मैंने इस लेख में स्कूल से उच्च शिक्षा तक के संक्रमण, विषय-चयन, रोजगार, शिक्षा के उद्देश्य और संस्कृत की वर्तमान स्थिति—इन सभी कोणों से देखा है। उपलब्ध नवीनतम सरकारी आँकड़ों के आधार पर कुछ बातें बहुत महत्वपूर्ण निकलती हैं।
सबसे पहले एक गलत प्रश्न को हटाना होगा
“छात्र संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते”—क्या यह अपने-आप में कोई तथ्य है?
यह वाक्य संस्कृत-जगत में बहुत प्रचलित है—
“आज के विद्यार्थी संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते।”
लेकिन यह वाक्य अपने-आप में कोई उपयोगी निष्कर्ष नहीं देता।
क्यों?
क्योंकि “नहीं पढ़ना” और “संस्कृत नहीं पढ़ना” दो अलग बातें हैं।
यदि कोई विद्यार्थी ही शिक्षा जारी नहीं रखना चाहता तो संस्कृत की समस्या कहाँ है?
यदि वह उच्च शिक्षा में जाता है, लेकिन संस्कृत नहीं चुनता, तब संस्कृत के सामने वास्तविक प्रश्न खड़ा होता है।
और यदि वह संस्कृत नहीं चुनता, तो अगला प्रश्न है—वह क्या चुनता है और क्यों चुनता है?
यहीं से चर्चा गंभीर होती है।
2. पहले यह देखना होगा कि विद्यार्थी वास्तव में पढ़ना चाहते हैं या नहीं
यहाँ राष्ट्रीय आँकड़े हमारी धारणा को थोड़ा बदल देते हैं।
2024-25 में भारत में प्राथमिक से उच्चतर माध्यमिक तक पहुँचते-पहुँचते संक्रमण दर लगातार कम होती जाती है:
संक्रमण भारत की संक्रमण दर 2024-25
कक्षा 5 → 6 92.2%
कक्षा 8 → 9 86.6%
कक्षा 10 → 11 75.1%
अर्थात कक्षा 10 के बाद 100 विद्यार्थियों में औसतन लगभग 75 ही उच्चतर माध्यमिक स्तर में प्रवेश करते हैं।
और 2024-25 में माध्यमिक स्तर (कक्षा 9-10) का dropout rate 11.5% था।
इसलिए आपका प्रश्न बिल्कुल उचित है—
“यदि विद्यार्थी 8वीं या 10वीं के बाद पढ़ाई ही छोड़ देता है, तो क्या उसे संस्कृत न पढ़ने की समस्या के रूप में देखना चाहिए?”
नहीं।
यह पहले स्कूल शिक्षा की पहुँच, आर्थिक-सामाजिक परिस्थितियों, विद्यालय की गुणवत्ता और शिक्षा की उपयोगिता का प्रश्न है।
संस्कृत की समस्या तभी शुरू होती है जब विद्यार्थी शिक्षा जारी रखना चाहता है और विषय चुनने की स्थिति में संस्कृत के बजाय कुछ और चुनता है।
यह बहुत महत्वपूर्ण विभाजन है।
3. उच्च शिक्षा में पहुँचने वाला विद्यार्थी क्या चाहता है?
भारत में उच्च शिक्षा का विस्तार बहुत बड़ा हुआ है।
AISHE के अनुसार 2021-22 में उच्च शिक्षा में कुल नामांकन लगभग 4.33 करोड़ था और 18-23 आयु वर्ग का Gross Enrolment Ratio (GER) 28.4% था।
नवीनतम AISHE 2023-24 के आँकड़ों में भी उच्च शिक्षा में करोड़ों विद्यार्थी हैं। AISHE की वेबसाइट पर 2023-24 की अंतिम रिपोर्ट अब उपलब्ध है।
इसका अर्थ है कि प्रश्न अब केवल यह नहीं है कि—
“बच्चे पढ़ रहे हैं या नहीं?”
बल्कि बड़ा प्रश्न है—
“जो विद्यार्थी पढ़ना चाहता है, वह क्या पढ़ना चाहता है और विषय चुनते समय उसकी प्राथमिकता क्या है?”
