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वैदिक साहित्य का विशिष्ट अध्ययन (यूजीसी नेट 2019 के अनुसार)

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विश्वविद्यालय अनुदान आयोग,नई दिल्ली के द्वारा आयोजित नेट एवं जेआरएफ परीक्षा जून 2019 का नया पाठ्यक्रम जारी हुआ है। यह परीक्षा कम्प्यूटर के माध्यम से संपन्न कराई जायेगी। अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए नया पाठ्यक्रम एवं सम्बन्धित पाठ्यसामग्री यहाँ दिया गया है। यहाँ  पेपर 1 तथा पेपर 2 का pdf उपलब्ध है।
NET/JRF परीक्षा में सम्मिलित होने वाले संस्कृत विषय कोड नं. 25 के परीक्षार्थी  लिंक पर क्लिक कर नये पाठ्यक्रम को प्राप्त करें।

सूर्य सूक्त              ऋग्वेदः - मण्डल 1 सूक्तं 115

इस ऋग्वेदीय ' सूर्य सूक्त ' ( 1 / 115 ) के ऋषि ' कुत्स आङ्गिरस ' हैं, देवता सूर्य हैं और छन्द त्रिष्टुप् है । इस सूक्त के देवता सूर्य संपूर्ण विश्वके प्रकाशक ज्योतिर्मय नेत्र हैं, जगत् की आत्मा हैं और प्राणि मात्र को सत्कर्मों में प्रेरित करने वाले देव हैं, देवमण्डलमें इनका अन्यतम एवं विशिष्ट स्थान इसलिये भी है, क्योंकि ये जीव मात्र के लिये प्रत्यक्ष गोचर हैं । ये सभी के लिये आरोग्य प्रदान करनेवाले एवं सर्वविध कल्याण करनेवाले हैं, अतः समस्त प्राणिधारियों के लिये स्तवनीत हैं, वन्दनीय हैं ।     
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः ।
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष ँ् सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्र्च ॥ 1 ॥
प्रकाशमान रश्मियोंका समूह अथवा राशि-राशि देवगण सूर्यमण्डलके रुपमें उदित हो रहे हैं । ये मित्र, वरुण, अग्नि और संपूर्ण विश्वके प्रकाशक ज्योतिर्मय नेत्र हैं । इन्होंने उदित होकर द्युलोक, पृथ्वी और अन्तरिक्षको अपने देदीप्यमान तेजसे सर्वतः परिपूर्ण कर दिया है । इस मण्डलमें जो सूर्य हैं, वे अन्तर्यामी होनेके कारण सबके प्रेरक परमात्मा हैं  तथा जङ्गम एवं स्थावर सृष्टिकी आत्मा हैं ।
सूर्यो देवीमुषसं रोचमानां मर्त्यो न योषामभ्येति पश्र्चात् ।
यत्रा नरो देवयन्तो युगानि वितन्वते प्रति भद्राय भद्रम् ॥ 2 ॥
सूर्य गुणमयी एवं प्रकाशमान उषा देवीके पीछे पीछे चलते है, जैसे कोई मनुष्य सर्वाङ्ग सुन्दरी युवती का अनुगमन करे । जब सुन्दरी उषा प्रकट होती है, तब प्रकाशके देवता सूर्यकी आराधना करनेके लिये कर्मनिष्ठ मनुष्य अपने कर्तव्य कर्मका सम्पादन करते हैं । सूर्य कल्याणरुप हैं और उनकी आराधनासे कर्तव्य कर्मके पालनसे कल्याणकी प्राप्ति होती हैं ।
भद्रा अश्वा हरितः सूर्यस्य चित्रा एतग्वा अनुमाद्यासः ।
नमस्यन्तो दिव आ पृष्ठमस्थुः परि द्यावापृथिवी यन्ति सद्यः ॥ 3 ॥
३) सूर्यका यह रश्मि मण्डल अश्व के समान उन्हें सर्वत्र पहुँचाने वाला चित्र विचित्र एवं कल्याणरुप है । यह प्रतिदिन तथा अपने पथपर ही चलता है एवं अर्चनीय तथा वन्दनीय है । यह सबको नमनकी प्रेरणा देता है और स्वयं द्युलोकके ऊपर निवास करता है । यह तत्काल द्युलोक और पृथ्वीका परिमन्त्रण कर लेता है ।
तत् सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्या कर्तोर्विततं सं जभार ।
यदेदयुक्त हरितः सधस्थादाद्रात्री वासस्तनुते सिमस्मै ॥ 4 ॥
सर्वान्तर्यामी प्रेरक सूर्यका यह ईश्र्वरत्व और महत्व है कि वे प्रारम्भ किये हुए, किंतु अपरिसमाप्त कृत्यादि कर्मको ज्यों का त्यों छोडकर अस्ताचल जाते समय अपनी किरणोंको इस लोकसे अपने आपमें समेट लेते हैं । साथ ही उसी समय अपने किरणों और घोडोंको एक स्थानसे खींचकर दूसरे स्थानपर नियुक्त कर देते हैं । उसी समय रात्रि अन्धकारके आवरणसे सबको आवृत्त कर देती है ।
तन्मित्रस्य वरुणस्याभिचक्षे सूर्यो रुपं कृणुते द्योरुपस्थे ।
अनन्तमन्यद् रुशदस्य पाजः कृष्णमन्यद्धरितः सं भरन्ति ॥ 5 ॥
प्रेरक सूर्य प्रातःकाल मित्र, वरुण और समग्र सृष्टिको सामनेसे प्रकाशित करनेके लिये प्राचीके आकाशीय क्षितिजमें अपना प्रकाशक रुप प्रकट करते हैं ।
इनकी रसभोजी रश्मियॉं अथवा हरे घोडे बलशाली रात्रिकालीन अन्धकारके निवारणमें समर्थ विलक्षण तेज धारण अन्धकारकी सृष्टि होती है ।
अद्या देवा उदिता सूर्यस्य निरहंसः पिपृता निरवद्यात् ।
तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥ 6 ॥
हे प्रकाशमान सूर्य रश्मियो आज सूर्योदयके समय इधर उधर बिखरकर तुम लोग हमें पापोंसे निकालकर बचा लो । न केवल पापसे ही, प्रत्युत जो कुछ निन्दित है, गर्हणीय है, दुःख दारिद्र्य है, सबसे हमारी रक्षा करो । जो कुछ हमने कहा है; मित्र, वरुण, अदिति, सिन्धु, पृथ्वी और द्युलोकके अधिष्ठातृ देवता उसका आदर करें, अनुमोदन करें, वे भी हमारी रक्षा करें ।

अक्ष सूक्त -                ऋग्वेदः - मण्डल 10 सूक्तं 34

 ऋग्वेद संहिता में जहाँ एक ओर देवताओं की स्तुति करते हुए उनसे अभीष्ट की प्राप्ति केलिए याचनायें की गई हैं, वहीं दूसरी ओर सामाजिक कुरीतियों एवं मानवीय दुर्व्यसनों को दूर करने से सम्बन्धित सूक्तों का संकलन भी किया गया है। समाज में जब भोग विलास और षक्ति का उदय होता है, तब द्यूतकर्म भी अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाता है। ऋग्वैदिक युग में जुआ खेलना एक बहुत प्रचलित सामाजिक दुर्व्यसन था। ऋग्वेद के दषम मण्डल का 34वाँ सूक्त इस सम्बन्ध में पर्याप्त प्रकाश डालता है।
अक्षों की संख्या एवं खेलने का स्थान-ऋग्वेद में अक्षों की संख्या के लिये त्रियचांषःशब्द प्रयुक्त है।
विद्वानों ने इस शब्द के अनेक अर्थ किये है। जैसे पन्द्रह, तिरपन एवं एक सौ पच्चीस। परवर्ती संहिताओं एवं ब्राह्मण ग्रन्थों में पांसा फेंकने से सम्बन्धित व्याह्तियों की तालिकायें प्राप्त हेाती है। पांसा फेकने के लिए भूमि पर ही एक नीचा सा स्थान बना लिया जाता था। दाँव पर रखी हुई वस्तु विजकहलाती थी। अक्षों का स्वरूप एवं प्रभाव-अक्षों को द्यूतकार देवता मानता है। उसके हृदय में अक्षों केप्रति श्रद्धा है जो शिल्पकार को अपने उपकरणों में, लेखक को अपनी लेखनी में तथा वणिक् को अपनी तुला में होती है। अक्ष किसी वृक्ष के फलों के बीज रूपी विग्रह वाले होते है। इनका रंग भूरा होता है। अक्षों को किसी पात्र-विशेष में डालकर भली-भांति हिलाकर द्यूतपटल पर फेंका जाता है। द्यूतपटल पर फुदकते हुए वे अक्ष बड़े ही मनोहारी दिखलाई पड़ते है। अक्षों को दिव्य अंगारस्वरूप एवं महाषक्तिषाली कहा गया है। अक्ष द्यूतकार को उसी प्रकार आनन्दित करते हैं जैसे सोमरस देवताओं को। अक्ष द्यूतकार को जगाने का कार्य भी करते हैं। द्यूतकार चिन्ता के वषीभूत होकर रात भर जागता रहता है। अक्षों के अन्दर एक प्रकार की मोहिनी शक्ति होती है। द्यूतकार इसी मोहिनी शक्ति के वष में रहता है। द्यूतकार अनेक बार द्यूतकार्य से विमुख होने का निष्चय करके भी ज्यों ही द्यूतपटल पर पासों को फुदकते हुए देखता है तो ही अपने आपको भूल जाता है। अक्षगण कभी भी उग्र से व्यक्ति के समक्ष भी पराजय को नहीं स्वीकारते। अक्षों की ध्वनि को द्यूतपटल पर सुनकर जुआरी उसी प्रकार द्यूतस्थल की और दौड़ पड़ता है जेसे कुलटा स्त्री संकेत-स्थल की ओर दौड़ पड़ती है। अक्षों की विलक्षणता-द्यूतपटल पर पड़े हुए भी अक्ष द्यूतकार के मर्मस्थल को भेदने वाले होते हैं। स्वयं हस्तविहीन होकर भी सहस्त्र को पराभूत करते रहते हैं। षीतल स्पर्ष वाले होकर भी द्यूतकार के हृदय को जलाते रहते हैं। स्वरूप और काष्ठवत् होते हुए भी अक्ष किसी द्यूतकार को क्षणमात्र के लिए बसा देते हैं तथा किसी को उजाड़ देते हैं। विजेता द्यूतकार के लिए वे प्रसन्नतादायक तथा पराजित के लिए दुःखप्रद भी होते हैं।
द्यूतक्रीड़ा का कुपरिणाम-द्यूतकार को समाज निकृष्ट कोटि का व्यक्ति समझने लगता है। द्यूतकार की पत्नी, सास तथा अन्य शुभाकाँक्षी व्यक्ति उससे द्वेष करते है। द्यूतकार के प्रति कोई भी व्यक्ति दया-भाव नहीं दिखलाता। द्यूतकार एक बूढे़ किन्तु मूल्यवान् अश्व की भाँति किसी के लिए प्रिय नहीं रह पाता। द्यूतकार अनुकूल आचरण वाली अपनी पतिपरायणा पत्नी तक को दाँव पर हार जाता है। दूसरों की पत्नियों को देखकर तथा सुसंस्कृत अन्य गृहों को देखकर वह मानसिक क्लेश पाता है। द्यूतकार्य का सबसे कठिन दुष्परिणाम तो यह होता है कि उसकी प्राणप्रिया पत्नी को दूसरे लोग आलिंगित करते है। जब दाँव हार कर द्यूतकार विजेता द्यूतकार को दाँव पर रक्खी हुई सम्पत्ति नहीं चुका पाता तो राजा के कर्मचारी उसे रज्जुबद्ध करके ले जाते है। उस समय उसके मित्र, पिता, माता, भाई उसको देखना पसन्द नहीं करते तथा यह भी कह डालते हैं कि हम लोग बंधे हुए उसको नहीं जानते। अमर संदेश-अक्षसूक्त के अधिकांश भाग में द्यूतकार्य के दुष्परिणामों को बतलाकर वैदिक ऋषि एक अमर
सन्देश प्रदान करता है, कि अक्षों से कभी भी मत खेलो, खेती करो। कृषि द्वारा प्राप्त धन को ही आदर-भाव से अपना समझो तथा उसमें ही आनन्द का अनुभव करो। कृषि कार्य में ही गायें हैं, पालतू पशु तथा सम्पूर्ण समृद्धि है। हे अक्षौ! हमसे मित्रता करो। अपनी षक्ति का प्रयोग हम पर मत करो तथा सदैव हमारी सहायता करो।

