मंगलवार, 30 अप्रैल 2019

Best Websites for Sanskrit Books

इस लेख में आपको संस्कृत की पुस्तकों से जुड़ी सर्वश्रेष्ठ वेबसाइट से परिचय कराने जा रहा हूँ। आप इनपर जाकर संस्कृत की पुस्तकों फ्री में डाउनलोड कर सकते है। कुछेक वेबसाइट पर संस्कृत ग्रन्थों को यूनीकोड में टंकित कर मूल रूप में रखा गया है। चुनिंदा लिंक उपलब्ध कराने के पीछे उद्येश्य यह है कि आज कई ऐसे वेबसाइट हैं, जहाँ से आप पुस्तकें पढ़ सकते हैं अथवा डाउनलोड कर सकते हैं, परन्तु उन स्थानों पर आपको लगभग यही पुस्तकें मिलेंगी। आपकी आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए ये पर्याप्त होंगें। इन वेबसाइट का परिचालन तथा सामग्री खोज की सुविधा और की अपेक्षा अधिक सुगम है। यहाँ से आप विन SING UP किये पुस्तकें ले सकते हैं।

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2. इस भारतविद्या वेबसाइट पर योग, षड्दर्शन, उपनिषद्, जैन, बौद्ध आदि विषयों पर संस्कृत की पुस्तकें उपलब्ध हैं।


3. संस्कृत विकिस्रोत पर वेद, पुराण, स्मृति , उपनिषद् , आगम, साहित्य, दर्शन, आदि विषयों पर मूल पुस्तकें उपलब्ध हैं। इसे आप पढ़ सकते हैं।

4. आर्काइव से  संस्कृत की पुस्तकें डाउनलोड कर सकते हैं। यहाँ संस्कृत पुस्तकों का भी विशाल संग्रह है। 

5.  राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली के विभिन्न परिसरों द्वारा 116 पुस्तकों को ई- बुक के रूप में परिणत किया गया। इन्हें आप ऑनलाइन पढ़ सकते हैं। इसके नीचे डिजिटलाइज्ड पुस्तकों का लिंक दिया गया है। इन पुस्तकों को आप डाउनलोड कर सकते हैं।

6. संस्कृत डाक्युमेंट पर मुख्य पुस्तकें, स्कैन की हुई पुस्तकें तथा संस्कृत से सम्बन्धित ढ़ेर सारी सामग्री मिलती है। यह एक वेबसाइट नहीं होकर एग्रीगेटर है, जो हमें विभिन्न वेबसाइट का लिंक उपलब्ध कराता है। इसके बारे में हम विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगें।


7. संस्कृत ईबुक्स इस लिंक पर वर्णक्रम से पुस्तकों की सूची दी गयी है। यहाँ से पुस्तकें डाउनलोड की जा सकती है। PDF सेक्शन में पुस्तकों को खोजने में थोड़ी असुविधा हो सकती है।


आप नीचे दिये गये विडियो को देखें । इसमें मैंने उपर्युक्त सभी लिंक को खोलकर कहाँ क्या सामग्री है और उससे पुस्तकें कैसे डाउनलोड की जाती है अथवा वहीं पढ़ी जा सकती है आदि के बारे में प्रायोगिक रूप से विस्तार से समझाया है। यदि आपको इस वेबसाइट के परिचालन या उपयोग करते समय किसी तरह की समस्या हो रही हो तो टिप्पणी में अपनी समस्या लिखें। 


शनिवार, 27 अप्रैल 2019

काव्यशास्त्र का सामान्य परिचय


काव्य की आत्मा पर विविध काव्यशास्त्रकारों में मतभेद रहा है। इस मतभेद के कारण भरत (500 ई. पू. से लेकर प्रथम शती तक) से लेकर 1750 तक के काल खण्ड में रस, अलंकार, वक्रोक्ति ,ध्वनि और औचित्य संप्रदाय इन 6 सिद्धान्तों / संप्रदायों की स्थापना हुई।   साहित्यशास्त्र के मुख्य 41 आचार्य इनमें से किसी न किसी संप्रदाय से संबंधित है। यदि हम काव्यशास्त्र के कालक्रमिक विकास को समझ लें तो विभिन्न सिद्धान्तों को समझने में आसानी होगी।  अधिकांश विद्वानों ने इस काल को चार भागों में विभक्त किया है -
प्रारंभिक काल-  अज्ञात काल, भरत से लेकर भामह (सातवीं शताब्दी) तक
रचनात्मक काल - भामह से लेकर आनंद वर्धन तक  (600 विक्रमी से 800 विक्रमी तक)
निर्णयात्मक काल - आनंदवर्धन काल से लेकर मम्मट तक ( 800 विक्रमी से 1000 विक्रमी तक)
व्याख्या काल -  मम्मट से लेकर विश्वेश्वर पंडित तक (1000 विक्रमी से 1750 विक्रमी तक)

प्रारंभिक काल

 भरत का नाट्यशास्त्र ग्रंथ साहित्य शास्त्र का प्रमुख ग्रंथ है। उसमें रस और नाटक के सूक्ष्म तत्वों का विवेचन बहुत सुंदर रूप से हुआ है। यह साहित्यशास्त्र का बीज भूत है। इस ग्रंथ का विस्तार अन्य आचार्यों ने किया है। नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में केवल 4 अलंकारों, 10 गुणों और 10 दोषों का ही विवेचन किया गया है, जो अलंकार शास्त्र की दृष्टि से एक रूपरेखा मात्र ही कहा जा सकता है। भामह ही अलंकार शास्त्र के प्रथम आचार्य माने जाते हैं । उनका काव्यालंकार ग्रंथ अलंकार शास्त्र का मुख्य ग्रंथ कहा जा सकता है। इसमें उन्होंने भरत के चार अलंकारों के स्थान पर 38 स्वतंत्र अलंकारों का विवेचन किया है।  भट्टिकाव्य के लेखक भट्टि ने इसी के आधार पर अपने ग्रंथ में अलंकारों का निरूपण किया है । भरत के बाद मेधावी, रूद्रट आदि उनके कुछ टीकाकार हुए हैं परंतु उनके ग्रंथ अनुपलब्ध है। आचार्य विश्वेश्वर ने काव्यप्रकाश की भूमिका में इनका उल्लेख किया है।  

रचनात्मक काल

भामह से लेकर आनंदवर्धन तक 200 वर्षों में अलंकार संप्रदाय, रीति संप्रदाय, रस संप्रदाय तथा ध्वनि संप्रदाय इन चार मुख्य संप्रदायों के मौलिक ग्रंथों का निर्माण हुआ है। चारों संप्रदायों के आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं -
अलंकार संप्रदाय – भामह, उद्भट, रूद्रट ।
रीति संप्रदाय – दण्डी, वामन
रस संप्रदाय – भट्टलोल्लट,शंकुक और भट्ट नायक आदि
ध्वनि संप्रदाय - आनंदवर्धन
यह काल साहित्य शास्त्र की दृष्टि से बड़ा ही महत्वपूर्ण है। इसमें जहां एक और भामह, उद्भट और रूद्रट ने काव्य के वाह्य स्वरुप अलंकारों का निरूपण किया, वहीं दूसरी ओर दण्डी और वामन ने काव्य की रीति और उसके गुणों की विवेचना की । नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध सूत्र की व्याख्या करने वाले सभी भट्टलोल्लट, शंकुक और भट्ट नायक आदि ने नाट्यशास्त्र के सिद्धांत को स्पष्ट करने का प्रयत्न किया और इसी काल में आनंदवर्धनाचार्य ने अपना ध्वन्यालोक ग्रंथ लिख कर ध्वनि सिद्धांत की स्थापना की।
निर्णय काल
इस काल में ध्वन्यालोक की प्रसिद्ध टीका लोचन एवं नाट्यशास्त्र की अभिनव भारती टीका के टीकाकार अभिनव गुप्त, वक्रोक्तिजीवितकार कुन्तक, व्यक्तिविवेकार महिमभट्ट हुए। महिमभट्ट ने अपने व्यक्तिविवेक में ध्वनि सिद्धांत का खण्डन किया हैं। इसके अतिरिक्त भोजराज, रूद्रट, धनिक और धनंजय भी इस काल के हैं।