यही संस्कृत-विमर्श का असली प्रवेश-बिंदु है।
4. विद्यार्थी विषय क्यों चुनता है?
यहाँ संस्कृत-जगत को शायद सबसे असुविधाजनक प्रश्न पूछना चाहिए।
एक विद्यार्थी B.Tech क्यों करता है?
सिर्फ इसलिए कि उसे गणित पसंद है?
एक विद्यार्थी MBBS क्यों करता है?
सिर्फ इसलिए कि उसे जीवविज्ञान पसंद है?
एक विद्यार्थी B.Com क्यों करता है?
सिर्फ इसलिए कि उसे वाणिज्य अच्छा लगता है?
नहीं।
विषय-चयन के पीछे कई कारक होते हैं—
* रोजगार
* आय की सम्भावना
* सामाजिक प्रतिष्ठा
* परिवार की अपेक्षा
* आगे की शिक्षा का रास्ता
* प्रतियोगी परीक्षाओं में उपयोगिता
* विदेश/राष्ट्रीय स्तर पर अवसर
* विषय में व्यक्तिगत रुचि
* भविष्य की अनिश्चितता से सुरक्षा
* सामाजिक गतिशीलता
इसलिए “रुचि” अकेला कारण नहीं है।
और संस्कृत की चर्चा करते समय हम अक्सर विद्यार्थी की इसी वास्तविकता को नजरअंदाज कर देते हैं।
5. विद्यार्थी क्या पढ़ना चाहते हैं—आँकड़े क्या कहते हैं?
AISHE 2021-22 में स्नातक स्तर पर सबसे बड़ा अनुशासन Arts था—लगभग 34.2% नामांकन। इसके बाद Science 14.8%, Commerce 13.3% और Engineering & Technology 11.8% थे। Indian Language का हिस्सा 1.1% था।
लेकिन 2023-24 में विषयों को अधिक सूक्ष्म रूप से देखें तो एक दिलचस्प बात सामने आती है।
उच्च शिक्षा में Indian Languages स्वयं कोई नगण्य क्षेत्र नहीं हैं।
AISHE 2023-24 के अनुसार PG स्तर पर:
* Hindi — 2,20,305
* Bengali — 42,436
* Sanskrit — 34,602
* Urdu — 20,416
विद्यार्थी Indian Language विषयों में पढ़ रहे थे।
संपूर्ण Indian Language समूह में PG स्तर पर लगभग 4.50 लाख विद्यार्थी थे।
इससे एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकलता है—
यह कहना भी सही नहीं है कि भारतीय भाषाओं को कोई विद्यार्थी पढ़ना ही नहीं चाहता।
बल्कि प्रश्न यह है कि कुछ भारतीय भाषाओं की तुलना में संस्कृत की माँग इतनी कम क्यों है?
6. संस्कृत की वास्तविक स्थिति क्या है?
AISHE 2023-24 में PG स्तर पर संस्कृत के नामांकन का आँकड़ा 34,602 है। उसी तालिका में Ph.D. स्तर पर संस्कृत के 2,235 विद्यार्थी दर्ज हैं।
PG स्तर पर तुलना देखिए:
विषय PG नामांकन
हिन्दी 2,20,305
बंगाली 42,436
संस्कृत 34,602
उर्दू 20,416
तमिल 11,174
तेलुगु 13,039
यहाँ संस्कृत के लिए असली प्रश्न पैदा होता है।
34,602 विद्यार्थी बहुत कम हैं या बहुत अधिक?
इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि हम संस्कृत से क्या अपेक्षा कर रहे हैं।
यदि हमारा लक्ष्य है—
“भारत की विशाल युवा आबादी में संस्कृत एक सामान्य उच्च शिक्षा विकल्प बने”
तो यह संख्या छोटी है।
लेकिन यदि लक्ष्य है—
“संस्कृत के गंभीर अध्येता, शोधकर्ता, शिक्षक, पाण्डुलिपि-विशेषज्ञ, भाषावैज्ञानिक, दार्शनिक आदि तैयार करना”
तो केवल संख्या देखकर निष्कर्ष निकालना गलत होगा।
7. अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न—लोग अधिक संख्या में किसी विषय को क्यों पढ़ते हैं?
