नई शिक्षा नीति और संस्कृत का विस्तृत होता दायरा

भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, तकनीकी उपलब्धियों, आर्थिक सामर्थ्य या आधुनिक शिक्षा से नहीं बनती। भारत की वास्तविक पहचान उसकी उस ज्ञान-परंपरा से बनती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य, समाज, राष्ट्र और जीवन के विविध पक्षों पर चिंतन किया है। इस ज्ञान-परंपरा का सबसे व्यापक और सशक्त माध्यम संस्कृत भाषा रही है।

आज नई शिक्षा नीति के माध्यम से संस्कृत के लिए एक नया अवसर उपस्थित हुआ है। संस्कृत अब केवल संस्कृत विभाग के विद्यार्थियों तक सीमित रहने वाली भाषा नहीं रहनी चाहिए। विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य सभी विषयों के विद्यार्थियों तक संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि पहुँचाना समय की आवश्यकता है।

यह केवल संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा को उसके मूल स्रोतों से जोड़ने का प्रश्न है।

संस्कृत : केवल एक भाषा नहीं, एक विशाल ज्ञान-परंपरा

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं—वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि। इनके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी व्यापक ज्ञान-परंपरा का हिस्सा माना गया। इसके बाद चौंसठ कलाओं की परंपरा है, जिन्हें उपविद्याओं के रूप में देखा गया।

इन सबका विशाल वाङ्मय संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।

आज इनमें से अनेक विषय अलग-अलग आधुनिक विभागों में पढ़ाए जा रहे हैं। समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा, कला और अनेक अन्य क्षेत्रों में आधुनिक अध्ययन हो रहा है। किंतु एक बड़ी समस्या यह है कि इन विषयों के अध्ययन में संस्कृत में उपलब्ध उनके मूल स्रोतों से हमारा संपर्क लगातार कम होता गया है।

नई शिक्षा नीति इस दूरी को कम करने का अवसर देती है। संस्कृत में निहित इन विषयों के सूत्रों को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक विद्यार्थी संस्कृत का व्याकरणाचार्य बन जाए। आवश्यकता यह है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार संस्कृत में निहित ज्ञान से परिचित हो।

नई शिक्षा नीति : संस्कृत के लिए खुलते हुए नए द्वार

पहले संस्कृत का अध्ययन मुख्यतः उन्हीं विद्यार्थियों तक सीमित रहता था, जिन्होंने संस्कृत को अपने मुख्य विषय के रूप में चुना हो। नई शिक्षा नीति ने इस स्थिति को व्यापक रूप से बदलने का अवसर दिया है।

अब संस्कृत को माइनर विषय, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टीडिसिप्लिनरी कोर्स जैसे विभिन्न माध्यमों से दूसरे विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में इन माध्यमों से विज्ञान, वाणिज्य, कला और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी भी संस्कृत से जुड़ रहे हैं।

कल्पना कीजिए—कृषि का कोई विद्यार्थी संस्कृत को माइनर विषय के रूप में पढ़ रहा है। वह संस्कृत पढ़कर जीविका नहीं कमाने वाला है। वह भविष्य में कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई दूसरा विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई प्रबंधक, कोई वैज्ञानिक, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ और कोई इंजीनियर।

लेकिन यदि इन सबके अध्ययन-क्रम में संस्कृत का थोड़ा-सा भी प्रवेश होता है, तो वे भारतीय ज्ञान-परंपरा के एक विशाल संसार से परिचित हो सकते हैं।

यही नई शिक्षा नीति की एक बड़ी विशेषता है।

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों से नहीं बनेगा। उसका भविष्य तब बनेगा जब दूसरे विषयों के विद्यार्थी भी उससे परिचित होंगे।

तीन लक्ष्य : सभी तक, समान रूप से और पूर्ण गुणवत्ता के साथ

संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि को समाज तक पहुँचाने के तीन प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए—

पहला—यह ज्ञान सभी तक पहुँचे।

दूसरा—समान रूप से पहुँचे।

तीसरा—पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

आज ज्ञान प्राप्त करने के रास्ते पहले की तरह सीमित नहीं हैं। किसी समय संस्कृत या उसके कुछ ग्रंथों को लेकर सामाजिक और स्थानगत प्रतिबंधों की चर्चा होती थी। आज ज्ञान के द्वार कहीं अधिक खुले हैं। आज कोई भी व्यक्ति वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत और अन्य ग्रंथों के अध्ययन की ओर बढ़ सकता है।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि ज्ञान उपलब्ध है या नहीं। प्रश्न यह है कि हम उस ज्ञान को कितनी प्रभावी और आधुनिक विधियों से विद्यार्थियों तक पहुँचा पा रहे हैं।

संस्कृत के शिक्षकों के सामने नई चुनौती

संस्कृत के विद्यार्थी के सामने संस्कृत का शिक्षक जाता है तो सामान्यतः एक साझा पृष्ठभूमि पहले से मौजूद होती है। विद्यार्थी संस्कृत की भूमिका, उसकी परंपरा और उसके शास्त्रीय संदर्भों से परिचित होता है। उसमें गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव भी रहता है—

“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”

लेकिन यदि वही शिक्षक प्रबंधन, विज्ञान या वाणिज्य के विद्यार्थी के सामने जाए, तो स्थिति अलग होगी।

वह विद्यार्थी श्रद्धा के साथ आया है, तभी उसने संस्कृत चुनी है; लेकिन उसके भीतर तर्क-बुद्धि भी है। वह पूछेगा—“ऐसा क्यों?” “यह इस प्रकार क्यों है?” “इसका प्रमाण क्या है?”

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अब केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने विषय को दूसरे विषय के विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।

उसे तर्क देने होंगे, उदाहरण देने होंगे, प्रस्तुतियाँ तैयार करनी होंगी और आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जैसे माध्यमों का प्रयोग करना होगा। जिन विद्यार्थियों की संस्कृत में पृष्ठभूमि नहीं है, उनके लिए सरल और संक्षिप्त नोट्स तैयार करने होंगे। उपयोगी संदर्भ-ग्रंथों की जानकारी देनी होगी।

अर्थात् अब चुनौती केवल “क्या पढ़ाना है” की नहीं है; चुनौती यह भी है कि “कैसे पढ़ाना है”

रामायण को केवल कथा नहीं, जीवन-पथ के रूप में पढ़ना

अभी रामायण का उदाहरण लें।

अधिकांश भारतीयों को यह मालूम है कि रामायण में कितने कांड हैं, उसकी कथा क्या है और राम कौन हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि राम क्या है और राम का अयन क्या है?

यदि हम राम को आलंबन-विभाव मानें, तो राम का अयन—अर्थात् उनका मार्ग—उद्दीपन-विभाव के रूप में देखा जा सकता है।

‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग।

इस दृष्टि से रामायण में केवल राम की कथा नहीं, बल्कि राम के मार्ग की प्रतिष्ठा है। राम का मार्ग यदि हम अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हमारा जीवन भी सफल हो सकता है।

यदि कोई विद्यार्थी रामायण के प्रति पहले से श्रद्धावान नहीं है, तब भी यदि हम उसे रामायण को इस दृष्टि से समझाएँ कि इसमें एक जीवन-पथ प्रस्तुत किया गया है, तो उसमें उसे पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न हो सकती है।

और संभव है कि वह पूरी रामायण न पढ़े, लेकिन उसके जीवन में उससे कोई सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आए।

यही संस्कृत को नए विद्यार्थियों तक पहुँचाने का उद्देश्य होना चाहिए।

धर्म और संप्रदाय : एक महत्वपूर्ण अंतर

संस्कृत परंपरा के संबंध में एक सामान्य भ्रम यह है कि धर्म का अर्थ संप्रदाय या किसी विशेष पूजा-पद्धति से है। वास्तव में धर्म और संप्रदाय में अंतर है।

संप्रदाय एक विशेष पूजा-पद्धति, परंपरा या अनुशासन हो सकता है। लेकिन धर्म उससे व्यापक है।

धर्म को एक सार्वभौमिक तत्व के रूप में देखा गया है—ऐसा तत्व जिसके बिना किसी व्यवस्था का अस्तित्व और उसका संतुलन संभव नहीं।

महर्षि पतंजलि की परंपरा में धर्म के व्यावहारिक आधार के रूप में यम और नियम का उल्लेख मिलता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम हैं; शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान नियम हैं।

ये किसी एक संप्रदाय तक सीमित मूल्य नहीं हैं। सत्य, अहिंसा, संयम, संतोष और आत्म-अनुशासन जैसे मूल्य किसी भी स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक हैं।

इसीलिए संस्कृत के माध्यम से धर्म को समझाने का अर्थ किसी विशेष संप्रदाय का प्रचार करना नहीं, बल्कि उन सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों को समझना है जो मनुष्य और समाज के संतुलन के लिए आवश्यक हैं।

मनुष्य के अस्तित्व की तीन शक्तियाँ

मनुष्य के अस्तित्व और उसके समुचित विकास के लिए तीन प्रकार की शक्तियाँ आवश्यक हैं—

शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और बौद्धिक शक्ति।

योग शारीरिक शक्ति को संतुलित और समर्थ बनाने में सहायता करता है। उपासना, ध्यान और अनुशासन मानसिक शक्ति को विकसित करते हैं। ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन बौद्धिक शक्ति को प्रखर बनाते हैं।

पतंजलि का प्रसिद्ध सूत्र है—

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”

योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं है। वह चित्त के अनुशासन से जुड़ा हुआ है।

इस प्रकार योग शरीर और मन दोनों के संतुलन का मार्ग प्रस्तुत करता है, जबकि ज्ञान बौद्धिक शक्ति को विकसित करता है।

मनुष्य के समग्र विकास के लिए इन तीनों शक्तियों का संतुलन आवश्यक है।

और इन तीनों के विकास से संबंधित विशाल ज्ञान-परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।

योग और आयुर्वेद : समग्र मनुष्य की चिंता

महर्षि पतंजलि के संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक है—

“योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”

यह परंपरा चित्त, वाणी और शरीर—तीनों के शोधन की ओर संकेत करती है।

आयुर्वेद भी मनुष्य को केवल रोगों के समूह के रूप में नहीं देखता। उसका उद्देश्य स्वास्थ्य की रक्षा और रोग की स्थिति में उसके निवारण से जुड़ा है—

“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्।”

आज जब आधुनिक शिक्षा में स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र जीवन-शैली पर चर्चा बढ़ रही है, तब संस्कृत के मूल ग्रंथों में उपलब्ध इस ज्ञान से विद्यार्थियों को परिचित कराना अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

संस्कृत और मनोविज्ञान : भावों का सूक्ष्म संसार

यदि आधुनिक मनोविज्ञान की बात करें, तो संस्कृत साहित्य और नाट्यशास्त्र में मानवीय भावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है।

आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भावों और उनके परस्पर संबंधों का विस्तृत विवेचन है। परंपरागत रूप से आठ स्थायी भाव, आठ सात्त्विक भाव और तैंतीस संचारी भावों की चर्चा की जाती है।

अर्थात् कुल 49 भावों का यह वर्गीकरण मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों को समझने का अत्यंत सूक्ष्म ढाँचा प्रस्तुत करता है।

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, सात्त्विक भाव और स्थायी भाव—इन सबके माध्यम से मनुष्य की भावात्मक दुनिया को समझने का प्रयास किया गया है।

आज जिस Emotional Intelligence की चर्चा प्रबंधन और मनोविज्ञान में होती है, उसके संदर्भ में नाट्यशास्त्र की यह परंपरा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है।

इसलिए संस्कृत को केवल प्राचीन साहित्य की भाषा समझना उसके विशाल ज्ञान-संसार को सीमित कर देना होगा।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र और ‘मनुष्यवती भूमि’

प्रबंधन और राजनीति की बात करें तो आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमारे सामने एक विशाल ज्ञान-संसार खोलता है।

कौटिल्य के यहाँ अर्थ केवल धन-संपत्ति का नाम नहीं है। राष्ट्र को समझने के लिए वे “मनुष्यवती भूमि” की अवधारणा सामने रखते हैं—मनुष्यों से युक्त भूमि।

पर्वत, नदियाँ, वन और भूभाग राष्ट्र के भौतिक आधार हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग कौन करता है? मनुष्य।

मनुष्य में विवेक है, औचित्य और अनौचित्य को समझने की क्षमता है। इसलिए मनुष्य का निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण का आधार बनता है।

इसीलिए राष्ट्र का वास्तविक सामर्थ्य उसके भूभाग से उतना नहीं, जितना उसके मनुष्यों की गुणवत्ता से निर्धारित होता है।

नेतृत्व के संस्कृत सूत्र

संस्कृत साहित्य में नेतृत्व के गुणों का भी सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

एक श्लोक में कहा गया है—

“विनीतो मधुरः त्यागी दक्षः प्रियवाक् तथा।
लोकवेदविदुत्साही स्मृतिप्रज्ञाकलान्वितः॥”

नेता कैसा हो?

वह विनीत हो। लेकिन विनय का अर्थ डरपोक होना नहीं है। विनय का अर्थ है—औचित्य की रक्षा करते हुए समय और परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करना।

वह मधुर हो—उसकी वाणी संतुलित हो।

वह त्यागी हो—पद और अधिकार को केवल अपने सुख के लिए न उपयोग करे।

वह दक्ष हो—अपने कार्य में निपुण हो।

वह प्रियवाक् हो—उसकी भाषा समाज को जोड़ने वाली हो।

इसी संदर्भ में हमारी परंपरा कहती है—

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्॥”

ये केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं। ये नेतृत्व और सामाजिक व्यवहार के व्यावहारिक सूत्र भी हैं।

धर्म का एक महत्वपूर्ण लक्षण धैर्य माना गया है। धैर्य के बिना नेतृत्व संभव नहीं।

और प्रसिद्ध पंक्ति है—

“विद्या ददाति विनयम्,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति,
धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥”

यह केवल श्लोक नहीं, जीवन की एक क्रमबद्ध दृष्टि है—विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से संपदा, संपदा से धर्म और धर्म से सुख।

भारतीय ज्ञान-परंपरा जड़ नहीं, निरंतर विकसित होने वाली परंपरा है

भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह समय के अनुसार अपनी प्रस्तुति बदलती रही है।

हम वेद से वेदांगों तक गए, वेदांगों से मीमांसा और न्याय तक पहुँचे, धर्मशास्त्र और पुराणों तक आए। मूल सिद्धांत और आदर्श बने रहे, लेकिन समाज तक उन्हें पहुँचाने की विधियाँ बदलती रहीं।

जब केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज को पर्याप्त रूप से संबोधित करना कठिन लगा, तब प्रस्तुति की नई विधियाँ विकसित हुईं।

नाट्यशास्त्र इसी प्रक्रिया का एक बड़ा उदाहरण है।

नाट्य का एक उद्देश्य लोकानुरंजन भी था—लोक तक बात किस प्रकार पहुँचाई जाए, यह भी महत्वपूर्ण था।

हमारी परंपरा के शास्त्र केवल एकांत में बैठे ऋषियों की कल्पना का परिणाम नहीं थे। ऋषि-मुनि समाज के बीच जाते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे, उनके साथ संवाद करते थे और जीवन का निरीक्षण करते थे।

चातुर्मास के समय नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर विचार-विमर्श की परंपरा रही। इस संवाद और चिंतन के माध्यम से जीवन की समस्याओं के शास्त्रीय समाधान खोजे गए।

इस दृष्टि से शास्त्र किसी एक व्यक्ति की मनमानी स्थापना नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और परीक्षण की दीर्घ परंपरा का परिणाम समझे जा सकते हैं।

तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों में समझना उपयोगी है—

1. तत्त्वमीमांसा

इसमें लोक और अस्तित्व का अध्ययन किया जाता है। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से जगत के स्वरूप को समझने का प्रयास किया गया।

2. प्रमाणमीमांसा

हमने जो अनुभव किया, उसे सही कैसे मानें? उसके प्रमाण क्या हैं? उसका परीक्षण कैसे हो? प्रमाणमीमांसा इसी प्रश्न से जुड़ी है।

3. व्यवहारमीमांसा

ज्ञान केवल ग्रंथों में बंद नहीं रहता। उसे जीवन और समाज तक ले जाना आवश्यक है।

इसी व्यवहार की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीवन, समाज, कर्तव्य, नेतृत्व, नीति और मानवीय संबंधों के विशाल ग्रंथ हैं।

वेद से पुराण और संत साहित्य तक : ज्ञान का लोकाभिमुखीकरण

समय के अनुसार ज्ञान को लोक तक पहुँचाने के लिए स्मृतियाँ रची गईं, इतिहास की परंपरा विकसित हुई और पुराणों की रचना हुई।

पुराणों में आख्यान और उपाख्यानों के माध्यम से जटिल सिद्धांतों को लोक के लिए सरल बनाया गया।

एक छोटा-सा श्लोक जीवन के अनेक सूत्रों को सामने रखता है—

“किं बीजं शस्यं धर्मः?
स किम् भूषणं यशः?
कोषस्य बन्धुः कः? उत्साहः।
सिद्धेः किं साधनम्? नयः।”

अर्थात् कल्याण का मार्ग धर्म है। सज्जन व्यक्ति का आभूषण यश है। लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।

नीति को यदि जीवन-प्रबंधन के रूप में देखें, तो समय और शक्ति का उचित प्रबंधन सफलता का आधार बनता है।

एक छोटे-से श्लोक में जीवन का इतना व्यापक दर्शन समाहित हो जाना संस्कृत साहित्य की विशेषता है।

इसके बाद कालिदास, भास, अश्वघोष, माघ, भारवि और श्रीहर्ष जैसे महाकवियों ने उन्हीं आदर्शों को साहित्य के विभिन्न रूपों में आगे बढ़ाया।

संकट के समय लोकभाषाओं में पहुँचा भारतीय ज्ञान

चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियों का सामना किया। इस काल में संत परंपरा ने समाज के भीतर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, सूरदास और कबीरदास जैसे संतों ने भी लोकभाषाओं में अपने विचारों को व्यक्त किया।

यहाँ संस्कृत के आदर्श समाप्त नहीं हुए; उनकी प्रस्तुति की भाषा बदल गई।

ज्ञान यदि लोक तक नहीं पहुँचे, तो वह समाज की शक्ति नहीं बन सकता। इसलिए संत साहित्य ने लोकभाषाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों, राम-कृष्ण, भक्ति, नीति और आध्यात्मिक दृष्टि को सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि सामान्य व्यक्ति अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल से जुड़ा रहा।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता है—सिद्धांतों को बचाए रखते हुए उनकी प्रस्तुति को समयानुकूल बनाना।

आज इसी दृष्टि को हम आधुनिक भाषा में Indian Knowledge System कह सकते हैं।

संस्कृत और भारतीय पहचान

भारतीय होने की पहचान केवल इस बात से नहीं हो सकती कि हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, वैज्ञानिक हैं, प्रबंधक हैं या तकनीकी विशेषज्ञ हैं।

ये सभी उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन एक भारतीय की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रश्न यह भी है—

क्या हम अपने शास्त्रों को जानते हैं?

