लघुसिद्धान्तकौमुदी (संज्ञाप्रकरणम्)


सूचना -  लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ने से पहले संस्कृत - शिक्षण - पाठशाला पर चटका लगायें। इसमें सरल भाषा में व्याकरण की आरम्भिक जानकारी दी गयी है। संस्कृत शिक्षण के लिए अभ्यास भी दिये गये हैं। इस चरण को पूरा करने के अनन्तर लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ें। ऐसा करने से इस पुस्तक की भाषा व नियमों को समझना अधिक आसान होगा।                                  

                                          अथ संज्ञाप्रकरणम्         



                             
नत्वा सरस्वतीं देवीं शुद्धां गुण्यां करोम्यहम्।
                              पाणिनीय प्रवेशाय लघु सिद्धान्तकौमुदीम्।
अइउण्।1। ऋलृक्। 2। एओङ्। 3।  ऐऔच्। 4। हयवरट्। 5। लण्। 6। ञमङणनम्। 7। झभञ्। 8। घढधष्। 9।जबगडदश्। 10। खफछठथचटतव्। 11। कपय्। 12। शषसर्। हल्।
इति माहेश्वराणि सूत्राण्यणादिसंज्ञार्थानि । एषामन्त्या इतः । हकारादिष्वकार उच्चारणार्थः । लण्मध्येत्वित्संज्ञकः।
अ इ उण् आदि सूत्र महेश द्वारा प्राप्त हैं । ये सूत्र अण् आदि संज्ञाओं (प्रत्याहार) के लिए हैं। इन सूत्रों के अंतिम वर्ण इत् संज्ञा के लिए हैं। (इत् संज्ञा के बाद इत् संज्ञक वर्ण का लोप हो जाता है। इसका प्रयोजन आगे के सूत्र में बताया जाएगा) लण् सूत्र के बीच में आने वाला अ वर्ण भी इत्संज्ञक है।                                         
 हलन्‍त्‍यम्
उपदेशेऽन्‍त्‍यं हलित्‍स्‍यात् । उपदेश आद्योच्‍चारणम् । सूत्रेष्‍वदृष्‍टं पदं सूत्रान्‍तरादनुवर्तनीयं सर्वत्र ।।
उपदेश अवस्था में अंतिम हल् की इत् संज्ञा हो। आदि उच्चारण को उपदेश कहते हैं। सूत्रों में जो पद दिखाई नहीं दे उसे दूसरे सूत्र से सभी जगह अनुवर्तन करना चाहिए।
इत्- इन 14 माहेश्वर सूत्रों में अंतिम वर्णों की इत् संज्ञा करने से 42 प्रत्याहार बनता है। कम शब्दों में अधिक शब्द कहने में इसका प्रयोग किया जाता है।
हकारादिषु- हयवर आदि व्यंजन वर्ण हैं। स्वर वर्ण की सहायता के विना व्यंजन वर्ण का उच्चारण नहीं हो सकता। अतः हयवर आदि व्यंजन वर्णों के उच्चारण के लिए इसे अकार सहित लिखा/ बोला गया है।
विशेष-
व्याकरण शास्त्र के पांच अङ्ग हैं- सूत्रपाठधातुपाठगणपाठउणादिपाठ तथा लिङ्गानुशासन। माहेश्वर सूत्र, सूत्रपाठधातुपाठवार्तिकपाठगणपाठउणादिपाठ तथा लिङ्गानुशासन, आगम, प्रत्यय तथा आदेश को उपदेश कहा जाता है। 
धातुसूत्रगणोणादि वाक्यलिङ्गानुशासनम्
आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः ।।
धातुसूत्रगणोणादि वाक्यलिंगानुशासनम्।
आदेशो आगमश्च उपदेशाः प्रकीर्तिता।।
इनमें सूत्रपाठ मुख्य भाग हैशेष उसके परिशिष्ट ग्रन्थ कहे जाते हैं। ये सभी रचनायें अष्टाध्यायी के सूत्रों के पूरक हैं। इन परिशिष्ट ग्रन्थों की सहायता से ही सूत्रों को लघु रूप में कह पाना सम्भव हो सका। आगे के पाठ में आप देख सकेंगे कि किस प्रकार प्रत्याहार तथा धातु आदि अन्य पाठों का उपयोग सूत्रों को छोटे आकार में बनाये रखने के लिए किया गया। जैसे- पाणिनि ने सर्वनाम संज्ञा के लिए ‘सर्वादीनि सर्वनामानि’ (अष्टा. 