लघुसिद्धान्तकौमुदी (स्‍त्रीप्रत्‍ययप्रकरणम्)

                                                               प्राक्कथन
       वरदराजाचार्य ने स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् को लघुसिद्धान्तकौमुदी के सबसे अंत में रखा है। इसका एक कारण यह है कि तब तक छात्र सन्धि, सुबन्त, तिङन्त, तद्धितान्त, कृदन्त आदि पदों के निर्माण की प्रक्रिया से भली- भाँति परिचित हो जाता है। स्त्री प्रत्यय के बाद सु आदि विभक्तियों की उत्पत्ति होती है। टाप्, डाप्, चाप्, ङीप्, ङीष्, ङीन्, ऊङ् और ति प्रत्यय के बाद आकारान्त, ईकारान्त, ऊकारान्त तथा इकारान्त शब्द बनते हैं। इनका शब्द रूप हम अजन्तस्त्रीलिंगप्रकरण में पढ़ चुके होते हैं।
           स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् में सन्धि का प्रयोग बहुधा होता है। आप पूर्व के पाठ में पढ़ चुके प्रत्ययों के इत् संज्ञक वर्णों के कारण वृद्धि आदि कार्य देख चुके होंगे । अनेक स्थलों पर हमें पूर्व के प्रकरणों में आये सूत्रों को स्मरण करने की आवश्यकता पड़ती है। अन्यथा रूप सिद्धि समझने में कठिनाई आती है। त्रिलोकी जैसे रूपों की सिद्धि के समय समास की समझ होनी चाहिए। अनड्वाही में ङीष् प्रत्यय होने के साथ साथ आम् का आगम भी होता है। यदि हमें तत्काल मिदचोऽन्त्यात्परः सूत्र स्मरण में नहीं आया तो हम यह निर्णय लेने में असमर्थ रहते हैं कि अनडुह् शब्द से आम् का जो आगम होगा वह अनडुह् के बाद होगा या अनडुह् के ह् के पूर्व। यदि अनडुह् के बाद आम् का आगम किया जाय तो अनड्वाही रूप निष्पन्न नहीं हो सकता ।  अनडुह् के ह् के पूर्व आम् का आगम करने पर रूप सिद्ध हो सकता है, परन्तु इसका नियम स्मरण नहीं आता। यहाँ यण् करने के लिए भी सूत्र स्मरण करना पड़ता है। आपको यदि शब्द सिद्धि की प्रक्रिया ज्ञात है तो आप कल्पना कर सकते हैं कि आम् में केवल आ शेष रहने पर ही बात बन सकती है, अतः मकार की इत्संज्ञा करनी पड़ेगी। पुनः आम् में मकार की इत्संज्ञा का प्रयोजन क्या हो सकता है? आप पूर्ववर्ती पाठ को स्मरण किये विना आगे नहीं बढ़ सकते। कुल मिलाकर स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् पढ़ने के पूर्व हमें कुछ आवश्यक सूत्रों को स्मरण करने या आवृत्ति देने की आवश्यकता होगा। ऐसे महत्वपूर्ण सूत्रों की सूची यहाँ दी जा रहा है। इसे आप अवश्य पुनः स्मरण करके स्त्रीप्रत्ययप्रकरणम् पढ़ना आरम्भ करें
              सूत्र                          कार्य                                                                

हलन्त्यम् -                   इत्संज्ञा                      मिदचोऽन्त्यात्परः
लशक्वतद्धिते -               इत्संज्ञा                       यचि भम्
उपदेशेऽजनुनासिक इत्    इत्संज्ञा                       यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम्‌
तस्य लोपः -                 लोप
अकः सवर्णे दीर्घः   -       दीर्घ                                                        
अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्                                 
ङ्याप्प्रातिपदिकात्
प्रत्ययः
परश्च
यस्येति च
शप्श्यनोर्नित्यम्
चरेष्टः

            प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण करने मात्र तक की जानकारी प्राप्त करने के उद्देश्य से यहाँ आ चुके लोगों के लिए इस प्रकरण के अंत में एक तोता रटंत विद्या दी जा रहा है, यह आपके काम आ सकेगा। सूक्ष्म प्रश्न पूछे जाने पर यह विद्या काम नहीं आएगी।  इसके लिए विधिवत् स्त्रीप्रत्यय की प्रक्रिया समझनी पड़ेगी।


१२५१ स्‍त्रियाम्

अधिकारोऽयम् । समर्थानामिति यावत् ।।

यह अधिकार सूत्र है। स्त्रियाम् सूत्र का अधिकार समर्थानां प्रथमाद्वा (पा.4.1.82) तक है। अर्थात् अष्टाध्यायी के 4.1.82 तक कहे गये प्रत्यय स्त्रीत्व बोधक प्रत्यय होंगें।
इस सूत्र के अधिकार में टाप्, डाप्, चाप्, ङीप्, ङीष्, ङीन्, ऊङ् और ति प्रत्यय आते हैं।  टाप्, डाप्, चाप् प्रत्ययों को संक्षेप में आप् तथा ङीप्, ङीष्, ङीन् को संक्षेप में ङी कहा जाता है।  इसका निर्देश हमें हल्ङ्याभ्यः, औङ् आपः, आङि चापः आदि सूत्रों से प्राप्त होता है।

स्त्रियाम् सूत्र के अतिरिक्त ङ्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च का भी यहाँ अधिकार है। अतःपुल्लिंग प्रतिपदिक से स्त्री प्रत्यय लगने के बाद सु आदि प्रत्ययों की उत्पत्ति होकर स्त्रीलिंग शब्द निष्पन्न होते हैं। 
१२५२ अजाद्यतष्‍टाप्