क्या हम रामायण को जानते हैं?

क्या हम महाभारत को जानते हैं?

क्या हम गीता को जानते हैं?

महाभारत में विदुरनीति जैसी नीति-परंपरा है और भीष्मपर्व में श्रीमद्भगवद्गीता है। विदुरनीति को लोक-जीवन के लिए नीति का एक महत्त्वपूर्ण उपदेश माना जा सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता की व्यापकता तो सर्वविदित है। अनेक परंपराओं और देशों के लोगों ने उसके विचारों में रुचि ली है।

हम उसे मूल संस्कृत में पढ़ें, यह सबसे अच्छा है; लेकिन यदि कोई व्यक्ति अनुवाद के माध्यम से पढ़ता है, तब भी कम-से-कम उसकी विषय-वस्तु से परिचित होना आवश्यक है।

महाभारत : ज्ञान का विराट प्रकाश-पुंज

महाभारत के बारे में एक विचित्र धारणा समाज में फैली हुई है कि घर में महाभारत रखने से घर में कलह होती है।

यह धारणा महाभारत को पढ़ने से रोकती है, जबकि महाभारत स्वयं जीवन के अत्यंत जटिल प्रश्नों का सामना करने वाला ग्रंथ है।

महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, धर्म है, मनोविज्ञान है, परिवार है, नेतृत्व है, नैतिक संकट है और मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष हैं।

गांधारी का चरित्र इसका एक उदाहरण है। एक ओर पुत्र के प्रति उसका मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर वही गांधारी दुर्योधन को धर्म की विजय का आशीर्वाद देती है।

महाभारत के प्रसंगों में मनुष्य की जटिलता इसी प्रकार दिखाई देती है।

इसलिए महाभारत को पढ़ना केवल कथा जानना नहीं है; यह मनुष्य और समाज को समझने का एक अवसर है।

संस्कृत और आधुनिक विषय : कोई क्षेत्र अछूता नहीं

यदि हम आधुनिक विषयों को देखें तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसके लिए संस्कृत में कोई न कोई महत्वपूर्ण ज्ञान-स्रोत न मिलता हो।

योग, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, राजनीति, नाट्य, काव्य, व्याकरण, दर्शन, गणित, ज्योतिष और अनेक कलाओं की समृद्ध परंपराएँ संस्कृत में उपलब्ध हैं।

आयुर्वेद के विद्यार्थी संस्कृत की ओर इसलिए आते हैं क्योंकि उसके अनेक मूल ग्रंथ संस्कृत में हैं।

देश के अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग हैं। शिक्षा, शोध, अध्यापन, मीडिया, आकाशवाणी, दूरदर्शन, प्रशासन और अनेक क्षेत्रों में संस्कृत से जुड़े अवसर मौजूद हैं।

संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफलता प्राप्त की है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत का संबंध केवल रोजगार से नहीं है। उसका संबंध उस ज्ञान से है जो विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझने में सहायता करता है।

संस्कृत का भविष्य उसके विद्यार्थियों पर निर्भर है

किसी भी भाषा का भविष्य उसके बोलने, पढ़ने और सीखने वालों की संख्या पर निर्भर करता है।

इतिहास में अनेक भाषाएँ ऐसी रही हैं जिनका कभी व्यापक लोक-प्रयोग था, लेकिन बाद में उनके बोलने वालों की संख्या घटती गई।

पाली और प्राकृत का उदाहरण सामने है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों और सामाजिक समूहों के लिए अलग-अलग भाषिक रूपों का प्रयोग मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में बहुभाषिकता की समृद्ध परंपरा थी।

आज यदि किसी भाषा के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था तो हो, लेकिन उसके वास्तविक भाषक लगातार कम होते जाएँ, तो उसके भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।

संस्कृत के संदर्भ में स्थिति आशाजनक है, क्योंकि आज भी उसके अध्ययन के लिए संस्थाएँ हैं, विद्यालय हैं, विश्वविद्यालय हैं और अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसी संस्थाएँ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी संस्कृत को विषय के रूप में चुन रहे हैं।

नई शिक्षा नीति ने इस आधार को और व्यापक करने का अवसर दिया है।

संस्कृत और मूल्य शिक्षा

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत Value Added Course या मूल्यवर्धित पाठ्यक्रम के माध्यम से भी संस्कृत को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

मानव-मूल्यों की शिक्षा के लिए संस्कृत से बेहतर स्रोतों में से एक क्या हो सकता है?

संस्कृत साहित्य सूक्तियों, सुभाषितों और नीति-वचनों से भरा हुआ है।

किसी विद्यार्थी का मुख्य विषय कृषि हो सकता है, विज्ञान हो सकता है, प्रबंधन हो सकता है या चिकित्सा। फिर भी यदि वह अपने अध्ययन-काल में संस्कृत के कुछ ग्रंथों और विचारों से परिचित होता है, तो उसके भीतर एक सांस्कृतिक संस्कार विकसित हो सकता है।

संस्कार कभी-कभी बहुत धीरे-धीरे काम करता है।

जैसे किसी घड़े को बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाए, तो घड़ा टूटने तक वह आकृति उसके साथ रहती है; उसी प्रकार विद्यार्थी-जीवन में पड़ा संस्कार भी लंबे समय तक उसके व्यक्तित्व के साथ रह सकता है।

आज संस्कृत का विद्यार्थी भले ही आगे चलकर किसी अन्य क्षेत्र में चला जाए, लेकिन वह उस क्षेत्र में भी भारतीय ज्ञान-परंपरा के लिए कुछ कर सकता है।

एक भारतीय के रूप में हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी

विदेश जाने वाले अनेक भारतीयों का अनुभव है कि वहाँ लोग उनसे केवल यह नहीं पूछते कि वे डॉक्टर हैं या इंजीनियर अथवा वैज्ञानिक।

वे पूछते हैं—

रामायण जानते हैं?

महाभारत जानते हैं?

गीता पढ़ी है?

और तब एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। हम भारत की आधुनिक उपलब्धियों के प्रतिनिधि बनकर विदेश जाते हैं, लेकिन जब हमारी अपनी परंपरा के मूल ग्रंथों के बारे में प्रश्न होता है, तो हमारे पास उत्तर नहीं होता।

यह स्थिति हमें सोचने के लिए बाध्य करती है।

यदि इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा हमारे पास है और हम ही उससे परिचित नहीं हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

हम स्वयं।

इसलिए संस्कृत दिवस जैसे अवसर केवल समारोह के लिए नहीं होने चाहिए। उन्हें व्यक्तिगत संकल्प का अवसर बनाना चाहिए।

कोई व्यक्ति संकल्प ले सकता है—

इस वर्ष मैं रघुवंश का प्रथम सर्ग पढ़ूँगा।

या—

मैं श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ूँगा।

या—

मैं कालिदास का अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ूँगा।

या—

मैं महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग पढ़ूँगा।

यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर हम एक छोटा-सा संकल्प लें और उसे पूरा करें, तो कुछ वर्षों में हमारे पास संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक बड़ा व्यक्तिगत संसार तैयार हो सकता है।

और यदि हम अपने बच्चों को भी उसमें सहभागी बनाएँ, तो यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँच सकती है।

संस्कृत : केवल संस्कृत विभाग की जिम्मेदारी नहीं

संस्कृत को बचाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल संस्कृत के विद्यार्थियों या अध्यापकों की नहीं है।

यह उन सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है जो अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना चाहते हैं।

लेकिन संस्कृत के अध्यापकों की जिम्मेदारी निश्चित रूप से अधिक है, क्योंकि अब उनके सामने अवसर भी बड़ा है।

उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।

उन्हें विज्ञान के विद्यार्थी से विज्ञान की भाषा में संवाद करना होगा। प्रबंधन के विद्यार्थी को प्रबंधन से संबंधित उदाहरण देने होंगे। मनोविज्ञान के विद्यार्थी को भाव और मन के संदर्भ में संस्कृत की सामग्री समझानी होगी।

उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है; वह वर्तमान के प्रश्नों से भी संवाद कर सकती है।

ज्ञान को फिर से अपने मूल से जोड़ने की आवश्यकता

आधुनिक शिक्षा के विकास के दौरान भारत में अनेक पाश्चात्य सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ा। परिणामस्वरूप शिक्षा के अनेक क्षेत्रों में भारतीय स्रोतों का अध्ययन कम होता गया।

इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि हम आधुनिक ज्ञान को छोड़ दें। ऐसा करना न तो आवश्यक है और न ही उचित।

चुनौती यह है कि आधुनिक ज्ञान के साथ अपने मूल ज्ञान-स्रोतों को भी पढ़ा जाए।

यदि प्रबंधन पढ़ रहे हैं तो कौटिल्य को भी पढ़ें।

यदि मनोविज्ञान पढ़ रहे हैं तो नाट्यशास्त्र और भारतीय मनोवैज्ञानिक परंपराओं को भी देखें।

यदि चिकित्सा पढ़ रहे हैं तो आयुर्वेद के मूल ग्रंथों से परिचित हों।

यदि नेतृत्व पढ़ रहे हैं तो गीता, महाभारत और नीति-साहित्य के सूत्रों को भी देखें।

यदि साहित्य पढ़ रहे हैं तो कालिदास, भास, भवभूति, माघ, भारवि और श्रीहर्ष को जानें।

अर्थात् आधुनिकता और परंपरा को परस्पर विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संवाद स्थापित किया जाए।

आज इन पंक्तियों को केवल संस्कृत-प्रचार के नारे के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

निष्कर्ष : संस्कृत की ‘सुगंध’ हर विद्यार्थी तक पहुँचे

नई शिक्षा नीति ने संस्कृत के सामने एक अभूतपूर्व अवसर रखा है।

अब संस्कृत को केवल संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। वह विज्ञान के विद्यार्थी तक जा सकती है, वाणिज्य के विद्यार्थी तक जा सकती है, प्रबंधन के विद्यार्थी तक जा सकती है, चिकित्सा के विद्यार्थी तक जा सकती है और कला तथा सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों तक भी पहुँच सकती है।

लेकिन इसके लिए केवल पाठ्यक्रम बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

हमें अपनी प्रस्तुति की विधि बदलनी होगी।

हमें सरल भाषा अपनानी होगी।
हमें तर्क देना होगा।
हमें उदाहरण देने होंगे।
हमें आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा।
हमें छोटे-छोटे नोट्स और उपयोगी संदर्भ उपलब्ध कराने होंगे।
हमें विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए स्वयं भी लगातार अध्ययन करना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात—हमें संस्कृत को केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान की एक विशाल परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना होगा।

भारत का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे कितने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रबंधक हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन सबके भीतर अपने समाज, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के प्रति कितनी समझ और संवेदना है।

इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर एक छोटा-सा संकल्प जगाएँ।

रामायण पढ़ेंगे।
महाभारत पढ़ेंगे।
गीता पढ़ेंगे।
कालिदास को पढ़ेंगे।
पतंजलि को जानेंगे।
कौटिल्य को समझेंगे।
और अपनी अगली पीढ़ी को भी इस ज्ञान-परंपरा से परिचित कराएँगे।

क्योंकि संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के हाथ में नहीं है। यह उस प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में है जो भारत की पहचान को केवल वर्तमान की उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी दीर्घ बौद्धिक परंपरा में भी देखता है।

हम आधुनिक बनें, वैज्ञानिक बनें, तकनीकी रूप से समर्थ बनें, विश्व के श्रेष्ठतम संस्थानों में जाएँ—लेकिन अपनी जड़ों को भूलकर नहीं।

भारत की वास्तविक शक्ति केवल उसकी तकनीक में नहीं, उसकी प्रज्ञा और परंपरा में भी निहित है।

नई शिक्षा नीति के माध्यम से यदि संस्कृत में निहित इस ज्ञान-राशि की ‘सुगंध’ प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुँचती है, तो यह केवल संस्कृत का प्रचार नहीं होगा।

यह भारतीय ज्ञान-परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा होगी।

और शायद यही इस समय संस्कृत के सामने उपस्थित सबसे बड़ा अवसर भी है और सबसे बड़ा दायित्व भी।

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संस्कृत और नवीन शिक्षा नीति : ज्ञान-परंपरा से आधुनिक शिक्षा तक

आधुनिक शिक्षा प्रणाली अब संस्कृत को केवल एक विषय तक सीमित न रखकर उसे विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान और अन्य विभिन्न संकायों से जोड़ रही है। नवीन शिक्षा नीति के माध्यम से संस्कृत के अध्ययन के द्वार उन विद्यार्थियों के लिए भी खोले जा रहे हैं, जिनका संस्कृत से पहले कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा है।

संस्कृत केवल भाषा नहीं है। यह भारत की उस विशाल ज्ञान-परंपरा की भाषा है, जिसमें दर्शन, धर्म, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, योग, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, साहित्य, राजनीति, समाज और जीवन-व्यवहार से संबंधित विपुल ज्ञान सुरक्षित है। आवश्यकता इस बात की है कि इस ज्ञान-राशि को आधुनिक विद्यार्थियों और समाज के व्यापक वर्ग तक उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप पहुँचाया जाए।

संस्कृत : समग्र ज्ञान-परंपरा की भाषा

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं—वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि। इसके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र को भी लिया जाए तथा इसके बाद चौंसठ कलाओं को देखें, जिन्हें उपविद्याओं के रूप में माना गया है, तो स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक अत्यंत व्यापक वाङ्मय संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।

आज इनमें से अनेक विषय अलग-अलग आधुनिक विभागों और संकायों में पढ़ाए जाते हैं। समस्या यह है कि अनेक बार इन विषयों का अध्ययन उनके संस्कृत मूल से अलग होकर होता है। इसलिए आवश्यकता है कि इन विषयों को उनके मूल स्रोतों से जोड़ा जाए और संस्कृत में निहित उनके मूल सूत्रों तथा दृष्टिकोणों को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए।

नवीन शिक्षा नीति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

संस्कृत के अध्ययन का विस्तार

पहले संस्कृत का अध्ययन मुख्यतः संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित माना जाता था। संस्कृत विभाग में आने वाला विद्यार्थी पहले से ही संस्कृत की पृष्ठभूमि लेकर आता था। उसके लिए संस्कृत के किसी विषय को पढ़ाना अपेक्षाकृत सरल था।

लेकिन यदि आपके सामने प्रबंधशास्त्र का विद्यार्थी आ जाए, विज्ञान का विद्यार्थी आ जाए या वाणिज्य का विद्यार्थी आ जाए, तो स्थिति बदल जाती है। उसमें संस्कृत की पृष्ठभूमि नहीं है। वह श्रद्धा के साथ आपके पास आया है, लेकिन उसके भीतर तर्क-बुद्धि भी है। वह प्रश्न करेगा—“ऐसा क्यों हुआ? ऐसा क्यों है?”

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अब केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को समझना होगा, उनके प्रश्नों के तार्किक उत्तर देने होंगे और अपने विषय को उनकी बौद्धिक पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रस्तुत करना होगा।

यही संस्कृत अध्यापकों के सामने नवीन शिक्षा नीति द्वारा प्रस्तुत एक बड़ी चुनौती भी है और बड़ा अवसर भी।

ज्ञान सभी तक, समान रूप से और गुणवत्ता के साथ

नवीन शिक्षा नीति के संदर्भ में संस्कृत की ज्ञान-राशि को समाज तक पहुँचाने के तीन प्रमुख लक्ष्य माने जा सकते हैं—

  1. यह ज्ञान सभी तक पहुँचे।

  2. सभी तक समान रूप से पहुँचे।

  3. पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

आज संस्कृत या वेद आदि के अध्ययन के संबंध में पहले जैसी सामाजिक अथवा स्थान-विशेष की सीमाएँ नहीं हैं। आज कोई भी व्यक्ति संस्कृत सीख सकता है, वेद पढ़ सकता है और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझ सकता है।

इसलिए संस्कृत के अध्यापकों का दायित्व है कि वे इस खुले हुए अवसर का उपयोग करें और ज्ञान को अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

संस्कृत पढ़ाने की पद्धति भी बदलनी होगी

जब विद्यार्थी संस्कृत की पृष्ठभूमि के बिना संस्कृत के किसी पाठ्यक्रम में आएगा, तो उसे सीधे पारंपरिक शास्त्रीय पद्धति से पढ़ाना हमेशा प्रभावी नहीं होगा। हमें अपनी प्रस्तुति की विधियों को भी बदलना होगा।

इसके लिए आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, दृश्य सामग्री, उदाहरण, संक्षिप्त नोट्स और सरल भाषा में तैयार संदर्भ-सामग्री विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती है।

जिस विद्यार्थी ने पहले संस्कृत नहीं पढ़ी है, उसे ऐसे लिखित नोट्स उपलब्ध कराने होंगे जिनके माध्यम से वह विषय को आसानी से समझ सके। साथ ही, सरल भाषा में उपलब्ध उपयोगी संदर्भ-ग्रंथों की जानकारी भी उसे देनी होगी।

हमें विधियाँ बनानी होंगी, तर्क तैयार करने होंगे, उदाहरण देने होंगे और ऐसी प्रस्तुतियाँ विकसित करनी होंगी जिनके माध्यम से संस्कृत की ज्ञान-परंपरा आधुनिक विद्यार्थी तक सहज रूप में पहुँच सके।

रामायण को केवल कथा के रूप में नहीं, जीवन-दृष्टि के रूप में समझना

इसका एक अच्छा उदाहरण रामायण है।

रामायण में कितने कांड हैं, उसकी कथा क्या है—यह हमारे समाज के बहुत बड़े वर्ग को मालूम है। लेकिन प्रश्न यह है कि राम क्या हैं और राम का अयन क्या है?

