गुरुवार, 13 जून 2019

जलवायु परिवर्तन के कारण एवं इसके दुष्परिणाम


ऊर्जा आज की आवश्यकता है परन्तु यह ऊर्जा हमारे लिए कल्याण कारक हो। वेद की इस ऋचा को देखें- पावको अस्मभ्यं शिवो भव अग्ने पावका रोचिषा। सन् 2030 तक ऊर्जा की मांग 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिसमें भारत और चीन की जरूरत सबसे ज्यादा होगी। जीवाश्म ईंधन, कोयला,तेल,प्राकृतिक गैस के जलने से वायुमंडल में कार्वन का उत्सर्जन होता है। ग्रीन हाउस में गैस के सघन होने से धरती गर्म होती है तथा वैश्विक ताप में वृद्धि होती है। वैश्विक ताप के कारण जलवायु में परिवर्तन तेजी से हो रहा है। वर्षा, हवा, तापमान में वृद्धि के कारण ऋतु चक्र अनियमित हो उठता है। भारत का 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर आधारित है। ऋतु चक्र में बदलाव के कारण अर्थव्यवस्था पर गम्भीर प्रभाव पडता है। संसाधनों के दोहन की रफ्तार अगर यही रही तो समुद्रों से मछलियां गायब हो जाएंगी। 250 वर्ष के विश्व इतिहास ने यह सिद्ध कर दिया है कि अत्यधिक भोग ने भूमि का दोहन अंतिम सीमा तक कर लिया है। जिस मशीनी युग का विकास व्यक्ति के सुख के लिए किया गया है, वहीं उसके दुःख का कारण बन गया है।
            ऋतु चक्र में परिवर्तन का प्रभाव दूरदराज तक गांवों, खेत-खलिहानों के कृषि पर पड़ रहा है, कम पानी और रासायनिक खादों के बिना पैदा होने वाली परंपरागत रूप से उत्पादित फसलों का नामो-निशान तक मिट गया है। कई फसलें समाप्त हो चुकी हैं और उसकी जगह नई फसलों ने ले लिया है. इनमें बड़ी मात्रा में रासायनिक खादों, कीटनाशकों, परिमार्जित बीजों और सिंचाई की जरूरत पड़ती है। इससे खेती का खर्च बढ़ा है और खेती के तरीके में बदलाव आया है। इसका सीधा असर ग्रामीण कृषक समाज के जीवन स्तर और रहन-सहन पर पड़ रहा है। खेती घाटे का सौदा बनने के चलते किसान अन्य धंधों की ओर जाने को विवश हुआ है। खेती में उपज तो बढ़ी लेकिन लागत कई गुना अधिक हो गई, जिससे अधिशेष यानी, माजिर्न का संकट पैदा हो गया। गर्मी, जाड़े और बरसात के मौसम में कुछ फेरबदल से फसलों की बुबाई, सिंचाई और कटाई का मौसम बदला और जल्दी खेती करने के दवाब में पशुओं को छोड़ मोटर चालित यंत्रों पर निर्भरता आई. इनका परिणाम हुआ कि खेती घाटे का सौदा हो गया. अब हर परिवार को खेती के अलावा कोई दूसरा काम करना मजबूरी हो गई।
            मानसून के समय में बदलाव की वजह से 51 प्रतिशत तक कृषि भूमि प्रभावित हुई। तापमान के बढ़ने से रबी की फसलों का जब पकने का समय आता है, तब तापमान में तीव्र वृद्धि से फसलों में एकदम बालियां आ जाती है। इससे गेहूँ व चने की फसलों के दाने बहुत पतले होते है व उत्पादकता घट जाती है।