यहाँ हमें Arts बनाम Engineering जैसे सरल विरोध से भी आगे जाना होगा।
विद्यार्थी किसी विषय को केवल इसलिए नहीं चुनता कि वह “अच्छा ज्ञान” देता है।
वह यह भी देखता है—
“इस शिक्षा के बाद मेरे पास कौन-कौन से रास्ते खुलेंगे?”
यही वह बिन्दु है जहाँ संस्कृत शिक्षा को अपने आप से कठोर प्रश्न करना होगा।
यदि कोई विद्यार्थी B.Tech करता है तो उसके सामने—
* निजी क्षेत्र
* सरकारी तकनीकी सेवाएँ
* IT
* software
* engineering services
* entrepreneurship
* higher studies
* research
जैसे अनेक रास्ते खुल सकते हैं।
B.Com के बाद—
* accounting
* finance
* banking
* taxation
* business
* management
* professional qualifications जैसे रास्ते हैं।
B.A. में भी विद्यार्थी विषय के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं, शिक्षण, प्रशासन, पत्रकारिता, शोध, कानून आदि की ओर जा सकता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि ये सभी रास्ते स्वतः मिल जाते हैं। रोजगार की समस्या इन क्षेत्रों में भी है।
उदाहरण के लिए NITI Aayog की 2026 की रिपोर्ट में B.A. graduates की employability 2026 के लिए 55.6%, B.Com 62.8%, B.Sc 61.0% और B.E./B.Tech 70.2% दी गई है। यानी लोकप्रिय विषय भी रोजगार की गारंटी नहीं देते।
यह तथ्य संस्कृत के लिए बहुत उपयोगी है।
हमें यह नहीं कहना चाहिए—
“इंजीनियरिंग पढ़ने से नौकरी मिलती है और संस्कृत पढ़ने से नहीं।”
वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है।
सही बात यह है—
विद्यार्थी उन क्षेत्रों को अधिक चुनते हैं जहाँ उन्हें शिक्षा और भविष्य के अवसर के बीच कोई स्पष्ट सम्बन्ध दिखाई देता है।
8. संस्कृत की सबसे बड़ी समस्या शायद “रोजगार कम है” नहीं, बल्कि “रास्ता दिखाई नहीं देता” है
यह अंतर बहुत महत्वपूर्ण है।
मान लीजिए संस्कृत में 100 संभावित career pathways हैं, लेकिन विद्यार्थी को उनमें केवल दो दिखाई देते हैं—
1. अध्यापक
2. संस्कृत अध्यापक
तो विद्यार्थी संस्कृत को सीमित विषय समझेगा।
जबकि संस्कृत की वास्तविक ज्ञान-संपदा इससे कहीं बड़ी है।
संस्कृत के साथ सम्भावित क्षेत्र हो सकते हैं—
* भाषा एवं साहित्य
* भाषाविज्ञान
* computational linguistics
* NLP
* AI language resources
* machine translation
* manuscriptology
* epigraphy
* lexicography
* textual criticism
* philosophy
* Indian Knowledge Systems
* इतिहास
* पुरातत्त्व से सम्बद्ध पाठ-अध्ययन
* योग
* आयुर्वेदिक साहित्य का अध्ययन
* न्याय-दर्शन
* गणितीय एवं खगोलीय ग्रन्थों का अध्ययन
* comparative philosophy
* translation
* interpretation
* publishing
* digital humanities
* cultural studies
* archival studies
* भारतीय कला एवं नाट्य परम्परा
* शिक्षा
* research
लेकिन क्या वर्तमान संस्कृत शिक्षा विद्यार्थी को इन रास्तों का अनुभव कराती है?
यहीं वास्तविक संकट है।
9. क्या संस्कृत का उद्देश्य वही होना चाहिए जो लोकप्रिय विषयों का है?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है—
“क्या संस्कृत शिक्षा का भी वही उद्देश्य है जो उस विषय का है जिसे अधिक छात्र पढ़ना चाहते हैं?”