अजादीनामकारान्‍तस्‍य च वाच्‍यं यत् स्‍त्रीत्‍वं तत्र द्योत्‍ये टाप् स्‍यात् । अजा । एडका । अश्वा । चटका । मूषिका । बाला । वत्‍सा । होडा । मन्‍दा । विलाता । इत्‍यादि ।। मेधा । गङ्गा । सर्वा ।।

स्त्रीत्व की विवक्षा में अजादि गण में पठित तथा अकारान्त प्रातिपदिक से परे टाप् हो। टाप् के ट् तथा प् इत्संज्ञक हैं। अतः चाप् में आ शेष रहता है।
अजा। अजादि गण में पठित अज शब्द की अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् से प्रातिपदिक संज्ञा हुई। अज इस प्रातिपदिक से अजाद्यतष्टाप् से टाप् प्रत्यय प्राप्त हुआ। यह प्रत्यय ङ्याप्प्रातिपदिकात्, प्रत्ययः, परश्च के अधिकार में है अतः अज के बाद आया।  
अज + टाप् में ट् तथा प् की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हुआ।
अज + आ = अजा । यहाँ अकः सवर्णे दीर्घः से अज के अ+आ के स्थान सवर्ण दीर्घ आ हुआ। अजा रूप सिद्ध हुआ।

इसी प्रकार उपर्युक्त प्रक्रिया के अनुसार एडका, अश्वा, चटका, मन्दा आदि रूप बनेगें।

१२५३ उगितश्‍च

उगिदन्‍तात्‍प्रातिपदिकात् स्‍त्रियां ङीप् स्‍यात् । भवन्‍ती । पचन्‍ती । दीव्‍यन्‍ती ।।

उगिदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् हो। भू धातु से शतृ प्रत्यय के द्वारा भवत् रूप सिद्ध होता है। शतृ में ऋ की इत्संज्ञा उपदेशेऽजनुनासिक इत् से होती है, जो कि उक् प्रत्याहार के अन्तर्गत आता है। अतः भवत् शब्द उगिदन्त है। इसकी प्रातिपदिक संज्ञा हुई। ऐसे उगिदन्त प्रातिपदिक से ङीप् प्रत्यय हुआ। ङीप् में ङकार तथा पकार की इत्संज्ञा लोप होने पर ई शेष रहा। भवत् + ई की स्थिति में शप्श्यनोर्नित्यम् से नुम् का आगम हुआ। नुम् में उकार मकार का अनुबन्ध लोप होने पर नकार शेष रहा। भवन्त् + ई = भवन्ती रूप सिद्ध हुआ।
विशेष- शप्श्यनोर्नित्यम् का अर्थ है- शप् और श्यन् के अकार से परे जो शतृ का अवयव,तदन्त को नुम् हो, शी तथा नदी संज्ञक परे रहते। भ्वादि तथा चुरादि धातुओं से शप् तथा दिवादि से श्यन् प्रत्यय होता है। भू धातु  भ्वादि गण का है अतः यहाँ भू + शप् + शतृ प्रत्यय होता है। अनुबन्ध लोप होने पर भू + अ + अत् = भवत् बना। इस भवत् से ङीप् होने पर भवत् + ई इस अवस्था में प्रस्तुत सूत्र से नुम का आगम होकर भवन्ती रूप बना। इसी प्रकार दिवादि गण के दिव् (दिवु) धातु से दीव्यन्ती रूप बनेगा।

१२५४ टिड्ढाणञ्द्वयसज्दघ्‍नञ्मात्रच्तयप्ठक्ठञ्कञ्क्‍वरपः

अनुपसर्जनं यट्टिदादि तदन्‍तं यददन्‍तं प्रातिपदिकं ततः स्‍त्रियां ङीप्‍स्‍यात् । कुरुचरी । नदट् नदी । देवट् देवी । सौपर्णेयी । ऐन्‍द्री । औत्‍सी । ऊरुद्वयसी । ऊरुदघ्‍नी । ऊरुमात्री । पञ्चतयी । आिक्षकी । लावणिकी । यादृशी । इत्‍वरी ।

अनुपसर्जन (जो गौण न हो) अकारान्त, टिदन्त, ढ, अण्, अञ्, द्वयसच्, दध्नञ्, मात्रच्, तयप्,ठक्, ठञ्, कञ् और क्वरप् प्रत्ययान्त शब्दों से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् हो। ङीप् में ङकार की इत्संज्ञा लशक्वतद्धिते से तथा पकार की इत्संज्ञा हलन्त्यम् से होगी। तस्य लोपः से लोप होकर ई शेष रहेगा।
कुरुचरी। कुरुषु चरति इति कुरुचरः में चर् धातु से अधिकरण सुबन्त उपपद में रहने पर चरेष्टः से ट प्रत्यय हुआ है,जो टित् है। टित् प्रत्यय से निष्पन्न अकारान्त कुरुचर में टिड्ढाणञ् से ङीप् हुआ। कुरुचर + ई । यस्येति च से कुरुचर के अन्त्य अकार का लोप हुआ। कुरुचरी में सु विभक्ति आयी।  कुरुचरी रूप सिद्ध हुआ।
ध्यातव्य है कि इस कुरुचरी का सातों विभक्तियों तथा तीनों वचनों में रूप बनेगें। इसी प्रकार ढ, अण् आदि प्रत्ययों से निष्पन्न अकारान्त शब्दों के उदाहरण दिये गये हैं। इनसे ङीप् प्रत्यय होता है।
 प्रत्ययान्त शब्द   प्रत्यय  ङीप् प्रत्ययान्त शब्द      प्रत्ययान्त              शब्द प्रत्यय    ङीप् प्रत्ययान्त शब्द
नदट्                  टित् =               नदी                   पञ्च                   तयप्                 पञ्चतयी
देवट्                  टित्                   देवी                   अक्ष                   ठक्                    आक्षिकी
सुपर्णा                ढक्                    सौपर्णेयी            प्रस्थ                  ठञ्                    प्रास्थिकी
इन्द्र                   अण्                   ऐन्द्री                 लवण                 ठञ्                    लावणिकी
उत्स                  अञ्                   औत्सी                यादृश्                कञ्                   यादृशी
उरु                    द्वयसच्               उरुद्वयसी            इत्वर                 क्वरप्                  इत्वरी
उरु                    दध्नच्                 उरुदध्नी 
(नञ्स्‍नञीकक्‍ख्‍युंस्‍तरुणतलुनानामुपसंख्‍यानम्)  स्‍त्रैणी । पौंस्‍नी । शाक्तीकी । आढ्यङ्करणी । तरुणी । तलुनी ।।

