संस्कृत रंगमंच की विस्मृत परम्परा : उपरूपक, नृत्य-नाट्य और सांगीतरूपक की सम्भावनाएँ

 संवादों से परे संस्कृत नाट्य की एक समृद्ध दुनिया

संस्कृत नाट्यपरम्परा का स्मरण होते ही सामान्यतः हमारे मन में भास, कालिदास, शूद्रक और भवभूति जैसे नाटककारों के नाम आते हैं। गीतगोविन्दम् का उल्लेख होने पर महाकवि जयदेव की गीतिमय काव्यप्रतिभा और राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं से अनुप्राणित नृत्य-परम्परा का ध्यान आता है। किन्तु संस्कृत नाट्य-साहित्य का संसार इससे कहीं अधिक विस्तृत है। इसमें ऐसे नाट्यरूप भी विकसित हुए, जिनमें संवादों की अपेक्षा गीत, वाद्य, नृत्य, हस्तमुद्राओं और आंगिक अभिनय की प्रधानता रहती है। नाट्यशास्त्रीय परम्परा में इनसे सम्बन्धित विविध रूपों को समझने के लिए उपरूपक की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

विडम्बना यह है कि संस्कृत नाट्य की इस समृद्ध परम्परा से आज के अनेक रंगकर्मी, नृत्य-निर्देशक और सांस्कृतिक संस्थाएँ पर्याप्त परिचित नहीं हैं। परिणामस्वरूप संस्कृत में मौलिक नाट्य-प्रयोगों की सम्भावनाएँ सीमित होती जा रही हैं, जबकि हमारे प्राचीन और परवर्ती साहित्य में ऐसी अनेक कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिन्हें आधुनिक मंच की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुत किया जा सकता है।

इस परम्परा की पुनर्खोज केवल साहित्यिक अनुसंधान का विषय नहीं है। यह संस्कृत को जनसामान्य के निकट लाने, भारतीय शास्त्रीय कलाओं को नवीन अभिव्यक्ति देने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को समकालीन रंगमंच से जोड़ने का भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

 

नाट्य में संगीत : केवल मनोरंजन नहीं, भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम

प्राचीन काल से ही नाट्यप्रयोगों में गीत और वाद्य का विशेष महत्त्व रहा है। नाटक के प्रदर्शन से पूर्व प्रस्तुत किया जाने वाला संगीत दर्शकों को नाटकीय वातावरण में प्रवेश कराने में सहायक होता है। नाटक का इतिवृत्त हास्यप्रधान हो अथवा करुणाप्रधान, उसकी प्रकृति के अनुरूप संगीत की योजना दर्शकों की भावभूमि तैयार करती है।

     नाटक के मध्य में भी संगीत की भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। किसी प्रसंग में उत्पन्न नीरसता को दूर करने, कथा के प्रवाह को प्रभावशाली बनाने और पात्रों की मनःस्थितियों को अभिव्यक्त करने में गीत, वाद्य और नृत्य अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होते हैं। युद्ध, मृत्यु अथवा अन्य ऐसी घटनाएँ, जिनका प्रत्यक्ष प्रदर्शन रंगमंच पर कठिन हो, उन्हें भी संगीत के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से संकेतित किया जा सकता है।

पात्रों के चरित्र-चित्रण में संगीत का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शिव-पार्वती के प्रसंगों में ताण्डव और लास्य की योजना, कृष्ण के चरित्र में वेणुवादन का प्रयोग तथा प्रकृति के मनोरम दृश्यों में सुकोमल स्वर-लहरियों का समावेश नाट्यप्रयोग को अधिक प्रभावोत्पादक बना सकता है। इसी प्रकार पात्रों की शोक, हर्ष, उत्साह, प्रेम और विरह जैसी मनःस्थितियों को अनुकूल रागों, स्वरों तथा लयों के माध्यम से अधिक सजीव बनाया जा सकता है।

इस दृष्टि से संगीत नाटक का बाहरी अलंकरण मात्र नहीं है। वह भावाभिव्यक्ति, वातावरण-निर्माण और रसोत्पत्ति की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता है।

 

शारदातनय और भावप्रकाशन की विशिष्टता

भारतीय नाट्यपरम्परा में संगीत और नाट्य के सम्बन्ध पर विचार करते समय आचार्य शारदातनय के ग्रन्थ भावप्रकाशन का उल्लेख विशेष रूप से आवश्यक है। संगीत, उसके विभिन्न अंगों और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का जो विस्तृत विवेचन इस ग्रन्थ में मिलता है, वह इसे भारतीय नाट्यशास्त्रीय साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

शारदातनय संगीत की उत्पत्ति और उसके स्वरूप पर विचार करते हुए उसे व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। उनके विवेचन में शैव एवं तान्त्रिक दर्शन के छत्तीस तत्त्वों के साथ सांख्य और वेदान्त की दार्शनिक अवधारणाओं का भी सन्दर्भ मिलता है। इस प्रकार संगीत उनके लिए केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना और भावानुभूति से सम्बद्ध एक व्यापक विषय बन जाता है।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, धनञ्जय के दशरूपक तथा अन्य नाट्यविषयक ग्रन्थों में भी संगीत का महत्त्व स्वीकार किया गया है। तथापि संगीत और नाट्य के सम्बन्ध का जैसा विस्तृत तथा दार्शनिक विवेचन भावप्रकाशन में दिखाई देता है, वह शारदातनय की विशिष्ट दृष्टि का परिचायक है।

भरतमुनि के यहाँ गीत और वाद्य नाट्यप्रयोग के सहायक अंगों के रूप में विवेचित होते हैं। उनके विवेचन में नाट्य की प्रधानता और संगीत के उपयुक्त नियोजन पर बल दिखाई देता है। दूसरी ओर, अभिनवगुप्त ने गीत को नाट्यप्रयोग का प्राण कहा है। इन आचार्यों की दृष्टियों के बीच शारदातनय का विस्तृत विवेचन संगीत और नाट्य के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है।

शारदातनय के बाद संगीतरत्नाकर और संगीतमकरन्द जैसे ग्रन्थों में संगीत के विविध पक्षों का विवेचन हुआ। इन ग्रन्थों का अपना महत्त्व है, किन्तु संगीत की दार्शनिक पृष्ठभूमि तथा नाट्य के साथ उसके सम्बन्ध को एक साथ समझने के लिए भावप्रकाशन का अध्ययन विशेष उपयोगी है।

इस समूची परम्परा से स्पष्ट होता है कि भारतीय आचार्यों ने संगीत को नाट्य के भीतर भावों और रसों की अभिव्यक्ति का सशक्त साधन माना था। यही दृष्टि उपरूपकों और सांगीतरूपकों की रचनात्मक सम्भावनाओं को समझने में भी सहायक है।

 

उपरूपक : जब गीत और अभिनय स्वयं कथा कहने लगते हैं

संस्कृत नाट्यपरम्परा में रूपक और उपरूपक का विवेचन मिलता है। उपरूपकों के अन्तर्गत अनेक ऐसे नाट्यरूपों का उल्लेख है, जिनमें नृत्य, गीत, संगीत और अभिनय की विशिष्ट भूमिकाएँ होती हैं। इनके स्वरूप, लक्षण और प्रयोगों का अध्ययन करने पर भारतीय रंगमंच की विविधता का परिचय मिलता है।

इनमें कुछ ऐसी नाट्य-शैलियाँ भी हैं, जिनकी प्रस्तुति में संवाद गौण हो सकते हैं अथवा कथा का अधिकांश भाग गीतों और नृत्याभिनय के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। पार्श्व में राग और ताल से युक्त गीत चलते हैं तथा मंच पर कलाकार हस्तमुद्राओं, अंग-संचालन, नेत्राभिनय और मुखमुद्राओं के माध्यम से कथा को साकार करते हैं।

ऐसी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भाषा की सीमा को काफी हद तक पार कर सकती है। दर्शक प्रत्येक पद का शाब्दिक अर्थ न जानते हुए भी संगीत, लय, भावभंगिमा और अभिनय के सहारे कथा के भावात्मक पक्ष से जुड़ सकते हैं। यही कारण है कि गीतप्रधान नृत्य-नाट्य संस्कृत को जनाभिमुख बनाने की दृष्टि से विशेष उपयोगी हो सकता है।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। उपरूपकों के सभी प्रकार एक जैसे नहीं होते। उनकी संरचना, संवाद-योजना, गीतों की भूमिका और नृत्य की प्रधानता में भिन्नता मिलती है। इसलिए किसी भी संस्कृत कृति को उपरूपक अथवा संवादमुक्त नृत्य-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उसके मूल स्वरूप और नाट्यशास्त्रीय लक्षणों का अध्ययन आवश्यक है।

 

गीतगोविन्दम् से आगे : संस्कृत की पाँच गेय कृतियाँ

महाकवि जयदेव का गीतगोविन्दम् भारतीय संगीत, नृत्य और भक्तिकाव्य की एक अनुपम उपलब्धि है। राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं, विरह और मिलन की अनुभूतियों तथा अष्टपदियों की गेयता ने इसे विभिन्न नृत्य-परम्पराओं में विशेष स्थान दिलाया है। किन्तु संस्कृत का गीतप्रधान साहित्य केवल गीतगोविन्दम् तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त भी अनेक ऐसी कृतियाँ हैं, जिनकी ओर रंगकर्मियों और नृत्य-निर्देशकों का ध्यान जाना चाहिए।

 

1. अभिनवगीतगोविन्दम् — पुरुषोत्तमदेव

अभिनवगीतगोविन्दम् का उल्लेख उन कृतियों में किया जा सकता है, जिन्हें गीतगोविन्द की परम्परा के विस्तार के रूप में देखा जाता है। राधा-कृष्ण की लीलाओं पर आधारित ऐसी गीतप्रधान रचनाएँ नृत्य-निर्देशन, संगीत-संयोजन और भावाभिनय के लिए उपयोगी सामग्री प्रदान कर सकती हैं।

इस कृति के आधार पर नृत्य-नाट्य तैयार करने से पूर्व इसके पाठ, राग-ताल सम्बन्धी निर्देशों, उपलब्ध संस्करणों और रचनाकाल का प्रामाणिक अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे निर्देशक को मूल रचना की विशेषताओं को सुरक्षित रखते हुए मंचीय प्रस्तुति विकसित करने में सहायता मिलेगी।

 

2. जगन्नाथवल्लभनाटकम् — राय रामानन्द

राय रामानन्द से सम्बद्ध जगन्नाथवल्लभनाटकम् संस्कृत की गीतप्रधान नाट्यपरम्परा में उल्लेखनीय स्थान रखता है। कृष्णभक्ति, प्रेमानुभूति और गीतात्मकता से युक्त इसकी कथावस्तु संगीत तथा नृत्य के समन्वित प्रयोग के लिए महत्त्वपूर्ण सम्भावनाएँ प्रस्तुत करती है।

इस कृति को मंच पर लाने के लिए उसके गीतों, प्रसंगों और नाटकीय संरचना का सूक्ष्म अध्ययन किया जा सकता है। ओडिसी जैसी शास्त्रीय नृत्यशैलियों की भावाभिव्यक्ति और गीतात्मक परम्परा के सन्दर्भ में भी यह कृति विशेष रुचि का विषय है। इसके आधार पर राधा-कृष्ण के प्रसंगों को संगीत, नृत्य और अभिनय के माध्यम से प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

3. श्रीकृष्णलीलामृतम् — कवि ईश्वर दीक्षित

कृष्ण की लीलाओं पर आधारित गेय साहित्य नृत्य-नाट्य के लिए सदैव आकर्षण का विषय रहा है। श्रीकृष्णलीलामृतम् का उल्लेख भी इसी सन्दर्भ में किया जा सकता है। कृष्ण के बालरूप, उनकी विविध लीलाओं और भक्तिभाव से सम्बद्ध प्रसंगों को गीत तथा अभिनय के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत करने की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं।

इस प्रकार की कृति का प्रयोग करते समय मूल पाठ में उपलब्ध राग-ताल सम्बन्धी निर्देशों का परीक्षण करना विशेष उपयोगी होगा। संगीतकार, गायक और नर्तक यदि मूल काव्य की गीतात्मकता तथा भावभूमि के अनुरूप कार्य करें, तो प्रस्तुति में साहित्यिक प्रामाणिकता और कलात्मक प्रभाव दोनों सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

 

4. शिवलीलामृतम् — अग्निचित् नित्यानन्द

संस्कृत गीतप्रधान नाट्य-परम्परा की चर्चा केवल कृष्णभक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शैव परम्परा में भी नृत्य और संगीत की अत्यन्त समृद्ध सम्भावनाएँ हैं। शिवलीलामृतम् का उल्लेख इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

 

शिव-पार्वती के प्रसंग, शिव का ताण्डव, पार्वती का लास्य, विवाह, प्रेम तथा विरह जैसे विषय नृत्य-नाट्य की प्रभावशाली संरचना के लिए उपयुक्त आधार प्रदान कर सकते हैं। ऐसी कृति पर कार्य करने वाली संस्था शिव के विविध रूपों को आंगिक अभिनय, नृत्य, गीत और वाद्य के माध्यम से मंच पर साकार कर सकती है।

इसके लिए आवश्यक है कि कृति के प्रामाणिक पाठ, रचनाकार, रचनाकाल और उपलब्ध संगीत-निर्देशों का समुचित सत्यापन किया जाए, जिससे प्रस्तुति कल्पनाशील होने के साथ-साथ मूल साहित्य के प्रति उत्तरदायी भी रहे।

 

5. मुकुन्दविलास — रघूत्तम तीर्थ

भगवान विष्णु और उनके विभिन्न रूपों से सम्बद्ध गेय साहित्य में भी मंचीय प्रस्तुति की व्यापक सम्भावनाएँ हैं। मुकुन्दविलास का उल्लेख ऐसी कृतियों में किया जाता है, जिनके आधार पर विष्णु के वैभव, विविध लीलाओं तथा अवतारों से सम्बन्धित प्रसंगों को संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करने पर विचार किया जा सकता है।

इस प्रकार की प्रस्तुति में वीर, अद्भुत और भक्ति जैसे भावों की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त रागों, तालों, नृत्य-संरचनाओं और समूह-अभिनय का संयोजन किया जा सकता है।

इन पाँचों कृतियों के सन्दर्भ में एक साझा आवश्यकता है—मूल ग्रन्थों के प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध हों, उनके पाठ और संगीत-निर्देशों का अध्ययन किया जाए तथा संस्कृत के विद्वानों, संगीतज्ञों और नृत्य-निर्देशकों के सहयोग से मंचीय रूप विकसित किए जाएँ। केवल ग्रन्थ का नाम जान लेना पर्याप्त नहीं; उसकी वास्तविक नाट्य-सम्भावनाएँ उसके सूक्ष्म अध्ययन और रचनात्मक प्रयोग से ही सामने आएँगी।

 

वर्तमान रंगमंच की चुनौती : परिचित नामों से आगे बढ़ने की आवश्यकता

कुछ समय पूर्व मुझे देश की प्रतिष्ठित नाट्य एवं नृत्य संस्थाओं के निर्देशकों और कलाकारों का साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। संस्कृत नाटक, संगीत तथा उपरूपकों के माध्यम से संस्कृत के जनाभिमुखीकरण के उद्देश्य से एक विशेष कार्यशाला आयोजित की जानी थी। इसी कार्यशाला के लिए संस्थाओं से आवेदन आमन्त्रित किए गए थे।

साक्षात्कार के दौरान एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। संस्कृत नाट्य की परम्परा में गीत, संगीत और नृत्य पर आधारित कृतियों की उपलब्धता तथा उनके मंचीय प्रयोग की सम्भावनाओं के विषय में अनेक निर्देशकों की जानकारी सीमित दिखाई दी। संवादमुक्त अथवा गीतप्रधान नृत्य-नाट्य की शास्त्रीय परम्परा को लेकर भी पर्याप्त परिचय का अभाव अनुभव हुआ।

यह स्थिति विचारणीय है। जब संस्कृत साहित्य में इतने विविध नाट्यरूप और गेय कृतियाँ उपलब्ध हैं, तब मंचीय प्रयोगों का दायरा कुछ प्रसिद्ध रचनाकारों और परिचित कृतियों तक ही क्यों सीमित रह जाए?