            तापमान में 1 प्रतिशत वृद्धि की से 20 प्रतिशत तक गेहूँ की ऊपज कम हो जाती है। इससे कीटरोधी उपायों को तो झटका लगता ही है, फसल रूग्णता भी बढती है। जलवायु परिवर्तन के चलते विकसित देश आस्ट्रेलिया और स्पेन भी खाद्य सुरक्षा के संकट से दो-चार हो रहे हैं। आस्ट्रेलिया में कुछ साल पहले जो अकाल पड़ा था, उसकी पृष्ठभूमि में औद्योगिक विकास के चलते बड़े तापमान की ही भूमिका जताई गई है। इस वजह से यहां गेहूं का उत्पादन 60 फीसदी तक घट गया है। अर्थात् भारत समेत दुनिया को एक समय बड़ी मात्रा में गेहूं का निर्यात करने वाला देश खुद भुखमरी की चपेट में आ गया है। स्पेन में 40 लाख लोगों पर भूख का साया गहरा रहा है। वैश्विक तापमान के चलते 36 विकासशील और 21 अफ्रीकी देशों पर भूख की काली छाया मंडरा रही है। इन परिस्थितियों को हमारे ऋषि बहुत पहले जानते थे। अतः वे आकाश, अंतरिक्ष, पथ्वी, जल, ओषधि, वनस्पति की शान्ति की बात करते थे। द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।। (यजु. 36/17)
            यदि समय रहते तापमान वृद्धि पर नियंत्रण न पाया गया तो खतरनाक वन आग, बाढ,सूखे जैसे प्राकृतिक दुष्प्रभाव का और सामना करना पड सकता है। ऊर्जा उत्पादन में भारत की प्रथम प्राथमिकता सौर तथा पवन ऊर्जा होनी चाहिए। आशा है पेरिस में 122 देशों का जो सौर गठबंधन हुआ है, वह मिलकर काम करेगा।
पानी
            जलवायु परिर्वतन से शुद्ध पानी का भयानक संकट छा जाएगा। । विश्व का 40 प्रतिशत मीठा पानी वर्तमान में पीने योग्य नहीं रह गया है। नदियों और झीलों से पानी का दोहन सन् 1960 के मुकाबले दो गुना बढ़ चुका है।
            विश्व के दो लाख लोग प्रतिदिन गांवों या छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर जा रहे हैं। इससे भी पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। ताजा पानी का भंडार 55 फीसदी घट चुका है और समुद्री जीवन भी घटकर एक-तिहाई ही रह गया है। ये सभी तथ्य एक खतरनाक भविष्य की ओर इशारा करते हैं,
 वर्षाचक्र में बदलाव, बाढ़, तूफान और भूस्खलन के चलते ज्यादातर शुद्ध जल के स्रोत दूषित होते जा रहे हैं। परिणामतः इस दूषित पानी के उपयोग से डायरिया व आंखों के संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। वैसे भी दुनिया में पानी की कमी से हर दस में चार लोग पहले से ही जूझ रहे हैं। डायरिया से हरेक साल 18 लाख मौतें होती हैं। मौसम में आए वर्तमान बदलावों ने पानी और मच्छर जैसे संवाहकों द्वारा डेंगू और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियों के खतरे उत्पन्न कर दिए हैं। 2006 में भारत में डेंगू के 10 हजार मामले सामने आए थे, जिनमें से दो सौ लोग मारे भी गए थे। हमारे ग्रन्थ इस समस्या से समाधान का मार्ग दिखाते हैं। अथर्ववेद में पृथिवी पर शुद्ध पेय जल के सर्वदा उपलब्ध रहने की ईश्वर से कामना की गयी है- शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो न: सेदुरप्रिये तं नि दध्म:। पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि॥ यजुर्वैदिक ऋषि शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शन्योरभिस्त्रवन्तु न: कहकर शुद्ध जल के प्रवाहित होने की कामना करते हैं।
अपो याचामि भेषजम्। अथर्ववेद 1.5.4
जल ओषधि है।
ता जीवला जीवधन्याः प्रतिष्ठाः। अथर्ववेद 12.3.25
जल जीवन शक्तिप्रद, जीवहितकारी, और जीवन का आधार है।
समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वती। अथर्ववेद 4.15.1