नञ्, खञ्,ईकक् तथा ख्युन् प्रत्ययान्त, तरूण तथा तलुन शब्दों से स्त्रीलिंग में ङीप् हो। नञ्, खञ् आदि प्रत्ययों से निष्पन्न शब्दों का क्रमशः उदाहरण- 
स्त्रैण शब्द नञ् प्रत्ययान्त है।        स्त्रैण + ङीप् =  स्त्रैणी
पौंस्‍न शब्द खञ् प्रत्ययान्त है।      पौंस्‍न + ङीप् =  पौंस्‍नी ।
शाक्तीक शब्द ईकक् प्रत्ययान्त है। शाक्तीक + ङीप् =  शाक्तीकी । 
आढ्यङ्करणी शब्द ख्युन् प्रत्ययान्त है। आढ्यङ्करण + ङीप् =  आढ्यङ्करणी ।
तरुण + ङीप् = तरुणी  ।
तलुन + ङीप् = तलुनी ।
१२५५ यञश्‍च

यञन्‍तात् स्‍त्रियां ङीप्‍स्‍यात् । अकारलोपे कृते


स्त्रीत्व विवक्षा में यञ् प्रत्ययान्त प्रातिपदिक से परे ङीप् प्रत्यय होता है। गार्ग के अकार का लोप करने पर

१२५६ हलस्‍तद्धितस्‍य

हलः परस्‍य तद्धितयकारस्‍योपधाभूतस्‍य लोप ईकारे परे । गार्गी ।।

हल् से परे तद्धित के उपधाभूत यकार का लोप होता है, ईकार के परे होने पर।

गार्गी । गर्गस्य गोत्रापत्यम् स्त्री इस विग्रह में गर्ग शब्द से अपत्य अर्थ में गर्गादिभ्यो यञ् से यञ् प्रत्यय आदि वृद्धि होकर गार्ग्य बना। स्त्रीत्व विवक्षा में गार्ग्य शब्द से यञश्च से ङीप् प्रत्यय हुआ। ङीप् का अनुबन्ध लोप हुआ। गार्ग्य + ई इस अवस्था में भसंज्ञक अकार का लोप तथा हलस्तद्धितस्य से भसंज्ञक यकार का लोप गार्ग् + ई हुआ। वर्ण सम्मेलन, सु आदि कार्य होकर गार्गी रूप सिद्ध हुआ।
विशेष- गार्गी में अङ्ग संज्ञा तथा भ संज्ञा ये दोनों संज्ञायें प्राप्त होती है । जबकि आकडारादेका संज्ञा (1.4.1) कहता है कि कडाराः कर्मधारये  (2.2.38) सूत्र तक एक की एक ही संज्ञा हो। कडाराः कर्मधारयेसूत्र तक यदि एक ही संज्ञा करेंगें तो शेष सब संज्ञाएं, जो सूत्रकार ने उस सूत्र तक की हैं, व्यर्थ हो जायेंगी।  पुनः संशय होता है कि इस सूत्र से एक की एक संज्ञा हो दो न हो यह तो निर्णीत हो गया परन्तु कौन सी संज्ञा हो?
समाधान करते हैं कि या परानवकाशाश्चअर्थात् जो संज्ञा परया निरवकाशहो उसी की प्रवृत्ति होगी।
यदि दोनों संज्ञाएं सावकाश, भिन्न-भिन्न स्थानों पर प्रवृत्त हो चुका हो  तो परसंज्ञा और यदि एक सावकाश और एक निरवकाश, जिसे प्रवृत्त होने के लिए कोई स्थान नहीं मिला हो तो वह अनवकाश संज्ञा ही प्रवृत्त हो। यह तर्क संगत भी है । जहां दोनों संज्ञाएं सावकाश होंगी वहां विप्रतिषेध होने से विप्रतिषेधे परं कार्यम्1.4.2 द्वारा परसंज्ञा ही प्रवृत्त होनी चाहिए। जहां एक सावकाश और एक निरवकाश होगी। वहां निरवकाश संज्ञा को स्थान देना युक्तिसंगत है। क्योंकि यदि सावकाश संज्ञा वहां पर भी अनवकाश संज्ञा को न होने दें तो उस अनवकाश संज्ञा का करना ही व्यर्थ हो जाये। अतः अनवकाश और सावकाश, दोनों के एक साथ एक ही स्थान पर प्राप्त होने पर अनवकाश संज्ञा ही प्रवृत्त होगी।
 प्रश्न उठता है कि अङ्ग तथा भसंज्ञा भी एकसंज्ञाधिकार में ही हैं अतः इन दोनों संज्ञाओं को एक साथ प्रवृत्त नहीं होना चाहिए। गार्गी में गार्ग् + यञ् इस दशा में प्रत्यय परे रहते यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम्‌ (१.४.१३) से अङ्ग संज्ञा तथा यकारादि प्रत्यय परे रहते यचि भम् से भसंज्ञा दोनों प्राप्त होती है। ज्ञातव्य है कि सर्वनामस्थान संज्ञक प्रत्ययों को छोड़कर सुसे कप्प्रत्यय पर्यन्त यकारादि  अजादि प्रत्यय परे होने पर पूर्वशब्द समुदाय भसंज्ञक होता है। सर्वनामस्थान से तात्पर्य सु, , जस, अम्, औट् तथा शिप्रत्ययों से है। तकारान्त और सकारान्त शब्दों की भी मत्वर्थ प्रत्ययों के परे रहते पूर्व की भसंज्ञा होती है। भसंज्ञा परहोने से अङ्ग संज्ञा को बाध लेगी जिससे कि अङ्ग संज्ञा के अभाव में अङ्गाधिकार में विहित वृद्धि रूप कार्य नहीं हो पायेगा।
 पतंजलि ने पर्यायः प्रसज्येत एका संज्ञेति वचनान्नास्ति यौगपद्येन संभवः लिखकर इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि एक संज्ञा के अधिकार में भी अङ्ग संज्ञा-पूर्वक भ-संज्ञा स्वीकार करनी चाहिए। कैसे? इसका उत्तर देते हैं कि यचि भम् (1.4.18) से अङ्ग संज्ञा का अनुवर्तन किया जाता है। अङ्ग की अनुवृत्ति मानने पर पर्याय प्राप्त होगा।
 एकसंज्ञाधिकार में अङ्ग संज्ञा का नित्य बाध प्राप्त होने पर अनुवृत्ति मानने से पर्याय से अङ्ग संज्ञा भी हो जायेगी तथा भ संज्ञा भी। इससे एक संज्ञा का नियम भी बाधित नहीं होगा और अनुवृत्ति भी सफल हो जायेगी।
 इस प्रकार गार्गीआदि में भसंज्ञा तथा अङ्ग संज्ञा दोनों हो जायेंगी तथा अङ्गाधिकार का इष्ट कार्य भी हो जायेगा।
 आचार्य की प्रवृत्ति भी यही इंगित करती है कि अङ्ग संज्ञा तथा भ संज्ञा पर्याय से हो जाती है। इसलिए अङ्ग के अधिकार के अन्तर्गत ही भ संज्ञा के अधिकार को स्थान दिया गया है। 

