संस्कृत केवल एक भाषा या एक विषय नहीं है। यह भारत की उस ज्ञान-परंपरा की वाहक है, जिसने जीवन, समाज, शासन, चिकित्सा, मनोविज्ञान, साहित्य, दर्शन और लोकव्यवहार—लगभग हर क्षेत्र को अपने चिंतन से समृद्ध किया है। नई शिक्षा नीति ने पहली बार आधुनिक उच्च शिक्षा की संरचना में इस ज्ञान-परंपरा को व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों तक पहुँचाने का अवसर उपलब्ध कराया है। आवश्यकता केवल इतनी है कि संस्कृत के अध्यापक और विद्यार्थी अपने पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर इस अवसर को पहचानें। संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित क्यों रखा जाए?
हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं। वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि के माध्यम से भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक व्यापक संसार निर्मित हुआ। इसके साथ आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी जोड़कर देखें तो ज्ञान के अनेक स्वतंत्र अनुशासन हमारे सामने आते हैं। इसके अतिरिक्त चौंसठ कलाओं की भी परंपरा रही है।
इन विषयों का विशाल वाङ्मय संस्कृत में उपलब्ध है। आज इनमें से अनेक विषय आधुनिक विश्वविद्यालयों में अलग-अलग विभागों और संकायों में पढ़ाए जाते हैं, लेकिन उनकी मूल भारतीय ज्ञान-परंपरा से उनका संबंध प्रायः विद्यार्थियों के सामने नहीं आ पाता।
यहीं संस्कृत की आवश्यकता सामने आती है।
यदि संस्कृत में निहित इन विषयों के मूल सूत्रों और अवधारणाओं को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए, तो संस्कृत केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान के एक बड़े स्रोत के रूप में सामने आ सकती है।
नई शिक्षा नीति इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है।
नई शिक्षा नीति और संस्कृत के लिए खुले नए द्वार
पहले संस्कृत का अध्ययन प्रायः संस्कृत विभागों तक सीमित रहता था। संस्कृत के विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते थे और संस्कृत के अध्यापक संस्कृत के विद्यार्थियों को पढ़ाते थे। अब स्थिति बदल रही है।
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत संस्कृत को माइनर, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टी-डिसिप्लिनरी कोर्स जैसे माध्यमों से अन्य विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाने की संभावना बनी है।
अब विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन और कृषि जैसे विषयों के विद्यार्थी भी संस्कृत से परिचित हो सकते हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालयों में इस प्रकार के पाठ्यक्रमों के माध्यम से विभिन्न संकायों के विद्यार्थियों तक संस्कृत पहुँचने लगी है। यह केवल पाठ्यक्रम का परिवर्तन नहीं है; यह संस्कृत के सामाजिक विस्तार की एक बड़ी संभावना है।
इसका अर्थ यह भी है कि संस्कृत विभागों को अपने पुराने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।
भारत सरकार ने शिक्षा के माध्यम से संस्कृत की ज्ञानराशि को व्यापक समाज तक पहुँचाने का अवसर दिया है। अब यह संस्कृत के अध्यापकों पर निर्भर करता है कि वे इस अवसर का उपयोग किस प्रकार करते हैं।
भारतीय ज्ञान-परंपरा का निर्माण लोक से संवाद द्वारा
