मंगलवार, 30 जुलाई 2019

स्तोत्र साहित्य का उद्भव और विकास

स्तोत्रों का गायन करना मुझे अतिशय प्रिय है। जब भी मैं आनंदित होता हूं, सहसा मेरे अंतःकरण से स्तोत्र फूट पड़ते हैं। मैं भावविभोर हो उठता हूं। इसके सुनने, पढ़ने और खुलकर गाने से मुझे अनिर्वचनीय आनंद की प्राप्ति होती है। इससे मुझे स्वांतः सुख मिलता है। लगता है यह मेरे समस्त सांसारिक उपद्रवों को नाश कर ज्ञान और वैराग्य की धारा में बहा ले जा रही है। ब्रह्मानुभूति के उस पल को मैं शब्दों से व्यक्त नहीं कर सकता। ये वही स्तोत्र हैं, जिसके द्वारा मैं अपने आराध्य से तादात्म्य स्थापित कर पाता हूँ। हृदय के समस्त भावों को स्तोत्रों के शब्दों में पिरोकर अपने आराध्य तक पहुँचा लेता हूँ। संस्कृत में अनेक प्रकार के स्तोत्र हैं। कुछ की भाषा अत्यन्त सरल है। आराध्य के नाम, गुण, कर्म और रूप सौंदर्य का वर्णन करने वाले स्तोत्रों को कोई भी गुनगुना सकता है।  कुछ स्तोत्र मनोहारी अलंकारिक रूप में मिलते हैं। कुछ दार्शनिक तो कुछ भक्तिभाव से ओतप्रोत कर देने वाली। मुझे सभी प्रकार के स्तोत्र प्रिय हैं, शायद आपको भी।
            इधर कुछ दिनों से मैं मानसिक अशान्ति से गुजरने लगा था। आराध्य की पूजा से भी मन उचट सा गया। इस प्रकार के दौर हर एक मानव के जीवन में आता रहता है। इस प्रकार की परिस्थिति से बाहर आने के लिए कभी मैं आलवंदारस्तोत्र का ध्वनि मुद्रण कर यहाँ पोस्ट किया था । तब मन में शान्ति छा गयी। इधर कुछेक दिन पूर्व वर्षों पहले रिकार्ड किये दक्षिणामूर्ति स्तोत्र को सुना। इस दार्शनिक स्तोत्र को सुनते ही मेरे चित्त की वृत्तियां शान्त होने लगी। मैं अपने इस ब्लॉग पर अतिशय प्रिय स्तोत्रों का संकलन किया है। कुछ फुटकर स्तोत्रों का लिंक भी उपलब्ध करा दिया है। स्तोत्रों के संकलन के क्रम में मैंने पाया कि इन्टरनेट पर उपलब्ध स्तोत्रों में काफी अशुद्धियाँ हैं। मैंने मूल ग्रन्थों से मिलाकर यहाँ पर शुद्ध पाठ दिया है।
स्तोत्र साहित्य इतने विपुल हैं कि उन्हें एक स्थान पर एकत्र करना सम्भव नहीं है। अतः इसमें रूचि रखने वाले लोगों के लिए मैं इस लेख में स्तोत्रों के इतिहास लिखना उचित समझा। इसके द्वारा वे मनोवांछित स्तोत्र को खोज कर अपने आराध्य के प्रति अपना विनय प्रस्तुत कर सकें।
स्तोत्र साहित्य की परंपरा अत्यंत ही प्राचीन है। वेदों में जहां विभिन्न देवी-देवताओं की स्तुतियाँ मिलती है, वही परवर्ती साहित्य रामायण महाभारत तथा पुराणों में भी स्तोत्र साहित्य बिखरे पड़े हैं। इन ग्रंथों में विभिन्न संप्रदायों के आराध्य देवताओं की स्तुतियाँ मिलती है। जैसे शैव संप्रदाय के लिए शिव की उपासना परक स्तोत्र साहित्य, दुर्गा तथा शक्ति से जुड़े हुए देवियों के लिए शक्ति साहित्य, भगवान राम, कृष्ण तथा विष्णु के लिए वैष्णव स्तोत्र साहित्य आदि विपुल संपदा में स्तोत्र साहित्य बिखरे पड़े हैं। उनके अनुरागी भक्तों, पंडितों ने अपने- अपने आराध्य की स्तुति में अपने देव विशेष को अपना सर्वस्य न्योछावर करने के लिए स्तोत्रों का गायन करते रहे। इसके द्वारा अभीष्ट प्राप्ति करना, देवताओं के नाम, गुण, कर्म और रूप सौंदर्य का वर्णन करके अपना अभीष्ट प्राप्त करना स्तुति साहित्य का मुख्य लक्ष्य रहा है। परवर्ती काव्यों में दार्शनिक और अलंकारिक सौंदर्य से भरपूर स्तोत्र साहित्य भी प्राप्त होते हैं। अधिकांश स्तोत्र साहित्य अलौकिक सुख के साथ पारलौकिक मोक्ष तथा लोक कल्याण कार्य के लिए लिखी गई है। वेदों से लेकर परवर्ती साहित्यकारों कालिदास, श्रीहर्ष आदि के काव्य में मधुरिम स्तुति प्राप्त होते हैं। रामायण, महाभारत, श्रीमद् भागवत तथा परवर्ती ज्ञात अज्ञात कवियों द्वारा अनेक प्रकार के स्तोत्र रचित है। मिथिला मेरी जन्मभूमि है। वहां पंचदेव उपासना की परंपरा है। वहां विष्णु, शिव, दुर्गा, गणेश और शिव की उपासना की जाती है। इन पांच देवताओं के स्तोत्र विपुल मात्रा में प्राप्त होते हैं। अवतारों में विष्णु के मुख्य 10 अवतार और उनकी शक्ति लक्ष्मी, सीता, राधा आदि की उपासना, वंदना करके अद्भुत लौकिक और अलौकिक सामर्थ्य प्राप्त करने के लिए स्तुतियाँ प्राप्त होती है। इसमें उनके अलौकिक सौंदर्य, रूपों और विविध लीलाओं का वर्णन प्राप्त होता है । अध्यात्म प्रधान भारतीय इन देवताओं से इतने प्रभावित हुए कि बाद में स्तोत्र साहित्य एक स्वतंत्र काव्य, शतक साहित्य के रूप में रचना होने लगी। स्तोत्र साहित्य के प्रभाव से बौद्ध भी अछूते नहीं रह सके। उस परम्परा में भी स्तोत्र काव्य प्राप्त होते हैं। मैंने इसी ब्लॉग में बौद्ध स्तोत्रों के बारे में भी लिखा है। इन स्तोत्रों को 5 वर्गों में विभाजित किया जाता है। 1. वैदिक स्तोत्र 2. पौराणिक स्तोत्र 3. रामायण तथा महाभारत के स्तोत्र 4. स्वतंत्र लेखकों के द्वारा लिखे गये स्तोत्र और 5. काव्य में प्रयुक्त स्तोत्र ।