१२५७ प्राचां ष्‍फ तद्धितः

यञन्‍तात् ष्‍फो वा स्‍यात्‍स च तद्धितः ।।

पूर्व के आचार्यों के मत में यञ् प्रत्ययान्त से स्त्रीलिंग में ष्फ होता है और वह ष्फ तद्धित होता है।

प्राचां कहने मात्र से सिद्ध है कि पाणिनि के मत में ष्फ नहीं होगा। अर्थात् यह ष्फ विकल्प से होगा। ष्फ का षकार इत्संज्ञक है।  फ को आयन् आदेश हो जाता है। इत्संज्ञा करने का प्रयोजन  षित् प्रत्ययान्त से ङीष् करना है। 

१२५८ षिद्गौरादिभ्‍यश्‍च

षिद्भ्‍यो गौरादिभ्‍यश्‍च स्‍त्रियां ङीष् स्‍यात् । गार्ग्यायणी । नर्तकी । गौरी । अनुडुही । अनड्वाही । आकृतिगणोऽयम् ।।


षित् प्रत्ययान्त से तथा गौर आदि शब्दों से स्त्रीलिंग में ङीप् होता है।
गार्ग्यायणी। गर्ग शब्द से यञ् प्रत्यय लगाकर गार्ग्य बनाने की प्रक्रिया पूर्व में बतायी जा चुकी है। इस गार्ग्य से प्राचां ष्फः तद्धितः सूत्र से स्फ हुआ। गार्ग्य + ष्फ, गार्ग्य + फ, गार्ग्य + आयन् = गार्ग्यायन् । षिद्गोरादिभ्यः  से ङीष् अनुबन्ध लोप सु आदि की उत्पत्ति गार्ग्यायणी रूप बना। नर्तक शब्द ष्वुन् प्रत्ययान्त है। षिदन्त होने से ङीष् हुआ। गौरी रूप बना।  गौरादि गण पठित गौर शब्द से ङीष् होकर गौरी रूप बना।
आमनडुहः स्त्रियां वा (वार्तिक)
अनुडुह् शब्द में विकल्प से ङीष् हो। अनड्वाही । अनडुह् शब्द से षिद्गौरादिभ्यश्च से ङीष् तथा आमनडुहः स्त्रियां वा से आम्  का आगम होगा। आम् में मकार की इत्संज्ञा हो जाती है, अतः मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः परिभाषा के बल से यह आम् का आगम अनडुह् के अन्त्य अच् का अवयव होगा। अनडु + आ + ह् इ हुआ। अनडु के उकार को यणादेश हुआ। अनड्वाह् + इ = अनड्वाही रूप सिद्ध हुआ। जिस पक्ष में आम् आदेश नहीं होगा वहाँ केवल ङीष् होकर अनडुही रूप बनेगा।
१२५९ वयसि प्रथमे

प्रथमवयोवाचिनोऽदन्‍तात् स्‍त्रियां ङीप्‍स्‍यात् । कुमारी ।।
प्रथम अवस्था के वाचक अदन्त शब्द से स्त्रीलिंग में ङीप् हो। कुमारी। कुमार शब्द प्रथम अवस्था का वाचक अदन्त शब्द है अतः इससे ङीप् होकर कुमारी रूप निष्पन्न हुआ।

वयसि अचरमे। (वा.) वृद्धावस्था को छोड़कर अवस्था वाचक शब्द से ङीप् हो। वधूट तथा चिरंट शब्द यौवन का वाचक है, अतः इस वार्तिक से ङीप् होकर वधूटी तथा चिरंटी सिद्ध हुआ।

१२६० द्विगोः

अदन्‍ताद् द्विगोङीर्प्‍स्‍यात् । त्रिलोकी । अजादित्‍वात्त्रिफला । त्र्यनीका सेना ।।