हमारी परंपरा में शास्त्र केवल किसी एक व्यक्ति के कथन को अंतिम सत्य मानकर नहीं बने। ऋषि-मुनि केवल एक स्थान पर बैठकर शास्त्रों की रचना नहीं करते थे।
चातुर्मास के समय वे किसी स्थान पर रुकते थे, लेकिन अन्य समय में वे भ्रमण करते थे। वे लोक का सूक्ष्म निरीक्षण करते थे, लोगों से मिलते थे, उनके साथ संवाद करते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे और उनके जीवन को समझते थे।
नैमिषारण्य जैसे स्थान केवल धार्मिक स्थल नहीं थे; वे ज्ञान और संवाद के केंद्र भी थे। वहाँ लोक की समस्याओं पर विचार होता था और संवाद के माध्यम से उनके शास्त्रीय समाधान खोजे जाते थे।
इसलिए भारतीय शास्त्र-परंपरा का एक महत्वपूर्ण आधार संवाद और तर्क है।
हमने किसी व्यक्ति की बात केवल इसलिए स्वीकार नहीं की कि वह किसी महान व्यक्ति की कही हुई बात थी। जो बात संवाद और तर्क के माध्यम से सर्वमान्य हुई, जो समाज के लिए उपयोगी और व्यापक रूप से लागू होने योग्य सिद्ध हुई, उसे शास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित किया गया।
इसीलिए भारतीय ज्ञान-परंपरा को समझने के लिए केवल ग्रंथों को पढ़ना पर्याप्त नहीं है; उस ज्ञान-निर्माण की प्रक्रिया को समझना भी आवश्यक है।
तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक
संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है—तत्त्वमीमांसा, प्रमाणमीमांसा और व्यवहारमीमांसा।
तत्त्वमीमांसा में हम लोक और सत्ता का अध्ययन करते हैं। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से वस्तु-जगत् को समझने का प्रयास किया गया।
प्रमाणमीमांसा का प्रश्न है—हमने जो जाना या अनुभव किया, वह सही है या नहीं? उसके सत्यापन और मूल्यांकन की क्या पद्धति है?
लेकिन भारतीय ज्ञान केवल तत्त्व और प्रमाण तक सीमित नहीं रहता। वह व्यवहार तक जाता है। इसी को व्यवहारमीमांसा के स्तर पर समझा जा सकता है।
रामायण और महाभारत इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ हैं। महर्षि वाल्मीकि की रामायण और महर्षि वेदव्यास का महाभारत केवल कथा-साहित्य नहीं हैं; वे जीवन और व्यवहार के अनेक स्तरों पर मार्गदर्शन देने वाले ग्रंथ हैं।
ज्ञान को लोक तक पहुँचाने की भारतीय पद्धति
समय के साथ यह अनुभव हुआ कि केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज के प्रत्येक वर्ग तक ज्ञान पहुँचाना पर्याप्त नहीं है। इसलिए प्रस्तुति की विधियाँ बदली गईं।
नाट्यशास्त्र इसी दृष्टि से महत्वपूर्ण है। लोकानुरंजन के माध्यम से लोक तक विचार कैसे पहुँचाया जाए—यह प्रश्न भारतीय चिंतन में गंभीरता से लिया गया।
पुराणों में आख्यान और उपाख्यान के माध्यम से आदर्शों को लोक तक पहुँचाया गया। स्मृतियों की रचना हुई। इतिहास की रचना हुई। विभिन्न काव्यों और नाटकों ने उन्हीं मूल आदर्शों को अलग-अलग रूपों में प्रस्तुत किया।
एक छोटे-से सुभाषित में जीवन के अनेक सूत्र समाहित किए गए हैं—
“किं बीजं शस्यं धर्मः,
स किं भूषणं यशः।
लक्ष्म्याः बन्धुः क उत्साहः,
सिद्धेः किं साधनं नयः।”
अर्थात् कल्याण का बीज धर्म है, सज्जन का आभूषण यश है, लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।
जीवन के लिए इतना बड़ा संदेश इतने छोटे रूप में देना भारतीय सुभाषित परंपरा की विशेषता है।
जब ज्ञान लोकभाषाओं में पहुँचा
चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी के बीच भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियाँ देखीं। ऐसे समय में संत परंपरा ने भारतीय ज्ञान और आदर्शों को लोक तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, संत सूरदास और संत कबीर जैसे संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से अपने विचार समाज तक पहुँचाए।
आदर्श वही थे, जिनकी जड़ें भारतीय परंपरा में थीं, लेकिन भाषा ऐसी थी जिसे सामान्य व्यक्ति समझ सके।
इसका उद्देश्य केवल साहित्य रचना नहीं था। उद्देश्य यह भी था कि लोगों के मन में अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति आस्था बनी रहे और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी वे अपने मूल से विचलित न हों।
यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की जीवंतता है।
संस्कृत में आधुनिक विषयों का ज्ञान
आज जब हम विज्ञान, चिकित्सा, मनोविज्ञान, प्रबंधन या राजनीति जैसे विषयों की बात करते हैं, तो यह मान लेना उचित नहीं होगा कि इनका भारतीय चिंतन में कोई आधार नहीं था।
आयुर्वेद का उद्देश्य ही समग्र स्वास्थ्य की दृष्टि से मनुष्य की रक्षा और रोग की चिकित्सा करना है—“स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणम्, आतुरस्य विकारप्रशमनम्।”
योग मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास से जुड़ता है। यम और नियम के माध्यम से अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान जैसे मूल्यों की चर्चा की गई।
आज जिस योग को पूरी दुनिया में स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन के संदर्भ में अपनाया जा रहा है, उसकी मूल शास्त्रीय परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।
इसी प्रकार साहित्य में भावों का जो सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है, वह मनोविज्ञान की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में विभाव, अनुभाव, सात्त्विक और संचारी भावों के माध्यम से मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन मिलता है।
अर्थशास्त्र में शासन, प्रशासन, अर्थव्यवस्था और राज्य-व्यवस्था के अनेक पक्षों का विवेचन मिलता है।
कौटिल्य ने राजा को मंत्रियों के चयन से लेकर उनकी परीक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था तक का अत्यंत सूक्ष्म विवेचन किया।
इसलिए संस्कृत को केवल धार्मिक या साहित्यिक भाषा मानना उसके वास्तविक ज्ञान-विस्तार को सीमित कर देना है।
संस्कृत और प्रबंधन
आज प्रबंधन एक आधुनिक विषय माना जाता है। लेकिन जीवन और संसाधनों के प्रबंधन के सूत्र भारतीय साहित्य में बहुत पहले से उपलब्ध हैं।
अपरिग्रह को ही लें। मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कितना संग्रह करे? उसकी व्यक्तिगत आवश्यकताओं और सामाजिक दायित्वों के बीच संतुलन क्या हो? यह प्रश्न आज के आर्थिक संतुलन और सतत विकास की चर्चाओं से भी जुड़ता है।
नीति को केवल राजनीतिक नीति न समझकर जीवन के प्रबंधन के रूप में भी देखा गया है।
समय और शक्ति का समुचित प्रबंधन व्यक्ति को जीवन में सिद्धि की ओर ले जाता है।
इसलिए यदि आधुनिक प्रबंधन का विद्यार्थी संस्कृत के कुछ मूल ग्रंथों और सूत्रों से परिचित होता है, तो वह अपने विषय के साथ एक दूसरी ज्ञान-परंपरा का भी परिचय प्राप्त करता है।
संस्कृत का विद्यार्थी कौन बनेगा?