यदि इन दोनों दृष्टियों से रामायण को प्रस्तुत किया जाए, तो वह विद्यार्थी भी रामायण के प्रति उत्सुक हो सकता है, जिसकी संस्कृत अथवा भारतीय परंपरा में पहले से कोई विशेष रुचि न हो।

साहित्य की दृष्टि से देखें तो राम आलंबन-विभाव हैं और राम का अयन उद्दीपन-विभाव के रूप में देखा जा सकता है। ‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग। राम का जीवन जिस मार्ग को प्रस्तुत करता है, वही रामत्व की ओर ले जाता है।

इसलिए रामायण का महत्व केवल राम के चरित्र में नहीं, बल्कि उस मार्ग में भी है जिसे राम ने अपने जीवन से प्रस्तुत किया।

यदि हम उस अयन को अपने जीवन में अपनाएँ, तो हमारा जीवन भी अधिक सार्थक हो सकता है।

भारतीय परंपरा तर्क-विहीन नहीं है

हमारी परंपरा के संबंध में अनेक प्रश्न उठाए जाते हैं—“संस्कृत में ऐसा क्यों है?”, “इस परंपरा में ऐसा क्यों कहा गया है?” आदि।

इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए आवश्यक है कि परंपरा को समग्रता में देखा जाए। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में अनेक बातें अत्यंत तार्किक ढंग से व्यवस्थित की गई हैं। वहाँ मनुष्य के जीवन, समाज और व्यवहार को लेकर गहरा चिंतन मिलता है।

इसी संदर्भ में धर्म और संप्रदाय के अंतर को समझना भी आवश्यक है।

संप्रदाय का अर्थ एक विशेष पूजा-पद्धति या अनुशासन से हो सकता है, लेकिन धर्म उससे कहीं व्यापक अवधारणा है। धर्म को एक सार्वभौमिक तत्व के रूप में देखा गया है, जिसके बिना किसी व्यवस्था का स्थायित्व संभव नहीं।

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र की परंपरा में धर्म के व्यवहारिक पक्ष को यम और नियम के माध्यम से स्पष्ट किया। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान जैसे सिद्धांत मानव जीवन के लिए सार्वभौमिक मूल्य प्रस्तुत करते हैं।

योग : शरीर, मन और बुद्धि का संतुलन

महर्षि पतंजलि की परंपरा को स्मरण करते हुए प्रसिद्ध श्लोक है—

“योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”

इसमें पतंजलि को चित्त, वाणी और शरीर के दोषों को दूर करने वाले महर्षि के रूप में नमन किया गया है।

योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है। मनुष्य की तीन प्रमुख शक्तियों—शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्ति—के विकास और संतुलन की दृष्टि से भी योग और भारतीय ज्ञान-परंपरा महत्वपूर्ण है।

योग से शरीर का सामर्थ्य बना रहता है। “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” के माध्यम से मानसिक अनुशासन की बात सामने आती है और ज्ञान के माध्यम से बौद्धिक शक्ति का विकास होता है।

मनुष्य के समग्र अस्तित्व के लिए ये तीनों शक्तियाँ आवश्यक हैं। इस दृष्टि से संस्कृत में उपलब्ध योगविद्या आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि

इसी प्रकार आयुर्वेद मनुष्य के स्वास्थ्य को केवल रोग के उपचार तक सीमित करके नहीं देखता। उसका उद्देश्य स्वास्थ्य की रक्षा और रोग की चिकित्सा दोनों है।

आयुर्वेद की प्रसिद्ध उक्ति है—

“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”

अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के विकार का प्रशमन करना आयुर्वेद का उद्देश्य है।

इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का कौन-सा ऐसा क्षेत्र है, जिसकी कोई जड़ या समानांतर चिंतन भारतीय संस्कृत वाङ्मय में उपलब्ध नहीं है?

समाजशास्त्र की बात करें, राजनीति की बात करें, अर्थशास्त्र की बात करें, मनोविज्ञान की बात करें या प्रबंधन की—भारतीय ज्ञान-परंपरा में इन सभी क्षेत्रों से संबंधित गहरा चिंतन मिलता है।

संस्कृत में मनोविज्ञान की सूक्ष्मता

विशेष रूप से साहित्य और नाट्यशास्त्र में मनोविज्ञान का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

भारतीय काव्यशास्त्र में स्थायी भाव, सात्त्विक भाव और संचारी भावों का विश्लेषण किया गया है। विभाव, अनुभाव, संचारी भाव और सात्त्विक भावों के माध्यम से मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति और उनके प्रभाव को समझाया गया है।

यह केवल साहित्यिक सिद्धांत नहीं है। यह मनुष्य के भीतर घटित होने वाली भावनात्मक प्रक्रियाओं का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन भी है।

महर्षि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इस दृष्टि से भारतीय ज्ञान-परंपरा की अद्भुत उपलब्धि है। लोक में दिखाई देने वाली भावनाओं और उनके प्रदर्शन की विविध विधियों को उन्होंने शास्त्रीय रूप में व्यवस्थित किया।

अर्थशास्त्र और प्रबंधन

प्रबंधन की दृष्टि से भी संस्कृत वाङ्मय अत्यंत समृद्ध है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल अर्थव्यवस्था का ग्रंथ नहीं है। उसमें लोक-प्रबंधन, शासन-व्यवस्था, प्रशासन, राजनीति, राज्य-व्यवस्था और मनुष्य के संगठन से संबंधित अनेक सूत्र मिलते हैं।

कौटिल्य के अनुसार—

“मनुष्यवती भूमिरर्थः।”

अर्थात् मनुष्यों से युक्त भूमि ही अर्थ है। उस भूमि की रक्षा, शासन और पालन की व्यवस्था से संबंधित शास्त्र को अर्थशास्त्र कहा गया।

इस दृष्टि से राष्ट्र केवल पर्वत, नदियों, वनों और भूमि से नहीं बनता। इन सबका उपयोग करने वाला मनुष्य ही राष्ट्र-निर्माण का वास्तविक केंद्र है। इसलिए मनुष्य का निर्माण ही राष्ट्र का निर्माण है।

संस्कृत और मानव-मूल्य

संस्कृत को केवल ज्ञान की भाषा मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह मानव-मूल्यों और जीवन-संस्कारों की भाषा भी है।

हमारे यहाँ कहा गया है—

“विद्या ददाति विनयम्,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति,
धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥”

विद्या से विनय आता है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

धैर्य मनुष्य को नेतृत्व की क्षमता देता है और विनय उसे समाज में सम्मान प्राप्त करने योग्य बनाता है। विनय का अर्थ डरपोक बनना नहीं है। इसका अर्थ है—औचित्य की रक्षा करते हुए, समय और परिस्थिति के अनुरूप उचित व्यवहार करना।

नेतृत्व के संदर्भ में भी हमारे शास्त्रों में अनेक गुण बताए गए हैं—

“विनीतो मधुरः त्यागी दक्षः प्रियवाक् तथा।
लोकवेदविदुत्साही स्मृतिप्रज्ञाकलान्वितः॥”

विनय, मधुरता, त्याग, दक्षता और प्रिय वचन—ये नेतृत्व के महत्वपूर्ण गुण हैं।

इसी प्रकार—

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्,
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”

सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन सत्य को भी प्रिय और संतुलित ढंग से कहने की शिक्षा हमारी परंपरा देती है।

ये मूल्य किसी एक वर्ग के लिए नहीं हैं। ये अच्छे नागरिक और अच्छे मनुष्य के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

ज्ञान को लोक तक पहुँचाने की भारतीय परंपरा

भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक विशेषता यह रही कि उसने समय के अनुसार अपनी प्रस्तुति की विधि बदली।

चौदह विद्या-स्थानों की परंपरा को देखें तो वेद से वेदांग, वेदांग से मीमांसा, मीमांसा से न्याय, धर्मशास्त्र और फिर पुराण तक ज्ञान की प्रस्तुति का विस्तार दिखाई देता है।

जब यह अनुभव हुआ कि केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन पर्याप्त नहीं है, तब ज्ञान को प्रस्तुत करने की नई विधियाँ विकसित की गईं। नाट्यशास्त्र इसका एक उदाहरण है। उसमें लोकानुरंजन के माध्यम से लोक तक विचारों और आदर्शों को पहुँचाने का प्रयास हुआ।

ऋषि-मुनि केवल एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों की रचना नहीं करते थे। वे लोक के बीच जाते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याओं को सुनते थे, संवाद करते थे और उनका सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। फिर चातुर्मास जैसे अवसरों पर एकत्र होकर उन अनुभवों पर विचार करते और संवाद तथा तर्क के माध्यम से शास्त्रीय समाधान विकसित करते थे।

इसलिए शास्त्र केवल किसी व्यक्ति-विशेष की व्यक्तिगत घोषणा नहीं है। भारतीय परंपरा में संवाद, तर्क और सर्वमान्यता का महत्वपूर्ण स्थान है।

तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा और व्यवहारमीमांसा

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन व्यापक स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहली है—तत्त्वमीमांसा। इसमें जगत और उसके तत्त्वों का अध्ययन होता है। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि पदार्थों का विश्लेषण इसी चिंतन का भाग है।

दूसरी है—प्रमाणमीमांसा। हमने जो अनुभव किया, उसे कैसे परखा जाए? वह सत्य है या नहीं? इसका परीक्षण किस प्रकार किया जाए? प्रमाणमीमांसा इन प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करती है।

तीसरी है—व्यवहारमीमांसा। ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखकर लोक-व्यवहार तक कैसे पहुँचाया जाए—यह इसका क्षेत्र है।

इस दृष्टि से महर्षि वाल्मीकि की रामायण और महर्षि वेदव्यास का महाभारत भारतीय व्यवहारशास्त्र के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

इसी प्रकार स्मृतियों, इतिहास और पुराणों की रचना हुई। पुराणों में आख्यान और उपाख्यानों के माध्यम से जटिल सिद्धांतों और जीवन-मूल्यों को सामान्य समाज तक पहुँचाया गया।

एक छोटा-सा संस्कृत श्लोक भी जीवन के अनेक सूत्रों को समेट सकता है—

“किं बीजं शस्यं धर्मः?
स किम् भूषणं यशः?
कोषस्य बन्धुः कः? उत्साहः।
सिद्धेः किं साधनम्? नयः।”

धर्म कल्याण का आधार है, यश सज्जन व्यक्ति का आभूषण है, उत्साह लक्ष्मी का सहायक है और नीति सिद्धि का साधन है।

नीति को यदि जीवन-प्रबंधन के रूप में देखें, तो समय और शक्ति का समुचित प्रबंधन जीवन में सफलता का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।

यही संस्कृत की विशेषता है—एक छोटे से सूत्र में जीवन का व्यापक दर्शन समाहित हो सकता है।

समय के अनुसार ज्ञान की प्रस्तुति

भारतीय परंपरा ने समय के अनुसार अपने ज्ञान को नए साहित्यिक रूपों में प्रस्तुत किया। महाकवि कालिदास, भास, अश्वघोष, माघ, भारवि और श्रीहर्ष जैसे कवियों ने वैदिक आदर्शों और भारतीय जीवन-मूल्यों को नए साहित्यिक रूपों में आगे बढ़ाया।

बाद के कठिन समय में, विशेषकर चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, जब देश अनेक प्रकार के आक्रमणों और सामाजिक परिस्थितियों से गुजर रहा था, संत परंपरा ने लोकभाषाओं के माध्यम से भारतीय मूल्यों को समाज तक पहुँचाने का कार्य किया।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, सूरदास और कबीरदास जैसे संतों ने भी लोकभाषाओं में अपने विचारों को प्रस्तुत किया।

इनकी भाषा ऐसी थी जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सकता था। लेकिन उनके पीछे निहित जीवन-मूल्य और आदर्श भारतीय शास्त्रीय परंपरा से जुड़े हुए थे।

इसका एक उद्देश्य यह भी था कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद सामान्य व्यक्ति अपने मूल, अपनी परंपरा और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहे।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा है।

आज इसी व्यापक परंपरा को Indian Knowledge System (IKS) के रूप में आधुनिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

संस्कृतज्ञों का नया दायित्व

आज संस्कृतज्ञों के सामने एक बड़ा दायित्व है।

जिस प्रकार पुराने समय में ज्ञान को लोक तक पहुँचाने के लिए नए-नए ग्रंथों और प्रस्तुति-विधियों का निर्माण किया गया, उसी प्रकार आज हमें भी अपनी प्रस्तुति की विधियों को समय की आवश्यकताओं के अनुसार परिष्कृत करना होगा।

हमें संस्कृत को उसके पारंपरिक सीमित दायरे से बाहर निकालकर विज्ञान, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, वाणिज्य, सामाजिक विज्ञान और अन्य विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाना होगा।

किसी विद्यार्थी को संस्कृत पढ़ाने का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि वह अनिवार्य रूप से संस्कृत का विद्वान बन जाए। उद्देश्य यह भी हो सकता है कि वह अपने विषय का श्रेष्ठ वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता, प्रबंधक या प्रशासक बने और साथ ही भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित हो।

भारतीय होने की पहचान

हम तकनीकी रूप से कितने उन्नत हैं, इससे हमारी भारतीय पहचान पूरी नहीं होती। हम कितने अच्छे चिकित्सक, अभियंता, वैज्ञानिक या प्रबंधक हैं, यह भी महत्वपूर्ण है, लेकिन भारतीय होने की सांस्कृतिक पहचान इससे आगे की चीज है।

प्रश्न यह भी है—

क्या हम रामायण जानते हैं?

क्या हम महाभारत जानते हैं?

क्या हम भगवद्गीता जानते हैं?

क्या हमें अपने साहित्य और अपनी ज्ञान-परंपरा के मूल विचारों का परिचय है?

महाभारत में विदुरनीति और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महत्वपूर्ण उपदेश-परंपराएँ हैं। विदुरनीति उद्योगपर्व में है और श्रीमद्भगवद्गीता भीष्मपर्व में।

श्रीमद्भगवद्गीता की विशेषता यह है कि वह भारतीय सीमाओं से बाहर भी व्यापक रूप से पढ़ी और स्वीकार की जाती है। यदि कोई व्यक्ति उसे अनुवाद के माध्यम से पढ़ता है, तब भी उसके विषय और चिंतन से परिचित होना महत्वपूर्ण है।

संस्कृत केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए नहीं

यदि कोई कृषि का विद्यार्थी संस्कृत को माइनर विषय के रूप में पढ़ता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह संस्कृत पढ़कर आजीविका कमाएगा। वह कृषि वैज्ञानिक बनेगा।

यदि कोई मनोविज्ञान का विद्यार्थी संस्कृत पढ़ता है, तो वह आगे मनोवैज्ञानिक बन सकता है। कोई प्रबंधन पढ़ रहा है, कोई राजनीति विज्ञान, कोई विज्ञान या वाणिज्य—फिर भी संस्कृत उसके लिए उपयोगी हो सकती है।

क्योंकि संस्कृत उसके भीतर एक सांस्कृतिक और बौद्धिक संस्कार छोड़ सकती है।

किसी विद्यार्थी ने यदि अपने स्नातक जीवन में संस्कृत के कुछ ग्रंथ पढ़ लिए, उनके विचारों को समझ लिया और भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित हो गया, तो संभव है कि भविष्य में वह अपने क्षेत्र में रहते हुए भी संस्कृत और भारतीय ज्ञान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य करे।

इसलिए संस्कृत का विस्तार केवल संस्कृत के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना नहीं है। यह समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़ने का प्रयास भी है।

निष्कर्ष : संस्कृत का भविष्य समाज से जुड़ा है

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत विभागों के भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा के भविष्य का प्रश्न है।

यदि संस्कृत का अध्ययन करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती है, यदि अन्य विषयों के विद्यार्थी संस्कृत के ज्ञान से परिचित होते हैं और यदि भारतीय ज्ञान-परंपरा आधुनिक शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अपना स्थान बनाती है, तो संस्कृत का प्रभाव भी व्यापक होगा।

इसके लिए हमें केवल यह कहने से काम नहीं चलेगा कि संस्कृत में बहुत ज्ञान है। हमें उस ज्ञान को पढ़ना, समझना, परखना और आधुनिक समाज तक पहुँचाना होगा।

संस्कृत दिवस जैसे अवसरों पर यदि हम छोटे-छोटे संकल्प लें—जैसे इस वर्ष गीता का कोई एक अध्याय पढ़ेंगे, रामायण का कोई अंश पढ़ेंगे, कालिदास के किसी ग्रंथ का अध्ययन करेंगे या अपने बच्चों को कुछ संस्कृत श्लोक और उनके अर्थ बताएँगे—तो धीरे-धीरे एक बड़ी सांस्कृतिक यात्रा शुरू हो सकती है।

संस्कृत के भविष्य को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय यही है कि संस्कृत को केवल एक विषय न रहने दिया जाए, बल्कि उसे भारतीय ज्ञान, जीवन-मूल्यों और आधुनिक शिक्षा के बीच एक सेतु बनाया जाए।

क्योंकि संस्कृत में केवल अतीत सुरक्षित नहीं है; उसमें वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने की क्षमता भी निहित है।

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संस्कृत : भारतीय ज्ञान-परंपरा से नई शिक्षा नीति तक

संस्कृत केवल एक भाषा या एक विषय नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान-परंपरा की वाहक है, जिसने जीवन, समाज, शासन, चिकित्सा, मनोविज्ञान, साहित्य, दर्शन और लोकव्यवहार—लगभग हर क्षेत्र को अपने चिंतन से समृद्ध किया है। नई शिक्षा नीति ने पहली बार आधुनिक उच्च शिक्षा की संरचना में इस ज्ञान-परंपरा को व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों तक पहुँचाने का अवसर उपलब्ध कराया है। आवश्यकता केवल इतनी है कि संस्कृत के अध्यापक और विद्यार्थी अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर इस अवसर को पहचानें। संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित क्यों रखा जाए?

