रविवार, 23 सितंबर 2018

लघुसिद्धान्तकौमुदी (अजन्तपुल्लिंगतः अजन्तनपुंसकलिंगपर्यन्तम्)

  अथ सुबन्ताः
                                अथ अजन्‍तपुँल्‍लिङ्गप्रकरणम् 

११६ अर्थवदधातुरप्रत्‍ययः प्रातिपदिकम्
धातुं प्रत्‍ययं प्रत्‍ययान्‍तं च वर्जयित्‍वा अर्थवच्‍छब्‍दस्‍वरूपं प्रातिपदिकसंज्ञं स्‍यात् ।।

धातु, प्रत्यय और प्रत्यययान्त को छोड़कर अर्थवान् शब्द स्वस्वरूप की प्रतिपदिक संज्ञा होती है। 
११७ कृत्तद्धितसमासाश्‍च
कृत्तद्धितान्‍तौ समासाश्‍च तथा स्‍युः ।।

कृदन्त, तद्धितान्त तथा समास की प्रतिपदिक संज्ञा हो।
११८ स्‍वौजसमौट्छष्‍टाभ्‍याम्‍भिस्‍ङेभ्‍याम्‍भ्‍यस्‍ङसिभ्‍याम्‍भ्‍यस्‍ङसोसाम्‍ङ्योस्‍सुप्

सु औ जस् इति प्रथमा । अम् औट् शस् इति द्वितीया । टा भ्‍याम् भिस् इति तृतीया । ङे भ्‍याम् भ्‍यस् इति चतुर्थी । ङसि भ्‍याम् भ्‍यस् इति पञ्चमी । ङस् ओस् आम् इति षष्‍ठी । ङि ओस् सुप् इति सप्‍तमी ।।

सु औ जस् आदि 21 प्रत्यय के विभक्ति तथा वचन को समझने के लिए अधोलिखित कोष्ठक को देखें-
विभक्ति
एकवचन
द्विवचन
बहुवचन
प्रथमा
सु     (स्)
जस्
द्वितीया
अम्
औट्  (औ)
शस्  (अस्)
तृतीया
टा    (आ)
भ्याम्
भिस्
चतुर्थी
ङे     (ए)
भ्याम्
भ्यस्
पंचमी
ङसि  (अस्)
भ्याम्
भ्यस्
षष्ठी
ङस्   (अस्)
ओस्
आम्
सप्तमी
ङि     (इ)
ओस्
सुप्   (सु)
११९ ङ्याप्‍प्रातिपदिकात्
१२० प्रत्‍ययः
१२१ परश्‍च
इत्‍यधिकृत्‍य । ङ्यन्‍तादाबन्‍तात्‍प्रातिपदिकाच्‍च परे स्‍वादयः प्रत्‍ययाः स्‍युः ।।
इन तीनों सूत्रों का अधिकार करके ङ्यन्त, आबन्त और प्रातिपदिक से परे सु औ जस् आदि प्रत्यय हों। 
१२२ सुपः
सुपस्‍त्रीणि त्रीणि वचनान्‍येकश एकवचनद्विवचनबहुवचनसंज्ञानि स्‍युः ।।

सुप् (सु से लेकर सुप् के प् तक) प्रत्याहार के तीन – तीन वचन क्रम से एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन संज्ञक हों।
१२३ द्व्‍येकयोर्द्विवचनैकवचने
द्वित्‍वैकत्‍वयोरेते स्‍तः ।।

दो की विवक्षा में द्विवचन तथा एक की विवक्षा में एकवचन हो।
१२४ विरामोऽवसानम्
वर्णानामभावोऽवसानसंज्ञः स्‍यात् । रुत्‍वविसर्गौ । रामः ।।
वर्णों के अभाव की अवसान संज्ञा हो। 
प्रयोग सिद्धि- राम शब्द की अर्थवदधातु. से प्रातिपदिक संज्ञा करने पर ङ्याप्प्राति. प्रत्ययः तथा परश्च सूत्र के अधिकार से स्वौजस् सूत्र से सु औ जस् आदि 21 प्रत्ययों की प्राप्ति हुई । प्रथमा एकवचन की विवक्षा में द्वयेकयोः सूत्र से सु प्रत्यय हुआ।
राम + सु इस स्थिति में उपदेशेऽजनुनासिक इत् से सु के उकार की इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हुआ।
राम + स् इस स्थिति में ससजुषो रुः से पदान्त स् को रु आदेश हुआ। राम + रु हुआ। रु के उ की पूर्ववत् इत्सज्ञा तथा लोप हुआ। राम + र् हुआ। विरामोऽवसानम् से वर्णों का अंत में अभाव होने से र् की अवसान संज्ञा तथा खरवसानयोर्वसर्जनीयः से र् को विसर्ग हुआ। रामः रूप बना।

नोट- आगे की रूप सिद्धि में सु उत्पत्ति की प्रक्रिया, इत्संज्ञा, लोप आदि के प्रयोग बार-बार देखने को मिलेंगें। इन सूत्रों को तथा इसके अर्थ को याद रखना चाहिए।

ध्यातव्य बातें – रूपसिद्धि के समय प्रत्येक छात्र को रूपसिद्धि में लगने वाले सूत्र और उसका अर्थ कंठस्थ होना चाहिए। छात्र सामान्य रूप से सूत्र और उसके कार्य को याद रखते हैं। जैसे रामः में राम + स् के स् को ससजुषो रुः से रु हुआ। यह अपर्याप्त है। उसे प्रत्येक चरण में सूत्र के अर्थ को लगाकर देखना चाहिए। जैसे-  ससजुषो रुः कहता है पदान्त स् तथा सजुष् शब्द के स् को रु हो। अब यहाँ विचार करना चाहिए कि राम + स् का स् पदान्त है या नहीं? यदि पदान्त स् है तो कैसे? किसे पदान्त कहा जाता है? इसके लिए कोई नियम है तो उसे लगाकर देखें। इस प्रकार करने से आप गलत कार्य करने से बचे रहेंगें। अन्यथा आप कुछ चुनिंदा शब्दों के रूप सिद्धि तक सीमित रह जायेंगें। आप तार्किक रूप से यह नहीं जान पायेंगें कि यह कार्य हुआ तो क्यों? कभी-कभी दो सूत्रों की प्रवृत्ति एक साथ होती है। उसमें से एक दूसरे को वाधित कर रूप सिद्धि करता है। आगे आप संस्कृत के विशाल शब्द भण्डार के शब्दों की सही व्युत्पत्ति एवं सिद्धि करने में असफल रहेंगें। 

रूप सिद्धि में कुछ सूत्र और प्रक्रिया का प्रयोग बार – बार प्रयोग होता हैं।  जैसे इत्संज्ञा, लोप, अंग संज्ञा आदि।  कुछ प्रक्रिया को संक्षेप में कह दिया जाता है। जैसे- रुत्व विसर्ग । जबकि इसके लिए इत्संज्ञा, लोप आदि कार्य भी किये जाते हैं। छात्रों को इन प्रक्रियाओं को भली भाँति याद कर लेना चाहिए।  

१२५ सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ
एकविभक्तौ यानि सरूपाण्‍येव दृष्‍टानि तेषामेक एव शिष्‍यते ।।

एक विभक्ति के विषय में जो समान रूप से मिलें, उनमें एक ही शेष रहता है। 
जैसे दो राम को बोध कराने के लिए प्रथमा द्विवचन में राम राम औ होगा। यहाँ औ इस एक विभक्ति के विषय में राम राम एक समान है, अतः इसमें से एक राम ही शेष रहेगा। अर्थात् अन्य राम का लोप हो जाता है।
१२६ प्रथमयोः पूर्वसवर्णः
अकः प्रथमाद्वितीययोरचि पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेशः स्‍यात् । इति प्राप्‍ते ।।

अक् से पहले प्रथमा तथा द्वितीया विभक्तियों के अच् बाद में होने पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश हो। इस सूत्र की प्राप्ति होने पर
१२७ नादिचि
आदिचि न पूर्वसवर्णदीर्घः । वृद्धिरेचि । रामौ ।।

अवर्ण से इच् परे होने पर पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश नहीं हो।