उत्तर है—
नहीं।
और यहीं संस्कृत-विमर्श में एक बड़ी वैचारिक भूल होती है।
हर ज्ञान-विषय का उद्देश्य एक जैसा नहीं होता।
शिक्षा के कुछ उद्देश्य समान हो सकते हैं—
* चिंतन
* व्यक्तित्व-विकास
* ज्ञान
* विवेक
* कौशल
* समाजोपयोगिता
लेकिन प्रत्येक विषय की विशिष्ट सामाजिक भूमिका अलग होती है।
एक MBBS का उद्देश्य चिकित्सक तैयार करना है।
एक B.Tech का उद्देश्य तकनीकी ज्ञान और engineering competence देना है।
कानून की शिक्षा का उद्देश्य विधिक ज्ञान और पेशेवर क्षमता विकसित करना है।
इसी प्रकार संस्कृत का उद्देश्य केवल “नौकरी पाने वाला संस्कृत विद्यार्थी” तैयार करना नहीं हो सकता।
संस्कृत एक भाषा भी है, साहित्य भी, ज्ञान-परम्परा का विशाल corpus भी और भारतीय बौद्धिक इतिहास का प्रमुख स्रोत भी।
10. लेकिन यहाँ संस्कृत के हितैषियों के लिए एक असहज सत्य है
यह कहना कि—
“संस्कृत का उद्देश्य अलग है, इसलिए हमें विद्यार्थियों की संख्या की चिंता नहीं करनी चाहिए”
भी सही नहीं होगा।
क्योंकि सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था में किसी विषय का अस्तित्व तभी टिकाऊ होता है जब उसके लिए पर्याप्त विद्यार्थी, शिक्षक, संस्थाएँ, शोध और सामाजिक उपयोग की व्यवस्था हो।
इसलिए दो बातें एक साथ स्वीकार करनी होंगी—
पहली
संस्कृत को केवल उसकी छात्र संख्या से नहीं आँका जा सकता।
दूसरी
छात्र संख्या को पूरी तरह महत्वहीन भी नहीं माना जा सकता।
यही संतुलित दृष्टि है।
11. संस्कृत की तुलना Engineering से करना गलत है—लेकिन तुलना करना आवश्यक भी है
यह विरोधाभास समझना बहुत जरूरी है।
हम यह नहीं पूछ सकते कि—
“संस्कृत में IIT जैसी नौकरी क्यों नहीं?”
क्योंकि दोनों की सामाजिक भूमिका अलग है।
लेकिन हम यह अवश्य पूछ सकते हैं—
“Engineering ने विद्यार्थी को अपने विषय का भविष्य दिखाने के लिए कौन-सी संरचना बनाई और संस्कृत ने क्या बनाया?”
यह तुलना वैध है।
Engineering विद्यार्थी को पहले वर्ष से ही पता होता है कि—
मैं क्या सीख रहा हूँ → किस समस्या पर काम करूँगा → कौन-सी industry है → कौन-सा skill चाहिए → internship कहाँ होगी → नौकरी कहाँ मिल सकती है → आगे specialization क्या होगा।
संस्कृत विद्यार्थी के लिए यह career map अक्सर इतना स्पष्ट नहीं है।
12. NEP 2020 वास्तव में संस्कृत के लिए एक बड़ा संकेत देती है
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 का संस्कृत सम्बन्धी दृष्टिकोण बहुत महत्वपूर्ण है।
नीति साफ कहती है कि संस्कृत को केवल पारम्परिक संस्कृत पाठशालाओं और विश्वविद्यालयों तक सीमित न रखकर मुख्यधारा की शिक्षा में लाया जाए, और उसे mathematics, astronomy, philosophy, linguistics, dramatics, yoga आदि आधुनिक एवं समकालीन क्षेत्रों से जोड़ा जाए। संस्कृत विश्वविद्यालयों को multidisciplinary institutions की दिशा में ले जाने की बात भी नीति में है।