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं। वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक व्यापक संसार निर्मित हुआ। इसके साथ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी जोड़कर देखें तो ज्ञान के अनेक स्वतंत्र अनुशासन हमारे सामने आते हैं। इसके अतिरिक्त चौंसठ कलाओं की भी परंपरा रही है।

इन विषयों का विशाल वाङ्मय संस्कृत में उपलब्ध है। आज इनमें से अनेक विषय आधुनिक विश्वविद्यालयों में अलग-अलग विभागों और संकायों में पढ़ाए जाते हैं, लेकिन उनकी मूल भारतीय ज्ञान-परंपरा से उनका संबंध प्रायः विद्यार्थियों के सामने नहीं आ पाता।

यहीं संस्कृत की आवश्यकता सामने आती है।

यदि संस्कृत में निहित इन विषयों के मूल सूत्रों और अवधारणाओं को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए, तो संस्कृत केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान के एक बड़े स्रोत के रूप में सामने आ सकती है।

नई शिक्षा नीति इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

नई शिक्षा नीति और संस्कृत के लिए खुले नए द्वार

पहले संस्कृत का अध्ययन प्रायः संस्कृत विभागों तक सीमित रहता था। संस्कृत के विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते थे और संस्कृत के अध्यापक संस्कृत के विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। अब स्थिति बदल रही है।

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत संस्कृत को माइनर, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टी-डिसिप्लिनरी कोर्स जैसे माध्यमों से अन्य विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाने की संभावना बनी है।

अब विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन और कृषि जैसे विषयों के विद्यार्थी भी संस्कृत से परिचित हो सकते हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों तक संस्कृत पहुँचने लगी है। यह केवल पाठ्यक्रम का परिवर्तन नहीं है; यह संस्कृत के सामाजिक विस्तार की एक बड़ी संभावना है।

इसका अर्थ यह भी है कि संस्कृत विभागों को अपने पुराने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।

भारत सरकार ने शिक्षा के माध्यम से संस्कृत की ज्ञानराशि को व्यापक समाज तक पहुँचाने का अवसर दिया है। अब यह संस्कृत के अध्यापकों पर निर्भर करता है कि वे इस अवसर का उपयोग किस प्रकार करते हैं।

भारतीय ज्ञान-परंपरा का निर्माण लोक से संवाद द्वारा

हमारी परंपरा में शास्त्र केवल किसी एक व्यक्ति के कथन को अंतिम सत्य मानकर नहीं बने। ऋषि-मुनि केवल एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों की रचना नहीं करते थे।

चातुर्मास के समय वे किसी स्थान पर रुकते थे, लेकिन अन्य समय में वे भ्रमण करते थे। वे लोक का सूक्ष्म निरीक्षण करते थे, लोगों से मिलते थे, उनके साथ संवाद करते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे और उनके जीवन को समझते थे।

नैमिषारण्य जैसे स्थान केवल धार्मिक स्थल नहीं थे; वे ज्ञान और संवाद के केंद्र भी थे। वहाँ लोक की समस्याओं पर विचार होता था और संवाद के माध्यम से उनके शास्त्रीय समाधान खोजे जाते थे।

इसलिए भारतीय शास्त्र-परंपरा का एक महत्वपूर्ण आधार संवाद और तर्क है।

हमने किसी व्यक्ति की बात केवल इसलिए स्वीकार नहीं की कि वह किसी महान व्यक्ति की कही हुई बात थी। जो बात संवाद और तर्क के माध्यम से सर्वमान्य हुई, जो समाज के लिए उपयोगी और व्यापक रूप से लागू होने योग्य सिद्ध हुई, उसे शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

इसीलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने के लिए केवल ग्रंथों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उस ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया को समझना भी आवश्यक है।

तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा और व्यवहारमीमांसा।

तत्त्वमीमांसा में हम लोक और सत्ता का अध्ययन करते हैं। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से वस्तु-जगत् को समझने का प्रयास किया गया।

प्रमाणमीमांसा का प्रश्न है—हमने जो जाना या अनुभव किया, वह सही है या नहीं? उसके सत्यापन और मूल्यांकन की क्या पद्धति है?

लेकिन भारतीय ज्ञान केवल तत्त्व और प्रमाण तक सीमित नहीं रहता। वह व्यवहार तक जाता है। इसी को व्यवहारमीमांसा के स्तर पर समझा जा सकता है।

रामायण और महाभारत इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। महर्षि वाल्मीकि की रामायण और महर्षि वेदव्यास का महाभारत केवल कथा-साहित्य नहीं हैं; वे जीवन और व्यवहार के अनेक स्तरों पर मार्गदर्शन देने वाले ग्रंथ हैं।

ज्ञान को लोक तक पहुँचाने की भारतीय पद्धति

समय के साथ यह अनुभव हुआ कि केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक ज्ञान पहुँचाना पर्याप्त नहीं है। इसलिए प्रस्तुति की विधियाँ बदली गईं।

नाट्यशास्त्र इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोकानुरंजन के माध्यम से लोक तक विचार कैसे पहुँचाया जाए—यह प्रश्न भारतीय चिंतन में गंभीरता से लिया गया।

पुराणों में आख्यान और उपाख्यान के माध्यम से आदर्शों को लोक तक पहुँचाया गया। स्मृतियों की रचना हुई। इतिहास की रचना हुई। विभिन्न काव्यों और नाटकों ने उन्हीं मूल आदर्शों को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया।

एक छोटे-से सुभाषित में जीवन के अनेक सूत्र समाहित किए गए हैं—

“किं बीजं शस्यं धर्मः,
स किं भूषणं यशः।
लक्ष्म्याः बन्धुः क उत्साहः,
सिद्धेः किं साधनं नयः।”

अर्थात् कल्याण का बीज धर्म है, सज्जन का आभूषण यश है, लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।

जीवन के लिए इतना बड़ा संदेश इतने छोटे रूप में देना भारतीय सुभाषित परंपरा की विशेषता है।

जब ज्ञान लोकभाषाओं में पहुँचा

चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियाँ देखीं। ऐसे समय में संत परंपरा ने भारतीय ज्ञान और आदर्शों को लोक तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, संत सूरदास और संत कबीर जैसे संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुँचाए।

आदर्श वही थे, जिनकी जड़ें भारतीय परंपरा में थीं, लेकिन भाषा ऐसी थी जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सके।

इसका उद्देश्य केवल साहित्य रचना नहीं था। उद्देश्य यह भी था कि लोगों के मन में अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था बनी रहे और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे अपने मूल से विचलित न हों।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की जीवंतता है।

संस्कृत में आधुनिक विषयों का ज्ञान

आज जब हम विज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान, प्रबंधन या राजनीति जैसे विषयों की बात करते हैं, तो यह मान लेना उचित नहीं होगा कि इनका भारतीय चिंतन में कोई आधार नहीं था।

आयुर्वेद का उद्देश्य ही समग्र स्वास्थ्य की दृष्टि से मनुष्य की रक्षा और रोग की चिकित्सा करना है—“स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”

योग मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से जुड़ता है। यम और नियम के माध्यम से अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान जैसे मूल्यों की चर्चा की गई।

आज जिस योग को पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के संदर्भ में अपनाया जा रहा है, उसकी मूल शास्त्रीय परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।

इसी प्रकार साहित्य में भावों का जो सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है, वह मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और संचारी भावों के माध्यम से मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन मिलता है।

अर्थशास्त्र में शासन, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और राज्य-व्यवस्था के अनेक पक्षों का विवेचन मिलता है।

कौटिल्य ने राजा को मंत्रियों के चयन से लेकर उनकी परीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था तक का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन किया।

इसलिए संस्कृत को केवल धार्मिक या साहित्यिक भाषा मानना उसके वास्तविक ज्ञान-विस्तार को सीमित कर देना है।

संस्कृत और प्रबंधन

आज प्रबंधन एक आधुनिक विषय माना जाता है। लेकिन जीवन और संसाधनों के प्रबंधन के सूत्र भारतीय साहित्य में बहुत पहले से उपलब्ध हैं।

अपरिग्रह को ही लें। मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कितना संग्रह करे? उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन क्या हो? यह प्रश्न आज के आर्थिक संतुलन और सतत विकास की चर्चाओं से भी जुड़ता है।

नीति को केवल राजनीतिक नीति न समझकर जीवन के प्रबंधन के रूप में भी देखा गया है।

समय और शक्ति का समुचित प्रबंधन व्यक्ति को जीवन में सिद्धि की ओर ले जाता है।

इसलिए यदि आधुनिक प्रबंधन का विद्यार्थी संस्कृत के कुछ मूल ग्रंथों और सूत्रों से परिचित होता है, तो वह अपने विषय के साथ एक दूसरी ज्ञान-परंपरा का भी परिचय प्राप्त करता है।

संस्कृत का विद्यार्थी कौन बनेगा?

नई शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित न रखा जाए।

यदि कृषि का विद्यार्थी संस्कृत को माइनर के रूप में पढ़ता है, तो उसका उद्देश्य संस्कृत को जीविका का साधन बनाना नहीं है। वह कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ, कोई प्रबंधन का विद्वान, कोई वैज्ञानिक।

लेकिन यदि उसने संस्कृत पढ़ी है, तो वह भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित होगा।

संस्कृत का एक संस्कार उसके भीतर बनेगा।

जैसे घड़ा बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाती है और वह आकृति घड़े के टूटने तक बनी रहती है, उसी प्रकार विद्यार्थी जीवन में पड़ा संस्कृत का संस्कार जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपना प्रभाव अवश्य दिखा सकता है।

इसलिए संस्कृत पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी का संस्कृतज्ञ बनना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि समाज के बड़े वर्ग को संस्कृत और उसके ज्ञान-संसार से परिचित कराया जाए।

वैल्यू एडेड कोर्स और संस्कृत

वैल्यू एडेड कोर्स, जिसे पहले मूल्य-शिक्षा की दृष्टि से देखा जाता था, संस्कृत के लिए विशेष अवसर प्रदान करता है।

मानव-मूल्यों की चर्चा करनी हो तो संस्कृत साहित्य में सूक्तियों, सुभाषितों, नीति-वचनों और जीवन-दर्शन की विशाल परंपरा उपलब्ध है।

एक विद्यार्थी यदि मेजर में संस्कृत न भी ले, तो वैल्यू एडेड कोर्स या माइनर के माध्यम से संस्कृत से परिचित हो सकता है।

यह संस्कृत के लिए एक बड़ा सामाजिक विस्तार है।

शिक्षक की भूमिका अब बदलनी होगी

जब संस्कृत का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आता है, तो उसके पास पहले से संस्कृत का आधार होता है। उसके मन में श्रद्धा का भाव भी होता है—“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”

लेकिन जब प्रबंधन, विज्ञान, वाणिज्य या कृषि का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आएगा, तो उसके पास श्रद्धा के साथ तर्क-बुद्धि भी होगी।

वह पूछेगा—“ऐसा क्यों है?”

और संस्कृत के अध्यापक को उसके इस प्रश्न का स्वागत करना होगा।

अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि “शास्त्र में ऐसा कहा गया है।” अध्यापक को उसके प्रश्न का तर्कपूर्ण उत्तर देना होगा। उसे उदाहरण देने होंगे, आधुनिक संदर्भों से जोड़ना होगा और विद्यार्थियों की जिज्ञासा को संतुष्ट करना होगा।

यही आज संस्कृत के अध्यापक के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, डिजिटल माध्यम, संक्षिप्त नोट्स, संदर्भ-ग्रंथ और सरल भाषा में तैयार अध्ययन-सामग्री—इन सभी माध्यमों का उपयोग करना होगा।

जिस विद्यार्थी की संस्कृत में कोई पृष्ठभूमि नहीं है, उसे सीधे किसी कठिन मूल ग्रंथ के सामने छोड़ देना उचित नहीं होगा। उसे क्रमशः उस ज्ञान-जगत् में प्रवेश कराना होगा।

रामायण को केवल कथा के रूप में क्यों पढ़ाएँ?

रामायण का नाम सुनते ही अधिकांश भारतीयों को उसकी कथा मालूम होती है। लेकिन राम क्या हैं? और राम का अयन क्या है?

राम को यदि आलंबन-विभाव माना जाए, तो राम का अयन—अर्थात् राम का मार्ग—एक दूसरी दृष्टि प्रदान करता है।

रामायण को केवल राम की कथा के रूप में नहीं, बल्कि राम के मार्ग के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

यदि विद्यार्थी उस मार्ग को समझ ले और अपने जीवन में उसका कुछ अंश भी अपनाए, तो उसके जीवन में परिवर्तन संभव है।

इस प्रकार संस्कृत के ग्रंथों को आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने के लिए केवल कथा बताना पर्याप्त नहीं है; उनके भीतर निहित अवधारणाओं को समझाना भी आवश्यक है।

संस्कृत और भारतीय पहचान

विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीयों के अनुभवों में एक बात सामने आती है। वहाँ लोग केवल यह नहीं पूछते कि भारत से आया व्यक्ति डॉक्टर है, इंजीनियर है या वैज्ञानिक है। वे यह भी अपेक्षा करते हैं कि भारत से आया व्यक्ति रामायण, महाभारत और गीता के बारे में जानता होगा।

जब विदेश में कोई व्यक्ति हमसे गीता, रामायण या महाभारत के बारे में प्रश्न करता है और हम उसका उत्तर नहीं दे पाते, तो यह विचार करने का विषय है।

हमारे पास इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा है और फिर भी हम उससे परिचित नहीं हैं।

दूसरी ओर, दुनिया के अनेक लोग हमारे ग्रंथों को पढ़ रहे हैं, समझ रहे हैं और उनके बारे में प्रश्न कर रहे हैं।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी परंपरा को केवल गौरव के रूप में न दोहराएँ, बल्कि उसे पढ़ें और समझें।

सभी शास्त्र सबको पढ़ने की आवश्यकता नहीं

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति दर्शन, व्याकरण, मीमांसा या न्याय का विशेषज्ञ बने।

दर्शन में जिसकी रुचि है, वह दर्शन पढ़े। जिसे व्याकरण में रुचि है, वह संस्कृत-व्याकरण पढ़े।

लेकिन कुछ ग्रंथ ऐसे हैं, जिनसे प्रत्येक भारतीय को परिचित होना चाहिए।

गीता पढ़नी चाहिए।

रामायण पढ़नी चाहिए।

महाभारत के महत्वपूर्ण अंश पढ़ने चाहिए।

कालिदास की कुछ रचनाओं से परिचित होना चाहिए। जयदेव के गीतगोविंद के पदों का रस समझना चाहिए।

बड़ी-बड़ी पुस्तकों को वर्षों तक टालते रहने की आवश्यकता नहीं है। छोटे लक्ष्य बनाए जा सकते हैं।

संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति संकल्प ले कि वह रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ेगा। कोई गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ने का संकल्प ले। कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ना शुरू करे।

जीवन में कितने संस्कृत दिवस आएँगे। यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर एक छोटा-सा संकल्प लिया जाए, तो वर्षों में एक बड़ी ज्ञान-संपदा अर्जित की जा सकती है।

महाभारत : ज्ञान का विशाल प्रकाश-पुंज

महाभारत को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ हैं। एक प्रचलित धारणा यह भी है कि महाभारत घर में रखने से घर में कलह होती है। ऐसी धारणाएँ हमें इस महान ग्रंथ को पढ़ने से रोकती हैं।

महाभारत को पढ़े बिना उसके बारे में निर्णय करना उचित नहीं है।

महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, नीति है, धर्म है, मनोविज्ञान है, नेतृत्व है और मनुष्य के स्वभाव का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन है।

व्यास कहते हैं—

“धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥”

अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में जो यहाँ है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

महाभारत के चरित्रों को देखें तो इसकी गहराई और स्पष्ट हो जाती है।

भीष्म और द्रोण जैसे महान योद्धाओं को केवल इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि युद्ध का अंतिम परिणाम किसके पक्ष में रहा। उनकी सामर्थ्य, उनकी भूमिका और उनके जीवन के नैतिक द्वंद्व अलग-अलग प्रश्न हैं।

गांधारी का चरित्र भी इसी जटिलता का उदाहरण है। एक ओर उनका पुत्र-मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर दुर्योधन को दिया गया उनका प्रसिद्ध आशीर्वचन है—

“यतो धर्मस्ततो जयः।”

उन्होंने केवल “विजयी भव” नहीं कहा। उन्होंने विजय को धर्म से जोड़ दिया—जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

यही कारण है कि यह वाक्य आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन और न्याय-व्यवस्था के संदर्भों में स्मरण किया जाता है।

महाभारत को पढ़ने का अर्थ केवल कथा जानना नहीं है; मनुष्य और समाज के जटिल प्रश्नों को समझना भी है।

संस्कृत और सामाजिक उत्तरदायित्व

संस्कृत का संबंध केवल विश्वविद्यालयों से नहीं है। आज लगभग प्रत्येक विश्वविद्यालय में किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन उपलब्ध है। विद्यालयों में टी.जी.टी. और पी.जी.टी. के माध्यम से संस्कृत पढ़ाई जाती है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न सांस्कृतिक माध्यमों में भी संस्कृत के लिए स्थान रहा है।

कथावाचकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। समाज को दिशा देने का काम केवल शास्त्र लिखने वालों का नहीं, उन्हें लोक तक पहुँचाने वालों का भी है।

प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि लोककल्याण की चर्चा करते थे। नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर मुनि एकत्र होकर समाज और लोक के कल्याण पर विचार करते थे।

आज कथावाचक, शिक्षक और संस्कृतज्ञ समाज के सामने इसी प्रकार की एक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।

समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। इसलिए समाज को सही दिशा देने का कार्य किसी छोटी जिम्मेदारी का कार्य नहीं है।

संस्कृत और शासन-व्यवस्था

कौटिल्य का अर्थशास्त्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

राजा को मंत्री कैसे नियुक्त करना चाहिए? अधिकारियों की परीक्षा कैसे होनी चाहिए? राज्य-व्यवस्था किस प्रकार संचालित हो? प्रशासन में किस प्रकार की सावधानियाँ रखी जानी चाहिए? इन विषयों पर अर्थशास्त्र में अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

दुःख की बात यह है कि हम इन ग्रंथों का गौरव तो बताते हैं, लेकिन स्वयं उन्हें पढ़ते नहीं।

फिर जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारी ही परंपरा की किसी बात को समझाकर बताता है, तो हमें लगता है—“वाह, क्या बात है!”

अपनी परंपरा से अपरिचित रहने के लिए हमारा एक सामान्य बहाना होता है—“सब संस्कृत में है।”

लेकिन आज अधिकांश महत्वपूर्ण ग्रंथों के हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं। मूल संस्कृत पढ़ने का आनंद और महत्व अपनी जगह है, लेकिन अनुवाद के माध्यम से कम-से-कम विषय-वस्तु से तो परिचित हुआ जा सकता है।

इसलिए “संस्कृत नहीं आती” को अपनी ज्ञान-परंपरा से दूर रहने का स्थायी बहाना नहीं बनाया जा सकता।

संस्कृत का भविष्य

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत विभागों के भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह प्रत्येक भाषा के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

किसी भाषा का भविष्य उसके भाषकों और पाठकों पर निर्भर करता है। दुनिया की अनेक भाषाएँ इसलिए कमजोर या समाप्त हुईं क्योंकि उनके बोलने और पढ़ने वाले कम होते गए।

पाली और प्राकृत इसका उदाहरण हैं। एक समय वे लोक में प्रचलित थीं। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों द्वारा संस्कृत और प्राकृत के प्रयोग से भी तत्कालीन भाषिक स्थिति का संकेत मिलता है।

आज प्राकृत और पाली के बोलने वालों की संख्या सीमित है, यद्यपि उनके अध्ययन-अध्यापन के संस्थान मौजूद हैं।

भाषा को जीवित रखने के लिए केवल विभाग पर्याप्त नहीं हैं। भाषक चाहिए, पाठक चाहिए और व्यवहार चाहिए।

संस्कृत की स्थिति इस दृष्टि से आशाजनक है कि आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न संस्थाओं में संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि भी बढ़ रही है।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसे संस्थान विभिन्न स्थानों पर संस्कृत की कक्षाएँ चलाने और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं।

संस्कृत और संस्कार

कई अभिभावक आज यह चाहते हैं कि उनका बच्चा आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कार भी प्राप्त करे।

उनका प्रश्न होता है—अच्छी शिक्षा तो मिल रही है, लेकिन संस्कार कहाँ से आएँगे?