नोट- इस प्रकरण में सभी रूपों की सिद्धि क्रमशः लिखी जा रही है। छात्रों को सलाह दिया जाता है कि तब तक वे इस लिंक के माध्यम से भी शब्दरूप निर्माण की प्रक्रिया को देखें। यहाँ पर परिणाम स्वरूप प्राप्त प्रक्रिया पूर्णतः सही नहीं होती, फिर भी यह उपयोगी है। अकारान्त पुल्लिंग पदों की सिद्धि के लिए संस्कृत सुबन्त निर्मापक पर अथवा प्रक्रिया सन्दर्शिनी चटका लगायें।प्रक्रिया- यहाँ पर रामौ की रूप सिद्धि के इस प्रकार की प्रक्रिया को प्राप्त करने के लिए इनकोडिंग में यूनीकोड देवनागरी को चुनें। इसके आगे यूनीकोड में शब्दरूप लिखें,जिसे आप सिद्ध/ निष्पन्न करना चाहते हैं। इसके आगे शब्दरूप के विभक्ति, लिंग तथा वचन का क्रमशः चयन करें। आपको इस पाठ से पता ही होगा कि जिस शब्द को आप निष्पन्न करने जा रहे हैं, वह किस विभक्ति, लिंग तथा वचन का है। इसके आगे submit बटन दबायें। पूरी प्रक्रिया इस तरह दिखेगी।
1-2-45(अर्थवत् अधातुः अप्रत्ययः प्रातिपदिकम्)::::::::प्रातिपदिक
रामौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, प्रातिपदिक, root(रामौ), औकारान्त)
4-1-2(सुऔजसमौट्शस्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्योस्सुप् )::::::::सुप्
3-1-1(प्रत्ययः)::::::::प्रत्यय
3-1-2(परः च)::::::::प्रकृति+प्रत्यय
1-4-102(तानि एकवचनद्विवचनबहुवचनानी एकशः)::::::::वचन
1-1-43(सुट् अनपुंसकस्य)::::::::सर्वनामस्थान
रामौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, प्रातिपदिक, root(रामौ), औकारान्त)+ औ(सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ))
1-4-13(यस्मात् प्रत्ययविधिः तदादि प्रत्यये अङ्गम्)::::::::अङ्ग
रामौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, प्रातिपदिक, root(रामौ), औकारान्त,अङ्ग)+ औ(सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ))
1-4-14(सुप्तिङन्तं पदम्)::::::::पद
रामौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, प्रातिपदिक, root(रामौ), औकारान्त,अङ्ग)+ औ(सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ),पद)
1-2-41(अपृक्तः एकाल् प्रत्ययः)::::::::अपृक्त
रामौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, प्रातिपदिक, root(रामौ), औकारान्त,अङ्ग)+ औ(सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ),पद,अपृक्त)
::::::::6-1-78(एचः अयवायावः)::::::::
6-1-78(एचः अयवायावः)::::::::संहिता
रामावौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, root(रामौ), औकारान्त,अङ्ग)+ (सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ),पद,अपृक्त)
1-4-110(विरामः अवसानम्)::::::::अवसान
रामावौ(पद,अवसान)( रामावौ(प्रथमा, पुं, द्विवचन, root(रामौ), औकारान्त,अङ्ग,अवसान)+ (सुप्, उपदेश, विभक्ति, प्रत्यय, द्विवचन, प्रथमा, सर्वनामस्थान,root(औ),पद,अपृक्त))
१२८ बहुषु बहुवचनम्
बहुत्‍वविवक्षायां बहुवचनं स्‍यात् ।।

बहुत्व की विवक्षा ( बहुत का बोध कराना) में बहुवचन हो।
१२९ चुटू
प्रत्‍ययाद्यौ चुटू इतौ स्‍तः ।।

प्रत्यय के आदि चवर्ग और टवर्ग इत्संज्ञक होते हैं।
१३० विभक्तिश्‍च
सुप्‍तिङौ विभक्तिसंज्ञौ स्‍तः ।।

सुबन्त तथा तिङन्त की विभक्ति संज्ञा हो।
१३१ न विभक्तौ तुस्‍माः
विभक्तिस्‍थास्‍तवर्गसमा नेतः । इति सस्‍य नेत्त्वम् । रामाः ।।

विभक्ति में स्थित तवर्ग , सकार और मकार इत्संज्ञक नहीं होते हैं। इससे जस् के सकार की इत्संज्ञा नहीं हुई।
१३२ एकवचनं सम्‍बुद्धिः
सम्‍बोधने प्रथमाया एकवचनं सम्‍बुद्धिसंज्ञं स्‍यात् ।।

सम्बोधन में प्रथमा का एकवचन सम्बुद्धि संज्ञक हो।
१३३ यस्‍मात्‍प्रत्‍ययविधिस्‍तदादि प्रत्‍ययेऽङ्गम्
यः प्रत्‍ययो यस्‍मात् क्रियते तदादिशब्‍दस्‍वरूपं तस्‍मिन्नङ्गं स्‍यात् ।।

 जो प्रत्यय जिससे विधान किया जाता है, वह शब्द है आदि में जिसके, उस शब्दरूप की उस प्रत्यय के परे रहते अंग संज्ञा हो।
१३४ एङ्ह्रस्‍वात्‍सम्‍बुद्धेः
एङन्‍ताद्ध्रस्‍वान्‍ताच्‍चाङ्गाद्धल्‍लुप्‍यते सम्‍बुद्धेश्‍चेत् । हे राम । हे रामौ । हे रामाः ।।

एङन्त एवं ह्रस्वान्त अंग से परे हल् का लोप हो, यदि वह हल् सम्बुद्धि का हो तो।
१३५ अमि पूर्वः
अकोऽम्‍यचि पूर्वरूपमेकादेशः । रामम् । रामौ ।।

अक् से अम् सम्बन्धी अच् परे हो तो पूर्व तथा पर के स्थान पर पूर्वरूप एकादेश हो।
१३६ लशक्‍वतद्धिते
तद्धितवर्जप्रत्‍ययाद्या लशकवर्गा इतः स्‍युः ।।

तद्धित को छोड़कर प्रत्यय के आदि ल् , श्  और कवर्ग की इत्संज्ञा हो।
१३७ तस्‍माच्‍छसो नः पुंसि
पूर्वसवर्णदीर्घात्‍परो यः शसः सस्‍तस्‍य नः स्‍यात्‍पुंसि ।।

पूर्व सवर्ण दीर्घ से परे जो शस् का सकार उसके स्थान पर नकार हो पुल्लिंग में।
१३८ अट्कुप्‍वाङ्नुम्‍व्‍यवायेऽपि
अट् कवर्ग पवर्ग आङ् नुम् एतैर्व्यस्‍तैर्यथासंभवं मिलितैश्‍च व्‍यवधानेऽपि रषाभ्‍यां परस्‍य नस्‍य णः समानपदे । इति प्राप्‍ते ।।

रेफ और षकार से परे अट् , कवर्ग, पवर्ग, आङ् और नुम् इनका अलग अलग अथवा इन सबका यथासंभव व्यवधान होने पर भी समानपद में नकार को णकार हो जाता है। इस सूत्र के प्राप्त होने पर -
१३९ पदान्‍तस्‍य
नस्‍य णो न । रामान् ।।
पदान्त नकार को णकार नहीं हो। 
यहाँ सुप्तिङन्तं पदम् के अनुसार रामान्  पद है। इसके अंत के नकार को रषाभ्यां नो णः समानपदे से णकार प्राप्त था। इस सूत्र द्वारा निषेध किया गया।
१४० टाङसिङसामिनात्‍स्‍याः
अदन्‍ताट्टादीनामिनादयः स्‍युः । णत्‍वम् । रामेण ।।
अदन्त अंग से परे टा को इन, ङसि को आत् और ङस् को स्य आदेश होता है।

राम भिस् इस अवस्था में टाङसि सूत्र से टा को इन् आदेश हुआ। राम + इन में अ तथा इ के स्थान पर गुण एकादेश ए हुआ तथा अट्कुप्वाङ् से न को ण आदेश होने पर रामेण रूप सिद्ध हुआ।
१४१ सुपि च
यञादौ सुपि अतोऽङ्गस्‍य दीर्घः । रामाभ्‍याम् ।।

यञादि सुप् परे होने पर अदन्त अंग को दीर्घ होता है।
१४२ अतो भिस ऐस्
अदन्तात् अङ्गात् परस्य भिस् ऐस् स्यात्।

अदन्त अङ्ग से परवर्ती भिस् को ऐस् आदेश हो।
अनेकाल्‍शित्‍सर्वस्‍य । रामैः ।।
ऐस् आदेश में ऐस् अनेक अल् वाला है अतः अनेकाल्शित् सूत्र से सम्पूर्ण भिस् के स्थान पर ऐस् आदेश होगा। 
१४३ ङेर्यः
अतोऽङ्गात्‍परस्‍य ङेर्यादेशः ।।
अदन्त अंग से परे ङे के स्थान में य आदेश हो।