यहाँ हमें NEP की भावना को ठीक से समझना चाहिए।
NEP यह नहीं कह रही कि—
“हर विद्यार्थी संस्कृत पढ़े।”
वह इससे अधिक महत्वपूर्ण बात कह रही है—
“जो विद्यार्थी संस्कृत पढ़ना चाहता है, उसके लिए संस्कृत को आधुनिक बहुविषयक शिक्षा से जोड़कर अर्थपूर्ण बनाया जाए।”
यही शायद आगे की दिशा है।
13. इसका अर्थ है—“संस्कृत + कुछ” की दिशा
मुझे लगता है कि संस्कृत शिक्षा की अगली बड़ी बहस “संस्कृत बनाम अन्य विषय” नहीं होनी चाहिए।
बल्कि—
“संस्कृत + अन्य ज्ञानक्षेत्र” होनी चाहिए।
उदाहरण के लिए—
संस्कृत + AI
संस्कृत + NLP
संस्कृत + Computational Linguistics
संस्कृत + दर्शन
संस्कृत + इतिहास
संस्कृत + Archaeology
संस्कृत + Manuscript Studies
संस्कृत + Yoga
संस्कृत + Ayurveda
संस्कृत + Mathematics
संस्कृत + Astronomy
संस्कृत + Translation
संस्कृत + Digital Humanities
यह केवल नारा नहीं होना चाहिए।
इसके लिए पाठ्यक्रम, शिक्षक, प्रयोगशाला, डिजिटल corpus, internship, research projects और रोजगार-मार्ग बनाने होंगे।
14. यहाँ एक और महत्वपूर्ण बात—संस्कृत को “सिर्फ संस्कृत” पढ़ाने की परम्परा पर विचार
यदि कोई विद्यार्थी पाँच वर्ष संस्कृत पढ़ता है और अन्त में उससे पूछा जाए—
“तुम संस्कृत के अलावा क्या कर सकते हो?”
और उसका उत्तर हो—
“मैं संस्कृत पढ़ सकता हूँ।”
तो शिक्षा-व्यवस्था को स्वयं से प्रश्न करना चाहिए।
भाषा का ज्ञान अपने-आप में मूल्यवान है, लेकिन आधुनिक उच्च शिक्षा में उसे transferable skills से जोड़ना होगा।
उदाहरण—
संस्कृत विद्यार्थी को संस्कृत के साथ:
* उच्च स्तरीय लेखन
* translation
* research methodology
* data handling
* digital tools
* AI tools
* corpus creation
* manuscript digitisation
* भाषावैज्ञानिक विश्लेषण
* communication
* presentation
* teaching technology
भी आना चाहिए।
तब संस्कृत केवल “एक विषय” नहीं रहेगी।
वह कौशलों के समूह के साथ जुड़ी हुई विशेषज्ञता बन सकती है।
15. क्या संस्कृत में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ाना ही लक्ष्य होना चाहिए?
नहीं।
यह बहुत खतरनाक लक्ष्य होगा।
यदि हम केवल संख्या बढ़ाने के लिए—
* आसान पाठ्यक्रम बना दें,
* परीक्षा सरल कर दें,
* नामांकन बढ़ा दें,
* डिग्री बाँट दें,
तो संस्कृत का संकट समाप्त नहीं होगा।
बल्कि संख्या बढ़ सकती है और गुणवत्ता गिर सकती है।
सही लक्ष्य होना चाहिए—
संस्कृत में ऐसे विद्यार्थी आएँ जो संस्कृत के माध्यम से किसी वास्तविक बौद्धिक, सांस्कृतिक, भाषिक, तकनीकी या सामाजिक क्षेत्र में आगे बढ़ सकें।
16. “कितने विद्यार्थी संस्कृत पढ़ते हैं?” से अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न
“संस्कृत पढ़ने वाला विद्यार्थी संस्कृत पढ़कर क्या बन सकता है?”
और इसके बाद दूसरा—
“क्या स्वयं संस्कृत का अध्यापक इस प्रश्न का दस स्पष्ट उत्तर दे सकता है?”