जल को किसी भी प्रकार से दूषित होने से बचाना है। पुराणों में गंगा के किनारे दातुवन करने तक को मना किया गया। आज इस पवित्र नही में मानव मल तथा कारखाने का विषैला जल प्रवाहित करने में संकोच नहीं होता। कहाँ से कहाँ आ गये हम।
न दन्तधावनं कुर्यात् गंगागर्भे विचक्षणः।
परिधायाम्बराम्बूनि गंगा स्रोतसि न त्यजेत्।। ब्रह्म पुराण


वायु
आज वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा जैसे अनेक रोग बढ़ते जा रहे हैं। इंधन के अंधाधुंध प्रयोग हमें मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। आक्सीजन कन्सीटेचर, आक्सीजन सेलेंडर से बाजार पट चुका है। हम जिस नारकीय जीवन की सृष्टि में लगे हैं उसके हम ही दोषी हैं। यदि हम ऋग्वेद के इस मंत्र का मनन किये होते तो आज हमारी यह दुर्दशा नहीं होती।
'वात आ वातु भेषजं शंभू, मयोभु नो हृदे। प्राण आयुंषि तारिषत्'- ऋग्वेद (10/186/1)
शुद्ध ताजी वायु अमूल्य औषधि है जो हमारे हृदय के लिए दवा के समान उपयोगी है, आनन्ददायक है। वह उसे प्राप्त कराता है और हमारे आयु को बढ़ाता है।

जंगल
            कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले सारे जंगल उजड़ते जा रहे हैं। सन् 1970 से 2002 के बीच पृथ्वी पर से जंगल का प्रतिशत 12 फीसदी कम हो गया है। 
जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव मौसम की अतिशय घटनाओं खासकर लू, बाढ़, सूखे और आंधी की बढ़ती आवृति और तीव्रता की वजह से पड़ रहा है। संक्रामक रोगों के स्वरूपों में बदलाव, वायु प्रदूषण, खाद्य असुरक्षा एवं कुपोषण, अनैच्छिक विस्थापन और संघर्षों से अप्रत्यक्ष प्रभाव भी पैदा हो रहे हैं।
प्राकृतिक आपदा
बढ़ते तापमान से हिमखंडों में जो पिघलने की शुरुआत हो चुकी है, उसका खतरनाक दृश्य भारत, बंगलादेश आदि देशों में देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश तीन नदियों के डेल्टा पर आबाद है। बांग्लादेश वर्ष 2080 तक इस देश के समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले पांच से 10 करोड़ लोगों को अपना मूलक्षेत्र छोड़ना होगा। बांग्लादेश के ज्यादातर भूखंड समुद्र तल से महज 20 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं, बर्फ की शिलाओं के पिघलने से समुद्र का जलस्तर उपर उठेगा तो सबसे ज्यादा जलमग्न भूमि इसी देश की होगी। यहां आबादी का घनत्व भी सबसे ज्यादा है, इसलिए मानव त्रासदी भी इस देश को ही ज्यादा झेलनी होगी। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक बांग्लादेश में धान की पैदावार 10 प्रतिशत और गेहूं की 30 प्रतिशत तक घट जाएगी।
बांग्लादेश के समुद्र तटीय बाढ़ के कारण कृषि भूमि में खारापन बढ़ रहा है। नतीजतन धान की खेती  बर्बाद हो रही है। ऐसे अनुमान हैं कि इस सदी के अंत तक बांग्लादेश का एक चैथाई हिस्सा पानी में डूब जाएगा। मोजांबिक से तवालू और मिश्र से वियतमान के बीच भी जलवायु परिवर्तन से ऐसे ही हालात निर्मित हो जाने का अंदाजा है।