१४४ स्‍थानिवदादेशोऽनल्‍विधौ
आदेशः स्‍थानिवत्‍स्‍यान्न तु स्‍थान्‍यलाश्रयविधौ । इति स्‍थानिवत्त्वात् सुपि चेति दीर्घः । रामाय । रामाभ्‍याम् ।।
रामाय में राम + ङे इस स्थिति में अदन्त अंग है राम । उसके बाद है ङे । इस ङे को ङेर्यः से य आदेश हो गया।  राम + य हुआ । यहाँ ङे स्थानी के स्थान पर य आदेश हुआ। अब स्थानिवत् सूत्र निर्देश करता है कि ङे के स्थान पर किया गया य आदेश अपने स्थानी ङे के धर्म वाला होगा। अतः ङे जो सुप् था उसका धर्म य में भी आ गया तथा सुप् च से सुप् य राम के बाद होने से साम के अ को दीर्घ होकर रामा + य रूप बना। इस प्रकार रामाय रूप सिद्ध हुआ।
आदेश स्थानी के समान स्थानी के धर्म वाला हो, परन्तु यदि स्थानी अल् हो तो तदाश्रयविधि में न हो।

विशेष- जिसके स्थान पर कुछ विधान किया जाता है, उसे स्थानी कहते हैं। जिसके विधान करने से कोई समाप्त हो जाता है उसे आदेश कहते हैं। आगम मित्र के समान होता है, जबकि आदेश शत्रु के समान होता है। जब हम जिसके स्थान पर किसी वर्ण का आगम करते हैं, तब वह पास में आकर बैठता है, जबकि हम जिस वर्ण के स्थान पर किसी वर्ण का आदेश करते हैं, तब उसे हटाकर बैठ जाता है।

१४५ बहुवचने झल्‍येत्
झलादौ बहुवचने सुप्‍यतोऽङ्गस्‍यैकारः । रामेभ्‍यः । सुपि किम् ? पचध्‍वम् ।।
झलादि बहुवचन सुप् परे होने पर अदन्त अंग के स्थान में एकार आदेश हो।

बहुवचने झल्येत् सूत्र में सुप् परे रहने पर एकार होने के विधान किया गया है। यहाँ यह विचार किया जा रहा है कि सुप् परे होने की यदि बाध्यता समाप्त कर दी जाय तो पचध्वम् जैसे स्थल पर भी पच के अकार को बहुवचने  झल्येत् से एकार होकर पचेध्वम् इस प्रकार का अनिष्ट रूप बनने लगेगा। अतः सुप् परे रहने का विधान किया। इस स्थिति में ध्वम् सुप् प्रत्यय नहीं होकर तिङ् प्रत्यय है अतः यहाँ एकार नहीं होगा।
रामेभ्यः। राम + भ्यस् इस स्थिति में बहुवचने झल्येत् से झलादि बहुवचन सुप् भ्यस् बाद में रहने पर अदन्त अंग राम के अकार को एकार हुआ। रामे + भ्यस् रूप बना। भ्यस् के स् को रुत्व तथा विसर्ग हुआ। रामेभ्यः रूप बना।
१४६ वाऽवसाने
अवसाने झलां चरो वा । रामात्रामाद् । रामाभ्‍याम् । रामेभ्‍यः । रामस्‍य ।।

अवसान में झलों को चर् हो विकल्प से।
१४७ ओसि च
अतोऽङ्गस्‍यैकारः । रामयोः ।।

अदन्त अंग के स्थान पर एकार आदेश हो ओस् परे रहने पर।
१४८ ह्रस्‍वनद्यापो नुट्
ह्रस्‍वान्‍तान्नद्यन्‍तादाबन्‍ताच्‍चाङ्गात्‍परस्‍यामो नुडागमः ।।

ह्रस्वान्त,नद्यन्त और आबन्त अंग से परे आम् को नुट् का आगम होता है।
१४९ नामि
अजन्‍ताङ्गस्‍य दीर्घः । रामाणाम् । रामे । रामयोः । सुपि – एत्त्वे कृते ।

अजन्त अंग को दीर्घ होता है नाम् रके रहने पर।
१५० आदेशप्रत्‍यययोः
इण्‍कुभ्‍यां परस्‍यापदान्‍तस्‍यादेशस्‍य प्रत्‍ययावयवस्‍य यः सस्‍तस्‍य मूर्धन्‍यादेशः । ईषद्विवृतस्‍य सस्‍य तादृश एव षः । रामेषु । एवं कृष्‍णादयोऽप्‍यदन्‍ताः ।।

इण् और कवर्ग परे अपदान्त जो आदेश रूप सकार अथवा प्रत्यय का अवयव जो सकार उसके स्थान पर मूर्धन्यादेश हो।
१५१ सर्वादीनि सर्वनामानि

सर्वादीनि शब्दस्वरूपाणि सर्वनामसञ्ज्ञानि स्युः।
सर्व आदि शब्द स्वरूप की सर्वनामसंज्ञा हो।
सर्व विश्व उभ उभय डतर डतम अन्‍य अन्‍यतर इतर त्‍वत् त्‍व नेम सम सिम । पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्‍यवस्‍थायामसंज्ञायाम् । स्‍वमज्ञातिधनाख्‍यायाम् । अन्‍तरं बहिर्योगोपसंव्‍यानयोः। त्‍यद् तद् यद् एतद् इदम् अदस् एक द्वि युष्‍मद् अस्‍मद् भवतु किम् ।।

सर्वादि एक गण है। यह सभी के अर्थ में प्रयोग किये जाते हैं। यदि किसी व्यक्ति का नाम सर्व होगा तो उसे सर्वनाम संज्ञा नहीं होगी। सर्व, विश्व, उभ, उभय आदि की कुल संख्या 25 है। 
१५२ जसः शी
अदन्‍तात्‍सर्वनाम्‍नो जसः शी स्‍यात् । अनेकाल्‍त्‍वात् सर्वादेशः । सर्वे ।।

अदन्त सर्वनाम से परे जश् को शी हो। जस् के स्थान पर शी आदेश अनेक अल् वाला होने से सम्पर्ण जस् के स्थान पर हो।
१५३ सर्वनाम्‍नः स्‍मै
अतः सर्वनाम्‍नो डेः स्‍मै । सर्वस्‍मै ।।

अदन्त सर्वनाम से परे ङे के स्थान पर स्मै आदेश होता होता है।
१५४ ङसिङ्योः स्‍मात्‍स्‍मिनौ
अतः सर्वनाम्‍न एतयोरेतौ स्‍तः । सर्वस्‍मात् ।।

अदन्त सर्वनाम से परे ङसि तथा ङस् के स्थान पर क्रमशः स्मात् तथा स्मिन् आदेश होता होता है।
१५५ आमि सर्वनाम्‍नः सुट्
अवर्णान्‍तात्‍परस्‍य सर्वनाम्‍नो विहितस्‍यामः सुडागमः । एत्‍वषत्‍वे । सर्वेषाम् । सर्वस्‍मिन् । शेषं रामवत् । एवं विश्वादयोऽप्‍यदन्‍ताः ।। 

अवर्ण अंत में हो जिसके ऐसे सर्वनाम से विहित आम् को सुट् का आगम होता है। 
एत्व एवं षत्व होने से सर्वेषाम् रूप बना ।  सर्व + आम् इस स्थिति में आमि सर्वनाम्नः सूत्र से अवर्णान्त सर्वादि गण में पठित सर्व शब्द से विहित आम् को सुट् का आगम हुआ। सुट् में उ तथा ट् की इत्संज्ञा तथा लोप हो गया। स् शेष बचा। सुट् में ट् की इत्संज्ञा होने के कारण यह टित् है। अतः आम् के पहले होगा। सर्व + स् + आम् हुआ।  बहुवचने झल्येत् से सर्व घटक वकारोत्तर अकार को एकार होकर सर्वेसाम् हुआ। आदेशप्रत्ययोः से इण् परे अपदान्त आदेश रूप सकार को षकार हुआ। सर्वेषाम् रूप बना। 
सर्वस्मिन् । सर्व + ङि इस दशा में ङि को ङसि ङ्योः सूत्र से स्मिन् आदेश हुआ। सर्वस्मिन् रूप बना।
सर्व शब्द के शेष रूप राम शब्द के समान निष्पन्न होंगें। इसी प्रकार विश्व उभ आदि अकार अंत वाले शब्द बनेंगें।