व्याख्या काल

इस काल में हेमचंद्र, विश्वनाथ और जयदेव आदि ने काव्य की सर्वांग पूर्ण विवेचना करते हुए काव्यशास्त्र पर अबतक के स्थापित सिद्धान्तों को लेकर अपने ग्रंथों की रचना की है। रुय्यक तथा अप्पय दीक्षित आदि ने केवल अलंकारों के विवेचन में ही अपनी शक्ति लगा दी। शारदातनय, शिङ्गभूपाल तथा भानुदत्त आदि ने इन सिद्धांतों के विवेचन में प्रयत्न किया है। गौडीय वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामी का सहयोग भी इस काल में रहा है। राजशेखर, क्षेमेंद्र अमर चंद्र आदि ने कवि शिक्षा के विषय पर अपने ग्रंथों का निर्माण किया है। इस काल के आचार्यों के अवदानों को हम विविध संप्रदायों के अंतर्गत निम्नलिखित प्रकार से वर्गीकरण कर सकते हैं -
ध्वनि संप्रदाय – मम्मट, रुय्यक, विश्वनाथ, हेमचंद्र, विद्याधर, विद्यानाथ, जयदेव तथा अप्पय दीक्षित आदि
रस संप्रदाय -  शारदातनय, सिंहभूपाल, भानुदत्त, रूप गोस्वामी आदि
कवि शिक्षा – राजशेखर, क्षेमेंद्र, अरिसिंह, अमरचंद्र, देवेश्वर आदि
अलंकार संप्रदाय - पंडितराज जगन्नाथ, विश्वेश्वर पंडित आदि
ध्वनि सिद्धांत को साहित्यशास्त्र का मुद्दे मुख्य सिद्धान्त मानकर काव्यशास्त्र को तीन भागों में विभक्त किया है
ध्वनि पूर्व काल - प्रारंभ से आनंदवर्धन 800 विक्रमी तक
ध्वनि काल - आनंद वर्धन 800 विक्रमी से मम्मट 1000 विक्रमी तक
ध्वनि पश्चात् का काल - 1000 विक्रमी से जगन्नाथ 1750 विक्रमी तक

रस संप्रदाय

            प्रवर्तक आचार्य- भरत मुनि
            ग्रन्थ नाट्यशास्त्र
            आचार्य भरत ने रस को काव्य की आत्मा माना।
            सिद्धान्त- विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिष्पत्तिः
           रस सिद्धान्त के व्याख्याकार - भट्टनायक, भट्टलोल्लट, अभिनव गुप्त और विश्वनाथ।
काव्यशास्त्र के प्रसिद्ध छः संप्रदायों में सबसे प्राचीन संप्रदाय, रस संप्रदाय है। इसके संस्थापक भरतमुनि है। इनका समय ई.पू. तृतीय शताब्दी है। राजशेखर ने काव्यमीमांसा में नंदीकेश्वर के नाम का उल्लेख किया है, किंतु उनका कोई भी ग्रंथ उपलब्ध नहीं होता है, इसीलिए प्रथम आचार्य के रूप में भरत को ही माना जाता है। इन्होंने अपने नाट्यशास्त्र में सबसे पहले रस के विषय में चर्चा की है। भरतमुनि ने लिखा है- विभावानुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिष्पत्तिः अर्थात् विभाव, अनुभाव तथा संचारी भाव के संयोग से रस की निष्पत्ति होती है। इसके बाद के आचार्यों ने इसी के आधार पर उसका विवेचन किया है। भरतमुनि नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में रस और सातवें अध्याय में भावों का विस्तार से विवेचन हुआ है। यही रस सिद्धान्त का आधार है। इस सिद्धांत की व्याख्याकारों में भट्टनायक, भट्टलोल्लट, विश्वनाथ और अभिनव गुप्त प्रसिद्ध है। अभिनव गुप्त ने आनन्दवर्धन कृत ध्वन्यालोक पर लोचन टीका तथा नाट्यशास्त्र पर अभिनव भारती टीका लिखी। इन्होंने रस को व्यंजना वृत्ति का व्यापार माना। आचार्य विश्वनाथ ने अपने साहित्यदर्पण में रस को काव्य की आत्मा मानते हुए उसकी कुछ विशेषतायें बतायी यथा- रस अलौकिक है, यह ब्रह्मानन्द का सहोदर है । रस ज्ञान स्वरूप होता है। इनहोंने रस के 4 अंग 9 स्थायी भाव, आलम्बन और उद्दीपन ये दो विभाव, कायिक, वाचिक, आहार्य और सात्विक ये चारों अनुभाव, तथा 33 संचारी भाव स्वीकार किये।

अलंकार संप्रदाय

अलंकार संप्रदाय के प्रवर्तक भामह माने जाते हैं। इन्होंने काव्यालंकार नामक ग्रन्थ की रचना की । इनका समय छठी शताब्दी माना जाता है। इनके व्याख्याकार भामह विवरण तथा काव्यलंकारसारसंग्रह के लेखक उद्भट और उसके बाद हुए दण्डी, रूद्रट और उसके बाद काव्यालंकारसारसंग्रह  प्रतिहारेन्दु राज तथा जयदेव आदि अनेक आचार्य अलंकार संप्रदाय के अंतर्गत आ जाते हैं। उद्भट ने काव्यलंकारसारसंग्रह में 41 अलंकारों का निरूपण किया है।  भामह के बाद दण्डी ने अलंकार पर काव्यादर्श नामक ग्रन्थ लिखा। इनका समय सातवीं शती का उत्तरार्ध माना जाता है। इन्होंने काव्यशोभाकरान् धर्मान् अलंकारान् प्रचक्षते अर्थात् काव्य के शोभाकर धर्म अलंकार हैं  कहकर अलंकार को काव्य का शोभाधायक तत्व माना। इन्होंने इस ग्रन्थ के द्वितीय परिच्छेद 35 अलंकारों के लक्षण तथा उदाहरण दिये है। अलंकार संप्रदाय के अनुयायी भी रस की सत्ता को मानते हैं, किंतु उसे प्रधानता नहीं देते हैं। उनके मत में काव्य का प्राण भूत जीवनाधायक तत्व अलंकार ही है।  अलंकारविहीन काव्य की कल्पना वैसे ही है जैसे गर्मी से रहित अग्नि की कल्पना। चंद्रलोक के रचयिता जयदेव ने काव्यप्रकाशकार के लक्षणों में आए अनलंकृति पुनः क्वापि अर्थात् कहीं-कहीं अलंकार हीन शब्दार्थ भी काव्य हो सकते हैं, पर उत्तर देते हुए लिखा है- 
                     अङ्गीकरोति यः काव्यं शब्दार्थावनलंकृती।
असौ न मन्यते कस्माद्नुष्णमनलं कृती । चन्द्रालोक, 1/8
अर्थात् काव्यप्रकाशकार जो अलंकार विहीन शब्द और अर्थ को भी काव्य मानते हैं, वह उष्णता विहीन अग्नि की सत्ता क्यों नहीं मानते? अलंकार संप्रदायवादी काव्य में अलंकारों को ही प्रधान मानते हैं और इसका अंतर्भाव रसवदलंकारों  में करते हैं। रसवत्, प्रेय, ऊर्जस्विन् और समाहित चार प्रकार के रसवदलंकार माने जाते हैं। दंडी और भामह दोनों ने रसवदलंकारों के भीतर ही रस का अंतर्भाव किया है।
रीति संप्रदाय
रीति संप्रदाय के संस्थापक वामन है। इनका समय 9वीं शताब्दी माना जाता है। वामन ने काव्यालंकारसूत्र नामक ग्रन्थ की रचना की। इन्होंने काव्य में अलंकारों की प्रधानता के स्थान पर रीति की प्रधानता को स्वीकार किया है। रीतिरात्मा काव्यस्य यह उनका प्रमुख सिद्धांत है। इसीलिए उन्हें रीति संप्रदाय के प्रवर्तक माना जाता है। इनहोंने वैदर्भी रीति, गौडी रीति, पाञ्चाली रीति इन तीन रीति का प्रतिपादन किया। ये सौन्दर्य शास्त्र के उद्भावक है।
 रीति का विवेचन करते हुए उन्होंने विशिष्टपदरचनारीतिः लिखा है अर्थात् विशिष्ट पद रचना का नाम रीति है। आगे उस विशेष की व्याख्या करते हुए कहा है विशेषणो गुणात्मा अर्थात रचना में माधुरी आदि गुणों का समावेश ही उसकी विशेषता है और यह विशेषता ही रीति है। इस प्रकार इस सिद्धांत में गुण और रीति का अत्यंत घनिष्ठ संबंध है। इसीलिए रीति संप्रदाय को गुण संप्रदाय के नाम से जाना जाता है। वामन ने काव्यशोभायाः कर्तारो गुणाः  तथा अतिशयहेतवत्वलङ्कारः  इन 2 सूत्रों को लिखकर गुण और अलंकार का भेद प्रदर्शित करते हुए अलंकारों की अपेक्षा गुणों के विशेष महत्व को प्रदर्शित किया है। गुण काव्य शोभा के उत्पादक होते हैं। अलंकार केवल उस शोभा के अभिवर्धक होते हैं अर्थात बढ़ाने वाले होते हैं, इसीलिए काव्य में अलंकारों की अपेक्षा गुणों का स्थान अधिक महत्वपूर्ण है। अतः वामन ने अलंकारों की प्रधानता को समाप्त कर गुणों की प्रधानता का प्रतिपादन करने वाले रीति संप्रदाय की स्थापना की। मम्मट आदि बाद के आचार्यों ने रीति की उपयोगिता स्वीकार की है, किंतु उसे काव्य की आत्मा स्वीकार नहीं किया है। उनके मत में रीतियोरवयवोसंस्थानविशेषवत् काव्य में रीतियों की स्थिति  वैसे ही है जैसे शरीर में आंख नाक कान आदि अवयवों की है। इन अवयवों की रचना शरीर के लिए उपयोगी भी है और शरीर शोभा की जनक भी है, फिर भी उसे आत्मा का स्थान नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार काव्य में रीति का महत्व तथा शोभाजनकत्व होने पर भी उसे काव्य की आत्मा नहीं कहा जा सकता।