नई शिक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पक्ष यही है कि संस्कृत को केवल संस्कृत के विद्यार्थियों तक सीमित न रखा जाए।
यदि कृषि का विद्यार्थी संस्कृत को माइनर के रूप में पढ़ता है, तो उसका उद्देश्य संस्कृत को जीविका का साधन बनाना नहीं है। वह कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ, कोई प्रबंधन का विद्वान, कोई वैज्ञानिक।
लेकिन यदि उसने संस्कृत पढ़ी है, तो वह भारतीय ज्ञान-परंपरा से परिचित होगा।
संस्कृत का एक संस्कार उसके भीतर बनेगा।
जैसे घड़ा बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाती है और वह आकृति घड़े के टूटने तक बनी रहती है, उसी प्रकार विद्यार्थी जीवन में पड़ा संस्कृत का संस्कार जीवन के किसी न किसी मोड़ पर अपना प्रभाव अवश्य दिखा सकता है।
इसलिए संस्कृत पढ़ने वाले प्रत्येक विद्यार्थी का संस्कृतज्ञ बनना आवश्यक नहीं है। आवश्यक यह है कि समाज के बड़े वर्ग को संस्कृत और उसके ज्ञान-संसार से परिचित कराया जाए।
वैल्यू एडेड कोर्स और संस्कृत
वैल्यू एडेड कोर्स, जिसे पहले मूल्य-शिक्षा की दृष्टि से देखा जाता था, संस्कृत के लिए विशेष अवसर प्रदान करता है।
मानव-मूल्यों की चर्चा करनी हो तो संस्कृत साहित्य में सूक्तियों, सुभाषितों, नीति-वचनों और जीवन-दर्शन की विशाल परंपरा उपलब्ध है।
एक विद्यार्थी यदि मेजर में संस्कृत न भी ले, तो वैल्यू एडेड कोर्स या माइनर के माध्यम से संस्कृत से परिचित हो सकता है।
यह संस्कृत के लिए एक बड़ा सामाजिक विस्तार है।
शिक्षक की भूमिका अब बदलनी होगी
जब संस्कृत का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आता है, तो उसके पास पहले से संस्कृत का आधार होता है। उसके मन में श्रद्धा का भाव भी होता है—“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”
लेकिन जब प्रबंधन, विज्ञान, वाणिज्य या कृषि का विद्यार्थी संस्कृत की कक्षा में आएगा, तो उसके पास श्रद्धा के साथ तर्क-बुद्धि भी होगी।
वह पूछेगा—“ऐसा क्यों है?”
और संस्कृत के अध्यापक को उसके इस प्रश्न का स्वागत करना होगा।
अब केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि “शास्त्र में ऐसा कहा गया है।” अध्यापक को उसके प्रश्न का तर्कपूर्ण उत्तर देना होगा। उसे उदाहरण देने होंगे, आधुनिक संदर्भों से जोड़ना होगा और विद्यार्थियों की जिज्ञासा को संतुष्ट करना होगा।
यही आज संस्कृत के अध्यापक के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन, डिजिटल माध्यम, संक्षिप्त नोट्स, संदर्भ-ग्रंथ और सरल भाषा में तैयार अध्ययन-सामग्री—इन सभी माध्यमों का उपयोग करना होगा।
जिस विद्यार्थी की संस्कृत में कोई पृष्ठभूमि नहीं है, उसे सीधे किसी कठिन मूल ग्रंथ के सामने छोड़ देना उचित नहीं होगा। उसे क्रमशः उस ज्ञान-जगत् में प्रवेश कराना होगा।
रामायण को केवल कथा के रूप में क्यों पढ़ाएँ?
रामायण का नाम सुनते ही अधिकांश भारतीयों को उसकी कथा मालूम होती है। लेकिन राम क्या हैं? और राम का अयन क्या है?