1.1.27) सूत्र लिखते हैंयहां सर्व आदि से सर्वादि गण का निर्देश किया गया है। सर्वादि गण के ज्ञान के लिए गणपाठ के सहारे की आवश्यकता होती है, यदि गण पाठ नहीं होता तो इतने कम शब्दों में सूत्रों को कहना सम्भव नहीं था। सूत्र का अर्थ ही होता है- धागा। (सूत्राणि नरि तन्तवः -अमरकोष2.28)  इसके सहारे हम विभिन्न गणों, प्रत्याहार के वर्णों तक पहुँच पाते हैं। इस प्रकार सूत्र अपने छोटे आकार में रहकर भी अधिक अर्थ को कह पाता है। इसी प्रकार ‘फणां च सप्तानाम्’ (अष्टा. 6.4.125) सूत्र में फणादि सात धातुओं का निर्देश मिलता है। इसकी जानकारी धातुपाठ से मिलती है। ‘उणादयो बहुलम्’ (अष्टा. 3.3.1) सूत्र को समझने के लिए उणादिपाठ की शरण में जाना होता है। इस प्रकार धातुपाठ और गणपाठ  आदि उपदेश कहे जाते हैं। पाणिनि अपने सूत्र में प्रत्याहार की तरह ही  इसका भी प्रयोग करते हैं। अतः सूत्रों के साथ साथ धातुपाठ आदि का भी स्मरण करना चाहिए।
सूत्र का लक्षण-
               अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवद् विश्वतोमुखम्।
               अस्तोभमनवद्यं च सूत्रं सूत्रविदोविदुः।।
सूत्रों के भेद -
             संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च।
             अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम्॥
अनुवर्तनीयम्-  अष्टाध्यायी की रचना सूत्रों की शैली में हुई अतः इसे अष्टाध्यायी सूत्रपाठ भी कहा जाता है। लघुसिद्धान्तकौमुदी का निर्माण  अष्टाध्यायी के सूत्रों से ही हुआ है। सूत्र में संक्षेपीकरण को महत्व दिया जाता है। हम इसके सहारे विस्तार तक पहुंच जाते हैं। सूत्रों को याद रखना आसान होता है। यदि ये सूत्र बड़े आकार में होते तो याद रखना भी कठिन होता। एक ही शब्द को बारबार कहना और लिखना पड़ता। सूत्र में कही गयी बातों को पूरी तरह समझने के लिए हमें कुछ बुद्धि लगानी पड़ती है। पाणिनि ने यदि किसी सूत्र में एक बार कोई बात कह दी तो उसे आगे के सूत्र में पुनः नहीं कहते। वह नियम आगे के सूत्र में आ जाते हैं। इसे अनुवर्तन कहते हैं। जब कोई शब्द किसी सूत्र में दिखाई नहीं दे और अर्थ पूर्ण नहीं हो रहा हो तो उसे पहले के सूत्र में देखना चाहिए। जैसे- हलन्त्यम् (1.3.3) सूत्र में उपदेशेऽजनुनासिक इत् (1.3.2) से  उपदेशे तथा इत् इन दो पदों की अनुवृत्ति आती है। आप देख रहे होंगें कि उपदेशेऽजनुनासिक इत् के बाद की संख्या हलन्त्यम् सूत्र की है। इस प्रकार हलन्त्यम् सूत्र का अर्थ पूर्ण हो जाता है। अनुवृत्ति को समझने के लिए हमें अष्टाध्यायी की आवश्यकता होती है परन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में सूत्र के नीचे अनुवृत्ति आदि प्रक्रिया को पूर्ण कर उसकी वृत्ति अर्थात् सूत्र का अर्थ लिखा हुआ है।
 अदर्शनं लोपः
प्रसक्तस्‍यादर्शनं लोपसंज्ञं स्‍यात् ।
विद्यमान का नहीं दिखाई देना लोप संज्ञक होता है।
 तस्‍य लोपः
तस्‍येतो लोपः स्‍यात् । णादयोऽणाद्यर्थाः ।
उस इत् संज्ञक का लोप होता है। अ इ उण् का ण् आदि अण् प्रत्याहार बनाने के लिए है।
 आदिरन्‍त्‍येन सहेता
अन्‍त्‍येनेता सहित आदिर्मध्‍यगानां स्‍वस्‍य च संज्ञा स्‍यात् यथाऽणिति अ इ उ वर्णानां संज्ञा । एवमच् हल् अलित्‍यादयः ।।