उभशब्‍दो नित्‍यं द्विवचनान्‍तः । उभौ २ । उभाभ्‍याम् ३ । उभयोः २ । तस्‍येह पाठोऽकजर्थः । उभयशब्‍दस्‍य द्विवचनं नास्‍ति । उभयः । उभये । उभयम् । उभयान् । उभयेन । उभयैः । उभयस्‍मै । उभयेभ्‍यः । उभयस्‍मात् । उभयेभ्‍यः । उभयस्‍य । उभयेषाम् । उभयस्‍मिन् । उभयेषु ।। डतरडतमौ प्रत्‍ययौप्रत्‍ययग्रहणे तदन्‍तग्रहणमिति तदन्‍ता ग्राह्‍याः ।। नेम इत्‍यर्धे ।। समः सर्वपर्यायः तुल्‍यपर्यायस्‍तु नयथासंख्‍यमनुदेशः समानामिति ज्ञापकात् ।

उभ शब्द दो अर्थ में प्रयुक्त होता है अतः नित्य द्विवचनान्त होगा।
१५ पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्‍यवस्‍थायामसंज्ञायाम् । (ग.सू)

एतेषां व्‍यवस्‍थायामसंज्ञायां च सर्वनामसंज्ञा गणसूत्रात्‍सर्वत्र या प्राप्‍ता सा जसि वा स्‍यात् । पूर्वेपूर्वाः । असंज्ञायां किम् ? उत्तराः कुरवः । स्‍वाभिधेयापेक्षावधिनियमो व्‍यवस्‍था । व्‍यवस्‍थायां किम् ? दक्षिणा गाथकाःकुशला इत्‍यर्थः ।

पूर्व आदि 7 शब्द व्यवस्था और असंज्ञा अर्थ में सर्वादि है। ये शब्द हैं-

पूर्व- पहला, परदूसरा, अवर- पश्चिम, दक्षिण- दक्षिण दिशा, उत्तर – उत्तर दिशा, अपर- पश्चिम- पश्चिम दिशा, अधर– नीचा । व्यवस्था का अर्थ होता है- स्वाभिधेयापेक्षानियमो व्यवस्था। जहाँ यह किससे पूर्व हैकिससे पर हैइत्यादि अवधि के नियमों की अपेक्षा हो, वहाँ प्रयुक्त पूर्व आदि शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है। इसी प्रकार पूर्व आदि किसी का नाम नहीं हो तभी इसकी सर्वनाम संज्ञा होगी।
१५७ स्‍वमज्ञातिधनाख्‍यायाम् (ग.सू)
ज्ञातिधनान्‍यवाचिनः स्‍वशब्‍दस्‍य प्राप्‍ता संज्ञा जसि वा । स्‍वेस्‍वाःआत्‍मीयाःआत्‍मान इति वा । ज्ञातिधनवाचिनस्‍तुस्‍वाःज्ञातयोऽर्था वा ।
ज्ञाति (सम्बन्धी) और धन अर्थ को छोड़कर अन्य अर्थ में स्व आदि शब्द की सर्वनाम संज्ञा होती है। स्व शब्द 4 अर्थ में आते हैं- आत्मा, आत्मीय ज्ञाति और धन।
१५८ अन्‍तरं बहिर्योगोपसंव्‍यानयोः
बाह्‍ये परिधानीये चार्थेऽन्‍तरशब्‍दस्‍य प्राप्‍ता संज्ञा जसि वा । अन्‍तरेअन्‍तरा वा गृहाःबाह्‍या इत्‍यर्थः । अन्‍तरेअन्‍तरा वा शाटकाःपरिधानीया इत्‍यर्थः ।।

बाह्य और परिधानीय अर्थ में अन्तर शब्द की सभी विभक्तियों में प्राप्त सर्वनाम संज्ञा जस् में विकल्प से हो।
१५९ पूर्वादिभ्‍यो नवभ्‍यो वा
एभ्‍यो ङसिङ्योः स्‍मात्‍स्‍मिनौ वा स्‍तः । पूर्वस्‍मात्पूर्वात् । पूर्वस्‍मिन्पूर्वे । एवं परादीनाम् । शेषं सर्ववत् ।।
पूर्व आदि नौ शब्दों से परे ङसि और ङि को क्रमशः स्मात् और स्मिन् आदेश विकल्प से हो।
१६० प्रथमचरमतयाल्‍पार्द्धकतिपयनेमाश्‍च
एते जसि उक्तसंज्ञा वा स्‍युः । प्रथमेप्रथमाः ।। तयः प्रत्‍ययः । द्वितयेद्वितयाः । शेषं रामवत् ।। नेमेनेमाः । शेषं सर्ववत् ।।

प्रथम, चरम, तय प्रत्ययान्त, अल्प, अर्ध, कतिपय और नेम शब्द के परे जस् होने पर सर्वनाम संज्ञा विकल्प से हो।
 (तीयस्‍य ङित्‍सु वा) । द्वितीयस्‍मैद्वितीयायेत्‍यादि । एवं तृतीयः ।। निर्जरः ।।

ङित् विभक्तियाँ परे होने पर तीयप्रत्ययान्त शब्दों की विकल्प से सर्वनाम संज्ञा हो।
१६१ जराया जरसन्‍यतरस्‍याम्
जराशब्दस्य जरस् वा स्यादजादौ विभक्तौ । 

अजादि विभक्ति परे होने पर जरा शब्द को विकल्प से जरस् आदेश हो।
(प) पदाङ्गाधिकारे तस्‍य च तदन्‍तस्‍य च । 
पद तथा अंग के अधिकार में जिसके स्थान पर जो आदेश विधान किया जाय वह आदेश उसके तथा तदन्त (उस समुदाय के स्थान पर) को हो।
(प) निर्दिश्‍यमानस्‍यादेशा भवन्‍ति । 
जिसका निर्देश किया गया हो उसके स्थान में ही आदेश होते हैं।
(प) एकदेशविकृतमनन्‍यवत्।
एकदेश (अवयव) के विकृत हो जाने पर अवयवी अन्य के समान नहीं होता।
इति जरशब्‍दस्‍य जरस् । निर्जरसौ । निर्जरसः इत्‍यादि । पक्षे हलादौ च रामवत् ।। विश्वपाः ।।
१६२ दीर्घाज्‍जसि च
दीर्घाज्‍जसि इचि च परे पूर्वसवर्णदीर्घो न स्‍यात् । विश्वपौ । विश्वपाः । हे विश्वपाः । विश्वपाम् । विश्वपौ ।।

दीर्घ से जस् या इच् परे होने पर पूर्व सवर्णदीर्घ नहीं हो। 
१६३ सुडनपुंसकस्‍य
स्‍वादिपञ्चवचनानि सर्वनामस्‍थानसंज्ञानि स्‍युरक्‍लीबस्‍य ।।

सु आदि पाँच प्रत्यय (सुट्) सर्वनाम स्थान संज्ञक हो नपुंसक लिंग को छोड़कर।
१६४ स्‍वादिष्‍वसर्वनामस्‍थाने
कप्‍प्रत्‍ययावधिषु स्‍वादिष्‍वसर्वनामस्‍थानेषु पूर्वं पदं स्‍यात् ।।

सर्वनाम स्थान संज्ञक प्रत्ययों को छोड़कर सु से लेकर कप् पर्यन्त प्रत्ययों के परे होने पर पूर्व शब्द समुदाय पदसंज्ञक हो।
१६५ यचि भम्
यादिष्‍वजादिषु च कप्‍प्रत्‍ययावधिषु स्‍वादिष्‍वसर्वनामस्‍थानेषु पूर्वं भसंज्ञं स्‍यात् ।।

सर्वनाम स्थान संज्ञक प्रत्ययों को छोड़कर कु से लेकर कप् पर्यन्त यकारादि और अजादि प्रत्यय के परे होने पर पूर्व शब्द स्वरूप भ संज्ञक हो।
१६६ आकडारादेका संज्ञा
इत ऊर्ध्वं कडाराः कर्मधारय इत्‍यतः प्रागेकस्‍यैकैव संज्ञा ज्ञेया । या पराऽनवकाशा च ।।