वैदिक स्तोत्र
  ऋग्वेद में इंद्र, विष्णु, रुद्र आदि देवों के अनेक मंत्र उनकी अलौकिक महिमा को हमारे समक्ष प्रस्तुत करती है। अथर्ववेद के मंत्र अपेक्षाकृत अधिक विकसित रूप में प्राप्त होते हैं। इंद्र, विष्णु, प्रजापति के अतिरिक्त रुद्र का भयंकर रूप भी हमें ऋग्वेद उसके बाद अथर्ववेद में प्राप्त होता है। यजुर्वेद के रूद्राध्याय के 65 मंत्रों में रूद्र को अति सुंदर,निर्भीक, हजारों आंखों वाला, शितिकण्ठ, नीलकंठ आदि रूपों में स्तवन किया गया है। 
             नमः श्वभ्यः श्वपतिभ्यश्च वो नमो नमो भवाय च रुद्राय च नमः
            शर्वाय च पशुपतये च नमो नीलग्रीवाय च शितिकण्ठाय च।।
ब्राह्मण, उपनिषद् ग्रंथों में रुद्र का महत्व और अधिक बढ़ गया है। वैदिक देवताओं में अग्नि बड़ा ही महत्वशाली महिमामंडित देव है। शुक्ल यजुर्वेद का शतरुद्रीय का आज भी महत्व है।  कृष्ण यजुर्वेद में देवियों की अवधारणा देखने को मिलती है। यहां दुर्गा की मूर्ति भी स्पष्ट रूप से प्रतिष्ठित हो गई है। श्री, लक्ष्मी, दुर्गा, सरस्वती तथा तांत्रिक बीज मंत्रों की अवधारणा यहां स्पष्ट देखी जा सकती है। उपनिषद् यद्यपि ज्ञान मार्ग का अवलंबन करते हैं, फिर भी उनमें स्तोत्रों की अच्छी परंपरा देखी जाती है । वस्तुतः ज्ञान, भक्ति और कर्म इन तीनों का उपनिषद् में बड़ा ही मार्मिक व्याख्यान किया गया है। तैत्तिरीय में प्रणव की प्रशंसा की गई है। श्वेताश्वतर में सर्वव्यापी, सर्वशक्तिमान की वन्दना गई है। वहीं स्तोत के लिए ज्ञान, बुद्धि आदि कामनाओं की प्राप्ति का भी उल्लेख है। छान्दोग्य तथा मैत्रायणी में भी परब्रह्म का मनोहारी गान प्रस्तुत हैं। इस प्रकार वैदिक साहित्य स्तुतियों से भरा पड़ा है। वैदिक ग्रन्थों में जो देवता महत्वशाली थे वे परवर्ती ग्रन्थों में उतने महत्वशाली नहीं रह गये। पौराणिक ग्रन्थों में देवताओं का मानवीकरण हुआ।
रामायण में स्तोत्र
     महर्षि वाल्मीकि द्वारा विरचित बाल्मीकि रामायण लौकिक संस्कृत का प्रथम ग्रंथ माना जाता है। इसे आदि काव्य भी कहा जाता है। इसमें भगवान श्री राम के चरित्र के साथ अनेक स्तोत्रों का भी निबंधन है। इसमें भगवती गंगा, देवी,सीता तथा भगवान राम की स्तुतियों के अतिरिक्त राम के द्वारा की गई सूर्य और ब्रह्मा की स्तुतियां भी अत्यंत मनोहारी तथा अंतः करण को शांति प्रदान करती है। महर्षि अगस्त द्वारा स्तवन किया गया आदित्य हृदय स्तोत्र रामायण का सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्तोत्रों में से एक है। इस स्तोत्र को मैंने अपने ब्लॉग पर स्थान दिया है। रावण पर विजय पाना राम के लिए जब कठिन हो गया तो महर्षि अगस्त्य ने उन्हें देवाधिदेव जगतपति भगवान सूर्य की पूजा का उपदेश दिया। यह आदित्य हृदय स्तोत्र विजय आदि प्रदान करने वाला बताया जाता है। इसी युद्ध कांड में ही मंदोदरी द्वारा की गई राम की स्तुति भी अच्छी है। रामायण के बाद के काव्य में स्तोत्रों का जो मनोहारी अलंकारिक रूप देखने को मिलता है, वह अलंकारिक शुरू रामायण में उपलब्ध नहीं है।
महाभारत के स्तोत्र
     महाभारत में अनेक स्तुतियों के दर्शन होते हैं। विशेष रूप से यहां शतनाम में या सहस्त्रनाम का एक विकसित रूप देखा जाता है। शतनाम में देव विशेष के गुणों तथा कार्यों के अनुसार उनके नाम बताये जाते हैं। प्रत्येक नाम में उस देवता का रहस्य छिपा रहता है। इस नाम कीर्तन से देवता का गुण कीर्तन साथ- साथ होता जाता है। यही स्थिति सहस्रनाम की भी है। इसमें पांच प्रसिद्ध स्तोत्र माने जाते हैं। गीता, सहस्त्रनाम, स्तवराज, अनुस्मृति, गजेंद्र मोक्ष।
    गीता में विश्वरूप दर्शन के समय अर्जुन द्वारा की गई भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति है। भीष्मस्तवराज तथा गजेंद्र मोक्ष महाभारत के सर्वोत्तम स्तोत्र माने जाते हैं। महाभारत में की गई विष्णु भगवान की गद्यात्मक स्तुति अपने पूर्ववर्ती वैदिक विधि का निदर्शन तथा परवर्ती गद्य स्तोत्रों की आधार भित्ति है। कृष्ण वेद होने के कारण महाभारत में भगवान श्रीकृष्ण की तमाम स्तुतियों के अतिरिक्त इंद्र, कार्तिकेय, सूर्य तथा देवी के शांत और घोररूपों का सुंदर स्तवन यहां देखा जाता है। 
नीचे का अंश असम्पादित है। इसे शीघ्र सम्पादित किया जाएगा-
पौराणिक स्तोत्र 
ऋषि-मुनियों उत्तम उत्तम धार्मिक तथा आध्यात्मिक चिंतन साधना योगिक अनुभूतियों वेदांत असंख्य न्याय आदि दर्शन सेवर वैष्णव शादी संप्रदायों की धरोहर है नवधा भक्ति का व्याख्यान सबसे पहले पुराण में ही देखा जाता है यहीं पर 5 देशों की उपासना और सखियों का प्राधान्य देखा जाता है सिद्ध मंगल स्तोत्र रक्षा कवच कर्म या नेहा शादी इक्षित वस्तुओं को प्राप्त कराने वाले स्तोत्र ओके अगर समुद्र पुराने ही हैं 18 पुराणों तथा पुराणों में अनेक स्तोत्र भरे पड़े हैं । भागवत पुराण में भगवान कृष्ण की स्तुति सबसे अधिक मिलती है इनमें कुंती भीष्म ध्रुव प्रह्लाद तथा गजेंद्र और सुखदेव की स्थितियां अधिक बनी है तथा हृदय को सबसे अधिक स्पर्श करती है कि नहीं सूत्रों की भाषा तो महाकवि कालिदास की सहायता तक को छू जाती है भागवत का नारायण बर्तन ब्रह्मांड पुराण का विष्णु पंजर स्तोत्र शतनाम स्तोत्र भगवान विष्णु के सुंदर प्रस्तुत करते हैं भागवत का स्तोत्र स्तोत्र स्तोत्र स्तोत्र आदि भी उल्लेखनीय है ब्रह्मा वैवर्ता श्री कृष्ण स्तोत्र वासुदेव चरित तथा इंद्र कृत कृष्ण स्तोत्र स्तोत्र तथा उन्हीं की स्थितियां कृष्ण स्तोत्र के अच्छे उदाहरण है भागवत में राम स्तोत्र अध्यात्म रामायण का राम हृदय स्तोत्र भी अतिशय माधुरी का विस्तार करता है श्री कृष्ण गोपाल स्तोत्र शतनाम स्तोत्र भी गणित किए जाने योग्य है नारद पुराण का दत्तात्रेय स्तोत्र भविष्य पुराण का स्तोत्र शतनाम स्तोत्र स्तोत्र आदि उल्लेखनीय हैं देवों के उदाहरण स्वरूप पुत्रों में ब्रह्मांड पुराण का सिद्ध लक्ष्मी स्तोत्र ब्रह्म पुराण का लक्ष्मी कवच कालिका पुराण ब्रह्मांड का ललिता सहस्त्रनाम स्तोत्रम भविष्य का मोहिनी कवच पद्म पुराण का संकटनाशन स्तोत्र देवी पुराण रात्रि सूक्त नारायणी स्तुति सकरा देवी स्तुति वराह पुराण का चंडी कवच आदि उल्लेखनीय हैं
 शिव संबंधी स्थितियां दो से ही चली आ रही है पुराणों में शिव पुराण भगवान शिव की स्थितियों से भरा पड़ा है इसके अतिरिक्त का शिव कवच स्तोत्र मार्कंडेय पुराण का महामृत्युंजय स्तोत्र का शिवराज का हिमालय कृत शिव स्तोत्र कल्कि पुराण का शिव स्तोत्र काशीपुरा दिस भगवान भूत भावन विश्वनाथ की सुंदर स्तुति प्रस्तुत करता है वस्तुतः कोई भी ऐसा पुराना नहीं है जिसमें सभी देवों की स्तुति ओं भारतीय धर्म समाज में गणेश की सर्व देवों से पहले पूजा होती है क्योंकि वह विघ्न विनायक विघ्नेश भंजन देव हैं इनके स्तोत्र में गणेश पुराण का गणेश कवचम् मयूरेश्वर स्तोत्रम गणेशा अष्टकम मुद्गल की गणेश मानस पूजा गणेशा स्तोत्र शतनाम स्तोत्र नारद पुराण का संकटनाशन गणेश स्तोत्र प्रमुख स्तोत्र हैं सूर्य भगवान की स्तुति ओं में भ्रम है या मलका त्रैलोक्य मंगल कवच भविष्य उत्तर का आदित्य हृदय स्तोत्र प्रमुख स्तोत्र है इसी प्रकार भागवत पुराण कल की मत्स्य तथा स्कंध आदि पुराणों में भगवती गंगा यमुना आदि पवित्र नदियों की अनेकानेक स्तोत्र निबंध है नारदीय अग्नि हरिवंश तथा पुराणों में भी प्राय सभी देवों की स्थितियां अपने पूर्ण परिपथ तथा हर प्रकार से परिपूर्ण अवस्था में पाई जाती है जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है समग्र पौराणिक ब्रह्मा ब्रह्म परमात्मा उसकी माया के विविध रूप ब्रह्मा विष्णु महेश लक्ष्मी सीता राधा सरस्वती शिवा पर्वती गणेश सूर्य इंद्र आदि के विविध लीलाओं के अक्षय अगाध अनंत रचना करें इनसे ज्ञान विराग ऐश्वर्या की मुक्ति मोक्ष की जितनी भी मनिया चाहे आप निकाल सकते हैं उपर्युक्त पौराणिक सूत्रों के अतिरिक्त अन्य स्तोत्र भी इस श्रेणी में लिए जा सकते हैं इसमें पद्म पुराण का गणेशा गणेश पुराण का गणेश सहस्त्रनाम स्तोत्र गर्ल का प्रह्लाद कृत गणेश स्तोत्र स्तोत्र देवर से गजानन स्तोत्र वामन पुराण का विष्णु सहस्त्रनाम स्तोत्रम कल्कि पुराण का विष्णु राज भविष्य पुराण शालिग्राम शीला स्तोत्र स्कंद का प्रदोष स्तोत्र आत्मा वीरेश्वर स्तोत्र पद्म का संकट अष्टक स्तोत्र सरस्वती अष्टक स्कंध का शीतला अष्टक कल्कि का गंगा स्तवन मत्स्य का प्रयागराज आज तक प्रसिद्ध स्तोत्र है इन्हीं की परंपरा में स्कंद पुराण का ऋण मोचन मंगल स्तोत्र अंगारक स्तोत्र ब्रह्मा व्रत का बुध का बृहस्पति स्तोत्र पद्म का बुध पंचवती नाम स्तोत्र ब्रह्मांड का सुख कवच सनी पसंद का ही राहु स्तोत्र केतु पंचमी सती नाम स्तोत्र ब्रह्मांड का नवग्रह स्तोत्र तुलसी का वचन तथा नरसिंह का मत्यास तक आदि लोकोपयोगी तथा जन जन के नित्य प्रयोग में लाए जाने वाले अच्छे स्तोत्र गिने जाते हैं पुराण तो देवताओं की स्तुति यों तथा स्त्रोतों के दूसरे रूप है पौराणिक स्तोत्र स्तोत्र यहां बेर महाभारत की परंपरा के अनुसार गद्य में भी लिखे गए हैं वहीं इनकी छंद अलंकार तथा ध्वनि योजना अपूर्व कांति का माधुर्य करती है धर्म तथा कर्मों में रोग तंत्र प्रयोग में पौराणिक स्तोत्र का पाठ होते रहता है इनका दार्शनिक महत्व भी चरम सीमा तक पहुंचा हुआ है
लौकिक संस्कृत काव्य में स्तोत्र
वैदिक काल से सतत प्रवाह मान स्तोत्र पुराणों में समृद्ध तथा परिपूर्ण होती हुई बाद के अलौकिक काव्य और कवियों की सहज गई है काव्य नाटक की छंद अलंकार रस भाबनी भूसा मंडी जनमानस को सिद्ध करती चली जा रही है लौकिक संस्कृत योग में देव अस्थियों के रूप ही नहीं बदले नई परिस्थितियों में वैदिक देवों के स्वरूप में भी काफी परिवर्तन आया वेदों का सबसे अधिक जाना पहचाना तथा महिमामंडित देवता इंद्र यहां एक सहायक इंद्रासन का अधिकारी शतक रितु मात्र होकर लग गया विष्णु शिव की प्रधानता सर्वत्र व्याप्त हो गई कवियों ने देवताओं का मानवीकरण कर उसमें मानवीय गुणों का आरोप करते हुए उसे प्रेमी पूज्य पूजक सखा वल्लभा प्रेसी आदि का भी संबंध स्थापित किया कवि स्वयं काव्य जगत का ब्रह्मा बन बैठा लौकिक संस्कृत काव्य में कवि कालिदास अपनी सहज स्वभाव की कविता की कविता के कारण विश्व विश्व अर्थ है परम सेव होने के नाते उनके नाटकों में मंगल रूप भगवान शिव की वंदना तो है ही रघुवंश महाकाव्य के 10 वर्ग में भगवान विष्णु की भी स्तुति की गई है रावण से संतृप्त चतुर्मुख ब्रह्मा विष्णु के पास पहुंचे इनके स्तोत्र भगवान के वैदिक स्वरुप को उभारने के साथ-साथ काव्य सौंदर्य का अद्भुत सामंजस्य स्थापित करते हैं कालिदास ने कुमारसंभव में ब्रह्मा के मुख से शिव स्तुति कराई है इसके बाद कुमार दास के जानकी हरण के द्वितीय सर्ग में भगवान विष्णु की स्तुति कालिदास की शैली में प्रस्तुत की गई महाकवि भारवि भी सेव है उनके काव्य किरातार्जुनीयम् में स्वाभाविक तौर पर भगवान शिव की स्तुति मिलती है युद्ध में कि रात में सुधारी भगवान शिव से त्रस्त हो जाने पर थके हुए शिवभक्त अर्जुन ध्यान लगाकर देखते हैं तो भगवान को पहचान लेते हैं और वह अपने आराध्य देव की स्तुति करने लग जाते हैं किरातार्जुनीयम् के 18 में सर्ग में स्तुति अपनी अलंकारिक शैली में प्रस्तुत है महाकवि माघ की अमर कृति शिशुपाल वध महाकाव्य में क्रमशः प्रथम और 14 वर्ग में नारद और युधिष्ठिर भीष्म के मुख से श्री कृष्ण का प्रस्तुत कर आते हैं भाषा कठिन होने पर भी यहां का संयोग है यह सभी कवि ईशा के एक शतक पूर्व से लेकर 21 तक के माने जाते हैं
काव्य परंपरा में ही द्वादश शतक के श्रीहर्ष ने अपने नैषधीयचरितम् महाकाव्य के 21 में स्वर्ग में भगवान विष्णु की स्तुति की है यहां भगवान को सूक्ष्म से सूक्ष्म महान से महान बताते हुए अहिंसा में उन्हें भगवान बुद्ध के समान बताया गया है अलंकारिक तथा पंडित कवि होने के नाते श्री हर्ष ने अपनी कविता में नमक आदि अलंकारों का भी अच्छा पुट दिया है यहां व्याकरण का पांडित्य तो हर जगह बिखरे पड़े हैं नमी शताब्दी के कवि रत्नाकर का हर विषय महाकाव्य में कवि ने 200 श्लोकों में भगवान शंकर तथा 170 श्लोकों में चंडिका देवी का स्तोत्र किया है यह स्तोत्र गौरी रीति में निबंध होने के साथ-साथ पौराणिक भावों को लेते हुए जैन बौद्ध पद्धति को भी समाविष्ट किए हैं रत्नाकर की वक्रोक्ति पचासी का आहार्य कविता सम्मानित होने पर भी प्रकारांतर से भगवान शिव की वंदना प्रस्तुत करती है
स्तोत्र ओं कि अभी छीनने परंपरा
स्तोत्र कार्यों की परंपरा में आचार्य शंकर को सर्वप्रथम रखा जा सकता है जिनका समय ईशा के कई शताब्दी पूर्व से लेकर ईशा की कई शताब्दी बाद तक भिन्न-भिन्न मतों से निर्धारित किया गया है महाकवि बाण सम्राट हर्षवर्धन के सभापंडित और हर्ष चरित कथा कादंबरी नामक आख्यायिका तथा कथा काव्य के लेखक थे बांधने भगवती की स्तुति में 100 श्लोकों में चंडी शतक लिखा है स्तोत्र की भाषा प्रांजल तथा अलंकारिक होने पर भी भक्ति भावना से परिपूर्ण है इसके अतिरिक्त उन्होंने कादंबरी में ब्रह्मा त्रिगुणात्मक परमेश्वर तथा भगवान शिव की वंदना की है हर्ष चरित में उन्होंने तीन लोक के मूल कारण भगवान शिव तथा भगवती पार्वती को नमस्कार किया है बाण के समकालीन तथा उनके संबंधी कवि मयूर ने भगवान सूर्य की स्थिति में सूर्य शतक लिखा कहा जाता है कि मयूर को श्राप बोर्ड हो गया था भगवान सूर्य का शतक लिखकर वह कुष्ठ रोग से मुक्त हो गए थे तो तुर्की भाषा अत्यंत और भी है शैली की हड़ताल या श्रीहर्ष किसी की भी कृति से तुलना की जा सकती है बाण मयूर के पूर्ववर्ती महाकवि कालिदास के नाम से दो स्तोत्र ग्रंथों का उल्लेख किया जाता है भगवती काली की स्तुति में लिखा गया काली स्तोत्र तथा जगत पावनी गंगा देवी के तब हमें अष्टक स्तोत्र है
भगवान आचार्य शंकर
शंकराचार्य के साथ अनेक प्रसिद्ध तोतों का नाम जुड़ा हुआ है सूत्रों के अतिरिक्त उन्होंने ब्रह्मा सूत्र गीता और उपनिषदों पर भाषा लिखे हैं उनके स्तोत्र हैं