यहीं संस्कृत की भूमिका सामने आती है।

संस्कृत साहित्य में केवल भाषा का ज्ञान नहीं है। उसमें विनय, धैर्य, नीति, कर्तव्य, संयम, उत्साह, लोककल्याण और जीवन-मूल्यों की विशाल परंपरा है।

इसलिए संस्कृत को केवल रोजगार के प्रश्न से देखना उसके महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा।

संस्कृत का प्रभाव विद्यार्थी के व्यक्तित्व और दृष्टि पर भी पड़ सकता है।

भारतीय होने की पहचान

हम डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वैज्ञानिक बनें, प्रबंधक बनें, शिक्षक बनें या किसी भी क्षेत्र में जाएँ—व्यावसायिक उत्कृष्टता आवश्यक है।

लेकिन भारतीय होने की पहचान केवल हमारी तकनीकी दक्षता से नहीं होगी।

हमारी पहचान इस बात से भी बनेगी कि हम अपनी ज्ञान-परंपरा को कितना जानते हैं।

क्या हम रामायण जानते हैं?

क्या हम महाभारत जानते हैं?

क्या हमें गीता के प्रमुख विचार मालूम हैं?

क्या हमें कालिदास का साहित्य मालूम है?

क्या हम अपने शास्त्रों में निहित जीवन-दृष्टि को समझते हैं?

यदि भारत में जन्म लेने के बावजूद हम अपनी ज्ञान-परंपरा से पूरी तरह अपरिचित हैं, तो यह केवल हमारी व्यक्तिगत कमी नहीं है; यह एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है।

संस्कृतज्ञों के सामने नई जिम्मेदारी

नई शिक्षा नीति ने अवसर दिया है। अब जिम्मेदारी संस्कृत के अध्यापकों और संस्कृतज्ञों की है।

हमें अपने प्रस्तुतीकरण की विधियों को बदलना होगा। हमें यह समझना होगा कि आज का विद्यार्थी केवल श्रद्धा के कारण किसी बात को स्वीकार नहीं करेगा। वह प्रश्न करेगा, तर्क करेगा और प्रमाण माँगेगा।

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अपने विषय का गहरा ज्ञान रखने के साथ-साथ उसे आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।

हमें नए पाठ्यक्रम बनाने होंगे।

हमें सरल नोट्स तैयार करने होंगे।

हमें उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ बताने होंगे।

हमें डिजिटल माध्यमों और पावरपॉइंट जैसी प्रस्तुति-पद्धतियों का उपयोग करना होगा।

हमें संस्कृत की जटिल ज्ञानराशि को सरल भाषा में समझाने की क्षमता विकसित करनी होगी।

यही वह कार्य है जिसके माध्यम से संस्कृत अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक पहुँच सकती है।


संस्कृत दिवस पर एक छोटा संकल्प

संस्कृत के भविष्य की चिंता केवल सरकारों, विश्वविद्यालयों और संस्कृत विभागों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।

हर व्यक्ति अपने स्तर पर एक छोटा कदम उठा सकता है।

इस संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ने का संकल्प ले सकता है।

कोई गीता का एक अध्याय पढ़ सकता है।

कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ सकता है।

कोई रामायण या महाभारत का एक महत्वपूर्ण अंश पढ़ सकता है।

कोई अपने बच्चे को प्रतिदिन एक संस्कृत श्लोक सिखा सकता है।

ये छोटे-छोटे प्रयास मिलकर संस्कृत के प्रति एक बड़े सामाजिक संस्कार का निर्माण कर सकते हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि संस्कृत को बचाने की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि वह हमारी प्राचीन भाषा है। उसे इसलिए जानना आवश्यक है क्योंकि उसके भीतर भारत की एक विशाल ज्ञान-संपदा सुरक्षित है।

निष्कर्ष : ज्ञानराशि को लोक तक पहुँचाना ही अगला लक्ष्य

भारतीय ज्ञान-परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गतिशीलता रही है। जब केवल वैदिक शब्द-राशि से समाज तक पहुँचना कठिन हुआ, तो प्रस्तुति की नई विधियाँ आईं। नाट्यशास्त्र आया। पुराण आए। आख्यान और उपाख्यान आए। स्मृतियाँ आईं। महाकाव्य आए। बाद में संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से उसी ज्ञान और उन्हीं आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया।

आज हमारे सामने भी वही चुनौती है।

ज्ञान वही है, लेकिन माध्यम बदल गया है।

आज विज्ञान का विद्यार्थी है, प्रबंधन का विद्यार्थी है, कृषि का विद्यार्थी है, चिकित्सा का विद्यार्थी है, तकनीकी शिक्षा का विद्यार्थी है। उसके सामने संस्कृत को उसी की भाषा और उसी की बौद्धिक पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रस्तुत करना होगा।

नई शिक्षा नीति ने यह अवसर उपलब्ध कराया है कि संस्कृत की ज्ञानराशि सभी तक पहुँचे, समान रूप से पहुँचे और पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

अब प्रश्न यह नहीं है कि संस्कृत को बचाया कैसे जाए।

प्रश्न यह है कि संस्कृत में निहित ज्ञान को कितने बड़े समाज तक पहुँचाया जाए।

यदि संस्कृत के विद्यार्थी और अध्यापक अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर इस कार्य को स्वीकार करते हैं, यदि प्रत्येक भारतीय अपनी परंपरा के कुछ मूल ग्रंथों से परिचित होने का संकल्प करता है और यदि नई पीढ़ी को संस्कृत से केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और जीवन-दृष्टि के रूप में परिचित कराया जाता है, तो संस्कृत का भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं होगा—उसकी ज्ञान-परंपरा नए युग में नए रूप में जीवित और सक्रिय भी रहेगी।

संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है। वह अतीत में संचित ज्ञान को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाला सेतु है।

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लोग शिक्षा में क्या चाहते हैं और उस चाहत में संस्कृत कहाँ और क्यों अनुपस्थित है? संस्कृत दिवस पर एक आत्ममंथन

 मैंने इस लेख में स्कूल से उच्च शिक्षा तक के संक्रमण, विषय-चयन, रोजगार, शिक्षा के उद्देश्य और संस्कृत की वर्तमान स्थिति—इन सभी कोणों से देखा है। उपलब्ध नवीनतम सरकारी आँकड़ों के आधार पर कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण निकलती हैं।

 सबसे पहले एक गलत प्रश्न को हटाना होगा

 “छात्र संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते”—क्या यह अपने-आप में कोई तथ्य है?

यह वाक्य संस्कृत-जगत में बहुत प्रचलित है—

 “आज के विद्यार्थी संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते।”

लेकिन यह वाक्य अपने-आप में कोई उपयोगी निष्कर्ष नहीं देता।

क्यों?

क्योंकि “नहीं पढ़ना” और “संस्कृत नहीं पढ़ना” दो अलग बातें हैं।

यदि कोई विद्यार्थी ही शिक्षा जारी नहीं रखना चाहता तो संस्कृत की समस्या कहाँ है?

यदि वह उच्च शिक्षा में जाता है, लेकिन संस्कृत नहीं चुनता, तब संस्कृत के सामने वास्तविक प्रश्न खड़ा होता है।

और यदि वह संस्कृत नहीं चुनता, तो अगला प्रश्न है—वह क्या चुनता है और क्यों चुनता है?

यहीं से चर्चा गंभीर होती है।

 2. पहले यह देखना होगा कि विद्यार्थी वास्तव में पढ़ना चाहते हैं या नहीं

यहाँ राष्ट्रीय आँकड़े हमारी धारणा को थोड़ा बदल देते हैं।

2024-25 में भारत में प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक तक पहुँचते-पहुँचते संक्रमण दर लगातार कम होती जाती है:

 संक्रमण        भारत की संक्रमण दर 2024-25 


 कक्षा 5 → 6                         92.2% 

कक्षा 8 → 9                         86.6% 

 कक्षा 10 → 11                   75.1% 


अर्थात कक्षा 10 के बाद 100 विद्यार्थियों में औसतन लगभग 75 ही उच्चतर माध्यमिक स्तर में प्रवेश करते हैं। 

और 2024-25 में माध्यमिक स्तर (कक्षा 9-10) का dropout rate 11.5% था। 

इसलिए आपका प्रश्न बिल्कुल उचित है—

 “यदि विद्यार्थी 8वीं या 10वीं के बाद पढ़ाई ही छोड़ देता है, तो क्या उसे संस्कृत न पढ़ने की समस्या के रूप में देखना चाहिए?”

नहीं।

यह पहले स्कूल शिक्षा की पहुँच, आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों, विद्यालय की गुणवत्ता और शिक्षा की उपयोगिता का प्रश्न है।

संस्कृत की समस्या तभी शुरू होती है जब विद्यार्थी शिक्षा जारी रखना चाहता है और विषय चुनने की स्थिति में संस्कृत के बजाय कुछ और चुनता है।

यह बहुत महत्वपूर्ण विभाजन है।

 3. उच्च शिक्षा में पहुँचने वाला विद्यार्थी क्या चाहता है?

भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार बहुत बड़ा हुआ है।

AISHE के अनुसार 2021-22 में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन लगभग 4.33 करोड़ था और 18-23 आयु वर्ग का Gross Enrolment Ratio (GER) 28.4% था।

नवीनतम AISHE 2023-24 के आँकड़ों में भी उच्च शिक्षा में करोड़ों विद्यार्थी हैं। AISHE की वेबसाइट पर 2023-24 की अंतिम रिपोर्ट अब उपलब्ध है। 

इसका अर्थ है कि प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि—

 “बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं?”

बल्कि बड़ा प्रश्न है—

 “जो विद्यार्थी पढ़ना चाहता है, वह क्या पढ़ना चाहता है और विषय चुनते समय उसकी प्राथमिकता क्या है?”

यही संस्कृत-विमर्श का असली प्रवेश-बिंदु है।

 4. विद्यार्थी विषय क्यों चुनता है?

यहाँ संस्कृत-जगत को शायद सबसे असुविधाजनक प्रश्न पूछना चाहिए।

एक विद्यार्थी B.Tech क्यों करता है?

सिर्फ इसलिए कि उसे गणित पसंद है?

एक विद्यार्थी MBBS क्यों करता है?

सिर्फ इसलिए कि उसे जीवविज्ञान पसंद है?

एक विद्यार्थी B.Com क्यों करता है?

सिर्फ इसलिए कि उसे वाणिज्य अच्छा लगता है?

नहीं।

विषय-चयन के पीछे कई कारक होते हैं—

* रोजगार

* आय की सम्भावना

* सामाजिक प्रतिष्ठा

* परिवार की अपेक्षा

* आगे की शिक्षा का रास्ता

* प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगिता

* विदेश/राष्ट्रीय स्तर पर अवसर

* विषय में व्यक्तिगत रुचि

* भविष्य की अनिश्चितता से सुरक्षा

* सामाजिक गतिशीलता

इसलिए “रुचि” अकेला कारण नहीं है।

और संस्कृत की चर्चा करते समय हम अक्सर विद्यार्थी की इसी वास्तविकता को नजरअंदाज कर देते हैं।


 5. विद्यार्थी क्या पढ़ना चाहते हैं—आँकड़े क्या कहते हैं?


AISHE 2021-22 में स्नातक स्तर पर सबसे बड़ा अनुशासन Arts था—लगभग 34.2% नामांकन। इसके बाद Science 14.8%, Commerce 13.3% और Engineering & Technology 11.8% थे। Indian Language का हिस्सा 1.1% था। 

लेकिन 2023-24 में विषयों को अधिक सूक्ष्म रूप से देखें तो एक दिलचस्प बात सामने आती है।

उच्च शिक्षा में Indian Languages स्वयं कोई नगण्य क्षेत्र नहीं हैं।

AISHE 2023-24 के अनुसार PG स्तर पर:

* Hindi — 2,20,305

* Bengali — 42,436

* Sanskrit — 34,602

* Urdu — 20,416


विद्यार्थी Indian Language विषयों में पढ़ रहे थे। 

संपूर्ण Indian Language समूह में PG स्तर पर लगभग 4.50 लाख विद्यार्थी थे। 

इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—

 यह कहना भी सही नहीं है कि भारतीय भाषाओं को कोई विद्यार्थी पढ़ना ही नहीं चाहता।

बल्कि प्रश्न यह है कि कुछ भारतीय भाषाओं की तुलना में संस्कृत की माँग इतनी कम क्यों है?


 6. संस्कृत की वास्तविक स्थिति क्या है?


AISHE 2023-24 में PG स्तर पर संस्कृत के नामांकन का आँकड़ा 34,602 है। उसी तालिका में Ph.D. स्तर पर संस्कृत के 2,235 विद्यार्थी दर्ज हैं। 


PG स्तर पर तुलना देखिए:

 विषय     PG नामांकन 


 हिन्दी     2,20,305 

 बंगाली       42,436 

 संस्कृत     34,602 

 उर्दू           20,416 

 तमिल         11,174 

 तेलुगु       13,039 


यहाँ संस्कृत के लिए असली प्रश्न पैदा होता है।

34,602 विद्यार्थी बहुत कम हैं या बहुत अधिक?

इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि हम संस्कृत से क्या अपेक्षा कर रहे हैं।

यदि हमारा लक्ष्य है—

 “भारत की विशाल युवा आबादी में संस्कृत एक सामान्य उच्च शिक्षा विकल्प बने”

तो यह संख्या छोटी है।

लेकिन यदि लक्ष्य है—

 “संस्कृत के गंभीर अध्येता, शोधकर्ता, शिक्षक, पाण्डुलिपि-विशेषज्ञ, भाषावैज्ञानिक, दार्शनिक आदि तैयार करना”

तो केवल संख्या देखकर निष्कर्ष निकालना गलत होगा।


 7. अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—लोग अधिक संख्या में किसी विषय को क्यों पढ़ते हैं?


यहाँ हमें Arts बनाम Engineering जैसे सरल विरोध से भी आगे जाना होगा।

विद्यार्थी किसी विषय को केवल इसलिए नहीं चुनता कि वह “अच्छा ज्ञान” देता है।

वह यह भी देखता है—

 “इस शिक्षा के बाद मेरे पास कौन-कौन से रास्ते खुलेंगे?”

यही वह बिन्दु है जहाँ संस्कृत शिक्षा को अपने आप से कठोर प्रश्न करना होगा।

यदि कोई विद्यार्थी B.Tech करता है तो उसके सामने—

* निजी क्षेत्र

* सरकारी तकनीकी सेवाएँ

* IT

* software

* engineering services

* entrepreneurship

* higher studies

* research

जैसे अनेक रास्ते खुल सकते हैं।

B.Com के बाद—

* accounting

* finance

* banking

* taxation

* business

* management

* professional qualifications जैसे रास्ते हैं।

B.A. में भी विद्यार्थी विषय के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं, शिक्षण, प्रशासन, पत्रकारिता, शोध, कानून आदि की ओर जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि ये सभी रास्ते स्वतः मिल जाते हैं। रोजगार की समस्या इन क्षेत्रों में भी है।

उदाहरण के लिए NITI Aayog की 2026 की रिपोर्ट में B.A. graduates की employability 2026 के लिए 55.6%, B.Com 62.8%, B.Sc 61.0% और B.E./B.Tech 70.2% दी गई है। यानी लोकप्रिय विषय भी रोजगार की गारंटी नहीं देते।

यह तथ्य संस्कृत के लिए बहुत उपयोगी है।

हमें यह नहीं कहना चाहिए—


 “इंजीनियरिंग पढ़ने से नौकरी मिलती है और संस्कृत पढ़ने से नहीं।”

वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।

सही बात यह है—

 विद्यार्थी उन क्षेत्रों को अधिक चुनते हैं जहाँ उन्हें शिक्षा और भविष्य के अवसर के बीच कोई स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई देता है।


 8. संस्कृत की सबसे बड़ी समस्या शायद “रोजगार कम है” नहीं, बल्कि “रास्ता दिखाई नहीं देता” है


यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।

मान लीजिए संस्कृत में 100 संभावित career pathways हैं, लेकिन विद्यार्थी को उनमें केवल दो दिखाई देते हैं—

1. अध्यापक

2. संस्कृत अध्यापक

तो विद्यार्थी संस्कृत को सीमित विषय समझेगा।

जबकि संस्कृत की वास्तविक ज्ञान-संपदा इससे कहीं बड़ी है।

संस्कृत के साथ सम्भावित क्षेत्र हो सकते हैं—

* भाषा एवं साहित्य

* भाषाविज्ञान

* computational linguistics

* NLP

* AI language resources

* machine translation

* manuscriptology

* epigraphy

* lexicography

* textual criticism

* philosophy

* Indian Knowledge Systems

* इतिहास

* पुरातत्त्व से सम्बद्ध पाठ-अध्ययन

* योग

* आयुर्वेदिक साहित्य का अध्ययन

* न्याय-दर्शन

* गणितीय एवं खगोलीय ग्रन्थों का अध्ययन

* comparative philosophy

* translation

* interpretation

* publishing

* digital humanities

* cultural studies

* archival studies

* भारतीय कला एवं नाट्य परम्परा

* शिक्षा

* research

लेकिन क्या वर्तमान संस्कृत शिक्षा विद्यार्थी को इन रास्तों का अनुभव कराती है?

यहीं वास्तविक संकट है।


 9. क्या संस्कृत का उद्देश्य वही होना चाहिए जो लोकप्रिय विषयों का है?


सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—

 “क्या संस्कृत शिक्षा का भी वही उद्देश्य है जो उस विषय का है जिसे अधिक छात्र पढ़ना चाहते हैं?”