अंतिम इत् के सहित आदि वर्ण, अपने बीच के वर्णों की तथा अपनी (आदि) भी संज्ञा हो। इसी प्रकार अक्, अच्, हल्, आदि को भी समझना चाहिए।
विशेष- 
माहेश्वर सूत्रों के प्रारंभिक एवं अंतिम अक्षरों को लेकर प्रत्याहारों (शब्द संक्षेपों) को बनाया गया है। जैसे प्रथम सूत्र में अ और ण् को लेकर अण् प्रत्याहार सिद्ध होता है। इसी प्रकार अधोलिखित प्रत्याहार बनते हैं । आप तालिका में देख सकते हैं कि अन्य सूत्रों के अंतिम अक्षर को लेकर भी प्रत्याहार सिद्ध होते हैं। जैसे- प्रथम सूत्र के अ वर्ण के साथ पांचवे सूत्र का ट् वर्ण लेकर अट् प्रत्याहार बनता है। इसी प्रकार सातवें सूत्र के प्रारंभिक वर्ण म के साथ 12 वें सूत्र के अंतिम अक्षर य् साथ जोड़ने पर मय् प्रत्याहार बनता है । प्रत्याहार में उन सभी स्वर और व्यंजन की गणना होती है जो प्रत्याहार के दोनों अक्षरों के बीच आ जाते हैं।  
प्रत्याहार के लिए माहेश्वर सूत्र का प्रारंभिक अक्षर लेना आवश्यक नहीं होता। प्रत्याहार के लिए माहेश्वर सूत्र के इत्संज्ञक (अंतिम वर्ण) को छोड़कर कोई भी वर्ण लिया जा सकता है। जैसे यय् प्रत्याहार में  माहेश्वर सूत्र के पांचवे सूत्र के दूसरे अक्षर से लेकर बारहवें सूत्र के य् से पूर्व के वर्णों की गणना होती है।
पहले सूत्र से चौथे सूत्र तक में सभी स्वर वर्ण है। इसे अच् प्रत्याहार द्वारा कहा जाता है। 5 वें सूत्र से 14 वें सूत्र तक सभी व्यंजनों वर्ण हैं। 5 वें सूत्र के ह से 14 वें सूत्र के ल् को लेकर  हल् प्रत्याहार बनता है । इसमें सभी व्यंजन वर्णों का समावेश हो जाता है।
व्यंजन वर्णों के उच्चारण में सहायता के लिए अकार स्वर मिला हुआ है।  जैसे ह् + अ = ह आदि । यह अ स्वर वर्ण व्यंजन वर्ण के उच्चारण में सहायक है। स्वर की सहायता के बिना व्यंजन का उच्चारण नहीं किया जा सकता है।
छठे सूत्र के ल का अ इत्संज्ञक है। अर्थात् इस अ की इत्संज्ञा तथा लोप होता है। इसके फलस्वरूप ल प्रत्याहार बनता है।
आपने अबतक जाना कि माहेश्वर सूत्रों में सभी स्वर (अच्) और व्यंजनों (हल्) की गणना की गई है । यहां ह व्यंजन के अतिरिक्त किसी भी स्वर और व्यंजन की पुनरावृत्ति नहीं हुई है।  ह य व रट् इस पंचम सूत्र में तथा हल् इस 14 वें सूत्र में ह व्यंजन वर्ण दो बार आया है।। यह इसलिए ताकि अट् और शल् ये दो प्रत्याहार बन सकें। अट् प्रत्याहार के कारण अट्कुप्वाङ्नुम्व्यवायेऽपि इस सूत्र के द्वारा अर्हेण में नकार को णकार हुआ और शल् प्रत्याहार के कारण शल इगुपधादनिटः क्सः सूत्र से अधुक्षत् रूप सिद्ध हुआ।  
                         हकारो द्विरूपात्तोऽयमटि शल्यपि वाञ्छता।
                         अर्हेणाधुक्षदित्येतद् द्वयं सिद्धं भविष्यति।। 
यहाँ आदि तथा अन्त्य शब्द विभिन्न प्रत्याहारों के सन्दर्भ में समझना चाहिए। इस प्रकार 14 सूत्रों से कुल 42 प्रत्याहार बनाये जाते हैं। पाणिनि ने अपने सूत्रों तथा कात्यायन के वार्तिक में अधोलिखित प्रत्याहारों का प्रयोग किया गया है- 
 प्रत्याहारों के नाम
अक्  
अण्   
एङ्   
चर्
झल्
यञ्
वल्
अच्  
अण्  
एच्
चय्
झस्
यण्
वश्
अट्   
इण्
ऐच्
छव्
झष्
यम्
शर्
अम्
इक्
खर्
जश्  
बश्
यय्  
शल्  
अल्
इच्
खय्
झय्
भष्
यर्  
हल्  
अश्
उक्   
ङम्  
झर्
मय्
रल्
हश्  