संस्कृत के प्राचीन नाटकों को आधुनिक दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसी प्रकार अन्य भाषाओं के नाटकों का संस्कृत रूपान्तरण भी उपयोगी हो सकता है। किन्तु यदि संस्कृत रंगमंच का विकास मुख्यतः इन्हीं दो मार्गों पर निर्भर रह जाए, तो मूल संस्कृत नाट्य-साहित्य और उसकी विविध परम्पराओं का पर्याप्त उपयोग नहीं हो सकेगा।

आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत रंगकर्मी भास, कालिदास, शूद्रक और जयदेव से आगे बढ़कर अन्य नाटककारों, गेय कृतियों, उपरूपकों तथा परवर्ती सांगीतरूपकों की खोज करें। संस्कृत साहित्य में उपलब्ध सामग्री का व्यवस्थित संकलन, सम्पादन, अनुवाद, संगीतात्मक विश्लेषण और मंचीय प्रयोग इस दिशा में ठोस कार्य हो सकता है।

 

वधूटि मा स्म रोदीः : संस्कृत नौटंकी की एक उल्लेखनीय कृति

इसी खोज के क्रम में हाल ही में मेरे हाथ में महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी की कृति वधूटि मा स्म रोदीः आई। इस सांगीतरूपक को पाकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। इसके लिए मैं आदरणीय विभाष जी के प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मेरे ऊपर स्नेहवर्षा करते हुए यह कृति उपलब्ध कराई।

     पुस्तक के आरम्भ में दी गई सत्रह पृष्ठों की विस्तृत प्रस्तावना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यह केवल प्रस्तुत रचना का परिचय नहीं देती, बल्कि संस्कृत की सांगीतरूपक-परम्परा और नौटंकी जैसी लोकनाट्य-विधा के साथ उसके सम्बन्ध को समझने में भी सहायता करती है।


कुछ समय पूर्व इसी विषय पर मेरी चर्चा प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र जी से हुई थी। चर्चा के दौरान उन्होंने उपरूपकों के विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि दशरूपक आदि ग्रन्थों में जिन उपरूपकों के नाम और लक्षण मिलते हैं
, उनसे सम्बद्ध अनेक रचनाएँ आज सहज रूप में उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने अपनी दो कृतियों से भी परिचित कराया था।

यह तथ्य संस्कृत नाट्य के अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। किसी नाट्यरूप का शास्त्रीय ग्रन्थों में उल्लेख मिलना और उस विधा की कोई पूर्ण, उपलब्ध तथा मंचनीय रचना प्राप्त होना—ये दोनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं। इसलिए उपरूपकों के पुनरुद्धार के लिए केवल शास्त्रीय लक्षणों का अध्ययन ही नहीं, बल्कि पाण्डुलिपियों, प्रकाशित ग्रन्थों और आधुनिक संस्कृत रचनाओं की खोज भी आवश्यक है।

आदरणीय महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी ने अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में कुछ ऐसी रचनाओं का उल्लेख किया है, जिनकी ओर हमारा ध्यान पहले नहीं गया था। वे लिखते हैं कि सन् 1987 में लखनऊ के एक संस्कृतप्रेमी डॉ. कृष्णनारायण पाण्डेय की संस्कृत नौटंकी सीता स्वयंवरम् देखने का अवसर मिला। उसी प्रसंग में डॉ. वीरभद्र मिश्र द्वारा आयोजित ‘संस्कृताक्रीड’ में उनकी नौटंकी सुल्तानादस्युः का मंचन हो रहा था।

विभाष जी के अनुसार, इन रचनाओं के अतिरिक्त उस समय तक उनकी दृष्टि में संस्कृत सांगीतरूपक अथवा नौटंकी की अन्य रचनाएँ नहीं आई थीं। वे आचार्य मिश्र की सुल्तानादस्युः को सम्पूर्ण नाट्यलक्षणों से युक्त संस्कृत के प्रारम्भिक सांगीतरूपकों में एक महत्त्वपूर्ण कृति मानते हैं।

वे यह भी बताते हैं कि लगभग बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व उन्होंने यौतकीयम् नाम से एक संस्कृत नौटंकी लिखी थी। उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकों की ग्रन्थसूचियों में इसका उल्लेख कई बार ‘प्रकाश्य’ कृति के रूप में हुआ। वर्तमान वधूटि मा स्म रोदीः उसी रचना का विस्तृत और परिवर्तित रूप है।

     इस जानकारी का महत्त्व इसलिए भी है कि संस्कृत सांगीतरूपक की परम्परा को समझते समय हमें केवल प्राचीन ग्रन्थों की ओर नहीं देखना चाहिए। आधुनिक संस्कृत लेखकों ने भी लोकनाट्य की लोकप्रिय विधाओं को संस्कृत में अपनाने और उनके माध्यम से नाट्य-रचना करने के प्रयास किए हैं। इन प्रयासों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।

 

परम्परा और प्रयोग का समन्वय

वधूटि मा स्म रोदीः की प्रस्तावना में रचना की संरचना से सम्बन्धित कुछ रोचक विशेषताओं की ओर भी संकेत किया गया है। परम्परागत सांगीतरूपक में दृश्यों का विधान नहीं होता, जबकि इस कृति के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में क्रमशः पाँच-पाँच दृश्य रखे गए हैं। पूर्वार्द्ध के तृतीय दृश्य में एक गर्भदृश्य भी है।

नौटंकी की परम्परा में अभिनय के साथ-साथ इतिवृत्त के उन अंशों की सूचना देने के लिए, जिन्हें मंच पर प्रत्यक्ष रूप में नहीं दिखाया जाता, ‘कवि’ अथवा ‘रंगा’ जैसे पात्र का प्रयोग मिलता है। प्रस्तुत कृति में इस प्रयोजन के लिए ‘ग्रन्थिक’ का प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार जहाँ नौटंकी की परम्परा में अर्थोपेक्षकों की व्यवस्था सामान्यतः नहीं मिलती, वहाँ इसके उत्तरार्द्ध में विष्कम्भक का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। पुस्तक की प्रस्तावना में इस नाट्य की वस्तु को उत्पाद्य बताया गया है।

इन विशेषताओं से यह समझने में सहायता मिलती है कि कोई आधुनिक संस्कृत रचनाकार परम्परागत नाट्यरूप के मूल स्वभाव को ग्रहण करते हुए उसकी संरचना में किस प्रकार नवीन प्रयोग कर सकता है। यहाँ परम्परा का अर्थ केवल पुराने विधान की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि उसके आधार पर नई रचनात्मक सम्भावनाओं का विकास भी है।

 

भाषा की प्रौढ़ता और मंचीय सम्प्रेषण

इस कृति का एक पक्ष ऐसा भी है, जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है। वधूटि मा स्म रोदीः में प्रौढ़ संस्कृत का प्रयोग हुआ है। साहित्यिक दृष्टि से यह उसकी विशेषता हो सकती है, किन्तु मंचीय प्रस्तुति के समय अभिनेता के लिए इस भाषा को सहज प्रवाह के साथ बोलना और सामान्य दर्शक के लिए उसे तत्काल समझ पाना कुछ कठिन हो सकता है।

यह कठिनाई संस्कृत नाट्य के समक्ष उपस्थित एक व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करती है। साहित्यिक प्रामाणिकता और मंचीय सम्प्रेषण के बीच सन्तुलन कैसे स्थापित किया जाए?

इसका समाधान मूल रचना को अनावश्यक रूप से सरल बनाकर उसकी साहित्यिक गरिमा कम करने में नहीं है। इसके स्थान पर अभिनेता-प्रशिक्षण, उच्चारणाभ्यास, संवादों के भावार्थ का पूर्वाभ्यास, उपयुक्त संगीत, दृश्य-संकेत, मुद्राभिनय तथा आवश्यकतानुसार संक्षिप्त परिचय या भावानुवाद की सहायता ली जा सकती है। इस प्रकार संस्कृत की प्रौढ़ता भी सुरक्षित रह सकती है और दर्शकों तक नाट्य का भाव भी पहुँच सकता है।

गीतप्रधान नाट्य में यह सम्भावना और भी अधिक है। संगीत, लय और आंगिक अभिनय दर्शक को कथा से जोड़ने में सहायक होते हैं। यदि निर्देशक इन तत्त्वों का संतुलित प्रयोग करे, तो संस्कृत के प्रति अपरिचित दर्शक भी प्रस्तुति का आनन्द ले सकते हैं।

 

संस्कृत नौटंकी की सम्भावनाएँ

नौटंकी भारतीय लोकनाट्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसके संगीत, गायन, कथावाचन, अभिनय और रंगमंचीय ऊर्जा ने इसे व्यापक जनसमुदाय से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि इस विधा की विशेषताओं का संस्कृत के साथ रचनात्मक समन्वय किया जाए, तो यह संस्कृत के जनाभिमुखीकरण का एक उपयोगी माध्यम बन सकती है।

सीता स्वयंवरम्, सुल्तानादस्युः, यौतकीयम् और वधूटि मा स्म रोदीः जैसी रचनाओं का उल्लेख इस दिशा में आगे अनुसंधान करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इन कृतियों के पाठ, रचनाकाल, प्रकाशन-इतिहास, उपलब्ध प्रतियों और मंचन-विवरणों का संकलन किया जाना चाहिए। इनके आधार पर यह समझा जा सकेगा कि आधुनिक संस्कृत लेखकों ने नौटंकी की परम्परा को किस प्रकार अपनाया और संस्कृत नाट्य की आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें क्या परिवर्तन किए।

     ऐसा कार्य संस्कृत के शोधार्थियों, नाट्य-निर्देशकों, संगीतज्ञों और लोकनाट्य के अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी हो सकता है।

 

वधूटि मा स्म रोदीः के प्रसंग में पुस्तक से प्राप्त यह पद भी उल्लेखनीय है—

 

“उच्चैरियं विरौति रागमालपति च भिन्नं भिन्नम्।

बहिर्यात एव त्वय्यस्याः शुभं नेक्ष्यते चिह्नम्।

दर्शं दर्शं बोभवीति पुत्रक चेतो मे खिन्नम्।

किं वदानि यत्त्वयि सुचिन्तितं सर्वं जातं छिन्नम्॥”

 

इन पंक्तियों में स्वर, राग, विरह और व्याकुलता का जो भावलोक दिखाई देता है, वह सांगीतरूपक की प्रकृति को समझने में सहायक है। यहाँ पद केवल कथ्य को आगे नहीं बढ़ाता, बल्कि अपने भीतर एक भावात्मक वातावरण भी निर्मित करता है। उचित संगीत-संयोजन और अभिनय के साथ ऐसी पंक्तियाँ मंच पर अधिक प्रभावशाली रूप ग्रहण कर सकती हैं।

     गीतप्रधान नाट्य की विशेषता यही है कि काव्य, संगीत और अभिनय अलग-अलग कलारूप बने रहने के स्थान पर एक-दूसरे के अर्थ को विस्तार देते हैं। संस्कृत उपरूपकों और सांगीतरूपकों की परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं।

    पहला, उपरूपकों के शास्त्रीय लक्षणों और उनसे सम्बन्धित उपलब्ध रचनाओं का प्रामाणिक संकलन किया जाए। दूसरा, गीतगोविन्दम् के अतिरिक्त अन्य गेय संस्कृत कृतियों के पाठ, संस्करण, राग-ताल निर्देश और मंचीय इतिहास का अध्ययन किया जाए। तीसरा, संस्कृत के विद्वानों, संगीतज्ञों, नृत्य-निर्देशकों और अभिनेताओं के बीच संयुक्त कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँ। चौथा, उपलब्ध रचनाओं पर छोटे-छोटे प्रयोगात्मक मंचन किए जाएँ, जिनसे यह जाना जा सके कि किस प्रकार की कृतियाँ वर्तमान दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुँच सकती हैं।

     इसके साथ ही संस्कृत नाट्य की आधुनिक रचनाओं विशेषतः संस्कृत नौटंकी और अन्य सांगीतरूपकों का भी व्यवस्थित अभिलेखीकरण होना चाहिए। यदि कोई रचना दुर्लभ है, तो उसकी प्रति, लेखक का परिचय, प्रकाशन-विवरण और मंचन से सम्बन्धित सामग्री सुरक्षित की जानी चाहिए। इससे भविष्य के शोधकर्ताओं और कलाकारों को उपयोगी आधार प्राप्त होगा।