उत्तर है—

 नहीं।

और यहीं संस्कृत-विमर्श में एक बड़ी वैचारिक भूल होती है।

हर ज्ञान-विषय का उद्देश्य एक जैसा नहीं होता।

शिक्षा के कुछ उद्देश्य समान हो सकते हैं—

* चिंतन

* व्यक्तित्व-विकास

* ज्ञान

* विवेक

* कौशल

* समाजोपयोगिता

लेकिन प्रत्येक विषय की विशिष्ट सामाजिक भूमिका अलग होती है।

एक MBBS का उद्देश्य चिकित्सक तैयार करना है।

एक B.Tech का उद्देश्य तकनीकी ज्ञान और engineering competence देना है।

कानून की शिक्षा का उद्देश्य विधिक ज्ञान और पेशेवर क्षमता विकसित करना है।

इसी प्रकार संस्कृत का उद्देश्य केवल “नौकरी पाने वाला संस्कृत विद्यार्थी” तैयार करना नहीं हो सकता।

संस्कृत एक भाषा भी है, साहित्य भी, ज्ञान-परम्परा का विशाल corpus भी और भारतीय बौद्धिक इतिहास का प्रमुख स्रोत भी।


 10. लेकिन यहाँ संस्कृत के हितैषियों के लिए एक असहज सत्य है


यह कहना कि—

 “संस्कृत का उद्देश्य अलग है, इसलिए हमें विद्यार्थियों की संख्या की चिंता नहीं करनी चाहिए”

भी सही नहीं होगा।

क्योंकि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में किसी विषय का अस्तित्व तभी टिकाऊ होता है जब उसके लिए पर्याप्त विद्यार्थी, शिक्षक, संस्थाएँ, शोध और सामाजिक उपयोग की व्यवस्था हो।

इसलिए दो बातें एक साथ स्वीकार करनी होंगी—

 पहली

संस्कृत को केवल उसकी छात्र संख्या से नहीं आँका जा सकता।

 दूसरी

छात्र संख्या को पूरी तरह महत्वहीन भी नहीं माना जा सकता।

यही संतुलित दृष्टि है।


 11. संस्कृत की तुलना Engineering से करना गलत है—लेकिन तुलना करना आवश्यक भी है

यह विरोधाभास समझना बहुत जरूरी है।

हम यह नहीं पूछ सकते कि—

 “संस्कृत में IIT जैसी नौकरी क्यों नहीं?”

क्योंकि दोनों की सामाजिक भूमिका अलग है।

लेकिन हम यह अवश्य पूछ सकते हैं—

 “Engineering ने विद्यार्थी को अपने विषय का भविष्य दिखाने के लिए कौन-सी संरचना बनाई और संस्कृत ने क्या बनाया?”

यह तुलना वैध है।

Engineering विद्यार्थी को पहले वर्ष से ही पता होता है कि—

मैं क्या सीख रहा हूँ → किस समस्या पर काम करूँगा → कौन-सी industry है → कौन-सा skill चाहिए → internship कहाँ होगी → नौकरी कहाँ मिल सकती है → आगे specialization क्या होगा।

संस्कृत विद्यार्थी के लिए यह career map अक्सर इतना स्पष्ट नहीं है।


 12. NEP 2020 वास्तव में संस्कृत के लिए एक बड़ा संकेत देती है


राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का संस्कृत सम्बन्धी दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण है।

नीति साफ कहती है कि संस्कृत को केवल पारम्परिक संस्कृत पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों तक सीमित न रखकर मुख्यधारा की शिक्षा में लाया जाए, और उसे mathematics, astronomy, philosophy, linguistics, dramatics, yoga आदि आधुनिक एवं समकालीन क्षेत्रों से जोड़ा जाए। संस्कृत विश्वविद्यालयों को multidisciplinary institutions की दिशा में ले जाने की बात भी नीति में है। 

यहाँ हमें NEP की भावना को ठीक से समझना चाहिए।

NEP यह नहीं कह रही कि—

 “हर विद्यार्थी संस्कृत पढ़े।”

वह इससे अधिक महत्वपूर्ण बात कह रही है—

 “जो विद्यार्थी संस्कृत पढ़ना चाहता है, उसके लिए संस्कृत को आधुनिक बहुविषयक शिक्षा से जोड़कर अर्थपूर्ण बनाया जाए।”

यही शायद आगे की दिशा है।


 13. इसका अर्थ है—“संस्कृत + कुछ” की दिशा


मुझे लगता है कि संस्कृत शिक्षा की अगली बड़ी बहस “संस्कृत बनाम अन्य विषय” नहीं होनी चाहिए।

बल्कि—

 “संस्कृत + अन्य ज्ञानक्षेत्र” होनी चाहिए।

उदाहरण के लिए—

संस्कृत + AI

संस्कृत + NLP

संस्कृत + Computational Linguistics

संस्कृत + दर्शन

संस्कृत + इतिहास

संस्कृत + Archaeology

संस्कृत + Manuscript Studies

संस्कृत + Yoga

संस्कृत + Ayurveda

संस्कृत + Mathematics

संस्कृत + Astronomy

संस्कृत + Translation

संस्कृत + Digital Humanities

यह केवल नारा नहीं होना चाहिए।


इसके लिए पाठ्यक्रम, शिक्षक, प्रयोगशाला, डिजिटल corpus, internship, research projects और रोजगार-मार्ग बनाने होंगे।


 14. यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात—संस्कृत को “सिर्फ संस्कृत” पढ़ाने की परम्परा पर विचार


यदि कोई विद्यार्थी पाँच वर्ष संस्कृत पढ़ता है और अन्त में उससे पूछा जाए—

 “तुम संस्कृत के अलावा क्या कर सकते हो?”

और उसका उत्तर हो—

 “मैं संस्कृत पढ़ सकता हूँ।”

तो शिक्षा-व्यवस्था को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए।

भाषा का ज्ञान अपने-आप में मूल्यवान है, लेकिन आधुनिक उच्च शिक्षा में उसे transferable skills से जोड़ना होगा।

उदाहरण—

संस्कृत विद्यार्थी को संस्कृत के साथ:

* उच्च स्तरीय लेखन

* translation

* research methodology

* data handling

* digital tools

* AI tools

* corpus creation

* manuscript digitisation

* भाषावैज्ञानिक विश्लेषण

* communication

* presentation

* teaching technology

भी आना चाहिए।

तब संस्कृत केवल “एक विषय” नहीं रहेगी।

वह कौशलों के समूह के साथ जुड़ी हुई विशेषज्ञता बन सकती है।


 15. क्या संस्कृत में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना ही लक्ष्य होना चाहिए?

नहीं।

यह बहुत खतरनाक लक्ष्य होगा।

यदि हम केवल संख्या बढ़ाने के लिए—

* आसान पाठ्यक्रम बना दें,

* परीक्षा सरल कर दें,

* नामांकन बढ़ा दें,

* डिग्री बाँट दें,

तो संस्कृत का संकट समाप्त नहीं होगा।

बल्कि संख्या बढ़ सकती है और गुणवत्ता गिर सकती है।

सही लक्ष्य होना चाहिए—

 संस्कृत में ऐसे विद्यार्थी आएँ जो संस्कृत के माध्यम से किसी वास्तविक बौद्धिक, सांस्कृतिक, भाषिक, तकनीकी या सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।


 16. “कितने विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते हैं?” से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न


 “संस्कृत पढ़ने वाला विद्यार्थी संस्कृत पढ़कर क्या बन सकता है?”

और इसके बाद दूसरा—

 “क्या स्वयं संस्कृत का अध्यापक इस प्रश्न का दस स्पष्ट उत्तर दे सकता है?”

यदि उत्तर अस्पष्ट है तो समस्या विद्यार्थी की रुचि में नहीं, हमारी शिक्षा-व्यवस्था की संरचना में है।


 17. संस्कृत शिक्षा के सामने तीन अलग-अलग समस्याएँ हैं


इनको एक ही समस्या मानना ठीक नहीं होगा।

 समस्या 1 — प्रवेश

विद्यार्थी संस्कृत क्यों चुने?

 समस्या 2 — निरन्तरता

संस्कृत चुनने के बाद विद्यार्थी बीच में क्यों छोड़ दे?

 समस्या 3 — परिणाम

संस्कृत पढ़ने के बाद विद्यार्थी क्या कर सके?

इन तीनों के समाधान अलग होंगे।

प्रचार से प्रवेश बढ़ सकता है।

अच्छे शिक्षक और आकर्षक पाठ्यक्रम से निरन्तरता बढ़ सकती है।

लेकिन career/research ecosystem से परिणाम सार्थक होगा।


 18. और एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य—लोकप्रिय विषय भी संकटमुक्त नहीं हैं


यहाँ संस्कृत-समर्थकों को एक गलती नहीं करनी चाहिए।

वे यह न कहें—

 “इंजीनियरिंग में बहुत विद्यार्थी हैं, इसलिए वह सफल है।”

Engineering में भी employability की समस्या है। NITI Aayog की 2026 रिपोर्ट में B.E./B.Tech graduates की employability 70.2% बताई गई है—अर्थात लगभग 30% graduates उस आकलन में employable नहीं माने गए। B.A. के लिए यह 55.6% है। 

Mercer के 2025 Graduate Skill Index में भी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले भारतीय graduates की overall employability 42.6% बताई गई है। ([Mercer][8])

इसलिए—

 अधिक विद्यार्थी किसी विषय को चुनते हैं = वह विषय स्वतः बेहतर शिक्षा देता है

यह निष्कर्ष गलत है।

विद्यार्थी की संख्या माँग का संकेत है, गुणवत्ता का प्रमाण नहीं।


 19. इसलिए संस्कृत के लिए सही प्रश्न क्या होना चाहिए?


मेरे विचार से इस लेख का पूरा विमर्श इन सात प्रश्नों के इर्द-गिर्द बनाया जा सकता है—

 1. क्या विद्यार्थी पढ़ना नहीं चाहते, या संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते?

 2. जो विद्यार्थी शिक्षा जारी रखना चाहते हैं, उनमें से कितने उच्च शिक्षा तक पहुँचते हैं?

 3. उच्च शिक्षा में वे किन क्षेत्रों को चुनते हैं और क्यों चुनते हैं?

 4. उनके विषय-चयन के पीछे रोजगार, प्रतिष्ठा, रुचि, परिवार, सामाजिक अवसर और भविष्य की सुरक्षा में कौन-सा तत्व कितना महत्वपूर्ण है?

 5. संस्कृत विद्यार्थी को इनमें से क्या देती है?

 6. जो संस्कृत नहीं देती, वह देने के लिए संस्कृत शिक्षा में क्या परिवर्तन आवश्यक है?

 7. और जो संस्कृत देती है तथा कोई दूसरा विषय नहीं दे सकता, उस विशिष्ट मूल्य को हम विद्यार्थी के सामने कितनी प्रभावी ढंग से रख पा रहे हैं?


20. और सबसे बड़ा वैचारिक प्रश्न

 “हरेक ज्ञान या शिक्षा का उद्देश्य एक समान ही होता है?”

 नहीं। शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य को अधिक सक्षम, विवेकशील और अर्थपूर्ण जीवन के योग्य बनाना हो सकता है, लेकिन प्रत्येक ज्ञान-विषय की अपनी विशिष्ट सामाजिक और बौद्धिक भूमिका होती है। इसलिए संस्कृत को इंजीनियरिंग की नकल करके सफल बनाने की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता यह है कि संस्कृत अपनी विशिष्टता को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ने की क्षमता विकसित करे।

यही फर्क “संस्कृत को लोकप्रिय बनाना” और “संस्कृत को प्रासंगिक बनाना” के बीच है।


 21. लेख का केंद्रीय निष्कर्ष

 संस्कृत की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि विद्यार्थी संस्कृत पढ़ना नहीं चाहते; समस्या यह है कि संस्कृत शिक्षा विद्यार्थी को यह पर्याप्त स्पष्टता से नहीं बता पा रही कि वह संस्कृत क्यों पढ़े, कितना पढ़े, संस्कृत पढ़कर क्या कर सकता है और संस्कृत उसके जीवन में कौन-सा ऐसा बौद्धिक मूल्य जोड़ती है जिसे वह कहीं और से उसी रूप में प्राप्त नहीं कर सकता।

और इससे भी आगे—

 संस्कृत के लिए लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि वह Engineering, Medicine या Commerce जितने विद्यार्थी पैदा करे। लक्ष्य यह होना चाहिए कि जो विद्यार्थी संस्कृत चुने, उसे इतना गहरा, व्यापक और आधुनिक अनुभव मिले कि उसे अपने चुनाव पर पछतावा न हो और समाज को भी उसके चुनाव का मूल्य दिखाई दे।

 एक सावधानी

2023-24 की नई AISHE तालिकाएँ विषय-स्तर पर अधिक सूक्ष्म आँकड़े देती हैं। इसलिए Indian Language और Sanskrit को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा। 2023-24 में संस्कृत के लिए PG में 34,602 और Ph.D. में 2,235 का प्रत्यक्ष subject-level आँकड़ा उपलब्ध है। 


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विद्यार्थी संस्कृत क्यों नहीं पढ़ना चाहते?

आज संस्कृत दिवस है। आज संस्कृत से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर चर्चा हो रही है। मैंने भी इसी क्रम में एक समसामयिक लेख तैयार किया है। आशा है कि यह वैचारिक लेख संस्कृत से जुड़े छात्रों तथा अन्य पाठकों के लिए पठनीय और विचारणीय होगा।

जब विद्यार्थी संस्कृत छोड़कर किसी दूसरे विषय को चुनता है, तो वह वास्तव में क्या खरीद रहा होता है—एक डिग्री, एक रोजगार-सम्भावना, एक सामाजिक पहचान, किसी प्रतियोगिता का रास्ता, किसी विशेष ज्ञान की क्षमता या इन सबका मिश्रण? और संस्कृत उसे इनमें से क्या देती है?

“विद्यार्थी संस्कृत क्यों नहीं पढ़ना चाहते?”

शायद यह प्रश्न ही अधूरा है। अधिक सही प्रश्न यह है कि विद्यार्थी संस्कृत छोड़कर क्या चुनता है और क्यों चुनता है?

यह प्रश्न संस्कृत के लिए असुविधाजनक हो सकता है, लेकिन इसी असुविधा से एक सार्थक विमर्श निकल सकता है।

क्योंकि कोई विद्यार्थी जब संस्कृत छोड़कर B.A., B.Com., B.Sc., B.Tech., कानून, चिकित्सा, प्रबन्धन या किसी व्यावसायिक पाठ्यक्रम की ओर जाता है, तो वह केवल एक विषय नहीं बदल रहा होता। वह अपने सामने दिखाई देने वाले भविष्य के विकल्पों को बदल रहा होता है।

इसलिए संस्कृत शिक्षा की तुलना केवल दूसरे विषयों से नहीं, बल्कि उन संभावनाओं के संसार से करनी होगी जो विद्यार्थी को दूसरे विषयों में दिखाई देता है।

और यहीं से एक कठिन प्रश्न सामने आता है—

यदि कोई विद्यार्थी संस्कृत के बजाय कोई दूसरा विषय चुनता है, तो उस दूसरे विषय में उसे ऐसा क्या मिलता है जो संस्कृत उसे नहीं दे रही है?

विद्यार्थी केवल विषय नहीं चुनता, भविष्य चुनता है

मान लीजिए किसी विद्यार्थी के सामने दो विकल्प हैं—संस्कृत में स्नातक और किसी सामान्य स्नातक विषय में स्नातक

यदि दोनों के बाद उसे केवल एक-सी डिग्री मिलनी है, लेकिन दूसरे विषय के बाद उसे अनेक प्रतियोगी परीक्षाओं, निजी क्षेत्र, बैंकिंग, प्रबन्धन, सरकारी सेवाओं या आगे के व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की अधिक स्पष्ट सम्भावनाएँ दिखाई देती हैं, तो वह स्वाभाविक रूप से उसी दिशा में जाएगा।

इसका अर्थ यह नहीं कि दूसरे विषय की शिक्षा श्रेष्ठ है।

इसका अर्थ केवल इतना है कि उस विषय ने अपने साथ जुड़ा भविष्य अधिक स्पष्ट बनाया है।

यही संस्कृत शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती है।

संस्कृत के विद्यार्थी को हम प्रायः यह बताते हैं कि संस्कृत महान है।

लेकिन क्या हम उतनी ही स्पष्टता से बताते हैं कि—

“संस्कृत पढ़कर तुम क्या कर सकते हो?”

यही प्रश्न निर्णायक है।

पहला रास्ता : सरकारी नौकरीและ प्रतियोगी परीक्षाएँ

संस्कृत का विद्यार्थी सरकारी नौकरी से बाहर नहीं है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अन्तर है।

अनेक विद्यार्थी सामान्य स्नातक विषयों को इसलिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि स्नातक की डिग्री के बाद वे UPSC, State PSC, SSC, Banking, Railway, Defence, Teaching और दूसरी प्रतियोगी परीक्षाओं में जा सकते हैं। संस्कृत का विद्यार्थी भी इन परीक्षाओं में जा सकता है।

लेकिन संस्कृत की अपनी एक अतिरिक्त उपयोगिता भी है।

उदाहरण के लिए, संघ लोक सेवा आयोग (UPSC) की Civil Services Main Examination में Sanskrit Literature एक वैकल्पिक विषय के रूप में उपलब्ध है। अर्थात् संस्कृत का गम्भीर विद्यार्थी सामान्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के साथ संस्कृत साहित्य को अपने वैकल्पिक विषय के रूप में भी चुन सकता है।

इस अर्थ में संस्कृत विद्यार्थी के सामने प्रतियोगी परीक्षा का एक विशिष्ट रास्ता मौजूद है।

लेकिन यहाँ हमें ईमानदार होना होगा।

सिर्फ संस्कृत पढ़ लेने से UPSC नहीं निकलता।

संस्कृत साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में लेने वाला विद्यार्थी तभी लाभ की स्थिति में होगा, जब उसकी संस्कृत की गहरी समझ के साथ सामान्य अध्ययन, लेखन, विश्लेषण और समग्र परीक्षा-तैयारी भी मजबूत हो।

इसलिए संस्कृत की शिक्षा को प्रतियोगी परीक्षा का पर्याय बना देना भी ठीक नहीं होगा।

सही बात यह है—

संस्कृत एक प्रतियोगी परीक्षा में अतिरिक्त उपयोगिता दे सकती है; लेकिन उसे प्रतियोगी परीक्षा-केंद्रित विषय बना देना संस्कृत की सम्भावनाओं को बहुत छोटा कर देगा।

दूसरा रास्ता : शिक्षक बनना

संस्कृत से जुड़ा सबसे स्पष्ट और स्थापित रोजगार-क्षेत्र आज भी शिक्षण है।

विद्यालयों, संस्कृत महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, संस्कृत संस्थानों और विभिन्न शैक्षिक संस्थाओं में संस्कृत अध्यापक, सहायक आचार्य, आचार्य तथा अन्य अकादमिक पदों के अवसर समय-समय पर उपलब्ध होते हैं।

इसका एक वर्तमान उदाहरण Central Sanskrit University की 2026 की भर्ती प्रक्रिया है। विश्वविद्यालय ने 2026 में अपने विभिन्न परिसरों के लिए Teaching तथा Other Academic Posts की सीधी भर्ती के लिए अधिसूचना जारी की। बाद में इन पदों के लिए लिखित शैक्षणिक मूल्यांकन, पात्रता परीक्षण तथा अन्य चयन प्रक्रियाओं से सम्बन्धित सूचनाएँ भी जारी की गईं।

इसी वर्ष विश्वविद्यालय की भर्ती सूचनाओं में विभिन्न परिसरों में Part Time Teacher, Guest Faculty, Assistant Professor, Associate Professor तथा अन्य शैक्षणिक अवसरों से सम्बन्धित सूचनाएँ भी प्रकाशित हुई हैं।

अर्थात् संस्कृत में शिक्षण केवल सैद्धान्तिक सम्भावना नहीं है; यह आज भी संस्कृत शिक्षा से जुड़ा हुआ एक वास्तविक और संस्थागत रोजगार-क्षेत्र है।

लेकिन यहाँ भी एक समस्या है।

यदि संस्कृत शिक्षा का विद्यार्थी केवल इस कल्पना के साथ संस्कृत पढ़ता है कि—

“आगे चलकर अध्यापक बन जाऊँगा।”

तो वह संस्कृत शिक्षा के विशाल क्षेत्र को केवल एक पेशे तक सीमित कर देता है।

और यदि हम स्वयं विद्यार्थियों को संस्कृत के केवल एक ही career pathway के बारे में बताते हैं, तो फिर दूसरे विषयों की ओर जाने वाले विद्यार्थियों को दोष देना कठिन है।

शिक्षक बनना संस्कृत का एक महत्वपूर्ण परिणाम है। संस्कृत के ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने और संस्कृत-वाङ्मय की परम्परा को जीवित रखने में शिक्षक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लेकिन हमें यह स्वीकार करना होगा कि—

संस्कृत शिक्षा का पूरा उद्देश्य शिक्षक बनाना नहीं हो सकता।

यदि संस्कृत में प्रवेश लेने वाले प्रत्येक विद्यार्थी के सामने केवल अध्यापन का ही रास्ता होगा, तो हम स्वयं संस्कृत को सीमित कर रहे होंगे। प्रश्न यह होना चाहिए कि शिक्षक बनने के अतिरिक्त संस्कृत विद्यार्थी के लिए और कौन-कौन से रास्ते खुल सकते हैं?