ध्वनि संप्रदाय

इस संप्रदाय के संस्थापक आनंदवर्धन आचार्य हैं। इन्होंने ध्वन्यालोक ग्रन्थ की रचना की। इनके मत में काव्य की आत्मा ध्वनि है। काव्यस्यत्मा ध्वनिः।  इन सभी संप्रदायों में ध्वनि संप्रदाय सबसे अधिक प्रबल एवं महत्वपूर्ण संप्रदाय रहा है। यद्यपि इसके विरोध में भी अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं ।ध्वनि सिद्धांत वैसा ही अधिक से अधिक चमकता गया जैसे अग्नि में तपने पर स्वर्ण की कांति बढ़ती है। ध्वनि सिद्धांत के विरोध में वैयाकरण, साहित्यिक, वेदांत, मीमांसक, नैयायिक आदि सभी ने अपना पक्ष रखा, किंतु अंत में काव्यप्रकाशकार मम्मट ने बड़ी प्रबल युक्तियों द्वारा उन सब का खंडन करके ध्वनि सिद्धांत की पुनर्स्थापना की। इसीलिए उनको ध्वनि प्रतिष्ठापक परमाचार्य माना जाता है। भरत से लेकर पंडितराज जगन्नाथ तक लगभग 2000 वर्षों के दीर्घ अवधि के भीतर इन संप्रदायों का विकास और संघर्ष होता रहा है। अनेक प्रमुख आचार्यों ने इन साहित्यिक विकास के कार्यों में अपना योगदान किया है।

वक्रोक्ति संप्रदाय

वक्रोक्ति संप्रदाय के संस्थापक कुन्तक माने जाते हैं। इन्होंने वक्रोक्तिजीवितम् नामक ग्रन्थ की रचना की। कुन्तक ने काव्य में रीति की प्रधानता को समाप्त कर वक्रोक्ति की प्रधानता की स्थापना की। वैसे काव्य में वक्रोक्ति का महत्व भामह ने भी स्वीकार किया है।
          सैषा सर्वत्रा वक्रोकितरनयार्थो विभाव्यते।
          यत्नोऽस्यां कविना कार्य: कोऽलंकारोऽनया विना।।
इसी प्रकार दण्डी ने भी भिन्नं द्विधा स्वभावोक्तिर्वक्रोक्तिश्चेति वाङ्मयम् लिखकर वक्रोक्ति के महत्व का प्रतिपादन किया है। वामन ने भी सादृश्याल्लक्षणा वक्रोक्तिः लिखकर काव्य में वक्रोक्ति का स्थान माना है। किंतु उन सब के मत से वक्रोक्ति सामान्य अलंकार आदि रूप ही हैं। कुन्तक ने वक्रोक्ति को जो गौरव प्रदान किया है उसे अन्य आचार्यों ने नहीं दिया है, इसीलिए कुन्तक ही इस संप्रदाय के संस्थापक माने जाते हैं। वक्रोक्तिजीवितकार ने अपने पूर्ववर्ती रीति सिद्धांत को भी परिमार्जित करके अपने यहां स्थान दिया है। वामन की पांचाली, वैदर्भी,  गौडी आदि रीतियां देश भेद के आधार पर मानी जाती थी। कुन्तक ने उसका आधार, देश को न मानकर रचना शैली को माना है और उसके लिए रीति के स्थान पर मार्ग शब्द का प्रयोग किया है। कुन्तक, वामन की वैदर्भी रीति को सुकुमार मार्ग कहते हैं। इसी प्रकार गोडी रीति को विचित्र मार्ग तथा पांचाली रीति को मध्यम मार्ग नाम से कहते हैं।
औचित्य सम्प्रदाय

नोट- मैंने इस ब्लॉग में इन विषयों पर अलग - अलग लेख लिखा था। यह लेख UGC नेट (संस्कृत) की तैयारी कर रहे छात्रों को ध्यान में रखकर लिखा है। विस्तृत सामग्री या इससे जुड़ी अन्य जानकारी के लिए टिप्पणी में लिखें।
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                      1. अलंकार सम्प्रदाय                  
                      2. संस्कृत काव्यशास्त्रकारों की सूची  एवं परिचय
                        3. रीति सम्प्रदाय
           

शुक्रवार, 26 अप्रैल 2019

रघुवंशम् द्वितीय सर्ग (ध्वनि सहित)


रघुवंशम् के द्वितीय सर्ग में पत्नी के साथ राजा दिलीप द्वारा की गयी गो सेवा तथा उसकी फल प्राप्ति का वर्णन किया गया है।  इहलोक में सुख समृद्धि की कामना रखने वाले के लिए यह काव्य  हमें गो सेवा की प्रेरणा देता है।  गोपाष्टमी के अवसर पर आपकी सेवा में अर्पित-



अथ प्रजानामधिपः प्रभाते जायाप्रतिग्राहितगन्धमाल्याम् । 
वनाय  पीतप्रतिबद्धवत्सां यशोधनो धेनुमृषेर्मुमोच    ।।1।।