     संस्कृत रंगमंच के विकास का अर्थ केवल पुराने नाटकों का पुनर्मंचन अथवा दूसरी भाषाओं के नाटकों का संस्कृत अनुवाद नहीं है। इसका वास्तविक विस्तार तब होगा, जब हम अपनी नाट्यपरम्परा के विविध रूपों को पहचानेंगे, उपेक्षित कृतियों को खोजेंगे और उन्हें समकालीन मंच की आवश्यकताओं से जोड़ेंगे।

     संस्कृत नाट्य-साहित्य में संवादप्रधान नाटकों के साथ-साथ गीत, संगीत, नृत्य और अभिनय के समन्वय से विकसित अनेक नाट्यरूपों की सम्भावनाएँ निहित हैं। भावप्रकाशन में संगीत का दार्शनिक विवेचन हो, गीतगोविन्दम् की गीतात्मक परम्परा हो, अन्य गेय संस्कृत कृतियाँ हों अथवा वधूटि मा स्म रोदीः जैसी आधुनिक संस्कृत नौटंकी—ये सभी हमें भारतीय रंगमंच की बहुआयामी प्रकृति का स्मरण कराते हैं।

     हमारी आवश्यकता केवल इन कृतियों की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना, प्रमाणित करना, उन पर शोध करना और मंच पर लाना है। जब संस्कृत के विद्वान, संगीतज्ञ, नर्तक और रंगकर्मी एक साथ कार्य करेंगे, तभी इस विरासत की वास्तविक सम्भावनाएँ सामने आएँगी।

     महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी की वधूटि मा स्म रोदीः जैसी कृतियाँ इस दिशा में हमारी जिज्ञासा को बढ़ाती हैं। अब आवश्यकता है कि ऐसी रचनाओं को व्यक्तिगत संग्रहों और सीमित पाठक-वर्ग तक सीमित न रहने दिया जाए, बल्कि उन्हें व्यापक सांस्कृतिक विमर्श और रंगमंचीय प्रयोगों का हिस्सा बनाया जाए।

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नई शिक्षा नीति और संस्कृत का विस्तृत होता दायरा

भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, तकनीकी उपलब्धियों, आर्थिक सामर्थ्य या आधुनिक शिक्षा से नहीं बनती। भारत की वास्तविक पहचान उसकी उस ज्ञान-परंपरा से बनती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य, समाज, राष्ट्र और जीवन के विविध पक्षों पर चिंतन किया है। इस ज्ञान-परंपरा का सबसे व्यापक और सशक्त माध्यम संस्कृत भाषा रही है।

आज नई शिक्षा नीति के माध्यम से संस्कृत के लिए एक नया अवसर उपस्थित हुआ है। संस्कृत अब केवल संस्कृत विभाग के विद्यार्थियों तक सीमित रहने वाली भाषा नहीं रहनी चाहिए। विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य सभी विषयों के विद्यार्थियों तक संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि पहुँचाना समय की आवश्यकता है।

यह केवल संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा को उसके मूल स्रोतों से जोड़ने का प्रश्न है।

संस्कृत : केवल एक भाषा नहीं, एक विशाल ज्ञान-परंपरा

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं—वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि। इनके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी व्यापक ज्ञान-परंपरा का हिस्सा माना गया। इसके बाद चौंसठ कलाओं की परंपरा है, जिन्हें उपविद्याओं के रूप में देखा गया।

इन सबका विशाल वाङ्मय संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।

आज इनमें से अनेक विषय अलग-अलग आधुनिक विभागों में पढ़ाए जा रहे हैं। समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा, कला और अनेक अन्य क्षेत्रों में आधुनिक अध्ययन हो रहा है। किंतु एक बड़ी समस्या यह है कि इन विषयों के अध्ययन में संस्कृत में उपलब्ध उनके मूल स्रोतों से हमारा संपर्क लगातार कम होता गया है।

नई शिक्षा नीति इस दूरी को कम करने का अवसर देती है। संस्कृत में निहित इन विषयों के सूत्रों को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक विद्यार्थी संस्कृत का व्याकरणाचार्य बन जाए। आवश्यकता यह है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार संस्कृत में निहित ज्ञान से परिचित हो।

नई शिक्षा नीति : संस्कृत के लिए खुलते हुए नए द्वार

पहले संस्कृत का अध्ययन मुख्यतः उन्हीं विद्यार्थियों तक सीमित रहता था, जिन्होंने संस्कृत को अपने मुख्य विषय के रूप में चुना हो। नई शिक्षा नीति ने इस स्थिति को व्यापक रूप से बदलने का अवसर दिया है।

अब संस्कृत को माइनर विषय, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टीडिसिप्लिनरी कोर्स जैसे विभिन्न माध्यमों से दूसरे विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में इन माध्यमों से विज्ञान, वाणिज्य, कला और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी भी संस्कृत से जुड़ रहे हैं।

कल्पना कीजिए—कृषि का कोई विद्यार्थी संस्कृत को माइनर विषय के रूप में पढ़ रहा है। वह संस्कृत पढ़कर जीविका नहीं कमाने वाला है। वह भविष्य में कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई दूसरा विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई प्रबंधक, कोई वैज्ञानिक, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ और कोई इंजीनियर।

लेकिन यदि इन सबके अध्ययन-क्रम में संस्कृत का थोड़ा-सा भी प्रवेश होता है, तो वे भारतीय ज्ञान-परंपरा के एक विशाल संसार से परिचित हो सकते हैं।

यही नई शिक्षा नीति की एक बड़ी विशेषता है।

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों से नहीं बनेगा। उसका भविष्य तब बनेगा जब दूसरे विषयों के विद्यार्थी भी उससे परिचित होंगे।

तीन लक्ष्य : सभी तक, समान रूप से और पूर्ण गुणवत्ता के साथ

संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि को समाज तक पहुँचाने के तीन प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए—

पहला—यह ज्ञान सभी तक पहुँचे।

दूसरा—समान रूप से पहुँचे।

तीसरा—पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

आज ज्ञान प्राप्त करने के रास्ते पहले की तरह सीमित नहीं हैं। किसी समय संस्कृत या उसके कुछ ग्रंथों को लेकर सामाजिक और स्थानगत प्रतिबंधों की चर्चा होती थी। आज ज्ञान के द्वार कहीं अधिक खुले हैं। आज कोई भी व्यक्ति वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत और अन्य ग्रंथों के अध्ययन की ओर बढ़ सकता है।

इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि ज्ञान उपलब्ध है या नहीं। प्रश्न यह है कि हम उस ज्ञान को कितनी प्रभावी और आधुनिक विधियों से विद्यार्थियों तक पहुँचा पा रहे हैं।

संस्कृत के शिक्षकों के सामने नई चुनौती

संस्कृत के विद्यार्थी के सामने संस्कृत का शिक्षक जाता है तो सामान्यतः एक साझा पृष्ठभूमि पहले से मौजूद होती है। विद्यार्थी संस्कृत की भूमिका, उसकी परंपरा और उसके शास्त्रीय संदर्भों से परिचित होता है। उसमें गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव भी रहता है—

“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”

लेकिन यदि वही शिक्षक प्रबंधन, विज्ञान या वाणिज्य के विद्यार्थी के सामने जाए, तो स्थिति अलग होगी।

वह विद्यार्थी श्रद्धा के साथ आया है, तभी उसने संस्कृत चुनी है; लेकिन उसके भीतर तर्क-बुद्धि भी है। वह पूछेगा—“ऐसा क्यों?” “यह इस प्रकार क्यों है?” “इसका प्रमाण क्या है?”

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अब केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने विषय को दूसरे विषय के विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।

उसे तर्क देने होंगे, उदाहरण देने होंगे, प्रस्तुतियाँ तैयार करनी होंगी और आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जैसे माध्यमों का प्रयोग करना होगा। जिन विद्यार्थियों की संस्कृत में पृष्ठभूमि नहीं है, उनके लिए सरल और संक्षिप्त नोट्स तैयार करने होंगे। उपयोगी संदर्भ-ग्रंथों की जानकारी देनी होगी।

अर्थात् अब चुनौती केवल “क्या पढ़ाना है” की नहीं है; चुनौती यह भी है कि “कैसे पढ़ाना है”।

रामायण को केवल कथा नहीं, जीवन-पथ के रूप में पढ़ना

अभी रामायण का उदाहरण लें।

अधिकांश भारतीयों को यह मालूम है कि रामायण में कितने कांड हैं, उसकी कथा क्या है और राम कौन हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि राम क्या है और राम का अयन क्या है?

यदि हम राम को आलंबन-विभाव मानें, तो राम का अयन—अर्थात् उनका मार्ग—उद्दीपन-विभाव के रूप में देखा जा सकता है।

‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग।

इस दृष्टि से रामायण में केवल राम की कथा नहीं, बल्कि राम के मार्ग की प्रतिष्ठा है। राम का मार्ग यदि हम अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हमारा जीवन भी सफल हो सकता है।

यदि कोई विद्यार्थी रामायण के प्रति पहले से श्रद्धावान नहीं है, तब भी यदि हम उसे रामायण को इस दृष्टि से समझाएँ कि इसमें एक जीवन-पथ प्रस्तुत किया गया है, तो उसमें उसे पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न हो सकती है।

और संभव है कि वह पूरी रामायण न पढ़े, लेकिन उसके जीवन में उससे कोई सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आए।

यही संस्कृत को नए विद्यार्थियों तक पहुँचाने का उद्देश्य होना चाहिए।

धर्म और संप्रदाय : एक महत्वपूर्ण अंतर

संस्कृत परंपरा के संबंध में एक सामान्य भ्रम यह है कि धर्म का अर्थ संप्रदाय या किसी विशेष पूजा-पद्धति से है। वास्तव में धर्म और संप्रदाय में अंतर है।

संप्रदाय एक विशेष पूजा-पद्धति, परंपरा या अनुशासन हो सकता है। लेकिन धर्म उससे व्यापक है।

धर्म को एक सार्वभौमिक तत्व के रूप में देखा गया है—ऐसा तत्व जिसके बिना किसी व्यवस्था का अस्तित्व और उसका संतुलन संभव नहीं।

महर्षि पतंजलि की परंपरा में धर्म के व्यावहारिक आधार के रूप में यम और नियम का उल्लेख मिलता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम हैं; शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान नियम हैं।

ये किसी एक संप्रदाय तक सीमित मूल्य नहीं हैं। सत्य, अहिंसा, संयम, संतोष और आत्म-अनुशासन जैसे मूल्य किसी भी स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक हैं।

इसीलिए संस्कृत के माध्यम से धर्म को समझाने का अर्थ किसी विशेष संप्रदाय का प्रचार करना नहीं, बल्कि उन सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों को समझना है जो मनुष्य और समाज के संतुलन के लिए आवश्यक हैं।

मनुष्य के अस्तित्व की तीन शक्तियाँ

मनुष्य के अस्तित्व और उसके समुचित विकास के लिए तीन प्रकार की शक्तियाँ आवश्यक हैं—

शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और बौद्धिक शक्ति।

योग शारीरिक शक्ति को संतुलित और समर्थ बनाने में सहायता करता है। उपासना, ध्यान और अनुशासन मानसिक शक्ति को विकसित करते हैं। ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन बौद्धिक शक्ति को प्रखर बनाते हैं।

पतंजलि का प्रसिद्ध सूत्र है—

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”

योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं है। वह चित्त के अनुशासन से जुड़ा हुआ है।

इस प्रकार योग शरीर और मन दोनों के संतुलन का मार्ग प्रस्तुत करता है, जबकि ज्ञान बौद्धिक शक्ति को विकसित करता है।

मनुष्य के समग्र विकास के लिए इन तीनों शक्तियों का संतुलन आवश्यक है।

और इन तीनों के विकास से संबंधित विशाल ज्ञान-परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।

योग और आयुर्वेद : समग्र मनुष्य की चिंता

महर्षि पतंजलि के संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक है—

“योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”

यह परंपरा चित्त, वाणी और शरीर—तीनों के शोधन की ओर संकेत करती है।

आयुर्वेद भी मनुष्य को केवल रोगों के समूह के रूप में नहीं देखता। उसका उद्देश्य स्वास्थ्य की रक्षा और रोग की स्थिति में उसके निवारण से जुड़ा है—

“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्।”

आज जब आधुनिक शिक्षा में स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र जीवन-शैली पर चर्चा बढ़ रही है, तब संस्कृत के मूल ग्रंथों में उपलब्ध इस ज्ञान से विद्यार्थियों को परिचित कराना अत्यंत उपयोगी हो सकता है।

संस्कृत और मनोविज्ञान : भावों का सूक्ष्म संसार

यदि आधुनिक मनोविज्ञान की बात करें, तो संस्कृत साहित्य और नाट्यशास्त्र में मानवीय भावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है।

आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भावों और उनके परस्पर संबंधों का विस्तृत विवेचन है। परंपरागत रूप से आठ स्थायी भाव, आठ सात्त्विक भाव और तैंतीस संचारी भावों की चर्चा की जाती है।

अर्थात् कुल 49 भावों का यह वर्गीकरण मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों को समझने का अत्यंत सूक्ष्म ढाँचा प्रस्तुत करता है।

विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, सात्त्विक भाव और स्थायी भाव—इन सबके माध्यम से मनुष्य की भावात्मक दुनिया को समझने का प्रयास किया गया है।

आज जिस Emotional Intelligence की चर्चा प्रबंधन और मनोविज्ञान में होती है, उसके संदर्भ में नाट्यशास्त्र की यह परंपरा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है।

इसलिए संस्कृत को केवल प्राचीन साहित्य की भाषा समझना उसके विशाल ज्ञान-संसार को सीमित कर देना होगा।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र और ‘मनुष्यवती भूमि’

प्रबंधन और राजनीति की बात करें तो आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमारे सामने एक विशाल ज्ञान-संसार खोलता है।

कौटिल्य के यहाँ अर्थ केवल धन-संपत्ति का नाम नहीं है। राष्ट्र को समझने के लिए वे “मनुष्यवती भूमि” की अवधारणा सामने रखते हैं—मनुष्यों से युक्त भूमि।

पर्वत, नदियाँ, वन और भूभाग राष्ट्र के भौतिक आधार हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग कौन करता है? मनुष्य।

मनुष्य में विवेक है, औचित्य और अनौचित्य को समझने की क्षमता है। इसलिए मनुष्य का निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण का आधार बनता है।

इसीलिए राष्ट्र का वास्तविक सामर्थ्य उसके भूभाग से उतना नहीं, जितना उसके मनुष्यों की गुणवत्ता से निर्धारित होता है।

नेतृत्व के संस्कृत सूत्र

संस्कृत साहित्य में नेतृत्व के गुणों का भी सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

एक श्लोक में कहा गया है—

“विनीतो मधुरः त्यागी दक्षः प्रियवाक् तथा।
लोकवेदविदुत्साही स्मृतिप्रज्ञाकलान्वितः॥”

नेता कैसा हो?