 इसके अतिरिक्त अन्य स्त्रोतों को मिलाकर कुल 200 से भी अधिक स्तोत्र भगवान शंकर के नाम से उपलब्ध हैं इन स्तोत्र ओं में भक्ति शिव तथा शक्ति तंत्र वेदांत दर्शन आदि के घनत्व उपदेश सरस्वत सरल संयोग राही हृदय को स्पर्श करने वाले व्यंजन आत्मक शब्द माधुरी में गठित अलंकार रस भरी सहज ही मन को मोह लेते हैं इन सूत्रों की सबसे बड़ी विशेषता है यह तथा मिठास के साथ साथ भक्ति का अविरल प्रवाह आदि होने पर भी आचार्य शंकर ने भक्ति को ही मोक्ष का परम साधन माना है
 मूर्ख कवि
 आचार्य शंकर की परंपरा में बीच में आचार्य और भक्ति नामक कामाक्षी स्तोत्र लिखा जिसे मुख पंचशती भी कहा जाता है इनका समय 300 96 ईसवी से 436 भी माना जाता है उनके तथा मणि और मेथी की पर्याप्त की है कहा जाता है कि वह जन्म थे भगवती की कृपा से शक्ति प्राप्त की और उनकी स्थिति में उन्होंने 500 श्लोकों में उक्त पंचशती का पूर्णिया परीक्षाओं के नाम है आर या पार बिंद कटाक्ष तथा मृतकों की गंभीरता में दुर्वासा की क्षति या ललिता रत्न से समानता रखती है
 आचार्य कुलशेखर
केरल के राजा कुल शेखर 700 ईसवी ने भगवान विष्णु की स्तुति में मुकुंद माला नामक स्तोत्र की रचना की थी वैष्णव संत कुल शेखर अलवर से अभिनय है
कवि पुष्पदंत आशुतोष भगवान शंकर की स्तुति में लिखा गया महिम्न स्तोत्र पुष्पदंत कभी की अमर कृति तथा भक्त समाज का ह्रदय रखना है कहा जाता है कि पुष्पदंत भगवान शिव के पार से चरण से अपराध व शिव के हिसाब से गंधर्व हो गए बाद में उक्त स्तोत्र का निर्माण कर भगवान को प्रसन्न कर लिया और पुनः अपनी पूर्व अवस्था को प्राप्त कर गए कथासरित्सागर के अनुसार पुष्पदंत स्नेही कात्यायन के रूप में अवतरण होकर स्तोत्र का प्रण किया था विष्णु तंत्र में पुष्पदंत को विष्णु का गण बताया गया है इनका वास्तविक नाम समय अज्ञात है परवर्ती कृपया ग्रंथों में महिम्न स्तोत्र के अनेक पद्य प्रस्तुत किए गए हैं जिनके आधार पर पुष्पदंत को नवी शताब्दी के पूर्वार्ध में स्थापित किया जाता है इनके स्तोत्र में कुल 40 लोग हैं या स्तोत्र विचारों सहज शुद्ध भक्ति तथा भगवान शिव को समानता सर्वोच्च सत्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है कभी ने यहां शिव के सगुण निर्गुण दोनों रूपों की अवतार अवतार ना की है बाण तथा में मयूर के शतकों की शैली में लिखा गया स्तोत्र रस भाव अलंकार और सर्वज्ञ है जिसकी तरंग में पाठक अपने आप को सर्वथा भूल जाता है लघु आकार होने पर भी कितना महत्वपूर्ण स्तोत्र इससे पता चलता है कि ईश्वर अब तक 20 से अधिक की गाएं लिखी जा चुकी है मधुसूदन सरस्वती तथा श्री राम कृष्ण स्तोत्र से प्रभावित हुए थे गणेश महीना स्तुति नाम की रचना भी इन्हीं आचार्य की मानी जाती है
इस काल में लक्ष्मण आचार्य ने 50 लोगों का चंडी कुछ पंचायत सी का लिखी पुष्पदंत के ही समकालीन तथा कश्मीर के राजा अवंती वर्मा के आश्रित का भी अन्य लोक काव्य शास्त्रीय ध्वनि ग्रंथ के प्रणेता कार्य शास्त्री आचार्य आनंद वर्धन ने देवी पार्वती की स्तुति में देवी शतक कब पूर्ण किया
उत्पल देव
आचार्य अभिनव गुप्त के गुरुजनों में उत्पल देव का प्रमुख स्थान है उनका समय दर्शन शताब्दी का पूर्वार्ध माना जाता है भगवान शिव के अनुपम अनुराग से उन्होंने शिव स्तोत्र आवली की रचना की इसमें विभिन्न प्रकार के 21 पुत्र हैं सभी भगवान शिव के अनुपम कार्यों की प्रशंसा में लिखे गए हैं यहां कभी भगवान के महत्व का गुणगान है तो कभी उनके अलौकिक कृतियों का वर्णन और कभी उनके विभिन्न नामों का महत्व प्रतिपादन भारद्वाज भक्ति को यहां मोक्ष रस कहा गया है कविता गई होने पर भी रूपक आदि अलंकारों की योजना से मंडित है कश्मीरी होने के कारण आचार्य बलदेव और उनकी इस कृति को सहवाग में महत्वपूर्ण स्थान है
 नवी शताब्दी के ही कभी शाम बने भगवान सूर्य की स्थिति में शांबिका लिखी रामानुजाचार्य के गुरु यमुनाचार्य 10 वीं शताब्दी ने चतुश्लोकी लक्ष्मी की स्तुति स्तोत्र विष्णु की स्तुति तथा राम प्रेमाश्रम की रचना की 11वीं शती के खेमराज ने शिव स्तोत्र तथा भैरव अनुक्रम स्तोत्र लिखा इसी समय पूर्व क्षेत्र श्री रामानुजाचार्य ने आत्म गीत कब लिखा शरणागत तथा श्री आचार्य श्री रामानुज के शिष्य श्री बसंत ने सृष्टि मानव व राजस्व तथा बैकुंठ स्तोत्र का निर्माण किया इन्हीं के पुत्र पराशर भट्ट ने श्रीरंग राजस्व और श्री गोश्त नाम के दोस्तों की रचना कविताएं गीत गोविंद कार जयदेव कृष्ण लीला गीत गीत गोविंद को श्रृंगार काव्य माना जाता है यह उत्तम गीतिकाव्य है जयदेव ने भगवती गंगा की स्थिति में गंगा नामक प्रसिद्ध स्तोत्र ग्रंथ 