दुनियाभर में 2050 तक 25 करोड़ लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जलवायु बदलाव के चलते मालद्वीप और प्रशांत महासागर क्षेत्र के कई द्वीपों को समुद्र लील लेगा। इसी आसन्न खतरे से अवगत कराने के लिए ही मालद्वीप ने कॉर्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए समुद्र की तलहटी में एक परिचर्चा आयोजित की थी। समुद्र के भीतर यह आयोजन इस बात का संकेत था कि दुनिया नहीं चेती, तो मालद्वीप जैसे अनेक छोटे द्वीपों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आश्चर्य की बात है, जिस भारतीय समाज में पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों को देवता की उपाधि से विभूषित कर वर्षो तक पूजा की गयी तथा जिन संस्कृत के ग्रन्थों ने हरे पेड़ को काटना पाप कहा, वह भी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। अथर्ववेद का ऋषि पृथिवी पर शुद्ध पेय जल के सर्वदा उपलब्ध रहने की ईश्वर से कामना की गयी है-शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं निदध्मः। पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि।। आवश्यकता है समय रहते संस्कृत के ग्रन्थों से प्रेरणा लेकर हमें अपनी जीवन पद्धति को बदल लेने की। अंत में मध्य देश में बहने वाली सरस्वती पवित्र बनाने वाली, पोषण देने वाली बुद्धिमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी सरस्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनायें ।
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ ऋग्वेद 

संस्कृत शब्दकोश तथा इसके वर्णक्रम


हर घर मेंहर विद्यार्थी के पास एक शब्दकोश अवश्य होना चाहिए। इसके बिना भाषा को समझना असंभव सा हो जाता है। भाषा और शब्दों पर अधिकार ही हमें अपनी बात सही तरह कहने की शक्ति देता है। शब्दकोश एक विशेष प्रकार की पुस्तक होती है। इसके द्वारा हम शब्दों का अर्थ जानते हैं।  कई बार पुस्तक में जो शब्द हम पढ़ते हैं, उनमें से कुछ शब्द का अर्थ हमारी समझ में नहीं आता। उस शब्द का अर्थ  या तो हम किसी दूसरे से पूछते हैं, अथवा किसी शब्दकोश की सहायता लेते हैं। पुस्तक को पढ़ते समय हर अपरिचित शब्द के अर्थ समझना बहुत आवश्यक होता है। तभी पुस्तक पढ़ने का हमें पूरा ज्ञान मिल पाता है। हिन्दी शब्दकोश में शब्दों को अकारादि क्रम से लिखा गया होता हैजैसे - अंकअंकगणितअंकुरअंकुश,अंग,अंगद,अंगारअग्निआगतआगमकक्ष,  कक्षाखगखगोल।
             कई भाषाओं को लिखने के लिए एक ही लिपि का प्रयोग होता है। जिस भाषा की लिपि अलग होगी, उसके कोश  में वर्णों का क्रम अलग होगा । हिन्दी, संस्कृत, मराठी, पालि, कोंकणी, सिन्धी, कश्मीरी, डोगरी आदि भारतीय भाषाएँ  तथा नेपाली भाषा की लिपि देवनागरी है। हिन्दी तथा संस्कृत के शब्दकोश में वर्ण के क्रम में कुछ परिवर्तन देखा जाता है। इसका मूल कारण वर्ण के पंचम अक्षर ङ,ञ,ण है। संस्कृत में ये वर्ण अपने क्रम के अनुसार होते हैं,जबकि हिन्दी में ङ ञ तथा ण को अनुस्वार के रूप में प्रदर्शित कर दिया जाता है। संस्कृत के अङ्क, अङ्ग, उलङ्घ्य को हिन्दी में अंक, अंग तथा उलंघ्य लिखा जाता है। इससे वर्णों के क्रम में परिवर्तन हो जाता है। संस्कृत शब्द कोश में अनुस्वार वाले वर्ण सर्व प्रथम आते हैं यथा- अंशः अंशुः, अंहतिः । यहाँ अनुस्वार अपने बाद वाले वर्ण का पाँचवां अक्षर नहीं