वह विनीत हो। लेकिन विनय का अर्थ डरपोक होना नहीं है। विनय का अर्थ है—औचित्य की रक्षा करते हुए समय और परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करना।

वह मधुर हो—उसकी वाणी संतुलित हो।

वह त्यागी हो—पद और अधिकार को केवल अपने सुख के लिए न उपयोग करे।

वह दक्ष हो—अपने कार्य में निपुण हो।

वह प्रियवाक् हो—उसकी भाषा समाज को जोड़ने वाली हो।

इसी संदर्भ में हमारी परंपरा कहती है—

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्॥”

ये केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं। ये नेतृत्व और सामाजिक व्यवहार के व्यावहारिक सूत्र भी हैं।

धर्म का एक महत्वपूर्ण लक्षण धैर्य माना गया है। धैर्य के बिना नेतृत्व संभव नहीं।

और प्रसिद्ध पंक्ति है—

“विद्या ददाति विनयम्,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति,
धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥”

यह केवल श्लोक नहीं, जीवन की एक क्रमबद्ध दृष्टि है—विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से संपदा, संपदा से धर्म और धर्म से सुख।

भारतीय ज्ञान-परंपरा जड़ नहीं, निरंतर विकसित होने वाली परंपरा है

भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह समय के अनुसार अपनी प्रस्तुति बदलती रही है।

हम वेद से वेदांगों तक गए, वेदांगों से मीमांसा और न्याय तक पहुँचे, धर्मशास्त्र और पुराणों तक आए। मूल सिद्धांत और आदर्श बने रहे, लेकिन समाज तक उन्हें पहुँचाने की विधियाँ बदलती रहीं।

जब केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज को पर्याप्त रूप से संबोधित करना कठिन लगा, तब प्रस्तुति की नई विधियाँ विकसित हुईं।

नाट्यशास्त्र इसी प्रक्रिया का एक बड़ा उदाहरण है।

नाट्य का एक उद्देश्य लोकानुरंजन भी था—लोक तक बात किस प्रकार पहुँचाई जाए, यह भी महत्वपूर्ण था।

हमारी परंपरा के शास्त्र केवल एकांत में बैठे ऋषियों की कल्पना का परिणाम नहीं थे। ऋषि-मुनि समाज के बीच जाते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे, उनके साथ संवाद करते थे और जीवन का निरीक्षण करते थे।

चातुर्मास के समय नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर विचार-विमर्श की परंपरा रही। इस संवाद और चिंतन के माध्यम से जीवन की समस्याओं के शास्त्रीय समाधान खोजे गए।

इस दृष्टि से शास्त्र किसी एक व्यक्ति की मनमानी स्थापना नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और परीक्षण की दीर्घ परंपरा का परिणाम समझे जा सकते हैं।

तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों में समझना उपयोगी है—

1. तत्त्वमीमांसा

इसमें लोक और अस्तित्व का अध्ययन किया जाता है। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से जगत के स्वरूप को समझने का प्रयास किया गया।

2. प्रमाणमीमांसा

हमने जो अनुभव किया, उसे सही कैसे मानें? उसके प्रमाण क्या हैं? उसका परीक्षण कैसे हो? प्रमाणमीमांसा इसी प्रश्न से जुड़ी है।

3. व्यवहारमीमांसा

ज्ञान केवल ग्रंथों में बंद नहीं रहता। उसे जीवन और समाज तक ले जाना आवश्यक है।

इसी व्यवहार की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीवन, समाज, कर्तव्य, नेतृत्व, नीति और मानवीय संबंधों के विशाल ग्रंथ हैं।

वेद से पुराण और संत साहित्य तक : ज्ञान का लोकाभिमुखीकरण

समय के अनुसार ज्ञान को लोक तक पहुँचाने के लिए स्मृतियाँ रची गईं, इतिहास की परंपरा विकसित हुई और पुराणों की रचना हुई।

पुराणों में आख्यान और उपाख्यानों के माध्यम से जटिल सिद्धांतों को लोक के लिए सरल बनाया गया।

एक छोटा-सा श्लोक जीवन के अनेक सूत्रों को सामने रखता है—

“किं बीजं शस्यं धर्मः?
स किम् भूषणं यशः?
कोषस्य बन्धुः कः? उत्साहः।
सिद्धेः किं साधनम्? नयः।”

अर्थात् कल्याण का मार्ग धर्म है। सज्जन व्यक्ति का आभूषण यश है। लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।

नीति को यदि जीवन-प्रबंधन के रूप में देखें, तो समय और शक्ति का उचित प्रबंधन सफलता का आधार बनता है।

एक छोटे-से श्लोक में जीवन का इतना व्यापक दर्शन समाहित हो जाना संस्कृत साहित्य की विशेषता है।

इसके बाद कालिदास, भास, अश्वघोष, माघ, भारवि और श्रीहर्ष जैसे महाकवियों ने उन्हीं आदर्शों को साहित्य के विभिन्न रूपों में आगे बढ़ाया।

संकट के समय लोकभाषाओं में पहुँचा भारतीय ज्ञान

चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियों का सामना किया। इस काल में संत परंपरा ने समाज के भीतर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, सूरदास और कबीरदास जैसे संतों ने भी लोकभाषाओं में अपने विचारों को व्यक्त किया।

यहाँ संस्कृत के आदर्श समाप्त नहीं हुए; उनकी प्रस्तुति की भाषा बदल गई।

ज्ञान यदि लोक तक नहीं पहुँचे, तो वह समाज की शक्ति नहीं बन सकता। इसलिए संत साहित्य ने लोकभाषाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों, राम-कृष्ण, भक्ति, नीति और आध्यात्मिक दृष्टि को सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाया।

इसका परिणाम यह हुआ कि सामान्य व्यक्ति अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल से जुड़ा रहा।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता है—सिद्धांतों को बचाए रखते हुए उनकी प्रस्तुति को समयानुकूल बनाना।

आज इसी दृष्टि को हम आधुनिक भाषा में Indian Knowledge System कह सकते हैं।

संस्कृत और भारतीय पहचान

भारतीय होने की पहचान केवल इस बात से नहीं हो सकती कि हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, वैज्ञानिक हैं, प्रबंधक हैं या तकनीकी विशेषज्ञ हैं।

ये सभी उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन एक भारतीय की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रश्न यह भी है—

क्या हम अपने शास्त्रों को जानते हैं?

क्या हम रामायण को जानते हैं?

क्या हम महाभारत को जानते हैं?

क्या हम गीता को जानते हैं?

महाभारत में विदुरनीति जैसी नीति-परंपरा है और भीष्मपर्व में श्रीमद्भगवद्गीता है। विदुरनीति को लोक-जीवन के लिए नीति का एक महत्त्वपूर्ण उपदेश माना जा सकता है।

श्रीमद्भगवद्गीता की व्यापकता तो सर्वविदित है। अनेक परंपराओं और देशों के लोगों ने उसके विचारों में रुचि ली है।

हम उसे मूल संस्कृत में पढ़ें, यह सबसे अच्छा है; लेकिन यदि कोई व्यक्ति अनुवाद के माध्यम से पढ़ता है, तब भी कम-से-कम उसकी विषय-वस्तु से परिचित होना आवश्यक है।

महाभारत : ज्ञान का विराट प्रकाश-पुंज

महाभारत के बारे में एक विचित्र धारणा समाज में फैली हुई है कि घर में महाभारत रखने से घर में कलह होती है।

यह धारणा महाभारत को पढ़ने से रोकती है, जबकि महाभारत स्वयं जीवन के अत्यंत जटिल प्रश्नों का सामना करने वाला ग्रंथ है।

महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, धर्म है, मनोविज्ञान है, परिवार है, नेतृत्व है, नैतिक संकट है और मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष हैं।

गांधारी का चरित्र इसका एक उदाहरण है। एक ओर पुत्र के प्रति उसका मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर वही गांधारी दुर्योधन को धर्म की विजय का आशीर्वाद देती है।

महाभारत के प्रसंगों में मनुष्य की जटिलता इसी प्रकार दिखाई देती है।

इसलिए महाभारत को पढ़ना केवल कथा जानना नहीं है; यह मनुष्य और समाज को समझने का एक अवसर है।

संस्कृत और आधुनिक विषय : कोई क्षेत्र अछूता नहीं

यदि हम आधुनिक विषयों को देखें तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसके लिए संस्कृत में कोई न कोई महत्वपूर्ण ज्ञान-स्रोत न मिलता हो।

योग, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, राजनीति, नाट्य, काव्य, व्याकरण, दर्शन, गणित, ज्योतिष और अनेक कलाओं की समृद्ध परंपराएँ संस्कृत में उपलब्ध हैं।

आयुर्वेद के विद्यार्थी संस्कृत की ओर इसलिए आते हैं क्योंकि उसके अनेक मूल ग्रंथ संस्कृत में हैं।

देश के अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग हैं। शिक्षा, शोध, अध्यापन, मीडिया, आकाशवाणी, दूरदर्शन, प्रशासन और अनेक क्षेत्रों में संस्कृत से जुड़े अवसर मौजूद हैं।

संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफलता प्राप्त की है।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत का संबंध केवल रोजगार से नहीं है। उसका संबंध उस ज्ञान से है जो विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझने में सहायता करता है।

संस्कृत का भविष्य उसके विद्यार्थियों पर निर्भर है

किसी भी भाषा का भविष्य उसके बोलने, पढ़ने और सीखने वालों की संख्या पर निर्भर करता है।

इतिहास में अनेक भाषाएँ ऐसी रही हैं जिनका कभी व्यापक लोक-प्रयोग था, लेकिन बाद में उनके बोलने वालों की संख्या घटती गई।

पाली और प्राकृत का उदाहरण सामने है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों और सामाजिक समूहों के लिए अलग-अलग भाषिक रूपों का प्रयोग मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में बहुभाषिकता की समृद्ध परंपरा थी।

आज यदि किसी भाषा के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था तो हो, लेकिन उसके वास्तविक भाषक लगातार कम होते जाएँ, तो उसके भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।

संस्कृत के संदर्भ में स्थिति आशाजनक है, क्योंकि आज भी उसके अध्ययन के लिए संस्थाएँ हैं, विद्यालय हैं, विश्वविद्यालय हैं और अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसी संस्थाएँ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी संस्कृत को विषय के रूप में चुन रहे हैं।

नई शिक्षा नीति ने इस आधार को और व्यापक करने का अवसर दिया है।

संस्कृत और मूल्य शिक्षा

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत Value Added Course या मूल्यवर्धित पाठ्यक्रम के माध्यम से भी संस्कृत को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।

मानव-मूल्यों की शिक्षा के लिए संस्कृत से बेहतर स्रोतों में से एक क्या हो सकता है?

संस्कृत साहित्य सूक्तियों, सुभाषितों और नीति-वचनों से भरा हुआ है।

किसी विद्यार्थी का मुख्य विषय कृषि हो सकता है, विज्ञान हो सकता है, प्रबंधन हो सकता है या चिकित्सा। फिर भी यदि वह अपने अध्ययन-काल में संस्कृत के कुछ ग्रंथों और विचारों से परिचित होता है, तो उसके भीतर एक सांस्कृतिक संस्कार विकसित हो सकता है।

संस्कार कभी-कभी बहुत धीरे-धीरे काम करता है।

जैसे किसी घड़े को बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाए, तो घड़ा टूटने तक वह आकृति उसके साथ रहती है; उसी प्रकार विद्यार्थी-जीवन में पड़ा संस्कार भी लंबे समय तक उसके व्यक्तित्व के साथ रह सकता है।

आज संस्कृत का विद्यार्थी भले ही आगे चलकर किसी अन्य क्षेत्र में चला जाए, लेकिन वह उस क्षेत्र में भी भारतीय ज्ञान-परंपरा के लिए कुछ कर सकता है।

एक भारतीय के रूप में हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी

विदेश जाने वाले अनेक भारतीयों का अनुभव है कि वहाँ लोग उनसे केवल यह नहीं पूछते कि वे डॉक्टर हैं या इंजीनियर अथवा वैज्ञानिक।

वे पूछते हैं—

रामायण जानते हैं?

महाभारत जानते हैं?

गीता पढ़ी है?

और तब एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। हम भारत की आधुनिक उपलब्धियों के प्रतिनिधि बनकर विदेश जाते हैं, लेकिन जब हमारी अपनी परंपरा के मूल ग्रंथों के बारे में प्रश्न होता है, तो हमारे पास उत्तर नहीं होता।

यह स्थिति हमें सोचने के लिए बाध्य करती है।

यदि इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा हमारे पास है और हम ही उससे परिचित नहीं हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?