 ऊकालोऽज्‍झ्रस्‍वदीर्घप्‍लुतः
उश्‍च ऊश्‍च ऊ३श्‍च वः। वां कालो यस्‍य सोऽच् क्रमाद् ह्रस्‍वदीर्घप्‍लुतसंज्ञः स्‍यात् । स प्रत्‍येकमुदात्तादि भेदेन त्रिधा ।
एक मात्रिक, द्वि मात्रिक तथा त्रि मात्रिक उकार के उच्चारण काल के समान जिस अच् का उच्चारण काल हो उसे क्रमशः ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत संज्ञा हो। उन प्रत्येक ह्रस्व आदि अच् का उदात्त, अनुदात्त तथा स्वरित के भेद से तीन- तीन भेद होते हैं।
नीलकण्ठ की ध्वनि एक मात्रा वाली, कौआ की दो मात्रा वाली, मयूर की तीनमात्रा वाली तथा नेवले की ध्वनि आधी मात्रा वाली होती है। ये जब बोलते हैं तो इनके बोलने में उपर्युक्तानुसार समय लगता है।
                      चाषस्तु वदते मात्रां दि्वमात्रं चैव वायसः ।
                     शिखी रौति त्रिमात्रं तु नकुलस्त्वर्धमात्रकम् ।।
 उच्‍चैरुदात्तः
तालु आदि भागों के स्थान में ऊपर वाले भाग से बोले जाने वाले अच् की उदात्त संज्ञा होती है।
 नीचैरनुदात्तः
तालु आदि स्थानों में निचले भाग से बोले जाने वाले अच् की अनुदात्त संज्ञा होती है।
 समाहारः स्‍वरितः
जिसमें उदात्त और अनुदात्त वर्णों के धर्म सम्मिलित हो, वह अच् को स्वरित संज्ञक होता हैं। 
स नवविधोऽपि प्रत्‍येकमनुनासिकत्‍वाननुनासिकत्‍वाभ्‍यां द्विधा ।।
वह अच् ह्रस्व तथा उदात्त आदि भेद के कारण 9 प्रकार का होते हुए अनुनासिक और अनुनासिक के भेद से दो-दो प्रकार के होते हैं।
 मुखनासिकावचनोऽनुनासिकः
मुखसहितनासिकयोच्‍चार्यमाणो वर्णोऽनुनासिकसंज्ञः स्‍यात् । तदित्‍थम् – अ इ उ ऋ एषां वर्णानां प्रत्‍येकमष्‍टादश भेदाः । ॡवर्णस्‍य द्वादशतस्‍य दीर्घाभावात् । एचामपि द्वादशतेषां ह्रस्‍वाभावात् ।।
मुख सहित नासिका (नाक) से बोला जाने वाला वर्ण अनुनासिक संज्ञक हो।
वह अच् इस प्रकार है- अ इ उ ऋ इन वर्णो में प्रत्येक वर्णों के 18-18 भेद होते हैं। ॡ वर्ण का 12 भेद होता है। उसमें दीर्घ का अभाव होता है। एच् प्रत्याहार में आए वर्ण के भी 12 भेद होते हैं। इसमें ह्रस्व का अभाव होता है।