यहाँ से लेकर कडाराः कर्मधारये सूत्र पर्यन्त एक शब्द की एक ही संज्ञा हो। जो संज्ञा पर में हो तथा निरवकाश हो। विश्वपा + शस् में यचि भम् से भ संज्ञा तथा पद संज्ञा दोनों प्राप्त हुए। दोनों में से कौन संज्ञा हो? इसके समाधान के लिए काशिका में यह पंक्ति कही गयी है। पद संज्ञा विधायक सूत्र की अपेक्षा भ संज्ञा पर में है तथा पद संज्ञा  अजादि तथा हलादि दोनों में प्राप्त होते हैं, जबकि भ संज्ञा केवल अजादि में प्राप्त होता है। अतः प्राप्त स्थल के अतिरिक्त अन्य स्थल के लिए भ संज्ञा का प्रयोजन नहीं है। अतः यहाँ भ संज्ञा होगी। हलादि में पद संज्ञा होगी।
१६७ आतो धातोः
आकारान्‍तो यो धातुस्‍तदन्‍तस्‍य भस्‍याङ्गस्‍य लोपः । अलोऽन्‍त्‍यस्‍य । विश्वपः । विश्वपा । विश्वपाभ्‍यामित्‍यादि । एवं शङ्खध्‍मादयः । धातोः किम् ? हाहान् ।। हरिः । हरी ।।
आकान्त जो धातु, वह है अंत में जिसके उस भसंज्ञक अंग का लोप हो। अलोन्त्यस्य के परिभाषा से भसंज्ञक अंग के अन्त्य अल् का लोप होगा। विश्वपा + अस् इस स्थिति में आकारान्त धातु है- पा। तदन्त भसंज्ञक अंग अंग के अन्त्य वर्ण आकार का लोप होकर विश्वप् + अस् हुआ। अस् से सकार का रुत्व विसर्ग हुआ। विश्वपा रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार अन्य रूप सिद्ध करना चाहिए।

आतो धातोः सूत्र में धातु के आकार का लोप होता है ऐसा क्यों कहा? क्योंकि हाहा शब्द किसी धातु से नहीं बना है।  यदि धातोः नहीं कहते तो यहाँ भी आकार का लोप होकर हाहन् अनिष्ट रूप बनने लगता। धातोः कहने से आकार का लोप नहीं हुआ। हाहा + शस् में श् का अनुबन्ध लोप हुआ। हाहा + अस् में पूर्व सवर्ण दीर्घ हुआ हाहास् बना। स् को तस्माच्छसोः से न् हुआ । हाहान् रूप बना। पूर्व प्रक्रिया के अनुसार अन्य रूप सिद्ध करना चाहिए। यहाँ तक अदन्त शब्दों का निर्वचन किया गया।

हरिः में सु के उकार का अनुबन्ध लोप, स् को रुत्व विसर्ग करने पर हरिः रूप बना। हरी । हरी + औ इस स्थिति में यण् प्राप्त था,जिसे प्रथमयोः सूत्र बाधकर पूर्वसवर्णदीर्ध किया। हरी रूप सिद्ध हुआ।
१६८ जसि च
ह्रस्‍वान्‍तस्‍याङ्गस्‍य गुणः । हरयः ।।

ह्रस्वान्त अंग को गुण हो जस् परे रहते।
हरि + जस् में जकार की चूटू से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हुआ। हरि + अस् इस अवस्था में ह्रस्वान्त अंग है हरि इसे जसि च से गुँ प्राप्त हुआ। अलोऽन्यस्य परिभाषा के अनुसार हरि के अंतिम अल् इ को गुण ए हुआ। हरे + अस् हुआ। एचोऽयवायावः से ए को अयादेश तथा सकार का रुत्वविसर्ग होकर हरयः रूप सिद्ध हुआ।
१६९ ह्रस्‍वस्‍य गुणः
सम्‍बुद्धौ । हे हरे । हरिम् । हरी । हरीन् ।।
ह्रस्वान्त अंग को गुण हो सम्बुद्धि परे रहते। एकवचनं सम्बुद्धिः के अनुसार सम्बोधन के एकवचन को सम्बुद्धि कहा जाता है।

हे हरे। सम्बोधन के प्रथमा एकवचन में हरि + सु के उकार का अनुबन्ध लोप हरि + स् हुआ। ह्रस्वस्य गुणः से हरि के इ को गुण ए हुआ हरे + स् बना। सम्बुद्धि की अवस्था में एङ् ह्रस्वात् सूत्र से एङन्त हरे से परे हल् स् का लोप हो गया। हे हरे रूप निष्पन्न हुआ। सम्बोधन के द्विवचन तथा बहुवचन में प्रथमा विभक्ति के समान ही रूप सिद्ध होंगें।
१७० शेषो घ्‍यसखि
शेष इति स्‍पष्‍टार्थम् । ह्रस्‍वौ याविदुतौ तदन्‍तं सखिवर्जं घिसंज्ञम् ।।

नदी संज्ञक को छोड़कर ह्रस्व इकारान्त और उकारान्त शब्द की घी संज्ञा हो, सखि शब्द को छोड़कर।
१७१ आङो नाऽस्‍त्रियाम्
घेः परस्‍याङो ना स्‍यादस्‍त्रियाम् । आङिति टासंज्ञा । हरिणा । हरिभ्‍याम् । हरिभिः ।।
घि संज्ञक शब्द से परे आङ् को ना आदेश हो, स्त्रीलिंग को छोड़कर। पाणिनि के पहले (प्राचीन) आचार्य टा को आङ् कहा करते थे। अतः पाणिनि ने भी यहाँ टा के स्थान पर आङ् का प्रयोग किया है। अनदी संज्ञक शब्द की विस्तृत व्याख्या बाद में की जाएगी।

हरिणा। हरि शब्द से टा विभक्ति हुई। हरि + टा इस स्थिति में शेषो घ्यसखि सूत्र से ह्रस्व इकारान्त हरि की घी संज्ञा हुई, आङो सूत्र से टा को ना आदेश होने पर हरि + ना हुआ। हरिना के नकार को अट्कुप्वाङ्० सूत्र से नकार को णकार आदेश होकर हरिणा रूप सिद्ध हुआ।
१७२ घेर्ङिति
घिसंज्ञस्‍य ङिति सुपि गुणः । हरये । हरिभ्‍याम् । हरिभ्‍यः ।।
घि संज्ञक अंग को ङित् (ङे, ङसि, ङस्, ङि) सुप् प्रत्यय परे रहते गुण हो।

हरि शब्द से चतुर्थी एकवचन में ङे विभक्ति आयी। हरि + ङे इस दशा में ङकार का अनुबन्ध लोप हरि + ए हुआ।  हरि की घि संज्ञा, घेर्ङिति से घिसंज्ञक हरि के अन्त्य वर्ण इ को ङित् परे रहते ए गुण हुआ। हरे + ए हुआ । हरे के एकार का अयादेश होकर हरये रूप सिद्ध हुआ।
१७३ ङसिङसोश्‍च
एङो ङसिङसोरति पूर्वरूपमेकादेशः । हरेः २ । हर्योः २ । हरीणाम् ।।
एङ् से ङसि और ङस् का अकार परे रहते पूर्वरूप एकादेश हो। यहाँ एङ् से अभिप्राय एङ् प्रत्याहार है, जिसमें ए तथा ओ वर्ण आते हैं।

हरि + ङसि में ङ् तथा इ को अनुबन्ध लोप, हरि + अस् इस दशा में घेर्ङिति से इकार को गुण एकार होकर हरे + अस् हुआ। ङिसि०सूत्र से अस् के अ का पूर्वरूप एकादेश हरेस् हुआ। सकार का रूत्वविसर्ग हरेः रूप बना। इसी प्रकार षष्ठी में भी रूप बनेगा।  
१७४ अच्‍च घेः
इदुद्भ्‍यामुत्तरस्‍य ङेरौत्घेरच्‍च । हरौ । हरिषु । एवं कव्‍यादयः ।।
ह्रस्व इकार और उकार से परे  ङि को औत् और घिसंज्ञक अंग को अत् आदेश हो।

हरि + ङि  में हरि की घि संज्ञा, घेर्ङिति से हरि के इकार को गुण प्राप्त हुआ, उसे अच्च घेः ने बाध कर अत् तथा ङि को औ किया। हर + औ इस अवस्था में वृद्धिरेचि से वृद्धि होकर हरौ रूप बना।  शेष रूप पूर्ववत् बनेगें। हरि शब्द के ही समान कवि, कपि आदि ह्रस्व इकारान्त शब्द  निष्पन्न होंगें।
१७५ अनङ् सौ
सख्‍युरङ्गस्‍यानङादेशोऽसम्‍बुद्धौ सौ ।।

सम्बुद्धि से भिन्न सु परे रहते सखि अंग को अनङ् आदेश हो।
१७६ अलोऽन्‍त्‍यात्‍पूर्व उपधा
अन्‍त्‍यादलः पूर्वो वर्ण उपधासंज्ञः ।।

अन्त्य अल् से पूर्व वर्ण की उपधा संज्ञा हो।
१७७ सर्वनामस्‍थाने चासम्‍बुद्धौ
नान्‍तस्‍योपधाया दीर्घोऽसम्‍बुद्धौ सर्वनामस्‍थाने ।।