बनता। संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार कुछ अनुस्वार वर्ण अपने बाद वाले वर्ण के वर्ग का पांचवां अक्षर बन जाता है। जैसे-  अङ्कः, अङ्कुरः, अङ्कुशः, अङ्गः, अङ्गदम्,अङ्गुलिः में अनुस्वार क और ग का वर्ग कवर्ग का पंचम अक्षर ङ बन गया। वर्ण परिवर्तन का यह रहस्य ध्वनि परिवर्तन से जुड़ा है। हम जैसा उच्चारण करते हैं वैसा ही लिखते भी हैं। हिन्दी शब्दकोश में इस नियम का पालन नहीं किया जाता है। वहाँ वर्ग के पंचम अक्षर को अनुस्वार के रूप में लिखा जाने लगा है। अतः संस्कृत एवं हिन्दी के देवनागरी कोश में वर्णों का क्रम अलग- अलग होता है। अस्तु। 
     संस्कृत में ईसा पूर्व से ही कोश की रचना होने लगी थी। परन्तु आज हम जिस प्रकार का शब्द कोश देखते हैं, वैसा वर्णक्रम वाला कोश प्राचीनकाल में नहीं होता था।  वेदों के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए सर्वप्रथम यास्क ने निघण्टु नाम से एक वैदिक कोश बनाया। इसमें वेद में प्रयुक्त नाम शब्द तथा धातुओं का संग्रह है। 

अमरकोश जैसे शब्दकोश में शब्दों की  वर्तनी, लिंग और पर्यायवाची शब्द दिये हैं, जबकि वर्णक्रम वाले वामन शिवराम आप्टे एवं अन्य भारतीय विद्वानों के आधुनिक संस्कृत शब्दकोश में शब्दों की व्युत्पत्ति, वर्तनी,लिंग,शब्दार्थ और पर्यायवाची शब्द दिये रहते हैं। यहां हर शब्द के बाद बताया जाता है कि वह शब्द संज्ञा है या सर्वनाम या क्रियाविशेषण आदि। इस जानकारी के बाद उस का अर्थ लिखा जाता है. ‘‘शब्दकल्प द्रुम’’ (1828-58) तथा ‘‘वाचस्पत्यम’’ जैसे  बड़े कोशों में शब्द का अर्थ समझाने के लिए उस की परिभाषा भी होती है। इन जानकारियों के लिए शब्दकोश देखने आना चाहिए। कोशकार कोश देखने और समझने के लिए आवश्यक निर्देंश दिये रहते हैं। आधुनिक संस्कृत कोश में शब्दों के लिंग ज्ञान के लिए अलग से लिंग निर्देश दिया रहता है। किसी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए उसके पर्यायवाची शब्द तथा व्युत्पत्ति भी दिया जाता है। कई बार उदाहरण के द्वारा भी शब्द के अर्थ को स्पष्ट किया जाता है जैसे-  वर्षा के अनेक शब्द हमें पता हैं। पावस और वृष्टि जैसे शब्द शायद हमें नए लगें। इन का अर्थ भी वर्षा है। यह कोश ही बताता है।
            हर भाषा में एक ही शब्द के कई अर्थ होते हैं, तब भी संकट हो जाता है। संस्कृत का एक  शब्द अंक ही लीजिए. इस के क्या-क्या अर्थ हो सकते हैं, यह हमें शब्दकोश से ही पता चलता है. जैसे- संख्या, क्रोड, चिह्न, नाटक का एक भाग।
            शब्दकोश कई तरह के होते हैं। संस्कृत से संस्कृत शब्दकोश, संस्कृत से हिन्दी शब्दकोश, हिन्दी से संस्कृत शब्दकोश। इस प्रकार के कोश को द्वैभाषिक कोश कहा जाता है। विद्यार्थियों के लिए कोशों में शब्दों की संख्या सीमित होती ही है। किसी में दो हजार तो किसी में दस हजार। इनमें आयु और उनकी आवश्कता के अनुसार जो जानकारी दी जाती है, वह उतनी ही दी जाती है जितनी से उनका काम चल जाए। छात्रों के लिए बनाया गया शब्दकोश में व्याख्याएँ या परिभाषाएँ बहुत आसान शब्दों में लिखी जाती हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, वैसे वैसे शब्दकोशों का स्तर भी ऊँचा होता जाता है। शब्दकोश अलग-अलग विषयों के लिए भी बनाए जाते हैं। विज्ञान के छात्रों के कोशों में वैज्ञानिक शब्दावली का संकलन होता है। संस्कृत भाषा में भी अनेक विषय हैं। प्रत्येक विषय के अलग - अलग पारिभाषिक कोश होते हैं।