प्रावेपा मा बृहतो मादयन्ति प्रवातेजा इरिणे वर्वृतानाः ।
सोमस्येव मौजवतस्य भक्षो विभीदको जागृविर्मह्यमच्छान् ॥1॥
न मा मिमेथ न जिहीळ एषा शिवा सखिभ्य उत मह्यमासीत् ।
अक्षस्याहमेकपरस्य हेतोरनुव्रतामप जायामरोधम् ॥2॥
द्वेष्टि श्वश्रूरप जाया रुणद्धि न नाथितो विन्दते मर्डितारम् ।
अश्वस्येव जरतो वस्न्यस्य नाहं विन्दामि कितवस्य भोगम् ॥3॥
अन्ये जायां परि मृशन्त्यस्य यस्यागृधद्वेदने वाज्यक्षः ।
पिता माता भ्रातर एनमाहुर्न जानीमो नयता बद्धमेतम् ॥4॥
यदादीध्ये न दविषाण्येभिः परायद्भ्योऽव हीये सखिभ्यः ।
न्युप्ताश्च बभ्रवो वाचमक्रतँ एमीदेषां निष्कृतं जारिणीव ॥5॥
सभामेति कितवः पृच्छमानो जेष्यामीति तन्वा शूशुजानः ।
अक्षासो अस्य वि तिरन्ति कामं प्रतिदीव्ने दधत आ कृतानि ॥6॥
अक्षास इदङ्कुशिनो नितोदिनो निकृत्वानस्तपनास्तापयिष्णवः ।
कुमारदेष्णा जयतः पुनर्हणो मध्वा सम्पृक्ताः कितवस्य बर्हणा ॥7॥
त्रिपञ्चाशः क्रीळति व्रात एषां देव इव सविता सत्यधर्मा ।
उग्रस्य चिन्मन्यवे ना नमन्ते राजा चिदेभ्यो नम इत्कृणोति ॥8॥
नीचा वर्तन्त उपरि स्फुरन्त्यहस्तासो हस्तवन्तं सहन्ते ।
दिव्या अङ्गारा इरिणे न्युप्ताः शीताः सन्तो हृदयं निर्दहन्ति ॥9॥
जाया तप्यते कितवस्य हीना माता पुत्रस्य चरतः क्व स्वित् ।
ऋणावा बिभ्यद्धनमिच्छमानोऽन्येषामस्तमुप नक्तमेति ॥10॥
स्त्रियं दृष्ट्वाय कितवं ततापान्येषां जायां सुकृतं च योनिम् ।
पूर्वाह्णे अश्वान्युयुजे हि बभ्रून्सो अग्नेरन्ते वृषलः पपाद ॥11॥
यो वः सेनानीर्महतो गणस्य राजा व्रातस्य प्रथमो बभूव ।
तस्मै कृणोमि न धना रुणध्मि दशाहं प्राचीस्तदृतं वदामि ॥12॥
अक्षैर्मा दीव्यः कृषिमित्कृषस्व वित्ते रमस्व बहु मन्यमानः ।
तत्र गावः कितव तत्र जाया तन्मे वि चष्टे सवितायमर्यः ॥13॥
मित्रं कृणुध्वं खलु मृळता नो मा नो घोरेण चरताभि धृष्णु ।
नि वो नु मन्युर्विशतामरातिरन्यो बभ्रूणां प्रसितौ न्वस्तु ॥14॥

ज्ञानसूक्त- (10/71)

ऋषि:  - बृहस्पतिः, अंगिरा
देवता  - ज्ञानम्
छन्द - त्रिष्टुप्, जगती
स्वर  - धैवत
ज्ञानसूक्त सूक्त, ब्रह्मज्ञान सूक्त अथवा भाषा सूक्त के नाम से प्रसिद्ध है। इस सूक्त के ऋषि आंगिरा के पुत्र बृहस्पति  और देवता ज्ञान हैं। इस सूक्त में कुल 11 मंत्र हैं, जिनमें से नवम मन्त्र को छोड़कर शेष दस मन्त्र त्रिष्टुप् छन्द में हैं, नवम मन्त्र का छन्द जगती है। सायण के अनुसार इस सूक्त में ऋषि ने परम पुरूषार्थ साधन पर ब्रह्मज्ञान की स्तुति की है। बृहद्देवता में कहा भी गया है- सुज्योतिः परमं ब्रह्म यद्योगात्समुपाश्नुते। तज्ज्ञानमभितुष्टाव सूक्तेनाथ बृहस्पतिः' (बृहद्देवता ७.१०९) इति ।
इस सूक्त का प्रतिपाद्य विषय है- वागार्थ  प्रतिपत्ति या शब्दार्थ  ज्ञान।
शब्दार्थ  ज्ञान के दो आधार हैं- 1. शब्द प्रयोग , 2. अर्थ ग्रहण। यह सूक्त दोनों आधारों का स्पर्श करता है। प्रस्तुत सूक्त में ग्यारह मन्त्रों  में आठ वार प्रयुक्त वाकशब्द उस वाणी की ओर संकेत करता है, जिसमें सत्यज्ञान स्वरूप बिन्दुओं के साथ ही शिव एव ं सुन्दर की अधीश्वरी मुद्रा लध्मी का निवास है। बृहस्पति को  वाणी का स्वामी माना गया है। शतपथ-ब्राह्मण में कहा गया है कि- वाक् ही बृहती है। उसके स्वामी हो ने के कारण ही वह बृहस्पति हैं। ऋषि पविष्टा वाक्  देवी हैं और  उसी के अधिपति बृहस्पति हैं। ब्रह्म को  ही बृहस्पति कहा गया है और वाक्  को  ही ब्रह्मरूप भी कहा गया है।
बृह् धातु से निष्पन्न ब्रह्म और  वृहतीशब्द है, जिसका शब्दार्थ  है- विस्तार पाना, फैलना। अतः बृहस्पतिउस बृहद् दृष्टि के स्वामी हैं, जिससे भेद -भाव लुप्त हो  जाता है। व्यष्टिभाव का समष्टि भाव के साथ तादाम्य हृदय की सहज अनुभूति एवं एकता विधायक भावना की स्थिति ही वृहद्स्थिति है और  ऋषि के वृहदृ अनुभव रूप अर्थ एवं तद्ग्राहक शब्द के पति हैं- बृहस्पति। ऋग्वेद संहिता के षष्ठ मण्डल में एक स्थान पर कहा गया है कि- दिव्य आंगिरस् बृहस्पति अज्ञान के पहाड़ को  तोड़कर अर्थ सम्पत्ति को  जीतते  हैं और  प्रवाहित कर देते हैं, उस वाणी की गतियों को ।

