संस्कृत के आधुनिक गीतकारों की प्रतिनिधि रचनायें (भाग-13)

 तदेव गगनं सैव धरा

 तदेव गगनं सैव धरा

जीवनगतिरनुदिनमपरा

तदेव गगनं सैव धरा।।

पापपुण्यविधुरा धरणीयं

कर्मफलं भवतादरणीयम्।

नैतद्-वचोऽधुना रमणीयं

तथापि सदसद्-विवेचनीयम्।।

मतिरतिविकला

सीदति विफला

सकला परम्परा। तदेव....

शास्त्रगता परिभाषाऽधीता

गीतामृतकणिकापि निपीता ।

को जानीते तथापि भीता

केन हेतुना विलपति सीता ।।

सुतरां शिथिला

सहते मिथिला

परिकम्पितान्तरा । तदेव.......

 जनताकृतिः शान्तिसुखहीना

संस्कृति-दशाऽतिमलिना दीना।

केवल-निजहित-साधनलीना

राजनीतिरचना स्वाधीना ।।

न तुलसीदलं

न गङ्गाजलं

स्वदते यथा सुरा । तदेव.....

देवालयपूजा भवदीया

कथं भाविनी प्रशंसनीया।

धर्म-धारणा यदि परकीया

नैव रोचते यथा स्वकीया।।

भक्तिसाधनं

न वृन्दावनं

काशी वा मथुरा। तदेव..

 

स्पृहयति धनं स्वयं जामाता

परिणय-रीतिराविला जाता।

सुता न परिणीतेति विधाता

वृथा निन्द्यते रोदिति माता ॥

चरणवन्दनं

भीतिबन्धनं

मोहमयी मदिरा । तदेव ...

सपदि समाजदशा विपरीता

परम्परा व्यथते ननु भीता ।

अपरिचिता नूतननैतिकता

शनैः शनैः प्रतिगृहमापतिता ।।

त्यज चिरन्तनं

हृदयमन्थनं

गतिरपि नास्त्यपरा । तदेव....

 

भारतीयसंस्कृतिमञ्जूषा

प्रतिनवयुग-संस्कार-विभूषा ।

स्वर-परिवर्तन-कृताभिलाषा

सम्प्रति लोक-मनोरथभाषा ।

नवयुगोचिता

मनुज-संहिता

विलसतु रुचिरतरा । तदेव......

लेखकः – श्रीनिवास रथ

हिन्दी

वही आकाश वही धरती

गति जीवन की नित नयी बदलती, है वही आकाश वही धरती ।

पाप पुण्य का भार धरा पर कर्म के अनुरूप मिलता फल, माना, अब ये बातें नहीं सुहाती फिर भी भले बुरे का तो कुछ करना होगा कही विवेचन । चकराने लगता है माथा समूची परम्परा लगती विफल सिसकती । है वही...

शास्त्रों वाली परिभाषायें पढ़ ली, पी गये अमृत बिन्दु सम वचनों वाली गीता, फिर भी किसे पता है ? किस कारण डरी डरी रोती है सीता ?

इसीलिए बेहाल कापते अन्तर से है मिथिला सब सहती । है वही..

सुख शान्ति से है दूर जनता, केवल अपने ही हित साधन में लीन राजनीति के हर करतब को मिल गयी स्वाधीनता ।

न तुलसी दल न गंगा जल में कहीं वह स्वाद या वह भावना दिखती, कि जितनी मन भावन रसीली अब सुरा लगती । है वही..

आपके मन्दिर की, पूजा की प्रशंसा कौन करेगा ? कैसी ! अगर परायी धर्म-धारणा नयी सुहाती खुद अपनी ही पूजा जैसी ।

वृन्दावन नहीं भक्ति का साधन न काशी या मथुरा भक्ति भक्त के मन में बसती । है वही......

जमाई राज अब खुद हो कर चाहने लगा वधू से बढ़ कर धन, हुए व्याह के तौर तरीके दूषित, भाग्य को बेकार कोसती माता 

है दिन रात रोती चरण वन्दन ये डरावने बन्धन एक मदिरा है भरम भरती । है वही......

दशा समाज की फिलहाल है विपरीत दुखी है परम्परा भयभीत । हर घर आँगन में उतर रही है धीरे धीरे एक नयी नैतिकता अपरिचित । 

छोड़ो चिरन्तन हृदय-मन्थन गति भी कोई और नही दिखती । है वही...

भारतीय संस्कृति की मंजूषा सक्षम है करने में नवयुग के संस्कार अलंकृत । स्वर परिवर्तन की अभिलाषा व्यक्त कर रही सम्प्रति जन मानस की भाषा ।

सुरुचिपूर्ण अति सुन्दर नयी संहिता मनुज जाति की अब निर्मित हो नव संयोजन करती। है वही...