अदन्त द्विगु से ङीप् हो। त्रिलोकी। त्रिलोक शब्द द्विगु समास से निष्पन्न है और यह अदन्त भी है अतः इससे ङीप् होकर त्रिलोकी बना। प्रश्न हुआ कि त्रिफल शब्द भी अदन्त द्विगु है, पुनः यहाँ पर ङीप् होकर त्रिफली रूप क्यों नहीं बना? इसका समाधान करते हुए कहते हैं कि त्रिफल शब्द अजादि गण में पठित है, अतः अजादि गण में पठित अदन्त शब्द से टाप् होगा, ङीप् नहीं। त्रिफल शब्द से चाप् होकर त्रिफला रूप बना। इसी प्रकार त्र्यनीका में भी टाप् हुआ है।


१२६१ वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो नः

वर्णवाची योऽनुदात्तान्‍तस्‍तोपधस्‍तदन्‍तादनुपसर्जनात्‍प्रातिपदिकाद्वा ङीप् तकारस्‍य नकारादेशश्‍च । एनी, एता । रोहिणी, रोहिता ।।

अनुदात्तान्त तथा तकार उपधा वाले वर्णवाची शब्द से स्त्रलिंग में विकल्प से ङीप् हो एवं तकार को नकार आदेश हो। एनी। विविध रंगों का वाचक एत शब्द में तकार उपधा में है तथा यह अनुदात्तान्त भी है । ऐसे एत शब्द से स्त्रित्व विवक्षा में विकल्प से ङीप् तथा एत के तकार को नकार हो गया। एनी रूप बना। विकल्प पक्ष में अजाद्यतष्टाप् से टाप् हो गया। एता रूप बना। इसी प्रकार रोहित से रोहिणी तथा रोहिता रूप बनता है।

१२६२ वोतो गुणवचनात्

उदन्‍ताद् गुणवाचिनो वा ङीष् स्‍यात् । मृद्वी, मृदुः ।।

मृद्वी। मृदु (कोमल) शब्द किसी व्यक्ति, वस्तु आदि के गुण को बताता है अतः यह गुणवाचक तथा उकारान्त शब्द है। इससे स्त्रीत्व की विवक्षा में विकल्प से ङीष् हुआ। ङीष् में ङकार तथा षकार का अनुबन्ध लोप हुआ। मृदु + ई में यण् हुआ । मृद्वी रूप बना। विकल्प पक्ष में मृदुः रूप बनेगा।
१२६३ बह्‍वादिभ्‍यश्‍च

एभ्‍यो वा ङीष् स्‍यात् । बह्‍वी, बहुः । (कृदिकारादक्तिनः)। रात्री, रात्रिः ।
बहु आदि से विकल्प से ङीष् हो। बह्वी। बहु शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में ङीष् हुआ। ङीष् में ङकार तथा षकार का अनुबन्ध लोप तथा यण् होकर बह्वी रूप बना। विकल्प पक्ष में बहुः रूप बनेगा।
बहु आदि से विकल्प से ङीष् हो। बह्वी। बहु शब्द से स्त्रीत्व विवक्षा में ङीष् हुआ। ङीष् में ङकार तथा षकार का अनुबन्ध लोप तथा यण् होकर बह्वी रूप बना। विकल्प पक्ष में बहुः रूप बनेगा।
(ग.सू.) कृदिकारादक्तिनः। रात्रिः,रात्री।
कृत् प्रत्यय का इकार जिसके अंत में हो, उससे विकल्प से ङीष् हो। किन्तु क्तिन् प्रत्ययान्त से नहीं हो।

उणादि कृदन्त में रा धातु से त्रिप् प्रत्यय के द्वारा रात्रि शब्द बनता है। अतः यह कृत् प्रत्ययान्त है। यहाँ कृदकारादक्तिनः से विकल्प से ङीष्  होकर रात्रि + ई हुआ। यचि भम् से रात्रि के इकार की इत्संज्ञा तथा यस्येति च से लोप हुआ। रात्र् + ई । परस्पर वर्ण संयोग होकर रात्री बना। स्वादि कार्य के अनन्तर रात्रीः बनता है। विकल्प पक्ष में मति शब्द के समान रात्रिः रूप बनेगा।

(ग.सू.) सर्वतोऽक्तिन्नर्थादित्‍येके। शकटी । शकटिः ।।

अव्युत्पन्न प्रातिपदिक शकटि शब्द में सर्वतोऽक्तिन्नर्थादित्‍येके से विकल्प से ङीष् प्रत्यय होकर शकटि + ई हुआ। भसंज्ञक इकार का लोप करने के पश्चात् शकटी रूप बनेगा। विकल्प में शकटिः रूप बनेगा।
१२६४ पुंयोगादाख्‍यायाम्

या पुमाख्‍या पुंयोगात् स्‍त्रियां वर्तते ततो ङीष् । गोपस्‍य स्‍त्री गोपी ।
पुरूष के साथ सम्बन्ध के कारण जब पुंवाचक शब्द को  स्त्रीत्व की विवक्षा में अदन्त शब्द से ङीष् होता है। गोपी। पुंवाचक शब्द के द्वारा यदि किसी स्त्री का सम्बन्ध प्रदर्शित किया जाय तो उस पुंवाचक शब्द से ङीष् होगा। उदाहरण - यहाँ पुंवाचक शब्द गोप है,जिससे किसी स्त्री का सम्बन्ध दिखाना है। वह सम्बन्ध पत्नी, पुत्री, भतीजी आदि कुछ भी हो सकता है। ऐसे गोप शब्द से ङीष्, भसंज्ञा, अनुबन्ध लोप होकर गोपी रूप बनेगा।