हम स्वयं।

इसलिए संस्कृत दिवस जैसे अवसर केवल समारोह के लिए नहीं होने चाहिए। उन्हें व्यक्तिगत संकल्प का अवसर बनाना चाहिए।

कोई व्यक्ति संकल्प ले सकता है—

इस वर्ष मैं रघुवंश का प्रथम सर्ग पढ़ूँगा।

या—

मैं श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ूँगा।

या—

मैं कालिदास का अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ूँगा।

या—

मैं महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग पढ़ूँगा।

यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर हम एक छोटा-सा संकल्प लें और उसे पूरा करें, तो कुछ वर्षों में हमारे पास संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक बड़ा व्यक्तिगत संसार तैयार हो सकता है।

और यदि हम अपने बच्चों को भी उसमें सहभागी बनाएँ, तो यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँच सकती है।

संस्कृत : केवल संस्कृत विभाग की जिम्मेदारी नहीं

संस्कृत को बचाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल संस्कृत के विद्यार्थियों या अध्यापकों की नहीं है।

यह उन सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है जो अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना चाहते हैं।

लेकिन संस्कृत के अध्यापकों की जिम्मेदारी निश्चित रूप से अधिक है, क्योंकि अब उनके सामने अवसर भी बड़ा है।

उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।

उन्हें विज्ञान के विद्यार्थी से विज्ञान की भाषा में संवाद करना होगा। प्रबंधन के विद्यार्थी को प्रबंधन से संबंधित उदाहरण देने होंगे। मनोविज्ञान के विद्यार्थी को भाव और मन के संदर्भ में संस्कृत की सामग्री समझानी होगी।

उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है; वह वर्तमान के प्रश्नों से भी संवाद कर सकती है।

ज्ञान को फिर से अपने मूल से जोड़ने की आवश्यकता

आधुनिक शिक्षा के विकास के दौरान भारत में अनेक पाश्चात्य सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ा। परिणामस्वरूप शिक्षा के अनेक क्षेत्रों में भारतीय स्रोतों का अध्ययन कम होता गया।

इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि हम आधुनिक ज्ञान को छोड़ दें। ऐसा करना न तो आवश्यक है और न ही उचित।

चुनौती यह है कि आधुनिक ज्ञान के साथ अपने मूल ज्ञान-स्रोतों को भी पढ़ा जाए।

यदि प्रबंधन पढ़ रहे हैं तो कौटिल्य को भी पढ़ें।

यदि मनोविज्ञान पढ़ रहे हैं तो नाट्यशास्त्र और भारतीय मनोवैज्ञानिक परंपराओं को भी देखें।

यदि चिकित्सा पढ़ रहे हैं तो आयुर्वेद के मूल ग्रंथों से परिचित हों।

यदि नेतृत्व पढ़ रहे हैं तो गीता, महाभारत और नीति-साहित्य के सूत्रों को भी देखें।

यदि साहित्य पढ़ रहे हैं तो कालिदास, भास, भवभूति, माघ, भारवि और श्रीहर्ष को जानें।

अर्थात् आधुनिकता और परंपरा को परस्पर विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संवाद स्थापित किया जाए।

आज इन पंक्तियों को केवल संस्कृत-प्रचार के नारे के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।

निष्कर्ष : संस्कृत की ‘सुगंध’ हर विद्यार्थी तक पहुँचे

नई शिक्षा नीति ने संस्कृत के सामने एक अभूतपूर्व अवसर रखा है।

अब संस्कृत को केवल संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। वह विज्ञान के विद्यार्थी तक जा सकती है, वाणिज्य के विद्यार्थी तक जा सकती है, प्रबंधन के विद्यार्थी तक जा सकती है, चिकित्सा के विद्यार्थी तक जा सकती है और कला तथा सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों तक भी पहुँच सकती है।

लेकिन इसके लिए केवल पाठ्यक्रम बनाना पर्याप्त नहीं होगा।

हमें अपनी प्रस्तुति की विधि बदलनी होगी।

हमें सरल भाषा अपनानी होगी।
हमें तर्क देना होगा।
हमें उदाहरण देने होंगे।
हमें आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा।
हमें छोटे-छोटे नोट्स और उपयोगी संदर्भ उपलब्ध कराने होंगे।
हमें विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए स्वयं भी लगातार अध्ययन करना होगा।

सबसे महत्वपूर्ण बात—हमें संस्कृत को केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान की एक विशाल परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना होगा।

भारत का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे कितने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रबंधक हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन सबके भीतर अपने समाज, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के प्रति कितनी समझ और संवेदना है।

इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर एक छोटा-सा संकल्प जगाएँ।

रामायण पढ़ेंगे।
महाभारत पढ़ेंगे।
गीता पढ़ेंगे।
कालिदास को पढ़ेंगे।
पतंजलि को जानेंगे।
कौटिल्य को समझेंगे।
और अपनी अगली पीढ़ी को भी इस ज्ञान-परंपरा से परिचित कराएँगे।

क्योंकि संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के हाथ में नहीं है। यह उस प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में है जो भारत की पहचान को केवल वर्तमान की उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी दीर्घ बौद्धिक परंपरा में भी देखता है।

हम आधुनिक बनें, वैज्ञानिक बनें, तकनीकी रूप से समर्थ बनें, विश्व के श्रेष्ठतम संस्थानों में जाएँ—लेकिन अपनी जड़ों को भूलकर नहीं।

भारत की वास्तविक शक्ति केवल उसकी तकनीक में नहीं, उसकी प्रज्ञा और परंपरा में भी निहित है।

नई शिक्षा नीति के माध्यम से यदि संस्कृत में निहित इस ज्ञान-राशि की ‘सुगंध’ प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुँचती है, तो यह केवल संस्कृत का प्रचार नहीं होगा।

यह भारतीय ज्ञान-परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा होगी।

और शायद यही इस समय संस्कृत के सामने उपस्थित सबसे बड़ा अवसर भी है और सबसे बड़ा दायित्व भी।

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संस्कृत और नवीन शिक्षा नीति : ज्ञान-परंपरा से आधुनिक शिक्षा तक

आधुनिक शिक्षा प्रणाली अब संस्कृत को केवल एक विषय तक सीमित न रखकर उसे विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान और अन्य विभिन्न संकायों से जोड़ रही है। नवीन शिक्षा नीति के माध्यम से संस्कृत के अध्ययन के द्वार उन विद्यार्थियों के लिए भी खोले जा रहे हैं, जिनका संस्कृत से पहले कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं रहा है।

संस्कृत केवल भाषा नहीं है। यह भारत की उस विशाल ज्ञान-परंपरा की भाषा है, जिसमें दर्शन, धर्म, न्याय, मीमांसा, आयुर्वेद, योग, अर्थशास्त्र, नाट्यशास्त्र, साहित्य, राजनीति, समाज और जीवन-व्यवहार से संबंधित विपुल ज्ञान सुरक्षित है। आवश्यकता इस बात की है कि इस ज्ञान-राशि को आधुनिक विद्यार्थियों और समाज के व्यापक वर्ग तक उनकी आवश्यकताओं के अनुरूप पहुँचाया जाए।

संस्कृत : समग्र ज्ञान-परंपरा की भाषा

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं—वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि। इसके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र को भी लिया जाए तथा इसके बाद चौंसठ कलाओं को देखें, जिन्हें उपविद्याओं के रूप में माना गया है, तो स्पष्ट होता है कि भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक अत्यंत व्यापक वाङ्मय संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।

आज इनमें से अनेक विषय अलग-अलग आधुनिक विभागों और संकायों में पढ़ाए जाते हैं। समस्या यह है कि अनेक बार इन विषयों का अध्ययन उनके संस्कृत मूल से अलग होकर होता है। इसलिए आवश्यकता है कि इन विषयों को उनके मूल स्रोतों से जोड़ा जाए और संस्कृत में निहित उनके मूल सूत्रों तथा दृष्टिकोणों को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए।

नवीन शिक्षा नीति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

संस्कृत के अध्ययन का विस्तार

पहले संस्कृत का अध्ययन मुख्यतः संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित माना जाता था। संस्कृत विभाग में आने वाला विद्यार्थी पहले से ही संस्कृत की पृष्ठभूमि लेकर आता था। उसके लिए संस्कृत के किसी विषय को पढ़ाना अपेक्षाकृत सरल था।

लेकिन यदि आपके सामने प्रबंधशास्त्र का विद्यार्थी आ जाए, विज्ञान का विद्यार्थी आ जाए या वाणिज्य का विद्यार्थी आ जाए, तो स्थिति बदल जाती है। उसमें संस्कृत की पृष्ठभूमि नहीं है। वह श्रद्धा के साथ आपके पास आया है, लेकिन उसके भीतर तर्क-बुद्धि भी है। वह प्रश्न करेगा—“ऐसा क्यों हुआ? ऐसा क्यों है?”

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अब केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं को समझना होगा, उनके प्रश्नों के तार्किक उत्तर देने होंगे और अपने विषय को उनकी बौद्धिक पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रस्तुत करना होगा।

यही संस्कृत अध्यापकों के सामने नवीन शिक्षा नीति द्वारा प्रस्तुत एक बड़ी चुनौती भी है और बड़ा अवसर भी।

ज्ञान सभी तक, समान रूप से और गुणवत्ता के साथ

नवीन शिक्षा नीति के संदर्भ में संस्कृत की ज्ञान-राशि को समाज तक पहुँचाने के तीन प्रमुख लक्ष्य माने जा सकते हैं—

  1. यह ज्ञान सभी तक पहुँचे।

  2. सभी तक समान रूप से पहुँचे।

  3. पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

आज संस्कृत या वेद आदि के अध्ययन के संबंध में पहले जैसी सामाजिक अथवा स्थान-विशेष की सीमाएँ नहीं हैं। आज कोई भी व्यक्ति संस्कृत सीख सकता है, वेद पढ़ सकता है और भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझ सकता है।

इसलिए संस्कृत के अध्यापकों का दायित्व है कि वे इस खुले हुए अवसर का उपयोग करें और ज्ञान को अधिक-से-अधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

संस्कृत पढ़ाने की पद्धति भी बदलनी होगी

जब विद्यार्थी संस्कृत की पृष्ठभूमि के बिना संस्कृत के किसी पाठ्यक्रम में आएगा, तो उसे सीधे पारंपरिक शास्त्रीय पद्धति से पढ़ाना हमेशा प्रभावी नहीं होगा। हमें अपनी प्रस्तुति की विधियों को भी बदलना होगा।

इसके लिए आधुनिक शिक्षण-पद्धतियों का उपयोग किया जा सकता है। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, दृश्य सामग्री, उदाहरण, संक्षिप्त नोट्स और सरल भाषा में तैयार संदर्भ-सामग्री विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकती है।

जिस विद्यार्थी ने पहले संस्कृत नहीं पढ़ी है, उसे ऐसे लिखित नोट्स उपलब्ध कराने होंगे जिनके माध्यम से वह विषय को आसानी से समझ सके। साथ ही, सरल भाषा में उपलब्ध उपयोगी संदर्भ-ग्रंथों की जानकारी भी उसे देनी होगी।

हमें विधियाँ बनानी होंगी, तर्क तैयार करने होंगे, उदाहरण देने होंगे और ऐसी प्रस्तुतियाँ विकसित करनी होंगी जिनके माध्यम से संस्कृत की ज्ञान-परंपरा आधुनिक विद्यार्थी तक सहज रूप में पहुँच सके।

रामायण को केवल कथा के रूप में नहीं, जीवन-दृष्टि के रूप में समझना

इसका एक अच्छा उदाहरण रामायण है।

रामायण में कितने कांड हैं, उसकी कथा क्या है—यह हमारे समाज के बहुत बड़े वर्ग को मालूम है। लेकिन प्रश्न यह है कि राम क्या हैं और राम का अयन क्या है?

यदि इन दोनों दृष्टियों से रामायण को प्रस्तुत किया जाए, तो वह विद्यार्थी भी रामायण के प्रति उत्सुक हो सकता है, जिसकी संस्कृत अथवा भारतीय परंपरा में पहले से कोई विशेष रुचि न हो।

साहित्य की दृष्टि से देखें तो राम आलंबन-विभाव हैं और राम का अयन उद्दीपन-विभाव के रूप में देखा जा सकता है। ‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग। राम का जीवन जिस मार्ग को प्रस्तुत करता है, वही रामत्व की ओर ले जाता है।

इसलिए रामायण का महत्व केवल राम के चरित्र में नहीं, बल्कि उस मार्ग में भी है जिसे राम ने अपने जीवन से प्रस्तुत किया।

यदि हम उस अयन को अपने जीवन में अपनाएँ, तो हमारा जीवन भी अधिक सार्थक हो सकता है।

भारतीय परंपरा तर्क-विहीन नहीं है

हमारी परंपरा के संबंध में अनेक प्रश्न उठाए जाते हैं—“संस्कृत में ऐसा क्यों है?”, “इस परंपरा में ऐसा क्यों कहा गया है?” आदि।

इन प्रश्नों का उत्तर देने के लिए आवश्यक है कि परंपरा को समग्रता में देखा जाए। भारतीय शास्त्रीय परंपरा में अनेक बातें अत्यंत तार्किक ढंग से व्यवस्थित की गई हैं। वहाँ मनुष्य के जीवन, समाज और व्यवहार को लेकर गहरा चिंतन मिलता है।

इसी संदर्भ में धर्म और संप्रदाय के अंतर को समझना भी आवश्यक है।

संप्रदाय का अर्थ एक विशेष पूजा-पद्धति या अनुशासन से हो सकता है, लेकिन धर्म उससे कहीं व्यापक अवधारणा है। धर्म को एक सार्वभौमिक तत्व के रूप में देखा गया है, जिसके बिना किसी व्यवस्था का स्थायित्व संभव नहीं।

महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र की परंपरा में धर्म के व्यवहारिक पक्ष को यम और नियम के माध्यम से स्पष्ट किया। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह तथा शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान जैसे सिद्धांत मानव जीवन के लिए सार्वभौमिक मूल्य प्रस्तुत करते हैं।

योग : शरीर, मन और बुद्धि का संतुलन

महर्षि पतंजलि की परंपरा को स्मरण करते हुए प्रसिद्ध श्लोक है—

“योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”

इसमें पतंजलि को चित्त, वाणी और शरीर के दोषों को दूर करने वाले महर्षि के रूप में नमन किया गया है।

योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है। मनुष्य की तीन प्रमुख शक्तियों—शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक शक्ति—के विकास और संतुलन की दृष्टि से भी योग और भारतीय ज्ञान-परंपरा महत्वपूर्ण है।

योग से शरीर का सामर्थ्य बना रहता है। “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” के माध्यम से मानसिक अनुशासन की बात सामने आती है और ज्ञान के माध्यम से बौद्धिक शक्ति का विकास होता है।

मनुष्य के समग्र अस्तित्व के लिए ये तीनों शक्तियाँ आवश्यक हैं। इस दृष्टि से संस्कृत में उपलब्ध योगविद्या आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।

आयुर्वेद और समग्र स्वास्थ्य-दृष्टि

इसी प्रकार आयुर्वेद मनुष्य के स्वास्थ्य को केवल रोग के उपचार तक सीमित करके नहीं देखता। उसका उद्देश्य स्वास्थ्य की रक्षा और रोग की चिकित्सा दोनों है।

आयुर्वेद की प्रसिद्ध उक्ति है—

“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”

अर्थात् स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और रोगी के विकार का प्रशमन करना आयुर्वेद का उद्देश्य है।

इसलिए यह प्रश्न स्वाभाविक है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान का कौन-सा ऐसा क्षेत्र है, जिसकी कोई जड़ या समानांतर चिंतन भारतीय संस्कृत वाङ्मय में उपलब्ध नहीं है?