तस्याः खुरन्यासपवित्रपांसुमपांसुलानां धुरि कीर्तनीया ।

मार्गं मनुष्येश्वरधर्मपत्नी श्रुतेरिवार्थं स्मृतिरन्वगच्छत् ।। 2 ।।

निवर्त्य राजा दयितां दयालुस्तां सौरभेयीं सुरभिर्यशोभिः ।
पयोधरीभूतचतुःसमुद्रां जुगोप गोरूपधरामिवोर्वीम् ।। 3 ।।
व्रताय तेनानुचरेण धेनोर्न्यषेधि शेषोप्यनुयायिवर्गः ।
न चान्यतस्तस्य शरीररक्षा स्ववीर्यगुप्ता हि मनोः प्रसूतिः ।। 4 ।।
आस्वादवद्भिः कबलैस्तृणानां कण्डूयनैर्दंशनिवारणैश्च ।
अव्याहतैः स्वैरगतैः स तस्याः सम्राट् समाराधनतत्परोऽभूत् ।। 5।।

स्थितः स्थितामुच्चलितः प्रयातां निषेदुषीमासनबन्धधीरः ।
जलाभिलाषी जलमाददानां छायेव तां भूपतिरन्वगच्छत् ।। 6 ।।
स न्यस्तचिह्नामपि राजलक्ष्मीं तेजोविशेषानुमितां दधानः ।
आसीदनाविष्कृतदानराजिरन्तर्मदावस्थ इव द्विपेन्द्रः ।। 7 ।।

लताप्रतानोद्ग्रथितैः स केशैरधिज्यधन्वा विचचार दावम् ।
रक्षाऽपदेशान्मुनिहोमधेनोर्वन्यान्विनेष्यन्निव दुष्टसत्त्वान् ।। 8 ।।

विसृष्टपार्श्वानुचरस्य तस्य पार्श्वद्रुमाः पाशभृता समस्य ।
उदीरयामासुरिवोन्मदानामालोकशब्दं वयसां विरावैः ।। 9 ।।

मरुत्प्रयुक्ताश्च मरुत्सखाभं तमर्च्यमारादभिवर्तमानम् ।
अवाकिरन् बाललताः प्रसूनैराचारलाजैरिव पौरकन्याः ।। 10 ।।

धनुर्भृतोऽप्यस्य दयार्द्रभावमाख्यातमन्तःकरणैर्विशङ्कैः ।
विलोकयन्त्यो वपुरापुरक्ष्णां प्रकामविस्तारफलं हरिण्यः ।। 11।।

स कीचकैर्मारुतपूर्णरन्ध्रैः कूजद्भिरापादितवंशकृत्यम् ।
शुश्राव कुञ्जेषु यशः स्वमुच्चैरुद्गीयमानं वनदेवताभिः ।। 12 ।।

पृक्तस्तुषारैर्गिरिनिर्झराणामनोकहाकम्पितपुष्पगन्धी ।
तमातपक्लान्तमनातपत्रमाचारपूतं पवनः सिषेवे ।। 13 ।।

शशाम वृष्ट्यापि विना दवाग्निरासीद्विशेषा फलपुष्पवृद्धिः ।
ऊनं न सत्त्वेष्वधिको बबाधे तस्मिन् वनं गोप्तरि गाहमाने ।। 14 ।।

सञ्चारपूतानि दिगन्तराणि कृत्वा दिनान्ते निलयाय गन्तुम् ।
प्रचक्रमे पल्लवरागताम्रा प्रभा पतङ्गस्य मुनेश्च धेनुः ।। 15 ।।

तां देवतापित्रतिथिक्रियार्थां अन्वग्ययौ मध्यमलोकपालः ।
बभौ च सा तेन सतां मतेन श्रद्धेव साक्षाद्विधिनोपपन्ना ।। 16 ।।

स पल्वलोत्तीर्णवराहयूथान्यावासवृक्षोन्मुखबर्हिणानि ।
ययौ मृगाध्यासितशाद्वलानि श्यामायमानानि वनानि पश्यन् ।। 17 ।।

आपीनभारोद्वहनप्रयत्नाद्गृष्टिर्गुरुत्वाद्वपुषो नरेन्द्रः ।
उभावलंचक्रतुरञ्चिताभ्यां तपोवनावृत्तिपथं गताभ्याम् ।। 18 ।।

वसिष्ठधेनोरनुयानिनं तमावर्तमानं वनिता वनान्तात् ।
पपौ निमेषालसपक्ष्मपङ्क्तिरुपोषिताभ्यामिव लोचनाभ्याम् ।। 19 ।।

पुरस्कृता वर्त्मनि पार्थिवेन प्रत्युद्गता पार्थिवधर्मपत्न्या ।
तदन्तरे सा विरराज धेनुर्दिनक्षपामध्यगतेव सन्ध्या ।। 20 ।।

प्रदक्षिणीकृत्य पयस्विनीं तां सुदक्षिणा साक्षतपात्रहस्ता ।
प्रणम्य चानर्च विशालमस्याः शृङ्गान्तरं द्वारमिवार्थसिद्धेः ।। 21 ।।

वत्सोत्सुकापि स्तिमिता सपर्यां प्रत्यग्रहीत् सेति ननन्दतुस्तौ ।
भक्त्योपपन्नेषु हि तद्विधानां प्रसादचिह्नानि पुरःफलानि ।। 22 ।।

गुरोः सदारस्य निपीड्य पादौ समाप्य सान्ध्यञ्च विधिं दिलीपः ।
दोहावसाने पुनरेव दोग्ध्रीं भेजे भुजोच्छिन्नरिपुर्निषण्णाम् ।। 23 ।।

तामन्तिकन्यस्तबलिप्रदीपामन्वास्य गोप्ता गृहिणीसहायः ।
क्रमेण सुप्तामनुसंविवेश सुप्तोत्थितां प्रातरनूदतिष्ठत् ।। 24 ।।

इत्थं व्रतं धारयतः प्रजार्थं समं महिष्या महनीयकीर्तेः ।
सप्त व्यतीयुस्त्रिगुणानि तस्य दिनानि दीनोद्धरणोचितस्य ।। 25 ।।

अन्येद्युरात्मानुचरस्य भावं जिज्ञासमाना मुनिहोमधेनुः ।
गङ्गाप्रपातान्तविरूढशष्पं गौरीगुरोर्गह्वरमाविवेश ।। 26 ।।

सा दुष्प्रधर्षा मनसाऽपि हिंस्त्रैरित्यद्रिशोभाप्रहितेक्षणेन ।
अलक्षिताभ्युत्पतनो नृपेण प्रसह्य सिंहः किल तां चकर्ष ।। 27 ।।

तदीयमाक्रन्दितमार्तसाधोर्गुहानिबद्धप्रतिशब्ददीर्घम् ।
रश्मिष्विवादाय नगेन्द्रसक्तां निवर्तयामास नृपस्य दृष्टिम् ।। 28 ।।

स पाटलायां गवि तस्थिवांसं धनुर्धरः केसरिणं ददर्श ।
अधित्यकायामिव धातुमय्यां लोध्रद्रुमं सानुमतः प्रफुल्लं ।। 29 ।।

ततो मृगेन्द्रस्य मृगेन्द्रगामी वधाय वध्यस्य शरं शरण्यः ।
जाताभिषङ्गो नृपतिर्निषङ्गादुद्धर्तुमैच्छत्प्रसभोद्धृतारिः ।। 30 ।।

वामेतरस्तस्य करः प्रहर्तुर्नखप्रभाभूषितकङ्कपत्त्रे ।
सक्ताङ्गुलिः सायकपुङ्ख एव चित्रार्पितारम्भ इवावतस्थे ।। 31 ।।

बाहुप्रतिष्टम्भविवृद्धमन्युरभ्यर्णमागस्कृतमस्पृशद्भिः ।
राजा स्वतेजोभिरदह्यतान्तर्भोगीव मन्त्रौषधिरुद्धवीर्यः ।। 32 ।।

