भारत की पहचान केवल उसकी भौगोलिक सीमाओं, तकनीकी उपलब्धियों, आर्थिक सामर्थ्य या आधुनिक शिक्षा से नहीं बनती। भारत की वास्तविक पहचान उसकी उस ज्ञान-परंपरा से बनती है, जिसने हजारों वर्षों से मनुष्य, समाज, राष्ट्र और जीवन के विविध पक्षों पर चिंतन किया है। इस ज्ञान-परंपरा का सबसे व्यापक और सशक्त माध्यम संस्कृत भाषा रही है।
आज नई शिक्षा नीति के माध्यम से संस्कृत के लिए एक नया अवसर उपस्थित हुआ है। संस्कृत अब केवल संस्कृत विभाग के विद्यार्थियों तक सीमित रहने वाली भाषा नहीं रहनी चाहिए। विज्ञान, वाणिज्य, कला, सामाजिक विज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा और अन्य सभी विषयों के विद्यार्थियों तक संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि पहुँचाना समय की आवश्यकता है।
यह केवल संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय ज्ञान-परंपरा को उसके मूल स्रोतों से जोड़ने का प्रश्न है।
संस्कृत : केवल एक भाषा नहीं, एक विशाल ज्ञान-परंपरा
हमारे यहाँ चौदह विद्या-स्थान माने गए हैं—वेद, वेदांग, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र, पुराण आदि। इनके अतिरिक्त आयुर्वेद, धनुर्वेद, गंधर्ववेद और अर्थशास्त्र जैसे विषयों को भी व्यापक ज्ञान-परंपरा का हिस्सा माना गया। इसके बाद चौंसठ कलाओं की परंपरा है, जिन्हें उपविद्याओं के रूप में देखा गया।
इन सबका विशाल वाङ्मय संस्कृत भाषा में उपलब्ध है।
आज इनमें से अनेक विषय अलग-अलग आधुनिक विभागों में पढ़ाए जा रहे हैं। समाजशास्त्र, राजनीति, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, प्रबंधन, चिकित्सा, कला और अनेक अन्य क्षेत्रों में आधुनिक अध्ययन हो रहा है। किंतु एक बड़ी समस्या यह है कि इन विषयों के अध्ययन में संस्कृत में उपलब्ध उनके मूल स्रोतों से हमारा संपर्क लगातार कम होता गया है।
नई शिक्षा नीति इस दूरी को कम करने का अवसर देती है। संस्कृत में निहित इन विषयों के सूत्रों को आधुनिक विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि प्रत्येक विद्यार्थी संस्कृत का व्याकरणाचार्य बन जाए। आवश्यकता यह है कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुसार संस्कृत में निहित ज्ञान से परिचित हो।
नई शिक्षा नीति : संस्कृत के लिए खुलते हुए नए द्वार
पहले संस्कृत का अध्ययन मुख्यतः उन्हीं विद्यार्थियों तक सीमित रहता था, जिन्होंने संस्कृत को अपने मुख्य विषय के रूप में चुना हो। नई शिक्षा नीति ने इस स्थिति को व्यापक रूप से बदलने का अवसर दिया है।
अब संस्कृत को माइनर विषय, वैल्यू एडेड कोर्स, स्किल एनहांसमेंट कोर्स और मल्टीडिसिप्लिनरी कोर्स जैसे विभिन्न माध्यमों से दूसरे विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में इन माध्यमों से विज्ञान, वाणिज्य, कला और सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थी भी संस्कृत से जुड़ रहे हैं।
कल्पना कीजिए—कृषि का कोई विद्यार्थी संस्कृत को माइनर विषय के रूप में पढ़ रहा है। वह संस्कृत पढ़कर जीविका नहीं कमाने वाला है। वह भविष्य में कृषि वैज्ञानिक बनेगा। कोई दूसरा विद्यार्थी मनोचिकित्सक बनेगा, कोई प्रबंधक, कोई वैज्ञानिक, कोई राजनीतिक विशेषज्ञ और कोई इंजीनियर।
लेकिन यदि इन सबके अध्ययन-क्रम में संस्कृत का थोड़ा-सा भी प्रवेश होता है, तो वे भारतीय ज्ञान-परंपरा के एक विशाल संसार से परिचित हो सकते हैं।
यही नई शिक्षा नीति की एक बड़ी विशेषता है।
संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों से नहीं बनेगा। उसका भविष्य तब बनेगा जब दूसरे विषयों के विद्यार्थी भी उससे परिचित होंगे।
तीन लक्ष्य : सभी तक, समान रूप से और पूर्ण गुणवत्ता के साथ
संस्कृत में निहित ज्ञान-राशि को समाज तक पहुँचाने के तीन प्रमुख लक्ष्य होने चाहिए—
पहला—यह ज्ञान सभी तक पहुँचे।
दूसरा—समान रूप से पहुँचे।
तीसरा—पूर्ण गुणवत्ता के साथ पहुँचे।