स्थानीय बोलियों में महिलाओं को उसके पुरुष के साथ सम्बन्ध प्रदर्शन करने हेतु डाक्टराइन, तिवारिन, हेडमास्टराइन आदि बोला जाता है।

(पालकान्‍तान्न)

१२६५ प्रत्‍ययस्‍थात्‍कात्‍पूर्वस्‍यात इदाप्‍यसुपः

प्रत्‍ययस्‍थात्‍कात्‍पूर्वस्‍याकारस्‍येकारः स्‍यादापि स आप्‍सुपः परो न चेत् । गोपालिका । अश्वपालिका । सर्विका । कारिका । अतः किम् ? नौका । प्रत्‍ययस्‍थात्‍किम् ? शक्‍नोतीति शका । असुपः किम् ? बहुपरिव्राजका नगरी ।
 जिस शब्द के अंत में पालक शब्द हो ऐसे पालकान्त शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में पुरूष के साथ सम्बन्ध होने पर भी ङीष् नहीं हो। 
स्मरण रखना चाहिए कि जहाँ भी ङीप्, ङीष् का विकल्प होगा वहाँ पुल्लिंग रूप बनेंगे । अजादि होने पर टाप् होगा।प्रत्‍ययस्‍थेति। प्रत्ययस्थ ककार से पूर्व में स्थित अकार के स्थान पर इकार आदेश होता है आप् के परे होने पर। यदि वह आप् सुप् से परे हो तो अकार को इकार नहीं हो।

(सूर्याद्देवतायां चाब्‍वाच्‍यः)  सूर्यस्‍य स्‍त्री देवता सूर्या । देवतायां किम् ?


(सूर्यागस्‍त्‍ययोश्‍छे च ङ्यां च)  यलोपः । सूरी कुन्‍ती; मानुषीयम् ।।

१२६६ इन्‍द्रवरुणभवशर्वरुद्रमृडहिमारण्‍ययवयवनमातुलचार्याणामानुक्

एषामानुगागमः स्‍यात् ङीष् च । इन्‍द्रस्‍य स्‍त्री इन्‍द्राणी । वरुणानी । भवानी । शर्वाणी । रुद्राणी । मृडानी । 


इन्‍द्र, वरुण, भव, शर्व, रुद्र, मृड, हिम, अरण्‍य, यव, यवन, मातुल तथा आचार्य शब्दों से ङीष् प्रत्यय तथा आनुक् का आगम हो।
इन्द्राणी। इन्द्र  शब्द से स्त्रीत्व की विवक्षा में इन्द्र- वरुण सूत्र से ङीष् प्रत्यय हुआ। ङीष् में ङकार, षकार का अनुबन्ध लोप इन्द्र + ई हुआ । इन्द्र को आनुक् का आगम, उकार तथा ककार का अनुबन्ध लोप हुआ। इन्द्र + आन् + ई में अ तथा आ के बीच सवर्ण दीर्घ, परस्पर वर्ण संयोग होकर इन्द्राणी रूप बना।
(वा) हिमारण्‍ययोर्महत्त्वे । महद्धिमं हिमानी । महदरण्‍यमरण्‍यानी ।
हिम तथा अरण्य शब्दों से  महत्व अर्थ में ङीष् प्रत्यय तथा आनुक् का आगम हो।

महत् हिमम् इस विग्रह में हिम शब्द से हिमारण्ययोर्महत्वे से ङीष्  तथा आनुक् का आगम, अनुबन्ध लोप, सवर्णदीर्घ, विभक्ति कार्य होकर हिमानी रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार महत् अरण्यम् इस विग्रह में अरण्यानी रूप बनेगा।

(वा) यवाद्दोषे  दुष्‍टो यवो यवानी ।
दोष अर्थ में यव शब्द से ङीष् प्रत्यय तथा आनुक् का आगम हो। दुष्टः यवः इस विग्रह में यव शब्द से ङीष्  तथा आनुक् का आगम, अनुबन्ध लोप, सवर्ण दीर्घ ,विभक्ति कार्य होकर यवानी रूप सिद्ध हुआ।
(वा) यवनाल्‍लिप्‍याम्  यवनानां लिपिर्यवनानी ।
लिपि अर्थ में यवन शब्द से उक्त प्रत्यय हो।
(वा) मातुलोपाध्‍याययोरानुग्‍वा  मातुलानी, मातुली । उपाध्‍यायानी, उपाध्‍यायी ।

मातुल तथा उपाध्याय से आनुक् आगम विकल्प से हो। 

(वा) आचार्यादणत्‍वं च  आचार्यस्‍य स्‍त्री आचार्यानी ।
आचार्य शब्द से पुंयोग में  ङीष् प्रत्यय, आनुक् का आगम तथा णत्व का निषेध हो।

जहाँ पुंयोग नहीं होगा वहाँ पर ङीष् प्रत्यय, आनुक् का आगम आदि का कार्य नहीं होकर टाप् होकर आचार्या रूप बनेगा। अर्थात् जो स्त्री अध्यापन करती है वह आचार्या तथा जो आचार्य की पत्नी होगी उसे आचार्या कहा जाता है।

 (वा) अर्यक्षत्रियाभ्‍यां वा स्‍वार्थे अर्याणी, अर्या । क्षत्रियाणी, क्षत्रिया ।।

अर्य तथा क्षत्रिय शब्दों से स्वार्थ में ङीष् तथा आनुक् विकल्प से हो। क्षत्रियाणी । क्षत्रिय कुल में उत्पनान हुई स्त्री को क्षत्रियाणी तथा क्षत्रिया कहा जाएगा। जो क्षत्रिय की पत्नी होगी उसे क्षत्रियी। 

१२६७ क्रीतात्‍करणपूर्वात्

क्रीतान्‍ताददन्‍तात् करणादेः स्‍त्रियां ङीष्‍स्‍यात् । वस्‍त्रक्रीती । क्‍वचिन्न । धनक्रीता ।।