                                               

                                              स्वरों के भेद

अ इ उ ऋ 
अ इ उ ऋ  ऌ ए ऐ ओ औ
अ इ उ ऋ  ऌ ए ऐ ओ औ
ह्रस्व उदात्त  अनुनासिक
दीर्घ उदात्त  अनुनासिक
प्लुत उदात्त  अनुनासिक
ह्रस्व उदात्त अननुनासिक
दीर्घ उदात्त अननुनासिक
प्लुत उदात्त अननुनासिक
ह्रस्व अनुदात्त अनुनासिक
दीर्घ अनुदात्त अनुनासिक
प्लुत अनुदात्त अनुनासिक
ह्रस्व अनुदात्त अनुनासिक
दीर्घ अनुदात्त अनुनासिक
प्लुत अनुदात्त अनुनासिक
ह्रस्व स्वरित अनुनासिक
दीर्घ स्वरित अनुनासिक
प्लुत स्वरित अनुनासिक


१० तुल्‍यास्‍यप्रयत्‍नं सवर्णम्
ताल्‍वादिस्‍थानमाभ्‍यन्‍तरप्रयत्‍नश्‍चेत्‍येतद्द्वयं यस्‍य येन तुल्‍यं तन्‍मिथः सवर्णसंज्ञं स्‍यात् ।

तालु आदि स्थान तथा आभ्यंतर प्रयत्न यह दोनों जिस वर्ण के साथ तुल्य हो
, वह परस्पर सवर्ण संज्ञक होता है। 
(ऋॡवर्णयोर्मिथः सावर्ण्यं वाच्‍यम्)  
ऋ और ॡ वर्ण की परस्पर सवर्ण संज्ञा कहनी चाहिए।
अकुहविसर्जनीयानां कण्‍ठः । , कवर्ग, ह तथा विसर्ग का उच्चारण स्थान कंठ है।
इचुयशानां तालु ।              चवर्गय तथा श का उच्चारण स्थान तालु है।
ऋटुरषाणां मूर्धा ।             , टवर्ग, र एवं ष का उच्चारण स्थान मूर्धा है।
ॡतुलसानां दन्‍ताः ।            , तवर्ग, ल एवं श का उच्चारण स्थान दांत है।
उपूपध्‍मानीयानामोष्‍ठौ ।      ,पवर्ग तथा उपध्मानीय का उच्चारण स्थान होठ है।
ञमङणनानां नासिका च ।     , , , , तथा न का उच्चारण स्थान नाक है।
एदैतोः कण्‍ठतालु ।               ए तथा ऐ का उच्चारण स्थान कंठ तालु है। 
ओदौतोः कण्‍ठोष्‍ठम्।             , औ का उच्चारण स्थान कंठ और होठ है।
वकारस्‍य दन्‍तोष्‍ठम् ।            वकार का उच्चारण स्थान दांत और होठ है।
जिह्‍वामूलीयस्‍य जिह्‍वामूलम् ।   जिह्वामूलीय का उच्चारण स्थान जिह्वामूल है। 
नासिकाऽनुस्‍वारस्‍य ।              अनुस्वार का उच्चारण नाक है।
इति स्थानानि।                     यहाँ वर्णों के उच्चारण स्थान समाप्त हुए।