बृह॑स्पते प्रथ॒मं वा॒चो अग्रं॒ यत्प्रैर॑त नाम॒धेयं॒ दधा॑नाः ।
यदे॑षां॒ श्रेष्ठं॒ यद॑रि॒प्रमासी॑त्प्रे॒णा तदे॑षां॒ निहि॑तं॒ गुहा॒विः ॥ 1 ॥ ।। ऋग्वेद 10/71/1
बृह॑स्पते । प्र॒थ॒मम् । वा॒चः । अग्र॑म् । यत् । प्र । ऐर॑त । ना॒म॒ऽधेय॑म् । दधा॑नाः । यत् । ए॒षा॒म् । श्रेष्ठ॑म् । यत् । अ॒रि॒प्रम् । आसी॑त् । प्रे॒णा । तत् । ए॒षा॒म् । निऽहि॑तम् । गुहा॑ । आ॒विः ॥
(बृहस्पते) वेदवाचः स्वामिन् ! परमात्मन् ! (वाचः-अग्रं प्रथमं नामधेयं यत्-दधानाः-ऐरत) वाण्याः-श्रेष्ठरूपं प्रथमं सृष्टेरारम्भे पदार्थजातस्य नामव्यवहारप्रदर्शकं वेदं धारयन्तः परमर्षयः प्रेरयन्ति प्रज्ञापयन्ति (यत्) यतः (एषाम्) परमर्षीणां (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठं कार्यं (अरिप्रम्-आसीत्) पापरहितं निष्पापम् रपो रिप्रमिति पापनामनी भवतः” [निरु० ४।२१] आसीत् (प्रेणा-एषां गुहा-निहितम्) तव-प्रेरणया, एषां परमर्षीणां गुहायां हृदये स्थितं (आविः) तदाविर्भवति प्रकटीभवति ॥१॥
शब्दार्थ -
(बृहस्पते) हे वेदवाणी के स्वामी परमात्मन् ! (वाचः-अग्रं प्रथमम्) वाणी के श्रेष्ठरूप सृष्टि के प्रारम्भ में होनेवाले (नामधेयं यत्-दधानाः प्रैरत) पदार्थमात्र के नामव्यवहार के प्रदर्शक वेद को धारण करते हुए परमर्षि प्रेरित करते हैं, जनाते हैं (यत्) यतः (एषाम्) इन परम ऋषियों का (श्रेष्ठम्) श्रेष्ठ कार्य (अरिप्रम्-आसीत्) पापरहित-निष्पाप है (प्रेणा-एषां गुहा निहितम्) तेरी प्रेरणा से इन परमर्षियों के हृदय में प्रकट होता है ॥१॥
भावार्थ -वेद का स्वामी परमात्मा सृष्टि के आरम्भ में आदि ऋषियों के पवित्र अन्तःकरण में वेद का प्रकाश करता है, जो पदार्थमात्र के गुण स्वरूप को बताता है, उसे वे ऋषि दूसरों को जनाते हैं ॥१॥
इस सूक्त में वेदों का प्रकाश तथा प्रचार करना, उसके अर्थज्ञान से लौकिक इष्टसिद्धि, अध्यात्म सुखलाभ, सब ज्ञानों से महत्ता, आदि विषय हैं।
सक्तु॑मिव॒ तित॑उना पु॒नन्तो॒ यत्र॒ धीरा॒ मन॑सा॒ वाच॒मक्र॑त ।
अत्रा॒ सखा॑यः स॒ख्यानि॑ जानते भ॒द्रैषां॑ ल॒क्ष्मीर्नि॑हि॒ताधि॑ वा॒चि ॥2।।
सक्तु॑म्ऽइव । तित॑उना । पु॒नन्तः॑ । यत्र॑ । धीराः॑ । मन॑सा । वाच॑म् । अक्र॑त । अत्र॑ । सखा॑यः । स॒ख्यानि॑ । जानते । भ॒द्रा । ए॒षा॒म् । ल॒क्ष्मीः । निऽहि॑ता । अधि॑ । वा॒चि ॥
धीर पुरुष वाणी को चलनी में छने हुए सत्तू के समान  उनकी वाणी में उनका सख्य भाव ज्ञात होता है । उनकी वाणी में लक्ष्मी (पवित्र गुण) प्रतिष्ठित होती है।
जैसे विद्वान् चलनी से सत्तू को  स्वच्छ कर लेते हैं, वैसे ही बुद्धिमान श्रेष्ठ पुरूष मन: पवित्र कर शब्द को उच्चारित करते हैं।  उनकी वाणी में कल्याण कारक मंगलमयी लक्ष्मी निवास करती है।
भावार्थ- मन के द्वारा शब्दचयन की प्रक्रिया चलती है, वह प्रज्ञान संज्ञक मन तो अपने में सब कुछ समेट लेता है। प्रतीक एवं बिम्ब की सृष्टि के मूल में मन का ही अनिर्वचनीय ब्यापार है, जिससे छनकर आनन्द एवं सौन्दर्य एक साथ रूपायित हो  उठते हैं। ज्ञान का तारतम्य ही सौन्दर्यबोध का तारतम्य है। मानसी कल्पना के सौन्दर्यबोध एवं आनन्द परिकल्पना के देव प्रयोग  की सम्भावना हुई है- मुद्रा लक्ष्मी में। दूसरे शब्दों में  शब्द एवं अर्थ के सख्य’ (सहभाव) अथवा अनन्य सम्बन्ध की पहचान ही वास्तविक ज्ञान’ (सम्यक ज्ञान) है।
य॒ज्ञेन॑ वा॒चः प॑द॒वीय॑माय॒न् तामन्व॑विन्द॒न्नृषि॑षु॒ प्रवि॑ष्टाम् ।
तामा॒भृत्या॒ व्य॑दधुः पुरु॒त्रा तां स॒प्त रे॒भा अ॒भि सं न॑वन्ते ॥ 3 ॥
य॒ज्ञेन॑ । वा॒चः । प॒द॒ऽवीय॑म् । आ॒य॒न् । ताम् । अनु॑ । अ॒वि॒न्द॒न् । ऋषि॑षु । प्रऽवि॑ष्टाम् ।
ताम् । आ॒ऽभृत्य॑ । वि । अ॒द॒धुः॒ । पु॒रु॒ऽत्रा । ताम् । स॒प्त । रे॒भाः । अ॒भि । सम् । न॒व॒न्ते॒ ॥
बुद्धिमानों  ने यज्ञ द्वारा वाणी के मार्ग को  प्राप्त किया, उन्होंने ऋषियों  के अन्तःकरण में स्थित वाणी को  पाया तदनन्तर उस वाणी को सभी देशों में  अभिव्यक्त किया। सात शब्द करने वाले पक्षी, अर्थात् गायत्री आदि छन्द एक साथ चोरों तरफ से उसकी स्तुति करते हैं।
भावार्थ- यज्ञ वैदिक दर्शन का महत्वपूर्ण मूलभूत विचारबिम्ब है, जो सर्वविध सर्जना की अपरिहार्य पूर्व स्थित हैं। इसी वाणी के योग से गायत्री आदि सात छन्द स्तुति करने में समर्थ हुए।
इसमें तीन तत्व छिपे हुए हैं- एक है ज्ञान साधना जो परम् सत्य के दर्शन तक ले जाय, दूसरा है संगति करण और  तीसरा है सीमित ‘‘स्व’’ की बृहद्में समाहिति। इन तीनों की स्थिति से ही सर्जनात्मक संव ेदनशीलता की अनुभूति होती है, जिससे काव्य की धारा प्रवाहित होती है। ऋषि-दृष्टि, सामाजिक-दृष्टि है और  ऋषि कवि की भाव भूमि तक पहुँची हुई वाणी की प्रस्तुति हुई है। ऐसी वाणी उस सुर को  भी बजाती है, जो कान से नहीं सुना जाता अपितु हृदय से ग्रहण किया जाता है। वेद मन्त्र में कहा गया है कि- वह साथ अथवा संसरण शील स्वर कवि दृष्टि केन्द्रित वाणी के साथ-साथ ही प्रवाहित हो ते हैं। भारतीय काव्यतत्व चिन्तन में काव्यरसों के साथ संगीत के विशेष स्वरों के सम्बन्ध को भी बताया है।
उ॒त त्वः॒ पश्य॒न्न द॑दर्श॒ वाच॑मु॒त त्वः॑ शृ॒ण्वन्न शृ॑णोत्येनाम् ।
उ॒तो त्व॑स्मै त॒न्वं१ विस॑स्रे जा॒येव॒ पत्य॑ उश॒ती सु॒वासाः॑ ॥ 4 ॥
उ॒त । त्वः॒ । पश्य॑न् । न । द॒द॒र्श॒ । वाच॑म् । उ॒त । त्वः॒ । शृ॒ण्वन् । न । शृ॒णो॒ति॒ । ए॒ना॒म् । उ॒तो इति॑ । त्व॒स्मै॒ । त॒न्व॑म् । वि । स॒स्रे॒ । जा॒याऽइ॑व । प॒त्ये । उ॒श॒ती॒ । सु॒ऽवासाः॑ ॥
एक वाणी को देखता हुआ भी अज्ञानता के कारण नहीं देखता, एक इस वाणी सुनता हुआ भी अर्थ को  न समझ सकता, वह वाणी किसी के पास अपने ज्ञानरूप को  स्वयं इस प्रकार व्यक्त करती है जैसे सुन्दर वस्त्र वाली पत्नी अपना रमणीय  शरीर अपने पति को  समर्पित करती है।
भावार्थ-  प्रस्तुत मन्त्र में यह तथ्य उपस्थ्ति हो ता है कि एक तो वह है जो वाणी के विषय में नितान्त गूढ़ है और  दूसरा निर्मल अन्तःकरण से युक्त सहृदय है, जो अनायास वाणी के अर्थ एवं सौन्दर्य को  प्राप्त करता है, वाणी स्वयं हीं जिसका वरण कर लेती है। ऐसे सहृदय को  आस्वादक कहा जाता है और वाणी की चारूता को । उसमें स्वाभाविक प्रतिभा होती है।
यह सूक्त 4-11 मन्त्र के साथ सम्बद्ध है, जिस में वाणी के स्वरूप को  पहचानने तथा उसके अर्थ को समझने की बात कही गयी है।
उ॒त त्वं॑ स॒ख्ये स्थि॒रपी॑तमाहु॒र्नैनं॑ हिन्व॒न्त्यपि॒ वाजि॑नेषु ।
अधे॑न्वा चरति मा॒ययै॒ष वाचं॑ शूश्रु॒वाँ अ॑फ॒लाम॑पु॒ष्पाम् ॥ 5 ॥
उ॒त । त्व॒म् । स॒ख्ये । स्थि॒रऽपी॑तम् । आ॒हुः॒ । न । ए॒न॒म् । हि॒न्व॒न्ति॒ । अपि॑ । वाजि॑नेषु । अधे॑न्वा । च॒र॒ति॒ । मा॒यया॑ । ए॒षः । वाच॑म् । शु॒श्रु॒ऽवान् । अ॒फ॒लाम् । अ॒पु॒ष्पाम् ॥
एक को विद्वानों की सभा में अर्थ का पूर्ण ज्ञानी कहते हैं। कोई-कोई वाक्य का अभ्यास करते हैं, ऐसा ब्यक्ति वन्ध्या गौ के समान छलपूर्वक वाणी के सहित विचरता है। अर्थात् वे वास्तविक धेनु नहीं माया मात्र धेनु हैं।
भावार्थ-  यह सह संवेदात्मक ज्ञान में सुप्रतिष्ठित है, जिसकी वाणी के सारभूत अर्थग्रहण की अपेक्षा नहीं की जा सकती और  एक है जो वाणी की माया अनर्थ क वाह्यरूप को  रूप लेकर घूमता है, जिस वाणी को वह सुनता है, उस वाणी में न अर्थ है और  न सौन्दर्य। ।
यस्ति॒त्याज॑ सचि॒विदं॒ सखा॑यं॒ न तस्य॑ वा॒च्यपि॑ भा॒गो अ॑स्ति ।
यदीं॑ शृ॒णॊत्यल॑कं शृणोति न॒हि प्र॒वेद॑ सुकृ॒तस्य॒ पन्था॑म् ॥ 6 ॥
यः । ति॒त्याज॑ । स॒चि॒ऽविद॑म् । सखा॑यम् । न । तस्य॑ । वा॒चि । अपि॑ । भा॒गः । अ॒स्ति॒ । यत् । ई॒म् । शृ॒णोति॑ । अल॑कम् । शृ॒णोति॑ । न॒हि । प्र॒ऽवेद॑ । सु॒ऽकृ॒तस्य॑ । पन्था॑म् ॥
जो विद्वान उपकारी, वेदों के अधिष्ठाता, वेत्ता, परम्-मित्र को  त्याग देता है, उसकी भी वाणी में को ई फल नहीं
है। वह जो कुछ सुनता है, व्यर्थ  ही सुनता है, न ही वह सुकृत् कर्म  को  भी ठीक से जानता है।
भावार्थ-  कवि के संवेगात्मक आवेग को  समझना और  उसमें भाग लेना ही वाणी में भाग लेना है। सह्यदय की आशंसा का अर्थ है कवि की वाणी के अन्तर्निहित भाव की साझेदारी करना, कवि तथा सहृदय के बीच विश्वास की एक मजबूत कड़ी रहती है। यह वाणी में भाग है।
अ॒क्ष॒ण्वन्तः॒ कर्ण॑वन्तः॒ सखा॑यो मनोज॒वेष्वस॑मा बभूवुः ।
आ॒द॒घ्नास॑ उपक॒क्षास॑ उ त्वे ह्र॒दाइ॑व॒ स्नात्वा॑ उ त्वे ददृश्रे ॥ 7 ॥
अ॒क्ष॒ण्ऽवन्तः॑ । कर्ण॑ऽवन्तः । सखा॑यः । म॒नः॒ऽज॒वेषु॑ । अस॑माः । ब॒भू॒वुः॒ ।
आ॒द॒घ्नासः॑ । उ॒प॒ऽक॒क्षासः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्वे । ह्र॒दाःऽइ॑व । स्नात्वाः॑ । ऊँ॒ इति॑ । त्वे॒ । द॒दृ॒श्रे॒ ॥
सहृदय साहित्य साधकों में भी विषमता पायी जाती है, इस तथ्य का संकेत आँखों वाले, कान वाले, समान ज्ञान ग्रहण करने वाले मित्र भी मन से जानने योग्य ज्ञान में एक समान नहीं हो ते, जैसे भूमि पर को ई जलाशय मुख तक गहरायी के जल वाले और  को ई कटि तक जल वाले तड़ाग के समान होते हैं और  को ई स्नान करने योग्य भी हो ते हैं, इसी प्रकार मनुष्यों में भी ज्ञान की दृष्टि से असमानता रहती है।
हृ॒दा त॒ष्टेषु॒ मन॑सो ज॒वेषु॒ यद्ब्रा॑ह्म॒णाः सं॒यज॑न्ते॒ सखा॑यः ।
अत्राह॑ त्वं॒ वि ज॑हुर्वे॒द्याभि॒रोह॑ब्रह्माणो॒ वि च॑रन्त्यु त्वे ॥ ८ ॥
हृ॒दा । त॒ष्टेषु॑ । मन॑सः । ज॒वेषु॑ । यत् । ब्रा॒ह्म॒णाः । स॒म्ऽयज॑न्ते । सखा॑यः ।
अत्र॑ । अह॑ । त्व॒म् । वि । ज॒हुः॒ । र्वे॒द्याभिः॑ । ओह॑ऽब्रह्माणः । वि । च॒र॒न्ति॒ । ऊँ॒ इति॑ । त्वे॒ ॥
अन्तः करण से निर्मित मन की गति में जब समान ज्ञान वाले ब्राह्मण एक साथ चलते हैं। समान ज्ञान वाले इन विद्वानों के समूह में वह एक अज्ञानी को अपने ज्ञान के कारण निश्चित रूप से पीछे छोड़ देते हैं। अपने ज्ञान के कारण शास्त्रीय ज्ञान सके लक्षणों से ब्राह्मण समझे जाने वाले कुछ ज्ञानी अपनी इच्छा  के अनुकूल ज्ञान में विचरण करते हैं