१२६८ स्‍वाङ्गाच्‍चोपसर्जनादसंयोगोपधात्

असंयोगोपधमुपसर्जनं यत् स्‍वाङ्गं तदन्‍ताददन्‍तान् ङीष्‍वा स्‍यात् । केशानतिक्रान्‍ता अतिकेशी, अतिकेशा । चन्‍द्रमुखी चन्‍द्रमुखा । असंयोगोपधात्‍किम् ? सुगुल्‍फा । उपसर्जनात्‍किम् ? शिखा ।।

१२६९ न क्रोडादिबह्‍वचः

क्रोडादेर्बह्‍वचश्‍च स्‍वाङ्गान्न ङीष् । कल्‍याणक्रोडा । आकृतिगणोऽयम् । सुजघना ।।

१२७० नखमुखात्‍संज्ञायाम्

न ङीष् ।।

१२७१ पूर्वपदात्‍संज्ञायामगः

पूर्वपदस्‍थान्निमित्तात्‍परस्‍य नस्‍य णः स्‍यात् संज्ञायां न तु गकारव्‍यवधाने । शूर्पणखा । गौरमुखा । संज्ञायां किम् ? ताम्रमुखी कन्‍या ।।

१२७२ जातेरस्‍त्रीविषयादयोपधात्

जातिवाचि यन्न च स्‍त्रियां नियतमयोपधं ततः स्‍त्रियां ङीष् स्‍यात् । तटी । वृषली । कठी । बह्वृची । जातेः किम् ? मुण्‍डा । अस्‍त्रीविषयात्‍किम् ? बलाका । अयोपधात्‍किम् ? क्षत्रिया ।

(योपधप्रतिषेधे हयगवयमुकयमनुष्‍यमत्‍स्‍यानामप्रतिषेधः) हयी । गवयी । मुकयी । हलस्‍तद्धितस्‍येति यलोपः । मनुषी ।
(मत्‍स्‍यस्‍य ङ्याम्) । यलोपः । मत्‍सी ।।

१२७३ इतो मनुष्‍यजातेः

ङीष् । दाक्षी ।।

१२७४ ऊङुतः

उदन्‍तादयोपधान्‍मनुष्‍यजातिवाचिनः स्‍त्रियामूङ् स्‍यात् । कुरूः । अयोपधात्‍किम् ? अध्‍वर्युर्ब्राह्‍मणी ।।

१२७५ पङ्गोश्‍च  । पङ्गूः ।

(श्वशुरस्‍योकाराकारलोपश्‍च) । श्वश्रूः ।।

१२७६ ऊरूत्तरपदादौपम्‍ये

उपमानवाची पूर्वपदमूरूत्तरपदं यत्‍प्रातिपदिकं तस्‍मादूङ् स्‍यात् । करभोरूः ।।

१२७७ संहिताशफलक्षणवामादेश्‍च

अनौपम्‍यार्थं सूत्रम् । संहितोरूः । शफोरूः । लक्षणोरूः । वामोरूः ।।

१२७८ शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन्

शाङ्र्गरवादेरञो योऽकारस्‍तदन्‍ताच्‍च जातिवाचिनो ङीन् स्‍यात्। शाङ्र्गरवी। बैदी। ब्राह्‍मणी ।

(वा)  नृनरयोर्वृद्धिश्‍च। नारी ।।
नृ तथा नर शब्द से ङीन् हो तथा नृ एवं नर की वृद्धि भी हो।

नरस्य स्त्री अय़वा नुः स्त्री इस विग्रह में नृ शब्द से नृन्नेभ्यो ङीप् से ङीप् प्राप्त था उसे बाधकर नृनरयोर्वृद्धिश्च से ङीन् तथा नृ के ऋकार को वृद्धि, रपर आर् होकर नारी बना। अनन्तर स्वादि विभक्ति कार्य हुआ। इसी प्रकार नर में ङीष् एवं नकार के बाद के अकार की वृद्धि  आ होकर नारी रूप बना।

१२७९ यूनस्‍तिः

युवञ्छब्‍दात् स्‍त्रियां तिः प्रत्‍ययः स्‍यात् । युवतिः ।।
युवन् शब्द से ति प्रत्यय हो।
युवन् शब्द से ति प्रत्यय हुआ। युवन +ति इस दशा में न लोपः प्रतिपदिकान्तस्य से प्रातिपदिक युवन के अंत वर्ण नकार को लोप हुआ। स्वादि कार्य होकर युवतिः बना।

यु धातु से शतृ प्रत्यय कर उगितश्च से ङीप् होकर युवती रूप बनता है। इसी प्रकार युवत् शब्द से सर्वतोऽक्तिन्नर्थात् से वैकल्पिक ङीष् होकर युवती रूप बनता है।

                             स्त्रीप्रत्ययप्रकरण में आये प्रत्ययों एवं उसके उदाहरणों की तालिका


प्रत्यय
स्त्रीलिंग शब्द
प्रत्यय
स्त्रीलिंग शब्द
टाप्
अजा, एडका, अश्वा, वत्सा, मन्दा, विलाता
ङीप्
भवन्ती, पचन्ती, दीव्यन्ती

ङीष्
गौरी, अनड्वाही
ङीप्
स्त्रैणी, पौंस्नी, शाक्तिकी, तरुणी, तलुनी
ङीष्
मृद्वी
ङीप्
कुरुचरी, नदी, ऐन्द्री, औत्सी, यादृशी
ङीष्
बह्वी
ङीप्
कुमारी
ङीष्
शकटी
ङीप्
गार्गी
ङीष्
गोपी
ङीप्
त्रिलोकी
ङीष्
इन्द्राणी, वरुणानि, भवानी, हिमानी, यवनानी, मातुली, मातुलानी
ङीप्
एनी, रोहिणी
ङीष्
वस्त्रक्रीति
ङीष्
अतिकेशी, चन्द्रमुखी, वस्त्रक्रीति,
ङीष्
वृषली, मानुषी, बृषली, मत्सी
ङीष्
दाक्षी
ऊङ्
कुरूः, श्वश्रूः, करभोरूः, वामोरूः, लक्षणोरूः
ङीन्
 ब्राह्मणी, बैदी, शार्ङ्गरवी, नारी
ति
युवतिः






Share:

लोकप्रिय पोस्ट

ब्लॉग की सामग्री यहाँ खोजें।

लेखानुक्रमणी

जगदानन्द झा. Blogger द्वारा संचालित.