यत्‍नो द्विधा – आभ्‍यन्‍तरो बाह्‍यश्‍च । यत्न दो प्रकार के होते हैं- आभ्यन्तर और बाह्य।
आद्यः पञ्चधा – आदि = आभ्यंतर प्रयत्न पांच प्रकार के होते हैं। 
स्‍पृष्‍टेषत्‍स्‍पृष्‍टेषद्विवृतविवृतसंवृत भेदात् । स्पृष्टईषत्स्पृष्टईषत् विवृतविवृतसंवृत के भेद से।
तत्र स्‍पृष्‍टं प्रयत्नं स्‍पर्शानाम् ।          आभ्यन्तर प्रयत्न में स्पर्श- (कुचुटुतुपु) वर्ग की स्पृष्ट संज्ञा होती है।
ईषत्‍स्‍पृष्‍टमन्‍तःस्‍थानाम् ।              अन्तःस्थों (यल ) की ईषत्स्पृष्ट संज्ञा होती है।
ईषद्विवृतमूष्‍मणाम् ।                    ऊष्म (श,,,,ह) की ईषद्विवृत संज्ञा होती है।
विवृतं स्‍वराणाम् ।                      स्वर वर्णों की विवृत संज्ञा होती है।
ह्रस्‍वस्‍यावर्णस्‍य प्रयोगे संवृतम् ।     प्रयोग अवस्था में ह्रस्व ‘’ की विवृत संज्ञा होती है।
प्रक्रियादशायां तु विवृतमेव ।         शब्द निर्माण का प्रक्रिया में ह्रस्व ‘’ की संवृत संज्ञा होती है।

विशेष-  कुचुटुतुपु प्रत्येक वर्ग के आदि अक्षर को लेकर बनाया गया है। इसका क्रमशः अर्थ होता है - कवर्गचवर्गटवर्गतवर्ग और पवर्ग। इसे इस प्रकार समझें-
उदित    वर्ग          वर्ण
कु =   कवर्ग -   क् ख् ग् घ् ङ्
चु =   चवर्ग –  च् छ् ज् झ् ञ्
टु =   टवर्ग –    ट् ठ् ड् ढ् ण्
तु =   तवर्ग –    त् थ् द् ध् न्
पु =   पवर्ग –    प् फ् ब् भ् म् 