 भावार्थ-  हृदय के द्वारा जिसका तक्षण किया गया हो और मन की गति का जिसमें विनिवेश किया गया हो ऐसे वैदिक मंत्र के आचरण से विद्यार्थी परस्पर मित्र हैं तथा एक साथ ही भोजन भी करते हैं, परंतु जब ज्ञान की बात आती है तो उनमें से एक अन्य को अपने ज्ञान से पीछे छोड़ देते हैं। ऐसा वेद जानने वाला जो वेद पर तर्क वितर्क कर लेता है, वह चारों ओर विचरण कर के वेद के ज्ञान को फैलाता है। जहां प्रतीत होता है कि ब्रह्मभोज में जो चर्चा होती थी उसमें कुछ आगे निकल जाते होंगे और की कुछ पीछे रह जाते होंगे। जब अनेक समानज्ञानी ब्राह्मण हृदय से वेदार्थ के गुणदोष निरूपण के लिए ब्रह्मोद्य में एकत्र होते हैं, तो किसी किसी को  कुछ भी ज्ञान नहीं होता, कोई-कोई स्तोता ब्राह्मण वेदार्थ  ज्ञाता हो कर विचरण करते  हैं।
इ॒मे ये नार्वाङ् न प॒रश्चर॑न्ति॒ न ब्रा॑ह्म॒णासो॒ न सु॒तेक॑रासः ।
त ए॒ते वाच॑मभि॒पद्य॑ पा॒पया॑ सि॒रीस्तन्त्रं॑ तन्वते॒ अप्र॑जज्ञयः ॥ 9 ॥
इ॒मे । ये । न । अ॒र्वाक् । न । प॒रः । चर॑न्ति । न । ब्रा॒ह्म॒णासः॑ । न । सु॒तेऽक॑रासः । ते । ए॒ते । वाच॑म् । अ॒भि॒ऽपद्य॑ । पा॒पया॑ । सि॒रीः । तन्त्र॑म् । त॒न्व॒ते॒ । अप्र॑ऽजज्ञयः ॥
ये जो वेदार्थ  को  न जानने वाले अविद्वान् इस लोक में ब्राह्मणों के तथा परलोक में  देवों के साथ यज्ञादि कर्म  नहीं करते, जो न ब्रह्मवेद जानने वाले हैं और  न सोमयज्ञ कर्ता है। वे ज्ञानी नहीं हो ते। वे ये पापकारिणी लौकिक वाणी को  प्राप्तकर मूर्ख व्यक्ति के समान हल आदि लेकर अपना भरण-पोषण कृषि आदि व्यवहार से करते हैं।
भावार्थ-  जो दिव्य वाणी के अर्थ से अनभिज्ञ हैं वे वस्तुतः जीवन को  नहीं समझते। वे जीवन के जाल में फॅंसकर
वस्तुतः एक विन्दु से दूसरे विन्दु तक चक्कर काटते रहते हैं। काव्य की वास्तविक  आशंसा तभी सम्भव है जब व्यक्ति स्थिति के दोनों धु्वों को  देख सके, समझे और उनसे ऊपर उठकर ऋषि की एकात्मक स्थिति से तादात्म्य कर ले।
सर्वे॑ नन्दन्ति य॒शसाग॑तेन सभासा॒हेन॒ सख्या॒ सखा॑यः ।
कि॒ल्बि॒ष॒स्पृत्पि॑तु॒षणि॒र्ह्ये॑षा॒मरं॑ हि॒तो भव॑ति॒ वाजि॑नाय ॥ 10 ॥
सर्वे॑ । न॒न्द॒न्ति॒ । य॒शसा॑ । आऽग॑तेन । स॒भा॒ऽस॒हेन॑ । सख्या॑ । सखा॑यः । कि॒ल्बि॒ष॒ऽस्पृत् । पि॒तु॒ऽसनिः॑ । हि । ए॒षा॒म् । अर॑म् । हि॒तः । भव॑ति । वाजि॑नाय ॥
मित्र के रूप में सभा में विजयी, यश को प्राप्त का सभी सहृय अभिनन्दन करते हैं। मन की जड़ता (किल्बष्) को  दूर
करने वाला वह अन्न देनेवाला है, जिसे पाकर लोग जीवन धारण करते हैं। वाणी की स्पर्धा  में वह समर्थ  होता है।
भावार्थ- ब्रह्मवेत्ता  विद्या सीख कर समाज के मध्य जाता है तथा जब वह सभा को जीतकर यश पूर्वक लौटता है तो उसके मित्र आनंदित होते हैं। वह मित्रों के पाप को नष्ट करने वाला हमारे लिए धन संपत्ति अथवा पोषक पदार्थ लाने वाला तथा उसकी शक्तिमत्ता पर्याप्त सिद्ध होता है। इससे स्पष्ट होता है कि ज्ञानी अपने अपने मित्र तथा परिवार के लिए हितकारी होता है।
ऋ॒चां त्वः॒ पोष॑मास्ते पुपु॒ष्वान् गा॑य॒त्रं त्वो॑ गायति॒ शक्व॑रीषु ।
ब्र॒ह्मा त्वो॒ वद॑ति जातवि॒द्यां य॒ज्ञस्य॒ मात्रां॒ वि मि॑मीत उ त्वः ॥ 11 ॥
ऋ॒चाम् । त्वः॒ । पोष॑म् । आ॒स्ते॒ । पुपु॒ष्वान् । गा॒य॒त्रम् । त्वः॒ । गा॒य॒ति॒ । शक्व॑रीषु । ब्र॒ह्मा । त्वः॒ । वद॑ति । जातऽवि॒द्याम् । य॒ज्ञस्य॑ । मात्रा॑म् । वि । मि॒मी॒ते॒ । ऊँ॒ इति॑ । त्वः॒ ॥
ज्ञान-सूक्त का अन्तिम मन्त्र एक बहुत ही गम्भीर तत्व प्रस्तुत करता है। अन्तर्बाध सत्य, गुह्यतत्व जिसे ऋषियों  में अभिव्यक्ति मिली है, वही सामवेद के संगीत में, यजुर्वेद के अनुष्ठान में और  अथर्ववेद के इहमत्र काम में अभिव्यक्त है और  इन सभी की अभिव्य×जना वाणी के द्वारा ही हो ती है। ऋत्विक्, होता, उद्गाता, अध्वर्यु तथा ब्रह्मा ये चारों सृष्टि यज्ञ के समन्वय को  ही परम् सत्य के रूप में ध्वनित करते हैं और  समन्वय के इसी विन्दु पर ही काव्य की वाणी टिकी है। इसी वाणी में सब कुछ प्रतिष्ठत है- ‘‘यावत् ब्रह्म विशिष्ठते  तावती वाक् ’’। ब्रह्म का ज्ञान वेदाध्ययन का मुख्य प्रयोजन है, अतएव आध्यात्मिक ज्ञान के लिए अनिवार्य साधनभूत वेदार्थ  ज्ञान की प्रशस्ति इस ज्ञानसूक्त का प्रतिपाद्य विषय है।

पर्जन्य सूक्त 5/83

अच्छा वद तवसं गीर्भिराभि स्तुहि पर्जन्यं नमसा विवास ।
कनिक्रदद्वृषभो जीरदानू रेतो दधात्योषधीषु गर्भम् ॥१॥
वि वृक्षान्हन्त्युत हन्ति रक्षसो विश्वं बिभाय भुवनं महावधात् ।
उतानागा ईषते वृष्ण्यावतो यत्पर्जन्य स्तनयन्हन्ति दुष्कृतः ॥२॥
रथीव कशयाश्वाँ अभिक्षिपन्नाविर्दूतान्कृणुते वर्ष्याँ अह ।
दूरात्सिंहस्य स्तनथा उदीरते यत्पर्जन्यः कृणुते वर्ष्यं नभः ॥३॥
प्र वाता वान्ति पतयन्ति विद्युत उदोषधीर्जिहते पिन्वते स्वः ।
इरा विश्वस्मै भुवनाय जायते यत्पर्जन्यः पृथिवीं रेतसावति ॥४॥
यस्य व्रते पृथिवी नन्नमीति यस्य व्रते शफवज्जर्भुरीति ।
यस्य व्रत ओषधीर्विश्वरूपाः स नः पर्जन्य महि शर्म यच्छ ॥५॥
दिवो नो वृष्टिं मरुतो ररीध्वं प्र पिन्वत वृष्णो अश्वस्य धाराः ।
अर्वाङेतेन स्तनयित्नुनेह्यपो निषिञ्चन्नसुरः पिता नः ॥६॥
अभि क्रन्द स्तनय गर्भमा धा उदन्वता परि दीया रथेन ।
दृतिं सु कर्ष विषितं न्यञ्चं समा भवन्तूद्वतो निपादाः ॥७॥
महान्तं कोशमुदचा नि षिञ्च स्यन्दन्तां कुल्या विषिताः पुरस्तात् ।
घृतेन द्यावापृथिवी व्युन्धि सुप्रपाणं भवत्वघ्न्याभ्यः ॥८॥
यत्पर्जन्य कनिक्रदत्स्तनयन्हंसि दुष्कृतः ।
प्रतीदं विश्वं मोदते यत्किं च पृथिव्यामधि ॥९॥
अवर्षीर्वर्षमुदु षू गृभायाकर्धन्वान्यत्येतवा उ ।
अजीजन ओषधीर्भोजनाय कमुत प्रजाभ्योऽविदो मनीषाम् ॥१०॥

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नासदीय सूक्त



नासदीय सूक्त ऋग्वेद के 10 वें मंडल का 129 वां सूक्त है। इसका सम्बन्ध ब्रह्माण्ड विज्ञान और ब्रह्मांड की उत्पत्ति के साथ है। माना जाता है कि यह सूक्त ब्रह्माण्ड के निर्माण के बारे में सटीक तथ्य बताता है।
नास॑दासी॒न्नो सदा॑सीत्त॒दानीं॒ नासी॒द्रजो॒ नो व्यो॑मा प॒रो यत् ।
किमाव॑रीवः॒ कुह॒ कस्य॒ शर्म॒न्नम्भः॒ किमा॑सी॒द्गह॑नं गभी॒रम् ॥ १॥

न मृ॒त्युरा॑सीद॒मृतं॒ न तर्हि॒ न रात्र्या॒ अह्न॑ आसीत्प्रके॒तः ।
आनी॑दवा॒तं स्व॒धया॒ तदेकं॒ तस्मा॑द्धा॒न्यन्न प॒रः किं च॒नास॑ ॥ २॥

तम॑ आसी॒त्तम॑सा गू॒ळ्हमग्रे॑ऽप्रके॒तं स॑लि॒लं सर्व॑मा इ॒दम् ।
तु॒च्छ्येना॒भ्वपि॑हितं॒ यदासी॒त्तप॑स॒स्तन्म॑हि॒नाजा॑य॒तैक॑म् ॥ ३॥

काम॒स्तदग्रे॒ सम॑वर्त॒ताधि॒ मन॑सो॒ रेतः॑ प्रथ॒मं यदासी॑त् ।
स॒तो बन्धु॒मस॑ति॒ निर॑विन्दन्हृ॒दि प्र॒तीष्या॑ क॒वयो॑ मनी॒षा ॥ ४॥

ति॒र॒श्चीनो॒ वित॑तो र॒श्मिरे॑षाम॒धः स्वि॑दा॒सी३दु॒परि॑ स्विदासी३त् ।
रे॒तो॒धा आ॑सन्महि॒मान॑ आसन्स्व॒धा अ॒वस्ता॒त्प्रय॑तिः प॒रस्ता॑त् ॥ ५॥

को अ॒द्धा वे॑द॒ क इ॒ह प्र वो॑च॒त्कुत॒ आजा॑ता॒ कुत॑ इ॒यं विसृ॑ष्टिः ।
अ॒र्वाग्दे॒वा अ॒स्य वि॒सर्ज॑ने॒नाथा॒ को वे॑द॒ यत॑ आब॒भूव॑ ॥ ६॥

इ॒यं विसृ॑ष्टि॒र्यत॑ आब॒भूव॒ यदि॑ वा द॒धे यदि॑ वा॒ न ।
यो अ॒स्याध्य॑क्षः पर॒मे व्यो॑म॒न्सो अ॒ङ्ग वे॑द॒ यदि॑ वा॒ न वेद॑ ॥ ७॥


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प्रमुख भारतीय दर्शनों का सामान्य परिचय