सोमवार, 29 जुलाई 2019

सूर्य की उपासना, स्तोत्र तथा फल


मकर संक्रांति पर्व का मुख्य आधार सूर्य हैं। इस दिन सूर्यदेव की विशेष उपासना की जाती है। सूर्य साक्षात् देवता माने जाते हैं। ये शीघ्र मनोकामनाएं पूरी करते हैं। छठ पर्व तथा भगवान सूर्य पर आधारित मकर संक्रांति जैसे पर्वों पर सूर्य की उपासना के लिए यहाँ स्तोत्र दिया जा रहा है। प्रतिदिन प्रातः काल सूर्य को अर्घ्य देकर  सूर्याष्टक का पाठ करना फलदायी होता है। जो व्यक्ति इस सूर्याष्टक को पढ़ता है उसकी सभी ग्रह बाधा दूर हो जाती है। जिसे पुत्र नहीं है उसे पुत्र प्राप्त होता है। (संस्कृत में पुल्लिंग शब्द कहने से स्त्रीलिंग का भी ग्रहण होता है अतः रुत्र से पुत्र और पुत्री दोनों समझना चाहिए) दरिद्र धनवान हो जाता है। सविवार के दिन जो मांसाहर और मधु पान (शराब आदि मादक पदार्थ का सेवन) करता है, वह सात जन्मों तक रोगी रहता है। वह हमेशा दरिद्रता से घिरा रहता है। जो लोग रविवार के दिन स्त्री, तेल, मधु, मांस का सेवन नहीं करते उसे शोक, दरिद्रता और बीमारी नहीं होती है। वह सूर्यलोक को जाता है।

सूर्याष्टकम्

आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमोस्तु ते।।

सप्ताश्व-रथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।

लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम् ।।

त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।

बृंहितं तेज:पुजं च वायुराकाशमेव च।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।

बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम्।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।

तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेज: प्रदीपनम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।

तं सूर्य जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणामाम्यहम्।।
इति सूर्याष्टकम्

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।

पूर्व गिरी उदयाचल तथा पश्चिम गिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति (सूर्य के उदित होने पर ही दिन होता है) आपको प्रणाम है।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।

आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है,आपको नमस्कार है।

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।

उग्र (अभक्तों के लिये भयंकर),वीर (शक्तिसंपन्न) और सारंग (शीघ्रगामी) सूर्यदेव को नमस्कार है कमलों को विकसित करनेवाले प्रचंड तेजधारी सूर्य को प्रणाम है ।

आदित्यहृदयस्तोत्रम्

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥१॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपागम्याब्रवीद्राममगस्त्यो भगवानृषिः॥२॥

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसि॥३॥

आदियहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपेन्नित्यमक्षय्यं परमं शिवम्॥४॥

सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्॥५॥

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥६॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः॥७॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥८॥

पितरो वसवः साध्या ह्यश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वह्निः प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥९॥

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकरः॥१०॥

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भुस्त्वष्टा मार्ताण्ड अंशुमान्॥११॥

हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनो भास्करो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः॥१२॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुस्सामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः॥१३॥

आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोद्भवः॥१४॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१५॥

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥१६॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥१७॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय मार्ताण्डाय नमो नमः॥१८॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥१९॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥२०॥

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रवये लोकसाक्षिणे॥२१॥

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥२२॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष एवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥२३॥

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥२४॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव॥२५॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥२६॥

अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।
एवमुक्त्वा तदाऽगस्त्यो जगाम च यथागतम्॥२७॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥२८॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥२९॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥३०॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा  सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥३१॥

॥ इति आदित्यहृदयम्

॥ सूर्याष्टकम् ॥

प्रभाते यस्मिन्नभ्युदितसमये कर्मसु नृणां
प्रवर्तेद् वै चेतो गतिरपि च शीतापहरणम् ।
गतो मैत्र्यं पृथ्वीसुरकुलपतेर्यश्च तमहं
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ १॥

त्रिनेत्रोऽप्यञ्जल्या सुरमुकुटसंवृष्टचरणो
बलिं नीत्वा नित्यं स्तुतिमुदितकालास्तसमये ।
निधानं यस्यायं कुरुत इति धाम्नामधिपतिः
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ २॥

मृगाङ्के मूर्तित्वं ह्यमरगण-भर्ताऽकृत इति
नृणां वर्त्माऽत्मात्मेक्षिणितविदुषां यश्च यजताम् ।
क्रतुर्लोकानां यो लयभरभवेषु प्रभुरयं
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ३॥

दिशः खं कालो भूरुदधिरचलं चाक्षुषमिदं
विभागो येनायं निखिलमहसा दीपयति तान् ।
स्वयं शुद्धं संविन्निरतिशयमानन्दमजरं
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ४॥

वृषात्पञ्चस्वेत्यौढयति दिनमानन्दगमनस्-
तथा वृद्धिं रात्रैः प्रकटयति कीटाज्जवगतिः ।
तुले मेषे यातो रचयति समानं दिननिशं
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ५॥

वहन्ते यं ह्यश्वा अरुणविनियुक्ताः प्रमुदितास्-
त्रयीरूपं साक्षाद् दधति च रथं मुक्तिसदनम् ।
न जीवानां यं वै विषयति मनो वागवसरो
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ६॥

तथा ब्रह्मा नित्यं मुनिजनयुता यस्य पुरत-
श्चलन्ते नृत्यन्तोऽयुतमुत रसेनानुगुणितम् ।
निबध्नन्ती नागा रथमपि च नागायुतबला
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ७॥

प्रभाते ब्रह्माणं शिवतनुभृतं मध्यदिवसे
तथा सायं विष्णुं जगति हितकारी सुखकरम् ।
सदा तेजोराशिं त्रिविधमथ पापौघशमनं
नमामि श्रीसूर्यं तिमिरहरणं शान्तशरणम् ॥ ८॥

मतं शास्त्राणां यत्तदनु रघुनाथेन रचितं
शुभे चुंराग्रामे तिमिरहरसूर्याष्टकमिदम् ।
त्रिसन्ध्यायां नित्यं पठति मनुजोऽनन्यगतिकां-
श्चतुर्वर्गप्राप्तौ प्रभवति सदा तस्य विजयम् ॥ ९॥

नन्देन्द्वङ्कक्षितावब्दे (१९१९) मार्गमासे शुभे दले ।
सूर्याष्टकमिदं प्रोक्तं दशम्यां रविवासरे ॥ १०॥


इति श्रीपण्डितरघुनाथशर्मणा विरचितं श्रीसूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।



शिव स्तोत्र

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शिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम्


नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय भस्माङ्गरागाय महेश्वराय।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय तस्मै नकाराय नमः शिवाय॥१॥

मन्दाकिनीसलिलचन्दनचर्चिताय नन्दीश्वरप्रमथनाथमहेश्वराय।
मन्दारपुष्पबहुपुष्पसुपूजिताय तस्मै मकाराय नमः शिवाय॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द- सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय तस्मै शिकाराय नमः शिवाय॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य- मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय
चन्द्रार्कवैश्वानरलोचनाय तस्मै वकाराय नमः शिवाय॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय पिनाकहस्ताय सनातनाय
दिव्याय देवाय दिगम्बराय तस्मै यकाराय नमः शिवाय॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते॥

शिवताण्डवस्तोत्रम्

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम्॥१॥
                  (श्लोक संख्या १ किसी किसी पाठ में नहीं मिलता है )
धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि॥३॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि॥४॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटकः
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥५॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम्।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदे शिरो जटालमस्तु नः॥६॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल-
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक-
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम॥७॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्-
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः॥८॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा (च्छटा)-
विडम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम्।
(विडम्बिकण्ठकन्धरारुचिप्रबद्धकन्धरम्।)
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे॥९॥

अखर्व- सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम्।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे॥१०॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस-
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट्।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल-
ध्वनिक्रमप्रवर्तित- प्रचण्डताण्डवः शिवः॥११॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्-
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रवृत्तिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम्॥१२॥
(समं प्रवर्तयन्मयः कदा सदाशिवं भजे॥१२॥)

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन्।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम्॥१३॥

निलिम्प-नाथनागरी-कदम्ब-मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म-धूष्णिकामनोहरः।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः॥१४॥

प्रचण्ड-वाडवानल-प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत-जल्पना।
विमुक्त-वाम-लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम्॥१५॥
             (श्लोक संख्या १४ तथा १५  किसी किसी पाठ में नहीं मिलता है )
इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम्।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम्॥१६॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः॥१७॥
इति श्रीरावणकृतं शिवताण्डवस्तोत्रं सम्पूर्णम्

लिङ्गाष्टकम्

ब्रह्ममुरारिसुरार्चितलिङ्गं निर्मलभासितशोभितलिङ्गम् ।
जन्मजदुःखविनाशकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥१॥

देवमुनिप्रवरार्चितलिङ्गं कामदहं करुणाकरलिङ्गम् ।
रावणदर्पविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥२॥

सर्वसुगन्धिसुलेपितलिङ्गं बुद्धिविवर्धनकारणलिङ्गम् ।
सिद्धसुरासुरवन्दितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥३॥

कनकमहामणिभूषितलिङ्गं फणिपतिवेष्टितशोभितलिङ्गम् ।
दक्षसुयज्ञविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥४॥

कुङ्कुमचन्दनलेपितलिङ्गं पङ्कजहारसुशोभितलिङ्गम् ।
सञ्चितपापविनाशनलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥५॥

देवगणार्चितसेवितलिङ्गं भावैर्भक्तिभिरेव च लिङ्गम् ।
दिनकरकोटिप्रभाकरलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥६॥

अष्टदलोपरिवेष्टितलिङ्गं सर्वसमुद्भवकारणलिङ्गम् ।
अष्टदरिद्रविनाशितलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥७॥

सुरगुरुसुरवरपूजितलिङ्गं सुरवनपुष्पसदार्चितलिङ्गम् ।
परात्परं परमात्मकलिङ्गं तत् प्रणमामि सदाशिवलिङ्गम् ॥८॥