आज ज्ञान प्राप्त करने के रास्ते पहले की तरह सीमित नहीं हैं। किसी समय संस्कृत या उसके कुछ ग्रंथों को लेकर सामाजिक और स्थानगत प्रतिबंधों की चर्चा होती थी। आज ज्ञान के द्वार कहीं अधिक खुले हैं। आज कोई भी व्यक्ति वेद, उपनिषद्, गीता, रामायण, महाभारत और अन्य ग्रंथों के अध्ययन की ओर बढ़ सकता है।
इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि ज्ञान उपलब्ध है या नहीं। प्रश्न यह है कि हम उस ज्ञान को कितनी प्रभावी और आधुनिक विधियों से विद्यार्थियों तक पहुँचा पा रहे हैं।
संस्कृत के शिक्षकों के सामने नई चुनौती
संस्कृत के विद्यार्थी के सामने संस्कृत का शिक्षक जाता है तो सामान्यतः एक साझा पृष्ठभूमि पहले से मौजूद होती है। विद्यार्थी संस्कृत की भूमिका, उसकी परंपरा और उसके शास्त्रीय संदर्भों से परिचित होता है। उसमें गुरु के प्रति श्रद्धा का भाव भी रहता है—
“श्रद्धावान् लभते ज्ञानम्।”
लेकिन यदि वही शिक्षक प्रबंधन, विज्ञान या वाणिज्य के विद्यार्थी के सामने जाए, तो स्थिति अलग होगी।
वह विद्यार्थी श्रद्धा के साथ आया है, तभी उसने संस्कृत चुनी है; लेकिन उसके भीतर तर्क-बुद्धि भी है। वह पूछेगा—“ऐसा क्यों?” “यह इस प्रकार क्यों है?” “इसका प्रमाण क्या है?”
इसलिए संस्कृत के अध्यापक को अब केवल विषय का ज्ञान होना पर्याप्त नहीं है। उसे अपने विषय को दूसरे विषय के विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करने की कला भी सीखनी होगी।
उसे तर्क देने होंगे, उदाहरण देने होंगे, प्रस्तुतियाँ तैयार करनी होंगी और आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा। पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन जैसे माध्यमों का प्रयोग करना होगा। जिन विद्यार्थियों की संस्कृत में पृष्ठभूमि नहीं है, उनके लिए सरल और संक्षिप्त नोट्स तैयार करने होंगे। उपयोगी संदर्भ-ग्रंथों की जानकारी देनी होगी।
अर्थात् अब चुनौती केवल “क्या पढ़ाना है” की नहीं है; चुनौती यह भी है कि “कैसे पढ़ाना है”।
रामायण को केवल कथा नहीं, जीवन-पथ के रूप में पढ़ना
अभी रामायण का उदाहरण लें।
अधिकांश भारतीयों को यह मालूम है कि रामायण में कितने कांड हैं, उसकी कथा क्या है और राम कौन हैं। लेकिन प्रश्न यह है कि राम क्या है और राम का अयन क्या है?
यदि हम राम को आलंबन-विभाव मानें, तो राम का अयन—अर्थात् उनका मार्ग—उद्दीपन-विभाव के रूप में देखा जा सकता है।
‘अयन’ का अर्थ है—मार्ग।
इस दृष्टि से रामायण में केवल राम की कथा नहीं, बल्कि राम के मार्ग की प्रतिष्ठा है। राम का मार्ग यदि हम अपने जीवन में अपनाते हैं, तो हमारा जीवन भी सफल हो सकता है।
यदि कोई विद्यार्थी रामायण के प्रति पहले से श्रद्धावान नहीं है, तब भी यदि हम उसे रामायण को इस दृष्टि से समझाएँ कि इसमें एक जीवन-पथ प्रस्तुत किया गया है, तो उसमें उसे पढ़ने की उत्सुकता उत्पन्न हो सकती है।
और संभव है कि वह पूरी रामायण न पढ़े, लेकिन उसके जीवन में उससे कोई सकारात्मक परिवर्तन अवश्य आए।
यही संस्कृत को नए विद्यार्थियों तक पहुँचाने का उद्देश्य होना चाहिए।
धर्म और संप्रदाय : एक महत्वपूर्ण अंतर
संस्कृत परंपरा के संबंध में एक सामान्य भ्रम यह है कि धर्म का अर्थ संप्रदाय या किसी विशेष पूजा-पद्धति से है। वास्तव में धर्म और संप्रदाय में अंतर है।
संप्रदाय एक विशेष पूजा-पद्धति, परंपरा या अनुशासन हो सकता है। लेकिन धर्म उससे व्यापक है।
धर्म को एक सार्वभौमिक तत्व के रूप में देखा गया है—ऐसा तत्व जिसके बिना किसी व्यवस्था का अस्तित्व और उसका संतुलन संभव नहीं।
महर्षि पतंजलि की परंपरा में धर्म के व्यावहारिक आधार के रूप में यम और नियम का उल्लेख मिलता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह यम हैं; शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान नियम हैं।
ये किसी एक संप्रदाय तक सीमित मूल्य नहीं हैं। सत्य, अहिंसा, संयम, संतोष और आत्म-अनुशासन जैसे मूल्य किसी भी स्वस्थ समाज के लिए आवश्यक हैं।
इसीलिए संस्कृत के माध्यम से धर्म को समझाने का अर्थ किसी विशेष संप्रदाय का प्रचार करना नहीं, बल्कि उन सार्वभौमिक जीवन-मूल्यों को समझना है जो मनुष्य और समाज के संतुलन के लिए आवश्यक हैं।