तमार्यगृह्यं निगृहीतधेनुर्मनुष्यवाचा मनुवंशकेतुम् ।
विस्माययन्विस्मितमात्मवृत्तौ सिंहोरुसत्त्वं निजगाद सिंहः ।। 33 ।।

अलं महीपाल तव श्रमेण प्रयुक्तमप्यस्त्रमितो वृथा स्यात् ।
न पादपोन्मूलनशक्ति रंहः शिलोच्चये मूर्च्छति मारुतस्य ।। 34 ।।

कैलासगौरं वृषमारुरुक्षोः पादार्पणानुग्रहपूतपृष्ठम् ।
अवेहि मां किंकरमष्टमूर्तेः कुम्भोदरं नाम निकुम्भमित्रम् ।। 35 ।।

अमुं पुरः पश्यसि देवदारुं पुत्रीकृतोऽसौ वृषभध्वजेन ।
यो हेमकुम्भस्तननिःसृतानां स्कन्दस्य मातुः पयसां रसज्ञः ।। 36 ।।

कण्डूयमानेन कटं कदाचिद्वन्यद्विपेनोन्मथिता त्वगस्य ।
अथैनमद्रेस्तनया शुशोच सेनान्यमालीढमिवासुरास्त्रैः ।। 37 ।।

तदा प्रभृत्येव वनद्विपानां त्रासार्थमस्मिन्नहमद्रिकुक्षौ ।
व्यापारितः शूलभृता विधाय सिंहत्वमङ्कागतसत्त्ववृत्ति ।। 38 ।।

तस्यालमेषा क्षुधितस्य तृप्त्यै प्रदिष्टकाला परमेश्वरेण ।
उपस्थिता शोणितपारणा मे सुरद्विषश्चान्द्रमसी सुधेव ।। 39 ।।

स त्वं निवर्तस्व विहाय लज्जां गुरोर्भवान्दर्शितशिष्यभक्तिः ।
शस्त्रेण रक्ष्यं यदशक्यरक्षं न तद्यशः शस्त्रभृतां क्षिणोति ।। 40 ।।

इति प्रगल्भं पुरुषाधिराजो मृगाधिराजस्य वचो निशम्य ।
प्रत्याहतास्त्रो गिरिशप्रभावादात्मन्यवज्ञां शिथिलीचकार ।। 41 ।।

प्रत्यब्रवीच्चैनमिषुप्रयोगे तत्पूर्वभङ्गे वितथप्रयत्नः ।
जडीकृतस्त्र्यम्बकवीक्षणेन वज्रं मुमुक्षन्निव वज्रपाणिः ।। 42 ।।

संरुद्धचेष्टस्य मृगेन्द्र कामं हास्यं वचस्तद्यदहं विवक्षुः ।
अन्तर्गतं प्राणभृतां हि वेद सर्वं भवान्भावमतोऽभिधास्ये ।। 43 ।।

मान्यः स मे स्थावरजङ्गमानां सर्गस्थितिप्रत्यवहारहेतुः ।
गुरोरपीदं धनमाहिताग्नेर्नश्यत्पुरस्तादनुपेक्षणीयम् ।। 44 ।।

स त्वं मदीयेन शरीरवृत्तिं देहेन निर्वर्तयितुं प्रसीद ।
दिनावसानोत्सुकबालवत्सा विसृज्यतां धेनुरियं महर्षेः ।। 45 ।।

अथान्धकारं गिरिगह्वराणां दंष्ट्रामयूखैः शकलानि कुर्वन् ।
भूयः स भूतेश्वरपार्श्ववर्ती किंचिद्विहस्यार्थपतिं बभाषे ।। 46 ।।

एकातपत्रं जगतः प्रभुत्वं नवं वयः कान्तमिदं वपुश्च ।
अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढः प्रतिभासि मे त्वम् ।। 47 ।।

भूतानुकम्पा तव चेदियं गौरेका भवेत्स्वस्तिमती त्वदन्ते ।
जीवन्पुनः शश्वदुपप्लवेभ्यः प्रजाः प्रजानाथ पितेव पासि ।। 48 ।।

अथैकधेनोरपराधचण्डाद्गुरोः कृषानुप्रतिमाद्बिभेषि ।
शक्योऽस्य मन्युर्भवता विनेतुं गाः कोटिशः स्पर्शयता घटोघ्नीः ।। 49 ।।

तद्रक्ष कल्याणपरंपराणां भोक्तारमूर्जस्वलमात्मदेहम् ।
महीतलस्पर्शनमात्रभिन्नं ऋद्धं हि राज्यं पदमैन्द्रमाहुः ।। 50 ।।

एतावदुक्त्वा विरते मृगेन्द्रे प्रतिस्वनेनास्य गुहागतेन ।
शिलोच्चयोऽपि क्षितिपालमुच्चैः प्रीत्या तमेवार्थमभाषतेव ।। 51 ।।

निशम्य देवानुचरस्य वाचं मनुष्यदेवः पुनरप्युवाच ।
धेन्वा तदध्यासितकातराक्ष्या निरीक्ष्यमाणः सुतरां दयालुः ।। 52 ।।

क्षतात्किल त्रायत इत्युदग्रः क्षत्रस्य शब्दो भुवनेषु रूढः ।
राज्येन किं तद्विपरीतवृत्तेः प्राणैरुपक्रोशमलीमसैर्वा ।। 53 ।।

कथं नु शक्योऽनुनयो महर्षेर्विश्राणनाच्चान्यपयस्विनीनाम् ।
इमामनूनां सुरभेरवेहि रुद्रौजसा तु पहृतं त्वयास्याम् ।। 54 ।।

सेयं स्वदेहार्पणनिष्क्रयेण न्याय्या मया मोचयितुं भवत्तः ।
न पारणा स्याद्विहता तवैवं भवेदलुप्तश्च मुनेः क्रियार्थः ।। 55 ।।

भवानपीदं परवानवैति महान्हि यत्नस्तव देवदारौ ।
स्थातुं नियोक्तुर्न हि शक्यमग्रे विनाश्य रक्ष्यं स्वयमक्षतेन ।। 56 ।।

किमप्यहिंस्यस्तव चेन्मतोऽहं यशःशरीरे भव मे दयालुः ।
                
एकान्तविधंसिषु मद्विधानां पिण्डेष्वनास्था खलु भौतिकेषु ।। 57 ।।

संबन्धमाभाषणपूर्वमाहुर्वृत्तः स नौ संगतयोर्वनान्ते ।
तद्भूतनाथानुग नार्हसि त्वं संबन्धिनो मे प्रणयं विहन्तुम् ।। 58 ।।

तथेति गामुक्तवते दिलीपः सद्यः प्रतिष्टम्भविमुक्तबाहुः ।
स न्यस्त शस्त्रो हरये स्वदेहमुपानयत्पिण्डमिवामिषस्य ।। 59 ।।

तस्मिन्क्षणे पालयितुः प्रजानामुत्पश्यतः सिंहनिपातमुग्रम् ।
अवाङ्मुखस्योपरि पुष्पवृष्टिः पपात विद्याधरहस्तमुक्ता ।। 60 ।।

उत्तिष्ठ वत्सेत्यमृतायमानं वचो निशम्योत्थितमुत्थितः सन् ।
ददर्श राजा जननीमिव स्वां गामग्रतः प्रस्रविणीं न सिंहम् ।। 61 ।।

तं विस्मितं धेनुरुवाच साधो मायां मयोद्भाव्य परीक्षितोऽसि ।
ऋषिप्रभावान्मयि नान्तकोऽपि प्रभुः प्रहर्तुं किमुतान्यहिंस्राः ।। 62 ।।

भक्त्या गुरौ मय्यनुकम्पया च प्रीतास्मि ते पुत्र वरं वृणीष्व ।
न केवलानां पयसां प्रसूतिमवेहि मां कामदुधां प्रसन्नाम् ।। 63 ।।