बाह्‍यप्रयत्‍नस्‍त्‍वेकादशधा
 –  बाह्य प्रयत्न 11 प्रकार का होता है।
विवारः संवारः श्‍वासो नादो घोषोऽघोषोऽल्‍पप्राणोमहाप्राण उदात्तोऽनुदात्तः स्‍वरितश्‍चेति । 
विवारसंवारश्वासनादघोषअघोषअल्पप्राणमहाप्राणउदात्तअनुदात्त और स्वरित। 
खरो विवाराः श्वासा अघोषाश्‍च ।         खर् प्रत्याहार के अन्तर्गत वाले वर्ण विवारश्वास और अघोष यत्न वाले होते हैं।
हशः संवारा नादा घोषाश्‍च ।               हश् प्रत्याहार के अन्तर्गत वाले वर्ण संवारनाद और घोष यत्न वाले होते हैं।
वर्गाणां प्रथमतृतीयपञ्चमा यणश्‍चाल्‍पप्राणाः । वर्गों के प्रथमतृतीय तथा पंचम वर्ण और यण् प्रत्याहार (यल) अल्पप्राण कहलाते हैं।
वर्गाणां द्वितीयचतुर्थौ शलश्‍च महाप्राणाः । वर्गों का दूसराचौथा और शल् प्रत्याहार (शह) महाप्राण कहलाते हैं।
कादयो मावसानाः स्‍पर्शाः ।  क से लेकर म तक स्पर्श कहे जाते हैं। 
यणोऽन्‍तःस्‍थाः ।                यण् प्रत्याहार के वर्ण अन्तस्थ कहे जाते हैं।
शल ऊष्‍माणः ।                 शल् प्रत्याहार के वर्ण उष्म कहे जाते हैं।
अचः स्‍वराः ।                   अच् प्रत्याहार के वर्ण स्वर कहे जाते हैं।
ں ں ख इति कखाभ्‍यां प्रगर्धविसर्गसदृशो जिह्‍वामूलीयः । 
ں  ں ख इति कखाभ्‍यां प्रगर्धविसर्गसदृशो जिह्‍वामूलीयः । क एवं ख के पहले आधे विसर्ग के समान वर्ण जिह्वामूलीय कहे जाते हैं ।
 ں ںफ इति पफाभ्‍यां प्रागर्धविसर्गसदृश उपध्‍मानीयः । 
 ں  ں एवं   के पहले आधे विसर्ग के समान वर्ण उपध्मामनीय कहे जाते हैं ।

अं अः इत्‍यचः परावनुस्‍वारविसर्गौ ।। अं अः में अच् के बाद का वर्ण अनुस्वार तथा विसर्ग हैं ।



माहेश्वर सूत्र में वर्णों के क्रम की योजना 
  
११ अणुदित्‍सवर्णस्‍य चाप्रत्‍ययः
प्रतीयते विधीयत इति प्रत्‍ययः । अविधीयमानोऽणुदिच्‍च सवर्णस्‍य संज्ञा स्‍यात् । अत्रैवाण् परेण णकारेण । कु चु टु तु पु एते उदितः । तदेवम् – अ इत्‍यष्‍टादशानां संज्ञा । तथेकारोकारौ । ऋकारस्‍त्रशिंतः । एवं ॡकारोऽपि । एचो द्वादशानाम् । अनुनासिकाननुनासिकभेदेन यवला द्विधातेनाननुनासिकास्‍ते द्वयोर्द्वयोस्‍संज्ञा ।

जिसे विधान किया जाय उसे प्रत्यय कहा जाता है।  अविधीयमान अण् और उदित  अपने तथा अपने सवर्ण  की तथा अपने स्वरूप की संज्ञा होती है। इस सूत्र में कहा गया अण् प्रत्याहार बाद वाले णकार अर्थात लण् सूत्र से ग्रहीत होता है।  कु चु टु तु पु ये उदित कहे जाते हैं। इस प्रकार अ 18 प्रकार की संज्ञा वाला है। इसी प्रकार की इकार और उकार भी 18 प्रकार की संज्ञा वाला है। ऋ 30 प्रकार की संज्ञा वाला होता है। इसी प्रकार   भी  30 प्रकार की संज्ञा वाला होता है। एच् प्रत्याहार के वर्ण 12 संज्ञा वाले होते हैं । अनुनासिक और अननुनासिक के भेद से य् व् ल् दो-दो प्रकार के होते हैं।  इसीलिए अननुनासिक य् व् ल् की 2- 2 संज्ञा होगी।


  
१२ परः संन्निकर्षः संहिता
वर्णानामतिशयितः सन्निधिः संहितासंज्ञः स्‍यात् ।।
वर्णों की अत्यन्त समीपता को संहिता कहते हैं।
१३ हलोऽनन्‍तराः संयोगः
अज्‍भिरव्‍यवहिता हलः संयोगसंज्ञाः स्‍युः ।।
दो हलों के बीच में किसी अच् का व्यवधान न हो उसकी संयोग संज्ञा होती है।
१४ सुप्‍तिङन्‍तं पदम्
सुबन्‍तं तिङन्‍तं च पदसंज्ञं स्‍यात् ।।
सुबन्त और तिङ्न्त की पद संज्ञा होती है।