मनुष्य के अस्तित्व की तीन शक्तियाँ
मनुष्य के अस्तित्व और उसके समुचित विकास के लिए तीन प्रकार की शक्तियाँ आवश्यक हैं—
शारीरिक शक्ति, मानसिक शक्ति और बौद्धिक शक्ति।
योग शारीरिक शक्ति को संतुलित और समर्थ बनाने में सहायता करता है। उपासना, ध्यान और अनुशासन मानसिक शक्ति को विकसित करते हैं। ज्ञान और शास्त्र-अध्ययन बौद्धिक शक्ति को प्रखर बनाते हैं।
पतंजलि का प्रसिद्ध सूत्र है—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
योग केवल शरीर को स्वस्थ रखने की पद्धति नहीं है। वह चित्त के अनुशासन से जुड़ा हुआ है।
इस प्रकार योग शरीर और मन दोनों के संतुलन का मार्ग प्रस्तुत करता है, जबकि ज्ञान बौद्धिक शक्ति को विकसित करता है।
मनुष्य के समग्र विकास के लिए इन तीनों शक्तियों का संतुलन आवश्यक है।
और इन तीनों के विकास से संबंधित विशाल ज्ञान-परंपरा संस्कृत में उपलब्ध है।
योग और आयुर्वेद : समग्र मनुष्य की चिंता
महर्षि पतंजलि के संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक है—
“योगेन चित्तस्य पदेन वाचां
मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
योऽपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां
पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोऽस्मि॥”
यह परंपरा चित्त, वाणी और शरीर—तीनों के शोधन की ओर संकेत करती है।
आयुर्वेद भी मनुष्य को केवल रोगों के समूह के रूप में नहीं देखता। उसका उद्देश्य स्वास्थ्य की रक्षा और रोग की स्थिति में उसके निवारण से जुड़ा है—
“स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम्।”
आज जब आधुनिक शिक्षा में स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और समग्र जीवन-शैली पर चर्चा बढ़ रही है, तब संस्कृत के मूल ग्रंथों में उपलब्ध इस ज्ञान से विद्यार्थियों को परिचित कराना अत्यंत उपयोगी हो सकता है।
संस्कृत और मनोविज्ञान : भावों का सूक्ष्म संसार
यदि आधुनिक मनोविज्ञान की बात करें, तो संस्कृत साहित्य और नाट्यशास्त्र में मानवीय भावों का अत्यंत सूक्ष्म विश्लेषण मिलता है।
आचार्य भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में भावों और उनके परस्पर संबंधों का विस्तृत विवेचन है। परंपरागत रूप से आठ स्थायी भाव, आठ सात्त्विक भाव और तैंतीस संचारी भावों की चर्चा की जाती है।
अर्थात् कुल 49 भावों का यह वर्गीकरण मानवीय मन और उसकी अभिव्यक्तियों को समझने का अत्यंत सूक्ष्म ढाँचा प्रस्तुत करता है।
विभाव, अनुभाव, संचारी भाव, सात्त्विक भाव और स्थायी भाव—इन सबके माध्यम से मनुष्य की भावात्मक दुनिया को समझने का प्रयास किया गया है।
आज जिस Emotional Intelligence की चर्चा प्रबंधन और मनोविज्ञान में होती है, उसके संदर्भ में नाट्यशास्त्र की यह परंपरा विद्यार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी हो सकती है।
इसलिए संस्कृत को केवल प्राचीन साहित्य की भाषा समझना उसके विशाल ज्ञान-संसार को सीमित कर देना होगा।
कौटिल्य का अर्थशास्त्र और ‘मनुष्यवती भूमि’
प्रबंधन और राजनीति की बात करें तो आचार्य कौटिल्य का अर्थशास्त्र हमारे सामने एक विशाल ज्ञान-संसार खोलता है।
कौटिल्य के यहाँ अर्थ केवल धन-संपत्ति का नाम नहीं है। राष्ट्र को समझने के लिए वे “मनुष्यवती भूमि” की अवधारणा सामने रखते हैं—मनुष्यों से युक्त भूमि।
पर्वत, नदियाँ, वन और भूभाग राष्ट्र के भौतिक आधार हो सकते हैं, लेकिन उनका उपयोग कौन करता है? मनुष्य।
मनुष्य में विवेक है, औचित्य और अनौचित्य को समझने की क्षमता है। इसलिए मनुष्य का निर्माण ही राष्ट्र-निर्माण का आधार बनता है।
इसीलिए राष्ट्र का वास्तविक सामर्थ्य उसके भूभाग से उतना नहीं, जितना उसके मनुष्यों की गुणवत्ता से निर्धारित होता है।
नेतृत्व के संस्कृत सूत्र
संस्कृत साहित्य में नेतृत्व के गुणों का भी सूक्ष्म विवेचन मिलता है।
एक श्लोक में कहा गया है—
“विनीतो मधुरः त्यागी दक्षः प्रियवाक् तथा।
लोकवेदविदुत्साही स्मृतिप्रज्ञाकलान्वितः॥”
नेता कैसा हो?