ततः समानीय समानितार्थी हस्तौ स्वहस्तार्जितवीरशब्दः ।
वंशस्य कर्तारमनन्तकीर्तिं सुदक्षिणायां तनयं ययाचे ।। 64 ।।

संतानकामाय तथेति कामं राज्ञे प्रतिश्रुत्य पयस्विनी सा ।
दुग्ध्वा पयः पत्त्रपुटे मदीयं पुत्रोपभुङ्क्ष्वेति तमादिदेश ।। 65 ।।

वत्सस्य होमार्थविधेश्च शेषं ऋषेरनुज्ञामधिगम्य मातः ।
औधस्यमिच्छामि तवोपभोक्तुं षष्ठांशमुर्व्या इव रक्षितायाः ।। 66 ।।

इत्थं क्षितीशेन वसिष्ठधेनुर्विज्ञापिता प्रीततरा बभूव ।
तदन्विता हैमवताच्च कुक्षेः प्रत्याययावाश्रममश्रमेण ।। 67 ।।

तस्याः प्रसन्नेन्दुमुखः प्रसादं गुरुर्नृपाणां गुरवे निवेद्य ।
प्रहर्षचिह्नानुमितं प्रियायै शशंस वाचा पुनरुक्तयेव ।। 68 ।।

स नन्दिनीस्तन्यमनिन्दितात्मा सद्वत्सलो वत्सहुतावशेषम् ।
पपौ वसिष्ठेन कृताभ्यनुज्ञः शुभ्रं यशो मूर्तमिवातितृष्णः ।। 69 ।।

प्रातर्यथोक्तव्रतपारणान्ते प्रास्थानिकं स्वस्त्ययनं प्रयुज्य ।
तौ दंपती स्वां प्रति राजधानीं प्रस्थापयामास वशी वसिष्ठः ।। 70 ।।

प्रदक्षिणीकृत्य हुतं हुताशमनन्तरं भर्तुररुन्धतीं च ।
धेनुं सवत्सां च नृपः प्रतस्थे सन्मङ्गलोदग्रतरप्रभावः ।। 71 ।।

श्रोत्राभिरामध्वनिना रथेन स धर्मपत्नीसहितः सहिष्णुः ।
ययावनुद्घातसुखेन मार्गं स्वेनेव पूर्णेन मनोरथेन ।। 72 ।।

तमाहितौत्सुक्यमदर्शनेन प्रजाः प्रजार्थव्रतकर्शिताङ्गम् ।
नेत्रैः पपुस्तृप्तिमनाप्नुवद्भिर्नवोदयं नाथं इवौषधीनाम् ।। 73 ।।

पुरंदरश्रीः पुरमुत्पताकं प्रविश्य पौरैरभिनन्द्यमानः ।
भुजे भुजंगेन्द्रसमानसारे भूयः स भूमेर्धुरमाससञ्ज ।। 74 ।।

अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरिव द्यौः
         सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतनैशम् ।
नरपतिकुलभूत्यै गर्भमाधत्त राज्ञी
         गुरुभिरभिनिविष्टं लोकपालानुभावैः ।। 75 ।।

गुरुवार, 25 अप्रैल 2019

रघुवंशम् प्रथमः सर्गः


वागर्थाविव संपृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये ।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ ॥ १-१॥
अन्वय- वागर्थाविव सम्पृक्तौ जगतः पितरौ पार्वतीपरमेश्वरौ वागर्थप्रतिपत्तये वन्दे।


शब्दार्थ - शब्द और अर्थ के समान एकरूप और संसार के माता पिता पार्वती  और शिव  को शब्द और अर्थ का ठीक-ठीक ज्ञान तथा व्यवहार करने के लिए मैं कालिदास प्रणाम करता हूं ।

क्व सूर्यप्रभवो वंशः क्व चाल्पविषया मतिः ।
तितीर्षुर्दुस्तरं मोहादुडुपेनास्मि सागरम् ॥ १-२॥
अन्वय- सूर्यप्रभवः वंशः क्व अल्पविषया (मम) मतिश्च क्व (अहम्) मोहाद् दुस्तरं सागरं उडुपेन तितिर्षुः (अस्मि)।

शब्दार्थ -  सूर्य से उत्पन्न हुआ वह तेजस्वी वंश कहां और कहां मेरी मंदबुद्धि । (मैं रघु के वंश का वर्णन करने से सर्वथा अयोग्य हूं फिर भी मेरी मूर्खता है कि) मैं उसी तरह इसे पार करना चाहता हूं जैसे कोई छोटी सी नाव से अपार समुद्र को पार करने की इच्छा कर रहा हो।

मन्दः कवियशः प्रार्थी गमिष्याम्युपहास्यताम् ।
प्रांशुलभ्ये फले लोभादुद्बाहुरिव वामनः ॥ १-३॥
अन्वय- मन्दः कवियशः प्रार्थी प्रांसुलभ्ये फले लोभादुद्वाहुना वामनेनेव उपहास्यतां गंस्यते।
शब्दार्थ - बड़े बड़े कवियों के यश को चाहने वाला मंदबुद्धि मैं उसी प्रकार हंसी को प्राप्त होगा जैसे कि लंबे मनुष्य के पहुंचने योग्य फल की ओर फल तोड़ने के लिए हाथ ऊपर ऊपर हाथ फैलाए बोना ।

अथवा कृतवाग्द्वारे वंशेऽस्मिन्पूर्वसूरिभिः ।
मणौ वज्रसमुत्कीर्णे सूत्रस्येवास्ति मे गतिः ॥ १-४॥

शब्दार्थ - बाल्मीकि आदि पूर्व कवियों सूर्यवंश पर रामायण आदि लिखकर बाणी का द्वार पहले ही खोल दिया है इसलिए उस में प्रवेश कर जाना तथा सूर्यवंश का पुनः वर्णन करना मेरे लिए वैसा ही सरल है जिस प्रकार हीरे की तनी से बंधे हुए मणि में धागा पिरोना सरल है।

सोऽहमाजन्मशुद्धानामाफलोदयकर्मणाम् ।
आसमुद्रक्षितीशानामानाकरथवर्त्मनाम् ॥ १-५॥

यथाविधिहुताग्नीनां यथाकामार्चितार्थिनाम् ।
यथापराधदण्डानां यथाकालप्रबोधिनाम् ॥ १-६॥

त्यागाय संभृतार्थानां सत्याय मितभाषिणाम् ।
यशसे विजिगीषूणां प्रजायै गृहमेधिनाम् ॥ १-७॥

शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् ।
वार्द्धके मुनिवृत्तीनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ॥ १-८॥

रघूणामन्वयं वक्ष्ये तनुवाग्विभवोऽपि सन् ।
तद्गुणैः कर्णमागत्य चापलाय प्रचोदितः ॥ १-९॥

तं सन्तः श्रोतुमर्हन्ति सदसद्व्यक्तिहेतवः ।
हेम्नः संलक्ष्यते ह्यग्नौ विशुद्धिः श्यामिकाऽपि वा ॥ १-१०॥

वैवस्वतो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् ।
आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥ १-११॥

तदन्वये शुद्धिमति प्रसूतः शुद्धिमत्तरः ।
दिलीप इति राजेन्दुरिन्दुः क्षीरनिधाविव ॥ १-१२॥

व्यूढोरस्को वृषस्कन्धः शालप्रांशुर्महाभुजः ।
आत्मकर्मक्षमं देहं क्षात्रो धर्म इवाश्रितः ॥ १-१३॥

सर्वातिरिक्तसारेण सर्वतेजोऽभिभाविना ।
स्थितः सर्वोन्नतेनोर्वीं क्रान्त्वा मेरुरिवात्मना ॥ १-१४॥

आकारसदृशप्रज्ञः प्रज्ञया सदृशागमः ।
आगमैः सदृशारम्भ आरम्भसदृशोदयः ॥ १-१५॥

भीमकान्तैर्नृपगुणैः स बभूवोपजीविनाम् ।
अधृष्यश्चाभिगम्यश्च यादोरत्नैरिवार्णवः ॥ १-१६॥