                                      चार्वाक दर्शन 
तत्त्व मीमांसा-
चार्वाक दर्शन के अनुसार पृथिवी जल तेज तथा वायु ये चार ही तत्त्व सृष्टि के मूल कारण हैं । जिस प्रकार बौद्ध उसी प्रकार चार्वाक का भी मत है कि आकाश नामक कोई तत्त्व नहीं है। यह शून्य मात्र है । अपनी आणविक अवस्था से स्थूल अवस्था में आने पर उपर्युक्त चार तत्त्व ही बाह्य जगत्इन्द्रिय अथवा देह के रूप में दृष्ट  होते हैं। आकाश की वस्त्वात्मक सत्ता न मानने के पीछे इनकी प्रमाणव्यवस्था कारण है। जिस प्रकार हम
गन्ध  रस रूप और स्पर्श का प्रत्यक्ष अनुभव करते हुए उनके समवायियों का भी तत्तत् इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष करते हैं आकाश तत्त्व का वैसा प्रत्यक्ष नहीं होता। अतः उनके मत में आकाश नामक तत्त्व है ही नहीं। चार महाभूतों का मूलकारण क्या हैइस प्रश्न का उत्तर चार्वाकों के पास नहीं है। यह विðा अकस्मात् भिन्न-भिन्न रूपों एवं भिन्न-भिन्न मात्राओं में मिलने वाले चार महाभूतों का संग्रह या संघट्ट मात्र है।
आत्मा-चार्वाकों के अनुसार चार महाभूतों से अतिरिक्त आत्मा नामक कोई अन्य पदार्थ नहीं है। चैतन्य आत्मा का गुण है। चूँकि आत्मा नामक कोई वस्तु है ही नहीं अतः चैतन्य शरीर का ही गुण या धर्म सिद्ध होता है। अर्थात् यह शरीर ही आत्मा है। इसकी सिद्धि के तीन प्रकार है-तर्कअनुभव और आयुर्वेद शास्त्रों।
तर्क-से आत्मा की सिद्धि के लिये चार्वाक लोग कहते हैं कि शरीर के रहने पर चैतन्य रहता है और शरीर के न रहने पर चैतन्य नहीं रहता। इस अन्वय व्यतिरेक से शरीर ही चैतन्य का आधार अर्थात् आत्मा सिद्ध होता है।
अनुभव-मैं स्थूल हूँ’, ‘मैं दुर्बल हूँ’, ‘मैं गोरा हूँ’, ‘मैं निष्क्रिय हूँ’ इत्यादि अनुभव हमें पग-पग पर होता है। स्थूलता दुर्बलता इत्यादि शरीर के धर्म हैं और ‘®’ भी वही है। अतः शरीर ही आत्मा है।
आयुर्वेद-जिस प्रकार गुड जौ महुआ आदि को मिला देने से कालक्रम के अनुसार उस मिश्रण में मदशक्ति उत्पन्न होती हैअथवा दही पीली मिट्टी और गोबर के परस्पर मिश्रण से उसमें बिच्छू पैदा हो जाता है अथवा पान कत्था सुपारी और चूना में लाल रंग न रहने पर भी उनके मिश्रण से मुँह में लालिमा उत्पन्न हो जाती है उसी प्रकार चतुर्भूतों के विशिष्ट सम्मिश्रण से चैतन्य उत्पन्न हो जाता है। किन्तु इन भूतों के विशिष्ट   मात्रा में मिश्रण का कारण क्या हैइस प्रश्न का उत्तर चार्वाक के पास स्वभाववाद के अतिरिक्त कुछ नहीं है।
ईश्वर-न्याय आदि शास्त्रों में ईश्वर की सिद्धि अनुमान या आप्त वचन से की जाती है। चूँकि चार्वाक प्रत्यक्ष और केवल प्रत्यक्ष प्रमाण को मानता है अतः उसके मत में प्रत्यक्ष दृश्यमान राजा ही ईश्वर है। वह अपने राज्य का तथा उसमें रहने वाली प्रजा का नियन्ता होता है। अतः उसे ही ईश्वर मानना चाहिये ।
ज्ञान मीमांसा-
प्रमेय अर्थात् विषय का यथार्थ ज्ञान अर्थात् प्रमा के लिये प्रमाण की आवश्यकता होती है । चार्वाक लोक केवल प्रत्यक्ष प्रमाण मानते हैं। विषय तथा इन्द्रिय के सन्निकार्ष से उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष ज्ञान कहलाता है । हमारी इन्द्रियों के द्वारा प्रत्यक्ष दिखलायी पड़ने वाला संसार ही प्रमेय है । इसके अतिरिक्त अन्य पदार्थ असत् है । आँख कान नाक जिह्ना और त्वचा के द्वारा रूप शब्द गन्ध रस एवं स्पर्श का प्रत्यक्ष हम सबको होता है। जो वस्तु अनुभवगम्य नहीं होती उसके लिये किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता भी नहीं होती । बौद्ध जैन नामक अवैदिक दर्शन तथा न्यायवैशेषिक आदि अर्द्धवैदिक दर्शन अनुमान को भी प्रमाण मानते हैं। उनका कहना है कि समस्त प्रमेय पदार्थों की सत्ता केवल प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध नहीं की जा सकती। परन्तु चार्वाक का कथन है कि अनुमान से केवल सम्भावना पैदा की जा सकती है। निधयात्मक ज्ञान प्रत्यक्ष से ही होता है । दूरस्थ हरे भरे वृक्षों को देखकर वहाँ पक्षियों का कोलाहल सुनकरउधर से आने वाली हवा के ठण्डे झोके से हम वहाँ पानी की सम्भावना मानते हैं। जल की उपलब्धि वहाँ जाकर प्रत्यक्ष देखने से ही निश्चित होती है। अतः सम्भावना उत्पन्न करने तथा लोकव्यवहार चलाने के लिये अनुमान आवश्यक होता है किन्तु वह प्रमाण नहीं हो सकता। जिस व्याप्ति के आधार पर अनुमान प्रमाण की सत्ता मानी जाती है वह व्याप्ति स्वभाव के अतिरिक्त कुछ नहीं है। धूम के साथ अग्नि कापुष्प के साथ गन्ध का होना स्वभाव है । सुख और धर्म का दुःख और अधर्म का कार्यकारण भाव स्वाभाविक है । जैसे कोकिल के शब्द में मधुरता तथा कौवे के शब्द में कर्कशता स्वाभाविक है उसी प्रकार सर्वत्र समझना चाहिये।
जहाँ तक शब्द प्रमाण की बात है तो वह तो एक प्रकार से प्रत्यक्ष प्रमाण ही है। आप्त पुरुष के वचन हमको प्रत्यक्ष सुनायी देते हैं। उनको सुनने से अर्थ ज्ञान होता है। यह प्रत्यक्ष ही है । जहाँ तक वेदों का प्रश्न है उनके वाक्य अदृ   और अश्रुतपूर्ण विषयों का वर्णन करते हैं अतः उनकी विðासनीयता सन्दिग्  है। साथ ही अधर्म आदि में अश्वलिङ्गग्रहण सदृश लज्जास्पद एवं मांसभक्षण सदृश घृणास्पद कार्य करने से तथा-
            सृण्येव जर्भरी तुर्फरीतू नैतोशेव तुर्फरी पर्करीका ।
            उदन्यजेव जेमना मदेरु  ता मे  जराटवजरं मरायु ।।
मन्त्र में जर्भरी तुर्फरी आदि अर्थहीन शब्दों का प्रयोग करने से वेद अपनी अप्रामाणिकता स्वयं सिद्ध करते हैं।
आचार मीमांसा-
उपर्युक्त विवरण से यह स्पष्ट हो जाता है कि चार्वाक लोग इस प्रत्यक्ष दिखायी देने वाले देह और जगत् के अतिरिक्त किसी अन्य पदार्थ का स्वीकार नहीं करते। धर्म अर्थ काम और मोक्ष नामक पुरुषार्थचतु  य को वे लोग पुरुष अर्थात् मनुष्य देह के लिये उपयोगी मानते हैं। उनकी दृष्टि में अर्थ और काम ही परम पुरुषार्थ है। धर्म नाम की वस्तु को मानना मूर्खता है क्योंकि जब इस संसार के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर्ग आदि है ही नहीं तो धर्म के फल को स्वर्ग में भोगने की बात अनर्गल है। पाखण्डी धूर्तों के द्वारा कपोलकल्पित स्वर्ग का सुख भोगने के लिये यहाँ यज्ञ आदि करना धर्म नहीं है बल्कि उसमें की जाने वाली पशुहिंसा आदि के कारण वह अधर्म ही है तथा हवन आदि करना तत्तद् वस्तुओं का दुरुपयोग तथा व्यर्थ शरीर को कष्ट  देना है। इसलिये जो कार्य शरीर को सुख पहुँचाये उसी को करना चाहिये। जिसमें इन्द्रियों की तृप्ति हो मन आन्दित हो वही कार्य करना चाहिये। जिनसे इन्द्रियों की तृप्ति हो मन आनन्दित हो उन्हीं विषयों का सेवन करना चाहिये। शरीर इन्द्रिय मन को आनन्दाप्लावित करने में जो तत्त्व बाधक होते हैं उनको दूर करना   करनामार देना धर्म है । शरीरिक मानसिक कष्ट  सहनाविषयानन्द से मन और शरीर को बलात् विरत करना अधर्म है। तात्पर्य यह है कि आस्तिक वैदिक एवं यहाँ तक कि अर्धवैदिक दर्शनों मेंपुराणों स्मृतियों में वर्णित आचार का पालन यदि शरीर सुख का साधक है तो उनका अनुसरण करना चाहिये और यदि वे उसके बाद के होते हैं तो उनका सर्वथा सर्वदा त्याग कर देना चाहिये।

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संस्कृत - साहित्य, काव्यशास्त्र एवं छन्द परिचय (2019 के अनुसार )

डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर जीवनी
जन्म, माता - पिता -
डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर का जन्म आषाढ़ कृष्ण नवमी संवत् 1976 तदनुसार 31 जुलाई 1918 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था। इनके पितामह का नाम श्री वामन गोपाल वर्णेकर, पिता का नाम श्री भास्कर राव वर्णेकर तथा माता का नाम अन्नपूर्णा बाई वर्णेकर था। इनके पिता भवन निर्माण के ठेकेदार थे। ये महाराष्ट्र के सतारा जिले के वर्णे नामक गाँव के मूल निवासी थे, जहाँ से बीसवीं शताब्दी में नागपुर में आकर रहने लगे।
पारिवारिक सदस्य - 
    श्रीधर भास्कर वर्णेकर के पांच भाई तथा एक बहन वत्सला हुए। वर्णेकर जी के 3 पुत्र तथा दो पुत्रियां हैं।  पुत्र चंद्रगुप्त वर्णेकर का जन्म 1947 ईस्वी में हुआ । श्री चंद्रगुप्त वर्णेकर इलेक्ट्रॉनिकक्स से एम. ई. करने के पश्चात् पीएचडी की उपाधि ग्रहण की। अमेरिका में 2 वर्ष तक प्रोफेसर रहने के पश्चात् वर्तमान में वे गोदिया के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर हैं । ये संस्कृत में विशेष अभिरुचि के कारण संस्कृत का उत्तम अध्ययन, वैदिक गणित का अध्यापन तथा सांस्कृतिक कार्यों में अग्रसर रहते हैं।
बाल्यावस्था एवं शिक्षा -
डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर बचपन से ही अत्यधिक प्रतिभा संपन्न थे। इसी प्रतिभा के परिणामस्वरूप उन्होंने 13 वर्ष की अल्पायु में रघुवंश महाकाव्य के अनेक शब्द कंठस्थ कर लिए थे। वर्णेकर जी जब इतवारी मोहल्ले में रहते थे, तब उनके पड़ोस में काशी के वेदांताचार्य श्री हनुमन्त शास्त्री केवले रहने के लिए आए। हनुमान शास्त्री बधिर होने के कारण कहीं बाहर न जा कर घर पर ही रहते थे। वह व्याकरणाचार्य थे। सन् 1931 के आसपास सभी जगह महात्मा गांधी के आंदोलन की धूम मची थी। स्कूल कॉलेज बंद थे। ऐसे समय में वर्णेकर जी अपने पिताजी के कहने पर बड़े भाई श्री प्रभाकर जी के साथ शास्त्री जी के यहां संस्कृत सीखने जाने लगे। श्री हनुमन्त शास्त्री केवले से पारम्परिक पद्धति से अमरकोश तथा लघु सिद्धांत कौमुदी का अध्ययन किया। इस प्रकार प्राचीन शिक्षण पद्धति से ही संस्कृत शिक्षण का आरंभ हुआ। शास्त्री जी ने कुछ भी लिखने पर प्रतिबंध लगा रखा था। केवल सुनकर ही सब कुछ याद रखना होता था। इतना अध्ययन होने के पश्चात् वर्णेकर जी ने बंगाल संस्कृत एशोसियेशन संस्था द्वारा संचालित व्याकरण प्रथम की परीक्षा उत्तीर्ण किया। आपके गुरु व्याकरण तथा वेदान्त के अध्यापन में ही लगे रहते थे। काव्य शिक्षण के प्रति वे उदासीन रहते थे। अतः संस्कृत काव्य के अध्ययन के लिए उन्होंने मुझे  नागपुर संस्कृत कॉलेज में अध्ययन के लिए भेजा। वहां श्री सावलापुरकर एवं श्री वराड पांडे शिक्षक थे। नागपुर संस्कृत कॉलेज में रघुवंशमहाकाव्यम् तथा कुमार संभवम् से प्रथम बार परिचय हुआ। बचपन से ही सुभाषित पद्यों को याद करने की इनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति था अतः रघुवंशमहाकाव्यम् तथा कुमार संभवम् की मधुरता से मोहित होकर स्वेच्छा से वह इसके कतिपय सर्ग कंठस्थ कर लिया। कालिदास के श्लोक गायन के अवसर पर उस प्रकार की पद्य रचना करने की प्रेरणा का उदय होने लगा। उन दिनों वर्णेकर ने मराठी भाषा में लिखित समर्थ रामदास के चरित ग्रन्थ का अध्ययन किया। प्रतिदिन स्नान के बाद समर्थ रामदास द्वारा लिखित दासबोध का पाठ अप्रतिम श्रद्धा से साथ करते थे। इस प्रकार राम दास के प्रति श्रद्धा से वशीभूत होकर अनायास ही रामदास की स्तुति परक मालिनी वृत्त में संस्कृत श्लोक लिखकर अपने कवि जीवन का श्रीगणेश किया। इस प्रकार सप्तम कक्षा में के छात्र डॉ. वर्णेकर की कविता का आरम्भ श्री समर्थ रामदास की स्तुति से हुआ।
डॉ. वर्णेकर जी सन् 1927 ईस्वी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ प्रथम परिचय हुआ। संघ के व्याख्यान में  शिवाजी के चरित के विषय मे अनेक ऐतिहासिक कथाओं का श्रवण कर शिवाजी के प्रति असीम श्रद्धा हो गयी। संघ के कार्य में अण्णा  सोहनी नामक तरुण कार्यकर्ता नागपुर में थे। उनसे डॉ. वर्णेकर का परिचय हुआ। वे ऐतिहासिक कथा सुनाने में प्रवीण थे। उन्होंने शिवाजी के चरित से जुड़े अनेक प्रकार के वीर और अद्भुत कथा सुनाया करते थे। नागपुर में ही दादा शास्त्री कायरकर नामक कीर्तन कला में निपुण व प्रख्यात थे। वे अपने कीर्तन में महाराष्ट्र के इतिहासिक कथाओं को अत्यन्त रोचकता के साथ वर्णन करते थे। उनसे भी इन्होंने शिवाजी के बारे में बार- बार सुना। 1930 ईस्वी में शिवाजी के 300 वें जन्मोत्सव के अवसर पर आनन्द पत्रिका में शिवाजी पर सचित्र विशेषांक प्रकाशित हुए। उसे इन्होंने अनेक बार पढ़ा। इस प्रकार शिवाजी से सम्बद्ध अनेक प्रेरक प्रसंगों ने इन्हें प्रभावित किया।
1936 से 1938 तक धनाभाव के कारण उच्च अध्ययन के लिए  नागपुर के एक अंध विद्यालय में शिक्षक की नौकरी स्वीकार कर ली। विद्यालय के रूग्न में विद्यार्थियों के लिए पैदल चलकर ही औषधि लेने जाते थे। उन दिनों रामकृष्ण आश्रम में एक डॉ. होम्योपैथी का धर्मार्थ चिकित्सालय चलाते थे। वहां पंक्ति में नंबर आने तक दो-तीन घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। पंक्ति में बैठे बैठे-बैठे रामकृष्ण परमहंस की समस्त पुस्तकों का अध्ययन कर लिया।   इस कारण उनकी परिचर्या आदि में सेवा आदि में अधिक समय लग जाने के कारण संस्कृत का अध्ययन लगभग स्थगित हो गया। 1938 में नागपुर विश्वविदद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा किसी प्रकार उत्तीर्ण किया।
1938 ईस्वी में इंटर की परीक्षा देनी थी। डॉ. वर्णेकर  उस समय धंतोली के डांगे के घर पर कुछ विद्यार्थियों के साथ रहते थे। इंटर की परीक्षा के प्रपत्र का शुल्क रु.35 था, परंतु अंतिम समय तक रु.30 रूपये की व्यवस्था हो पाई शेष रु.5 चचेरे भाई ने दिए। वर्णेकर जी ने कृतज्ञता पूर्वक यह कहते हैं कि यदि वे 5 रुपए नहीं मिले होते तो जीवन के 2 वर्ष व्यर्थ ही चले जाते। इसी वर्ष इन्होंने मदोर्मिमाला तथा शिवराजस्तवन पुस्तक लिखी। आगे की शिक्षा में गो. नी. दांडेकर की माता जी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी भिशीकर जी आदि ने पर्याप्त सहायता की ।
डॉ. वर्णेकर जी 14 वर्ष की अल्पायु मैं निर्दोष काव्य रचना करने लगे थे, किंतु ध्यान आकर्षित करने योग्य उनकी प्रथम काव्य रचना मंगलाष्टक थी जिस की प्रशंसा महामहोपाध्याय मिरासी जैसे महान संस्कृतज्ञ ने भी की है। श्री राम बहादुर बाड़ेगांवकर ने इस मंगलाष्टक में 21 व्याकरण की त्रुटियों के होने का दावा किया, उनमें एक स्थान पर स्तुन्वन्ति के स्थान पर स्तुवन्ति का सुझाव दिया। डॉ. वर्णेकर जी ने तुरंत एवं यं ब्रह्मावरुनेन्द्ररूद्र यह पंक्ति सुना कर यह किस प्रकार शुद्ध है यह दिखा दिया तथा अन्य कई शब्दों की संगति इसी प्रकार सूत्रों से सिद्ध की। श्री इस पर वाडेकरगांवकर जी अत्यंत प्रसन्न हुए और वर्णेकर जी की शिक्षा का दायित्व स्वयं स्वीकार किया। उसके पश्चात बनर्जी वाडेगांवकर जी के यहां प्रत्येक अपराह्न सिद्धांत कौमुदी सीखने जाने लगे।
इसी समय कर्नल कुकडे वर्णेकर जी को समाचार पत्र व पुस्तकें पढ़ कर सुनाने के लिए 10 रूपये मासिक देते थे। इसी से 1 वर्णेकर जी का 1941 ईस्वी में संस्कृत विषय में एम.तक का शिक्षण संभव हो सका। इसी समय अवधि में वर्णेकर जी को कमल ताई की संस्कृत विषय की ट्यूशन भी प्राप्त हो गई। बाद में कमल ताई की शादी वर्णेकर के साथ हुई। इसके बाद वर्णेकर नागपुर के ही धनवटे नेशनल कॉलेज में प्राध्यापक हो गए। 1965 ईस्वी में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से अर्वाचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास पर डी. लिट की उपाधि प्राप्त की। इसकी रोचक कथा है। संक्षेप में यह उपाधि तृतीय परीक्षक के नियुक्ति पर मिली। इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में नियुक्त होकर विभागाध्यक्ष बने। इनकी संगीत में अभिरुचि बहुत पूर्व से थी, परंतु वह संगीत को विधिवत् सीख नहीं पाए थे। स्वयं शिक्षक होने के कारण विद्यार्थियों के मध्य सीखना संभव नहीं था। वह बाहर से संगीत ध्वनि सुनकर समाधान मान लिया करते थे। जब चतुर संगीत विद्यालय स्थापित हुआ है तब उसमें नित्य जाया करते थे। लगभग 1 माह तक विद्यालय में गए परंतु संगीत विद्यालय अधिक दूरी पर स्थित होने के कारण व शिक्षण छूट गया ।
1976 के आसपास कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद केंद्र की स्थापना हुई। तब वर्णेकर जी को एक माह तक संस्कृत में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। 1 दिन वहां मद्रास के गुरुग दास नामक गायक वहां आए वर्णेकर जी ने उनका भजन सुना। उस संगीत की मोहिनी इनके अंतःकरण पर इतनी थी कि वह रात्रि सो नहीं सके। अगले दिन प्रातः काल समुद्र के किनारे घूमने जाने पर उन्हें नागपुर के भैयाजी बझलवार मिले। वे स्कूल के बच्चों को धुमाने लाए थे। वहीं वर्णेकर ने उन्हें प्रणाम कर कहा भैया जी आप मेरे गुरु और मैं आपका शिष्य हुआ । नागपुर में आप मुझे संगीत सिखाएंगे। नागपुर वापस आने पर उन्होंने संगीत की ट्यूशन की। उस समय वर्णेकर जी नाट्य गीत, कीर्तन आदि गाते थे। फिर भी संगीत के सात सुरों का भेद समझ नहीं आया था। 58 वर्ष की आयु में सीखना प्रारंभ किया। विलंब से ही परंतु हारमोनियम और तानपुरा लेकर संगीत सीखने लगे। इस प्रकार उन्होंने जीवन का एक और दृढ़ निश्चय पूरा किया।
आपने  1950 में संस्कृत भाषा प्रचारिणी सभा से साप्ताहिक संस्कृतम् भवितव्यम् संस्कृत पत्रिका का आरम्भ किया था। इसके आप प्रथम सम्पादक थे। यह पत्रिका आज भी निरंतर प्रकाशित हो रही है। इसी प्रकार राष्ट्र शक्ति मराठी साप्ताहिक तथा योग प्रकाश मराठी मासिक के सम्पादक रहे।
नागपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष पद से डॉ. वर्णेकर जी ने 1979 ईस्वी में अवकाश ग्रहण कर लिया। आपने अन्य संस्थाओं के विभिन्न पदों  को तथा पुरस्कारों को भी गौरवान्वित किया, जिसकी सूची साथ में दी गयी है। चैत्र शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत् 2057 सोमवार दिनांक 10 अप्रैल 2000 ईस्वी को  नागपुर में वर्णेकर जी का निधन हो गया । विगत वर्ष आपकी जन्म शती मनायी गयी। इस अवसर पर आपका अभिनन्दन ग्रन्थ श्रीधरीयम् का विमोचन भी हुआ। प्रज्ञा भारतीयम् सत्यानंदम् में आपकी जीवनी स्फुट रूप से प्रकाशित हुई।
कृतित्व
डॉ. वर्णेकर की कृतियां इस प्रकार हैं-
शिवराज्योदयम् महाकाव्यम् - 68 सर्गों में लिखित तथा 1972 में प्रकाशित इस महाकाव्य में 4 हजार श्लोक हैं।
मदोर्मिमाला -   स्फुटकाव्य चतुःशती
मन्दस्मितम् मदोर्मिमाला उत्तरार्ध
 शतक काव्य
स्वातंत्र्यवीरशतकम् (विनायकवैजयन्ती)
जवाहरतरंगिणी (भारतरत्नशतकम्) 
वात्सल्यरसायनम् (श्रीकृष्णबाललीलाशतकम्) - यह 8 अंकी गीति नाट्य है। कृष्ण की बाल लीलाओं का दार्शनिक विवेचन किया गया है।
श्रीरामकृष्णपरमहंसीयम् (युगदेवताशतकम्)
मातृभूलहरी
सत्यशतकम्
रागकाव्य
तीर्थभारतम् - गीति काव्य ।
श्रीरामसंगीतिका - यह गीति नाट्य है। राम के चरित्र को गीतों की 12 विधियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
श्रीकृष्णसंगीतिका
विविध गीताएं
श्रमगीता - गाँधी जी से प्रेरित होकर 118 पद्यों में श्रम की महत्ता को वर्णित किया।
संघगीता - इसमें संघ की महत्ता का वर्णन किया है।
ग्रामगीतामृतम् - इसमें 41 अध्याय है, जिसमें ग्राम कुटुम्ब, भू वैकुण्ठ, आदर्श जनतंत्र शासन और शोषण रहित समाज का वर्णन किया गया है। 
प्रशस्ति एवं स्तोत्र काव्य
कालिदासरहस्यम् -
अध्यात्मशिवायनम्
प्रार्थनास्तोत्रम्
श्रीगजाननप्रार्थनास्तोत्रम्
दृश्य काव्य
विवेकान्दविजयम् (महानाटकम्)
शिवराज्याभिषेकम्
सम्पादन
संस्कृत वाङ्मय कोश - 
अन्य रचनायें
महाभारतकथा- इसमें तीन भागों में महाभारत की कथा वर्णित है।
प्रश्नावली विमर्श - संस्कृत आयोग के प्रश्नावली के उत्तर के लिए निबन्ध लिखे गये।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य - मराठी में लिखित प्रबन्ध साहित्य।
भारतीय विद्या -     हिन्दी में लिखित प्रबन्ध साहित्य।
धारित पद एवं विशिष्ट कार्य
     1.   अध्यक्ष, भोसला वेदशास्त्र महाविद्यालय, नागपुर ।
     2.   अध्यक्ष योगाभ्यासी मंडल नागपुर
     3.   संस्कृत विश्व परिषद अखिल भारतीय प्रचार मंत्री 1952 से 1956 तक इस निमित्त अखिल भारत में
      संस्कृत व्याख्यान के लिए प्रवास। (इसकी स्थापना कन्हैयालाल मुंशी ने की थी।)
     4.   भारत शासन की वैज्ञानिक एवं तकनीकी परिभाषा समिति के सदस्य
     5.    कार्यवाह, संस्कृत भाषा प्रचारिणी सभा, नागपुर
     6.   अध्यक्ष, महाराष्ट्र संस्कृत परिषद्
     7.   उपाध्यक्ष, संस्कृत विद्यापीठ समिति, महाराष्ट्र शासन द्वारा नियुक्त
     8.   सचिव, अखिल भारतीय विद्या परिषद का नागपुर अधिवेशन
     9.   सचिव, अखिल भारतीय शिक्षा परिषद का नागपुर अधिवेशन
     10.    संयोजक, अखिल भारतीय संस्कृत कथा स्पर्धा, यूनेस्को द्वारा प्रवर्तित 1953 ।
     11.    संस्कृत विद्यालय पाठशाला पुनर्गठन समिति सदस्य 1953
     12.    प्रमुख मंत्री, संस्कृत विश्व परिषद्, नागपुर अधिवेशन 1954
     13.    महाराष्ट्र शासन की स्थाई संस्कृत समिति सदस्य 1973 से 1983 तक  
     14.   नागपुर, कोल्हापुर, रायपुर, ग्वालियर, इंदौर, हैदराबाद आदि विश्वविद्यालयों के संस्कृत अभ्यास मंडल,    
         विद्वत् सभा, पाठ्यपुस्तक समिति आदि की सदस्यता
15.  अध्यक्ष, संस्कृत अभ्यास मंडल रायपुर विश्वविद्यालय
16.   अध्यक्ष, विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी, नागपुर विभाग
17.   अध्यक्ष, विश्व हिंदू परिषद्, विदर्भ विभाग
18.    अध्यक्ष, हस्तलिखित ग्रंथालय, नागपुर विश्वविद्यालय
19.    अध्यक्ष, अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, पांडिचेरी
20.    अध्यक्ष, रजत जयंती अधिवेशन, स्वाध्याय मंडल, गुजरात 1957
21.   अध्यक्ष, उत्कल संस्कृत परिषद् 1958
22.    अध्यक्ष, केरलीय संस्कृत परिषद् 1967
23.     अध्यक्ष, अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् नाशिक अधिवेशन 1988
24.      अध्यक्ष, संत साहित्य प्रतिष्ठान, नागपुर
25.     अध्यक्ष, महाराष्ट्र योग सम्मेलन अकोला अधिवेशन 1989
26.     साहित्य अकादमी जनरल काउंसिल तथा संस्कृत समिति की सदस्यता 1973 से 10 वर्षों तक
27.      संस्थापक संपादक, राष्ट्र शक्ति मराठी साप्ताहिक पत्रिका नागपुर 1956 से 60 तक
28.     संपादक, साहित्य विभाग, दैनिक तरुण भारत मराठी, नागपुर 1956 - 60 तक
29.     संपादक, योग प्रकाश मराठी मासिक पत्रिका (योगविषयक)
30.    आकाशवाणी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन 1961 से 1982 तक में संस्कृत काव्य गायन
31.    1983 में न्यूयार्क में विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संस्कृत परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व
32.    विश्व हिंदू परिषद अमेरिका द्वारा आयोजित ऑरलैंडो फ्लोरिडा के अधिवेशन में प्रमुख वक्ता 1983
33.    संपादक, सत्यानन्दम् संस्कृत पत्रिका, जादवपुर
34.    संस्थापक, सदस्य विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम्