राम को यदि आलंबन-विभाव माना जाए, तो राम का अयन—अर्थात् राम का मार्ग—एक दूसरी दृष्टि प्रदान करता है।
रामायण को केवल राम की कथा के रूप में नहीं, बल्कि राम के मार्ग के रूप में भी प्रस्तुत किया जा सकता है।
यदि विद्यार्थी उस मार्ग को समझ ले और अपने जीवन में उसका कुछ अंश भी अपनाए, तो उसके जीवन में परिवर्तन संभव है।
इस प्रकार संस्कृत के ग्रंथों को आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने के लिए केवल कथा बताना पर्याप्त नहीं है; उनके भीतर निहित अवधारणाओं को समझाना भी आवश्यक है।
संस्कृत और भारतीय पहचान
विदेशों में रहने वाले अनेक भारतीयों के अनुभवों में एक बात सामने आती है। वहाँ लोग केवल यह नहीं पूछते कि भारत से आया व्यक्ति डॉक्टर है, इंजीनियर है या वैज्ञानिक है। वे यह भी अपेक्षा करते हैं कि भारत से आया व्यक्ति रामायण, महाभारत और गीता के बारे में जानता होगा।
जब विदेश में कोई व्यक्ति हमसे गीता, रामायण या महाभारत के बारे में प्रश्न करता है और हम उसका उत्तर नहीं दे पाते, तो यह विचार करने का विषय है।
हमारे पास इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा है और फिर भी हम उससे परिचित नहीं हैं।
दूसरी ओर, दुनिया के अनेक लोग हमारे ग्रंथों को पढ़ रहे हैं, समझ रहे हैं और उनके बारे में प्रश्न कर रहे हैं।
इसलिए यह आवश्यक है कि हम अपनी परंपरा को केवल गौरव के रूप में न दोहराएँ, बल्कि उसे पढ़ें और समझें।
सभी शास्त्र सबको पढ़ने की आवश्यकता नहीं
इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति दर्शन, व्याकरण, मीमांसा या न्याय का विशेषज्ञ बने।
दर्शन में जिसकी रुचि है, वह दर्शन पढ़े। जिसे व्याकरण में रुचि है, वह संस्कृत-व्याकरण पढ़े।
लेकिन कुछ ग्रंथ ऐसे हैं, जिनसे प्रत्येक भारतीय को परिचित होना चाहिए।
गीता पढ़नी चाहिए।
रामायण पढ़नी चाहिए।
महाभारत के महत्वपूर्ण अंश पढ़ने चाहिए।
कालिदास की कुछ रचनाओं से परिचित होना चाहिए। जयदेव के गीतगोविंद के पदों का रस समझना चाहिए।
बड़ी-बड़ी पुस्तकों को वर्षों तक टालते रहने की आवश्यकता नहीं है। छोटे लक्ष्य बनाए जा सकते हैं।
संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति संकल्प ले कि वह रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ेगा। कोई गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ने का संकल्प ले। कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ना शुरू करे।
जीवन में कितने संस्कृत दिवस आएँगे। यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर एक छोटा-सा संकल्प लिया जाए, तो वर्षों में एक बड़ी ज्ञान-संपदा अर्जित की जा सकती है।
महाभारत : ज्ञान का विशाल प्रकाश-पुंज
महाभारत को लेकर समाज में अनेक भ्रांतियाँ हैं। एक प्रचलित धारणा यह भी है कि महाभारत घर में रखने से घर में कलह होती है। ऐसी धारणाएँ हमें इस महान ग्रंथ को पढ़ने से रोकती हैं।
महाभारत को पढ़े बिना उसके बारे में निर्णय करना उचित नहीं है।
महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, नीति है, धर्म है, मनोविज्ञान है, नेतृत्व है और मनुष्य के स्वभाव का अत्यंत सूक्ष्म अध्ययन है।
व्यास कहते हैं—
“धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभ।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत्क्वचित्॥”
अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के संदर्भ में जो यहाँ है, वह अन्यत्र भी मिल सकता है; और जो यहाँ नहीं है, वह कहीं नहीं है।
महाभारत के चरित्रों को देखें तो इसकी गहराई और स्पष्ट हो जाती है।
भीष्म और द्रोण जैसे महान योद्धाओं को केवल इस आधार पर नहीं देखा जा सकता कि युद्ध का अंतिम परिणाम किसके पक्ष में रहा। उनकी सामर्थ्य, उनकी भूमिका और उनके जीवन के नैतिक द्वंद्व अलग-अलग प्रश्न हैं।
गांधारी का चरित्र भी इसी जटिलता का उदाहरण है। एक ओर उनका पुत्र-मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर दुर्योधन को दिया गया उनका प्रसिद्ध आशीर्वचन है—
“यतो धर्मस्ततो जयः।”
उन्होंने केवल “विजयी भव” नहीं कहा। उन्होंने विजय को धर्म से जोड़ दिया—जहाँ धर्म है, वहीं विजय है।
यही कारण है कि यह वाक्य आज भी हमारे सार्वजनिक जीवन और न्याय-व्यवस्था के संदर्भों में स्मरण किया जाता है।
महाभारत को पढ़ने का अर्थ केवल कथा जानना नहीं है; मनुष्य और समाज के जटिल प्रश्नों को समझना भी है।
संस्कृत और सामाजिक उत्तरदायित्व
संस्कृत का संबंध केवल विश्वविद्यालयों से नहीं है। आज लगभग प्रत्येक विश्वविद्यालय में किसी न किसी रूप में संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन उपलब्ध है। विद्यालयों में टी.जी.टी. और पी.जी.टी. के माध्यम से संस्कृत पढ़ाई जाती है। आकाशवाणी, दूरदर्शन और विभिन्न सांस्कृतिक माध्यमों में भी संस्कृत के लिए स्थान रहा है।
कथावाचकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। समाज को दिशा देने का काम केवल शास्त्र लिखने वालों का नहीं, उन्हें लोक तक पहुँचाने वालों का भी है।
प्राचीन काल में ऋषि-महर्षि लोककल्याण की चर्चा करते थे। नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर मुनि एकत्र होकर समाज और लोक के कल्याण पर विचार करते थे।
आज कथावाचक, शिक्षक और संस्कृतज्ञ समाज के सामने इसी प्रकार की एक जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
समाज ही राष्ट्र का निर्माण करता है। इसलिए समाज को सही दिशा देने का कार्य किसी छोटी जिम्मेदारी का कार्य नहीं है।
संस्कृत और शासन-व्यवस्था
कौटिल्य का अर्थशास्त्र इसका उत्कृष्ट उदाहरण है।
राजा को मंत्री कैसे नियुक्त करना चाहिए? अधिकारियों की परीक्षा कैसे होनी चाहिए? राज्य-व्यवस्था किस प्रकार संचालित हो? प्रशासन में किस प्रकार की सावधानियाँ रखी जानी चाहिए? इन विषयों पर अर्थशास्त्र में अत्यंत सूक्ष्म विवेचन मिलता है।
दुःख की बात यह है कि हम इन ग्रंथों का गौरव तो बताते हैं, लेकिन स्वयं उन्हें पढ़ते नहीं।
फिर जब कोई दूसरा व्यक्ति हमारी ही परंपरा की किसी बात को समझाकर बताता है, तो हमें लगता है—“वाह, क्या बात है!”
अपनी परंपरा से अपरिचित रहने के लिए हमारा एक सामान्य बहाना होता है—“सब संस्कृत में है।”
लेकिन आज अधिकांश महत्वपूर्ण ग्रंथों के हिंदी और अंग्रेजी अनुवाद उपलब्ध हैं। मूल संस्कृत पढ़ने का आनंद और महत्व अपनी जगह है, लेकिन अनुवाद के माध्यम से कम-से-कम विषय-वस्तु से तो परिचित हुआ जा सकता है।
इसलिए “संस्कृत नहीं आती” को अपनी ज्ञान-परंपरा से दूर रहने का स्थायी बहाना नहीं बनाया जा सकता।
संस्कृत का भविष्य
संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत विभागों के भविष्य का प्रश्न नहीं है। यह प्रत्येक भाषा के भविष्य से जुड़ा प्रश्न है।
किसी भाषा का भविष्य उसके भाषकों और पाठकों पर निर्भर करता है। दुनिया की अनेक भाषाएँ इसलिए कमजोर या समाप्त हुईं क्योंकि उनके बोलने और पढ़ने वाले कम होते गए।
पाली और प्राकृत इसका उदाहरण हैं। एक समय वे लोक में प्रचलित थीं। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों द्वारा संस्कृत और प्राकृत के प्रयोग से भी तत्कालीन भाषिक स्थिति का संकेत मिलता है।
आज प्राकृत और पाली के बोलने वालों की संख्या सीमित है, यद्यपि उनके अध्ययन-अध्यापन के संस्थान मौजूद हैं।
भाषा को जीवित रखने के लिए केवल विभाग पर्याप्त नहीं हैं। भाषक चाहिए, पाठक चाहिए और व्यवहार चाहिए।
संस्कृत की स्थिति इस दृष्टि से आशाजनक है कि आज विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और विभिन्न संस्थाओं में संस्कृत पढ़ने वालों की संख्या बढ़ रही है। संस्कृत के प्रति लोगों की रुचि भी बढ़ रही है।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसे संस्थान विभिन्न स्थानों पर संस्कृत की कक्षाएँ चलाने और संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहे हैं।
संस्कृत और संस्कार
कई अभिभावक आज यह चाहते हैं कि उनका बच्चा आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कार भी प्राप्त करे।
उनका प्रश्न होता है—अच्छी शिक्षा तो मिल रही है, लेकिन संस्कार कहाँ से आएँगे?
यहीं संस्कृत की भूमिका सामने आती है।
संस्कृत साहित्य में केवल भाषा का ज्ञान नहीं है। उसमें विनय, धैर्य, नीति, कर्तव्य, संयम, उत्साह, लोककल्याण और जीवन-मूल्यों की विशाल परंपरा है।
इसलिए संस्कृत को केवल रोजगार के प्रश्न से देखना उसके महत्व को बहुत छोटा कर देना होगा।
संस्कृत का प्रभाव विद्यार्थी के व्यक्तित्व और दृष्टि पर भी पड़ सकता है।
भारतीय होने की पहचान
हम डॉक्टर बनें, इंजीनियर बनें, वैज्ञानिक बनें, प्रबंधक बनें, शिक्षक बनें या किसी भी क्षेत्र में जाएँ—व्यावसायिक उत्कृष्टता आवश्यक है।
लेकिन भारतीय होने की पहचान केवल हमारी तकनीकी दक्षता से नहीं होगी।
हमारी पहचान इस बात से भी बनेगी कि हम अपनी ज्ञान-परंपरा को कितना जानते हैं।
क्या हम रामायण जानते हैं?
क्या हम महाभारत जानते हैं?
क्या हमें गीता के प्रमुख विचार मालूम हैं?
क्या हमें कालिदास का साहित्य मालूम है?
क्या हम अपने शास्त्रों में निहित जीवन-दृष्टि को समझते हैं?
यदि भारत में जन्म लेने के बावजूद हम अपनी ज्ञान-परंपरा से पूरी तरह अपरिचित हैं, तो यह केवल हमारी व्यक्तिगत कमी नहीं है; यह एक बड़ी सांस्कृतिक चुनौती है।
संस्कृतज्ञों के सामने नई जिम्मेदारी
नई शिक्षा नीति ने अवसर दिया है। अब जिम्मेदारी संस्कृत के अध्यापकों और संस्कृतज्ञों की है।
हमें अपने प्रस्तुतीकरण की विधियों को बदलना होगा। हमें यह समझना होगा कि आज का विद्यार्थी केवल श्रद्धा के कारण किसी बात को स्वीकार नहीं करेगा। वह प्रश्न करेगा, तर्क करेगा और प्रमाण माँगेगा।
इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अपने विषय का गहरा ज्ञान रखने के साथ-साथ उसे आधुनिक विद्यार्थी के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।
हमें नए पाठ्यक्रम बनाने होंगे।
हमें सरल नोट्स तैयार करने होंगे।