रेखामात्रमपि क्षुण्णादा मनोर्वर्त्मनः परम् ।
न व्यतीयुः प्रजास्तस्य नियन्तुर्नेमिवृत्तयः ॥ १-१७॥

प्रजानामेव भूत्यर्थं स ताभ्यो बलिमग्रहीत् ।
सहस्रगुणमुत्स्रष्टुमादत्ते हि रसं रविः ॥ १-१८॥

सेना परिच्छदस्तस्य द्वयमेवार्थसाधनम् ।
शास्त्रेष्वकुण्ठिता बुद्धिर्मौर्वी धनुषि चातता ॥ १-१९॥

तस्य संवृतमन्त्रस्य गूढाकारेङ्गितस्य च ।
फलानुमेयाः प्रारम्भाः संस्काराः प्राक्तना इव ॥ १-२०॥

जुगोपात्मानमत्रस्तः भेजे धर्ममनातुरः ।
अगृध्नुराददे सोऽर्थमसक्तः सुखमन्वभूत् ॥ १-२१॥

ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः ।
गुणा गुणानुबन्धित्वात्तस्य सप्रसवा इव ॥ १-२२॥

अनाकृष्टस्य विषयैर्विद्यानां पारदृश्वनः ।
तस्य धर्मरतेरासीद्वृद्धत्वं जरसा विना ॥ १-२३॥

प्रजानां विनयाधानाद्रक्षणाद्भरणादपि ।
स पिता पितरस्तासां केवलं जन्महेतवः ॥ १-२४॥

स्थित्यै दण्डयतो दण्ड्यान्परिणेतुः प्रसूतये ।
अप्यर्थकामौ तस्यास्तां धर्म एव मनीषिणः ॥ १-२५॥

दुदोह गां स यज्ञाय सस्याय मघवा दिवम् ।
सम्पद्विनियमेनोभौ दधतुर्भुवनद्वयम् ॥ १-२६॥

न किलानुनयुस्तस्य राजानो रक्षितुर्यशः ।
व्यावृत्ता यत्परस्वेभ्यः श्रुतौ तस्करता स्थिता ॥ १-२७॥

द्वेष्योऽपि सम्मतः शिष्टस्तस्यार्तस्य यथौषधम् ।
त्याज्यो दुष्टः प्रियोऽप्यासीदङ्गुलीवोरगक्षता ॥ १-२८॥

तं वेधा विदधे नूनं महाभूतसमाधिना ।
तथा हि सर्वे तस्यासन्परार्थैकफला गुणाः ॥ १-२९॥

स वेलावप्रवलयां परिखीकृतसागराम् ।
अनन्यशासनामुर्वीं शशासैकपुरीमिव ॥ १-३०॥

तस्य दाक्षिण्यरूढेन नाम्ना मगधवंशजा ।
पत्नी सुदक्षिणेत्यासीदध्वरस्येव दक्षिणा ॥ १-३१॥

कलत्रवन्तमात्मानमवरोधे महत्यपि ।
तया मेने मनस्विन्या लक्ष्म्या च वसुधाधिपः ॥ १-३२॥

तस्यामात्मानुरूपायामात्मजन्मसमुत्सुकः ।
विलम्बितफलैः कालं स निनाय मनोरथैः ॥ १-३३॥

सन्तानार्थाय विधये स्वभुजादवतारिता ।
तेन धूर्जगतो गुर्वी सचिवेषु निचिक्षिपे ॥ १-३४॥

अथाभ्यर्च विधातारं प्रयतौ पुत्रकामया ।
तौ दम्पती वसिष्ठस्य गुरोर्जग्मतुराश्रमम् ॥ १-३५॥

स्निग्धगम्भीरनिर्घोषमेकं स्यन्दनमाश्रितौ ।
प्रावृषेण्यं पयोवाहं विद्युदैरावताविव ॥ १-३६॥

मा भूदाश्रमपीडेति परिमेयपुरस्सरौ ।
अनुभावविशेषात्तु सेनापरिवृताविव ॥ १-३७॥

सेव्यमानौ सुखस्पर्शैः शालनिर्यासगन्धिभिः ।
पुष्परेणूत्किरैर्वातैराधूतवनराजिभिः ॥ १-३८॥

मनोभिरामाः शृण्वन्तौ रथनेमिस्वनोन्मुखैः ।
षड्जसंवादिनीः केका द्विधा भिन्नाः शिखण्डिभिः ॥ १-३९॥

परस्पराक्षिसादृश्यमदूरोज्झितवर्त्मसु ।
मृगद्वन्द्वेषु पश्यन्तौ स्यन्दनाबद्धदृष्टिषु ॥ १-४०॥

श्रेणीबन्धाद्वितन्वद्भिरस्तम्भां तोरणस्रजम् ।
सारसैः कलनिर्ह्रादैः क्वचिदुन्नमिताननौ ॥ १-४१॥

पवनस्यानुकूलत्वात्प्रार्थनासिद्धिशंसिनः ।
रजोभिस्तुरगोत्कीर्णैरस्पृष्टालकवेष्टनौ ॥ १-४२॥

सरसीष्वरविन्दानां वीचिविक्षोभशीतलम् ।
आमोदमुपजिघ्रन्तौ स्वनिःश्वासानुकारिणम् ॥ १-४३॥

ग्रामेष्वात्मविसृष्टेषु यूपचिह्नेषु यज्वनाम् ।
अमोघाः प्रतिगृह्णन्तावर्घ्यानुपदमाशिषः ॥ १-४४॥

हैयङ्गवीनमादाय घोषवृद्धानुपस्थितान् ।
नामधेयानि पृच्छन्तौ वन्यानां मार्गशाखिनाम् ॥ १-४५॥

काप्यभिख्या तयोरासीद्व्रजतोः शुद्धवेषयोः ।
हिमनिर्मुक्तयोर्योगे चित्राचन्द्रमसोरिव ॥ १-४६॥

तत्तद्भूमिपतिः पत्न्यै दर्शयन्प्रियदर्शनः ।
अपि लङ्घितमध्वानं बुबुधे न बुधोपमः ॥ १-४७॥

स दुष्प्रापयशाः प्रापदाश्रमं श्रान्तवाहनः ।
सायं संयमिनस्तस्य महर्षेर्महिषीसखः ॥ १-४८॥

वनान्तरादुपावृत्तैः समित्कुशफलाहरैः ।
पूर्यमाणमदृश्याग्निप्रत्युद्यात्यैस्तपस्विभिः ॥ १-४९॥

आकीर्णमृषिपत्नीनामुटजद्वाररोधिभिः ।
अपत्यैरिव नीवारभागधेयोचितैर्मृगैः ॥ १-५०॥

सेकान्ते मुनिकन्याभिस्तत्क्षणोज्झितवृक्षकम् ।
विश्वासाय विहङ्गानामालवालाम्बुपायिनम् ॥ १-५१॥

आतपात्ययसंक्षिप्तनीवारासु निषादिभिः ।
मृगैर्वर्तितरोमन्थमुटजाङ्गनभूमिषु ॥ १-५२॥

अभ्युत्थिताग्निपिशुनैरतिथीनाश्रमोन्मुखान् ।
पुनानं पवनोद्धूतैर्धूमैराहुतिगन्धिभिः ॥ १-५३॥

अथ यन्तारमादिश्य धुर्यान्विश्रामयेति सः ।
तामवारोहयत्पत्नीं रथादवततार च ॥ १-५४॥

तस्मै सभ्याः सभार्याय गोप्त्रे गुप्ततमेन्द्रियाः ।
अर्हणामर्हते चक्रुर्मुनयो नयचक्षुषे ॥ १-५५॥

विधेः सायन्तनस्यान्ते स ददर्श तपोनिधिम् ।
अन्वासितमरुन्धत्या स्वाहयेव हविर्भुजम् ॥ १-५६॥