तीसरा रास्ता : शोध और विश्वविद्यालय

संस्कृत का सबसे स्वाभाविक और सबसे गहरा क्षेत्र शोध है।

क्योंकि संस्कृत में आज भी ऐसे असंख्य ग्रन्थ, पाण्डुलिपियाँ, टीकाएँ, पाठ-परम्पराएँ और ज्ञान-संसाधन हैं, जिनका आधुनिक शोध-पद्धतियों से अध्ययन किया जाना अभी बाकी है। संस्कृत का विशाल वाङ्मय अपने आप में शोध की एक बड़ी सम्भावना है।

Ph.D., Post-Doctoral Research, Project Fellow, Research Assistant और अन्य अकादमिक अवसर इस क्षेत्र का हिस्सा हैं। वर्ष 2026 में Central Sanskrit University की भर्ती सूचनाओं में Post Doctoral Fellow और Project Fellow जैसी नियुक्तियों के लिए भी प्रक्रिया संचालित की गई। विश्वविद्यालय की इसी वर्ष की सूचनाओं में शोध तथा IKS से जुड़े internship अवसर भी दिखाई देते हैं।

संस्कृत के लिए UGC-NET में भी स्पष्ट स्थान है। वर्तमान UGC-NET व्यवस्था में Sanskrit विषय उपलब्ध है और परीक्षा Junior Research Fellowship (JRF), Assistant Professor तथा विभिन्न श्रेणियों में Ph.D. admission के लिए पात्रता निर्धारित करने का माध्यम है।

और संस्कृत की एक विशेषता यह भी है कि UGC-NET की विषय-सूची में सामान्य Sanskrit के साथ Sanskrit Traditional Subjects के लिए भी अलग विषय-संरचना उपलब्ध है। इसमें ज्योतिष, व्याकरण, मीमांसा, नव्यन्याय, सांख्य-योग, तुलनात्मक दर्शन, धर्मशास्त्र, साहित्य, पुराणेतिहास आदि परम्परागत अध्ययन-क्षेत्र सम्मिलित हैं।

यह संस्कृत की विशिष्टता है।

लेकिन यहाँ भी एक प्रश्न है—

क्या हमारी स्नातक शिक्षा विद्यार्थी को वास्तव में शोध के योग्य बनाती है?

केवल पाठ याद कर लेना शोध की तैयारी नहीं है।

शोध के लिए चाहिए—

  • मूल पाठ पढ़ने और समझने की क्षमता
  • पाठभेद को पहचानने और समझने की क्षमता
  • सन्दर्भ एवं स्रोत खोजने की क्षमता
  • आधुनिक शोध-पद्धति का ज्ञान
  • डिजिटल संसाधनों का उपयोग
  • Bibliography और Citation की समझ
  • पाण्डुलिपियों के अध्ययन और प्रबन्धन की क्षमता
  • Data Organisation और डिजिटल अभिलेखन की समझ
  • भाषावैज्ञानिक दृष्टि
  • आलोचनात्मक एवं विश्लेषणात्मक चिन्तन
  • आधुनिक अकादमिक लेखन की क्षमता

यदि संस्कृत का विद्यार्थी इन क्षमताओं के साथ निकलता है, तो उसका शोध-क्षेत्र बहुत बड़ा हो सकता है। तब संस्कृत केवल शोध का एक विषय नहीं रहेगी, बल्कि अनेक विषयों के मूल स्रोतों तक पहुँचने का माध्यम बन सकती है।

चौथा रास्ता : भारतीय ज्ञान परम्परा

यह क्षेत्र पिछले कुछ वर्षों में विशेष रूप से महत्वपूर्ण हुआ है।

Indian Knowledge Systems (IKS) अर्थात् भारतीय ज्ञान परम्परा के लिए शिक्षा मंत्रालय के अधीन Indian Knowledge Systems Division की स्थापना अक्टूबर 2020 में हुई। इसका उद्देश्य भारतीय ज्ञान परम्पराओं के विभिन्न पक्षों पर interdisciplinary और transdisciplinary research को बढ़ावा देना, उनके संरक्षण तथा प्रसार को प्रोत्साहित करना और उनके सामाजिक अनुप्रयोगों की सम्भावनाओं पर कार्य करना है। IKS Division शोध केन्द्रों की स्थापना, research projects, undergraduate internships, faculty development programmes, workshops, text-mining तथा documentation projects जैसी गतिविधियों का संचालन एवं समर्थन करता है।

यहाँ संस्कृत की भूमिका स्वाभाविक रूप से महत्वपूर्ण है। भारतीय ज्ञान परम्परा के अनेक मूल स्रोत संस्कृत में उपलब्ध हैं। इसलिए इन स्रोतों को मूल रूप में पढ़ने, समझने और उनका आलोचनात्मक अध्ययन करने वाला संस्कृत विद्यार्थी इस क्षेत्र में विशेष भूमिका निभा सकता है।

लेकिन यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है।

IKS का अर्थ केवल संस्कृत ग्रन्थ पढ़ना नहीं है।

भारतीय ज्ञान परम्परा में इतिहास, गणित, खगोल, आयुर्वेद, दर्शन, वास्तु, कृषि, धातु-विज्ञान, कला, भाषा, शिक्षा और अनेक अन्य ज्ञान-परम्पराएँ आती हैं। इनका अध्ययन केवल परम्परागत व्याख्या के आधार पर नहीं, बल्कि आधुनिक शोध-पद्धतियों और सम्बन्धित विषयों की वैज्ञानिक समझ के साथ होना चाहिए।

इसलिए संस्कृत विद्यार्थी को IKS में प्रभावी ढंग से प्रवेश करने के लिए केवल संस्कृत नहीं, बल्कि संस्कृत + विषय-विशेषज्ञता की आवश्यकता होगी।

उदाहरण के लिए—

  • संस्कृत + गणित का विद्यार्थी प्राचीन गणितीय ग्रन्थों और गणितीय परम्पराओं के अध्ययन में काम कर सकता है।
  • संस्कृत + खगोल-विज्ञान का विद्यार्थी ज्योतिष एवं खगोल सम्बन्धी ग्रन्थों के ऐतिहासिक और गणितीय पक्षों का अध्ययन कर सकता है।
  • संस्कृत + दर्शन का विद्यार्थी भारतीय दर्शन को आधुनिक Philosophy के साथ तुलनात्मक रूप से समझ सकता है।
  • संस्कृत + आयुर्विज्ञान का विद्यार्थी आयुर्वेद के मूल ग्रन्थों के textual और historical study में योगदान दे सकता है।

यहीं संस्कृत की एक बड़ी सम्भावना छिपी है।

संस्कृत विद्यार्थी को दूसरे विषयों से प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता नहीं है। उसे दूसरे विषयों के साथ सार्थक रूप से जुड़ने की आवश्यकता है।

पाँचवाँ रास्ता : AI और NLP

शायद आने वाले समय में संस्कृत के लिए सबसे रोचक और सम्भावनापूर्ण क्षेत्रों में से एक Artificial Intelligence (AI) और Natural Language Processing (NLP) हो सकता है।

लेकिन इसे लेकर अतिशयोक्ति भी नहीं करनी चाहिए।

आज संस्कृत में AI और Natural Language Processing का कार्य कोई कल्पना मात्र नहीं है। इसके पीछे वर्षों से चल रहा वास्तविक computational research मौजूद है।

University of Hyderabad की Sanskrit Computational Linguistics परम्परा में Saṃsādhanī नामक मंच विकसित हुआ है। इसमें Sanskrit transliteration, lexicons, morphological analyser, morphological generator, sandhi joiner, sandhi splitter, e-readers तथा अन्य computational tools उपलब्ध हैं। इसके advanced tools में Sanskrit-Hindi machine translation तथा पाणिनीय व्याकरण से सम्बन्धित computational resources भी शामिल हैं।

दूसरी ओर IIIT Hyderabad के Language Technologies Research Centre ने Sanskrit Computational Toolkit तथा Sanskrit-Hindi Machine Translation जैसे क्षेत्रों में काम किया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि संस्कृत और computational linguistics के बीच सम्बन्ध कोई काल्पनिक सम्भावना नहीं, बल्कि शोध एवं तकनीकी विकास का वास्तविक क्षेत्र है।

2026 में भी Sanskrit Computational Linguistics में शोध जारी है। उदाहरण के लिए Sanskrit computational resources और lexical databases के आधार पर शब्दार्थ तथा sense inventory जैसे विषयों पर शोध प्रस्तुत किए जा रहे हैं।

इसी दिशा में एक और रोचक उदाहरण शिक्षा मंत्रालय के वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग का है। उसके ऑनलाइन संसाधनों में Artificial Intelligence–Machine Learning का English-Hindi-Sanskrit Glossary प्रक्रियाधीन है, जिसमें हजारों तकनीकी शब्दों को सम्मिलित किया जा रहा है।

अर्थात् संस्कृत और AI का सम्बन्ध केवल भाषण का विषय नहीं है। भाषा-प्रौद्योगिकी में संस्कृत के लिए वास्तविक शोध और संसाधन-विकास का कार्य हो रहा है।

लेकिन यहाँ सबसे महत्वपूर्ण बात यह है—

AI में संस्कृत के अवसर केवल संस्कृत जानने वाले व्यक्ति को अपने-आप नहीं मिलेंगे।

उसे संस्कृत के साथ computational skills भी सीखनी होंगी।

उसे Python जैसी programming language सीखनी पड़ सकती है।

उसे data annotation समझना होगा।

उसे corpus बनाना और व्यवस्थित करना आना चाहिए।

उसे morphology, syntax और semantics को computational रूप में समझना होगा।

उसे NLP models, machine translation, information retrieval, OCR, speech technology network और language resources की मूल समझ विकसित करनी होगी।

अर्थात् भविष्य का विद्यार्थी केवल—

“संस्कृत जानने वाला”

नहीं, बल्कि—

“संस्कृत और computational language technology दोनों जानने वाला”

होना चाहिए।

यही है—

संस्कृत + AI

लेकिन इस सूत्र का अर्थ यह नहीं कि हर संस्कृत विद्यार्थी को software engineer बनना होगा। इसका अर्थ केवल इतना है कि संस्कृत के विद्यार्थी के लिए तकनीक के दरवाजे बन्द नहीं होने चाहिए। उसे यह विकल्प मिलना चाहिए कि वह अपनी संस्कृत-विशेषज्ञता को आधुनिक भाषा-प्रौद्योगिकी के साथ जोड़ सके।

छठा रास्ता : अनुवाद

संस्कृत के साथ अनुवाद का सम्बन्ध स्वाभाविक है। संस्कृत के विशाल वाङ्मय को आज की पीढ़ी और व्यापक समाज तक पहुँचाने में अनुवाद की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

लेकिन अनुवाद को भी केवल “संस्कृत से हिन्दी अनुवाद” तक सीमित कर देना उचित नहीं होगा। आज संस्कृत के साथ अनुवाद के अनेक आयाम विकसित हो सकते हैं।

  • संस्कृत से हिन्दी
  • संस्कृत से अंग्रेजी
  • अंग्रेजी से संस्कृत
  • भारतीय भाषाओं के बीच अनुवाद
  • Academic Translation
  • Technical Translation
  • Digital Translation
  • Machine Translation
  • Cultural Translation
  • पुरातन ग्रन्थों का आधुनिक भाषाओं में रूपान्तरण

लेकिन यहाँ भी एक बात स्पष्ट है—

सिर्फ संस्कृत जानना पर्याप्त नहीं है।

एक अच्छा Translator बनने के लिए दूसरी भाषा पर भी लगभग उतना ही अधिकार चाहिए। यदि संस्कृत का विद्यार्थी संस्कृत के साथ हिन्दी, अंग्रेजी अथवा किसी अन्य भारतीय/विदेशी भाषा पर भी मजबूत पकड़ बनाता है, तभी वह उच्च स्तरीय अनुवाद के क्षेत्र में अपनी जगह बना सकता है।

इसलिए संस्कृत विद्यार्थी के लिए कुछ उपयोगी संयोजन हो सकते हैं—

संस्कृत + अंग्रेजी या संस्कृत + हिन्दी + एक अन्य भारतीय भाषा या संस्कृत + Translation Technology

यहाँ भी वही बात सामने आती है जो AI और NLP के क्षेत्र में दिखाई देती है। भविष्य का संस्कृत विद्यार्थी केवल संस्कृत का जानकार न होकर संस्कृत को किसी दूसरी उपयोगी क्षमता के साथ जोड़ने वाला विशेषज्ञ हो सकता है।

सातवाँ रास्ता : निजी क्षेत्र

यह वह क्षेत्र है जहाँ संस्कृत की सम्भावनाओं पर सबसे कम चर्चा होती है। लेकिन यहीं सबसे अधिक सावधानी की आवश्यकता भी है।

आज संस्कृत के लिए Private Sector में कोई ऐसा विशाल, अलग और स्पष्ट Job Market नहीं है जैसा IT, Finance, Sales या कुछ अन्य बड़े रोजगार क्षेत्रों में दिखाई देता है।

इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि—

“संस्कृत पढ़िए और निजी कंपनियों में बहुत सारी नौकरियाँ आपका इंतजार कर रही हैं।”

ऐसा अभी नहीं है।

लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं है कि निजी क्षेत्र में संस्कृत का कोई स्थान नहीं है। संस्कृत की उपयोगिता उन क्षेत्रों में बन सकती है जहाँ Language, Content, Culture, Knowledge Resources और Technology एक-दूसरे से जुड़ते हैं।

उदाहरण के लिए—

  • Language Data Annotation
  • AI Training Data
  • Sanskrit OCR Correction
  • Digital Text Preparation
  • Lexicon Development
  • Content Creation
  • Editing
  • Proofreading
  • Translation
  • Publishing
  • E-learning
  • Educational Technology
  • Digital Humanities
  • Cultural Content Development
  • Language Technology

यहाँ नौकरी का शीर्षक आवश्यक नहीं कि “Sanskrit Expert” ही हो।

वह Language Specialist, Content Specialist, Linguistic Annotator, Research Assistant, Language Data Specialist, Translator, Editor या किसी तकनीकी परियोजना से जुड़ा कोई अन्य पद हो सकता है।

लेकिन यहाँ एक महत्वपूर्ण अन्तर समझना होगा। इनमें से प्रत्येक क्षेत्र में संस्कृत जानना अपने आप रोजगार की गारंटी नहीं देता। कई भूमिकाओं के लिए अतिरिक्त तकनीकी, भाषिक या व्यावसायिक कौशल की आवश्यकता होगी।

यही आधुनिक रोजगार की एक महत्वपूर्ण विशेषता है।

भविष्य में केवल डिग्री से अधिक उसके साथ जुड़ा हुआ Skill Combination महत्वपूर्ण होगा।

इसलिए संस्कृत के सामने प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि “निजी क्षेत्र में संस्कृत के नाम से कितनी नौकरियाँ हैं?”

बल्कि प्रश्न यह होना चाहिए—

“संस्कृत के ज्ञान को किन आधुनिक कौशलों के साथ जोड़कर नए रोजगार-क्षेत्र बनाए जा सकते हैं?”