समाजशास्त्र की बात करें, राजनीति की बात करें, अर्थशास्त्र की बात करें, मनोविज्ञान की बात करें या प्रबंधन की—भारतीय ज्ञान-परंपरा में इन सभी क्षेत्रों से संबंधित गहरा चिंतन मिलता है।

संस्कृत में मनोविज्ञान की सूक्ष्मता

विशेष रूप से साहित्य और नाट्यशास्त्र में मनोविज्ञान का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

भारतीय काव्यशास्त्र में स्थायी भाव, सात्त्विक भाव और संचारी भावों का विश्लेषण किया गया है। विभाव, अनुभाव, संचारी भाव और सात्त्विक भावों के माध्यम से मानवीय भावनाओं की अभिव्यक्ति और उनके प्रभाव को समझाया गया है।

यह केवल साहित्यिक सिद्धांत नहीं है। यह मनुष्य के भीतर घटित होने वाली भावनात्मक प्रक्रियाओं का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन भी है।

महर्षि भरतमुनि का नाट्यशास्त्र इस दृष्टि से भारतीय ज्ञान-परंपरा की अद्भुत उपलब्धि है। लोक में दिखाई देने वाली भावनाओं और उनके प्रदर्शन की विविध विधियों को उन्होंने शास्त्रीय रूप में व्यवस्थित किया।

अर्थशास्त्र और प्रबंधन

प्रबंधन की दृष्टि से भी संस्कृत वाङ्मय अत्यंत समृद्ध है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल अर्थव्यवस्था का ग्रंथ नहीं है। उसमें लोक-प्रबंधन, शासन-व्यवस्था, प्रशासन, राजनीति, राज्य-व्यवस्था और मनुष्य के संगठन से संबंधित अनेक सूत्र मिलते हैं।

कौटिल्य के अनुसार—

“मनुष्यवती भूमिरर्थः।”

अर्थात् मनुष्यों से युक्त भूमि ही अर्थ है। उस भूमि की रक्षा, शासन और पालन की व्यवस्था से संबंधित शास्त्र को अर्थशास्त्र कहा गया।

इस दृष्टि से राष्ट्र केवल पर्वत, नदियों, वनों और भूमि से नहीं बनता। इन सबका उपयोग करने वाला मनुष्य ही राष्ट्र-निर्माण का वास्तविक केंद्र है। इसलिए मनुष्य का निर्माण ही राष्ट्र का निर्माण है।

संस्कृत और मानव-मूल्य

संस्कृत को केवल ज्ञान की भाषा मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह मानव-मूल्यों और जीवन-संस्कारों की भाषा भी है।

हमारे यहाँ कहा गया है—

“विद्या ददाति विनयम्,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति,
धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥”

विद्या से विनय आता है, विनय से पात्रता, पात्रता से धन, धन से धर्म और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।

धैर्य मनुष्य को नेतृत्व की क्षमता देता है और विनय उसे समाज में सम्मान प्राप्त करने योग्य बनाता है। विनय का अर्थ डरपोक बनना नहीं है। इसका अर्थ है—औचित्य की रक्षा करते हुए, समय और परिस्थिति के अनुरूप उचित व्यवहार करना।

नेतृत्व के संदर्भ में भी हमारे शास्त्रों में अनेक गुण बताए गए हैं—

“विनीतो मधुरः त्यागी दक्षः प्रियवाक् तथा।
लोकवेदविदुत्साही स्मृतिप्रज्ञाकलान्वितः॥”

विनय, मधुरता, त्याग, दक्षता और प्रिय वचन—ये नेतृत्व के महत्वपूर्ण गुण हैं।

इसी प्रकार—

“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्,
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्।”

सत्य बोलना आवश्यक है, लेकिन सत्य को भी प्रिय और संतुलित ढंग से कहने की शिक्षा हमारी परंपरा देती है।

ये मूल्य किसी एक वर्ग के लिए नहीं हैं। ये अच्छे नागरिक और अच्छे मनुष्य के निर्माण के लिए आवश्यक हैं।

ज्ञान को लोक तक पहुँचाने की भारतीय परंपरा

भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक विशेषता यह रही कि उसने समय के अनुसार अपनी प्रस्तुति की विधि बदली।

चौदह विद्या-स्थानों की परंपरा को देखें तो वेद से वेदांग, वेदांग से मीमांसा, मीमांसा से न्याय, धर्मशास्त्र और फिर पुराण तक ज्ञान की प्रस्तुति का विस्तार दिखाई देता है।

जब यह अनुभव हुआ कि केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज का मार्गदर्शन पर्याप्त नहीं है, तब ज्ञान को प्रस्तुत करने की नई विधियाँ विकसित की गईं। नाट्यशास्त्र इसका एक उदाहरण है। उसमें लोकानुरंजन के माध्यम से लोक तक विचारों और आदर्शों को पहुँचाने का प्रयास हुआ।

ऋषि-मुनि केवल एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों की रचना नहीं करते थे। वे लोक के बीच जाते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याओं को सुनते थे, संवाद करते थे और उनका सूक्ष्म निरीक्षण करते थे। फिर चातुर्मास जैसे अवसरों पर एकत्र होकर उन अनुभवों पर विचार करते और संवाद तथा तर्क के माध्यम से शास्त्रीय समाधान विकसित करते थे।

इसलिए शास्त्र केवल किसी व्यक्ति-विशेष की व्यक्तिगत घोषणा नहीं है। भारतीय परंपरा में संवाद, तर्क और सर्वमान्यता का महत्वपूर्ण स्थान है।

तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा और व्यवहारमीमांसा

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन व्यापक स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहली है—तत्त्वमीमांसा। इसमें जगत और उसके तत्त्वों का अध्ययन होता है। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि पदार्थों का विश्लेषण इसी चिंतन का भाग है।

दूसरी है—प्रमाणमीमांसा। हमने जो अनुभव किया, उसे कैसे परखा जाए? वह सत्य है या नहीं? इसका परीक्षण किस प्रकार किया जाए? प्रमाणमीमांसा इन प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत करती है।

तीसरी है—व्यवहारमीमांसा। ज्ञान को केवल ग्रंथों तक सीमित न रखकर लोक-व्यवहार तक कैसे पहुँचाया जाए—यह इसका क्षेत्र है।

इस दृष्टि से महर्षि वाल्मीकि की रामायण और महर्षि वेदव्यास का महाभारत भारतीय व्यवहारशास्त्र के अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं।

इसी प्रकार स्मृतियों, इतिहास और पुराणों की रचना हुई। पुराणों में आख्यान और उपाख्यानों के माध्यम से जटिल सिद्धांतों और जीवन-मूल्यों को सामान्य समाज तक पहुँचाया गया।

एक छोटा-सा संस्कृत श्लोक भी जीवन के अनेक सूत्रों को समेट सकता है—

“किं बीजं शस्यं धर्मः?
स किम् भूषणं यशः?
कोषस्य बन्धुः कः? उत्साहः।
सिद्धेः किं साधनम्? नयः।”

धर्म कल्याण का आधार है, यश सज्जन व्यक्ति का आभूषण है, उत्साह लक्ष्मी का सहायक है और नीति सिद्धि का साधन है।

नीति को यदि जीवन-प्रबंधन के रूप में देखें, तो समय और शक्ति का समुचित प्रबंधन जीवन में सफलता का महत्वपूर्ण आधार बन जाता है।

यही संस्कृत की विशेषता है—एक छोटे से सूत्र में जीवन का व्यापक दर्शन समाहित हो सकता है।

समय के अनुसार ज्ञान की प्रस्तुति

भारतीय परंपरा ने समय के अनुसार अपने ज्ञान को नए साहित्यिक रूपों में प्रस्तुत किया। महाकवि कालिदास, भास, अश्वघोष, माघ, भारवि और श्रीहर्ष जैसे कवियों ने वैदिक आदर्शों और भारतीय जीवन-मूल्यों को नए साहित्यिक रूपों में आगे बढ़ाया।

बाद के कठिन समय में, विशेषकर चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच, जब देश अनेक प्रकार के आक्रमणों और सामाजिक परिस्थितियों से गुजर रहा था, संत परंपरा ने लोकभाषाओं के माध्यम से भारतीय मूल्यों को समाज तक पहुँचाने का कार्य किया।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, सूरदास और कबीरदास जैसे संतों ने भी लोकभाषाओं में अपने विचारों को प्रस्तुत किया।

इनकी भाषा ऐसी थी जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सकता था। लेकिन उनके पीछे निहित जीवन-मूल्य और आदर्श भारतीय शास्त्रीय परंपरा से जुड़े हुए थे।

इसका एक उद्देश्य यह भी था कि कठिन परिस्थितियों के बावजूद सामान्य व्यक्ति अपने मूल, अपनी परंपरा और अपनी सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा रहे।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा है।

आज इसी व्यापक परंपरा को Indian Knowledge System (IKS) के रूप में आधुनिक शिक्षा के माध्यम से विद्यार्थियों तक पहुँचाने का प्रयास किया जा रहा है।

संस्कृतज्ञों का नया दायित्व

आज संस्कृतज्ञों के सामने एक बड़ा दायित्व है।

जिस प्रकार पुराने समय में ज्ञान को लोक तक पहुँचाने के लिए नए-नए ग्रंथों और प्रस्तुति-विधियों का निर्माण किया गया, उसी प्रकार आज हमें भी अपनी प्रस्तुति की विधियों को समय की आवश्यकताओं के अनुसार परिष्कृत करना होगा।

हमें संस्कृत को उसके पारंपरिक सीमित दायरे से बाहर निकालकर विज्ञान, चिकित्सा, प्रौद्योगिकी, प्रबंधन, वाणिज्य, सामाजिक विज्ञान और अन्य विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाना होगा।

किसी विद्यार्थी को संस्कृत पढ़ाने का उद्देश्य यह नहीं होना चाहिए कि वह अनिवार्य रूप से संस्कृत का विद्वान बन जाए। उद्देश्य यह भी हो सकता है कि वह अपने विषय का श्रेष्ठ वैज्ञानिक, चिकित्सक, अभियंता, प्रबंधक या प्रशासक बने और साथ ही भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित हो।

भारतीय होने की पहचान

हम तकनीकी रूप से कितने उन्नत हैं, इससे हमारी भारतीय पहचान पूरी नहीं होती। हम कितने अच्छे चिकित्सक, अभियंता, वैज्ञानिक या प्रबंधक हैं, यह भी महत्वपूर्ण है, लेकिन भारतीय होने की सांस्कृतिक पहचान इससे आगे की चीज है।

प्रश्न यह भी है—

क्या हम रामायण जानते हैं?

क्या हम महाभारत जानते हैं?

क्या हम भगवद्गीता जानते हैं?

क्या हमें अपने साहित्य और अपनी ज्ञान-परंपरा के मूल विचारों का परिचय है?

महाभारत में विदुरनीति और श्रीमद्भगवद्गीता जैसे महत्वपूर्ण उपदेश-परंपराएँ हैं। विदुरनीति उद्योगपर्व में है और श्रीमद्भगवद्गीता भीष्मपर्व में।

श्रीमद्भगवद्गीता की विशेषता यह है कि वह भारतीय सीमाओं से बाहर भी व्यापक रूप से पढ़ी और स्वीकार की जाती है। यदि कोई व्यक्ति उसे अनुवाद के माध्यम से पढ़ता है, तब भी उसके विषय और चिंतन से परिचित होना महत्वपूर्ण है।

संस्कृत केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के लिए नहीं

यदि कोई कृषि का विद्यार्थी संस्कृत को माइनर विषय के रूप में पढ़ता है, तो इसका अर्थ यह नहीं कि वह संस्कृत पढ़कर आजीविका कमाएगा। वह कृषि वैज्ञानिक बनेगा।

यदि कोई मनोविज्ञान का विद्यार्थी संस्कृत पढ़ता है, तो वह आगे मनोवैज्ञानिक बन सकता है। कोई प्रबंधन पढ़ रहा है, कोई राजनीति विज्ञान, कोई विज्ञान या वाणिज्य—फिर भी संस्कृत उसके लिए उपयोगी हो सकती है।

क्योंकि संस्कृत उसके भीतर एक सांस्कृतिक और बौद्धिक संस्कार छोड़ सकती है।

किसी विद्यार्थी ने यदि अपने स्नातक जीवन में संस्कृत के कुछ ग्रंथ पढ़ लिए, उनके विचारों को समझ लिया और भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित हो गया, तो संभव है कि भविष्य में वह अपने क्षेत्र में रहते हुए भी संस्कृत और भारतीय ज्ञान के लिए कुछ महत्वपूर्ण कार्य करे।

इसलिए संस्कृत का विस्तार केवल संस्कृत के विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना नहीं है। यह समाज के विभिन्न क्षेत्रों के विद्यार्थियों को भारतीय ज्ञान-परंपरा से जोड़ने का प्रयास भी है।

निष्कर्ष : संस्कृत का भविष्य समाज से जुड़ा है

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत विभागों के भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा के भविष्य का प्रश्न है।

यदि संस्कृत का अध्ययन करने वाले लोगों की संख्या बढ़ती है, यदि अन्य विषयों के विद्यार्थी संस्कृत के ज्ञान से परिचित होते हैं और यदि भारतीय ज्ञान-परंपरा आधुनिक शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में अपना स्थान बनाती है, तो संस्कृत का प्रभाव भी व्यापक होगा।

इसके लिए हमें केवल यह कहने से काम नहीं चलेगा कि संस्कृत में बहुत ज्ञान है। हमें उस ज्ञान को पढ़ना, समझना, परखना और आधुनिक समाज तक पहुँचाना होगा।

संस्कृत दिवस जैसे अवसरों पर यदि हम छोटे-छोटे संकल्प लें—जैसे इस वर्ष गीता का कोई एक अध्याय पढ़ेंगे, रामायण का कोई अंश पढ़ेंगे, कालिदास के किसी ग्रंथ का अध्ययन करेंगे या अपने बच्चों को कुछ संस्कृत श्लोक और उनके अर्थ बताएँगे—तो धीरे-धीरे एक बड़ी सांस्कृतिक यात्रा शुरू हो सकती है।

संस्कृत के भविष्य को सुरक्षित रखने का सबसे प्रभावी उपाय यही है कि संस्कृत को केवल एक विषय न रहने दिया जाए, बल्कि उसे भारतीय ज्ञान, जीवन-मूल्यों और आधुनिक शिक्षा के बीच एक सेतु बनाया जाए।

क्योंकि संस्कृत में केवल अतीत सुरक्षित नहीं है; उसमें वर्तमान को समझने और भविष्य को दिशा देने की क्षमता भी निहित है।

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संस्कृत : भारतीय ज्ञान-परंपरा से नई शिक्षा नीति तक

संस्कृत केवल एक भाषा या एक विषय नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान-परंपरा की वाहक है, जिसने जीवन, समाज, शासन, चिकित्सा, मनोविज्ञान, साहित्य, दर्शन और लोकव्यवहार—लगभग हर क्षेत्र को अपने चिंतन से समृद्ध किया है। नई शिक्षा नीति ने पहली बार आधुनिक उच्च शिक्षा की संरचना में इस ज्ञान-परंपरा को व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों तक पहुँचाने का अवसर उपलब्ध कराया है। आवश्यकता केवल इतनी है कि संस्कृत के अध्यापक और विद्यार्थी अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर इस अवसर को पहचानें। संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित क्यों रखा जाए?

हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं। वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक व्यापक संसार निर्मित हुआ। इसके साथ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी जोड़कर देखें तो ज्ञान के अनेक स्वतंत्र अनुशासन हमारे सामने आते हैं। इसके अतिरिक्त चौंसठ कलाओं की भी परंपरा रही है।

इन विषयों का विशाल वाङ्मय संस्कृत में उपलब्ध है। आज इनमें से अनेक विषय आधुनिक विश्वविद्यालयों में अलग-अलग विभागों और संकायों में पढ़ाए जाते हैं, लेकिन उनकी मूल भारतीय ज्ञान-परंपरा से उनका संबंध प्रायः विद्यार्थियों के सामने नहीं आ पाता।

यहीं संस्कृत की आवश्यकता सामने आती है।

यदि संस्कृत में निहित इन विषयों के मूल सूत्रों और अवधारणाओं को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए, तो संस्कृत केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान के एक बड़े स्रोत के रूप में सामने आ सकती है।

नई शिक्षा नीति इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।

नई शिक्षा नीति और संस्कृत के लिए खुले नए द्वार

पहले संस्कृत का अध्ययन प्रायः संस्कृत विभागों तक सीमित रहता था। संस्कृत के विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते थे और संस्कृत के अध्यापक संस्कृत के विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। अब स्थिति बदल रही है।

नई शिक्षा नीति के अंतर्गत संस्कृत को माइनर, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टी-डिसिप्लिनरी कोर्स जैसे माध्यमों से अन्य विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाने की संभावना बनी है।

अब विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन और कृषि जैसे विषयों के विद्यार्थी भी संस्कृत से परिचित हो सकते हैं।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों तक संस्कृत पहुँचने लगी है। यह केवल पाठ्यक्रम का परिवर्तन नहीं है; यह संस्कृत के सामाजिक विस्तार की एक बड़ी संभावना है।

इसका अर्थ यह भी है कि संस्कृत विभागों को अपने पुराने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।

भारत सरकार ने शिक्षा के माध्यम से संस्कृत की ज्ञानराशि को व्यापक समाज तक पहुँचाने का अवसर दिया है। अब यह संस्कृत के अध्यापकों पर निर्भर करता है कि वे इस अवसर का उपयोग किस प्रकार करते हैं।

भारतीय ज्ञान-परंपरा का निर्माण लोक से संवाद द्वारा

हमारी परंपरा में शास्त्र केवल किसी एक व्यक्ति के कथन को अंतिम सत्य मानकर नहीं बने। ऋषि-मुनि केवल एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों की रचना नहीं करते थे।

चातुर्मास के समय वे किसी स्थान पर रुकते थे, लेकिन अन्य समय में वे भ्रमण करते थे। वे लोक का सूक्ष्म निरीक्षण करते थे, लोगों से मिलते थे, उनके साथ संवाद करते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे और उनके जीवन को समझते थे।

नैमिषारण्य जैसे स्थान केवल धार्मिक स्थल नहीं थे; वे ज्ञान और संवाद के केंद्र भी थे। वहाँ लोक की समस्याओं पर विचार होता था और संवाद के माध्यम से उनके शास्त्रीय समाधान खोजे जाते थे।

इसलिए भारतीय शास्त्र-परंपरा का एक महत्वपूर्ण आधार संवाद और तर्क है।

हमने किसी व्यक्ति की बात केवल इसलिए स्वीकार नहीं की कि वह किसी महान व्यक्ति की कही हुई बात थी। जो बात संवाद और तर्क के माध्यम से सर्वमान्य हुई, जो समाज के लिए उपयोगी और व्यापक रूप से लागू होने योग्य सिद्ध हुई, उसे शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।

इसीलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने के लिए केवल ग्रंथों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उस ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया को समझना भी आवश्यक है।

तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक

संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा और व्यवहारमीमांसा।

तत्त्वमीमांसा में हम लोक और सत्ता का अध्ययन करते हैं। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से वस्तु-जगत् को समझने का प्रयास किया गया।

प्रमाणमीमांसा का प्रश्न है—हमने जो जाना या अनुभव किया, वह सही है या नहीं? उसके सत्यापन और मूल्यांकन की क्या पद्धति है?

लेकिन भारतीय ज्ञान केवल तत्त्व और प्रमाण तक सीमित नहीं रहता। वह व्यवहार तक जाता है। इसी को व्यवहारमीमांसा के स्तर पर समझा जा सकता है।

रामायण और महाभारत इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। महर्षि वाल्मीकि की रामायण और महर्षि वेदव्यास का महाभारत केवल कथा-साहित्य नहीं हैं; वे जीवन और व्यवहार के अनेक स्तरों पर मार्गदर्शन देने वाले ग्रंथ हैं।

ज्ञान को लोक तक पहुँचाने की भारतीय पद्धति

समय के साथ यह अनुभव हुआ कि केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक ज्ञान पहुँचाना पर्याप्त नहीं है। इसलिए प्रस्तुति की विधियाँ बदली गईं।

नाट्यशास्त्र इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोकानुरंजन के माध्यम से लोक तक विचार कैसे पहुँचाया जाए—यह प्रश्न भारतीय चिंतन में गंभीरता से लिया गया।

पुराणों में आख्यान और उपाख्यान के माध्यम से आदर्शों को लोक तक पहुँचाया गया। स्मृतियों की रचना हुई। इतिहास की रचना हुई। विभिन्न काव्यों और नाटकों ने उन्हीं मूल आदर्शों को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया।

एक छोटे-से सुभाषित में जीवन के अनेक सूत्र समाहित किए गए हैं—

“किं बीजं शस्यं धर्मः,
स किं भूषणं यशः।
लक्ष्म्याः बन्धुः क उत्साहः,
सिद्धेः किं साधनं नयः।”

अर्थात् कल्याण का बीज धर्म है, सज्जन का आभूषण यश है, लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।

जीवन के लिए इतना बड़ा संदेश इतने छोटे रूप में देना भारतीय सुभाषित परंपरा की विशेषता है।

जब ज्ञान लोकभाषाओं में पहुँचा

चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियाँ देखीं। ऐसे समय में संत परंपरा ने भारतीय ज्ञान और आदर्शों को लोक तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, संत सूरदास और संत कबीर जैसे संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुँचाए।

आदर्श वही थे, जिनकी जड़ें भारतीय परंपरा में थीं, लेकिन भाषा ऐसी थी जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सके।

इसका उद्देश्य केवल साहित्य रचना नहीं था। उद्देश्य यह भी था कि लोगों के मन में अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था बनी रहे और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे अपने मूल से विचलित न हों।

यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की जीवंतता है।

संस्कृत में आधुनिक विषयों का ज्ञान

आज जब हम विज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान, प्रबंधन या राजनीति जैसे विषयों की बात करते हैं, तो यह मान लेना उचित नहीं होगा कि इनका भारतीय चिंतन में कोई आधार नहीं था।

आयुर्वेद का उद्देश्य ही समग्र स्वास्थ्य की दृष्टि से मनुष्य की रक्षा और रोग की चिकित्सा करना है—“स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”

योग मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से जुड़ता है। यम और नियम के माध्यम से अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान जैसे मूल्यों की चर्चा की गई।

आज जिस योग को पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के संदर्भ में अपनाया जा रहा है, उसकी मूल शास्त्रीय परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।

इसी प्रकार साहित्य में भावों का जो सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है, वह मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और संचारी भावों के माध्यम से मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन मिलता है।

अर्थशास्त्र में शासन, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और राज्य-व्यवस्था के अनेक पक्षों का विवेचन मिलता है।

कौटिल्य ने राजा को मंत्रियों के चयन से लेकर उनकी परीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था तक का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन किया।

इसलिए संस्कृत को केवल धार्मिक या साहित्यिक भाषा मानना उसके वास्तविक ज्ञान-विस्तार को सीमित कर देना है।

संस्कृत और प्रबंधन

आज प्रबंधन एक आधुनिक विषय माना जाता है। लेकिन जीवन और संसाधनों के प्रबंधन के सूत्र भारतीय साहित्य में बहुत पहले से उपलब्ध हैं।

अपरिग्रह को ही लें। मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कितना संग्रह करे? उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन क्या हो? यह प्रश्न आज के आर्थिक संतुलन और सतत विकास की चर्चाओं से भी जुड़ता है।

नीति को केवल राजनीतिक नीति न समझकर जीवन के प्रबंधन के रूप में भी देखा गया है।

समय और शक्ति का समुचित प्रबंधन व्यक्ति को जीवन में सिद्धि की ओर ले जाता है।

इसलिए यदि आधुनिक प्रबंधन का विद्यार्थी संस्कृत के कुछ मूल ग्रंथों और सूत्रों से परिचित होता है, तो वह अपने विषय के साथ एक दूसरी ज्ञान-परंपरा का भी परिचय प्राप्त करता है।

संस्कृत का विद्यार्थी कौन बनेगा?

नई शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित न रखा जाए।

यदि कृषि का विद्यार्थी संस्कृत को माइनर के रूप में पढ़ता है, तो उसका उद्देश्य संस्कृत को जीविका का साधन बनाना नहीं है। वह कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ, कोई प्रबंधन का विद्वान, कोई वैज्ञानिक।

लेकिन यदि उसने संस्कृत पढ़ी है, तो वह भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित होगा।

संस्कृत का एक संस्कार उसके भीतर बनेगा।

जैसे घड़ा बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाती है और वह आकृति घड़े के टूटने तक बनी रहती है, उसी प्रकार विद्यार्थी जीवन में पड़ा संस्कृत का संस्कार जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपना प्रभाव अवश्य दिखा सकता है।

इसलिए संस्कृत पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी का संस्कृतज्ञ बनना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि समाज के बड़े वर्ग को संस्कृत और उसके ज्ञान-संसार से परिचित कराया जाए।

वैल्यू एडेड कोर्स और संस्कृत

वैल्यू एडेड कोर्स, जिसे पहले मूल्य-शिक्षा की दृष्टि से देखा जाता था, संस्कृत के लिए विशेष अवसर प्रदान करता है।

मानव-मूल्यों की चर्चा करनी हो तो संस्कृत साहित्य में सूक्तियों, सुभाषितों, नीति-वचनों और जीवन-दर्शन की विशाल परंपरा उपलब्ध है।

एक विद्यार्थी यदि मेजर में संस्कृत न भी ले, तो वैल्यू एडेड कोर्स या माइनर के माध्यम से संस्कृत से परिचित हो सकता है।

यह संस्कृत के लिए एक बड़ा सामाजिक विस्तार है।

शिक्षक की भूमिका अब बदलनी होगी

जब संस्कृत का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आता है, तो उसके पास पहले से संस्कृत का आधार होता है। उसके मन में श्रद्धा का भाव भी होता है—“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”

लेकिन जब प्रबंधन, विज्ञान, वाणिज्य या कृषि का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आएगा, तो उसके पास श्रद्धा के साथ तर्क-बुद्धि भी होगी।

वह पूछेगा—“ऐसा क्यों है?”

और संस्कृत के अध्यापक को उसके इस प्रश्न का स्वागत करना होगा।

अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि “शास्त्र में ऐसा कहा गया है।” अध्यापक को उसके प्रश्न का तर्कपूर्ण उत्तर देना होगा। उसे उदाहरण देने होंगे, आधुनिक संदर्भों से जोड़ना होगा और विद्यार्थियों की जिज्ञासा को संतुष्ट करना होगा।

यही आज संस्कृत के अध्यापक के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।

पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, डिजिटल माध्यम, संक्षिप्त नोट्स, संदर्भ-ग्रंथ और सरल भाषा में तैयार अध्ययन-सामग्री—इन सभी माध्यमों का उपयोग करना होगा।

जिस विद्यार्थी की संस्कृत में कोई पृष्ठभूमि नहीं है, उसे सीधे किसी कठिन मूल ग्रंथ के सामने छोड़ देना उचित नहीं होगा। उसे क्रमशः उस ज्ञान-जगत् में प्रवेश कराना होगा।

रामायण को केवल कथा के रूप में क्यों पढ़ाएँ?

रामायण का नाम सुनते ही अधिकांश भारतीयों को उसकी कथा मालूम होती है। लेकिन राम क्या हैं? और राम का अयन क्या है?