पुरस्कार एवं सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1974  शिवराज्योदयम् महाकाव्य हेतु प्रदान किया गया।  
कालिदास पुरस्कार  - 1983 श्रीराम संगीतिका पुस्तक पर मध्य प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा दिया गया ।
कुवलयानंद योग पुरस्कार, पुणे  1985  
राष्ट्रपति पुरस्कार 1989
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार  1990
क्षमादेवी राव पुरस्कार  1990
डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार 1990
वाङ्मय चूड़ामणि पुरस्कार वाराणसी 1991
श्रीमंत पेशावे पुरस्कार पुणे 1992
जीजामाता पुरस्कार 1992
विवेकानंद पुरस्कार 1992  
ज्ञानपीठ द्वारा विशिष्ट संस्कृत विषयक पुरस्कार 1993
उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी पुरस्कार 1994  
काशी स्वाध्याय मंडल तथा अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित संघ द्वारा प्रदत सुरभारती कण्ठाभरण उपाधि 1977
हडसन अमेरिका वासी भारतीय समाज द्वारा भारत पुत्र उपाधि से सम्मानित 1983
सत्यानंद ज्ञानपीठ, जादवपुर कोलकाता द्वारा प्रदत्त तथा शंकराचार्य काम कांची कामकोटि पीठाधीश्वर द्वारा समर्पित प्रज्ञाभारती उपाधि।

वेंकटराम राघवन (पद्म भूषण(19081979)
वेंकटराम राघवन् का जन्म 22 अगस्त 1908 को तमिलनाडु  के तंजौर जिले के तिरुवायुर में हुआ था। इनके पिता का नाम वेंकटराम अय्यर तथा माता का नाम मीनाक्षी था। आपने 1930 में 3 कॉलेज पुरस्कार और 5 विश्वविद्यालय पदक के साथ प्रेसीडेंसी कॉलेजमद्रास से स्नातक किया। आपने महामहोपाध्याय प्रोफेसर एस कुप्पुस्वामी शास्त्री से संस्कृत भाषा, साहित्य, तुलनात्मक दर्शन और भारतीय दर्शन के साथ में एम. ए किया। 1934-1935  मद्रास विश्वविद्यालय से महामहोपाध्याय कुप्पुस्वामी शास्त्री के अधीन श्रृंगार प्रकाश पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त किया। आपने  संस्कृत भाषण और लेखन के लिए भी पदक और पुरस्कार जीते।
सरस्वती महल पांडुलिपि पुस्तकालय में कुछ समय तक पर्यवेक्षण का कार्य करने के बादअल्मा मेटरमद्रास विश्वविद्यालय के अनुसंधान विभाग से जुड़े।  वहाँ शोध विद्वान् (Research Scholar) पर नियुक्त होकर प्रोफेसर के पद तक पहुंचे। संस्कृत विभागमद्रास विश्वविद्यालय से आप दिसंबर 1968 में संस्कृत विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुए। । इस प्रकार आप 1935 से 1960 तक मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़े रहे।
 व्यक्तित्व
आपने मुक्तक काव्यखंडकाव्यकथा, काव्यशास्त्र, अन्योक्ति, सुभाषित आदि की रचना की। जिसमें यूरोप के यात्रा का अनुभवआधुनिक जीवन की समस्याएंपश्चिमी काव्य धारा का संपर्क देखने को मिलता है। पारंपरिक रचना बंध तथा रसास्वाद की भूमि पर भी आपकी रचना अवस्थित है। स्तोत्र काव्य में कामाक्षी मातृका स्टमक मीनाक्षी सुप्रभातम उल्लेखनीय हैराघवन के काव्य में देश तथा विश्व में हो रहे परिवर्तनों के प्रति सजगता है। विभिन्न विचारधाराओं का समावेश है। अंग्रेजी की स्वच्छंदतावादी कविता की प्रेरणा भी है। कहीं-कहीं आत्म अनुभूतियों की गहनता और कहीं निसर्ग के सौंदर्य के प्रति ललक का भाव है।  संस्कृत कविता को नए मुहावरे और नई शैली से अलंकृत करने में भी आपका योगदान है। संस्कृत में 1960 से लेकर 1980 तक राघवन् युग माना जाता है। जिसमें संस्कृत गद्य का क्रांतिकारी विकास हुआ। आपने 1969 में 1 आर्मीनियाई कहानी का संस्कृत में अनुवाद किया। यह संकलन के रूप में भी प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त आंध्रदेश्यहास्यकथाः 1964 में भी प्रकाशित हुआ।
आप संस्कृत के कई हस्तलिखित ग्रंथों का प्रकाशन किया है। ऑल इंडिया ओरियन्टल कॉन्फ्रेंस के श्रीनगर अधिवेशन तथा विश्व संस्कृत सम्मेलन के नई दिल्ली अधिवेशन के अध्यक्ष रहे । आप कवि कोकिलसकल कला कलापविद्वत्कविन्द्र तथा पद्म भूषण की उपाधियों से विभूषित हुए ।
कृतित्व
            आपने 1953-58 में यूरोप के 13 देशों का दौरा कियाजिसमें संस्कृत और संबद्ध अध्ययनों के विश्वविद्यालय केंद्रोंसंस्थानोंसंग्रहालयपुस्तकालयों का दौरा किया। यूरोप में 20,000 संस्कृत की अप्रकाशित पांडुलिपियों की एक सूची तैयार की । अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के अलावाआपने 1962-63 में दो बार पाण्डुलिपि की खोज में नेपाल के काठमांडू की  यात्रा की। आपने पूर्व एशिया के देशोंऑस्ट्रेलियामॉरीशसकनाडा और मैक्सिको आदि देशों की भी यात्रा की। 
आपकी कविता परंपरा में आधुनिकता का समागम है। आपने लगभग 120 से अधिक पुस्तकों और 1200 लेखों को लिखा,जिसमें अलंकार शास्त्र विषय पर 25 ग्रंथों का लेखन किया ।
1954 में SANSKRIT और ALLIED INDO-LOGICAL STUDIES नामक एक पुस्तक प्रकाशित की।     कृतियां
खण्डकाव्य/ गीतिकाव्य/ लघुकाव्य
          गोपहम्पनः(1947), देववन्दीवरदराजः(1948),महात्मा (1948), उच्छ्वसितानि (1978), प्रमैव योगः (1978), प्रतीक्षा (1976), वाग्वादिनी सहस्रतन्त्री (1969), पुलकितमेति कश्चित्कविःसर्वधारी, महीपो मनुनीतिचोलः, फाल्गुनषोडशी स्तुतिः, किं प्रियं कालिदासस्य, नरेन्द्रो विवेकानन्दः, श्लिष्टप्रकीर्णक, किमिदं तव कार्मणम्, कालः कविः, संक्रान्तिमहः, कविर्ज्ञानी ऋषिः, विश्वभिक्षुस्तवः, कामकोटिकार्मण,गृहीतमिवान्तरंगम्, कावेरी,शब्दः (नृत्यगीत) वैवर्तपुराणम्, ब्रह्मपत्रदम्मविभूतिः, स्वराज्यकेतु, अभ्रमभ्रमभ्रविलायम् (यात्रावृत्तांत)।
स्तोत्रकाव्य
              श्रीकामाक्षीमातृकास्तवः 1979, श्रीमीनाक्षीसुप्रभातम्1979,
महाकाव्य
            मुत्तुस्वामी दीक्षितचरितम्, 1955
रूपक
      विमुक्ति, रासलीला, कामशुद्धि, पुनरुन्मेष, लक्ष्मीस्वयंवर, आषाढस्य प्रथमदिवसे, महाश्वेता, प्रतापरुद्रविजय, अनारकली
प्रेक्षणक (ओपेरा)
                    विकटनितम्बा, अवन्तिसुन्दरी, विज्जिका
संस्कृत विषयों पर अंग्रेजी में लिखित पुस्तकें

The Number Of Rasas (1975)
Rtu In Sanskrit Literature (1972)
Some concepts of Alankara Sastra.
Sanskrit and Allied Indological Studies in Europe.
Sanskrit and Allied Indian Studies in U.S.
The Social Play in Sanskrit.
Love in the Poems and Plays of Kalidasa.
Modern Sanskrit Writings.
Srngaramajari of Akbarshah.
Agamadambara of Jayanta.
सम्पादन
न्यू कैटलस कैटलोरम (एनसीसी) के 5 भाग का सम्पादन, प्रकाशन
जर्नल ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्चजर्नल ऑफ़ द म्यूज़िक एकेडमीमद्रासएवं साहित्य अकादमी की पत्रिका संस्कृत प्रतिभा के सम्पादक।
भोज कृत श्रृंगार प्रकाश का अनुवाद ,1963 ( काव्य और नाटक से संबंधित। यह ग्रन्थ 36 अध्यायों में विभक्त है।)
इसके अतिरिक्त आपने संस्कृत में अनेक मूल एवं  आलोचनात्मक ग्रन्थों को लिखा। आपने तमिल में भी कहानियां तथा संस्कृतिक लेख लिखे।
सम्मान पुरस्कार
 1962 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मभूषण पुरस्कार मिला।
 1966 में संस्कृत के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
1969 में जवाहरलाल नेहरू फाउन्डेशन, नई दिल्ली ने श्रृंगार प्रकाश की पाण्डुलिपियों के सम्पादन के लिए फैलोशिप दिया।
1971 में कैनबराऑस्ट्रेलिया में ओरिएंटलिस्टों की 28 वीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में भाग लिया।
1998 में हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज के वॉल्यूम 53 के रूप में प्रकाशित किया गया था।
श्री कांची शंकराचार्य द्वारा उनकी काव्य रचनाओं के लिए कवि-कोकिल की उपाधि और शाला-कला-कल्प को उनकी बहुमुखी उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया।
विशिष्ट शोध के लिए एशियाटिक सोसायटीबॉम्बे द्वारा 1953 केन गोल्ड मेडल से सम्मानित।
संगीत
एक संगीतज्ञ के रूप मेंउन्होंने कर्नाटक संगीत में विशेषज्ञता हासिल की। वह 1944 से अपनी मृत्यु तक संगीत अकादमीमद्रास के सचिव थे। आप ने सन् 1958 में मद्रास में संस्कृत रंगमंच की स्थापना की। संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं के पोषण और प्रचार के लिए आपकी पत्नी पत्नी श्रीमती शारदा राघवन द्वारा (Dr.v.raghavan center for performing arts) की स्थापना 1974 में की। यह केंद्र 1998 में पंजीकृत किया गया।  यह एक गैर-लाभकारी संगठन है।  ट्रस्ट की गतिविधियों को परिवार के संसाधनोंसंस्कृति मंत्रालय, भारत के शासन और कुछ निजी स्रोतों तथा से संरक्षण दिया जाता है।
विरासत
उनकी जन्मशताब्दी पर अगस्त 2008 में समारोह आयोजित किए गए थे। इस अवसर पर स्मृति कुसुमंजलि पुस्तक का विमोचन किया गया।
  