वह विनीत हो। लेकिन विनय का अर्थ डरपोक होना नहीं है। विनय का अर्थ है—औचित्य की रक्षा करते हुए समय और परिस्थिति के अनुरूप व्यवहार करना।
वह मधुर हो—उसकी वाणी संतुलित हो।
वह त्यागी हो—पद और अधिकार को केवल अपने सुख के लिए न उपयोग करे।
वह दक्ष हो—अपने कार्य में निपुण हो।
वह प्रियवाक् हो—उसकी भाषा समाज को जोड़ने वाली हो।
इसी संदर्भ में हमारी परंपरा कहती है—
“सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्।
न ब्रूयात् सत्यमप्रियम्॥”
ये केवल नैतिक उपदेश नहीं हैं। ये नेतृत्व और सामाजिक व्यवहार के व्यावहारिक सूत्र भी हैं।
धर्म का एक महत्वपूर्ण लक्षण धैर्य माना गया है। धैर्य के बिना नेतृत्व संभव नहीं।
और प्रसिद्ध पंक्ति है—
“विद्या ददाति विनयम्,
विनयाद् याति पात्रताम्।
पात्रत्वाद् धनमाप्नोति,
धनाद् धर्मं ततः सुखम्॥”
यह केवल श्लोक नहीं, जीवन की एक क्रमबद्ध दृष्टि है—विद्या से विनय, विनय से पात्रता, पात्रता से संपदा, संपदा से धर्म और धर्म से सुख।
भारतीय ज्ञान-परंपरा जड़ नहीं, निरंतर विकसित होने वाली परंपरा है
भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता यह है कि वह समय के अनुसार अपनी प्रस्तुति बदलती रही है।
हम वेद से वेदांगों तक गए, वेदांगों से मीमांसा और न्याय तक पहुँचे, धर्मशास्त्र और पुराणों तक आए। मूल सिद्धांत और आदर्श बने रहे, लेकिन समाज तक उन्हें पहुँचाने की विधियाँ बदलती रहीं।
जब केवल वैदिक शब्द-राशि के माध्यम से समाज को पर्याप्त रूप से संबोधित करना कठिन लगा, तब प्रस्तुति की नई विधियाँ विकसित हुईं।
नाट्यशास्त्र इसी प्रक्रिया का एक बड़ा उदाहरण है।
नाट्य का एक उद्देश्य लोकानुरंजन भी था—लोक तक बात किस प्रकार पहुँचाई जाए, यह भी महत्वपूर्ण था।
हमारी परंपरा के शास्त्र केवल एकांत में बैठे ऋषियों की कल्पना का परिणाम नहीं थे। ऋषि-मुनि समाज के बीच जाते थे, लोगों से मिलते थे, उनकी समस्याएँ सुनते थे, उनके साथ संवाद करते थे और जीवन का निरीक्षण करते थे।
चातुर्मास के समय नैमिषारण्य जैसे स्थानों पर विचार-विमर्श की परंपरा रही। इस संवाद और चिंतन के माध्यम से जीवन की समस्याओं के शास्त्रीय समाधान खोजे गए।
इस दृष्टि से शास्त्र किसी एक व्यक्ति की मनमानी स्थापना नहीं, बल्कि संवाद, तर्क और परीक्षण की दीर्घ परंपरा का परिणाम समझे जा सकते हैं।
तत्त्वमीमांसा से व्यवहारमीमांसा तक
संस्कृत की ज्ञान-परंपरा को तीन स्तरों में समझना उपयोगी है—
1. तत्त्वमीमांसा
इसमें लोक और अस्तित्व का अध्ययन किया जाता है। द्रव्य, गुण, सामान्य, विशेष, समवाय आदि के माध्यम से जगत के स्वरूप को समझने का प्रयास किया गया।
2. प्रमाणमीमांसा
हमने जो अनुभव किया, उसे सही कैसे मानें? उसके प्रमाण क्या हैं? उसका परीक्षण कैसे हो? प्रमाणमीमांसा इसी प्रश्न से जुड़ी है।
3. व्यवहारमीमांसा