            विद्यार्थियों का भाषा ज्ञान बढ़ाने के लिए विद्यालयों में पर्याय शब्द सिखाए जाते हैं, ताकि वे अपनी बात कहने के लिए सही शब्द काम में ला सकें। उनकी सहायता के लिए पर्याय कोश बनाए जाते हैं।
यहाँ सामान्य शब्दकोश और पर्याय कोश का अंतर समझाना जरूरी है। शब्दकोश को हम शब्दार्थ कोश कह सकते हैं। उनमें किसी शब्द का अर्थ बताने लिए एक दो शब्द ही लिखे जाते हैं. जैसे-- जल के लिए- अम्ब, अम्बु, तोय, नीर, पय,  वारि, सलिल। संस्कृत का अमरकोष, हलायुध कोश आदि पर्याय कोश हैं।
            पर्याय कोश से भी आगे थिसारस होते हैं।  थिसारस में पर्यायवाची तो होते ही हैं, उनसे संबद्ध और उनके विपरीत शब्द भी दिए जाते हैं। जैसे सुंदर का विपरीत कुरूप, अदर्शनीय, अप्रियदर्शन, असुन्दर, कुदर्शन आदि।
            हमारे पास अब चित्रित शब्दकोश हैं। हमलोग चित्र देखकर वस्तु को पहचान लेते हैं। कक्षा में हमें विपरीतार्थवाची भी पढ़ाया जाता है।
            आज कम्प्यूटर और इंटरनेट का युग है। अब अनेक विद्यार्थियों के पास मोबाईल हो गया है। वे इंटरनेट पर भी सक्रिय रहकर तरह-तरह की जानकारी बटोरते हैं। यहाँ बहुत सारे कोश और थिसारस भी मिलने लगे हैं। शब्दकल्पद्रुम तथा वाचस्पत्यम् जैसे विशालकाय कोश के लिए ऐप बनाया जा चुका है। यह गूगल प्ले स्टोर पर निःशुल्क उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त हिन्दी से संस्कृत तथा संस्कृत से हिन्दी शब्दकोश के ऐप भी बन चुके हैं। अब ऑनलाइन बहुभाषी कोश की मदद से संस्कृत शब्दों का अर्थ जानना अधिक आसान हो गया है। यहाँ खोजे जा रहे किसी शब्द का किस किस कोश में क्या अर्थ लिखा है, यह जानना भी सुलभ हो गया है। ऑनलाइन संस्कृत कोश में फॉन्ट परावर्तक की सुविधा दी गयी होती है। यहाँ विकल्प भी उपलब्ध होता है कि आप यूनीकोड देवनागरी के द्वारा किसी शब्द को ढ़ूंढ़ना चाहते हैं अथवा IAST (Diacritics) SLP1,   HARVARD – KAYOTO ,HK (ASCII)
द्वारा लिप्यन्तरण की सुविधा चाहते हैं।  
          मुद्रित संस्कृत शब्दकोश में इच्छित शब्द ढूढने की विधि अत्यन्त सरल है। इसके लिए देवनागरी लिपि का वर्णक्रम याद रहना चाहिए। इसमें पहले स्वर वर्ण है पश्चात् व्यंजन वर्ण। अयोगवाह को अर्ध स्वर मानकर मूल स्वर के बाद इस अक्षर को रखा जाता है। जैसे-
स्वर- अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ औ
अयोगवाह अं अः
व्यंजन कवर्ग से पवर्ग तक
अंतस्थ और उष्म (य----------ह)
शब्दकोश के वर्ण-क्रम
स्वरवर्ण-
स्वरयुक्त व्यंजनवर्ण यथा-
कः कं क का कि की कु कू  के कै को कौ क् (संयुक्ताक्षर)
इस वर्णक्रम में वैज्ञानिकता और तार्किकता है।  जैसा कि ऊपर में वर्णों का क्रम बताया गया है। मोटे तौर पर पहले स्वर वर्ण, पश्चात् अयोगवाह, उसके बाद व्यंजन वर्ण आते हैं। शब्दकोश में अ अक्षर के बाद अं अक्षर से वर्ण का आरम्भ होता है, क्योंकि स्वर अ के बाद अयोगबाह अनुस्वार वर्ण आएगा। आदि के स्वर वर्ण वाले अक्षरों के बाद आदि व्यंजन वाले वर्ण शुरु होते हैं। 