धारित पद
संस्कृत आयोग के सदस्य
केंद्रीय संस्कृत बोर्ड और इंडोलॉजी समिति के सदस्य
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानशिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय प्रकाशन समिति के अध्यक्ष
साहित्य अकादमी के  संयोजक;
संस्कृत सलाहकार बोर्ड,नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य
संगीत नाटक अकादमी कार्यकारी समिति के सदस्य,
कुछ समय के लिए संस्कृतऑल इंडिया रेडियो के विशेष सलाहकार;
कई पांडुलिपियों के पुस्तकालयों के लिए सलाहकार;
सदस्यन्यू संस्कृत डिक्शनरी बोर्ड और पुराण संपादकीय बोर्ड;
निदेशक / सचिवकुप्पुस्वामी शास्त्री अनुसंधान संस्थान और
सचिवसंगीत अकादमीमद्रास;
1951-59 तक अखिल भारतीय प्राच्य सम्मेलन के सचिव रहे।
1961 में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य सम्मेलन के 21 वें सत्र के दो बार अनुभाग अध्यक्ष और सामान्य अध्यक्ष;
सरकार द्वारा केंद्रीय संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त।
प्रथम विश्व संस्कृत सम्मेलनशिक्षा मंत्रालय (1972) के अध्यक्ष (अकादमिक)
अध्यक्षसंस्कृत अध्ययन के अंतर्राष्ट्रीय संघएस।
संस्कृत विश्वविद्यालयवाराणसी द्वारा विद्या वाचस्पति (डी. लिट) की उपाधि
क्षमा राव (पंडिता)
आज आधुनिक संस्कृत साहित्य पर विचार करने से पहले पंडिता क्षमा राव का नाम लिया जाता है। पंडिता क्षमा राव एक लेखकनाटककार और संस्कृत के गद्य लेखक के रूप में जानी जाती हैं। इसके अलावालघु कथाओं की आधुनिक शैली को पहली बार संस्कृत में वर्गीकृत किया गया था। पण्डिता क्षमा राव समकालीन संस्कृत साहित्य की अग्रदूत है। इनका जन्म 4 जुलाई 1890 को हुआ। इनके पिता का नाम शङ्कर पाण्डुरंग पण्डित तथा माता का नाम उषा देवी था । 
  उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध मेंमराठी शोधकर्ता शंकर पांडुरंग (1840-1894) ने प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्ययन को अपने जीवन का केंद्र बनाया। उन्होंने अपने 54 साल के जीवनकाल में ऋग्वेदवेदान्त और तुकाराम के ग्रंथ सहित विभिन्न संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों के संस्करणों को संपादित करके शोध के मानदंड बनें।
इनका पारिवारिक उपाधि ‘पण्डित’ था । शंकर पांडुरंग के चार बेटे और चार बेटियाँ थी । उनमेंवामन पंडित एक महान चित्रकार थे। अन्य तीनों कानूनचिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे। लेकिन पंडिता  क्षमा राव ने अपने पिता की संस्कृत नैपुण्य विरासत को सम्हाला। । विद्वान् शंकर पाण्डुरंग आर्. जि. भण्डारकर से प्रभावित थे । 
    क्षमा के पिता बचपन में ही दिवंगत हो गये । क्षमा राव (1890-1954) ने थोड़े समय के लिए राजकोट में अपने चाचा बैरिस्टर सीताराम पंडित के साथ रही। वहीं उनकी शिक्षा की व्यवस्था हुई । प्रतिभासम्पन्ना क्षमा तीक्ष्ण बुद्धि की थी । ये मेट्रिक परीक्षा के संस्कृत-आङ्ग्ल भाषा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त की । इसके बाद विल्सन् महाविद्यालय में प्रवेश लिया । जहाँ इनके गुरु महामहोपाध्याय भारतरत्न पी.वी. काणे थे । क्षमा राव के गुरुओं में विद्यालङ्कार  नगप्प शास्त्री प्रमुख थे । यहाँ इनका विद्याभ्यास  स्थगित हो गया । उस समय लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना  और डिग्री लेना संभव नहीं था।  माँ उषा बाई एक बहुत ही दयालु और समझदार महिला थी। पति के निधन के  बाद उन्होंने अपने घर में क्षमा की शिक्षा पर ध्यान दियाताकि उनके बच्चों को शैक्षिक क्षति का सामना न करना पड़े। वैज्ञानिक शोधकर्ता और जीवनी लेखक ल. रा. पंगारकर उस समय इन बच्चों को संस्कृत पढ़ाने जाते थे। क्षमा अत्यंत तीक्ष्ण और मेधावी थी। पूरे जोश में उसने कई विषय आत्मसात् कर ली।
     क्षमा राव का विवाह मुम्बई के डा. राघवेन्द्र राव नामक सुप्रसिद्ध चिकित्सक के साथ हुआ। उसी कारण से इनका उपनाम क्षमा राव हुआ।  शादी के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। डॉ. राव का विद्वानों के बीच उठना बैठना था। उन्होंने विषाक्तता (टाइफाइड) की बीमारी पर विशेष शोध किया था। डॉ. राव एक प्रगतिशील विचारक थे। इसलिएअपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता को जानते हुएउन्होंने घर पर उनकी शिक्षा के लिए एक विशेष संस्कृत विद्वान की व्यवस्था की । अब वह पूरी तरह से अंग्रेजी बोल और लिख रही थी। इसी तरह से उन्हें देश-विदेश जाना पड़ा। उन्होंने उसी समय फ्रेंचइतालवी सीखा। वह बहुभाषी बन गयी। पति के साथ विदेशों में घूमती हुई क्षमा का ज्ञान विस्तृत हुआ । वह मराठी, गुजराती, संस्कृत,  अंग्रेजी भाषा जानती ही थी। ये अनेक क्रीडाओं में भी निपुण थी। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि शंकर पांडुरंग में लड़कियों को सामाजिक सुधारों पर जोर देते हुए शिक्षा लेने की लालसा की थी। इसके लिए उन्होंने जस्टिस रानाडे और अन्य की मदद से लड़कियों के लिए एक स्कूल स्थापित किया।
     क्षमा के अध्ययन के समय देश में स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा था । ये महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये स्वातन्त्र्य संग्राम की सेनानी बनकर देश को परतंत्रता की बेड़ी से मुक्त कराने हेतु लोगों को प्रेरित की । इन्होंने अपनी कृतियों में  गान्धी के जीवन और विचारों को प्रमुखता से वर्णित की। ये गान्धी के साबरमती आश्रम को भी देखी ।
शङ्करजीवनाख्यानम् में अपने पिता की जीवनी लेखन से पण्डिता क्षमा ने संस्कृत साहित्य में नई विधा का सूत्रपात किया। उसके प्रस्ताव में श्रीनृसिंह केलकर ने मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा -
कथं हि न करिष्यन्ति कन्याभ्यः पितरः स्पृहाम्।  ऋणम् तत् पैतृकम् पुण्यमपाकुर्युर्तदीह ताः।।
पिता पुत्रियों की स्पृहा क्यों नहीं करेंगेक्योंकि वे भी पितृ ऋण को उतारने में पूर्ण रूप से समर्थ होती हैं। पण्डिता क्षमा गार्गी एवं मैत्रेयी की परंपरा को आगे बढाने वाली संस्कृत कवयित्री हैं। उन्होंने कथाओं को भी पद्य में लिखा । चरित काव्य के अंतर्गत क्षमा ने तुकारामचरित , रामदासचरित तथा ज्ञानेश्वर चरित को लिखा।
पण्डिता क्षमा राव ने 1920 से 30 तक अंग्रेजी में लिखा। आपकी रचनायें मराठी में भी उपलब्ध होती है। इसके बाद सत्याग्रह आन्दोलन से प्रभावित होकर संस्कृत में लिखना आरम्भ किया। इनकी अग्रलिखित रचनायें प्रकाशित हैं।
श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (महाकाव्य) शङ्करजीवनाख्यानीयम्रामदासचरितम्,  तुकारामचरितम् मीरालहरी(खण्डकाव्यम्), सत्याग्रहगीता, उत्तरसत्याग्रहगीता उत्तरजयसत्याग्रहगीता,   स्वराज्यविजयः, कटुविपाकः (नाटक), महाश्मसानम् (नाटक), कथामुक्तावली 1955, कथापञ्चकम् (पद्यात्मक कथा), ग्राम ज्योति (पद्यात्मक कथा) विचित्रपरिषद् यात्रा, मायाजालम् (आख्यायिका)
पण्डिता क्षमा राव ने श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (महाकाव्य) शङ्करजीवनाख्यानम्,  तुकारामचरितम्मीरालहरी तथा रामदासचरितम्  का अंग्रेजी में अनुवाद कर प्रकाशित किया।
उन्होंने संस्कृत साहित्य में नूतन विधाओं तथा विषयवस्तु का अवतरण किया । गांधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने सत्याग्रहगीता तथा उत्तरसत्याग्रहगीता नामक महाकाव्य की रचना की, जो 1932 में पेरिस से प्रकाशित हुआ। इसमें राष्ट्रीय आन्दोलन की घटनायें वर्णित हैं।
 ‘विचित्रपरिषद् यात्रा’ नामक लघु पुस्तक के अंत में संस्कृत प्रचार के विषय में वह इस प्रकार प्रार्थना की है-
संस्कृताधीतिनः सन्तु सर्वे भारतभूमिजाः ।
संस्कृतेनैव कुर्वन्तु व्यवहारं परस्परम् ॥
संस्कृतज्ञानमासाद्य संस्कृताचारवृत्तयः ।
सर्वतः संस्कृतीभूय सुखिनः सन्तु सर्वतः ॥
पंडिता क्षमा राव की कथाओं में भारत के गौरव की धारा परिलक्षित होती है। इन की कुछ कहानियां तो उनके प्रिय अनुष्टुप् छंद में निबद्ध है, जो कथापंचकम् (मुंबई 1930) में संकलित है। उनकी गद्य कथाओं में कुछ की कथावस्तु तत्कालीन परिस्थितियों से संबंधित है और कुछ में सामाजिक रूढ़ियों से त्रस्त नारी की या शोषित वर्ग की दुर्दशा और त्रासदी चित्रित है। इनकी अधिकांश कहानियां दुःखान्त है। कुछ कहानियों की कथावस्तु राष्ट्रीय आंदोलन से भी संबद्ध है । कथामुक्तावली (मुंबई 1954) में उनकी 15 गद्य कथाएं संकलित हैं। इनमें से कुछ दुःखान्त प्रेम कथाएं हैं, जहां प्रेमी प्रेमिका का मिलन बर्फ से दबकर मृत्यु के समय ही होता है। एक कहानी में पिता अपनी संतति का मुख देखने को तरस जाता है, क्योंकि उसने अपने पत्नी का परित्याग कर दिया था और पत्नी ने मरते समय यह प्रतिज्ञा की थी कि उसकी संतान को उसके पति को न दिखाया जाए। एक कहानी में एक मछुआरा साधु बन जाता है। बरसों जब वह अपने नगर आता है तो उसकी मां उसे पहचान लेती है, परंतु पड़ोसियों को जब मालूम पड़ता है कि यह तो मछुआरा है तो मां-बेटे दोनों का बहिष्कार कर दिया जाता है। खेटग्रामस्य चक्रोद्भवः जैसी कहानियों में गुजरात के खेड़ा जैसे गांव में बस के पहुंचने पर जो सामाजिक परिवर्तन होता है ,उसका मनोरम चित्रण गुजरात के ग्रामीण परिवेश से संबद्ध कथाओं में है। इसी प्रकार की सामाजिक परिवेश की कथावस्तु पर लिखी पंडिता क्षमा राव की कहानियां आधुनिक लघुकथा का अच्छा निदर्शन सिद्ध होती है। उसमें विषय की विविधता है और शैली भी शुद्ध और सुंदर है।
पंडिता क्षमा राव 1942 में सरस्वती चन्द्रिका उपाधि से विभूषित हुई।
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