ज्ञान केवल ग्रंथों में बंद नहीं रहता। उसे जीवन और समाज तक ले जाना आवश्यक है।
इसी व्यवहार की दृष्टि से वाल्मीकि रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथ अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। ये केवल कथाएँ नहीं, बल्कि जीवन, समाज, कर्तव्य, नेतृत्व, नीति और मानवीय संबंधों के विशाल ग्रंथ हैं।
वेद से पुराण और संत साहित्य तक : ज्ञान का लोकाभिमुखीकरण
समय के अनुसार ज्ञान को लोक तक पहुँचाने के लिए स्मृतियाँ रची गईं, इतिहास की परंपरा विकसित हुई और पुराणों की रचना हुई।
पुराणों में आख्यान और उपाख्यानों के माध्यम से जटिल सिद्धांतों को लोक के लिए सरल बनाया गया।
एक छोटा-सा श्लोक जीवन के अनेक सूत्रों को सामने रखता है—
“किं बीजं शस्यं धर्मः?
स किम् भूषणं यशः?
कोषस्य बन्धुः कः? उत्साहः।
सिद्धेः किं साधनम्? नयः।”
अर्थात् कल्याण का मार्ग धर्म है। सज्जन व्यक्ति का आभूषण यश है। लक्ष्मी का बंधु उत्साह है और सिद्धि का साधन नीति है।
नीति को यदि जीवन-प्रबंधन के रूप में देखें, तो समय और शक्ति का उचित प्रबंधन सफलता का आधार बनता है।
एक छोटे-से श्लोक में जीवन का इतना व्यापक दर्शन समाहित हो जाना संस्कृत साहित्य की विशेषता है।
इसके बाद कालिदास, भास, अश्वघोष, माघ, भारवि और श्रीहर्ष जैसे महाकवियों ने उन्हीं आदर्शों को साहित्य के विभिन्न रूपों में आगे बढ़ाया।
संकट के समय लोकभाषाओं में पहुँचा भारतीय ज्ञान
चौदहवीं से सत्रहवीं शताब्दी तक भारत ने अत्यंत विषम परिस्थितियों का सामना किया। इस काल में संत परंपरा ने समाज के भीतर एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना की। संत रविदास, सूरदास और कबीरदास जैसे संतों ने भी लोकभाषाओं में अपने विचारों को व्यक्त किया।
यहाँ संस्कृत के आदर्श समाप्त नहीं हुए; उनकी प्रस्तुति की भाषा बदल गई।
ज्ञान यदि लोक तक नहीं पहुँचे, तो वह समाज की शक्ति नहीं बन सकता। इसलिए संत साहित्य ने लोकभाषाओं के माध्यम से भारतीय जीवन-मूल्यों, राम-कृष्ण, भक्ति, नीति और आध्यात्मिक दृष्टि को सामान्य व्यक्ति तक पहुँचाया।
इसका परिणाम यह हुआ कि सामान्य व्यक्ति अपने प्राचीन ग्रंथों, आदर्शों और सांस्कृतिक मूल से जुड़ा रहा।
यही भारतीय ज्ञान-परंपरा की एक बड़ी विशेषता है—सिद्धांतों को बचाए रखते हुए उनकी प्रस्तुति को समयानुकूल बनाना।
आज इसी दृष्टि को हम आधुनिक भाषा में Indian Knowledge System कह सकते हैं।
संस्कृत और भारतीय पहचान
भारतीय होने की पहचान केवल इस बात से नहीं हो सकती कि हम डॉक्टर हैं, इंजीनियर हैं, वैज्ञानिक हैं, प्रबंधक हैं या तकनीकी विशेषज्ञ हैं।
ये सभी उपलब्धियाँ महत्वपूर्ण हैं, लेकिन एक भारतीय की सांस्कृतिक पहचान का एक प्रश्न यह भी है—
क्या हम अपने शास्त्रों को जानते हैं?
क्या हम रामायण को जानते हैं?
क्या हम महाभारत को जानते हैं?
क्या हम गीता को जानते हैं?
महाभारत में विदुरनीति जैसी नीति-परंपरा है और भीष्मपर्व में श्रीमद्भगवद्गीता है। विदुरनीति को लोक-जीवन के लिए नीति का एक महत्त्वपूर्ण उपदेश माना जा सकता है।
श्रीमद्भगवद्गीता की व्यापकता तो सर्वविदित है। अनेक परंपराओं और देशों के लोगों ने उसके विचारों में रुचि ली है।
हम उसे मूल संस्कृत में पढ़ें, यह सबसे अच्छा है; लेकिन यदि कोई व्यक्ति अनुवाद के माध्यम से पढ़ता है, तब भी कम-से-कम उसकी विषय-वस्तु से परिचित होना आवश्यक है।
महाभारत : ज्ञान का विराट प्रकाश-पुंज
महाभारत के बारे में एक विचित्र धारणा समाज में फैली हुई है कि घर में महाभारत रखने से घर में कलह होती है।
यह धारणा महाभारत को पढ़ने से रोकती है, जबकि महाभारत स्वयं जीवन के अत्यंत जटिल प्रश्नों का सामना करने वाला ग्रंथ है।
महाभारत में केवल युद्ध नहीं है। उसमें राजनीति है, अर्थशास्त्र है, धर्म है, मनोविज्ञान है, परिवार है, नेतृत्व है, नैतिक संकट है और मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष हैं।
गांधारी का चरित्र इसका एक उदाहरण है। एक ओर पुत्र के प्रति उसका मोह दिखाई देता है, दूसरी ओर वही गांधारी दुर्योधन को धर्म की विजय का आशीर्वाद देती है।
महाभारत के प्रसंगों में मनुष्य की जटिलता इसी प्रकार दिखाई देती है।
इसलिए महाभारत को पढ़ना केवल कथा जानना नहीं है; यह मनुष्य और समाज को समझने का एक अवसर है।
संस्कृत और आधुनिक विषय : कोई क्षेत्र अछूता नहीं
यदि हम आधुनिक विषयों को देखें तो शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र हो जिसके लिए संस्कृत में कोई न कोई महत्वपूर्ण ज्ञान-स्रोत न मिलता हो।
योग, आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, राजनीति, नाट्य, काव्य, व्याकरण, दर्शन, गणित, ज्योतिष और अनेक कलाओं की समृद्ध परंपराएँ संस्कृत में उपलब्ध हैं।
आयुर्वेद के विद्यार्थी संस्कृत की ओर इसलिए आते हैं क्योंकि उसके अनेक मूल ग्रंथ संस्कृत में हैं।
देश के अनेक विश्वविद्यालयों में संस्कृत विभाग हैं। शिक्षा, शोध, अध्यापन, मीडिया, आकाशवाणी, दूरदर्शन, प्रशासन और अनेक क्षेत्रों में संस्कृत से जुड़े अवसर मौजूद हैं।
संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों ने विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में भी सफलता प्राप्त की है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि संस्कृत का संबंध केवल रोजगार से नहीं है। उसका संबंध उस ज्ञान से है जो विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय बौद्धिक परंपरा को समझने में सहायता करता है।
संस्कृत का भविष्य उसके विद्यार्थियों पर निर्भर है
किसी भी भाषा का भविष्य उसके बोलने, पढ़ने और सीखने वालों की संख्या पर निर्भर करता है।
इतिहास में अनेक भाषाएँ ऐसी रही हैं जिनका कभी व्यापक लोक-प्रयोग था, लेकिन बाद में उनके बोलने वालों की संख्या घटती गई।
पाली और प्राकृत का उदाहरण सामने है। संस्कृत नाटकों में विभिन्न पात्रों और सामाजिक समूहों के लिए अलग-अलग भाषिक रूपों का प्रयोग मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय समाज में बहुभाषिकता की समृद्ध परंपरा थी।
आज यदि किसी भाषा के अध्ययन-अध्यापन की व्यवस्था तो हो, लेकिन उसके वास्तविक भाषक लगातार कम होते जाएँ, तो उसके भविष्य की चिंता स्वाभाविक है।
संस्कृत के संदर्भ में स्थिति आशाजनक है, क्योंकि आज भी उसके अध्ययन के लिए संस्थाएँ हैं, विद्यालय हैं, विश्वविद्यालय हैं और अनेक संगठन कार्य कर रहे हैं।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान जैसी संस्थाएँ संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रही हैं। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में विद्यार्थी संस्कृत को विषय के रूप में चुन रहे हैं।
नई शिक्षा नीति ने इस आधार को और व्यापक करने का अवसर दिया है।
संस्कृत और मूल्य शिक्षा
नई शिक्षा नीति के अंतर्गत Value Added Course या मूल्यवर्धित पाठ्यक्रम के माध्यम से भी संस्कृत को विद्यार्थियों तक पहुँचाया जा सकता है।
मानव-मूल्यों की शिक्षा के लिए संस्कृत से बेहतर स्रोतों में से एक क्या हो सकता है?