आठवाँ रास्ता : संस्कृत और भाषा-प्रौद्योगिकी

यह क्षेत्र इतना महत्वपूर्ण है कि इसे AI से कुछ अलग करके देखना चाहिए। AI उसका एक बड़ा हिस्सा है, लेकिन Language Technology का क्षेत्र उससे कहीं व्यापक है।

संस्कृत की पारम्परिक व्याकरणिक परम्परा अत्यन्त विकसित है। पाणिनीय व्याकरण में नियम, धातु, प्रत्यय, शब्द-निर्माण, समास, सन्धि और वाक्य-संरचना का जो विश्लेषण मिलता है, उसका आधुनिक Computational Linguistics के साथ सार्थक संवाद सम्भव है।

University of Hyderabad का Sanskrit Computational Linguistics Programme इसी सम्भावना का एक उदाहरण है। इसके पाठ्यक्रम में NLP, Finite-State Automata, Word Generators and Analysers, Chunking, Pāṇinian Parser तथा Lexical Resources जैसे विषयों से विद्यार्थियों को परिचित कराया जाता है।

इसका महत्व केवल इतना नहीं कि संस्कृत को कंप्यूटर पर पढ़ाया जा सके। इसका व्यापक अर्थ यह है कि संस्कृत की पारम्परिक भाषिक समझ को आधुनिक भाषा-प्रौद्योगिकी में उपयोग किया जा सकता है।

यहाँ संस्कृत विद्यार्थी की पारम्परिक शिक्षा अचानक आधुनिक तकनीक से जुड़ सकती है।

लेकिन इसके लिए संस्कृत विभागों में एक बड़ा परिवर्तन करना होगा।

व्याकरण को केवल परीक्षा का विषय नहीं, Language Technology का Resource भी समझना होगा।

जिस विद्यार्थी को सन्धि, समास, धातु, प्रत्यय, कारक और वाक्य-संरचना केवल परीक्षा में लिखने के लिए नहीं, बल्कि भाषा के computational analysis के लिए भी समझाई जाएगी, उसके लिए संस्कृत शिक्षा का अर्थ ही बदल जाएगा।

नौवाँ रास्ता : पाण्डुलिपियाँ और डिजिटल मानविकी

संस्कृत के पास एक ऐसा resource है जो अधिकांश आधुनिक भाषाओं के पास इस मात्रा में उपलब्ध नहीं है—

एक विशाल पाण्डुलिपि-संसार।

लेकिन केवल पाण्डुलिपि होना अपने आप में कोई आधुनिक अवसर नहीं है। अवसर तब बनेगा जब इन पाण्डुलिपियों को पढ़ने, सुरक्षित रखने, डिजिटाइज करने, सूचीबद्ध करने, searchable बनाने और उनका आलोचनात्मक अध्ययन करने की क्षमता विकसित होगी।

इसके लिए संस्कृत विद्यार्थी को केवल पारम्परिक पाठ-अध्ययन से आगे जाकर अनेक नई क्षमताएँ सीखनी होंगी—

  • Manuscript Reading
  • Cataloguing
  • Digitisation
  • Metadata Creation
  • OCR Correction
  • Text Encoding
  • TEI/XML
  • Digital Archives
  • Textual Criticism
  • Variant Readings का अध्ययन

तभी संस्कृत का विशाल पाण्डुलिपि-संसार आधुनिक शोध, डिजिटल अभिलेखन और वैश्विक ज्ञान-संसाधनों का हिस्सा बन सकेगा।

इसलिए संस्कृत + Digital Humanities केवल एक आकर्षक विचार नहीं, बल्कि संस्कृत शिक्षा के विस्तार का एक गंभीर सम्भावित क्षेत्र है।

यहाँ भी वही मूल बात लौटकर आती है—

संस्कृत को बचाने के लिए केवल अधिक संस्कृत पढ़ाना पर्याप्त नहीं है; संस्कृत को पढ़ने वाले व्यक्ति की क्षमताओं का दायरा भी बढ़ाना होगा।

अब तुलना कीजिए

विभिन्न व्यावसायिक और सामान्य पाठ्यक्रमों की तुलना में विद्यार्थी के सामने खुलने वाली संभावनाओं को यदि हम एक नज़र में देखें, तो अंतर स्पष्ट हो जाता है:

चुना गया पाठ्यक्रम भविष्य की मुख्य दिशाएँ और विकल्प
सामान्य B.A. सामान्य प्रतियोगी परीक्षाएँ, शिक्षण (Teaching), उच्च शिक्षा (Higher Education) तथा सामान्य करियर विकल्प।
B.Com Accounting, Finance, Banking, Taxation, Business और Management की अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट दिशा।
B.Tech Engineering, IT (सूचना प्रौद्योगिकी), मुख्य तकनीकी क्षेत्र और अनेक प्रकार के Technical Roles।
कानून (Law) Legal Profession (वकालत), Judicial Services (न्यायिक सेवाएँ) तथा अन्य कॉर्पोरेट Legal Examinations।

और यदि कोई विद्यार्थी संस्कृत पढ़ता है?

तो यह धारणा बिल्कुल गलत है कि उसके रास्ते बंद हैं। उसके सामने भी संभावनाओं का एक विस्तृत संसार है—

  • शिक्षण (School & University Teaching)
  • शोध (Academic & Policy Research)
  • प्रतियोगी परीक्षाएँ (Civil Services - Sanskrit Optional)
  • उच्च स्तरीय अनुवाद (Translation Industry)
  • भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS Domain)
  • पाण्डुलिपि विज्ञान (Manuscript Studies)
  • प्रकाशन क्षेत्र (Publishing House Roles)
  • संगणकीय भाषाविज्ञान (Computational Linguistics)
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता एवं भाषा प्रसंस्करण (AI / NLP Models)
  • डिजिटल मानविकी (Digital Humanities)
  • सांस्कृतिक और ज्ञान क्षेत्र (Cultural & Knowledge Sectors)

लेकिन अन्तर यह है कि दूसरे क्षेत्रों में इनमें से कई रास्ते पहले से संस्थागत, व्यापक और विद्यार्थियों को दिखाई देने वाले हैं।

संस्कृत में कई रास्ते अभी छोटे, बिखरे हुए, उभरते हुए या विशेषज्ञता-आधारित हैं।

यही वास्तविक अन्तर है।

इसलिए समस्या यह कहना नहीं है कि “संस्कृत में अवसर नहीं हैं।” समस्या इससे अधिक सूक्ष्म है।

संस्कृत में उपलब्ध या विकसित हो रहे अवसरों को कम-से-कम तीन स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला स्तर : स्थापित अवसर

इसमें शिक्षण, विश्वविद्यालय, शोध, संस्कृत संस्थान और प्रतियोगी परीक्षाएँ आते हैं। इन क्षेत्रों में संस्कृत की भूमिका और संस्थागत संरचना पहले से मौजूद है। विद्यार्थी को इन रास्तों की जानकारी भी अपेक्षाकृत आसानी से मिल सकती है।

दूसरा स्तर : संस्थागत रूप से विकसित हो रहे अवसर

इसमें Indian Knowledge Systems (IKS), Manuscript Studies, Digital Humanities, Translation Projects, Cultural Research और Knowledge Documentation जैसे क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में संस्थागत गतिविधियाँ बढ़ रही हैं। IKS Division के Research Centres, Internships, Text-Mining और Documentation Initiatives इसके उदाहरण हैं।

लेकिन इन क्षेत्रों को अभी IT या Banking की तरह विशाल रोजगार-बाजार मानना उचित नहीं होगा। यहाँ अवसरों का बड़ा हिस्सा अभी Project-based, Research-oriented और Specialist प्रकृति का है।

तीसरा स्तर : उभरते अवसर

इसमें AI, NLP, Computational Linguistics, Language Technology और Digital Language Resources जैसे क्षेत्र आते हैं।

इन क्षेत्रों में संस्कृत से सम्बन्धित वास्तविक शोध और तकनीकी विकास हो रहा है। University of Hyderabad और IIIT Hyderabad जैसी संस्थाओं में Computational Linguistics तथा Sanskrit Language Technology से सम्बन्धित कार्य इसके उदाहरण हैं।

लेकिन यहाँ भी हमें सावधानी रखनी होगी।

उभरते हुए अवसर को स्थापित नौकरी-बाजार बताना संस्कृत के हित में भी नहीं है।

आज AI/NLP में संस्कृत का काम वास्तविक है, लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि बड़ी संख्या में संस्कृत विद्यार्थियों के लिए यहाँ नियमित रोजगार उपलब्ध हो चुका है। यह एक उभरता हुआ विशेषज्ञता-क्षेत्र है, जिसे विकसित करने की आवश्यकता है।

इस अन्तर को स्वीकार करना जरूरी है। क्योंकि यदि हम सम्भावना को उपलब्धि और सम्भावित रोजगार को निश्चित रोजगार बताकर प्रस्तुत करेंगे, तो कुछ समय के लिए उत्साह तो पैदा हो सकता है, लेकिन दीर्घकाल में विद्यार्थी का विश्वास कमजोर होगा।

लेकिन यहाँ दूसरे विषयों के बारे में भी एक भ्रम दूर करना होगा

हमें यह नहीं मान लेना चाहिए कि विद्यार्थी जिस विषय को चुनता है, उससे उसे निश्चित रोजगार मिल जाता है।

आज सामान्य स्नातक डिग्रियों और रोजगार के बीच भी एक बड़ा Gap है। समस्या केवल संस्कृत की नहीं है। उच्च शिक्षा में Skill Mismatch, Employability और Work-readiness की चुनौती व्यापक है। 2026 में NITI Aayog की रिपोर्टों में भी शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच बेहतर सामंजस्य तथा युवाओं की Work-readiness पर जोर दिया गया है।

अर्थात् केवल Degree या Certificate अपने आप में पर्याप्त नहीं है। शिक्षा को वास्तविक Learning Outcomes, Skills और Employment से जोड़ करना आवश्यक है।

इसलिए संस्कृत को यह कहकर अपने को बचाने की आवश्यकता नहीं कि—

“दूसरे विषयों में भी नौकरी नहीं मिलती।”

यह तर्क पर्याप्त नहीं है।

हाँ, दूसरे विषयों में भी रोजगार की समस्या है। लेकिन इससे संस्कृत की समस्या समाप्त नहीं हो जाती।

हमें इससे आगे जाना होगा।

दूसरे विषयों में भी समस्या है। लेकिन क्या संस्कृत अपनी समस्या को समझकर उसके समाधान की दिशा में आगे बढ़ रही है?

यही वास्तविक प्रश्न है।

संस्कृत शिक्षा को अब “विषय” से “क्षमता” की ओर जाना होगा

अब मूल प्रश्न पर लौटिए।

यदि किसी विद्यार्थी ने संस्कृत में चार वर्ष पढ़ाई की है, तो अन्त में उसके पास क्या होना चाहिए?

केवल एक डिग्री?

या उससे कहीं अधिक?

वास्तव में, उसके पास होनी चाहिए—

  • उच्च स्तर की संस्कृत भाषा-क्षमता।
  • मूल ग्रन्थों को पढ़ने और समझने की क्षमता।
  • अनुवाद करने की क्षमता।
  • शोध करने की क्षमता।
  • डिजिटल पाठ (Digital E-Texts) तैयार करने की क्षमता।
  • भाषिक विश्लेषण (Linguistic Analysis) की क्षमता।
  • AI/NLP तथा Language Technology में प्रवेश की आधारभूत क्षमता।
  • भारतीय ज्ञान परम्परा (IKS) के मूल स्रोतों को समझने की क्षमता।
  • अच्छे अकादमिक और व्यावसायिक लेखन (Academic Writing) की क्षमता।
  • प्रभावी संप्रेषण (Communication Skills) की क्षमता।
  • एक या दो आधुनिक विषयों के साथ संस्कृत को जोड़ने की क्षमता।

यदि संस्कृत शिक्षा यह सब दे पाती है, तो संस्कृत की डिग्री का अर्थ ही बदल जाएगा।

तब विद्यार्थी केवल यह नहीं कहेगा कि “मैंने संस्कृत पढ़ी है।”

वह यह कह सकेगा कि—

“मैं संस्कृत के मूल स्रोतों को पढ़ सकता हूँ, उनका विश्लेषण कर सकता हूँ, उन्हें दूसरी भाषाओं में पहुँचा सकता हूँ, उन पर शोध कर सकता हूँ और आवश्यकता पड़ने पर आधुनिक तकनीक के साथ उनका उपयोग भी कर सकता हूँ।”

और शायद यही वह बिन्दु है जहाँ संस्कृत शिक्षा को अपने भविष्य की सबसे गंभीर पुनर्व्याख्या करनी होगी।

एक सम्भावित नया मॉडल

कल्पना कीजिए कि संस्कृत में स्नातक करने वाले विद्यार्थी के लिए शिक्षा की संरचना कुछ इस प्रकार हो—

पहला वर्ष —
संस्कृत भाषा + संचार कौशल (Communication Skills)

दूसरा वर्ष —
साहित्य/व्याकरण + डिजिटल कौशल (Digital Skills)

तीसरा वर्ष —
संस्कृत + एक व्यावहारिक प्रभाग (Applied Track)

और इस Applied Track के अंतर्गत विद्यार्थियों के सामने ये बहुआयामी विकल्प हों—

  1. संस्कृत + AI/NLP
  2. संस्कृत + Translation
  3. संस्कृत + Manuscript Studies
  4. संस्कृत + Indian Knowledge Systems (IKS)
  5. संस्कृत + Linguistics
  6. संस्कृत + Digital Humanities
  7. संस्कृत + Teaching
  8. संस्कृत + Competitive Examination
  9. संस्कृत + Publishing/Content
  10. संस्कृत + किसी भारतीय या विदेशी भाषा

तब विद्यार्थी के सामने पहली बार यह स्पष्ट होगा कि—

“मैं संस्कृत पढ़ रहा हूँ, लेकिन मैं केवल संस्कृत तक सीमित नहीं हूँ।”

यह परिवर्तन अत्यन्त महत्वपूर्ण है।

और शायद संस्कृत शिक्षा की सबसे बड़ी भूल यही रही है कि हमने संस्कृत को दूसरे विषयों से बचाने के लिए उसके चारों ओर एक दीवार बना दी।

जबकि आवश्यकता दीवार बनाने की नहीं, पुल बनाने की है।

संस्कृत को इतिहास से जोड़िए।

संस्कृत को दर्शन से जोड़िए।

संस्कृत को विज्ञान के इतिहास से जोड़िए।

संस्कृत को AI से जोड़िए।

संस्कृत को भाषाविज्ञान से जोड़िए।

संस्कृत को अनुवाद से जोड़िए।

संस्कृत को भारतीय ज्ञान परम्परा से जोड़िए।

संस्कृत को डिजिटल तकनीक से जोड़िए।

और सबसे महत्वपूर्ण—

संस्कृत को विद्यार्थी के भविष्य से जोड़िए।

तरुण पीढ़ी के सामने एक नया प्रश्न पैदा होगा

अब तक हम पूछते रहे हैं—

“विद्यार्थी संस्कृत क्यों नहीं पढ़ता?”

लेकिन हमें पूछना चाहिए—

“हमने संस्कृत को विद्यार्थी के भविष्य से जोड़ने के लिए क्या किया?”

यदि किसी विद्यार्थी को संस्कृत के साथ AI पढ़ने का अवसर मिले, तो वह संस्कृत को नए ढंग से देख सकता है।

यदि उसे संस्कृत के साथ Translation Technology मिले, तो वह इसे नए ढंग से देख सकता है।

यदि उसे संस्कृत के साथ Manuscript Digitisation मिले, तो वह इसे नए ढंग से देख सकता है

यदि उसे संस्कृत के साथ भारतीय ज्ञान परम्परा पर Interdisciplinary Research का अवसर मिले, तो वह इसे नए ढंग से देख सकता है।

यदि उसे संस्कृत के साथ Teaching Technology मिले, तो वह इसे नए ढंग से देख सकता है।

और यदि उसे संस्कृत के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का स्पष्ट मार्ग मिले, तो वह इसे एक उपयोगी Academic Choice के रूप में देख सकता है।

लेकिन अन्ततः संस्कृत को केवल रोजगार का विषय बना देना भी गलत होगा।

लेकिन अन्ततः संस्कृत को केवल रोजगार का विषय बना देना भी गलत होगा

यहाँ फिर उसी मूल प्रश्न पर लौटना आवश्यक है—

क्या शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार है?

यदि ऐसा होता, तो दर्शन, इतिहास, साहित्य, संगीत, कला और अनेक मूलभूत ज्ञान-विषयों को शिक्षा से हटा देना चाहिए।

लेकिन ऐसा कोई गंभीर समाज नहीं करेगा।

क्योंकि मनुष्य को केवल कमाने के लिए शिक्षा नहीं चाहिए।

वास्तव में, उसे जीवन और जगत को—

  • समझने के लिए भी शिक्षा चाहिए।
  • सोचने के लिए चाहिए।
  • प्रश्न करने के लिए चाहिए।
  • संस्कृति को समझने के लिए चाहिए।
  • अपने अतीत को जानने के लिए चाहिए।
  • भविष्य बनाने के लिए चाहिए।
  • और स्वयं को मनुष्य के रूप में विकसित करने के लिए भी चाहिए।

इसलिए संस्कृत की उपयोगिता को केवल रोजगार में मापना उतना ही गलत है, जितना रोजगार की आवश्यकता को संस्कृत से बाहर कर देना।

दोनों को साथ रखना होगा—संस्कृत की मानवीय और बौद्धिक उपयोगिता भी, और विद्यार्थी के भविष्य की व्यावहारिक आवश्यकता भी।

संस्कृत शिक्षा का नया सूत्र

शायद अब संस्कृत शिक्षा को कुछ नए सूत्रों की आवश्यकता है—

संस्कृत के लिए रोजगार चाहिए, लेकिन संस्कृत केवल रोजगार के लिए नहीं है।
संस्कृत की परम्परा बचानी है, लेकिन परम्परा को संग्रहालय में नहीं रखना है।
संस्कृत को आधुनिक बनाना है, लेकिन आधुनिक बनाने के नाम पर संस्कृत की विशिष्टता समाप्त नहीं करनी है।

और सबसे महत्वपूर्ण—

विद्यार्थी को संस्कृत चुनने के लिए विवश नहीं करना है; संस्कृत को ऐसा बनाना है कि विद्यार्थी उसे चुनने का कारण स्वयं देख सके।

संस्कृत दिवस पर सबसे कठिन संकल्प

संस्कृत दिवस पर हम संस्कृत की महानता के हजार प्रमाण दे सकते हैं।

लेकिन शायद आज एक और काम करें।

एक कक्षा में जाकर किसी विद्यार्थी से पूछें—

“तुम संस्कृत क्यों पढ़ रहे हो?”

उसके उत्तर को ध्यान से सुनें।

फिर दूसरे विद्यार्थी से पूछें—

“तुम संस्कृत क्यों नहीं पढ़ रहे हो?”

उसका उत्तर उससे भी अधिक ध्यान से सुनें।

और तीसरा प्रश्न पूछें—

“यदि संस्कृत में तुम्हारी रुचि हो, तो तुम संस्कृत के साथ क्या पढ़ना चाहोगे?”

संभव है कि उस तीसरे प्रश्न का उत्तर ही संस्कृत शिक्षा का भविष्य बता दे।

क्योंकि शायद विद्यार्थी संस्कृत से दूर नहीं जाना चाहता।

वह केवल ऐसी शिक्षा चाहता है जिसमें—

संस्कृत भी हो और उसका भविष्य भी।

यही वह जगह है जहाँ संस्कृत शिक्षा को आज पहुँचने की आवश्यकता है।

संस्कृत को विद्यार्थी से यह नहीं कहना चाहिए—

“मेरी महानता स्वीकार करो।”

संस्कृत को विद्यार्थी से कहना चाहिए—

“आओ, मेरे माध्यम से उस ज्ञान-संसार में प्रवेश करो जिसे अभी पूरी तरह समझा भी नहीं गया है; और साथ में अपने समय की नई तकनीक, नए कौशल और नई समस्याओं को भी समझो।”

तभी संस्कृत अतीत की भाषा भर नहीं रहेगी।

वह अतीत से भविष्य तक जाने वाली भाषा बन सकेगी।

और शायद संस्कृत दिवस पर इससे बड़ा संकल्प कोई दूसरा नहीं हो सकता।

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