सम्बुद्धि से भिन्न सर्वनाम स्थान से परे होने पर नकारान्त अंग को उपधा के स्थान पर  दीर्घ आदेश हो।
१७८ अपृक्त एकाल् प्रत्‍ययः
एकाल् प्रत्‍ययो यः सोऽपृक्तसंज्ञः स्‍यात् ।।

एक अल् रूप जो प्रत्यय, उसकी अपृक्त संज्ञा हो।
१७९ हल्‍ङ्याब्‍भ्‍यो दीर्घात्‍सुतिस्‍यपृक्तं हल्
हलन्‍तात्‍परं दीर्घौ यौ ङ्यापौ तदन्‍ताच्‍च परंम् सु ति सि इत्‍येतदपृक्तं हल् लुप्‍यते ।।

हलन्त से परवर्ती दीर्घ जो (ङी, आप्) उससे परे  सु ति सि के अपृक्त हल् का लोप हो।
१८० नलोपः प्रातिपदिकान्‍तस्‍य
प्रातिपदिकसंज्ञकं यत्‍पदं तदन्‍तस्‍य नस्‍य लोपः । सखा ।।

प्रातिपदिक संज्ञक जो पद, उसके अन्त्य नकार का लोप हो। 
सखा। सखि + सु में सम्बुद्धि से भिन्न सु परे रहते सखि के इकार को अनङ् आदेश हुआ। अनङ् आदेश ङित् है, अतः ङिच्च से अन्त्य अल् को होगा।  अनङ् में ङकार का अनुबन्ध लोप, सख् + अन् + सु हुआ। अलोन्त्य०सूत्र से सखन् के न् की उपधा संज्ञा तथा सर्वनामस्थाने० सूत्र से नकारान्त अंग सखन् से परे सर्वनाम स्थान का सु परे रहने पर उपधा के अकार को दीर्घ होकर सखान्+ सु रूप हुआ। अपृक्त०सूत्र से एक अल् वाले सु प्रत्यय की अपृक्त संज्ञा, उकार का अनुबन्ध लोप, हल्ङ्या०सूत्र से सखान् + स् में सु सम्बन्धी अपृक्त हल् सकार को लोप हुआ सखान् रूप बना। न लोपः ०सूत्र से सखान् के नकार को लोप सखा रूप सिद्ध हुआ। 
१८१ सख्‍युरसम्बुद्धौ
सख्‍युरङ्गात्‍परं संम्बुद्धिवर्जं सर्वनामस्‍थानं णिद्वत्‍स्‍यात् ।।

सखि रूप अंग से परे सम्बुद्धिभिन्न सर्वनाम स्थान प्रत्यय णित् के समान हो।
१८२ अचो ञ्णिति
अजन्‍ताङ्गस्‍य वृद्धिर्ञिति णिति च परे । सखायौ । सखायः । हे सखे । सखायम् । सखायौ । सखीन् । सख्‍या । सख्‍ये ।।
अजन्त अंग को वृद्धि हो, ञित् तथा णित् पिरत्यय परे रहते।
सखायौ ।सखि + औ स दशा में सख्यु० सूत्र से औ णित् के समान हुआ। औ को णित् हो जाने के फलस्वरूप अलोन्त्य० परिभाषा के अनुसार अचो ञ्णिति से अजन्त अंग सखि के अंतिम अच् इकार को वृद्धि आदेश होकर सखै + औ हुआ। एचो ऽयवायावः से ऐ को आय् आदेश हुआ। सखाय् + औ में परस्पर वर्ण संयोग हुआ। सखायौ रूप बना।
१८३ ख्‍यत्‍यात्‍परस्‍य
खितिशब्‍दाभ्‍यां खीतीशब्‍दाभ्‍यां कृतयणादेशाभ्‍यां परस्‍य ङसिङसोरत उः । सख्‍युः ।।
१८४ औत्
इतः परस्‍य ङेरौत् । सख्‍यौ । शेषं हरिवत् ।।
१८५ पतिः समास एव
घिसंज्ञः । पत्या। पत्ये। पत्‍युः २ । पत्‍यौ । शेषं हरिवत् । समासे तु भूपतये । कतिशब्‍दो नित्‍यं बहुवचनान्‍तः ।।
१८६ बहुगणवतुडति संख्‍या
१८७ डति च
डत्‍यन्‍ता संख्‍या षट्संज्ञा स्‍यात् ।।
१८८ षड्भ्‍यो लुक्
जश्‍शसोः ।।
१८९ प्रत्‍ययस्‍य लुक्‍श्‍लुलुपः
लुक्‍श्‍लुलुप्‍शब्‍दैः कृतं प्रत्‍ययादर्शनं क्रमात्तत्तत्‍संज्ञं स्‍यात् ।।
१९० प्रत्‍ययलोपे प्रत्‍ययलक्षणम्
प्रत्‍यये लुप्‍ते तदाश्रितं कार्यं स्‍यात् । इति जसि चेति गुणे प्राप्‍ते ।।
१९१ न लुमताऽङ्गस्‍य
लुमता शब्‍देन लुप्‍ते तन्निमित्तमङ्गकार्यं न स्‍यात् । कति २ । कतिभिः । कतिभ्‍यः २ । कतीनाम् । कतिषु । युष्‍मदस्‍मत्‍षट्संज्ञकास्‍त्रिषु सरूपाः ।। त्रिशब्‍दो नित्‍यं बहुवचनान्‍तः । त्रयः । त्रीन् । त्रिभिः । त्रिभ्‍यः २ ।।
१९२ त्रेस्‍त्रयः
त्रिशब्‍दस्‍य त्रयादेशः स्‍यादामि । त्रयाणाम् । त्रिषु । गौणत्‍वेऽपि प्रियत्रयाणाम् ।।
१९३ त्‍यदादीनामः
एषामकारो विभक्तौ । (द्विपर्यन्‍तानामेवेष्‍टिः) । द्वौ २ । द्वाभ्‍याम् ३ । द्वयोः २ ।। पाति लोकमिति पपीः सूर्यः ।।
१९४ दीर्घाज्‍जसि च
पप्‍यौ २ । पप्‍यः । हे पपीः । पपीम् । पपीन् । पप्‍या । पपीभ्‍याम् ३ । पपीभिः । पप्‍ये । पपीभ्‍यः २ । पप्‍यः २ । पप्‍योः । दीर्घत्‍वान्न नुट्पप्‍याम् । ङौ तु सवर्णदीर्घःपपी । पप्‍योः । पपीषु । एवं वातप्रम्‍यादयः ।। बह्‍व्‍यः श्रेयस्‍यो यस्‍य स बहुश्रेयसी ।।
१९५ यू स्‍त्र्याख्‍यौ नदी
ईदूदन्‍तौ नित्‍यस्‍त्रीलिङ्गौ नदीसंज्ञौ स्‍तः । 
(प्रथमलिङ्गग्रहणं च) । पूर्वं स्‍त्र्याख्‍यस्‍योपसर्जनत्‍वेऽपि नदीत्‍वं वक्तव्‍यमित्‍यर्थः ।।
१९६ अम्‍बार्थनद्योर्ह्रस्‍वः
सम्‍बुद्धौ । हे बहुश्रेयसि ।।
१९७ आण्‍नद्याः
नद्यन्‍तात्‍परेषां ङितामाडागमः ।।
१९८ आटश्‍च
आटोऽचि परे वृद्धिरेकादेशः । बहुश्रेयस्‍यै । बहुश्रेयस्‍याः । बहुश्रेयसीनाम् ।।
१९९ ङेराम्‍नद्याम्‍नीभ्‍यः
नद्यन्‍तादाबन्‍तान्नीशब्‍दाच्‍च परस्‍य ङेराम् । बहुश्रेयस्‍याम् । शेषं पपीवत् ।। अङ्यन्‍तत्‍वान्न सुलोपः । अतिलक्ष्मीः । शेषं बहुश्रेयसीवत् ।। प्रधीः ।।
२०० अचि श्‍नुधातुभ्रुवां य्‍वोरियङुवङौ
श्‍नु प्रत्‍ययान्‍तस्‍येवर्णोवर्णान्‍तस्‍य धातोर्भ्रू इत्‍यस्‍य चाङ्गस्‍य चेयङुवङौ स्‍तोऽजादौ प्रत्‍यये परे । इति प्राप्‍ते ।।
२०१ एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्‍य
धात्‍ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य इवर्णस्‍तदन्‍तो यो धातुस्‍तदन्‍तस्‍यानेकाचोऽङ्गस्‍य यणजादौ प्रत्‍यये । प्रध्‍यौ । प्रध्‍यः । प्रध्‍यम् । प्रध्‍यौ । प्रध्‍यः । प्रध्‍यि । शेषं पपीवत् । एवं ग्रामणीः । ङौ तु ग्रामण्‍याम् ।। अनेकाचः किम् ? नीः । नियौ । नियः । अमि शसि च परत्‍वादियङ्नियम् । ङेराम्नियाम् ।। असंयोगपूर्वस्‍य किम् ? सुश्रियौ । यवक्रियौ ।।
२०२ गतिश्‍च
प्रादयः क्रियायोगे गतिसंज्ञाः स्‍युः । 
(गतिकारकेतरपूर्वपदस्‍य यण् नेष्‍यते) । शुद्धधियौ ।।
२०३ न भूसुधियोः
एतयोरचि सुपि यण्‍न । सुधियौ । सुधिय इत्‍यादि ।। सुखमिच्‍छतीति सुखीः । सुतीः । सुख्‍यौ । सुत्‍यौ । सुख्‍युः । सुत्‍युः । शेषं प्रधीवत् । शम्‍भुर्हरिवत् । एवं भान्‍वादयः ।।
२०४ तृज्‍वत्‍क्रोष्‍टुः
असम्‍बुद्धौ सर्वनामस्‍थाने परे । क्रोष्‍टुशब्‍दस्‍य स्‍थाने क्रोष्‍टृशब्‍दः प्रयोक्तव्‍य इत्‍यर्थः ।।
२०५ ऋतो ङिसर्वनामस्‍थानयोः
ऋतोऽङ्गस्‍य गुणो ङौ सर्वनामस्‍थाने च । इति प्राप्‍ते —
२०६ ऋदुशनस्‍पुरुदंसोऽनेहसां च
ऋदन्‍तानाम् उशनसादीनाम् च अनङ् स्‍यात् असंबुद्धौ सौ ।।
२०७ अप्‍तृन्‍तृच्‍स्‍वसृनप्‍तृनेष्‍टृत्‍वष्‍टृक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्‍तॄणाम्
अबादीनाम् उपधाया दीर्घः असंबुद्धौ सर्वनामस्‍थाने । क्रोष्‍टा । क्रोष्‍टारौ । क्रोष्‍टारः । क्रोष्‍टून् ।।
२०८ विभाषा तृतीयादिष्‍वचि
अजादिषु तृतीयादिषु क्रोष्‍टुर्वा तृज्‍वत् । क्रोष्‍ट्रा । क्रोष्‍ट्रे ।।
२०९ ऋत उत्
ऋतो ङसिङसोरति उदेकादेशः । रपरः ।।
२१० रात्‍सस्‍य
रेफात्‍संयोगान्‍तस्‍य सस्‍यैव लोपो नान्‍यस्‍य । रस्‍य विसर्गः । क्रोष्‍टुः २ । क्रोष्‍ट्रोः २ ।
(नुमचिरतृज्‍वद्भावेभ्‍यो नुट् पूर्वविप्रतिषेधेन) । क्रोष्‍टूनाम् ।
क्रोष्‍टरि । पक्षे हलादौ च शम्‍भुवत् ।। हूहूः । हूह्‍वौ । हूह्‍वः । हूहूम् इत्‍यादि ।। अतिचमूशब्‍दे तु नदीकार्यं विशेषः । हे अतिचमु । अतिचम्‍वै । अतिचम्‍वाः । अतिचमूनाम् ।। खलपूः ।।
२११ ओः सुपि
धात्‍ववयवसंयोगपूर्वो न भवति य उवर्णस्‍तदन्‍तो यो धातुस्‍तदन्‍तस्‍यानेकाचोऽङ्गस्‍य यण् स्‍यादचि सुपि । खलप्‍वौ । खलप्‍वः । एवं सुल्‍वादयः ।। स्‍वभूः । स्‍वभुवौ । स्‍वभुवः ।। वर्षाभूः ।।
२१२ वर्षाभ्‍वश्‍च
अस्‍य यण् स्‍यादचि सुपि । वर्षाभ्‍वावित्‍यादि ।। दृन्‍भूः । (दृन्‍करपुनः पूर्वस्‍य भुवो यण् वक्तव्‍यः) । दृन्‍भ्‍वौ । एवं करभूः ।। धाता । हे धातः । धातारौ । धातारः । 
(ऋवर्णान्‍नस्‍य णत्‍वं वाच्‍यम्) । धातॄणाम् । एवं नप्‍त्रादयः ।। नप्‍त्रादिग्रहणं व्‍युत्‍पत्तिपक्षे नियमार्थम् । तेनेह न । पिता । पितरौ । पितरः । पितरम् । शेषं धातृवत् । एवं जामात्रादयः ।। ना । नरौ ।।
२१३ नृ च
अस्‍य नामि वा धीर्घः । नृणाम् । नॄणाम् ।।
२१४ गोतो णित्
ओकाराद्विहितं सर्वनामस्‍थानं णिद्वत् । गौः । गावौ । गावः ।।
२१५ औतोऽम्‍शसोः
ओतोऽम्‍शसोरचि आकार एकादेशः । गाम् । गावौ । गाः । गवा । गवे । गोः । इत्‍यादि ।।
२१६ रायो हलि
अस्‍याकारादेशो हलि विभक्तौ । राः । रायौ । रायः । राम्‍यामित्‍यादि ।। ग्‍लौः । ग्‍लावौ । ग्‍लावः । ग्‍लौभ्‍यामित्‍यादि ।।
इत्‍यजन्‍तपुँल्‍लिङ्गाः ।                                                    
अथाजन्‍तस्‍त्रीलिङ्गाः