बुधवार, 12 जून 2019

राग का ऋतु वसन्त


भारतीय वर्ष का अंत और आरंभ दोनों वसन्त से होता है। इसे मधुऋतु,, मधूलिका, ऋतुओं की रानी, ऋतुराज, आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। इस ऋतु में मिठास तो है ही मधु का उत्पादन भी प्रभूत मात्रा में होता है,जिसे पीकर ऋषिगण इसकी प्रशंसा में अनेक गीत गाते रहे। संस्कृत में यह पुल्लिंग है तो हिन्दी में स्त्री।
 

 वसन्त को ऋतुराज अर्थात् सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। माघ माह की शुक्ल पंचमी से वसन्त ऋतु आरंभ होती है। अतः उसी दिन को ’वसंत पंचमीअथवा श्री पंचमीके रूप में सम्पूर्ण भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। ग्रीष्म विराग का और वसन्त राग का ऋतु है। सज-धज का निकल पड़ता है।  
            इस ऋतु में प्रकृति सोलह कलाओं से खिल उठती है। जैसे युवावस्था मानव जीवन का बंसत है उसी प्रकार इस सृष्टि की युवावस्था बसंत ऋतु है। इस मौसम में प्रकृति में ऐसा जादू उजागर होता है। मानो प्रकृति देवी ने स्वयं आकर पूरी धरती का अपने हाथों से श्रृगांर किया हो। श्रावण की हरियाली हेमंत व शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है तब बसंत ऋतु में धरती नववधू की भाँति श्रृंगार करके खिल उठती है। मानो पूरी धरती ने पीली चादर ओढ़ रखी हो। किसान भी हर तरफ फैला सरसों रूपी पीला सोना देखकर प्रफुल्लित होते हैं। महर्षि वाल्मीकिने रामायण में बसंत का वर्णन किया है, तो भगवान श्री कृष्ण ने गीतामें ऋतूनाम् कुसुमाकरःकहकर ऋतुराज बसंत को अपनी विभूति कहा है।
इस दिन सरस्वती देवी का पूजन किया जाता है तथा इसे ज्ञान के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवती सरस्वती का अविर्भाव हुआ था ऐसा पुराणों में उल्लेख मिलता है। वे ही वि़द्या, बुद्वि और ज्ञान की देवी है। ऋग्वेद के 10/125 सूक्त में इनके असीम प्रभाव का वर्णन है- प्रणो देवी सरस्वती वार्जेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
प्राच्य विद्या के ग्रन्थों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि सोम, अग्निष्टोम आदि अनेक प्रकार के याग का आरम्भ वसन्त ऋतु से ही होता था। शतपथब्राह्मणम् के काण्डम् 2 अध्यायः 1 ब्राह्मण 3 के मंत्र 1 में 6 ऋतुओं के नामोल्लेख में वसन्त का नाम सर्वप्रथम आया आया है।
वसन्तो ग्रीष्मो वर्षाः । ते देवा ऋतवः शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पितरो य एवापूर्यतेऽर्धमासः स देवा योऽपक्षीयते स पितरोऽहरेव देवा रात्रिः पितरः पुनरह्नः पूर्वाह्णो देवा अपराह्णः पितरः ।
यहाँ पर वसन्त की महिमा गायी गयी है। वसन्त को ब्रह्म कहा गया है। वसन्त का जो सेवन करता है वह ब्रह्मवर्चस् होता है। ब्रह्मैव वसन्तः । क्षत्रं ग्रीष्मो विडेव वर्षास्तस्माद्ब्राह्मणो वसन्त आदधीत ब्रह्म हि वसन्तस्तस्मात्क्षत्रियो ग्रीष्म आदधीत क्षत्रं हि ग्रीष्मस्तस्माद्वैश्यो वर्षास्वादधीत विड्ढि वर्षाः - 2.1.5.5