श्रीविश्वनाथाष्टकम्

गङ्गातरङ्ग-रमणीयजटाकलापं गौरीनिरन्तर-विभूषितवामभागं ।
नारायणप्रियमनङ्ग-मदापहारं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥1।।

वाचामगोचरमनेक-गुणस्वरूपं वागीशविष्णु-सुरसेवित-पादपीठम्
वामेन विग्रहवरेण कलत्रवन्तं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥2।।

भूताधिपं भुजगभूषणभूषिताङ्गं व्याघ्राञ्जिनामबरधरं जटिलं त्रिनेत्रं
पाशाङ्कुशाभय-वरप्रद-शूलपाणिं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥3।।

शीतांशु-शोभित-किरीटविराजमानं भालेक्षणालन-विशोषित-पञ्चबाणं
नागाधिपा-रचितभासुर-कर्णपूरं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥4।।

पञ्चाननं दुरितमत्तमतङ्गजानां  नागान्तकं दनुज-पुङ्गव-पन्नागानां
दावानलं मरण-शोक-जराटवीनां वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥5।।

तेजोमयं सगुण-निर्गुणमद्वितीयं आनन्द-कन्दमपराजित-मप्रमेयं
नागात्मकं सकल-निष्कलमात्मरूपं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥6।।

आशां विहाय परिहृत्य परस्य निन्दां पापे रतिं च सुनिवार्य-मनः समाधौ
आदाय हृत्-कमलमध्यगतं परेशं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥7।।

रागादि दोषरहितं स्वजनानुरागं वैराग्यशान्ति-निलयं गिरिजासहायं
माधुर्य-धैर्य-सुभगं गरलाभिरामं वाराणसीपुरपतिं भज विश्वनाथम्॥8।।

वाराणसी पुरपते स्तवनं शिवस्य व्याख्यातमष्टकमिदं पठते मनुष्यः
विद्यां श्रियं विपुल-सौख्यमनन्त-कीर्तिं सम्प्राप्य देवनिलये लभते च मोक्षम् ॥

चन्द्रशेखराष्टकम्

चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर पाहिमाम् ।
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ १॥

रत्नसानुशरासनं रजतादिशृङ्गनिकेतनं
सिञ्जिनीकृतपन्नगेश्वरमच्युताननसायकम् ।
क्षिप्रदग्घपुरत्रयं त्रिदिवालयैरभिवन्दितं
चन्द्रशेखरमाश्रये मम किं करिष्यति वै यमः ॥ २॥

पञ्चपादपपुष्पगन्धपदाम्बुजद्वयशोभितं
भाललोचनजातपावकदग्धमन्मथविग्रहम् ।
भस्मदिग्धकलेवरं भवनाशनं भवमव्ययं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ३॥

मत्तवारणमुख्यचर्मकृतोत्तरीयमनोहरं
पङ्कजासनपद्मलोचनपुजिताङ्घ्रिसरोरुहम् ।
देवसिन्धुतरङ्गसीकर-सिक्तशुभ्रजटाधरं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ४॥

यक्षराजसखं भगाक्षहरं भुजङ्गविभूषणं
शैलराजसुता-परिष्कृत-चारुवामकलेवरम् ।
क्ष्वेडनीलगलं परश्वधधारिणं मृगधारिणं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ५॥

कुण्डलीकृतकुण्डलेश्वरकुण्डलं वृषवाहनं
नारदादिमुनीश्वरस्तुतवैभवं भुवनेश्वरम् ।
अन्धकान्धकामाश्रितामरपादपं शमनान्तकं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ६॥

भेषजं भवरोगिणामखिलापदामपहारिणं
दक्षयज्ञविनाशनं त्रिगुणात्मकं त्रिविलोचनम् ।
भुक्तिमुक्तफलप्रदं सकलाघसङ्घनिवर्हनं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ७॥

भक्त-वत्सलमर्चितं निधिमक्षयं हरिदम्बरं
सर्वभूतपतिं परात्परमप्रमेयमनुत्तमम् ।
सोमवारिज-भूहुताशनसोमपानिलखाकृतिं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ८॥

विश्वसृष्टिविधायिनं पुनरेव पालनतत्परं
संहरन्तमपि प्रपञ्चमशेषलोकनिवासिनम् ।
क्रीडयन्तमहर्निशं गणनाथयूथ-समन्वितं
चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर चन्द्रशेखर रक्षमाम् ॥ ९॥

मृत्युभीतमृकण्डसूनुकृतस्तवं शिवसन्निधौ
यत्र कुत्र च यः पठेन्नहि तस्य मृत्युभयं भवेत् ।
पूर्णमायुररोगितामखिलार्थसम्पदमादरं
चन्द्रशेखर एव तस्य ददाति मुक्तिमयत्नतः ॥ १०॥
॥ इति चन्द्रशेखराष्टकस्तोत्रं पूर्णम् ॥


कालभैरवाष्टकम्

देवराज-सेव्यमान-पावनाङ्घ्रि-पङ्कजं
व्यालयज्ञ-सूत्रमिन्दु-शेखरं कृपाकरम् ।
नारदादि-योगिवृन्द-वन्दितं दिगम्बरं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 1 ॥

भानुकोटि-भास्वरं भवब्धितारकं परं
नीलकण्ठ-मीप्सितार्थ-दायकं त्रिलोचनम् ।
कालकाल-मम्बुजाक्ष-मक्षशूलमक्षरं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 2 ॥

शूलटङ्क-पाशदण्ड-पाणिमादि-कारणं
श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्र-ताण्डव-प्रियं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 3 ॥

भुक्ति-मुक्ति-दायकं प्रशस्तचारु-विग्रहं
भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोक-विग्रहम् ।
निक्वणन्-मनोज्ञ-हेम-किङ्किणी-लसत्कटिं
काशिकापुराधिनाथ कालभैरवं भजे ॥ 4 ॥

धर्मसेतु-पालकं त्वधर्ममार्ग-नाशकं
कर्मपाश-मोचकं सुशर्म-दायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्ण-केशपाश-शोभिताङ्ग-निर्मलं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 5 ॥

रत्न-पादुका-प्रभाभिराम-पादयुग्मकं
नित्य-मद्वितीय-मिष्ट दैवतं निरञ्जनम् ।
मृत्युदर्प-नाशनं करालदंष्ट्र-भूषणं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 6 ॥

अट्टहास-भिन्न-पद्मजाण्डकोश-सन्ततिं
दृष्टिपात-नष्टपाप-जालमुग्र-शासनम् ।
अष्टसिद्धि-दायकं कपालमालिकाधरं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 7 ॥

भूतसङ्घ-नायकं विशालकीर्ति-दायकं
काशिवासि-लोक-पुण्यपाप-शोधकं विभुम् ।
नीतिमार्ग-कोविदं पुरातनं जगत्पतिं
काशिकापुराधिनाथ-कालभैरवं भजे ॥ 8 ॥

कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं
ज्ञानमुक्ति-साधकं विचित्र-पुण्य-वर्धनम् ।
शोकमोह-लोभदैन्य-कोपताप-नाशनं
ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रि-सन्निधिं ध्रुवम् ॥
इति श्री शंकराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं सम्पूर्णम्।          

द्वादश-ज्योतिर्लिंगानि

सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्‌।
उज्जयिन्यां महाकालमोंकारममलेश्वरम्‌ ॥1

परल्यां वैजनाथं च डाकियन्यां भीमशंकरम्‌।
सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥2

वाराणस्यां तु विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे।
हिमालये तु केदारं धुसृणेशं शिवालये ॥3

एतानि ज्योतिर्लिंगानि सायं प्रातः पठेन्नरः।
सप्तजन्मकृतं पापं स्मरेण विनश्यति ॥4
इति द्वादशज्योतिर्लिंगानि

दक्षिणामूर्तिस्तोत्रम्

ॐ मौनं व्याख्या प्रकटितपरब्रह्मतत्वं युवानं
वर्शिष्ठान्ते वसदृषिगणैरावृतं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलित-चिन्मुद्रमानन्दमूर्तिं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे ॥
वटविटपिसमीपे भूमिभागे निषण्णं
सकलमुनिजनानां ज्ञानदातारमारात् ।
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिदेवं
जननमरणदुःखच्छेद-दक्षं नमामि ॥
चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा ।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तुच्छिन्नसंशयाः ॥
निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् ।
गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः ॥
ॐ नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये ।
निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः ॥
चिदोघनाय महेशाय वटमूलनिवासिने ।
सच्चिदानन्द-रूपाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥
ईश्वरो गुरुरात्मेति मूर्त्तिभेद-विभागिने ।
व्योमवद् व्याप्तदेहाय दक्षिणामूर्तये नमः ॥

विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरी तुल्यं निजान्तर्गतं
पश्यन्नात्मनि मायया बहिरिवोद्भूतं यथा निद्रया ।
यः साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयं
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ 1 ॥

बीजस्यान्तरिवाङ्कुरो जगदितं प्राङ् निर्विकल्पं पुनः
मायाकल्पितदेशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम् ।
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया 
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ 2।।

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमसत्कल्पार्थकं भासते
साक्षात्तत्वमसीति वेदवचसा यो बोधयत्याश्रितान् ।
यत्साक्षात्करणाद्भवेन्न पुनरावृत्तिर्भवाम्भोनिधौ
तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ 3।।

नानाच्छिद्र-घटोदर-स्थित-महादीप-प्रभाभास्वरं
ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरण-द्वारा-बहिः स्पन्दते ।
जानामीति तमेव भान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत्
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 4 ॥

देहं प्राणमपीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्धिं च शून्यं विदुः
स्त्री-बालान्ध-जडोपमास्त्वहमिति भ्रान्ताभृशं वादिनः ।
मायाशक्ति-विलासकल्पित-महाव्यामोह-संहारिणे
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 5 ॥

राहुग्रस्त-दिवाकरेन्दु-सदृशो माया-समाच्छादनात्
सन्मात्रः करणोप-संहरणतो यो‌ऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ।
प्रागस्वाप्समिति प्रभोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 6 ॥

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि
व्यावृत्ता स्वनु-वर्तमानमहमित्यन्तः स्फुरन्तं सदा ।
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 7 ॥

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसम्बन्धतः
शिष्याचार्यतया तथैव पितृ-पुत्राद्यात्मना भेदतः ।
स्वप्ने जाग्रति वा य एष पुरुषो माया परिभ्रामितः
तस्मै श्री गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 8 ॥

भूरम्भांस्यनलो‌ऽनिलो‌ऽम्बर-महर्नाथो हिमांशुः पुमान्
इत्याभाति चराचरात्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकम् ।
नान्यत्किञ्चन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभो
तस्मै गुरुमूर्तये नम इदं श्री दक्षिणामूर्तये ॥ 9 ॥