रमा ।
२१७ औङ आपः
आबन्‍तादङ्गात्‍परस्‍ययौङः शी स्‍यात् । औङित्‍यौकारविभक्तेः संज्ञा । रमे । रमाः ।।
२१८ सम्‍बुद्धौ च
आप एकारः स्‍यात्‍सम्‍बुद्धौ । एङ्ह्रस्‍वादिति संबुद्धिलोपः । हे रमे । हे रमे । हे रमाः । रमाम् । रमे । रमाः ।।
२१९ आङि चापः
आङि ओसि चाप एकारः । रमया । रमाभ्‍याम् । रमाभिः ।।
२२० याडापः
आपो ङितो याट् । वृद्धिः । रमायै । रमाभ्‍याम् । रमाभ्‍यः । रमायाः । रमयोः । रमाणाम् । रमायाम् । रमासु । एवं दुर्गाम्‍बिकादयः ।।
२२१ सर्वनाम्‍नः स्‍याड्ढ्रस्‍वश्‍च
आबन्‍तात्‍सर्वनाम्‍नो ङितः स्‍याट् स्‍यादापश्‍च ह्रस्‍वः । सर्वस्‍यै । सर्वस्‍याः । सर्वासाम् । सर्वस्‍याम् । शेषं रमावत् ।। एवं विश्वादय आबन्‍ताः ।।
२२२ विभाषा दिक्‍समासे बहुव्रीहौ
सर्वनामता वा । उत्तरपूर्वस्‍यैउत्तरपूर्वायै । तीयस्‍येति वा सर्वनामसंज्ञा । द्वितीयस्‍यैद्वितीयायै ।। एवं तृतीया ।। अम्‍बार्थेति ह्रस्‍वः । हे अम्‍ब । हे अक्‍क । हे अल्‍ल ।। जरा । जरसौ इत्‍यादि । पक्षे रमावत् ।। गोपाःविश्वपावत् ।। मतीः । मत्‍या ।।
२२३ ङिति ह्रस्‍श्‍च
इयङुवङ्स्‍थानौ स्‍त्रीशब्‍दभिन्नौ नित्‍यस्‍त्रीलिङ्गावीदूतौह्रस्‍वौ चेवर्णोवर्णौस्‍त्रियां वा नदीसंज्ञौ स्‍तो ङिति । मत्‍यैमतये । मत्‍याः २ । मतेः २ ।।
२२४ इदुद्भ्‍याम्
इदुद्भ्‍यां नदीसंज्ञकाभ्‍यां परस्‍य ङेराम् । मत्‍याम्मतौ । शेषं हरिवत् ।। एवं बुद्ध्‍यादयः ।।
२२५ त्रिचतुरोः स्‍त्रियां तिसृचतसृ
स्‍त्रीलिङ्गयोरेतौ स्‍तो विभक्तौ ।।
२२६ अचि र ऋतः
तिसृ चतसृ एतयोर्ऋकारस्‍य रेफादेशः स्‍यादचि । गुणदीर्घोत्‍वानामपवादः । तिस्रः । तिसृभ्‍यः । तिसृभ्‍यः । आमि नुट् ।।
२२७ न तिसृचतसृ
एतयोर्नामि दीर्घो न । तिसृणाम् । तिसृषु ।। द्वे । द्वे । द्वाभ्‍याम् । द्वाभ्‍याम् । द्वाभ्‍याम् । द्वयोः । द्वयोः ।। गौरी । गौर्य्यौ । गौर्य्यः । हे गौरि । गौर्य्यै इत्‍यादि । एवं नद्यादयः ।। लक्ष्मीः । शेषं गौरीवत् ।। एवं तरीतन्‍त्र्यादयः ।। स्‍त्री । हे स्‍त्रि ।।
२२८ स्‍त्रियाः
अस्‍येयङ् स्‍यादजादौ प्रत्‍यये परे । स्‍त्रियौ । स्‍त्रियः ।।
२२९ वाम्‍शसोः
अमि शसि च स्‍त्रिया इयङ् वा स्‍यात् । स्‍त्रियम्स्‍त्रीम् । स्‍त्रियःस्‍त्रीः । स्‍त्रिया । स्‍त्रियै । स्‍त्रियाः । परत्‍वान्नुट् । स्‍त्रीणाम् । स्‍त्रीषु ।। श्रीः । श्रियौ । श्रियाः ।।
२३० नेयङुवङ्स्‍थानावस्‍त्री
इयङुवङोः स्‍थितिर्ययोस्‍तावीदूतौ नदीसंज्ञौ न स्‍तो न तु स्‍त्री । हे श्रीः । श्रियैश्रिये । श्रियाःश्रियः ।।
२३१ वामि
इयङुवङ्स्‍थानौ स्‍त्र्याख्‍यौ यू आमि वा नदीसंज्ञौ स्‍तो न तु स्‍त्री । श्रीणाम्श्रियाम् । श्रियिश्रियाम् ।। धेनुर्मतिवत् ।।
२३२ स्‍त्रियां च
स्‍त्रीवाची क्रोष्‍टुशब्‍दस्‍तृजन्‍तवद्रूपं लभते ।।
२३३ ऋन्नेभ्‍यो ङीप्
ऋदन्‍तेभ्‍यो नान्‍तेभ्‍यश्‍च स्‍त्रियां ङीप् । क्रोष्‍ट्री गौरीवत् ।। भ्रूः श्रीवत् ।। स्‍वयम्‍भूः पुंवत् ।।
२३४ न षट्स्‍वस्रादिभ्‍यः
ङीप्‍टापौ न स्‍तः ।।
                   स्‍वसा तिस्रश्‍चतस्रश्‍च ननान्‍दा दुहिता तथा ।
                   याता मातेति सप्‍तैते स्‍वस्रादय उदाहृताः ।।
स्‍वसा । स्‍वसारौ ।। माता पितृवत् । शसि मातॄः ।। द्यौर्गोवत् ।। राः पुंवत् ।। नौर्ग्‍लौवत् ।।
इत्‍यजन्‍तस्‍त्रीलिङ्गाः
                                         अथाजन्‍तनपुंसकलिङ्गाः