तयोर्जगृहतुः पादान्राजा राज्ञी च मागधी ।
तौ गुरुर्गुरुपत्नी च प्रीत्या प्रतिननन्दतुः ॥ १-५७॥

तमातिथ्यक्रियाशान्तरथक्षोभपरिश्रमम् ।
पप्रच्छ कुशलं राज्ये राज्याश्रममुनिं मुनिः ॥ १-५८॥

अथाथर्वनिधेस्तस्य विजितारिपुरः पुरः ।
अर्थ्यामर्थपतिर्वाचमाददे वदतां वरः ॥ १-५९॥

उपपन्नं ननु शिवं सप्तस्वङ्गेषु यस्य मे ।
दैवीनां मानुषीणां च प्रतिकर्ता त्वमापदाम् ॥ १-६०॥

तव मन्त्रकृतो मन्त्रैर्दूरात्प्रशमितारिभिः ।
प्रत्यादिश्यन्त इव मे दृष्टलक्ष्यभिदः शराः ॥ १-६१॥

हविरावर्जितं होतस्त्वया विधिवदग्निषु ।
वृष्टिर्भवति सस्यानामवग्रहविशोषिणाम् ॥ १-६२॥

पुरुषायुष्यजीविन्यो निरातङ्का निरीतयः ।
यन्मदीयाः प्रजास्तस्य हेतुस्त्वद्ब्रह्मवर्चसम् ॥ १-६३॥

त्वयैवं चिन्त्यमानस्य गुरुणा ब्रह्मयोनिना ।
सानुबन्धाः कथं न स्युः संपदो मे निरापदः ॥ १-६४॥

किन्तु वध्वां तवैतस्यामदृष्टसदृशप्रजम् ।
न मामवति सद्वीपा रत्नसूरपि मेदिनी ॥ १-६५॥

नूनं मत्तः परं वंश्याः पिण्डविच्छेददर्शिनः ।
न प्रकामभुजः श्राद्धे स्वधासंग्रहतत्पराः ॥ १-६६॥

मत्परं दुर्लभं मत्वा नूनमावर्जितं मया ।
पयः पूर्वैः स्वनिःश्वासैः कवोष्णमुपभुज्यते ॥ १-६७॥

सोऽहमिज्याविशुद्धात्मा प्रजालोपनिमीलितः ।
प्रकाशश्चाप्रकाशश्च लोकालोक इवाचलः ॥ १-६८॥

लोकान्तरसुखं पुण्यं तपोदानसमुद्भवम् ।
संततिः शुद्धवंश्या हि परत्रेह च शर्मणे ॥ १-६९॥

तया हीनं विधातर्मां कथं पश्यन्न दूयसे ।
सिक्तं स्वयमिव स्नेहाद्वन्ध्यमाश्रमवृक्षकम् ॥ १-७०॥

असह्यपीडं भगवनृणमन्त्यमवेहि मे ।
अरुन्तुदमिवालानमनिर्वाणस्य दन्तिनः ॥ १-७१॥

तस्मान्मुच्ये यथा तात संविधातुं तथार्हसि ।
इक्ष्वाकूणां दुरापेऽर्थे त्वदधीना हि सिद्धयः ॥ १-७२॥

इति विज्ञापितो राज्ञा ध्यानस्तिमितलोचनः ।
क्षणमात्रमृषिस्तस्थौ सुप्तमीन इव ह्रदः ॥ १-७३॥

सोऽपश्यत्प्रणिधानेन सन्ततेः स्तम्भकारणम् ।
भावितात्मा भुवो भर्तुरथैनं प्रत्यबोधयत् ॥ १-७४॥

पुरा शक्रमुपस्थाय तवोर्वीं प्रति यास्यतः ।
आसीत्कल्पतरुच्छायामाश्रिता सुरभिः पथि ॥ १-७५॥

धर्मलोपभयाद्राज्ञीमृतुस्नातामनुस्मरन् ।
प्रदक्षिणक्रियार्हायां तस्यां त्वं साधु नाचरः ॥ १-७६॥

अवजानासि मां यस्मादतस्ते नाभविष्यति ।
मत्प्रसूतिमनाराध्य प्रजेति त्वां शशाप सा ॥ १-७७॥

स शापो न त्वया राजन्न च सारथिना श्रुतः ।
नदत्याकाशगङ्गायाः स्रोतस्युद्दामदिग्गजे ॥ १-७८॥

ईप्सितं तदवज्ञानाद्विद्धि सार्गलमात्मनः ।
प्रतिबध्नाति हि श्रेयः पूज्यपूजाव्यतिक्रमः ॥ १-७९॥

हविषे दीर्घसत्रस्य सा चेदानीं प्रचेतसः ।
भुजङ्गपिहितद्वारं पातालमधितिष्ठति ॥ १-८०॥

सुतां तदीयां सुरभेः कृत्वा प्रतिनिधिं शुचिः ।
आराधय सपत्नीकः प्रीता कामदुघा हि सा ॥ १-८१॥

इति वादिन एवास्य होतुराहुतिसाधनम् ।
अनिन्द्या नंदिनी नाम धेनुराववृते वनात् ॥ १-८२॥

ललाटोदयमाभुग्नं पल्लवस्निग्धपाटला ।
बिभ्रती श्वेतरोमाङ्कं सन्ध्येव शशिनं नवम् ॥ १-८३॥

भुवं कोष्णेन कुण्डोध्नी मेध्येनावभृथादपि ।
प्रस्रवेणाभिवर्षन्ती वत्सालोकप्रवर्तिना ॥ १-८४॥

रजःकणैः खुरोद्धूतैः स्पृशद्भिर्गात्रमन्तिकात् ।
तीर्थाभिषेकजां शुद्धिमादधाना महीक्षितः ॥ १-८५॥

तां पुण्यदर्शनां दृष्ट्वा निमित्तज्ञस्तपोनिधिः ।
याज्यमाशंसितावन्ध्यप्रार्थनं पुनरब्रवीत् ॥ १-८६॥

अदूरवर्तिनीं सिद्धिं राजन् विगणयात्मनः ।
उपस्थितेयं कल्याणी नाम्नि कीर्तित एव यत् ॥ १-८७॥

वन्यवृत्तिरिमां शश्वदात्मानुगमनेन गाम् ।
विद्यामभ्यसनेनेव प्रसादयितुमर्हसि ॥ १-८८॥

प्रस्थितायां प्रतिष्ठेथाः स्थितायां स्थितिमाचरेः ।
निषण्णायां निषीदास्यां पीताम्भसि पिबेरपः ॥ १-८९॥

वधूर्भक्तिमती चैनामर्चितामा तपोवनात् ।
प्रयता प्रातरन्वेतु सायं प्रत्युद्व्रजेदपि ॥ १-९०॥

इत्याप्रसादादस्यास्त्वं परिचर्यापरो भव ।
अविघ्नमस्तु ते स्थेयाः पितेव धुरि पुत्रिणाम् ॥ १-९१॥

तथेति प्रतिजग्राह प्रीतिमान्सपरिग्रहः ।
आदेशं देशकालज्ञः शिष्यः शासितुरानतः ॥ १-९२॥

अथ प्रदोषे दोषज्ञः संवेशाय विशांपतिम् ।
सूनुः सूनृतवाक्स्रष्टुर्विससर्जोर्जितश्रियम् ॥ १-९३॥

सत्यामपि तपःसिद्धौ नियमापेक्षया मुनिः ।
कल्पवित्कल्पयामास वन्यामेवास्य संविधाम् ॥ १-९४॥

निर्दिष्टां कुलपतिना स पर्णशाला-
मध्यास्य प्रयतपरिग्रहद्वितीयः ।
तच्छिष्याध्यननिवेदितावसानां
संविष्टः कुशशयने निशां निनाय ॥ १-९५॥

॥ इति कालिदासकृते रघुवंशमहाकाव्ये प्रथमः सर्गः ॥