अपनी प्रगति जांचें

संज्ञाप्रकरणम् से जुड़ी कुछ ध्यातव्य बातें- इस प्रकरण में हमने वर्णों का परिचय एवं स्वर वर्णों के सभी भेद को जान लिया है। हमेशा यह ध्यान रखना होगा कि जब भी अ इ उ ए  आदि वर्णों के विषय में कहा जाय, उसके साथ ही दीर्घ एवं प्लुत स्वर भी सम्मिलित रहता है। अतः अ कहने का तात्पर्य आ भी है। इसी प्रकार अन्य स्वरों के बारे में भी समझना चाहिए। यहाँ हमने  वर्णों के उच्चारण स्थान एवं प्रयत्न के बारे में भी जाना। यह शुद्ध उच्चारण करने में सहायक है। सन्धि आदि करते समय वर्णों के स्थान व प्रयत्न एक होने पर सदृशतम आदेश होता है। सन्धि में वर्ण परिवर्तन का रहस्य, उच्चारण की वैज्ञानिकता में भी छिपी है। आप इसका भी अनुभव करेंगें।  इत्, लोप, सवर्ण, संहिता एवं संयोग आदि संज्ञा के नियमों को ध्यान में रखना चाहिए। यह सम्पूर्ण शब्द शास्त्र का मूल आधार है। इसकी आवश्यता बार-बार पड़ेगी। प्रत्याहार के द्वारा अनेक वर्णों को कम वर्णों द्वारा कह पाते है। हम आज भी बोलचाल तथा अन्य व्यवहार में शब्दों को संक्षिप्त कर बोलते हैं। पाणिनि की यह अभूतपूर्व कल्पना एवं संरचना है,जिसके सहारे उन्होंने इतना विशाल व्याकरण शास्त्र लिखा। आप आगे देखेंगें कि इन प्रत्याहारों का प्रयोग वे कितने सूत्रों में करते हैं। कल्पना कीजिये यदि ये प्रत्याहार नहीं होते तो अष्टाध्यायी के इन सूत्रों को कैसे लिखा जाता? हमें कितने शब्द बार-बार याद करने पड़ते? माहेश्वर सूत्र में वर्णों के क्रम इस प्रकार रखा गया कि प्रत्याहार बनाने तथा उनके प्रयोग में सरलता आ गयी। माहेश्वर सूत्र को जितना जल्द हो याद कर लेना चाहिए। 
     सूत्र में हल् वर्णों का आरम्भ अन्तस्थ अर्थात् यण् प्रत्याहार के वर्णों से हुआ। उसके बाद प्रत्येक वर्ग का क्रमशः 5,4,3,2,1 वर्ण आया। अंत में उष्म वर्ण अर्थात् शल् प्रत्याहार के वर्ण आये। सूत्रों में वर्णों के क्रम तथा प्रत्येक सूत्र के अंतिम हल् वर्ण स्पष्ट रूप से याद हों,ताकि किसी प्रत्याहार का नाम सुनते ही तुरंत स्मरण हो जाय कि इसके बीच में कौन-कौन वर्ण आयेंगें। याद है न, यहाँ का कु चु टु तु पु ये पांचों वर्गये वर्ग भी शब्द संक्षेपीकरण का अनुपम उदाहरण हैं। आगे हम इसी प्रकार से अन्य तरह के कुछ नये प्रत्याहारों से भी परिचित होंगें। प्रत्याहार के विषय में अपने मित्रों से चर्चा कर अभ्यास कीजिये।
इति संज्ञाप्रकरणम्

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1 टिप्पणी:

  1. राधे राधे आपको सुनकर बहुत अच्छा लगा बहुत ही दिव्य कार्य आप कर रहे हैं प्रभु से प्रार्थना करता हूं कि आपके ऊपर भगवान असीम अनुकंपा कृपा बनाए रखें मेरी ओर से आपको अनंत अनंत मंगलकामनाएं हर हर महादेव

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