संस्कृत साहित्य सूक्तियों, सुभाषितों और नीति-वचनों से भरा हुआ है।
किसी विद्यार्थी का मुख्य विषय कृषि हो सकता है, विज्ञान हो सकता है, प्रबंधन हो सकता है या चिकित्सा। फिर भी यदि वह अपने अध्ययन-काल में संस्कृत के कुछ ग्रंथों और विचारों से परिचित होता है, तो उसके भीतर एक सांस्कृतिक संस्कार विकसित हो सकता है।
संस्कार कभी-कभी बहुत धीरे-धीरे काम करता है।
जैसे किसी घड़े को बनाते समय उस पर कोई आकृति अंकित कर दी जाए, तो घड़ा टूटने तक वह आकृति उसके साथ रहती है; उसी प्रकार विद्यार्थी-जीवन में पड़ा संस्कार भी लंबे समय तक उसके व्यक्तित्व के साथ रह सकता है।
आज संस्कृत का विद्यार्थी भले ही आगे चलकर किसी अन्य क्षेत्र में चला जाए, लेकिन वह उस क्षेत्र में भी भारतीय ज्ञान-परंपरा के लिए कुछ कर सकता है।
एक भारतीय के रूप में हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी
विदेश जाने वाले अनेक भारतीयों का अनुभव है कि वहाँ लोग उनसे केवल यह नहीं पूछते कि वे डॉक्टर हैं या इंजीनियर अथवा वैज्ञानिक।
वे पूछते हैं—
रामायण जानते हैं?
महाभारत जानते हैं?
गीता पढ़ी है?
और तब एक विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है। हम भारत की आधुनिक उपलब्धियों के प्रतिनिधि बनकर विदेश जाते हैं, लेकिन जब हमारी अपनी परंपरा के मूल ग्रंथों के बारे में प्रश्न होता है, तो हमारे पास उत्तर नहीं होता।
यह स्थिति हमें सोचने के लिए बाध्य करती है।
यदि इतनी बड़ी ज्ञान-संपदा हमारे पास है और हम ही उससे परिचित नहीं हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है?
हम स्वयं।
इसलिए संस्कृत दिवस जैसे अवसर केवल समारोह के लिए नहीं होने चाहिए। उन्हें व्यक्तिगत संकल्प का अवसर बनाना चाहिए।
कोई व्यक्ति संकल्प ले सकता है—
इस वर्ष मैं रघुवंश का प्रथम सर्ग पढ़ूँगा।
या—
मैं श्रीमद्भगवद्गीता का बारहवाँ अध्याय पढ़ूँगा।
या—
मैं कालिदास का अभिज्ञानशाकुन्तलम् पढ़ूँगा।
या—
मैं महाभारत के कुछ महत्वपूर्ण प्रसंग पढ़ूँगा।
यदि प्रत्येक संस्कृत दिवस पर हम एक छोटा-सा संकल्प लें और उसे पूरा करें, तो कुछ वर्षों में हमारे पास संस्कृत और भारतीय ज्ञान-परंपरा का एक बड़ा व्यक्तिगत संसार तैयार हो सकता है।
और यदि हम अपने बच्चों को भी उसमें सहभागी बनाएँ, तो यह परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुँच सकती है।
संस्कृत : केवल संस्कृत विभाग की जिम्मेदारी नहीं
संस्कृत को बचाने और आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी केवल संस्कृत के विद्यार्थियों या अध्यापकों की नहीं है।
यह उन सभी भारतीयों की जिम्मेदारी है जो अपनी बौद्धिक और सांस्कृतिक जड़ों को समझना चाहते हैं।
लेकिन संस्कृत के अध्यापकों की जिम्मेदारी निश्चित रूप से अधिक है, क्योंकि अब उनके सामने अवसर भी बड़ा है।
उन्हें अपने सीमित दायरे से बाहर निकलना होगा।
उन्हें विज्ञान के विद्यार्थी से विज्ञान की भाषा में संवाद करना होगा। प्रबंधन के विद्यार्थी को प्रबंधन से संबंधित उदाहरण देने होंगे। मनोविज्ञान के विद्यार्थी को भाव और मन के संदर्भ में संस्कृत की सामग्री समझानी होगी।
उन्हें यह सिद्ध करना होगा कि संस्कृत केवल अतीत की भाषा नहीं है; वह वर्तमान के प्रश्नों से भी संवाद कर सकती है।
ज्ञान को फिर से अपने मूल से जोड़ने की आवश्यकता
आधुनिक शिक्षा के विकास के दौरान भारत में अनेक पाश्चात्य सिद्धांतों का प्रभाव बढ़ा। परिणामस्वरूप शिक्षा के अनेक क्षेत्रों में भारतीय स्रोतों का अध्ययन कम होता गया।
इस स्थिति में सबसे बड़ी चुनौती यह नहीं है कि हम आधुनिक ज्ञान को छोड़ दें। ऐसा करना न तो आवश्यक है और न ही उचित।