भारतीवसंतगीतिः

निनादय नवीनामये वाणी वीणाम् ।

मृदुं गाय गीतिं ललित नीति लीनाम् ॥

 

मधुर - मञ्जरी- पिञ्जरीभूत- माला:

वसन्ते लसन्तीह सरसा रसाला:

कलापा कलित-कोकिला-काकलीनाम्

निनादय नवीनामये वाणी वीणाम् ॥

 

वहति मन्द-मन्दं समीरे सनीरे

कलिन्दात्मजाया: सवानीर-तीरे

नतां पंक्तिमालोक्य मधुमाधवीनाम्

निनादय नवीनामये वाणी वीणाम् ॥

 

चलितपल्‍लवे पादपे पुष्‍पपुंजे,

 मलयमारुतोच्‍चुम्बिते मञ्जुकुंजे

स्‍वनन्‍तीन्‍ततिम्‍प्रेक्ष्‍य मलिनामलीनाम्।

निनादय नवीनामये वाणि ! वीणाम्।।

 

लतानां नितान्‍तं सुमं शान्तिशीलम्,

 चलेदुच्‍छलेत्‍कान्‍तसलिलं सलीलम्-

तवाकर्ण्‍य वाणीमदीनां नदीनाम्।

निनादय नवीनामये वाणि  वीणाम्।।

 

उदयति मिहिरो, विगलति तिमिरो

भुवनं कथमभिरामम्

प्रचरति चतुरो मधुकरनिकरो

गुंजति कथमविरामम्॥

 

विकसति कमलं, विलसति सलिलम्

पवनो वहति सलीलम्

दिशिदिशि धावति,कूजति नृत्यति

खगकुलमतिशयलोलम्॥

 

शिरसि तरूणां रविकिरणानाम्

खेलति रुचिररुणाभा

उपरि दलानाम् हिमकणिकानाम्

कापि हृदयहरशोभा॥

लेखक-  जानकीवल्लभ शास्त्री


विलसति संस्कृतप्रतिभा

विलसतिसंस्कृतप्रतिभा

                 

संस्कृतप्रतिभान्वेषणलग्ना भव्या  मित्र! मनोज्ञा

प्रेरयन्ति सद्गुरव: शिष्यान् नितरां गन्तुं विज्ञा:।

दिशि दिशि विद्यालयतो वटवश्चलितास्सन्ति श्रुताभा:

विलसति संस्कृतप्रतिभा

विलसति  संस्कृतप्रतिभा

 

पश्य पश्य सज्ज्ञानवनेऽस्मिन् गुञ्जति प्रतिभागानम्

अहो वटूनां वाणी कुरुते बाणभट्टसम्मानम्।

सुखिनो दृष्ट्वा हन्त पूर्वजा मोदन्ते दिव्याभा:

विलसति संस्कृतप्रतिभा

विलसति संस्कृतप्रतिभा

 

श्लोकानामुच्चारणमेतद् हरते चेतोऽस्माकम्

ब्रुवते गुरवो वाहवाह इति प्रेरकवचनं साकम्।

अन्नंभट्टामरपाणिनिरचनानां हन्त जिताभा

विलसति संस्कृतप्रतिभा

विलसति संस्कृतप्रतिभा

 

व्यासगणेशविरचिता भाषा जीवति लेखे वन्द्या

मुदिता वयं भवामो दृष्ट्वा प्रतिभामेषां धन्या

संस्कृतिसंस्कृतरक्षणहेतोर्विलसतु राष्ट्रनवाभा

विलसति संस्कृतप्रतिभा

विलसति संस्कृतप्रतिभा

      अनुवादक - अरविन्दतिवारी

 

संस्कृतप्रतिभान्वेषणधन्यवादगानम्!!

********

 

समादरणीय हे श्रीमन्! वदामो धन्यवादं ते।

कृतज्ञा योजका: प्रीत्या वदामो धन्यवादं ते।।१

 

सुप्रतिभान्वेषणं सफलं वयं मन्यामहे  मतिमन्!

उपस्थित्या स्वसंस्थाने वदामो धन्यवादं ते।। २

 

गुरुर्वा यो महानभिभावक: प्रेम्णा प्रियच्छात्र:।

विमलनिष्ठां प्रदर्शितवान् वदामो धन्यवादं ते।। ३

 

स्वसंस्कृतवर्द्धने धीमन्! प्रयासोऽयं सदा श्लाघ्य:।

समर्थनयोगदानार्थं वदामो धन्यवादं ते।। ४

 

असीमप्रेमभावो दर्शनीयो मान्य! प्रतिभायाम्।

मनो नोऽचोरयत्त्वरितं वदामो धन्यवादं ते।। ५

 

सुयोगं सम्प्रदायैतद् विहितवान् योजनं सुफलम्।

वटो! प्रतिभागितां कृतवान् वदामो धन्यवादं ते।। ६

 

गिरामायोजनेऽस्मिन् य: सदोत्थ:  संस्कृतोन्नतये।

विनयकुसुमैर्मुहुर्मुदिता वदामो धन्यवादं ते।। ७

                  ***अरविन्दतिवारी


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