सर्वात्मत्वमिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन् स्तवे
तेनास्व-श्रवणात्तदर्थ मननाद्ध्यानाच्च सङ्कीर्तनात् ।
सर्वात्मत्वमहाविभूति-सहितं स्यादीश्वरत्वं स्वतः
सिद्ध्येत्तत्पुनरष्टधा परिणतं चैश्वर्य-मव्याहतम् ॥ 10 ॥
॥ इति श्री शङ्कराचार्यविरचितं दक्षिणामूर्तिस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

शिवमानसपूजा-स्तोत्रम्

रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
नानारत्न-विभूषितं मृगमदा-मोदाङ्कितं चन्दनम् ।
जाती-चम्पक-बिल्वपत्र-रचितं पुष्पं च धूपं तथा
दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ॥ १॥

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूर-खण्डोज्ज्वलं
ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥ २॥

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
वीणा-भेरि-मृदङ्ग-काहल-कला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ॥ ३॥

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥ ४॥

करचरण कृतं वाक्-कायजं कर्मजं वा ।
                  श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व ।
                  जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेवशम्भो ॥ ५॥


॥ इति श्री शङ्कराचार्यविरचितं शिवमानसपूजा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

शिवनामावल्यष्टकम्

हे चन्द्रचूड मदनान्तक शूलपाणे
स्थाणो गिरीश गिरिजेश महेश शम्भो।
भूतेश भीतभयसूदन मामनाथं
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥1॥

हे पार्वती-हृदय-वल्लभ चन्द्रमौले
भूताधिप प्रथमनाथ गिरीशजाप।
हे वामदेव भव रुद्र पिनाकपाणे
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥2॥

हे नीलकण्ठ वृषभध्वज पञ्चवक्त्र
लोकेश शेषवलयं प्रमथेश शर्व
हे धूर्जटे पशुपते गिरिजापते मां
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥3॥

हे विश्वनाथ शिव शंकर देवदेव
गङ्गाधर प्रथमनायक नन्दिकेश।
विश्वेश्वरान्धकरिपो हर लोकनाथ
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥4॥

वाराणसीपुरपते मणिकर्णिकेश
वीरेश दक्षमखकाल विभो गणेश।
सर्वज्ञ सर्वह्रदयैकनिवास नाथ
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥5॥

श्रीमन् महेश्वर कृपामय हे दयालो
हे व्योमकेश शितकण्ठ गणाधिनाथ
भस्मांगराग-नृकपाल-कलापमाल
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥6॥

कैलास-शैल-विनिवास वृषाकपे हे
मृत्युञ्जय त्रिनयन त्रिजगन्निवास।
नारायणप्रिय मदापह शक्तिनाथ
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥7॥

विश्वेश विश्वभव-नाशक विश्वरूप
विश्वात्मक त्रिभुवनैकगुणाभिवेश
हे विश्वबन्धु करुणामय दीनबन्धो
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥8॥

गौरीविलासभुवनाय महेश्वराय
पञ्चाननाय शरणागतरक्षकाय।
शर्वाय सर्वजगतामधिपाय तस्मै
संसार-दु:ख-गहनाज्जगदीश रक्ष॥॥9

॥ इति श्री शङ्कराचार्यविरचितं शिवनामावल्यष्टकं सम्पूर्णम् ॥

रुद्राष्टकम्

नमामीशमीशान-निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम् ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम् ।।१।।

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं गिराज्ञानगोतीतमीशं गिरीशम् ।
करालं महाकालकालं कृपालं गुणागारसंसारपारं नतोऽहम् ।।२।।

तुषाराद्रिसंकाशगौरं गभीरं मनोभूतकोटि प्रभाश्रीशरीरम् ।
स्फुरन्मौलिकल्लोलिनी चारुगङ्गा लसद्भालबालेन्दुकण्ठे भुजङ्गा ।।३।।

चलत्कुण्डलं भ्रूसुनेत्रं विशालं प्रसन्नाननं नीलकण्ठं दयालम् ।
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं प्रियं शङ्करं सर्वनाथं भजामि ।।४।।

प्रचण्डं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशमखण्डम् अजं भानुकोटिप्रकाशम् ।
त्रयः शूलनिर्मूलनं शूलपाणिं भजेऽहं भावानीपतिं भावगम्यम् ।।५।।

कलातिकल्याण कल्पान्तकारी सदा सज्जनानन्ददाता पुरारी ।
चिदानंदसंदोह मोहापहारी प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ।।६।।

न यावद् उमानाथपादारविन्दं भजन्तीह लोके परे वा नराणाम् ।
न तावत्सुखं शान्ति-संतापनाशं प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासम् ।।७।।

न जानामि योगं जपं नैव पूजां नतोऽहं सदा सर्वदा शम्भुतुभ्यम् ।
जरजन्मदुःखौघ-तातप्यमानं प्रभो पाहि आपन्नमामीश शम्भो ।।८।।

रुद्रष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ।।

।। इति श्री गोस्वामी-तुलसीदास-कृतं  रुद्राष्टकं संपूर्णम् ।।

बिल्वपत्र उत्पत्ति कैसे हुई?

 बिल्व पत्र लक्ष्मी के स्तन से उत्पन्न हुआ या शरीर से? जी हाँ, यह स्तोत्र लिखते समय मुझे दो पाठ मिले।
लक्ष्म्या: स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।
        तथा
लक्ष्म्या: तनुत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम्।
प्रथम पाठ में लिखे स्तनत मूल रूप से स्तन तः शब्द है जिसका अर्थ होगा- स्तन से। इस श्लोक का पाठ भेद मिला जिसमें स्तन तः के स्थान पर तनुत लिखा मिला। व्याकरण नियम के कारण तनुतः में विसर्ग का लोप हो गया है। तनु तः का अर्थ है शरीर से। आप बोलेंगें शरीर में ही तो स्तन भी है। स्तनत बोलो या तनुत बात एक ही है। मूल पाठ तो स्तनत ही है परन्तु कुछ भक्त मां लक्ष्मी के इस अंग का नाम बोलना अश्लील जनक मानते होंगें, वे गोस्वामी तुलसीदास जैसे सीता चरण चोंच हति भागा वाले होंगें अतः उसे तनुत कर दिया। निर्णय आपको करना है कि कि आप दोंनो में से किस पाठ को स्वीकर करना चाहेंगें। बिल्ववृक्ष उत्पत्ति की कथा अन्तर्जाल पर उपलब्ध है।

श्रीबिल्वाष्टकम्

त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्रं च त्रियायुधम् ।
त्रिजन्मपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥१॥

त्रिशाखैः बिल्वपत्रैश्च ह्यच्छिद्रैः कोमलैः शुभैः ।
शिवपूजां करिष्यामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥२॥

अखण्ड-बिल्व-पत्रेण पूजिते नन्दिकेश्वरे ।
शुद्ध्यन्ति सर्वपापेभ्यो ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥३॥

शालिग्राम-शिलामेकां विप्राणां जातु चार्पयेत् ।
सोमयज्ञ-महापुण्यं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥४॥

दन्तिकोटिसहस्राणि वाजपेयशतानि च ।
कोटिकन्या-महादानं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥५॥

लक्ष्म्याः स्तनत उत्पन्नं महादेवस्य च प्रियम् ।
बिल्ववृक्षं प्रयच्छामि ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥६॥

दर्शनं बिल्ववृक्षस्य स्पर्शनं पापनाशनम् ।
अघोरपापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणम् ॥७॥

काशीक्षेत्रनिवासं च कालभैरवदर्शनम् ।
प्रयागमाधवं दृष्ट्वा ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥

मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।
अग्रतः शिवरूपाय ह्येकबिल्वं शिवार्पणम् ॥८॥

बिल्वाष्टकमिदं पुण्यं यः पठेत् शिवसन्निधौ ।
सर्वपाप-विनिर्मुक्तः शिवलोकमवाप्नुयात् ॥९॥


॥ इति श्रीबिल्वाष्टकम् ॥


॥ महादेवाष्टकम् ॥


शिवं शान्तं शुद्धं प्रकटमकलङ्कं श्रुतिनुतं
     महेशानं शम्भुं सकल-सुर-संसेव्यचरणम् ।
गिरीशं गौरीशं भवभयहरं निष्कलमजं
     महादेवं वन्दे प्रणतजनतापोपशमनम् ॥ १॥

सदा सेव्यं भक्तैर्हृदि वसन्तं गिरिशय-
     मुमाकान्तं क्षान्तं करधृतपिनाकं भ्रमहरम् ।
त्रिनेत्रं पञ्चास्यं दशभुजमनन्तं शशिधरं
     महादेवं वन्दे प्रणतजनतापोपशमनम् ॥ २॥

चिताभस्मालिप्तं भुजग-मुकुटं विश्वसुखदं
     धनाध्यक्षस्याङ्गं त्रिपुरवधकर्तारमनघम् ।
करोटीखट्वाङ्गे ह्यरसि च दधानं सृतिहरं
     महादेवं वन्दे प्रणतजन-तापोपशमनम् ॥ ३॥

सदोत्साहं गङ्गाधरमचलमानन्दकरणं
     पुरारातिं भातं रतिपतिहरं दीप्तवदनम् ।
जटाजूटैर्जुष्टं रसमुख-गणेशानपितरं
     महादेवं वन्दे प्रणतजन-तापोपशमनम् ॥ ४॥

वसन्तं कैलासे सुरमुनिसभायां हि नितरां
     ब्रुवाणं सद्धर्मं निखिलमनुजानन्दजनकम् ।
महेशानी साक्षात्सनकमुनि-देवर्षिसहिता
     महादेवं वन्दे प्रणतजन-तापोपशमनम् ॥ ५॥

शिवां स्वे वामाङ्गे गुहगणपतिं दक्षिणभुजे
     गले कालं व्यालं जलधिगरलं कण्ठविवरे ।
ललाटे श्वेतेन्दुं जगदपि दधानं च जठरे
     महादेवं वन्दे प्रणतजन-तापोपशमनम् ॥ ६॥

सुराणां दैत्यानां बहुलमनुजानां बहुविधं
     तपःकुर्वाणानां झटिति फलदातारमखिलम् ।
सुरेशं विद्येशं जलनिधिसुताकान्तहृदयं
     महादेवं वन्दे प्रणतजनतापोपशमनम् ॥ ७॥

वसानं वैयाघ्रीं मृदुलललितां कृत्तिमजरां
     वृषारूढं सृष्ट्यादिषु कमलजाद्यात्मवपुषम् ।
अतर्क्यं निर्मायं तदपि फलदं भक्तसुखदं
     महादेवं वन्दे प्रणतजनतापोपशमनम् ॥ ८॥