स यः कामयेत । ब्रह्मवर्चसी स्यामिति वसन्ते स आदधीत ब्रह्म वै वसन्तो ब्रह्मवर्चसी हैव भवति - 2.1.3.[6]
वैखानसगृह्यसूत्रम् के तृतीय खण्ड में ब्रह्मवर्चस् , आयुष्य तथा धन धान्य की कामना रखने वाले ब्राह्मण को वसन्त ऋतु में उपनयन संस्कार करने को कहा गया गया है।
अथ गर्भाधानादिवर्षे पञ्चमे ब्रह्मर्चसकामम् आयुष्काममष्टमे नवमे वा श्रीकामं वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत ॥ 1 ॥ ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करने की प्रक्रिया उपनयन संस्कार से आरम्भ होती है। अतः इसी ऋतु में उपनयन संस्कार पूर्वक वेदारम्भ किया जाता है। विना उपनयन संस्कार किये वेदाध्ययन की अनुमति नहीं है।
प्राचीन काल से ही सरस्वती की कृपा पाने के लिए विद्यारम्भ संस्कार इस दिन करवाने की मान्यता है। वेद में कहा गया है- वसन्ते ब्राह्मणमुपनीयात्। ऋग्वेद में सरस्वती की वन्दना की गयी है और उन्हें विद्या की देवी के रूप में माना गया है।
            सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
            विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्विर्भवतु मे सदा।।
            इस दिन को सरस्वती के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है अतः इसे वागीश्वरी जयंती व श्री पंचमी भी कहा जाता है। श्री सौदन्दर्य है और ऐश्वर्य भी।
             वासंती अथवा पीले रंग का इस दिन विशेष महत्व है। यह रंग परिपक्वता का प्रतीक है। स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती है। घरों में पीला भोजन बनाया जाता है। हल्दी का तिलक लगाया जाता है। इसे सुहाग का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन कामदेव की भी पूजा होती है। इस माह को मधुमास भी कहा जाता है। शुक्र के प्रभाव के कारण यह अवधि कामोद्दीपक होती है। कालिदास ने ऋतुसंहार 6/2 में कहा है-  सर्वं प्रिये चारूतरं वसन्ते । कई नाटकों में मदनोत्सव के प्रमाण भी मिलते है जैसे रत्नावलीआदि।
             इसके अतिरिक्त इस दिन से ही होलिका के लिए लकड़ियाँ एकत्रित करनी आरंभ हो जाती है तथा धमार आदि होली के गीत गाना आरम्भ हो जाता है। इन गीतों से हंसी-खुशी ,मस्ती, उल्लास, उमंग के साथ किसानों के जीवन में नयापन आ जाता है। कई स्थानों में पतंगबाजी-प्रतिस्पर्धा का आयोजन होता है और  घरों में भी पतंगे उड़ाई जाती है।
            मथुरा, वृदावन में राधा कृष्ण वसंतोत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिरों में बसंती भोग लगाए जाते हैं तथा बसंत के राग गाये जाते है।
            देवताओं का दिन अर्थात् सूर्य के उत्तरायण का काल भी आज से ही आरंभ होता है। इस पर्व का काल स्वंय इतना शुभ है अतः इसका आध्यात्मिक, धार्मिक तथा वैदिक दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है।
            परंतु यदि वसंत हमारे भीतर के राग का रूपक है तो उसे पृथ्वी पर सुरक्षित रखना भी हमारा कर्तव्य है। आधुनिकता, औद्योगिकता, कृत्रिमता के इस युग में वसंत ऋतु के उसी सौन्दर्य को समझना होगा जो जीवन-दृष्टि पुरातन ऋषियों द्वारा हमें प्रदान की गई थी।