राम को यदि आलंबन-विभाव माना जाए, तो राम का अयन—अर्थात् राम का मार्ग—एक दूसरी दृष्टि प्रदान करता है।

रामायण को केवल राम की कथा के रूप में नहीं, बल्कि राम के मार्ग के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।

यदि विद्यार्थी उस मार्ग को समझ ले और अपने जीवन में उसका कुछ अंश भी अपनाए, तो उसके जीवन में परिवर्तन संभव है।

इस प्रकार संस्कृत के ग्रंथों को आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने के लिए केवल कथा बताना पर्याप्त नहीं है; उनके भीतर निहित अवधारणाओं को समझाना भी आवश्यक है।

संस्कृत और भारतीय पहचान

विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीयों के अनुभवों में एक बात सामने आती है। वहाँ लोग केवल यह नहीं पूछते कि भारत से आया व्यक्ति डॉक्टर है, इंजीनियर है या वैज्ञानिक है। वे यह भी अपेक्षा करते हैं कि भारत से आया व्यक्ति रामायण, महाभारत और गीता के बारे में जानता होगा।

जब विदेश में कोई व्यक्ति हमसे गीता, रामायण या महाभारत के बारे में प्रश्न करता है और हम उसका उत्तर नहीं दे पाते, तो यह विचार करने का विषय है।

हमारे पास इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा है और फिर भी हम उससे परिचित नहीं हैं।

दूसरी ओर, दुनिया के अनेक लोग हमारे ग्रंथों को पढ़ रहे हैं, समझ रहे हैं और उनके बारे में प्रश्न कर रहे हैं।

इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी परंपरा को केवल गौरव के रूप में न दोहराएँ, बल्कि उसे पढ़ें और समझें।

सभी शास्त्र सबको पढ़ने की आवश्यकता नहीं

इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति दर्शन, व्याकरण, मीमांसा या न्याय का विशेषज्ञ बने।

दर्शन में जिसकी रुचि है, वह दर्शन पढ़े। जिसे व्याकरण में रुचि है, वह संस्कृत-व्याकरण पढ़े।

लेकिन कुछ ग्रंथ ऐसे हैं, जिनसे प्रत्येक भारतीय को परिचित होना चाहिए।

गीता पढ़नी चाहिए।

रामायण पढ़नी चाहिए।

महाभारत के महत्वपूर्ण अंश पढ़ने चाहिए।

कालिदास की कुछ रचनाओं से परिचित होना चाहिए। जयदेव के गीतगोविंद के पदों का रस समझना चाहिए।

बड़ी-बड़ी पुस्तकों को वर्षों तक टालते रहने की आवश्यकता नहीं है। छोटे लक्ष्य बनाए जा सकते हैं।

संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति संकल्प ले कि वह रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ेगा। कोई गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ने का संकल्प ले। कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ना शुरू करे।

जीवन में कितने संस्कृत दिवस आएँगे। यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर एक छोटा-सा संकल्प लिया जाए, तो वर्षों में एक बड़ी ज्ञान-संपदा अर्जित की जा सकती है।

महाभारत : ज्ञान का विशाल प्रकाश-पुंज

महाभारत को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ हैं। एक प्रचलित धारणा यह भी है कि महाभारत घर में रखने से घर में कलह होती है। ऐसी धारणाएँ हमें इस महान ग्रंथ को पढ़ने से रोकती हैं।

महाभारत को पढ़े बिना उसके बारे में निर्णय करना उचित नहीं है।

महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, नीति है, धर्म है, मनोविज्ञान है, नेतृत्व है और मनुष्य के स्वभाव का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन है।

व्यास कहते हैं—

“धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥”

अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में जो यहाँ है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।

महाभारत के चरित्रों को देखें तो इसकी गहराई और स्पष्ट हो जाती है।

भीष्म और द्रोण जैसे महान योद्धाओं को केवल इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि युद्ध का अंतिम परिणाम किसके पक्ष में रहा। उनकी सामर्थ्य, उनकी भूमिका और उनके जीवन के नैतिक द्वंद्व अलग-अलग प्रश्न हैं।

गांधारी का चरित्र भी इसी जटिलता का उदाहरण है। एक ओर उनका पुत्र-मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर दुर्योधन को दिया गया उनका प्रसिद्ध आशीर्वचन है—

“यतो धर्मस्ततो जयः।”

उन्होंने केवल “विजयी भव” नहीं कहा। उन्होंने विजय को धर्म से जोड़ दिया—जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।

यही कारण है कि यह वाक्य आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन और न्याय-व्यवस्था के संदर्भों में स्मरण किया जाता है।

महाभारत को पढ़ने का अर्थ केवल कथा जानना नहीं है; मनुष्य और समाज के जटिल प्रश्नों को समझना भी है।

संस्कृत और सामाजिक उत्तरदायित्व

संस्कृत का संबंध केवल विश्वविद्यालयों से नहीं है। आज लगभग प्रत्येक विश्वविद्यालय में किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन उपलब्ध है। विद्यालयों में टी.जी.टी. और पी.जी.टी. के माध्यम से संस्कृत पढ़ाई जाती है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न सांस्कृतिक माध्यमों में भी संस्कृत के लिए स्थान रहा है।

कथावाचकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। समाज को दिशा देने का काम केवल शास्त्र लिखने वालों का नहीं, उन्हें लोक तक पहुँचाने वालों का भी है।

प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि लोककल्याण की चर्चा करते थे। नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर मुनि एकत्र होकर समाज और लोक के कल्याण पर विचार करते थे।

आज कथावाचक, शिक्षक और संस्कृतज्ञ समाज के सामने इसी प्रकार की एक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।

समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। इसलिए समाज को सही दिशा देने का कार्य किसी छोटी जिम्मेदारी का कार्य नहीं है।

संस्कृत और शासन-व्यवस्था

कौटिल्य का अर्थशास्त्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।

राजा को मंत्री कैसे नियुक्त करना चाहिए? अधिकारियों की परीक्षा कैसे होनी चाहिए? राज्य-व्यवस्था किस प्रकार संचालित हो? प्रशासन में किस प्रकार की सावधानियाँ रखी जानी चाहिए? इन विषयों पर अर्थशास्त्र में अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।

दुःख की बात यह है कि हम इन ग्रंथों का गौरव तो बताते हैं, लेकिन स्वयं उन्हें पढ़ते नहीं।

फिर जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारी ही परंपरा की किसी बात को समझाकर बताता है, तो हमें लगता है—“वाह, क्या बात है!”

अपनी परंपरा से अपरिचित रहने के लिए हमारा एक सामान्य बहाना होता है—“सब संस्कृत में है।”

लेकिन आज अधिकांश महत्वपूर्ण ग्रंथों के हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं। मूल संस्कृत पढ़ने का आनंद और महत्व अपनी जगह है, लेकिन अनुवाद के माध्यम से कम-से-कम विषय-वस्तु से तो परिचित हुआ जा सकता है।

इसलिए “संस्कृत नहीं आती” को अपनी ज्ञान-परंपरा से दूर रहने का स्थायी बहाना नहीं बनाया जा सकता।

संस्कृत का भविष्य

संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत विभागों के भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह प्रत्येक भाषा के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।

किसी भाषा का भविष्य उसके भाषकों और पाठकों पर निर्भर करता है। दुनिया की अनेक भाषाएँ इसलिए कमजोर या समाप्त हुईं क्योंकि उनके बोलने और पढ़ने वाले कम होते गए।

पाली और प्राकृत इसका उदाहरण हैं। एक समय वे लोक में प्रचलित थीं। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों द्वारा संस्कृत और प्राकृत के प्रयोग से भी तत्कालीन भाषिक स्थिति का संकेत मिलता है।

आज प्राकृत और पाली के बोलने वालों की संख्या सीमित है, यद्यपि उनके अध्ययन-अध्यापन के संस्थान मौजूद हैं।

भाषा को जीवित रखने के लिए केवल विभाग पर्याप्त नहीं हैं। भाषक चाहिए, पाठक चाहिए और व्यवहार चाहिए।

संस्कृत की स्थिति इस दृष्टि से आशाजनक है कि आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न संस्थाओं में संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि भी बढ़ रही है।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसे संस्थान विभिन्न स्थानों पर संस्कृत की कक्षाएँ चलाने और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं।

संस्कृत और संस्कार

कई अभिभावक आज यह चाहते हैं कि उनका बच्चा आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कार भी प्राप्त करे।

उनका प्रश्न होता है—अच्छी शिक्षा तो मिल रही है, लेकिन संस्कार कहाँ से आएँगे?

यहीं संस्कृत की भूमिका सामने आती है।

संस्कृत साहित्य में केवल भाषा का ज्ञान नहीं है। उसमें विनय, धैर्य, नीति, कर्तव्य, संयम, उत्साह, लोककल्याण और जीवन-मूल्यों की विशाल परंपरा है।

इसलिए संस्कृत को केवल रोजगार के प्रश्न से देखना उसके महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा।

संस्कृत का प्रभाव विद्यार्थी के व्यक्तित्व और दृष्टि पर भी पड़ सकता है।

भारतीय होने की पहचान

हम डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वैज्ञानिक बनें, प्रबंधक बनें, शिक्षक बनें या किसी भी क्षेत्र में जाएँ—व्यावसायिक उत्कृष्टता आवश्यक है।

लेकिन भारतीय होने की पहचान केवल हमारी तकनीकी दक्षता से नहीं होगी।

हमारी पहचान इस बात से भी बनेगी कि हम अपनी ज्ञान-परंपरा को कितना जानते हैं।

क्या हम रामायण जानते हैं?

क्या हम महाभारत जानते हैं?

क्या हमें गीता के प्रमुख विचार मालूम हैं?

क्या हमें कालिदास का साहित्य मालूम है?

क्या हम अपने शास्त्रों में निहित जीवन-दृष्टि को समझते हैं?

यदि भारत में जन्म लेने के बावजूद हम अपनी ज्ञान-परंपरा से पूरी तरह अपरिचित हैं, तो यह केवल हमारी व्यक्तिगत कमी नहीं है; यह एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है।

संस्कृतज्ञों के सामने नई जिम्मेदारी

नई शिक्षा नीति ने अवसर दिया है। अब जिम्मेदारी संस्कृत के अध्यापकों और संस्कृतज्ञों की है।

हमें अपने प्रस्तुतीकरण की विधियों को बदलना होगा। हमें यह समझना होगा कि आज का विद्यार्थी केवल श्रद्धा के कारण किसी बात को स्वीकार नहीं करेगा। वह प्रश्न करेगा, तर्क करेगा और प्रमाण माँगेगा।

इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अपने विषय का गहरा ज्ञान रखने के साथ-साथ उसे आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।

हमें नए पाठ्यक्रम बनाने होंगे।

हमें सरल नोट्स तैयार करने होंगे।

हमें उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ बताने होंगे।

हमें डिजिटल माध्यमों और पावरपॉइंट जैसी प्रस्तुति-पद्धतियों का उपयोग करना होगा।

हमें संस्कृत की जटिल ज्ञानराशि को सरल भाषा में समझाने की क्षमता विकसित करनी होगी।

यही वह कार्य है जिसके माध्यम से संस्कृत अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक पहुँच सकती है।


संस्कृत दिवस पर एक छोटा संकल्प

संस्कृत के भविष्य की चिंता केवल सरकारों, विश्वविद्यालयों और संस्कृत विभागों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।

हर व्यक्ति अपने स्तर पर एक छोटा कदम उठा सकता है।

इस संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ने का संकल्प ले सकता है।

कोई गीता का एक अध्याय पढ़ सकता है।

कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ सकता है।

कोई रामायण या महाभारत का एक महत्वपूर्ण अंश पढ़ सकता है।

कोई अपने बच्चे को प्रतिदिन एक संस्कृत श्लोक सिखा सकता है।

ये छोटे-छोटे प्रयास मिलकर संस्कृत के प्रति एक बड़े सामाजिक संस्कार का निर्माण कर सकते हैं।

हमें यह भी समझना होगा कि संस्कृत को बचाने की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि वह हमारी प्राचीन भाषा है। उसे इसलिए जानना आवश्यक है क्योंकि उसके भीतर भारत की एक विशाल ज्ञान-संपदा सुरक्षित है।

निष्कर्ष : ज्ञानराशि को लोक तक पहुँचाना ही अगला लक्ष्य

भारतीय ज्ञान-परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गतिशीलता रही है। जब केवल वैदिक शब्द-राशि से समाज तक पहुँचना कठिन हुआ, तो प्रस्तुति की नई विधियाँ आईं। नाट्यशास्त्र आया। पुराण आए। आख्यान और उपाख्यान आए। स्मृतियाँ आईं। महाकाव्य आए। बाद में संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से उसी ज्ञान और उन्हीं आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया।

आज हमारे सामने भी वही चुनौती है।

ज्ञान वही है, लेकिन माध्यम बदल गया है।

आज विज्ञान का विद्यार्थी है, प्रबंधन का विद्यार्थी है, कृषि का विद्यार्थी है, चिकित्सा का विद्यार्थी है, तकनीकी शिक्षा का विद्यार्थी है। उसके सामने संस्कृत को उसी की भाषा और उसी की बौद्धिक पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रस्तुत करना होगा।

नई शिक्षा नीति ने यह अवसर उपलब्ध कराया है कि संस्कृत की ज्ञानराशि सभी तक पहुँचे, समान रूप से पहुँचे और पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।

अब प्रश्न यह नहीं है कि संस्कृत को बचाया कैसे जाए।

प्रश्न यह है कि संस्कृत में निहित ज्ञान को कितने बड़े समाज तक पहुँचाया जाए।

यदि संस्कृत के विद्यार्थी और अध्यापक अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर इस कार्य को स्वीकार करते हैं, यदि प्रत्येक भारतीय अपनी परंपरा के कुछ मूल ग्रंथों से परिचित होने का संकल्प करता है और यदि नई पीढ़ी को संस्कृत से केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और जीवन-दृष्टि के रूप में परिचित कराया जाता है, तो संस्कृत का भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं होगा—उसकी ज्ञान-परंपरा नए युग में नए रूप में जीवित और सक्रिय भी रहेगी।

संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है। वह अतीत में संचित ज्ञान को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाला सेतु है।

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