इदं स्तोत्रं शम्भोर्दुरितदलनं धान्यधनदं
     हृदि ध्यात्वा शम्भुं तदनु रघुनाथेन रचितम् ।
नरः सायम्प्रातः पठति नियतं तस्य विपदः
     क्षयं यान्ति स्वर्गं व्रजति सहसा सोऽपि मुदितः ॥ ९॥


इति पण्डितरघुनाथशर्मणा विरचितं श्रीमहादेवाष्टकं समाप्तम् ।

श्रीकाशीविश्वनाथस्तोत्रम्

कण्ठे यस्य लसत्करालगरलं गङ्गाजलं मस्तके
वामाङ्गे गिरिराजराजतनया जाया भवानी सती ।
नन्दि-स्कन्दगणाधिराज-सहिता श्रीविश्वनाथप्रभुः
काशीमन्दिरसंस्थितोऽखिलगुरुर्देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १॥

यो देवैरसुरैर्मुनीन्द्रतनयैर्गन्धर्वयक्षोरगै-
र्नागैर्भूतलवासिभिर्द्विजवरैः संसेवितः सिद्धये ।
या गङ्गोत्तरवाहिनी परिसरे तीर्थेरसङ्ख्यैर्वृता
सा काशी त्रिपुरारिराजनगरी देयात्सदा मङ्गलम् ॥ २॥

तीर्थानां प्रवरा मनोरथकरी संसारपारापरा-
नन्दा नन्दिगणेश्वरैरुपहिता देवैरशेषैः स्तुता ।
या शम्भोर्मणिकुण्डलैककणिका विष्णोस्तपोदीर्घिका
सेयं श्रीमणिकर्णिका भगवती देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ३॥

एषा धर्मपताकिनी तटरुहासेवावसन्नाकिनी
पश्यन्पातकिनी भगीरथतपःसाफल्यदेवाकिनी ।
प्रेमारूढपताकिनी गिरिसुता सा केकरास्वाकिनी
काश्यामुत्तरवाहिनी सुरनदी देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ४॥

विघ्नावासनिवासकारणमहागण्डस्थलालम्बितः
सिन्दूरारुणपुञ्जचन्द्रकिरणप्रच्छादिनागच्छविः ।
श्रीविश्वेश्वरवल्लभो गिरिजया सानन्दकानन्दितः
स्मेरास्यस्तव ढुण्ढिराजमुदितो देयात्सदा मङ्गलम् ॥। ५॥ ।

केदारः कलशेश्वरः पशुपतिर्धर्मेश्वरो मध्यमो
ज्येष्ठेशो पशुपश्च कन्दुकशिवो विघ्नेश्वरो जम्बुकः ।
चन्द्रेशो ह्यमृतेश्वरो भृगुशिवः श्रीवृद्धकालेश्वरो
मध्येशो मणिकर्णिकेश्वरशिवो देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ६॥

गोकर्णस्त्वथ भारभूतनुदनुः श्रीचित्रगुप्तेश्वरो
यक्षेशस्तिलपर्णसङ्गमशिवो शैलेश्वरः कश्यपः ।
नागेशोऽग्निशिवो निधीश्वरशिवोऽगस्तीश्वरस्तारक-
ज्ञानेशोऽपि पितामहेश्वरशिवो देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ७॥

ब्रह्माण्डं सकलं मनोषितरसै रत्नैः पयोभिर्हरं
खेलैः पूरयते कुटुम्बनिलयान् शम्भोर्विलासप्रदा ।
नानादिव्यलताविभूषितवपुः काशीपुराधीश्वरी
श्रीविश्वेश्वरसुन्दरी भगवती देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ८॥

या देवी महिषासुरप्रमथनी या चण्डमुण्डापहा
या शुम्भासुररक्तबीजदमनी शक्रादिभिः संस्तुता ।
या शूलासिधनुःशराभयकरा दुर्गादिसन्दक्षिणा-
माश्रित्याश्रितविघ्नशंसमयतु देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ९॥

आद्या श्रीर्विकटा ततस्तु विरजा श्रीमङ्गला पार्वती
विख्याता कमला विशालनयना ज्येष्ठा विशिष्टानना ।
कामाक्षी च हरिप्रिया भगवती श्रीघण्टघण्टादिका
मौर्या षष्टिसहस्रमातृसहिता देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १०॥

आदौ पञ्चनदं प्रयागमपरं केदारकुण्डं कुरु-
क्षेत्रं मानसकं सरोऽमृतजलं शावस्य तीर्थं परम् ।
मत्स्योदर्यथ दण्डखाण्डसलिलं मन्दाकिनी जम्बुकं
घण्टाकर्णसमुद्रकूपसहितो देयात्सदा मङ्गलम् ॥ ११॥

रेवाकुण्डजलं सरस्वतिजलं दुर्वासकुण्डं ततो
लक्ष्मीतीर्थलवाङ्कुशस्य सलिलं कन्दर्पकुण्डं तथा ।
दुर्गाकुण्डमसीजलं हनुमतः कुण्डप्रतापोर्जितः
प्रज्ञानप्रमुखानि वः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १२॥

आद्यः कूपवरस्तु कालदमनः श्रीवृद्धकूपोऽपरो
विख्यातस्तु पराशरस्तु विदितः कूपः सरो मानसः ।
जैगीषव्यमुनेः शशाङ्कनृपतेः कूपस्तु धर्मोद्भवः
ख्यातः सप्तसमुद्रकूपसहितो देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १३॥

लक्ष्यीनायकबिन्दुमाधवहरिर्लक्ष्मीनृसिंहस्ततो
गोविन्दस्त्वथ गोपिकाप्रियतमः श्रीनारदः केशवः ।
गङ्गाकेशववामनाख्यतदनु श्वेतो हरिः केशवः
प्रह्लादादिसमस्तकेशवगणो देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १४॥

लोलार्को विमलार्कमायुखरविः संवर्तसंज्ञो रवि-
र्विख्यातो द्रुपदुःखखोल्कमरुणः प्रोक्तोत्तरार्को रविः ।
गङ्गार्कस्त्वथ वृद्धवृद्धिविबुधा काशीपुरीसंस्थिताः
सूर्या द्वादशसंज्ञकाः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १५॥

आद्यो ढुण्डिविनायको गणपतिश्चिन्तामणिः सिद्धिदः
सेनाविघ्नपतिस्तु वक्त्रवदनः श्रीपाशपाणिः प्रभुः ।
आशापक्षविनायकाप्रषकरो मोदादिकः षड्गुणो
लोलार्कादिविनायकाः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १६॥।

हेरम्बो नलकूबरो गणपतिः श्रीभीमचण्डीगणो
विख्यातो मणिकर्णिकागणपतिः श्रीसिद्धिदो विघ्नपः ।
मुण्डश्चण्डमुखश्च कष्टहरणः श्रीदण्डहस्तो गणः
श्रीदुर्गाख्यगणाधिपः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १७॥

आद्यो भैरवभीषणस्तदपरः श्रीकालराजः क्रमा-
च्छ्रीसंहारकभैरवस्त्वथ रुरुश्चोन्मत्तको भैरवः ।
क्रोधश्चण्डकपालभैरववरः श्रीभूतनाथादयो
ह्यष्टौ भैरवमूर्तयः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १८॥

आधातोऽम्बिकया सह त्रिनयनः सार्धं गणैर्नन्दितां
काशीमाशु विशन् हरः प्रथमतो वार्षध्वजेऽवस्थितः ।
आयाता दश धेनवः सुकपिला दिव्यैः पयोभिर्हरं
ख्यातं तद्वृषभध्वजेन कपिलं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ १९॥

आनन्दाख्यवनं हि चम्पकवनं श्रीनैमिषं खाण्डवं
पुण्यं चैत्ररथं त्वशाकविपिनं रम्भावनं पावनम् ।
दुर्गारण्यमथोऽपि कैरववनं वृन्दावनं पावनं
विख्यातानि वनानि वः प्रतिदिनं देयात्सदा मङ्गलम् ॥ २०॥

अलिकुलदलनीलः कालदंष्ट्राकरालः
सजलजलदनीलो व्यालयज्ञोपवीतः ।
अभयवरदहस्तो डामरोद्दामनादः
सकलदुरितभक्षो मङ्गलं वो ददातु ॥ २१॥

अर्धाङ्गे विकटा गिरीन्द्रतनया गौरी सती सुन्दरी
सर्वाङ्गे विलसद्विभूतिधवलो कालो विशालेक्षणः ।
वीरेशः सहनन्दिभृङ्गिसहितः श्रीविश्वनाथः प्रभुः
काशीमन्दिरसंस्थितोऽखिलगुरुर्देयात्सदा मङ्गलम् ॥ २२॥

यः प्रातः प्रयतः प्रसन्नमनसा प्रेमप्रमोदाकुलः
ख्यातं तत्र विशिष्टपादभुवनेशेन्द्रादिभिर्यत्स्तुतम् ।
प्रातः प्राङ्मुखमासनोत्तमगतो ब्रूयाच्छृणोत्यादरात्
काशीवासमुखान्यवाप्य सततं प्रीते शिवे धूर्जटि ॥ २३॥


इति श्री शङ्कराचार्यविरचितं काशीविश्वनाथस्तोत्रम् ॥

अपराध-भञ्जन-स्तोत्रम्

शान्तं पद्मासनस्थं शशिधरमुकुटं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रं
शूलं वज्रं च खड्गं परशुमपि वरं दक्षिणाङ्गे वहन्तम् ।
नागं पाशं च घण्टां डमरुकसहितं चाङ्कुशं वामभागे
नानालङ्कारदीप्तं स्फटिकमणिनिभं पार्वतीशं भजामि ॥१॥

वन्दे देवमुमापतिं सुरगुरुं वन्दे जगत्कारणं
वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशूनां पतिम् ।
वन्दे सूर्यशशाङ्कवह्निनयनं वन्दे मुकुन्दप्रियं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ॥२॥

आदौ कर्मप्रसङ्गात्कलयति कलुषं मातृकुक्षौ स्थितः सन्-
विण्मूत्रामेध्यमध्ये व्यथयति नितरां जाठरो जातवेदाः ।
यद्यद्वा सांब दुःखं विषयति विषमं शक्यते केन वक्तुं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शंभो ॥३॥

बाल्ये दुःखातिरेको मललुलितवपुः स्तन्यपाने पिपासा
नो शक्यं चेन्द्रियेभ्यो भवगुणजनिता जन्तवो मां तुदन्ति ।
नानारोगोत्थदुःखादुदरपरिवशः शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥४॥

प्रौढोऽहं यौवनस्थो विषयविषधरैः पञ्चभिर्मर्मसन्धौ
दषटो नष्टो विवेकः सुतधन युवतिस्वादुसौख्ये निषण्णाः
शैवे चिन्ताविहीनं मम हृदयमहो मानगर्वाधिरूढं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥५॥