हमें उपयोगी संदर्भ-ग्रंथ बताने होंगे।
हमें डिजिटल माध्यमों और पावरपॉइंट जैसी प्रस्तुति-पद्धतियों का उपयोग करना होगा।
हमें संस्कृत की जटिल ज्ञानराशि को सरल भाषा में समझाने की क्षमता विकसित करनी होगी।
यही वह कार्य है जिसके माध्यम से संस्कृत अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, चिकित्सा, प्रबंधन और अन्य क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक पहुँच सकती है।
संस्कृत दिवस पर एक छोटा संकल्प
संस्कृत के भविष्य की चिंता केवल सरकारों, विश्वविद्यालयों और संस्कृत विभागों के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
हर व्यक्ति अपने स्तर पर एक छोटा कदम उठा सकता है।
इस संस्कृत दिवस पर कोई व्यक्ति रघुवंश का पहला सर्ग पढ़ने का संकल्प ले सकता है।
कोई गीता का एक अध्याय पढ़ सकता है।
कोई अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ सकता है।
कोई रामायण या महाभारत का एक महत्वपूर्ण अंश पढ़ सकता है।
कोई अपने बच्चे को प्रतिदिन एक संस्कृत श्लोक सिखा सकता है।
ये छोटे-छोटे प्रयास मिलकर संस्कृत के प्रति एक बड़े सामाजिक संस्कार का निर्माण कर सकते हैं।
हमें यह भी समझना होगा कि संस्कृत को बचाने की आवश्यकता केवल इसलिए नहीं है कि वह हमारी प्राचीन भाषा है। उसे इसलिए जानना आवश्यक है क्योंकि उसके भीतर भारत की एक विशाल ज्ञान-संपदा सुरक्षित है।
निष्कर्ष : ज्ञानराशि को लोक तक पहुँचाना ही अगला लक्ष्य
भारतीय ज्ञान-परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता उसकी गतिशीलता रही है। जब केवल वैदिक शब्द-राशि से समाज तक पहुँचना कठिन हुआ, तो प्रस्तुति की नई विधियाँ आईं। नाट्यशास्त्र आया। पुराण आए। आख्यान और उपाख्यान आए। स्मृतियाँ आईं। महाकाव्य आए। बाद में संतों ने लोकभाषाओं के माध्यम से उसी ज्ञान और उन्हीं आदर्शों को जन-जन तक पहुँचाया।
आज हमारे सामने भी वही चुनौती है।
ज्ञान वही है, लेकिन माध्यम बदल गया है।
आज विज्ञान का विद्यार्थी है, प्रबंधन का विद्यार्थी है, कृषि का विद्यार्थी है, चिकित्सा का विद्यार्थी है, तकनीकी शिक्षा का विद्यार्थी है। उसके सामने संस्कृत को उसी की भाषा और उसी की बौद्धिक पृष्ठभूमि के अनुरूप प्रस्तुत करना होगा।
नई शिक्षा नीति ने यह अवसर उपलब्ध कराया है कि संस्कृत की ज्ञानराशि सभी तक पहुँचे, समान रूप से पहुँचे और पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।
अब प्रश्न यह नहीं है कि संस्कृत को बचाया कैसे जाए।
प्रश्न यह है कि संस्कृत में निहित ज्ञान को कितने बड़े समाज तक पहुँचाया जाए।
यदि संस्कृत के विद्यार्थी और अध्यापक अपने सीमित दायरे से बाहर निकलकर इस कार्य को स्वीकार करते हैं, यदि प्रत्येक भारतीय अपनी परंपरा के कुछ मूल ग्रंथों से परिचित होने का संकल्प करता है और यदि नई पीढ़ी को संस्कृत से केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान और जीवन-दृष्टि के रूप में परिचित कराया जाता है, तो संस्कृत का भविष्य केवल सुरक्षित ही नहीं होगा—उसकी ज्ञान-परंपरा नए युग में नए रूप में जीवित और सक्रिय भी रहेगी।
संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है। वह अतीत में संचित ज्ञान को वर्तमान और भविष्य से जोड़ने वाला सेतु है।





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