मास्तु प्रतिलिपिः

इस ब्लॉग के बारे में

संस्कृतभाषी ब्लॉग में मुख्यतः मेरा
वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
आदि विषयों पर सामग्री उपलब्ध हैं। आप लेवल में जाकर इच्छित विषय का चयन करें। ब्लॉग की सामग्री खोजने के लिए खोज सुविधा का उपयोग करें

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 2

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 3

Sanskritsarjana वर्ष 2 अंक-1

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 1

समर्थक एवं मित्र

सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय श्रेणियाँ

ब्लॉग आर्काइव

Recent Posts

लेखाभिज्ञानम्

अंक (1) अभिनवगुप्त (1) अलंकार (3) आचार्य (1) आधुनिक संस्कृत (1) आधुनिक संस्कृत गीत (1) आधुनिक संस्कृत साहित्य (3) आम्बेडकर (1) उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (1) उत्तराखंड (1) ऋग्वेद (1) ऋतु (1) ऋषिका (1) कणाद (1) करक चतुर्थी (1) करण (2) करवा चौथ (1) कर्मकाण्ड (33) कामशास्त्र (1) कारक (1) काल (3) काव्य (4) काव्यशास्त्र (12) काव्यशास्त्रकार (1) कुमाऊँ (1) कूर (1) कूर्मांचल (1) कृदन्त (3) कोजगरा (1) कोश (2) गंगा (1) गया (1) गाय (1) गीतकार (1) गीति काव्य (1) गुरु (1) गृह कीट (1) गोविन्दराज (1) ग्रह (1) चरण (1) छन्द (4) छात्रवृत्ति (1) जगत् (1) जगदानन्द झा (3) जगन्नाथ (1) जीवनी (3) ज्योतिष (13) तकनीकि शिक्षा (1) तद्धित (10) तिङन्त (11) तिथि (2) तीर्थ (3) दर्शन (11) धन्वन्तरि (1) धर्म (1) धर्मशास्त्र (12) नक्षत्र (3) नाटक (2) नाट्यशास्त्र (2) नायिका (2) नीति (2) पक्ष (1) पतञ्जलि (3) पत्रकारिता (4) पत्रिका (6) पराङ्कुशाचार्य (2) पाण्डुलिपि (2) पालि (3) पुरस्कार (13) पुराण (2) पुरुषार्थोपदेश (1) पुस्तक (2) पुस्तक संदर्शिका (1) पुस्तक सूची (14) पुस्तकालय (5) पूजा (1) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (1) प्रशस्तपाद (1) प्रहसन (1) प्रौद्योगिकी (1) बिल्हण (1) बौद्ध (6) बौद्ध दर्शन (2) ब्रह्मसूत्र (1) भरत (1) भर्तृहरि (2) भामह (1) भाषा (1) भाष्य (1) भोज प्रबन्ध (1) मगध (3) मनु (1) मनोरोग (1) महाविद्यालय (1) महोत्सव (2) मुहूर्त (2) योग (6) योग दिवस (2) रचनाकार (3) रस (1) राजभाषा (1) रामसेतु (1) रामानुजाचार्य (4) रामायण (1) राशि (1) रोजगार (2) रोमशा (1) लघुसिद्धान्तकौमुदी (45) लिपि (1) वर्गीकरण (1) वल्लभ (1) वाल्मीकि (1) विद्यालय (1) विधि (1) विश्वनाथ (1) विश्वविद्यालय (1) वृष्टि (1) वेद (2) वैचारिक निबन्ध (22) वैशेषिक (1) व्याकरण (15) व्यास (2) व्रत (2) व्रत कथा (1) शंकाराचार्य (2) शतक (1) शरद् (1) शैव दर्शन (2) संख्या (1) संचार (1) संस्कार (19) संस्कृत (16) संस्कृत आयोग (1) संस्कृत गीतम्‌ (9) संस्कृत पत्रकारिता (2) संस्कृत प्रचार (1) संस्कृत लेखक (1) संस्कृत वाचन (1) संस्कृत विद्यालय (3) संस्कृत शिक्षा (4) संस्कृतसर्जना (5) सन्धि (3) समास (6) सम्मान (1) सामुद्रिक शास्त्र (1) साहित्य (1) साहित्यदर्पण (1) सुबन्त (7) सुभाषित (3) सूक्त (3) सूक्ति (1) सूचना (1) सोलर सिस्टम (1) सोशल मीडिया (2) स्तुति (2) स्तोत्र (11) स्त्रीप्रत्यय (1) स्मृति (11) स्वामि रङ्गरामानुजाचार्य (2) हास्य (1) हास्य काव्य (1) हुलासगंज (2) Devnagari script (2) Dharma (1) epic (1) jagdanand jha (1) JRF in Sanskrit (Code- 25) (3) Kahani (1) Library (1) magazine (1) Mahabharata (1) Manuscriptology (2) Pustak Sangdarshika (1) Sanskrit (2) Sanskrit language (1) sanskrit saptaha (1) sanskritsarjana (3) sex (1) Student Contest (1) UGC NET/ JRF (4)