चुनौती यह है कि आधुनिक ज्ञान के साथ अपने मूल ज्ञान-स्रोतों को भी पढ़ा जाए।
यदि प्रबंधन पढ़ रहे हैं तो कौटिल्य को भी पढ़ें।
यदि मनोविज्ञान पढ़ रहे हैं तो नाट्यशास्त्र और भारतीय मनोवैज्ञानिक परंपराओं को भी देखें।
यदि चिकित्सा पढ़ रहे हैं तो आयुर्वेद के मूल ग्रंथों से परिचित हों।
यदि नेतृत्व पढ़ रहे हैं तो गीता, महाभारत और नीति-साहित्य के सूत्रों को भी देखें।
यदि साहित्य पढ़ रहे हैं तो कालिदास, भास, भवभूति, माघ, भारवि और श्रीहर्ष को जानें।
अर्थात् आधुनिकता और परंपरा को परस्पर विरोधी मानने के बजाय दोनों के बीच संवाद स्थापित किया जाए।
आज इन पंक्तियों को केवल संस्कृत-प्रचार के नारे के रूप में नहीं, बल्कि विज्ञान, तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन की आवश्यकता के रूप में भी पढ़ा जा सकता है।
निष्कर्ष : संस्कृत की ‘सुगंध’ हर विद्यार्थी तक पहुँचे
नई शिक्षा नीति ने संस्कृत के सामने एक अभूतपूर्व अवसर रखा है।
अब संस्कृत को केवल संस्कृत पढ़ने वाले विद्यार्थियों के बीच सीमित रखने की आवश्यकता नहीं है। वह विज्ञान के विद्यार्थी तक जा सकती है, वाणिज्य के विद्यार्थी तक जा सकती है, प्रबंधन के विद्यार्थी तक जा सकती है, चिकित्सा के विद्यार्थी तक जा सकती है और कला तथा सामाजिक विज्ञान के विद्यार्थियों तक भी पहुँच सकती है।
लेकिन इसके लिए केवल पाठ्यक्रम बनाना पर्याप्त नहीं होगा।
हमें अपनी प्रस्तुति की विधि बदलनी होगी।
हमें सरल भाषा अपनानी होगी।
हमें तर्क देना होगा।
हमें उदाहरण देने होंगे।
हमें आधुनिक तकनीक का उपयोग करना होगा।
हमें छोटे-छोटे नोट्स और उपयोगी संदर्भ उपलब्ध कराने होंगे।
हमें विद्यार्थियों के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए स्वयं भी लगातार अध्ययन करना होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात—हमें संस्कृत को केवल भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान की एक विशाल परंपरा के रूप में प्रस्तुत करना होगा।
भारत का भविष्य केवल इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हमारे कितने डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या प्रबंधक हैं। यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि इन सबके भीतर अपने समाज, संस्कृति और ज्ञान-परंपरा के प्रति कितनी समझ और संवेदना है।
इसलिए आज आवश्यकता है कि हम अपने भीतर एक छोटा-सा संकल्प जगाएँ।
रामायण पढ़ेंगे।
महाभारत पढ़ेंगे।
गीता पढ़ेंगे।
कालिदास को पढ़ेंगे।
पतंजलि को जानेंगे।
कौटिल्य को समझेंगे।
और अपनी अगली पीढ़ी को भी इस ज्ञान-परंपरा से परिचित कराएँगे।
क्योंकि संस्कृत का भविष्य केवल संस्कृत के विद्यार्थियों के हाथ में नहीं है। यह उस प्रत्येक व्यक्ति के हाथ में है जो भारत की पहचान को केवल वर्तमान की उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसकी दीर्घ बौद्धिक परंपरा में भी देखता है।
हम आधुनिक बनें, वैज्ञानिक बनें, तकनीकी रूप से समर्थ बनें, विश्व के श्रेष्ठतम संस्थानों में जाएँ—लेकिन अपनी जड़ों को भूलकर नहीं।
भारत की वास्तविक शक्ति केवल उसकी तकनीक में नहीं, उसकी प्रज्ञा और परंपरा में भी निहित है।
नई शिक्षा नीति के माध्यम से यदि संस्कृत में निहित इस ज्ञान-राशि की ‘सुगंध’ प्रत्येक विद्यार्थी तक पहुँचती है, तो यह केवल संस्कृत का प्रचार नहीं होगा।
यह भारतीय ज्ञान-परंपरा की पुनः प्रतिष्ठा होगी।
और शायद यही इस समय संस्कृत के सामने उपस्थित सबसे बड़ा अवसर भी है और सबसे बड़ा दायित्व भी।





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