२३५ अतोऽम्
अतोऽङ्गात् क्‍लीबात्‍स्‍वमोरम् । अमि पूर्वः । ज्ञानम् । एङ्ह्रस्‍वादिति हल्‍लोपः । हे ज्ञान।।
२३६ नपुंसकाच्‍च
क्‍लीबादौङः शी स्‍यात् । भसंज्ञायाम् ।।
२३७ यस्‍येति च
कडारे तद्धिते च परे भस्‍येवर्णावर्णयोर्लोपः । इत्‍यल्‍लोपे प्राप्‍ते 
(औङः श्‍यां प्रतिषेधो वाच्‍यः) । ज्ञाने ।।
२३८ जश्‍शसोः शिः
क्‍लीबादनयोः शिः स्‍यात् ।।
२३९ शि सर्वनामस्‍थानम्
शि इत्‍येतदुक्तसंज्ञं स्‍यात् ।।
२४० नपुंसकस्‍य झलचः
झलन्‍तस्‍याजन्‍तस्‍य च क्‍लीबस्‍य नुम् स्‍यात् सर्वनामस्‍थाने ।।
२४१ मिदचोऽन्‍त्‍यात्‍परः
अचां मध्‍ये योऽन्‍त्‍यस्‍तस्‍मात्‍परस्‍तस्‍यैवान्‍तावयवो मित्‍स्‍यात् । उपधादीर्घः । ज्ञानानि । पुनस्‍तद्वत् । शेषं पुंवत् ।। एवं धन वन फलादयः ।।
२४२ अद्ड्डतरादिभ्‍यः पञ्चभ्‍यः
एभ्‍यः क्‍लीबेभ्‍यः स्‍वमोः अद्डादेशः स्‍यात् ।।
२४३ टेः
डिति भस्‍य टेर्लोपः । कतरत्कतरद् । कतरे । कतराणि । हे कतरत् । शेषं पुंवत् ।। एवं कतमत् । इतरत् । अन्‍यत् । अन्‍यतरत् । अन्‍यतमस्‍य त्‍वन्‍यतममित्‍येव । (एकतरात्‍प्रतिषेधो वक्तव्‍यः)। एकतरम् ।।
२४४ ह्रस्‍वो नपुंसके प्रातिपदिकस्‍य
अजन्‍तस्‍येत्‍येव । श्रीपं ज्ञानवत् ।।
२४५ स्‍वमोर्नपुंसकात्
लुक् स्‍यात् । वारि ।।
२४६ इकोऽचि विभक्तौ
इगन्‍तस्‍य क्‍लीबस्‍य नुमचि विभक्तौ । वारिणी । वारीणि । न लुमतेत्‍यस्‍यानित्‍यत्‍वात्‍पक्षे संबुद्धिनिमित्तो गुणः । हे वारेहे वारि । घेर्ङितीति गुणे प्राप्‍ते (वृद्ध्‍यौत्त्वतृज्‍वद्भावगुणेभ्‍यो नुम् पूर्वविप्रतिषेधेन) । वारिणे । वारिणः । वारिणोः । नुमचिरेति नुट् । वारीणाम् । वारिणि । हलादौ हरिवत् ।।
२४७ अस्‍थिदधिसक्‍थ्‍यक्ष्णामनङुदात्तः
एषामनङ् स्‍याट्टादावचि ।।
२४८ अल्‍लोपोऽनः
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्‍थानयजादिस्‍वादिपरो योऽन् तस्‍याकारस्‍य लोपः । दध्‍ना । दध्‍ने । दध्‍नः । दध्‍नः । दध्‍नोः । दध्‍नोः ।।
२४९ विभाषा ङिश्‍योः
अङ्गावयवोऽसर्वनामस्‍थानयजादिस्‍वादिपरो योऽन् तस्‍याकारस्‍य लोपो वा स्‍यात् ङिश्‍योः परयोः । दध्‍निदधनि । शेषं वारिवत् ।। एवमस्‍थिसक्‍थ्‍यक्षि ।। सुधि । सुधिनी । सुधीनि । हे सुधेहे सुधि ।।
२५० तृतीयादिषु भाषितपुंस्‍कं पुंवद्गालवस्‍य
प्रवृत्तिनिमित्तैक्‍ये भाषितपुंस्‍कमिगन्‍तं क्‍लीबं पुंवद्वा टादावचि । सुधियासुधिनेत्‍यादि ।। मधु । मधुनी । मधूनि । हे मधोहे मधु ।। सुलु । सुलुनी । सुलूनि । सुलुनेत्‍यादि ।। धातृ । धातृणी । धातॄणि । हे धातःहे धातृ । धातॄणाम् ।। एवं ज्ञात्रादयः ।।
२५१ एच इग्‍घ्रस्‍वादेशे
आदिश्‍यमानेषु ह्रस्‍वेषु एच इगेव स्‍यात् । प्रद्यु । प्रद्युनी । प्रद्यूनि । प्रद्युनेत्‍यादि ।। प्ररि । प्ररिणी । प्ररीणि । प्ररिणा । एकदेशविकृतमनन्‍यवत् । प्रराभ्‍याम् । प्ररीणाम् ।। सुनु । सुनुनी । सुनूनि । सुनुनेत्‍यादि ।।
इत्‍यजन्‍तनपुंसकलिङ्गाः ।
--------------------------------------------------------------
इस अंश के लिए इस लिंक पर चटका लगायें-    लघुसिद्धान्तकौमुदी (हलन्तपुल्लिङ्गतः अव्ययपर्यन्तम्)
इस अंश के लिए इस लिंक पर चटका लगायें-    लघुसिद्धान्तकौमुदी (कृदन्ततः विभक्त्यर्थ- पर्यन्तम्)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें