारणः [विशेषण] | अहेतुकः [विशेषण] | निर्निमित्तः [विशेषण] | स्वयम्भूः [विशेषण/पुं.] | निष्प्रयोजनम् [अव्यय] | निष्कारणम् [अव्यय]
    अकारादि वर्णअक्षरम् [नपुं.]
    अकालदुर्भिक्षम् [नपुं.] | दुष्कालः [पुं.]
    अकिंचननिर्धनः [विशेषण] | निःस्वः [विशेषण] | दरिद्रः [विशेषण] | दुर्गतः [विशेषण]
    अकूतअमितः [विशेषण] | अगणितः [विशेषण]
    अकेलाएकः [विशेषण] | एकाकी [विशेषण]
    अक्लबुद्धिः [स्त्री.] | प्रज्ञा [स्त्री.] | धीः [स्त्री.] | मेधा [स्त्री.]
    अक्लमंदबुद्धिमत् [विशेषण] | प्रज्ञावत् [विशेषण] | मेधावी [विशेषण] | विज्ञः [विशेषण]
    अक्षशारिः [पुं.] | पाशकः [पुं.] | इन्द्रियवर्गः [पुं.] | रुद्राक्षः [पुं.] | सर्पः [पुं.]
    अक्षकुमाररावणपुत्रः [पुं.]
    अक्षतअखण्डितः [विशेषण] | व्रणहीनः [विशेषण] | सम्पूर्णतण्डुलकणः [पुं.]
    अक्षमअसहिष्णुः [विशेषण] | क्षमाशून्यः [विशेषण] | अतितिक्षुः [विशेषण] | अशक्तः [विशेषण] | असमर्थः [विशेषण]
    अक्षयअनश्वरः [विशेषण]
    अक्षरमालावर्णमाला [स्त्री.]
    अक्षिनयनम् [नपुं.] | नेत्रम् [नपुं.] | अक्षि [नपुं.]
    अक्षुब्धक्रोधहीनः [विशेषण] | क्षोभहीनः [विशेषण]
    अक्सरप्रायः [अव्यय]
    अखंडसमग्रः [विशेषण] | सम्पूर्णः [विशेषण] | निरन्तरः [विशेषण]
    अखंडनीयअभेद्यः [विशेषण] | अविभाज्यः [विशेषण] | पुष्टः [विशेषण] | दृढः [विशेषण]
    अखबारसमाचारपत्रम् [नपुं.]
    अखरनाबाधनम् [नपुं.] (बाध् [धातु]) | दुरनुभवः [पुं.]
    अखरोटअक्षोटः [पुं.] | अक्षोटम् [नपुं.]
    अखाड़ाअक्षवाटः [पुं.] | मल्लभूमिः [स्त्री.]
    अगरचेत् [अव्यय] | यदि [अव्यय]
    अगरचेयद्यपि [अव्यय]
    अगलाअग्रिमः [विशेषण] | प्रधानः [विशेषण] | पूर्वजः [पुं.] | अग्र्यः [विशेषण] | पूर्वः [विशेषण]
    अगवानीस्वागतम् [नपुं.]
    अगहन मासअग्रहायणः [पुं.] | मार्गशीर्षः [पुं.]
    अगिनबोटअग्निनौका [स्त्री.] | अग्निपोतः [पुं.]
    अगियानाउत्तपनम् [नपुं.] (उत्तप् [नामधातु])
    अगुआअग्रणीः [पुं.] | मुखरः [पुं.] | नायकः [पुं.]
    अगोचरइन्द्रियातीतः [विशेषण] | अतीन्द्रियः [विशेषण] | अप्रकटः [विशेषण] | अव्यक्तः [विशेषण] | अप्रत्यक्षः [विशेषण]
    अग्निअनलः [पुं.] | ज्वलनः [पुं.] | दहनः [पुं.] | तापः [पुं.] | कृपीटयोनिः [पुं.] | ज्वलनम् [नपुं.] | शवदाहः [पुं.] | अग्निः [पुं.]
    अग्रगण्यअग्रगण्यः [विशेषण] | ज्येष्ठः [विशेषण] | श्रेष्ठः [विशेषण] | मान्यः [विशेषण]
    अग्रगामीपुरोगः [विशेषण/पुं.] | अग्रणीः [विशेषण/पुं.] | नायकः [पुं.]
    अग्राह्यअग्राह्यः [विशेषण] | त्याज्यः [विशेषण] | परिहार्यः [विशेषण] | हेयः [विशेषण]
    अग्रिमअग्रिमः [विशेषण] | भावी [विशेषण] | आगामी [विशेषण] | प्रधानः [विशेषण] | अग्र्यः [विशेषण]
    अघपापम् [नपुं.] | पातकम् [नपुं.] | दुरितम् [नपुं.] | दुःखम् [नपुं.] | व्यसनम् [नपुं.]
    अघटितअभूतः [विशेषण] | असम्भवः [विशेषण] | कठिनः [विशेषण] | अयोग्यः [विशेषण]
    अघानातृप्तिः [स्त्री.] (तृप् [धातु])
    अघोरसौम्यः [विशेषण] | शोभनः [विशेषण] | प्रियदर्शनः [विशेषण]
    अघोरीअघोरमतानुयायी [पुं.] | सर्वभक्षकः [पुं.] | दुर्दर्शनः [पुं.]
    अघोषनीरवः [विशेषण] | निश्शब्दः [विशेषण] | अल्पध्वनियुतः [विशेषण] | गोपहीनः [विशेषण]
    अचकनकञ्चुकः [पुं.]
    अचरजआश्चर्यम् [नपुं.] | अद्भुतम् [नपुं.] | कौतुकम् [नपुं.] | विस्मयः [पुं.]
    अचम्भाआश्चर्यम् [नपुं.] | अद्भुतम् [नपुं.] | कौतुकम् [नपुं.] | विस्मयः [पुं.]
    अचानकअकस्मात् [अव्यय] | सहसा [अव्यय]
    अचारसन्धितम् [नपुं.] | सन्धानम् [नपुं.]
    अचूकअमोघः [विशेषण] | अभ्रान्तः [विशेषण] | अव्यर्थः [विशेषण]
    अचेतमूर्छितः [विशेषण] | सञ्ज्ञाहीनः [विशेषण]
    अच्छाउत्तमः [विशेषण] | सुन्दरः [विशेषण] | भद्रः [विशेषण] | वरः [विशेषण] | साधुः [विशेषण] | बाढम् [अव्यय]
    अच्छा भाग्यसौभाग्यम् [नपुं.]
    अच्छा लगनारोचनम् [नपुं.] (रुच् [धातु]) | लसनम् [नपुं.] (लस् [धातु])
    अच्छा लेखसुलेखः [पुं.]
    अच्छाईभद्रता [स्त्री.] | सौजन्यम् [नपुं.]
    अच्छी तरहसुष्ठु [अव्यय]
    अच्छी मिट्टीमृत्सा [स्त्री.]
    अछूतअस्पृश्यः [विशेषण]
    अछूताशुद्धः [विशेषण] | पवित्रः [विशेषण] | अस्पृष्टः [विशेषण]
    अजगरशयुः [पुं.] | वाहसः [पुं.] | अजगरः [पुं.]
    अजदहाअजगरः [पुं.]
    अजनबीअपरिचितः [विशेषण/पुं.] | वैदेशिकः [पुं.] | अभ्यागतः [पुं.] | आगन्तुकः [पुं.] | अतिथिः [पुं.]
    अजन्माअजः [विशेषण/पुं.] | स्वयम्भूः [विशेषण/पुं.] | अनादिः [विशेषण/पुं.]
    अजबअद्भुतः [विशेषण] | विचित्रः [विशेषण]
    अजवायनयवानी [स्त्री.] | शूलहन्त्री [स्त्री.]
    अजातशत्रुशत्रुहीनः [विशेषण] | सर्वमित्रम् [विशेषण/नपुं.] | युधिष्ठिरः [पुं.] | शिवः [पुं.]
    अजायबघरविचित्रालयः [पुं.] | कौतुकागारम् [नपुं.] | दुर्लभवस्तुसंग्रहालयः [पुं.] | अद्भुतालयः [पुं.]
    अजीभोः [अव्यय] | अयि [अव्यय] | अङ्गे [अव्यय]
    अजीजप्रियः [विशेषण] | तातः [पुं.] | वत्सः [पुं.]
    अजीबअसाधारणः [विशेषण] | अपूर्वः [विशेषण] | विचित्रः [विशेषण]
    अजूबाअद्भुतम् [नपुं.] | कौतुकम् [नपुं.]
    अजेयअजय्यः [विशेषण] | अजेयः [विशेषण]
    अजोड़अतुलः [विशेषण] | अनुपमः [विशेषण]
    अज्ञानअविद्या [स्त्री.] | जाड्यम् [नपुं.] | अज्ञानम् [नपुं.]
    अटकनाअवरोधः [पुं.] (अव् + रुध् [धातु]) | सज्जतः (सञ्ज [धातु])
    अटकलतर्कः [पुं.] | अनुमानम् [नपुं.]
    अन्दाजातर्कः [पुं.] | अनुमानम् [नपुं.]
    अटकलपच्चूकपोलकल्पना [स्त्री.] | अनुमानम् [नपुं.] | काल्पनिकः [विशेषण]
    अटलअचलः [विशेषण] | अचरः [विशेषण] | स्थिरः [विशेषण]
    अटानाभरणम् [नपुं.] (भृ [धातु])
    अटारीअट्टालिका [स्त्री.]
    अट्टसट्टप्रलापः [पुं.] | असम्बद्धभाषणम् [नपुं.]
    अट्टहासअट्टहास्यम् [नपुं.] | अट्टहासः [पुं.]
    अट्ठाइसअष्टविंशतिः [स्त्री.]
    अट्ठानबेअष्टनवतिः [स्त्री.]
    अट्ठावनअष्टपञ्चाशत् [स्त्री.]
    अट्ठासीअष्टाशीतिः [स्त्री.]
    अठवारासप्ताहः [पुं.]
    अठहत्तरअष्टसप्ततिः [स्त्री.]
    अठारहअष्टादश [विशेषण]
    अठारहवाँअष्टादशः [विशेषण] | अष्टादशी [विशेषण] | अष्टादशम् [विशेषण]
    अड़ंगाबाधा [स्त्री.] | अवरोधः [पुं.]
    अड़चनविघ्नः [पुं.] | बाधा [स्त्री.]
    अड़तालीसअष्टचत्वारिंशत् [स्त्री.]
    अड़तीसअष्टात्रिंशत् [स्त्री.]
    अड़नाअवरोधः [पुं.] (अव् + रुध् [धातु]) | विरामः [पुं.] (वि + रम् [धातु])
    अड़बंगावक्रः [विशेषण] | कुटिलः [विशेषण] | दुर्गमः [विशेषण] | विकटः [विशेषण]
    अड़सठअष्टषष्टिः [स्त्री.]
    अड़ाड़बहिर्गोष्ठम् [नपुं.]
    अड़ारकाष्ठराशिः [पुं.] | राशिः [पुं.]
    अडिगनिश्चलः [विशेषण] | स्थिरः [विशेषण] | दृढः [विशेषण]
    अड़ियलहठी [विशेषण]
    अडोलअचलः [विशेषण] | स्थिरः [विशेषण] | स्थावरः [विशेषण]
    अड़ोस-पड़ोसप्रतिवेशः [पुं.] | समीपस्थानम् [नपुं.] | सामन्तम् [नपुं.]
    अड्डासमागमस्थानम् [नपुं.] | निवासस्थानम् [नपुं.]
    अढ़ाईसार्धद्वयम् [नपुं.] | द्वयर्धः [पुं.]
    अणुअणुः [पुं.] | सूक्ष्मः [विशेषण] | स्वल्पः [विशेषण] | ईषत् [अव्यय]
    अत एवअत एव [अव्यय] | अस्मादेव कारणात् [अव्यय] | अनेनैव हेतुना [अव्यय]
    अतरइत्रम् [नपुं.] | सुवासः [पुं.] | सारः [पुं.]
    अतिथिअतिथिः [पुं.] | प्राघूर्णः [पुं.]
    पाहुनप्राघूर्णः [पुं.] | अतिथिः [पुं.]
    अतिरिक्तअतिरिक्तः [विशेषण] | विना [अव्यय] | ऋते [अव्यय] | विहाय [अव्यय] | अवशिष्टः [विशेषण] | भिन्नः [विशेषण] | पृथक् [अव्यय]
    अतिसारअतिसारः [पुं.] | प्रवाहिका [स्त्री.]
    अतीतअतीतः [विशेषण] | गतः [विशेषण] | व्यतीतः [विशेषण] | विरक्तः [विशेषण] | मृतः [विशेषण] | दिवंगतः [विशेषण]
    अतीवअतीव [अव्यय] | अत्यधिकम् [विशेषण/क्रियाविशेषण] | बहु [विशेषण/अव्यय] | प्रभूतः [विशेषण]
    अतुलअतुलः [विशेषण] | अत्यधिकः [विशेषण] | अतुल्यः [विशेषण]
    अत्तारगन्धिकः [पुं.] | रसविक्रेता [पुं.] | भेषजकारः [पुं.]
    अत्याचारअन्यायः [पुं.] | दुराचारः [पुं.] | पापम् [नपुं.]
    अथवाअथवा [अव्यय] | वा [अव्यय]
    अथाहअगाधः [विशेषण] | गम्भीरः [विशेषण] | गहनः [विशेषण]
    अददसङ्ख्या [स्त्री.] | एककम् [नपुं.]
    अदनातुच्छः [विशेषण] | साधारणः [विशेषण]
    अदबशिष्टाचारः [पुं.] | शिष्टता [स्त्री.] | विनयः [पुं.]
    अदम्यप्रचण्डः [विशेषण] | अजेयः [विशेषण] | दुर्दमः [विशेषण]
    अदरकआर्द्रकम् [नपुं.] | गुल्ममूलम् [नपुं.]
    अदलनिर्दलः [विशेषण] | निष्पत्रः [विशेषण]
    अदल-बदलविनियमः [पुं.]
    अदालीला [स्त्री.] | विभ्रमः [पुं.] | प्रकारः [पुं.] | विधिः [पुं.] | दत्तम् [नपुं.] | शोधितम् [नपुं.]
    अदालतन्यायालयः [पुं.]
    अदालतीआधिकरणिकः [विशेषण] | न्यायालयसम्बन्धी [विशेषण]
    अदीठअदृष्टः [विशेषण]
    अदीनअकातरः [विशेषण] | उदारः [विशेषण] | तेजस्वी [विशेषण]
    अदृश्यपरोक्षः [विशेषण] | अगोचरः [विशेषण] | अलक्ष्यः [विशेषण] | अदृश्यः [विशेषण]
    अदृष्टअन्तर्हितः [विशेषण] | लुप्तः [विशेषण] | अलक्षितः [विशेषण] | अदृष्टम् [नपुं.]
    अदेहअकायः [विशेषण/पुं.] | अशरीरः [विशेषण/पुं.] | कामदेवः [पुं.] | मदनः [पुं.]
    अद्वितीयअतुल्यः [विशेषण] | अनुपमः [विशेषण] | अद्वितीयः [विशेषण]
    अद्वैतभेदाभावः [पुं.] | ब्रह्मजीवयोरैक्यम् [नपुं.] | अद्वैतम् [नपुं.]
    अधःपतननीचैः पतनम् [नपुं.] | अवनतिः [स्त्री.] | दुर्दशा [स्त्री.] | दुर्गतिः [स्त्री.] | विनाशः [पुं.] | क्षयः [पुं.]
    अधकच्चाअपक्वः [विशेषण] | अपूर्णः [विशेषण]
    अधकचराअपक्वः [विशेषण] | अपूर्णः [विशेषण]
    अधकपारीअर्धकपाली [स्त्री.]
    अधखिलाअर्धप्रस्फुटितः [विशेषण]
    अधखुलाअर्धविवृतः [विशेषण] | अर्धोन्मीलितः [विशेषण] | अर्धापावृतः [विशेषण]
    अधबटाईअर्धार्धबण्टनम् [नपुं.]
    अधमनीचः [विशेषण] | निकृष्टः [विशेषण] | दुष्टः [विशेषण] | अधमः [विशेषण]
    अधमरामृतप्रायः [विशेषण]
    अधमर्णऋणी [पुं.] | अधमर्णः [पुं.]
    अधर्मीपापी [विशेषण] | पातकी [विशेषण] | अधर्मी [विशेषण]
    अधिकबहु [विशेषण/अव्यय] | अतिरिक्तः [विशेषण] | अधिकः [विशेषण]
    अधिकतरबहुधा [अव्यय] | प्रायः [अव्यय] | अधिकतरम् [अव्यय]
    अधिकांशअधिकभागः [पुं.] | बहुलः [विशेषण]
    अधिकानावर्धनम् [नपुं.] (वृध् [धातु])
    अधिकारप्रभुत्वम् [नपुं.] | स्वत्वम् [नपुं.] | स्वामित्वम् [नपुं.] | अधिकारः [पुं.]
    अधिकार करनाअधिकारः [पुं.] (अधि + कृ [धातु])
    अधिकारीप्रभुः [पुं.] | स्वामी [पुं.] | स्वत्ववान् [विशेषण] | योग्यः [विशेषण] | क्षमः [विशेषण] | अधिकारी [पुं.]
    अधिकृतहस्तगतः [विशेषण] | उपलब्धः [विशेषण] | अध्यक्षः [पुं.] | अधिकारी [पुं.] | अधिकृतः [विशेषण]
    अधियानाअर्धीकरणम् [नपुं.] (अर्ध [नामधातु])
    अधियारअर्धार्धभागी [पुं.]
    अधिवेशनसङ्गः [पुं.] | सङ्गमः [पुं.] | गोष्ठी [स्त्री.] | समागमः [पुं.] | अधिवेशनम् [नपुं.]
    अधिष्ठाताअध्यक्षः [पुं.] | निर्वाहकः [पुं.] | प्रणेता [पुं.] | व्यवस्थापकः [पुं.] | अवेक्षकः [पुं.] | प्रवर्तकः [पुं.] | चालकः [पुं.] | अधिष्ठाता [पुं.]
    अधीनआश्रितः [विशेषण] | वशीभूतः [विशेषण] | अधीनः [विशेषण]
    अधीनतापरवशता [स्त्री.] | परतन्त्रता [स्त्री.] | अधीनता [स्त्री.]
    अधीरअधीरः [विशेषण] | उत्सुकः [विशेषण] | व्यग्रः [विशेषण]
    अधूराअपूर्णः [विशेषण] | असमाप्तः [विशेषण]
    अधेड़गतयौवनः [विशेषण] | प्रौढः [विशेषण]
    अधोगतिपतनम् [नपुं.] | अवपातः [पुं.] | विनिपातः [पुं.] | अवनतिः [स्त्री.] | क्षयः [पुं.] | दुर्दशा [स्त्री.] | अधोगतिः [स्त्री.]
    अध्यक्षस्वामी [पुं.] | प्रभुः [पुं.] | नायकः [पुं.] | अधिकारी [पुं.] | अध्यक्षः [पुं.]
    अध्ययनपठनम् [नपुं.] | पाठः [पुं.] | अधीतिः [स्त्री.] | वाचनम् [नपुं.] | अध्यायः [पुं.] | अध्ययनम् [नपुं.]
    अध्ययन करनाअध्ययनम् [नपुं.] (अधि + इ [धातु])
    अध्यवसाययत्नः [पुं.] | उद्यमः [पुं.] | अध्यवसायः [पुं.]
    अध्यापकअध्यापकः [पुं.]
    अध्यायसर्गः [पुं.] | परिच्छेदः [पुं.] | प्रकरणम् [नपुं.] | अध्यायः [पुं.]
    अध्येतव्यपठनीयः [विशेषण] | पठितव्यः [विशेषण] | अध्ययनार्हः [विशेषण] | पाठ्यः [विशेषण] | अध्येयः [विशेषण]
    अध्येतापाठकः [पुं.] | विद्यार्थी [पुं.] | अध्येता [पुं.]
    अध्वरयज्ञः [पुं.] | यागः [पुं.] | मखः [पुं.] | सवः [पुं.] | क्रतुः [पुं.]
    अनंतरपश्चात् [अव्यय] | अनन्तरम् [अव्यय]
    अनगिनतअगणितः [विशेषण] | असङ्ख्यः [विशेषण]
    अनचाहाअनिच्छितः [विशेषण]
    अनजानअज्ञः [विशेषण] | अनभिज्ञः [विशेषण] | अपरिचितः [विशेषण]
    अनदेखाअदृष्टः [विशेषण] | अदृश्यः [विशेषण] | अलक्ष्यः [विशेषण]
    अनन्तअमितः [विशेषण] | अपारः [विशेषण] | अपरिमितः [विशेषण] | निःसीमः [विशेषण] | विष्णुः [पुं.] | आकाशः [पुं.] | शेषनागः [पुं.] | अनन्तः [विशेषण/पुं.]
    अनन्यअभिन्नः [विशेषण] | निर्विशेषः [विशेषण] | समः [विशेषण] | समानः [विशेषण]
    अनन्यचित्तएकाग्रः [विशेषण] | एकाग्रचित्तः [विशेषण]
    अनपढ़अशिक्षितः [विशेषण] | निरक्षरः [विशेषण]
    अनबनवैरम् [नपुं.] | शत्रुता [स्त्री.] | मनोमालिन्यम् [नपुं.]
    अनब्याहाअविवाहितः [विशेषण]
    अनभलअनिष्टम् [नपुं.] | अशुभम् [नपुं.]
    अनभिज्ञअज्ञः [विशेषण] | अबोधः [विशेषण] | अनभिज्ञः [विशेषण]
    अनमनाउदासीनः [विशेषण] | खिन्नः [विशेषण] | शोकाकुलः [विशेषण]
    अनमेलविषमः [विशेषण] | प्रतिकूलः [विशेषण] | असम्बद्धः [विशेषण]
    अनमोलअमूल्यः [विशेषण] | बहुमूल्यः [विशेषण]
    अनरसापूपः [पुं.] | अपूपः [पुं.] | पिष्टकः [पुं.]
    अनरीतिनियमविरोधः [पुं.] | कुरीतिः [स्त्री.]
    अनर्गलनिरङ्कुशः [विशेषण] | उद्दामः [विशेषण] | विवेकशून्यः [विशेषण]
    अनर्घबहुमूल्यः [विशेषण] | अनर्घः [विशेषण]
    अनर्थविपरीतार्थः [पुं.] | अनिष्टम् [नपुं.] | कार्यहानिः [स्त्री.] | अनर्थः [पुं.]
    अनर्हअयोग्यः [विशेषण] | अनधिकारी [विशेषण/पुं.] | अपात्रम् [नपुं.]
    अनलअग्निः [पुं.] | अनलः [पुं.]
    अनवरतनिरन्तरम् [अव्यय] | सततम् [अव्यय] | सदा [अव्यय]
    अनशनउपवासः [पुं.] | अन्नत्यागः [पुं.] | निराहारव्रतम् [नपुं.]
    अनसुनीअश्रुतः [विशेषण] | अनाकर्णितः [विशेषण]
    अनहितअप्रियः [विशेषण] | अहितकारी [विशेषण] | अपकारः [पुं.]
    अनहोनीअलौकिकघटना [स्त्री.] | असम्भववार्ता [स्त्री.]
    अनाजअन्नम् [नपुं.] | धान्यम् [नपुं.]
    अनाड़ीअनार्यः [विशेषण] | अज्ञानी [विशेषण] | मूर्खः [विशेषण] | मूढः [विशेषण] | जडः [विशेषण]
    अनाथअशरणः [विशेषण] | असहायः [विशेषण] | निराश्रयः [विशेषण] | अनाथः [विशेषण/पुं.]
    अनाथालयअनाथाश्रमः [पुं.] | अनाथालयः [पुं.]
    अनादरतिरस्कारः [पुं.] | अवज्ञा [स्त्री.] | अपमानः [पुं.] | अनादरः [पुं.]
    अनादर करनाअनादरः [पुं.] (अन् + आ + दृ [धातु]) | तिरस्कारः [पुं.] (तिरस् + कृ [धातु])
    अनादिसततः [विशेषण] | नित्यः [विशेषण] | शाश्वतः [विशेषण] | अनादिः [विशेषण]
    अनानासअनानासम् [नपुं.]
    अनापशनापअनर्थकवार्ता [स्त्री.] | प्रलापः [पुं.]
    अनायासअनायासः [पुं.] | परिश्रमं विना [अव्यय] | सहसा [अव्यय] | अकस्मात् [अव्यय]
    अनारदाडिमम् [नपुं.]
    अनावश्यकनिष्प्रयोजनः [विशेषण] | अनपेक्षितः [विशेषण] | असारः [विशेषण] | क्षुद्रः [विशेषण] | उपेक्षणीयः [विशेषण]
    अनित्यनश्वरः [विशेषण] | अस्थायी [विशेषण] | अनित्यः [विशेषण]
    अनिवार्यअवश्यम्भावी [विशेषण] | अपरिहार्यः [विशेषण] | ध्रुवः [विशेषण] | परमावश्यकः [विशेषण]
    अनिश्चितअनियतः [विशेषण] | अनिर्धारितः [विशेषण] | अनिर्दिष्टः [विशेषण] | अनिश्चितः [विशेषण]
    अनिष्टअनपेक्षितः [विशेषण] | अवाञ्छितः [विशेषण] | अनभिलषितः [विशेषण] | अमङ्गलम् [नपुं.] | अहितम् [नपुं.] | हानिः [स्त्री.] | अनिष्टः [विशेषण/पुं.]
    अनुकरणअनुकृतिः [स्त्री.] | अनुकरणम् [नपुं.] (अनु + कृ [धातु]) | अनुकारः [पुं.] | अनुवृत्तिः [स्त्री.] | अनुसरणम् [नपुं.]
    अनुकरणीयअनुकरणार्हः [विशेषण] | अनुसरणीयः [विशेषण]
    अनुक्रमअन्वयः [पुं.] | आनुपूर्व्यम् [नपुं.] | परम्परा [स्त्री.] | अनुक्रमः [पुं.]
    अनुगमनअनुसरणम् [नपुं.] (अनु + गम् [धातु]) | अनुगतिः [स्त्री.] | अनुकरणम् [नपुं.] | सहवासः [पुं.] | सम्भोगः [पुं.]
    अनुगामीअनुयायी [विशेषण/पुं.] | अनुवर्ती [विशेषण/पुं.] | अनुकारी [विशेषण/पुं.] | आज्ञापालकः [विशेषण/पुं.] | सम्भोगी [विशेषण/पुं.] | अनुकर्ता [विशेषण/पुं.]
    अनुगृहीतउपकृतः [विशेषण] | कृतज्ञः [विशेषण] | अनुगृहीतः [विशेषण]
    अनुचरसेवकः [पुं.] | किङ्करः [पुं.] | दासः [पुं.] | वयस्यः [पुं.] | सहचरः [पुं.]
    अनुचितअयोग्यः [विशेषण] | अयुक्तः [विशेषण] | अनुचितः [विशेषण]
    अनुजकनीयान् भ्राता [पुं.] | पश्चादुत्पन्नः [विशेषण/पुं.] | स्थलपद्मम् [नपुं.] | अनुजः [पुं.]
    अनुजीवीआश्रितः [विशेषण] | अधीनः [विशेषण] | आयत्तः [विशेषण] | सेवकः [पुं.] | दासः [पुं.] | अनुजीवी [पुं.]
    अनुनयविनयः [पुं.] | आवेदनम् [नपुं.] | अनुनयः [पुं.]
    अनुपमअप्रतिमः [विशेषण] | निरुपमः [विशेषण] | अतुलः [विशेषण] | अतुल्यः [विशेषण] | असदृशः [विशेषण] | अप्रतिरूपः [विशेषण] | अद्वितीयः [विशेषण] | अनुपमेयः [विशेषण] | अनुपमः [विशेषण]
    अनुपस्थितिअसन्निधिः [स्त्री.] | परोक्षता [स्त्री.] | अनुपस्थितिः [स्त्री.]
    अनुपातसम्बन्धसाम्यम् [नपुं.] | आनुगुण्यम् [नपुं.] | त्रैराशिकक्रिया [स्त्री.] | अनुपातः [पुं.]
    अनुभवज्ञानम् [नपुं.] | बोधः [पुं.] | अनुभूतिः [स्त्री.] | प्रतीतिः [स्त्री.] | अनुभवः [पुं.]
    अनुभवीबहुदर्शी [विशेषण] | परिणतप्रज्ञः [विशेषण] | सानुभवः [विशेषण] | अनुभवी [विशेषण]
    अनुमानअनुमानम् [नपुं.] (अनु + मा [धातु]) | तर्कः [पुं.]
    अनुरक्तआसक्तचित्तः [विशेषण] | बद्धानुरागः [विशेषण] | अनुरागी [विशेषण] | कृतप्रणयः [विशेषण] | लीनः [विशेषण] | मग्नः [विशेषण] | अनुरक्तः [विशेषण]
    अनुरागस्नेहः [पुं.] | रागः [पुं.] | प्रीतिः [स्त्री.] | रुचिः [स्त्री.] | अनुरागः [पुं.]
    अनुरोधआग्रहः [पुं.] | निर्बन्धः [पुं.] | अभिनिवेशः [पुं.] | प्रेरणा [स्त्री.] | विघ्नः [पुं.] | अनुरोधः [पुं.]
    अनुवादभाषान्तरम् [नपुं.] | पुनरुक्तिः [स्त्री.] | पुनर्वचनम् [नपुं.] | अनुवादः [पुं.]
    अनुवादकभाषान्तरकारः [पुं.] | अनुवादकः [पुं.]
    अनुसरणअनुगमनम् [नपुं.] (अनु + सृ [धातु]) | सहगमनम् [नपुं.] | अनुकरणम् [नपुं.] | अनुकूलाचरणम् [नपुं.] | अनुसरणम् [नपुं.]
    अनूठाविचित्रः [विशेषण] | अपूर्वः [विशेषण] | अद्भुतः [विशेषण]
    अनूदितपुनःकथितः [विशेषण] | पुनःवर्णितः [विशेषण] | भाषान्तरितः [विशेषण] | अनूदितः [विशेषण]
    अनूप (अनुपम)अनुपमः [विशेषण] | अद्वितीयः [विशेषण]
    अनूप (जलबहुल)जलप्रायदेशः [पुं.] | जलबहुलः [विशेषण/पुं.] | जलप्रायः [विशेषण] | अनूपः [पुं.]
    अनृतअसत्यम् [नपुं.] | अनृतम् [नपुं.]
    अनृशंसदयावान् [विशेषण] | अनृशंसः [विशेषण]
    अनेकएकाधिकः [विशेषण] | बहु [विशेषण/अव्यय] | अनेकः [विशेषण]
    अनेक प्रकार सेबहुधा [अव्यय] | अनेकशः [अव्यय]
    अनेक बारअसकृत् [अव्यय] | अनेकवारम् [अव्यय]
    अनोखाविचित्रः [विशेषण] | अनोखः [विशेषण]
    अन्तर्यामीअन्तःकरणनियामकः [विशेषण/पुं.] | मनोभावज्ञः [विशेषण/पुं.] | परमेश्वरः [पुं.] | आत्मा [पुं.] | अन्तर्यामी [पुं.]
    अन्धकारतिमिरम् [नपुं.] | अन्धकारः [पुं.]
    अन्धेरी राततमिस्रा [स्त्री.] | तमिः [स्त्री.]
    अन्नअन्नम् [नपुं.]
    अन्न (खेत में)शस्यम् [नपुं.]
    अन्वर्थअर्थानुसारी [विशेषण] | सार्थकः [विशेषण] | अन्वर्थः [विशेषण]
    अन्वितयुक्तः [विशेषण] | सहितः [विशेषण] | सङ्गतः [विशेषण] | अन्वितः [विशेषण]
    अन्वेषणअनुसन्धानम् [नपुं.] (अनु + इष् [धातु]) | अन्वेषणम् [नपुं.]
    अपकारअभद्रम् [नपुं.] | अहितम् [नपुं.] | अनिष्टसाधनम् [नपुं.] | व्यलीकम् [नपुं.] | अपकारः [पुं.]
    अपचअजीर्णम् [नपुं.] | अपचः [पुं.]
    अपत्यसन्तानः [पुं.] | सन्ततिः [स्त्री.] | प्रसूतिः [स्त्री.] | प्रजा [स्त्री.] | प्रसवः [पुं.] | तोकम् [नपुं.] | अपत्यम् [नपुं.]
    अपनास्वकीयः [विशेषण] | निजः [विशेषण] | स्वः [विशेषण] | स्वम् [नपुं.] | निजम् [नपुं.]
    अपनानाआत्मीकरणम् [नपुं.] (आत्मन् + कृ [धातु]) | आत्मसात्करणम् [नपुं.]
    अपनापनआत्मीयता [स्त्री.] | ममता [स्त्री.] | आत्माभिमानः [पुं.]
    अपने समानआत्मवत् [अव्यय]
    अपभ्रंशपतनम् [नपुं.] | अवनतिः [स्त्री.] | विकारः [पुं.] | विकृतशब्दः [पुं.] | प्राकृतभाषाभेदः [पुं.] | विकृतः [विशेषण] | अपभ्रंशः [पुं.]
    अपयशकलङ्कः [पुं.] | अकीर्तिः [स्त्री.] | अपयशः [नपुं.]
    अपराधपापम् [नपुं.] | दोषः [पुं.] | प्रमादः [पुं.] | अपराधः [पुं.]
    अपवादविरोधः [पुं.] | प्रतिवादः [पुं.] | निन्दा [स्त्री.] | अपकीर्तिः [स्त्री.] | दोषः [पुं.] | पापम् [नपुं.] | बाधकशास्त्रम् [नपुं.] | अपवादः [पुं.]
    अपवित्रअमेध्यः [विशेषण] | अशुद्धः [विशेषण] | अपवित्रः [विशेषण]
    अपवित्रताधर्महीनता [स्त्री.] | पापशीलता [स्त्री.] | मलिनता [स्त्री.] | अशुचिता [स्त्री.] | अपवित्रता [स्त्री.]
    अपशकुनकुलक्षणम् [नपुं.] | अशुभलक्षणम् [नपुं.] | दुर्लक्षणम् [नपुं.] | अजन्यम् [नपुं.] | दुश्चिह्नम् [नपुं.] | अपशकुनम् [नपुं.]
    अपशब्दगाली [स्त्री.] | अपवादः [पुं.] | अशुद्धपदम् [नपुं.] | निरर्थकशब्दः [पुं.] | अपशब्दः [पुं.]
    अपस्मारअपस्मारः [पुं.] | भ्रामरम् [नपुं.] | अङ्गविकृतिः [स्त्री.] | भूतविक्रिया [स्त्री.]
    अपहरणअपहारः [पुं.] (अप् + हृ [धातु]) | मोषणम् [नपुं.] | विलुण्ठनम् [नपुं.] | सगोपनम् [नपुं.] | लोप्त्रम् [नपुं.] | अपहरणम् [नपुं.]
    अपारअनन्तः [विशेषण] | अमितः [विशेषण] | अपारः [विशेषण]
    अपाहिजविकलाङ्गः [विशेषण/पुं.] | विकलः [विशेषण] | व्यङ्गः [विशेषण/पुं.] | हीनाङ्गः [विशेषण/पुं.]
    अपीलपुनर्विचारप्रार्थना [स्त्री.] | प्रमाणीकरणम् [नपुं.] | पुनरावेदनम् [नपुं.]
    अपूर्वअभूतपूर्वः [विशेषण] | अदृष्टपूर्वः [विशेषण] | अद्भुतः [विशेषण] | अलौकिकः [विशेषण] | अनुपमः [विशेषण] | श्रेष्ठः [विशेषण] | अपूर्वः [विशेषण]
    अपूर्वताविलक्षणता [स्त्री.] | लोकोत्तरता [स्त्री.] | अपूर्वता [स्त्री.]
    अपेक्षाआकाङ्क्षा [स्त्री.] | इच्छा [स्त्री.] | अभिलाषः [पुं.] | आवश्यकता [स्त्री.] | अपेक्षा [स्त्री.] | तुलनया [अव्यय] | अपेक्षया [अव्यय]
    अपेक्षा करनाअपेक्षा [स्त्री.] (अप् + ईक्ष् [धातु])
    अप्रामाणिकअविश्वसनीयः [विशेषण] | अप्रामाणिकः [विशेषण]
    अप्रेंटिसअन्तेवासी [पुं.] | शिष्यः [पुं.] | शिल्पविद्यार्थी [पुं.]
    अप्सराअप्सरा [स्त्री.] | स्वर्वेश्या [स्त्री.]
    अफरनाजठरातिभरणम् [नपुं.] (जठर + अति + भृ [धातु]) | अतिभोजनम् [नपुं.]
    अफरातफरीसंक्षोभः [पुं.] | अव्यवस्था [स्त्री.] | सम्भ्रमः [पुं.] | आकुलत्वम् [नपुं.]
    अफवाहकिंवदन्ती [स्त्री.] | जनश्रुतिः [स्त्री.] | प्रवादः [पुं.] | जनप्रवादः [पुं.]
    अफसरअधिकारी [पुं.]
    अफसोसखेदः [पुं.] | शोकः [पुं.]
    अफीमअहिफेनः [पुं.] | अफेनम् [नपुं.]
    अबइदानीम् [अव्यय] | साम्प्रतम् [अव्यय] | अधुना [अव्यय] | सम्प्रति [अव्यय]
    अब तकएतावत्कालम् [अव्यय] | अद्यापि [अव्यय] | अद्यावधि [अव्यय]
    अब भीअधुनापि [अव्यय] | इदानीमपि [अव्यय]
    अब सेअतः [अव्यय] | इतःपरम् [अव्यय] | अद्यप्रभृति [अव्यय]
    अबइदानीम् [अव्यय] | सम्प्रति [अव्यय] | अधुना [अव्यय]
    इस समयइदानीम् [अव्यय] | सम्प्रति [अव्यय] | अधुना [अव्यय]
    अब-तब होनामृत्युमुखे पतनम् [नपुं.] | आसन्नमरणः [विशेषण]
    अबरकअभ्रकम् [नपुं.]
    अबलानारी [स्त्री.] | स्त्री [स्त्री.] | अबला [स्त्री.]
    अबाधनिर्विघ्नः [विशेषण] | निर्बाधः [विशेषण] | असीमः [विशेषण]
    अबूझअज्ञः [विशेषण] | अबोधः [विशेषण]
    अबेअरे [अव्यय] | हे [अव्यय] | अयि [अव्यय]
    अबेरविलम्बः [पुं.] | अबेरः [पुं.]
    अब्तरअधमः [विशेषण] | निकृष्टः [विशेषण]
    अब्दवर्षम् [नपुं.] | अब्दः [पुं.]
    अब्धिसमुद्रः [पुं.] | तडागः [पुं.] | सप्तेतिसङ्ख्या [स्त्री.] | अब्धिः [पुं.]
    अभागदुर्भाग्यम् [नपुं.] | दुर्दैवम् [नपुं.] | मन्दभाग्यम् [नपुं.]
    अभागाउपहतकः [विशेषण] | मन्दभाग्यः [विशेषण] | हतभाग्यः [विशेषण]
    अभावसत्ताभावः [पुं.] | अविद्यमानता [स्त्री.] | अभावः [पुं.]
    अभिकामइच्छा [स्त्री.] | कामः [पुं.] | अभिकामः [पुं.]
    अभिक्रोशनिन्दा [स्त्री.] | अभिक्रोशः [पुं.]
    अभिख्यातप्रसिद्धः [विशेषण] | अभिख्यातः [विशेषण]
    अभिचारमन्त्रैः मारणोच्चाटनादिक्रिया [स्त्री.] | अभिचारः [पुं.]
    अभिजातकुलीनः [विशेषण] | पण्डितः [विशेषण] | श्रेष्ठः [विशेषण] | अभिजातः [विशेषण]
    अभिज्ञानस्मृतिः [स्त्री.] | अनुबोधः [पुं.] | लक्षणम् [नपुं.] | स्मारकचिह्नम् [नपुं.] | अभिज्ञानम् [नपुं.]
    अभिनयनाट्यम् [नपुं.] | अङ्गविक्षेपः [पुं.] | अवस्थानुकृतिः [स्त्री.] | नाटकक्रीडा [स्त्री.] | अभिनयः [पुं.]
    अभिनय करनाअभिनयः [पुं.] (अभि + नी [धातु]) | नाट्यम् [नपुं.] (नट् [धातु])
    अभिन्नअविभक्तः [विशेषण] | सँलग्नः [विशेषण] | संसृष्टः [विशेषण] | अभिन्नः [विशेषण]
    अभिभवतिरस्कारः [पुं.] | पराजयः [पुं.] | अपमानः [पुं.] | अभिभवः [पुं.]
    अभिभावकपरिरक्षकः [पुं.] | अभिभावकः [पुं.]
    अभिभूतपराजितः [विशेषण] | विजितः [विशेषण] | पीडितः [विशेषण] | वशीभूतः [विशेषण] | व्याकुलः [विशेषण] | अभिभूतः [विशेषण]
    अभिमतइष्टः [विशेषण] | मनोनीतः [विशेषण] | वाञ्छितः [विशेषण] | सम्मतः [विशेषण] | मतम् [नपुं.] | मतिः [स्त्री.] | विचारः [पुं.] | अभीष्टपदार्थः [पुं.] | अभिमतः [विशेषण]
    अभिमानगर्वः [पुं.] | अभिमानः [पुं.]
    अभिमान करनाअभिमानः [पुं.] (अभि + मन् [धातु]) | गर्वः [पुं.] (गर्व् [नामधातु])
    अभियोगव्यवहारः [पुं.] | कार्यम् [नपुं.] | अक्षः [पुं.] | आक्रमणम् [नपुं.] | उद्योगः [पुं.] | मनोयोगः [पुं.] | अभियोगः [पुं.]
    अभिरुचिरुचिः [स्त्री.] | प्रवृत्तिः [स्त्री.] | कामः [पुं.] | अभिलाषः [पुं.] | छन्दः [नपुं.] | इच्छा [स्त्री.] | अभिरुचिः [स्त्री.]
    अभिलाषावाञ्छा [स्त्री.] | काङ्क्षा [स्त्री.] | स्पृहा [स्त्री.] | ईहा [स्त्री.] | लालसा [स्त्री.] | अभिलाषा [स्त्री.]
    अभिलेखलेखः [पुं.] | शिलालेखः [पुं.] | अभिलेखः [पुं.]
    अभिव्यक्तप्रकटितः [विशेषण] | दर्शितः [विशेषण] | स्पष्टीकृतः [विशेषण] | अभिव्यक्तः [विशेषण]
    अभिव्यक्तिप्रकाशनम् [नपुं.] | आविष्कारः [पुं.] | साक्षात्कारः [पुं.] | अभिव्यक्तिः [स्त्री.]
    अभिशप्तआक्रुष्टः [विशेषण] | शापग्रस्तः [विशेषण] | अभिशस्तः [विशेषण] | मिथ्यादूषितः [विशेषण] | अभिशप्तः [विशेषण]
    अभिशापशापः [पुं.] | आक्रोशः [पुं.] | दोषारोपः [पुं.] | मिथ्याभियोगः [पुं.] | अभिशापः [पुं.]
    अभिषिक्तस्नपितः [विशेषण] | प्रक्षालितः [विशेषण] | सिंहासने उपवेशितः [विशेषण] | यथाविधिनियुक्तः [विशेषण] | अभिषिक्तः [विशेषण]
    अभिषेकअभिषेचनम् [नपुं.] | प्रोक्षणम् [नपुं.] | आसेकः [पुं.] | अवसेकः [पुं.] | मार्जनम् [नपुं.] | सिंहासने स्थापनम् [नपुं.] | यज्ञानन्तरं शान्तये स्नानम् [नपुं.] | अभिषेकः [पुं.]
    अभिषेक करनाअभिषेकः [पुं.] (अभि + सिच् [धातु]) | अभिषेचनम् [नपुं.]
    अभिहितउक्तः [विशेषण] | कथितः [विशेषण] | उदितः [विशेषण] | अभिहितः [विशेषण]
    अभीअधुनैव [अव्यय] | अचिरेण [अव्यय]
    अभीरगोपालः [पुं.] | अभीरः [पुं.]
    अभीष्टवाञ्छितः [विशेषण] | अभिलषितः [विशेषण] | अभिप्रेतः [विशेषण] | मनोनीतः [विशेषण] | मनोरथः [पुं.] | अभीष्टः [विशेषण]
    अभूतअघटितः [विशेषण] | वर्तमानः [विशेषण] | विलक्षणः [विशेषण] | अभूतः [विशेषण]
    अभेदभेदाभावः [पुं.] | एकत्वम् [नपुं.] | अभिन्नता [स्त्री.] | समानता [स्त्री.] | भेदरहितः [विशेषण] | समानः [विशेषण] | अभेदः [पुं.]
    अभेद्यअच्छेद्यः [विशेषण] | अखण्डनीयः [विशेषण] | अभेदनीयः [विशेषण] | अभेद्यः [विशेषण]
    अभौतिकअप्राकृतिकः [विशेषण] | अगोचरः [विशेषण] | अभौतिकः [विशेषण]
    अभ्यागतउपस्थितः [विशेषण] | अतिथिः [पुं.] | अभ्यागतः [पुं.]
    अभ्यास करनाअभ्यासः [पुं.] (अभि + अस् [धातु]) | अनुशीलनम् [नपुं.]
    अभ्युदयसूर्यादीनामुदयः [पुं.] | प्रादुर्भावः [पुं.] | मनोरथसिद्धिः [स्त्री.] | शुभावसरः [पुं.] | उन्नतिः [स्त्री.] | अभ्युदयः [पुं.]
    अभ्रमेघः [पुं.] | जलदः [पुं.] | आकाशः [पुं.] | अभ्रकम् [नपुं.] | सुवर्णम् [नपुं.] | अभ्रम् [नपुं.]
    अभ्रकअभ्रकम् [नपुं.]
    अमचूरआम्रचूर्णम् [नपुं.]
    अमनशान्तिः [स्त्री.] | सुव्यवस्था [स्त्री.]
    अमरअमरः [विशेषण/पुं.] | अजरः [विशेषण/पुं.] | अनश्वरः [विशेषण] | नित्यः [विशेषण]
    अमरावतीइन्द्रपुरी [स्त्री.] | स्वर्गः [पुं.] | अमरावती [स्त्री.]
    अमरूदबीजपूरम् [नपुं.] | दृढबीजम् [नपुं.] | अमृतफलम् [नपुं.]
    अमर्षक्रोधः [पुं.] | रोषः [पुं.] | क्षमाभावः [पुं.] | असहिष्णुता [स्त्री.] | अमर्षः [पुं.]
    अमानतन्यासः [पुं.] | निक्षेपः [पुं.] | उपनिधिः [पुं.]
    अमावटशुष्काम्ररसः [पुं.]
    अमावसअमावस्या [स्त्री.] | अमावास्या [स्त्री.] | दर्शः [पुं.]
    अमावस्यादर्शः [पुं.] | अमावास्या [स्त्री.] | अमावस्या [स्त्री.]
    अमिटअक्षरः [विशेषण] | शाश्वतः [विशेषण] | अमार्जनीयः [विशेषण]
    अमीनभूमिमापकः [पुं.]
    अमीरधनी [विशेषण/पुं.] | कुलीनः [विशेषण/पुं.] | आर्यजनः [पुं.] | शिष्टजनः [पुं.]
    अमृतपीयूषम् [नपुं.] | अमृतम् [नपुं.] | सुधा [स्त्री.]
    अमोलअमूल्यः [विशेषण] | बहुमूल्यः [विशेषण]
    अयानाअबोधः [पुं.] | अज्ञानम् [नपुं.]
    अयालकेसरः [पुं.] | केशरः [पुं.]
    अरंडएरण्डः [पुं.]
    अरकआसवः [पुं.] | रसः [पुं.] | सूर्यः [पुं.] | अर्कः [पुं.]
    अरगनीवसनालम्बनी [स्त्री.] | वस्त्रालम्बनाय रज्जुः [स्त्री.]
    अरदलीपरिचारकः [पुं.] | किङ्करः [पुं.] | प्रेष्यः [पुं.]
    अरबअर्बुदः [पुं.] | अर्बुदम् [नपुं.] | अरबदेशः [पुं.]
    अरब देशवनायुदेशः [पुं.] | अरबदेशः [पुं.]
    अरब-खरबअसङ्ख्यः [विशेषण] | सङ्ख्यातीतः [विशेषण] | अगण्यः [विशेषण] | गणनातीतः [विशेषण]
    अरहरआढकी [स्त्री.]
    अराजकताराजविप्लवः [पुं.] | अराजकता [स्त्री.]
    अरीअयि [अव्यय]
    अरुचिघृणा [स्त्री.] | अरुचिः [स्त्री.]
    अरुझानासंसर्गः [पुं.] (सम् + सञ्ज [धातु]) | उलझनम् [नपुं.]
    अरेहे [अव्यय] | अहो [अव्यय] | अरे [अव्यय] | भोः [अव्यय] | हा [अव्यय] | हन्त [अव्यय]
    अर्कसूर्यः [पुं.] | विष्णुः [पुं.] | ब्रह्मा [पुं.] | द्वादशसङ्ख्या [स्त्री.] | अर्कः [पुं.]
    अर्गलाअर्गलम् [नपुं.] | अर्गला [स्त्री.]
    अर्घाअर्घपात्रम् [नपुं.] | अर्घा [स्त्री.]
    अर्ज़प्रार्थना [स्त्री.] | निवेदनम् [नपुं.]
    अर्ज़ (कपड़े की चौड़ाई)परिणाहः [पुं.] | आयामः [पुं.]
    अर्जितउपार्जितः [विशेषण] | सङ्गृहीतः [विशेषण] | सञ्चितः [विशेषण] | अर्जितः [विशेषण]
    अर्जीप्रार्थनापत्रम् [नपुं.] | निवेदनपत्रम् [नपुं.]
    अर्थअभिप्रायः [पुं.] | प्रयोजनम् [नपुं.] | तात्पर्यम् [नपुं.] | अर्थः [पुं.]
    अर्दलीभृत्यः [पुं.] | पदातिः [पुं.] | आनुषङ्गिकः [पुं.] | परिचरः [पुं.]
    अर्बुदम्अर्बुदम् [नपुं.] (दस करोड़ की संख्या या अरब)
    अर्वाचीननूतनः [विशेषण] | नातिपुराणः [विशेषण] | आधुनिकः [विशेषण] | अभिनवः [विशेषण] | अर्वाचीनः [विशेषण]
    अलखअदृश्यः [विशेषण] | अलक्ष्यः [विशेषण] | अगोचरः [विशेषण]
    अलगपृथक् [अव्यय] | भिन्नः [विशेषण] | विच्छिन्नः [विशेषण]
    अलग होनापृथग्भवनम् [नपुं.] (पृथक् + भू [धातु]) | रेचनम् [नपुं.] (रिच् [धातु])
    अलताअलक्तः [पुं.] | असक्तकः [पुं.]
    अलबमचित्रपञ्जिका [स्त्री.] | चित्रसङ्ग्रहः [पुं.]
    अलबेलारूपगर्वितः [विशेषण] | दम्भी [विशेषण]
    अलमारीउत्थितपिटकः [पुं.] | कपाटिका [स्त्री.]
    अलवानलोमवस्त्रम् [नपुं.] | कम्बली [स्त्री.]
    अलसानाआलस्यम् [नपुं.] (अल्स् [नामधातु]) | तन्द्रा [स्त्री.]
    अलसीअतसी [स्त्री.]
    अलापआलापः [पुं.] | रागः [पुं.] | तानः [पुं.] | स्वरः [पुं.]
    अलावाविना [अव्यय] | अतिरिक्तम् [अव्यय/विशेषण]
    अलीकमिथ्या [अव्यय] | असत्यम् [नपुं.] | अलीकम् [नपुं.]
    अलोनालवणरहितः [विशेषण] | नीरसः [विशेषण] | रसहीनः [विशेषण]
    अल्पायुस्वल्पायुः [विशेषण] | अदीर्घजीवी [विशेषण]
    अल्पाहारीसंयताहारी [विशेषण] | सामान्याहारः [विशेषण]
    अल्हड़प्रमत्तः [विशेषण] | अविवेकी [विशेषण]
    अवगतविदितः [विशेषण] | ज्ञातः [विशेषण] | बुद्धः [विशेषण] | परिचितः [विशेषण] | निगतः [विशेषण] | पतितः [विशेषण] | अवगतः [विशेषण]
    अवमतिअवज्ञा [स्त्री.] | तिरस्कारः [पुं.] | अवमतिः [स्त्री.]
    अवयवअङ्गम् [नपुं.] | अवयवः [पुं.]
    अवयस्कअप्राप्तवयस्कः [विशेषण] | अवयस्कः [विशेषण]
    अवसादग्लानिः [स्त्री.] | अवसादः [पुं.]
    अवसानविरामः [पुं.] | याननिवृत्तिः [स्त्री.] | विष्टम्भः [पुं.] | समाप्तिः [स्त्री.] | अन्तः [पुं.] | मृत्युः [पुं.] | सीमा [स्त्री.] | सायंकालः [पुं.] | अवसानम् [नपुं.]
    अवस्थादशा [स्त्री.] | वयः [नपुं.] | स्थितिः [स्त्री.] | अवस्था [स्त्री.]
    अवृष्टिअवग्रहः [पुं.] | अवृष्टिः [स्त्री.]
    अशोकअशोकः [पुं.] (वृक्ष या शोकहीन)
    अश्वशालामन्दुरा [स्त्री.] | अश्वशाला [स्त्री.]
    असंख्यअसंख्येयः [विशेषण] | असंख्यातः [विशेषण] | अगणितः [विशेषण] | असङ्ख्यः [विशेषण]
    असरप्रभावः [पुं.] | संस्कारः [पुं.]
    असलवास्तविकः [विशेषण] | यथार्थः [विशेषण] | सत्यः [विशेषण] | वास्तवः [विशेषण]
    असल मेंयथार्थतः [अव्यय] | परमार्थतः [अव्यय] | वस्तुतः [अव्यय]
    असलियतसत्यता [स्त्री.] | वास्तविकता [स्त्री.] | मूलम् [नपुं.] | तत्त्वम् [नपुं.] | सारः [पुं.] | असलियत [स्त्री.]
    असहनीयअसह्यः [विशेषण] | असहनीयः [विशेषण]
    असाढ़आषाढः [पुं.]
    असीसआशीर्वादः [पुं.] | आशिषः [स्त्री.]
    असोज मासआश्विनः [पुं.]
    अस्तबलअश्वशाला [स्त्री.] | मन्दुरा [स्त्री.] | स्थानकम् [नपुं.]
    अस्तरअन्तःपटः [पुं.] | आस्तरः [पुं.] | आस्तरणम् [नपुं.]
    अस्त्र शस्त्रआयुधम् [नपुं.] | अस्त्रशस्त्रम् [नपुं.]
    अस्थिर होनाभ्रमणम् [नपुं.] (भ्रम् [धातु]) | विचलकः [विशेषण]
    अस्थिसारमज्जा [स्त्री.] | अस्थिसारः [पुं.]
    अस्पतालआरोग्यशाला [स्त्री.] | चिकित्सालयः [पुं.]
    अस्वास्थ्यरोगः [पुं.] | व्याधिः [पुं.] | गदः [पुं.] | आमयः [पुं.] | अस्वास्थ्यम् [नपुं.]
    अस्सीअशीतिः [स्त्री.]
    अहंकारगर्वः [पुं.] | अहङ्कारः [पुं.] | दर्पः [पुं.]
    अहसानउपकारः [पुं.] | हितम् [नपुं.]
    अहातापरिसरभूमिः [स्त्री.] | प्राङ्गणम् [नपुं.] | प्राकारः [पुं.] | प्राचीरम् [नपुं.] | अहातः [पुं.]
    अहारआहारः [पुं.] | भोजनम् [नपुं.] | अन्नम् [नपुं.] | खाद्यम् [नपुं.]
    अहीरआभीरः [पुं.] | गोपः [पुं.] | गोपालः [पुं.]
    अहेरमृगया [स्त्री.] | आखेटः [पुं.]
    आ पड़नाआपतनम् [नपुं.] (आ + पत् [धातु])
    आँकचिह्नम् [नपुं.] | लक्षणम् [नपुं.] | अङ्कः [पुं.]
    आँख का तारातारका [स्त्री.] | कनीनिका [स्त्री.] | स्नेहभाजनम् [नपुं.] | एकलपुत्रः [पुं.]
    आँख की मैलदूषिका [स्त्री.] | अक्षिमलम् [नपुं.]
    आँख बंद करनाकाणनम् [नपुं.] (काण् [नामधातु]) | निमीलनम् [नपुं.] (नि + मील् [धातु])
    आँख मिचौलीअक्षितारकाक्रीडा [स्त्री.] | अक्षिमेषणी [स्त्री.] | बालक्रीडाभेदः [पुं.]
    आँखें मूँदनामीलनम् [नपुं.] (मील् [धातु]) | निमीलनम् [नपुं.] (नि + मील् [धातु])
    आँगनअजिरम् [नपुं.] | अङ्गनम् [नपुं.] | प्राङ्गणम् [नपुं.] | चत्वरम् [नपुं.]
    आँटाचूर्णम् [नपुं.] | पिष्टम् [नपुं.]
    आँतअन्त्रम् [नपुं.]
    आँधीझञ्झावातः [पुं.] | वात्या [स्त्री.]
    आँवआमः [पुं.] | आमातिसारः [पुं.]
    आँवलाआमलकी [स्त्री.] | आमलकम् [नपुं.] | आमलकः [पुं.]
    आँसूअश्रु [नपुं.] | अस्रम् [नपुं.] | वाष्पः [पुं.] | नेत्राम्बु [नपुं.] | नेत्रजलम् [नपुं.]
    आंकनाअनुमानम् [नपुं.] (अनु + मा [धातु]) | अङ्कनम् [नपुं.] (अङ्क् [धातु])
    आंकुशअङ्कुशः [पुं.]
    आंखनेत्रम् [नपुं.] | नयनम् [नपुं.] | लोचनम् [नपुं.] | चक्षुः [नपुं.]
    आंख के बालपक्ष्म [नपुं.] | पक्ष्मणि [नपुं.]
    आंचअग्निः [पुं.] | उष्णता [स्त्री.] | दाहः [पुं.] | तापः [पुं.]
    आंचलअञ्चलः [पुं.] | अञ्चलम् [नपुं.] | वस्त्रप्रान्तः [पुं.]
    आंजनअञ्जनम् [नपुं.] | कज्जलम् [नपुं.]
    आंटीतृणमुष्टिः [स्त्री.]
    आइनादर्पणः [पुं.] | आदर्शः [पुं.]
    आई. डी.परिचयपत्रम् [नपुं.]
    आउटपुटफलितम् [नपुं.] | उत्पादनम् [नपुं.]
    आकअर्कः [पुं.]
    आकांक्षाइच्छा [स्त्री.] | अपेक्षा [स्त्री.] | अभिलाषः [पुं.] | आकाङ्क्षा [स्त्री.]
    आकाशअन्तरिक्षम् [नपुं.] | गगनम् [नपुं.] | आकाशः [पुं.]
    आखिरअन्तः [पुं.] | पर्यन्तः [पुं.] | पर्यन्तम् [नपुं./अव्यय]
    आखिरकारअन्ते [अव्यय] | अन्ततः [अव्यय]
    आखिरीअन्तिमः [विशेषण] | अन्त्यः [विशेषण]
    आखुमूषकः [पुं.] | चौरः [पुं.] | आखुः [पुं.]
    आखेटआखेटः [पुं.] | मृगया [स्त्री.]
    आगकृशानुः [पुं.] | अग्निः [पुं.] | दहनः [पुं.] | अनलः [पुं.]
    आग भड़कानावैरोद्दीपनम् [नपुं.] | क्रोधोद्दीपनम् [नपुं.] | अग्न्युद्दीपनम् [नपुं.] (अग्नि + उद् + दिप् [धातु])
    आगन्तुकआगन्तुः [पुं.] | आगन्तुकः [पुं.]
    आगामीआगामी [विशेषण] | भावी [विशेषण] | भविष्यत् [विशेषण]
    आगेअग्रे [अव्यय] | पुरः [अव्यय] | पुरस्तात् [अव्यय] | पुरतः [अव्यय] | समक्षम् [अव्यय] | प्रत्यक्षम् [अव्यय]
    आगे-पीछा करनाविलम्बनम् [नपुं.] (वि + लम्ब् [धातु]) | उपेक्षणम् [नपुं.] (उप् + ईक्ष् [धातु]) | संशयनम् [नपुं.]
    आग्रहनिर्बन्धः [पुं.] | अभिनिवेशः [पुं.] | हठः [पुं.] | आवेशः [पुं.] | आग्रहः [पुं.]
    आघातआहतिः [स्त्री.] | आघातः [पुं.]
    आचारव्यवहारः [पुं.] | चरित्रम् [नपुं.] | आचारः [पुं.]
    आजअद्य [अव्यय]
    आज भीअद्यापि [अव्यय] | इदानीमपि [अव्यय]
    आज सेअद्यारभ्य [अव्यय] | अद्यप्रभृति [अव्यय]
    आज हीअद्यैव [अव्यय]
    आजकलसम्प्रति [अव्यय] | अधुनातनकाले [अव्यय] | एषु दिवसेषु [अव्यय] | आजकल [अव्यय]
    आजादमुक्तः [विशेषण] | स्वतन्त्रः [विशेषण] | आज़ादः [विशेषण]
    आजादीस्वतन्त्रता [स्त्री.] | मुक्तिः [स्त्री.] | आज़ादी [स्त्री.]
    आजीवनआजीवनम् [अव्यय] | आजन्म [अव्यय]
    आज्ञाअनुज्ञा [स्त्री.] | आदेशः [पुं.] | निदेशः [पुं.] | शासनम् [नपुं.] | अनुमतिः [स्त्री.] | आज्ञा [स्त्री.]
    आटागोधूमचूर्णम् [नपुं.] | चूर्णम् [नपुं.] | पिष्टम् [नपुं.]
    आठअष्ट [विशेषण] | अष्टौ [विशेषण]
    आठवाँअष्टमः [विशेषण] | अष्टमी [विशेषण] | अष्टमम् [विशेषण]
    आठोपहरअहर्निशम् [अव्यय] | रात्रिन्दिवम् [अव्यय] | दिवारात्रम् [अव्यय] | अनिशम् [अव्यय] | नक्तन्दिवम् [अव्यय]
    आड़प्रतिबन्धः [पुं.] | प्रतिकारः [पुं.] | प्रतिरोधः [पुं.] | आवरणम् [नपुं.]
    आडंबरआटोपः [पुं.] | अनावश्यकदर्शनम् [नपुं.] | आडम्बरः [पुं.]
    आड़ूआर्द्रालुः [पुं.]
    आढ़तअभिकरणम् [नपुं.] | नियोज्यत्वम् [नपुं.]
    आढ़तीकार्यनिर्वाहकः [पुं.] | प्रतिहस्तः [पुं.] | अभिकर्ता [पुं.]
    आतंकत्रासः [पुं.] | भयम् [नपुं.] | आतङ्कः [पुं.]
    आतपघर्मः [पुं.] | सूर्यतापः [पुं.] | आतपः [पुं.]
    आतशबाजीअग्निक्रीडाद्रव्याणि [नपुं.] | आग्नेयक्रीडनकम् [नपुं.]
    आतिथ्यअतिथिसत्कारः [पुं.] | आतिथ्यम् [नपुं.]
    आतुरव्याकुलः [विशेषण] | व्यग्रः [विशेषण] | उद्विग्नः [विशेषण] | आतुरः [विशेषण]
    आदतअभ्यासः [पुं.] | आचारः [पुं.] | व्यवहारः [पुं.] | नित्यक्रिया [स्त्री.] | नित्यप्रवृत्तिः [स्त्री.] | शीलम् [नपुं.] | स्वभावः [पुं.] | प्रकृतिः [स्त्री.]
    आदमीजनः [पुं.] | मनुष्यः [पुं.] | मानुषः [पुं.] | मनुजः [पुं.] | नरः [पुं.] | मानवः [पुं.] | पुरुषः [पुं.] | पूरुषः [पुं.] | मर्त्यः [पुं.]
    आदरसम्मानः [पुं.] | सत्कारः [पुं.] | अर्चा [स्त्री.] | आदरः [पुं.]
    आदर करनासत्कारः [पुं.] (सत् + कृ [धातु]) | पूजनम् [नपुं.] (पूज् [धातु])
    आदर पानासमादरलाभः [पुं.] (सम् + आ + दृ [धातु])
    आदीअभ्यस्तः [विशेषण] | अभ्यासी [विशेषण/पुं.]
    आदेश देनाआदेशः [पुं.] (आ + दिश् [धातु]) | अनुज्ञा [स्त्री.]
    आधाअर्धः [पुं.] | अर्धम् [नपुं.] | अर्धांशः [पुं.] | अर्धभागः [पुं.]
    आधानग्रहणम् [नपुं.] | स्थापनम् [नपुं.] | आधानम् [नपुं.]
    आधारित होनाआश्रयणम् [नपुं.] (आ + श्रि [धातु]) | आश्रितः [विशेषण]
    आधी रातनिशीथः [पुं.] | अर्धरात्रः [पुं.]
    आधुनिकनूतनः [विशेषण] | नवीनः [विशेषण] | अधुनातनः [विशेषण] | इदानीन्तनः [विशेषण] | अर्वाचीनः [विशेषण] | साम्प्रतिकः [विशेषण]
    आनन-फाननक्षणेन [अव्यय] | क्षणात् [अव्यय] | तत्क्षणमेव [अव्यय]
    आनन्द देनाआनन्दनम् [नपुं.] (आ + नन्द् [धातु]) | मोदनम् [नपुं.] (मुद् [धातु])
    आना (क्रिया)आगमनम् [नपुं.] (आ + गम् [धातु])
    आना (सिक्का)आणकम् [नपुं.]
    आनाकानीअस्वीकृतिः [स्त्री.] | व्यपदेशः [पुं.] | उपेक्षा [स्त्री.]
    आने वाला कलश्वः [अव्यय]
    आने वाला परसोंपरश्वः [अव्यय]
    आनेवालाआगामी [विशेषण] | आगन्तुकः [विशेषण/पुं.] | आयाती [विशेषण]
    आपभवान् [सर्वनाम/पुं.] | भवती [सर्वनाम/स्त्री.] | स्वयम् [अव्यय] | आत्मा [पुं.]
    आपत्कालदुष्कालः [पुं.] | दुस्समयः [पुं.] | विपत्तिः [स्त्री.] | आपत्कालः [पुं.]
    आपत्तिदुःखम् [नपुं.] | क्लेशः [पुं.] | विपत्तिः [स्त्री.] | आपत्तिः [स्त्री.]
    आपस मेंपरस्परम् [अव्यय] | अन्योन्यम् [अव्यय] | इतरेतरम् [अव्यय]
    आप-से-आपस्वयम् [अव्यय] | स्वतः [अव्यय]
    आपाधापीस्वार्थपरता [स्त्री.] | स्वस्वहितचिन्ता [स्त्री.] | सङ्घर्षः [पुं.]
    आफतआपत्तिः [स्त्री.] | आपद् [स्त्री.] | आफ़तः [पुं.]
    आफिसकार्यालयः [पुं.]
    आबनूसतमालवृक्षः [पुं.] | तमालः [पुं.]
    आबादीजनसङ्ख्या [स्त्री.] | जनवसतिः [स्त्री.]
    आबोहवाजलवायुः [पुं.]
    आभाकान्तिः [स्त्री.] | दीप्तिः [स्त्री.] | छविः [स्त्री.] | आभा [स्त्री.]
    आभारीकृतज्ञः [विशेषण] | आभारी [विशेषण]
    आभूषणआभरणम् [नपुं.] | भूषणम् [नपुं.] | अलङ्कारः [पुं.] | आभूषणम् [नपुं.]
    आमआम्रम् [नपुं.] | रसालः [पुं.] | सहकारः [पुं.] | आम्रः [पुं.] | सर्वसाधारणः [विशेषण]
    आमदनीआयः [पुं.] | धनप्राप्तिः [स्त्री.]
    आयधनलाभः [पुं.] | धनागमः [पुं.] | आयः [पुं.]
    आयोजनप्रबन्धः [पुं.] | नियुक्तिः [स्त्री.] | आयोजनम् [नपुं.]
    आयोडीनजम्बुकी [स्त्री.] | नीलीनम् [नपुं.]
    आरंभउपक्रमः [पुं.] | प्रारम्भः [पुं.] | उत्पत्तिः [स्त्री.] | आरम्भः [पुं.]
    आरतआर्तः [विशेषण]
    आरतीआरार्तिकम् [नपुं.] | दीपदर्शनम् [नपुं.]
    आरम्भ करनाआरम्भः [पुं.] (आ + रभ् [धातु]) | उपक्रमः [पुं.] (उप् + क्रम् [धातु])
    आराक्रकचः [पुं.] | करपत्रम् [नपुं.]
    आराधनाभक्तिः [स्त्री.] | पूजा [स्त्री.] | सेवा [स्त्री.] | तर्पणम् [नपुं.] | आराधना [स्त्री.]
    आरामविश्रामः [पुं.] | उपशमः [पुं.] | शमनम् [नपुं.] | मोचनम् [नपुं.] | मोक्षः [पुं.] | उद्धारः [पुं.] | मुक्तिः [स्त्री.] | आरामः [पुं.]
    आराम होनाआरोग्यलाभः [पुं.] (आ + रुज् [धातु])
    आरीकरपत्रम् [नपुं.] | क्रकचिका [स्त्री.]
    आरोपआरोपणम् [नपुं.] | संस्थापनम् [नपुं.] | स्थिरीकरणम् [नपुं.] | भ्रमः [पुं.] | आरोपः [पुं.]
    आरोपितस्थापितः [विशेषण] | निहितः [विशेषण] | निवेशितः [विशेषण] | आरोपितः [विशेषण]
    आर्जवऋजुता [स्त्री.] | सरलव्यवहारः [पुं.] | आर्जवम् [नपुं.]
    आर्थिकअर्थसम्बन्धी [विशेषण] | आर्थिकः [विशेषण]
    आर्द्रकम्आर्द्रकम् [नपुं.] (अदरक)
    आर्षवैदिकः [विशेषण] | ऋषिप्रयुक्तः [विशेषण] | ऋषिकृतः [विशेषण] | आर्षः [विशेषण]
    अलमारीकाष्ठमञ्जूषा [स्त्री.] | कपाटिका [स्त्री.]
    आलसआलस्यम् [नपुं.] (अल्स् [नामधातु]) | लुण्ठनम् [नपुं.] (लुण्ठ् [धातु])
    आलसीअलसः [विशेषण] | निरुद्यमः [विशेषण]
    आलापनास्वरारोहावरोहः [पुं.] (आ + लप् [धातु]) | आलापः [पुं.]
    आलिंगन करनाआलिङ्गनम् [नपुं.] (आ + लिङ्ग् [धातु]) | परिष्वङ्गः [पुं.] (परि + ष्वञ्ज [धातु])
    आलिमविद्वान् [पुं.] | पण्डितः [पुं.] | बुधः [पुं.]
    आलूआलुः [पुं./स्त्री.] | गोलालुः [पुं.] | आलुकम् [नपुं.]
    आलू की टिकियापक्कालुः [पुं.]
    आलू बुखाराआलुकम् [नपुं.] | आलूबुखारफला [स्त्री.]
    आलूचाआलूच्चः [पुं.] | आलूच्चम् [नपुं.]
    आलेखलेखः [पुं.] | लेख्यम् [नपुं.] | लिखितम् [नपुं.] | लिपिः [स्त्री.] | आलेखः [पुं.]
    आलोचनागुणदोषपरीक्षणम् [नपुं.] | विवेचना [स्त्री.] | आलोचना [स्त्री.]
    आवभगतसम्मानम् [नपुं.] | सत्कारः [पुं.] | उपचारः [पुं.] | सेवा [स्त्री.]
    आवाकुम्भकाराग्निकुण्डम् [नपुं.] | मृत्पात्रपाककुण्डम् [नपुं.] | पाकपुटी [स्त्री.]
    आवागमनपुनर्जन्म [नपुं.] | जन्ममरणचक्रम् [नपुं.] | आवागमनम् [नपुं.]
    आवाजध्वनिः [स्त्री.] | स्वरः [पुं.] | शब्दः [पुं.]
    आवारावृथाभ्रमणशीलः [विशेषण] | भ्रान्तः [विशेषण]
    आवाहननिमन्त्रणम् [नपुं.] | आकारणम् [नपुं.] | आह्वानम् [नपुं.]
    आविष्कारनवनिर्माणम् [नपुं.] | अज्ञाततत्त्वप्रकाशनम् [नपुं.] | आविष्कारः [पुं.]
    आवृतसंवृतः [विशेषण] | आवेष्टितः [विशेषण] | आवृतः [विशेषण]
    आवेगआवेशः [पुं.] | चित्तोद्वेगः [पुं.] | उत्तेजनम् [नपुं.] | उद्दीपनम् [नपुं.] | त्वरा [स्त्री.] | सञ्चारीभावभेदः [पुं.] | आवेगः [पुं.]
    आवेशआवेगः [पुं.] | क्रोधः [पुं.] | व्याप्तिः [स्त्री.] | आवेशः [पुं.]
    आशंकाभयम् [नपुं.] | संशयः [पुं.] | सन्देहः [पुं.] | आशङ्का [स्त्री.]
    आशयअभिप्रायः [पुं.] | अर्थः [पुं.] | तात्पर्यम् [नपुं.] | आशयः [पुं.]
    आशा करनाआशा [स्त्री.] (आ + शास् [धातु]) | प्रत्याशा (प्रति + आ + शास् [धातु])
    आसिकमोहितः [विशेषण] | आसक्तः [विशेषण] | कामुकः [पुं.]
    आशीर्वादआशीर्वादः [पुं.] | आशिषः [स्त्री.] | शुभकामना [स्त्री.]
    आश्चर्यविस्मयः [पुं.] | कौतुकम् [नपुं.] | अद्भुतम् [नपुं.] | आश्चर्यम् [नपुं.]
    आश्रमतपोवनम् [नपुं.] | मठः [पुं.] | कुटी [स्त्री.] | आश्रमः [पुं.]
    आश्रय लेनाआश्रयणम् [नपुं.] (आ + श्रि [धातु]) | शरणागतिः [स्त्री.]
    आश्रयअवलम्बः [पुं.] | आधारः [पुं.] | आश्रयः [पुं.] | शरणम् [नपुं.]
    आसराअवलम्बः [पुं.] | आधारः [पुं.] | आश्रयः [पुं.] | शरणम् [नपुं.]
    आषाढ़ मासआषाढः [पुं.]
    आसआशा [स्त्री.] | मनोरथः [पुं.] | इच्छा [स्त्री.]
    आसनआसनम् [नपुं.]
    आसपाससमीपम् [अव्यय] | समीपे [अव्यय] | परितः [अव्यय]
    आसमानगगनम् [नपुं.] | आकाशः [पुं.] | आकाशम् [नपुं.] | व्योम [नपुं.]
    आसानसुगमः [विशेषण] | सुसाध्यः [विशेषण] | सुकरः [विशेषण]
    आसानीसौकर्यम् [नपुं.] | सौविध्यम् [नपुं.]
    आसारलक्षणम् [नपुं.] | चिह्नम् [नपुं.] | आसारः [पुं.]
    आसिनआश्विनः [पुं.]
    आस्पदस्थानम् [नपुं.] | अधिष्ठानम् [नपुं.] | पदम् [नपुं.] | आस्पदम् [नपुं.]
    आहविनिःश्वासः [पुं.] | उच्छ्वसितम् [नपुं.] | दीर्घश्वासः [पुं.] | निःश्वासः [पुं.]
    आहटशब्दः [पुं.] | अस्पष्टध्वनिः [पुं.] | सङ्केतध्वनिः [पुं.] | निनादः [पुं.]
    आहरपल्वलः [पुं.] | अल्पसरः [नपुं.]
    आहारआहारः [पुं.] | भोजनम् [नपुं.]
    आहार-विहारचर्या [स्त्री.] | वर्तनम् [नपुं.] | वृत्तम् [नपुं.] | आचारव्यवहारौ [पुं. द्विवचन]
    आहितस्थापितः [विशेषण] | कृतः [विशेषण] | आहितः [विशेषण]
    आहुतिआहुतिः [स्त्री.]
    आह्लादहर्षः [पुं.] | आनन्दः [पुं.] | आह्लादः [पुं.]
    इंचअङ्गुलः [पुं.] | अत्यल्पम् [नपुं.] | रेखामात्रम् [नपुं.]
    इंजनयन्त्रम् [नपुं.] | वाष्पशकटीकर्षकयन्त्रम् [नपुं.]
    इंजीनियरयन्त्रकारः [पुं.] | वास्तुविद्याविशारदः [पुं.]
    इंजेक्शनसूचीभरणम् [नपुं.] | सूच्यौषधभरणम् [नपुं.]
    इंतजामप्रबन्धः [पुं.] | व्यवस्था [स्त्री.]
    इंतजारप्रतीक्षा [स्त्री.] | प्रतिपालनम् [नपुं.]
    इंदुचन्द्रः [पुं.] | शशी [पुं.] | इन्दुः [पुं.]
    इंद्रदेवराजः [पुं.] | सुरपतिः [पुं.] | इन्द्रः [पुं.]
    इंद्रीइन्द्रियम् [नपुं.]
    इंधनइध्मम् [नपुं.] | एधः [पुं.] | एधस् [नपुं.] | इन्धनम् [नपुं.]
    इंसाफन्यायः [पुं.] | निर्णयः [पुं.]
    इंस्पेक्टरनिरीक्षकः [पुं.] | द्रष्टा [पुं.]
    इकट्ठाएकत्र [अव्यय] | सम्मिलितः [विशेषण] | सङ्गृहीतः [विशेषण]
    इकट्ठा करनासङ्ग्रहः [पुं.] (सम् + ग्रह् [धातु]) | सञ्चयनम् [नपुं.] (सम् + चि [धातु])
    इक्तालीसएकचत्वारिंशत् [स्त्री.]
    इकत्तीसएकत्रिंशत् [स्त्री.]
    इकरारप्रतिज्ञा [स्त्री.] | पणः [पुं.] | स्वीकारः [पुं.]
    इकलौताअद्वितीयः [विशेषण] | एकमात्रपुत्रः [पुं.] | एकातकः [विशेषण]
    इकसठएकषष्टिः [स्त्री.]
    इकरहत्तरएकसप्ततिः [स्त्री.]
    इक्कीसएकविंशतिः [स्त्री.]
    इक्यानबेएकनवतिः [स्त्री.]
    इक्यावनएकपञ्चाशत् [स्त्री.]
    इक्यासीएकाशीतिः [स्त्री.]
    इख्तियारअधिकारः [पुं.] | प्रभुत्वम् [नपुं.]
    इच्छाअभिलाषः [पुं.] | ईहा [स्त्री.] | स्पृहा [स्त्री.] | मनोरथः [पुं.] | इच्छा [स्त्री.]
    इच्छा करने वालास्पृहयालुः [विशेषण]
    इजाजतअनुमतिः [स्त्री.] | आज्ञा [स्त्री.] | आदेशः [पुं.] | निदेशः [पुं.]
    इज्जतसम्मानः [पुं.] | प्रतिष्ठा [स्त्री.]
    इतनाएतावान् [विशेषण/पुं.] | एतावती [विशेषण/स्त्री.] | एतावत् [विशेषण/नपुं.] | इयान् [विशेषण/पुं.] | इयती [विशेषण/स्त्री.] | इयत् [विशेषण/नपुं.]
    इतने मेंअत्रान्तरे [अव्यय] | एतस्मिन्नन्तरे [अव्यय]
    इतमीनानविश्वासः [पुं.] | विश्रम्भः [पुं.] | शान्तिः [स्त्री.]
    इतवाररविवासरः [पुं.] | भानुवासरः [पुं.]
    इत्रगन्धतैलम् [नपुं.] | इत्रम् [नपुं.]
    इधरइतः [अव्यय] | अत्र [अव्यय]
    इधर-उधरइतस्ततः [अव्यय] | यत्र-तत्र [अव्यय]
    इनकमआयः [पुं.]
    इनकारअस्वीकारः [पुं.] | प्रत्यादेशः [पुं.] | प्रत्याख्यानम् [नपुं.] | निषेधः [पुं.]
    इनपुटनिवेशः [पुं.]
    इन्द्रशतक्रतुः [पुं.] | आखण्डलः [पुं.] | इन्द्रः [पुं.]
    इन्द्र आदिदेवाः [पुं. बहुवचन] | देवताः [स्त्री. बहुवचन]
    इन्द्र का अस्त्रवज्रम् [नपुं.]
    इन्द्र का वननन्दनम् [नपुं.]
    इन्द्र का सारथीमातलिः [पुं.]
    इन्द्रधनुषइन्द्रायुधम् [नपुं.] | इन्द्रधनुः [नपुं.]
    इन्द्रपत्नीइन्द्राणी [स्त्री.]
    इन्फ्लूएंजाशीतज्वरः [पुं.]
    फ्लूशीतज्वरः [पुं.]
    इन्स्टॉलप्रतिस्थापनम् [नपुं.] | प्रस्थापना [स्त्री.] (प्रति/प्र + स्था [धातु])
    इन्साफन्यायः [पुं.]
    इमरतीअमृती [स्त्री.]
    इमलीतिन्तिडीकम् [नपुं.] | तिन्तिडी [स्त्री.]
    इम्तिहानपरीक्षा [स्त्री.]
    इररत्रुटिः [स्त्री.]
    इलाजचिकित्सा [स्त्री.]
    इलायचीएला [स्त्री.] | उपकुञ्चिका [स्त्री.]
    इशाराइङ्गितम् [नपुं.] | सङ्केतः [पुं.]
    इस प्रकारइत्थम् [अव्यय] | एवम् [अव्यय]
    इस प्रकार काईदृशः [विशेषण]
    इसके बादअथ [अव्यय] | अनन्तरम् [अव्यय] | अतः परम् [अव्यय]
    इसलिएअतः [अव्यय] | तस्मात् [अव्यय]
    इस्तेमालउपयोगः [पुं.] | प्रयोगः [पुं.]
    ईंटइष्टका [स्त्री.] | इष्टकः [पुं.]
    ईंधनइन्धनम् [नपुं.]
    ईक्षादर्शनम् [नपुं.] | दृष्टिः [स्त्री.] | पर्यालोचना [स्त्री.] | ईक्षा [स्त्री.]
    ईखइक्षुः [पुं.]
    ईजादआविष्कारः [पुं.]
    ईतिबाधा [स्त्री.] | उपद्रवः [पुं.] | विप्लवः [पुं.] | ईतिः [स्त्री.]
    ईर्ष्यामत्सरः [पुं.] | असूया [स्त्री.] | ईर्ष्या [स्त्री.]
    ईर्ष्या करनाईर्ष्यनम् [नपुं.] (ईर्ष्य [धातु]) | असूयनम् [नपुं.] (असूय् [नामधातु])
    ईर्ष्यालुमत्सरी [विशेषण] | असूयकः [विशेषण] | ईर्ष्यालुः [विशेषण]
    ईश्वरपरमेश्वरः [पुं.] | स्वामी [पुं.] | राजा [पुं.] | पतिः [पुं.] | प्रभुः [पुं.] | ईश्वरः [पुं.]
    उऋणअनृणः [विशेषण] | ऋणमुक्तः [विशेषण] | उऋणः [विशेषण]
    उक्तकथितः [विशेषण] | उदितः [विशेषण] | भाषितः [विशेषण] | लपितः [विशेषण] | व्याहृतः [विशेषण] | उदीरितः [विशेषण] | उक्तः [विशेषण]
    उक्तिकथनम् [नपुं.] | वाक्यम् [नपुं.] | उक्तिः [स्त्री.]
    उगनाउद्गमः [पुं.] (उद् + गम् [धातु]) | उदयः [पुं.] (उद् + इ [धातु]) | उद्भेदः [पुं.] | प्ररोहः [पुं.] | स्फुटनम् [नपुं.] | उत्पत्तिः [स्त्री.]
    उगलनावमनम् [नपुं.] (वम् [धातु])
    उघरनाविकसनम् [नपुं.] (वि + कस् [धातु]) | उद्घटनम् [नपुं.] (उद् + घट् [धातु])
    उघारनाआवरणहरणम् [नपुं.] | उद्घाटनम् [नपुं.] (उद् + घट् [धातु])
    उचक्काप्रतारकः [पुं.] | वञ्चकः [पुं.]
    उचटनाक्षोभः [पुं.] | स्थानात् स्खलनम् [नपुं.] (स्खल् [धातु])
    उछलनाउत्कूर्दनम् [नपुं.] (उद् + कूर्द् [धातु]) | प्रप्लवनम् [नपुं.] (प्र + प्लु [धातु])
    उछालनाउत्क्षेपणम् [नपुं.] (उद् + क्षिप् [धातु])
    उजलाउज्ज्वलः [विशेषण] | प्रदीप्तः [विशेषण] | निर्मलः [विशेषण]
    उजाड़नानाशनम् [नपुं.] (नश् [धातु]) | उद्वसनम् [नपुं.] (उद् + वस् [धातु])
    उजालाप्रकाशः [पुं.] | आलोकः [पुं.] | प्रभा [स्त्री.] | आभा [स्त्री.] | भा [स्त्री.] | दीप्तिः [स्त्री.] | द्युतिः [स्त्री.] | कान्तिः [स्त्री.]
    उज्जैन नगरउज्जयिनी [स्त्री.]
    उज्रआपत्तिः [स्त्री.] | बाधा [स्त्री.]
    उठनाउत्थानम् [नपुं.] (उद् + स्था [धातु]) | उद्गमः [पुं.] | उत्पातः [पुं.]
    उठानाउत्थापनम् [नपुं.] (उद् + स्था [धातु])
    उठाने वालावोढा [पुं.] | उत्थापकः [विशेषण/पुं.]
    उड़दमाषः [पुं.]
    उड़नाउड्डयनम् [नपुं.] (उद् + डी [धातु]) | उत्पतनम् [नपुं.] (उद् + पत् [धातु])
    उड़ानाउत्पातनम् [नपुं.] (उद् + पत् [धातु]) | उड्डापनम् [नपुं.] (उद् + डी [धातु])
    उतनातावान् [विशेषण/पुं.] | तावती [विशेषण/स्त्री.] | तावत् [विशेषण/नपुं.]
    उतना हीतावदेव [अव्यय]
    उतरनाअवतणम् [नपुं.] (अव + तृ [धातु])
    उतरनाअवतरणम् [नपुं.] (अव + तृ [धातु]) | अवरोहणम् [नपुं.] (अव + रुह [धातु])
    उतानउत्तानः [पुं.] | उत्तान [विशेषण]
    उतारअवरोहः [पुं.] | अवतरणम् [नपुं.] | अवतारः [पुं.] | अवपातः [पुं.]
    उतार-चढ़ावनिम्नोच्चता [स्त्री.] | आरोहावरोहः [पुं.]
    उत्कण्ठाउत्कलिका [स्त्री.] | लालसा [स्त्री.] | औत्कण्ठ्यम् [नपुं.] | औत्सुक्यम् [नपुं.] | उत्कण्ठा [स्त्री.]
    उत्तमर्णऋणदः [पुं.] | ऋणदाता [पुं.] | उत्तमर्णः [पुं.]
    उत्तरउदीची [स्त्री.] | उत्तरदिशा [स्त्री.] | प्रतिवचनम् [नपुं.] | प्रत्युक्तिः [स्त्री.] | उत्तरम् [नपुं.]
    उत्तरायणउत्तरायणम् [नपुं.]
    उत्पत्तिउत्पत्तिः [स्त्री.] | उद्गमः [पुं.] | उद्भवः [पुं.] | आरम्भः [पुं.]
    उत्पत्तिस्थानयोनिः [स्त्री./पुं.] | उत्पत्तिस्थानम् [नपुं.]
    उत्सस्रोतः [नपुं.] | सरः [नपुं.] | उत्सः [पुं.]
    उत्संगअङ्कः [पुं.] | सम्पर्कः [पुं.] | योगः [पुं.] | उत्सङ्गः [पुं.]
    उत्साह दिखानाउत्साहप्रदर्शनम् [नपुं.] (उद् + सह् [धातु]) | उद्योगः [पुं.]
    उत्सुकउत्सुकः [विशेषण] | उत्कण्ठितः [विशेषण] | व्यग्रः [विशेषण]
    उथल-पुथलविपर्यस्तः [विशेषण] | अधरोत्तरम् [नपुं./विशेषण] | विप्लवः [पुं.]
    उदय होनाउदयः [पुं.] (उद् + इ [धातु]) | प्रादुर्भावः [पुं.]
    उदरमध्यभागः [पुं.] | उदरम् [नपुं.]
    उदारदानशीलः [विशेषण] | बहुप्रदः [विशेषण] | उदारः [विशेषण]
    उदारताऔदार्यम् [नपुं.] | त्यागः [पुं.] | दाक्षिण्यम् [नपुं.] | सुशीलता [स्त्री.] | उदारता [स्त्री.]
    उदास होनाविषादः [पुं.] (वि + सद् [धातु]) | ग्लानिः [स्त्री.] (ग्लै [धातु])
    उदासीअवсадः [पुं.] | ग्लानिः [स्त्री.] | उदासी [स्त्री.]
    उदासीनविरक्तः [विशेषण] | निस्स्पृहः [विशेषण] | प्रपञ्चरहितः [विशेषण] | मध्यस्थः [विशेषण] | तटस्थः [विशेषण] | समभावः [विशेषण] | रूक्षः [विशेषण] | निस्स्नेहः [विशेषण] | उदासीनः [विशेषण]
    उदाहरणदृष्टान्तः [पुं.] | निदर्शनम् [नपुं.] | उदाहरणम् [नपुं.]
    उदुंबरक्षीरवृक्षः [पुं.] | सदाफलः [पुं.] | जन्तुफलः [पुं.] | क्षीरवृक्षफलम् [नपुं.] | देहली [स्त्री.] | उदुम्बरः [पुं.]
    उद्घाटनउन्मुद्रणम् [नपुं.] | निरर्गलीकरणम् [नपुं.] | प्रकाशनम् [नपुं.] | प्रकटीकरणम् [नपुं.] | उद्घाटनम् [नपुं.]
    उद्दंडउद्धतः [विशेषण] | दुःशीलः [विशेषण] | अविनीतः [विशेषण] | साहसिकः [विशेषण] | कलहप्रियः [विशेषण] | उद्दण्डः [विशेषण]
    उद्धारनिर्वाणम् [नपुं.] | मुक्तिः [स्त्री.] | निवृत्तिः [स्त्री.] | उद्धारः [पुं.]
    उद्बोधनज्ञापनम् [नपुं.] | प्रकाशनम् [नपुं.] | उत्तेजनम् [नपुं.] | जागरणम् [नपुं.] | उद्बोधनम् [नपुं.]
    उद्भवजन्म [नपुं.] | उत्पत्तिः [स्त्री.] | उद्भवः [पुं.]
    उद्यमउद्योगः [पुं.] | प्रयत्नः [पुं.] | प्रयासः [पुं.] | उद्यमः [पुं.]
    उद्योगउद्योगः [पुं.] | यत्नः [पुं.] | अध्यवसायः [पुं.] | परिश्रमः [पुं.]
    उद्वेगव्याकुलता [स्त्री.] | उद्विग्नता [स्त्री.] | मनोवेगः [पुं.] | उद्वेगः [पुं.]
    उधरतत्र [अव्यय] | ततः [अव्यय]
    उधारऋणम् [नपुं.] | धार्यम् [नपुं.] | उधारः [पुं.]
    उधार खातेनामलेखनम् [नपुं.] | ऋणपञ्जिकायाम् [अव्यय]
    उधार देने वालाउत्तमर्णः [पुं.] | ऋणदाता [पुं.]
    उधार लेने वालाअधमर्णः [पुं.] | ऋणग्रहीता [पुं.]
    उधेड़बुनआकुलता [स्त्री.] | व्याकुलता [स्त्री.] | सन्देहः [पुं.] | व्यग्रता [स्त्री.] | चित्तविक्षेपः [पुं.] | संशयः [पुं.]
    उनतीसनवविंशतिः [स्त्री.] | एकोनत्रिंशत् [स्त्री.] | ऊनत्रिंशत् [स्त्री.]
    उनमनाव्यग्रः [विशेषण] | विरक्तः [विशेषण] | अप्रसन्नः [विशेषण] | अनमनाः [विशेषण]
    अनमनाव्यग्रः [विशेषण] | विरक्तः [विशेषण] | अप्रसन्नः [विशेषण] | उनमनाः [विशेषण]
    उनसठनवपञ्चाशत् [स्त्री.] | एकोनषष्टिः [स्त्री.] | ऊनषष्टिः [स्त्री.]
    उन्चासएकोनपञ्चाशत् [स्त्री.] | ऊनपञ्चाशत् [स्त्री.]
    उन्तालीसएकोनचत्वारिंशत् [स्त्री.] | ऊनचत्वारिंशत् [स्त्री.]
    उन्नतप्रांशुः [विशेषण] | उच्चः [विशेषण] | उन्नतः [विशेषण]
    उन्नतिउच्छ्रयः [पुं.] | उत्थानम् [नपुं.] | वृद्धिः [स्त्री.] | अभ्युदयः [पुं.] | उन्नतिः [स्त्री.]
    उन्नीसनवदश [विशेषण] | ऊनविंशतिः [स्त्री.] | एकोनविंशतिः [स्त्री.]
    उन्नीसवाँएकोनविंशतितमः [विशेषण] | एकोनविंशतितमी [विशेषण] | एकोनविंशतितमम् [विशेषण]
    उन्मादउन्मत्तता [स्त्री.] | चित्तविभ्रमः [पुं.] | मतिभ्रंशः [पुं.] | उन्मादः [पुं.]
    उन्मूलननिर्मूलनम् [नपुं.] (निस् + मूल् [धातु]) | उत्पाटनम् [नपुं.] | उत्खननम् [नपुं.] | विध्वंसनम् [नपुं.] | विनाशनम् [नपुं.]
    उन्यासीएकोनाशीतिः [स्त्री.] | ऊनाशीतिः [स्त्री.]
    उन्हत्तरएकोनसप्ततिः [स्त्री.] | ऊनसप्ततिः [स्त्री.]
    उपकरणसाधनम् [नपुं.] | उपकरणम् [नपुं.]
    उपकारहितम् [नपुं.] | परोपकारः [पुं.] | उपकृतिः [स्त्री.] | उपकारः [पुं.]
    उपकार करनाउपकारः [पुं.] (उप + कृ [धातु]) | उपकृतिः [स्त्री.]
    उपक्रमआरम्भः [पुं.] | भूमिका [स्त्री.] | उपक्रमः [पुं.]
    उपचाररोगप्रतिकारः [पुं.] | चिकित्सा [स्त्री.] | उपचर्या [स्त्री.] | रोगिपरिचर्या [स्त्री.] | प्रयोगः [पुं.] | विधानम् [नपुं.] | धर्मानुष्ठानम् [नपुं.] | चाटूक्तिः [स्त्री.] | उत्कोचः [पुं.] | उपचारः [पुं.]
    उपजउत्पत्तिः [स्त्री.] | प्रसवः [पुं.] | फलम् [नपुं.] | लाभः [पुं.] | उपजः [पुं.]
    उपजनाउत्पत्तिः [स्त्री.] (उत् + पद् [धातु]) | उद्भवः [पुं.] (उत् + भू [धातु])
    उपजाऊउर्वरः [विशेषण] | शस्यप्रदः [विशेषण] | उर्वरा [स्त्री.]
    उपजानाउत्पादनम् [नपुं.] (उत् + पद् [धातु]) | जननम् [नपुं.] (जन् [धातु])
    उपदेशशिक्षा [स्त्री.] | शिक्षणम् [नपुं.] | अनुशासनम् [नपुं.] | उपदेशः [पुं.]
    उपदेश देनाउपदेशः [पुं.] (उप + दिश् [धातु]) | शिक्षणम् [नपुं.]
    उपद्रवविघ्नः [पुं.] | विप्लवः [पुं.] | बाधा [स्त्री.] | उपद्रवः [पुं.]
    उपन्यासकल्पितकथा [स्त्री.] | कथाप्रबन्धः [पुं.] | प्रबन्धकल्पना [स्त्री.] | वाक्योपक्रमः [पुं.] | निक्षेपः [पुं.] | न्यासः [पुं.] | उपन्यासः [पुं.]
    उपभुक्तप्रयुक्तः [विशेषण] | उच्छिष्टः [विशेषण] | उपभुक्तः [विशेषण]
    उपयुक्तउचितः [विशेषण] | उपपन्नः [विशेषण] | सङ्गतः [विशेषण] | युक्तः [विशेषण] | योग्यः [विशेषण] | यथायोग्यः [विशेषण] | यथार्हः [विशेषण] | उपयुक्तः [विशेषण]
    उपयोगिताव्यवहार्यता [स्त्री.] | लाभकारिता [स्त्री.] | उपकारकता [स्त्री.] | उपयोगिता [स्त्री.]
    उपयोगीप्रयोजनीयः [विशेषण] | हितसाधनः [विशेषण] | उपकारकः [विशेषण] | लाभदायकः [विशेषण] | अनुकूलः [विशेषण] | उपयोगी [विशेषण]
    उपरतविरक्तः [विशेषण] | उदासीनः [विशेषण] | मृतः [विशेषण] | उपरतः [विशेषण]
    उपरांतपरम् [अव्यय] | ततः परम् [अव्यय] | तदनन्तरम् [अव्यय] | तदनु [अव्यय] | उपरान्त [अव्यय]
    उपरोक्तउपर्युक्तः [विशेषण]
    उपरोहितपुरोहितः [पुं.] | धर्माचार्यः [पुं.] | धर्माध्यक्षः [पुं.]
    उपलब्धअधिगतः [विशेषण] | प्राप्तः [विशेषण] | गृहीतः [विशेषण] | उपलब्धः [विशेषण]
    उपलब्धिप्राप्तिः [स्त्री.] | अधिगमः [पुं.] | ज्ञानम् [नपुं.] | उपलब्धिः [स्त्री.]
    उपवनआरामः [पुं.] | लघुवनम् [नपुं.] | उपवनम् [नपुं.]
    उपवासअनाहारः [पुं.] | अनशनम् [नपुं.] | उपवासः [पुं.]
    उपशमशमः [पुं.] | शान्तिः [स्त्री.] | तृष्णाक्षयः [पुं.] | इन्द्रियनिग्रहः [पुं.] | प्रतिकारः [पुं.] | उपचारः [पुं.] | उपशमः [पुं.]
    उपशमनसान्त्वनम् [नपुं.] | प्रतिविधानम् [नपुं.] | उपशमनम् [नपुं.]
    उपसम्पादकसम्पादकसहायः [पुं.] | सहायकसम्पादकः [पुं.] | उपसम्पादकः [पुं.]
    उपस्थलिङ्गम् [नपुं.] | मेढ्रः [पुं.] | भगः [पुं.] | योनिः [स्त्री./पुं.] | क्रोडम् [नपुं.] | वक्षः [नपुं.] | उपस्थः [पुं.]
    उपहारउपायनम् [नपुं.] | उपदा [स्त्री.] | उपहारः [पुं.]
    उपहासपरिहासः [पुं.] | प्रहसनम् [नपुं.] | नर्म [नपुं.] | क्रीडाकौतुकम् [नपुं.] | निन्दा [स्त्री.] | आक्षेपः [पुं.] | उपहासः [पुं.]
    उपांगअवयवः [पुं.] | अङ्गभागः [पुं.] | अङ्गपूरकम् [नपुं.] | उपाङ्गम् [नपुं.]
    उपाख्यानप्राचीनकथा [स्त्री.] | आख्यानम् [नपुं.] | कथान्तर्गतकथा [स्त्री.] | वृत्तान्तः [पुं.] | उदन्तः [पुं.] | उपाख्यानम् [नपुं.]
    उपादानसमवायिकारणम् [नपुं.] | प्राप्तिः [स्त्री.] | उपलब्धिः [स्त्री.] | बोधः [पुं.] | प्रत्याहारः [पुं.] | उपादानम् [नपुं.]
    उपादेयग्राह्यः [विशेषण] | ग्रहीतव्यः [विशेषण] | स्वीकार्यः [विशेषण] | श्रेष्ठः [विशेषण] | उत्तमः [विशेषण] | उपादेयः [विशेषण]
    उपाधिबाधा [स्त्री.] | उपद्रवः [पुं.] | विघ्नः [पुं.] | उपाधिः [स्त्री./पुं.]
    उपाध्यायशिक्षकः [पुं.] | गुरुः [पुं.] | आचार्यः [पुं.] | उपाध्यायः [पुं.]
    उपायप्रतिकारः [पुं.] | उपायः [पुं.] | प्रयोगः [पुं.] | युक्तिः [स्त्री.]
    उपासनापूजा [स्त्री.] | आराधना [स्त्री.] | अर्चा [स्त्री.] | उपासना [स्त्री.]
    उपेक्षाअनादरः [पुं.] | तिरस्कारः [पुं.] | घृणा [स्त्री.] | विरक्तिः [स्त्री.] | उपेक्षा [स्त्री.]
    उपेक्षा करनाउपेक्षा [स्त्री.] (उप + ईक्ष् [धातु])
    उबटनउद्वर्तनम् [नपुं.] | अङ्गरागः [पुं.] | लेपः [पुं.] | लेपनम् [नपुं.]
    उबलनाक्वथनम् [नपुं.] (क्वथ् [धातु])
    उबारनाउद्धरणम् [नपुं.] (उद् + हृ [धातु])
    उबालउद्वेगः [पुं.] | आवेशः [पुं.] | उबालः [पुं.]
    उबालनाक्वथनम् [नपुं.] (क्वथ् [धातु])
    उबासीजृम्भः [पुं.] | जृम्भा [स्त्री.]
    उभरास्फीतः [विशेषण] | शूनः [विशेषण] | प्रफुल्लितः [विशेषण]
    उभाड़नाउत्तेजनम् [नपुं.] (उद् + तिज् [धातु]) | उद्दीपनम् [नपुं.] (उद् + दीप् [धातु])
    उमंगउल्लासः [पुं.] | आनन्दः [पुं.] | उमङ्गः [पुं.]
    उमड़नाजलाप्लावः [पुं.] | उद्वेलनम् [नपुं.] (उद् + वेल् [धातु])
    उमापार्वती [स्त्री.] | दुर्गा [स्त्री.] | कान्तिः [स्त्री.] | उमा [स्त्री.]
    उम्मीदआशा [स्त्री.] | अपेक्षा [स्त्री.] | प्रत्याशा [स्त्री.]
    उम्रवयः [नपुं.] | आयुः [पुं./स्त्री.]
    उरगसर्पः [पुं.] | नागः [पुं.] | सरीसृपः [पुं.] | उरगः [पुं.]
    उरोजस्तनः [पुं.] | कुचः [पुं.] | उरोजः [पुं.]
    उर्वराउर्वरा [स्त्री.] | बहुफलदा भूमिः [स्त्री.] | पृथिवी [स्त्री.] | फलदा [विशेषण/स्त्री.] | शस्यप्रदा [विशेषण/स्त्री.]
    उलझनविघ्नः [पुं.] | प्रतिबन्धः [पुं.] | बाधा [स्त्री.] | समस्या [स्त्री.] | चिन्ताविषयः [पुं.] | विवादविषयः [पुं.] | उलझनम् [नपुं.]
    उलटनाविलोमः [पुं.] | विपर्यासः [पुं.] | परावर्तनम् [नपुं.] (परि + आ + वृत् [धातु])
    उलटानाअधोमुखीकरणम् [नपुं.] (अधस् + मुख + कृ [धातु]) | विपर्यसनम् [नपुं.] (वि + परि + अस् [धातु])
    उलटेप्रत्युत [अव्यय]
    उलथाअनुवादः [पुं.] | भाषान्तरम् [नपुं.]
    उलाहनाअभियोगः [पुं.] | उपालम्भः [पुं.] | परिदेवनम् [नपुं.] | विलपनम् [नपुं.]
    उलूखलउदूखलम् [नपुं.] | उलूखलम् [नपुं.] | गुग्गुलुः [पुं.]
    उल्काखोल्का [स्त्री.] | उत्पातः [पुं.] | पतन्नक्षत्रम् [नपुं.] | प्रकाशः [पुं.] | अग्निशिखा [स्त्री.] | अग्निः [पुं.] | दीपिका [स्त्री.] | प्रदीपः [पुं.] | दीपकः [पुं.] | अग्निकाष्ठम् [नपुं.] | अलातम् [नपुं.] | उल्का [स्त्री.]
    उल्लासआनन्दः [पुं.] | आह्लादः [पुं.] | उल्लासः [पुं.]
    उल्लिखितउत्कीर्णः [विशेषण] | अभिलिखितः [विशेषण] | चक्षुतष्टः [विशेषण] | लिखितः [विशेषण] | उपरिलिखितः [विशेषण] | उपर्युक्तः [विशेषण] | चित्रितः [विशेषण] | आलिखितः [विशेषण] | उल्लिखितः [विशेषण]
    उल्लूकौशिकः [पुं.] | उलूकः [पुं.] | पेचकः [पुं.]
    उल्लेखलेखः [पुं.] | लिखितम् [नपुं.] | लेख्यम् [नपुं.] | वर्णनम् [नपुं.] | निरूपणम् [नपुं.] | अलङ्कारभेदः [पुं.] | उल्लेखः [पुं.]
    उल्लेखनीयलेखार्हः [विशेषण] | उत्लेख्यः [विशेषण] | वर्णनीयः [विशेषण] | निरूपणीयः [विशेषण] | अद्भुतः [विशेषण] | उल्लेखनीयः [विशेषण]
    उषाउषा [स्त्री.] | उषःकालः [पुं.] | प्रभातम् [नपुं.] | अरुणोदयः [पुं.] | दिनमुखम् [नपुं.] | रात्रिशेषः [पुं.] | ब्राह्मवेला [स्त्री.] | अरुणोदयलालिमा [पुं.] | बाणासुरकन्या [स्त्री.] | अनिरुद्धपत्नी [स्त्री.]
    उसतद् [सर्वनाम] | अदस् [सर्वनाम]
    उसकातदीयः [विशेषण] | तस्य [सर्वनाम/पुं. षष्ठी]
    उसमें भीतत्रापि [अव्यय]
    उसासउच्छ्वासः [पुं.] | निश्वासः [पुं.] | दीर्घश्वासः [पुं.]
    उसूलनियमः [पुं.] | सिद्धान्तः [पुं.]
    उस्तराक्षुरः [पुं.]
    ऊँघतन्द्रा [स्त्री.] | म्लानिः [स्त्री.]
    ऊँघनातन्द्रायणम् [नपुं.] (तन्द्राय [नामधातु]) | निद्रालसः [विशेषण]
    ऊँघने वालातन्द्रालुः [विशेषण]
    ऊँघाईतन्द्रा [स्त्री.] | निद्रालस्यम् [नपुं.]
    ऊँच-नीचउच्चावचः [विशेषण] | कुलीनाकुलीनम् [नपुं.] | हानिलाभौ [पुं. द्विवचन] | भद्राभद्रे [नपुं. द्विवचन]
    ऊँचाउच्चः [विशेषण] | उन्नतः [विशेषण] | तुङ्गः [विशेषण] | उत्तुङ्गः [विशेषण] | उत्तमः [विशेषण] | श्रेष्ठः [विशेषण] | मुख्यः [विशेषण] | परमः [विशेषण] | उच्चैः [अव्यय]
    ऊँटउष्ट्रः [पुं.] | क्रमेलः [पुं.] | ककुद्मान् [पुं.] | पशुः [पुं.]
    ऊँटनीउष्ट्री [स्त्री.] | क्रमेली [स्त्री.]
    ऊखइक्षुः [पुं.]
    ऊटपटांगअसम्बद्धः [विशेषण] | असङ्गतः [विशेषण]
    ऊदविलावजलमार्जारः [पुं.] | ओतुः [पुं.]
    ऊधमउपद्रवः [पुं.] | उत्पातः [पुं.] | कोलाहलः [पुं.] | तुमुलम् [नपुं.] | कलहः [पुं.]
    ऊनी कपड़ाऔर्णम् वस्त्रम् [नपुं.] | ऊर्णावस्त्रम् [नपुं.]
    ऊनी वस्त्रराङ्कवम् [नपुं.] | ऊर्णावस्त्रम् [नपुं.]
    ऊपरउपरि [अव्यय]
    ऊपर-नीचेउर्यधः [अव्यय] | उपरि-अधः [अव्यय]
    ऊबड़-खाबड़विषमः [विशेषण] | नतोन्नतः [विशेषण]
    ऊबनाउद्वेगः [पुं.] (उद् + विज् [धातु]) | विरक्तिः [स्त्री.]
    ऊसरऊषरः [पुं.] | ऊषरम् [नपुं.]
    ऋजुसरलः [विशेषण] | निर्व्याजः [विशेषण] | निष्कपटः [विशेषण] | ऋजुः [विशेषण]
    ऋणऋणम् [नपुं.]
    ऋणदाताउत्तमर्णः [पुं.] | ऋणदाता [पुं.]
    ऋणीअधमर्णः [पुं.] | ऋणी [पुं.]
    ऋत्विग् वा राजाप्रशास्ता [पुं.]
    ऋत्विग्विशेषनेष्टा [पुं.]
    ऋद्धिवृद्धिः [स्त्री.] | समृद्धिः [स्त्री.] | ऋद्धिः [स्त्री.]
    एकएकः [विशेषण/पुं.] | एका [विशेषण/स्त्री.] | एकम् [विशेषण/नपुं.]
    एक ओरएकपार्श्वे [अव्यय] | पार्श्वतः [अव्यय] | एकान्ते [अव्यय] | निभृते [अव्यय]
    एक टकनिर्निमेषम् [अव्यय] | अनिमिषम् [अव्यय]
    एक दूसरे कोअन्योऽन्यम् [अव्यय] | परस्परम् [अव्यय] | इतरेतरम् [अव्यय]
    एक प्रकारएकधा [अव्यय] | एकप्रकारः [पुं.]
    एक बारएकदा [अव्यय] | सकृत् [अव्यय] | अथ [अव्यय] | कदाचित् [अव्यय]
    एक लड़ी का हारएकावली [स्त्री.]
    एक समयएकदा [अव्यय] | एकस्मिन् समये [अव्यय]
    एक साथएकपदे [अव्यय] | समम् [अव्यय] | युगपत् [अव्यय] | एककालम् [अव्यय] | एककाले [अव्यय] | समकालम् [अव्यय]
    एक सौशतम् [नपुं.]
    एक ही समय मेंयुगपत् [अव्यय]
    एक-एक करकेएकैकशः [अव्यय] | एकशः [अव्यय] | एकैकः [विशेषण]
    एकचित्तअवहितः [विशेषण] | स्थिरचित्तः [विशेषण] | अभिन्नहृदयः [विशेषण]
    एकताऐक्यम् [नपुं.] | एकता [स्त्री.]
    एकत्रएकत्र [अव्यय] | एकस्थले [अव्यय] | एकस्थाने [अव्यय]
    एकत्रितसङ्घीभूतः [विशेषण] | सञ्चितः [विशेषण] | सङ्गृहीतः [विशेषण] | एकत्रितः [विशेषण]
    एकदिलऐकमत्येन [अव्यय] | स्थिरचित्तः [विशेषण] | एकचित्तीभूय [अव्यय]
    एकरसतुल्यः [विशेषण] | सदृशः [विशेषण] | अव्ययः [विशेषण] | अपरिणामी [विशेषण] | परिवर्तनरहितः [विशेषण]
    एकलौताएकलः [विशेषण] | एकाकी [विशेषण] | एकमात्रपुत्रः [पुं.]
    एकवेषएकपरिधानम् [नपुं.] | एकवेषः [पुं.]
    यूनिफार्मएकपरिधानम् [नपुं.] | एकवेषः [पुं.]
    एकसातुल्यः [विशेषण] | समः [विशेषण]
    एकहराएकगुणीकृतः [विशेषण] | एकहरः [विशेषण]
    एकाएकता [स्त्री.] | सङ्गः [पुं.] | संसर्गः [पुं.] | संयोगः [पुं.] | सन्धिः [पुं.] | सङ्घातः [पुं.] | संश्लेषः [पुं.]
    एकांतविजनम् [नपुं.] | एकान्तः [पुं.] | अत्यन्तः [विशेषण] | एकाकी [विशेषण]
    एकाएकअकस्मात् [अव्यय] | सहसा [अव्यय] | अतर्कितम् [अव्यय]
    एजेन्टअभिकर्ता [पुं.] | प्रतिहस्तः [पुं.]
    आढ़तीअभिकर्ता [पुं.] | प्रतिहस्तः [पुं.]
    एटम बमपरमाण्वस्त्रम् [नपुं.]
    एटलसदेशचित्रसङ्ग्रहः [पुं.] | मानचित्रसङ्ग्रहः [पुं.]
    एड़उत्तेजनम् [नपुं.] | प्रेरणम् [नपुं.] | प्रवर्तनम् [नपुं.]
    एडिटसम्पादनम् [नपुं.] (सम् + पद् [धातु])
    एडिटरसम्पादकः [पुं.]
    एड़ीपादमूलम् [नपुं.] | पार्ष्णिः [स्त्री.] | पादतलम् [नपुं.]
    एलचीदूतः [पुं.] | राजदूतः [पुं.] | प्रणिधिः [पुं.] | सन्देशहरः [पुं.]
    एवजीप्रतिपुरुषः [पुं.] | प्रतिहस्तः [पुं.] | प्रतिनिधिः [पुं.]
    एषणाइच्छा [स्त्री.] | याच्ञा [स्त्री.] | एषणा [स्त्री.]
    एसेसिबिलिटिअभिगम्यता [स्त्री.]
    एसोसिएशनपरिषद् [स्त्री.] | समितिः [स्त्री.] | सङ्घः [पुं.]
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