वार्धक्ये चेन्द्रियाणां विगतगतनतैराधिदैवादितापैः
पापैर्रोगैर्वियोगैरसदृशवपुषं प्रौढहीनं च दीनम् ।
मिथ्यामोहाभिलाषैर्भ्रमति मम मनो धूर्जटेर्ध्यानशून्यं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥६॥

नो शक्यं स्मार्तकर्म प्रतिपदगहनमत्यवायाकुलाख्यं
श्रौतं वार्ता कथं मे द्विजकुलविहिते ब्रह्ममार्गे च सारे ।
नष्टो धर्म्यो विचारः श्रवणमननयोः को निदिध्यासितव्यः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥७॥

स्त्नात्वा प्रत्यूषकाले स्नपनविधिविधामाहृतं गाङ्गतोयं
पूजार्थं वा कदाचिद्बहुतरुगहनात खण्डबिल्वैकपत्रम् ।
नानीता पद्ममाला सरसि विकसिता गन्धपुष्पे त्वदर्थं
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥८॥

दुग्धैर्मध्वाज्ययुक्तैर्घटशतसहितैः स्नापितं नैव लिङ्गं
नो लिप्तं चन्दनाद्यैः कनकविरचितैः पूजितं न प्रसूनैः ।
धूपैः कर्पूरदीपैर्विविधरसयुतैर्नैव भक्ष्योपहारैः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥ ९॥

नग्नो निःसङ्गशुद्धस्त्रिगुणविरहितो ध्वस्तमोहान्धकारो
नासाग्रे न्यस्तदृष्टिर्विहरभवगुणैर्नैव दृष्टं कदाचित् ।
उन्मत्तावस्थया त्वां विगतकलिमलं शङ्करं न स्मरामि
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥१०॥

ध्यानं चित्ते शिवाख्यं प्रचुरतरधनं नैव दत्तं द्विजेभ्यो
हव्यं ते लक्षसंख्यं हुतवहवदने नार्पितं बीजमन्त्रैः ।
नो जप्तं गाङ्गतीरे व्रतपरिचरणै रुद्रजप्यैर्न वेदैः
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शम्भो ॥११॥

स्थित्वा स्थाने सरोजे प्रणवमयमरुत्कुंभके सूक्ष्ममार्गे
शान्ते स्वान्ते प्रलीने प्रकटितगहने ज्योतिरूपे पराख्ये ।
लिङ्गं तत्ब्रह्मवाच्यं सकलमभिमतं नैव दृष्टं कदाचित्
क्षन्तव्यो मेऽपराधः शिव शिव शिव भोः श्रीमहादेव शंभो ॥१२॥

आयुर्नश्यति पश्यतो प्रतिदिनं याति क्षयं यौवनं
प्रत्यायान्ति गताः पुनर्न दिवसाः कालो जगद्भक्षकः ।
लक्षीस्तोयतरङ्गभङ्गचपला विद्युच्चलं जीवनं
तस्मान्मां शरणागतं शरणद त्वं रक्ष रक्षाधुना ॥१३॥

चन्द्रोद्भासितशेखरे स्मरहरे गङ्गाधरे शङ्करे
सपैर्भूषितकण्ठकर्णविवरे नेत्रोत्थवैश्वानरे
दन्तित्वक्कतिसुन्दरांबरधरे त्रैलोक्यसारे हरे
मोक्षार्थं कुरु चित्तवृत्तिममलामन्यैस्तु किं कर्मभिः ॥१४॥

किं दानेन धनेन वाजिकरिभिः प्राप्तेन राज्येन किं
किं वा पुत्रकळत्रमित्रपशुभिर्देहेन गेहेन किम् ।
ज्ञात्वैतत्क्षणभङ्गुरं सपदि रे त्याज्यं मनो दूरतः
स्वात्मार्थं गुरुवाक्यतो भज भज श्रीपार्वतीवल्लभम ॥१५॥

करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा
श्रवणनयनजं वा मानसं वाऽपराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शंभो ॥१६॥

गात्रं भस्मसितं स्मितं च हसितं हस्ते कपालं सितं
खट्वाङ्गं च सितं सितश्च वृषभः कर्णे सिते कुण्डले।
गङ्गाफेनसितं जटावलयकं चन्द्रः सितो मूर्धनि
सोऽयं सर्वसितो ददातु विभवं पापक्षयं शङ्करः ॥१७॥


इत्यपराधभञ्जनस्तोत्रं समाप्तम् ॥

शिव-स्तुतिः

वन्दे देवमुमापतिम सुरगुरुं वन्दे जगतकारणं
 वन्दे पन्नगभूषणं मृगधरं वन्दे पशुनांपतिं ।
वन्दे सूर्यशशांकवंदीनयनं वन्दे मुकुंदप्रियम्
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवम् शङ्करम् ।। १

वन्दे सर्वजगद्-विहारमतुलं वन्देऽन्धकध्वंसिनं
            वन्दे देवशिखामणिं शशिनिभं वन्दे हरेर्वल्लभं ।
वन्दे नाग-भुजङ्ग-भूषणधरं वन्दे शिवं चिन्मयं
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। २

वन्दे दिव्यमचिन्तयमद्वयमहं वन्देऽकदर्पापहं
            वन्दे निर्मलमादिमूलमनिशं वन्दे मखध्वंसिनम् ।
वन्दे सत्यमनन्तमाद्यमभयं वन्देऽतिशान्ताकृतिं
वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ३

वन्दे भूरथमम्बुजाक्ष-विशिखं वन्दे श्रुतीघोटकं
            वन्दे शैलशरासनं फणिगुणं वन्देऽधितुणीरकम् ।
वन्दे पंकजसारथिं पुरहरं वन्दे महाभैरवं
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ४

वन्दे पञ्चमुखाम्बुजं त्रिनयनं वन्दे ललाटेक्षणं
            वन्दे व्योमगतं जटासुमुकुटं चंद्रार्धगंगाधरम् ।
वन्दे भस्मकृत-त्रिपुण्डजटिलं वन्देष्टमूर्त्यात्मकं
            वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ५

वन्दे कालहरं हरं विषधरं वन्दे मृडं धूर्जटिं
वन्दे सर्वगतं दयामृतनिधिं वन्दे नृसिंहापहम् ।
वन्दे विप्र-सुरार्चितांघ्रि-कमलं वन्दे भगाक्षापहं
            वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ६

वन्दे मङ्गलराजताद्रि-निलयं वन्दे सुराधीश्वरं
 वन्दे शंकरमप्रमेयमतुलं वन्दे यमद्वेशिणम् ।
वन्दे कुंडलिराजकुंडलधरं वन्दे सहस्त्राननं
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ७

वन्दे हंसमतीन्द्रियं स्मरहरं वन्दे विरुपेक्षणं
            वन्दे भूतगणेशमव्ययमहं वन्देऽर्थ-राज्य-प्रदम् ।
वन्दे सुन्दर-सौरभेय-गमनं वन्दे त्रिशुलायुधं
            वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ८

वन्दे सूक्ष्ममनन्तमाद्यमभयं वन्देऽन्धकारापहं
 वन्दे रावण-नन्दि-भृङ्गि-विनतं वन्दे सुपर्णावृतम् ।
वन्दे शैलसुतार्धभागवपुषं वन्देऽभयं त्रयम्बकं
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। ९

वन्दे पावनमम्बरात्मविभवं वन्दे महेन्द्रेश्वरम्
            वन्दे भक्तजनाश्रयामरतरुं वन्दे नताभीष्टदम् ।
वन्दे जह्नुसुताम्बिकेशमनिशं वन्दे गणाधीश्वरं
 वन्दे भक्तजनाश्रयं च वरदं वन्दे शिवं शङ्करम् ।। १०


इति शिव-स्तुतिः

वेदसारशिवस्तोत्रम्

पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।
जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्॥।। १

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।
विरूपाक्षमिन्द्वर्क-वह्नित्रिनेत्रं सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्॥ २

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।
भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्॥ ३

शिवाकान्त शम्भो शशाङ्कार्धमौले महेशान् शूलिन् जटाजूटधारिन्।
त्वमेको जगद्-व्यापको विश्वरूप: प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप॥ ४

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं निरीहं निराकारमोङ्कारवेद्यम्।
यतो जायते पाल्यते येन विश्वम् तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्॥ ५

न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायुर्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।
न चोष्णं न शीतं न देशो न वेषो न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे॥ ६

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।
तुरीयं तमः पारमाद्यन्तहीनं, प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्॥ ७

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।
नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य॥ ८

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ महादेव शम्भो महेश त्रिनेत्र।
शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः॥ ९

शम्भो महेश करुणामय शूलपाणे गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।
काशीपते करुणया जगदेतदेकस्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि॥ १०

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।
त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश, लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्॥ ११

इति श्री शङ्कराचार्य कृतं वेदसारशिवस्तोत्रं सम्पूर्णम्

।।अर्धनारीश्वरस्तोत्रम्।।


चाम्पेयगौरार्धशरीरकायै कर्पूरगौरार्धशरीरकाय।
धम्मिल्लकायै च जटाधराय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।1।।

कस्तूरिकाकुङ्कुमचर्चितायै चितारजःपुञ्जविचर्चिताय।
कृतस्मरायै विकृतस्मराय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।2।।

झणत्क्वणत्कङ्कणनूपुरायै पादाब्जराजत्फणिनूपुराय।
हेमाङ्गदायै भुजगाङ्गदाय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।3।।

विशालनीलोत्पललोचनायै विकासिपङ्केरुहलोचनाय।
समेक्षणायै विषमेक्षणाय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।4।।

मन्दारमालाकलितालकायै कपालमालाङ्कितकन्धराय।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।5।।

अम्भोधरश्यामलकुन्तलायै तटित्प्रभाताम्रजटाधराय।
निरीश्वरायै निखिलेश्वराय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।6।।

प्रपञ्चसृष्ट्युन्मुखलास्यकायै समस्तसंहारकताण्डवाय।
जगज्जनन्यै जगदेकपित्रे नमः शिवायै च नमः शिवाय।।7।।

प्रदीप्तरत्नोज्ज्वलकुण्डलायै स्फुरन्महापन्नगभूषणाय।
शिवान्वितायै च शिवान्विताय नमः शिवायै च नमः शिवाय।।8।।

एतत्पठेदष्ठकमिष्टदं यो भक्त्या स मान्यो भुवि दीर्घजीवी।
प्राप्नोति सौभाग्यमनन्तकालं भूयात्सदा तस्य समस्तसिद्धिः।।9।।

इति श्री शंकराचार्य विरचितम् अर्धनारीश्वरस्तोत्रं संपूर्णम्।।