यदि उत्तर अस्पष्ट है तो समस्या विद्यार्थी की रुचि में नहीं, हमारी शिक्षा-व्यवस्था की संरचना में है।
17. संस्कृत शिक्षा के सामने तीन अलग-अलग समस्याएँ हैं
इनको एक ही समस्या मानना ठीक नहीं होगा।
समस्या 1 — प्रवेश
विद्यार्थी संस्कृत क्यों चुने?
समस्या 2 — निरन्तरता
संस्कृत चुनने के बाद विद्यार्थी बीच में क्यों छोड़ दे?
समस्या 3 — परिणाम
संस्कृत पढ़ने के बाद विद्यार्थी क्या कर सके?
इन तीनों के समाधान अलग होंगे।
प्रचार से प्रवेश बढ़ सकता है।
अच्छे शिक्षक और आकर्षक पाठ्यक्रम से निरन्तरता बढ़ सकती है।
लेकिन career/research ecosystem से परिणाम सार्थक होगा।
18. और एक बहुत महत्वपूर्ण तथ्य—लोकप्रिय विषय भी संकटमुक्त नहीं हैं
यहाँ संस्कृत-समर्थकों को एक गलती नहीं करनी चाहिए।
वे यह न कहें—
“इंजीनियरिंग में बहुत विद्यार्थी हैं, इसलिए वह सफल है।”
Engineering में भी employability की समस्या है। NITI Aayog की 2026 रिपोर्ट में B.E./B.Tech graduates की employability 70.2% बताई गई है—अर्थात लगभग 30% graduates उस आकलन में employable नहीं माने गए। B.A. के लिए यह 55.6% है।
Mercer के 2025 Graduate Skill Index में भी नौकरी के लिए आवेदन करने वाले भारतीय graduates की overall employability 42.6% बताई गई है। ([Mercer][8])
इसलिए—
अधिक विद्यार्थी किसी विषय को चुनते हैं = वह विषय स्वतः बेहतर शिक्षा देता है
यह निष्कर्ष गलत है।
विद्यार्थी की संख्या माँग का संकेत है, गुणवत्ता का प्रमाण नहीं।
19. इसलिए संस्कृत के लिए सही प्रश्न क्या होना चाहिए?
मेरे विचार से इस लेख का पूरा विमर्श इन सात प्रश्नों के इर्द-गिर्द बनाया जा सकता है—
1. क्या विद्यार्थी पढ़ना नहीं चाहते, या संस्कृत नहीं पढ़ना चाहते?
2. जो विद्यार्थी शिक्षा जारी रखना चाहते हैं, उनमें से कितने उच्च शिक्षा तक पहुँचते हैं?
3. उच्च शिक्षा में वे किन क्षेत्रों को चुनते हैं और क्यों चुनते हैं?
4. उनके विषय-चयन के पीछे रोजगार, प्रतिष्ठा, रुचि, परिवार, सामाजिक अवसर और भविष्य की सुरक्षा में कौन-सा तत्व कितना महत्वपूर्ण है?
5. संस्कृत विद्यार्थी को इनमें से क्या देती है?
6. जो संस्कृत नहीं देती, वह देने के लिए संस्कृत शिक्षा में क्या परिवर्तन आवश्यक है?
7. और जो संस्कृत देती है तथा कोई दूसरा विषय नहीं दे सकता, उस विशिष्ट मूल्य को हम विद्यार्थी के सामने कितनी प्रभावी ढंग से रख पा रहे हैं?
20. और सबसे बड़ा वैचारिक प्रश्न
“हरेक ज्ञान या शिक्षा का उद्देश्य एक समान ही होता है?”
नहीं। शिक्षा का मूल उद्देश्य मनुष्य को अधिक सक्षम, विवेकशील और अर्थपूर्ण जीवन के योग्य बनाना हो सकता है, लेकिन प्रत्येक ज्ञान-विषय की अपनी विशिष्ट सामाजिक और बौद्धिक भूमिका होती है। इसलिए संस्कृत को इंजीनियरिंग की नकल करके सफल बनाने की आवश्यकता नहीं है; आवश्यकता यह है कि संस्कृत अपनी विशिष्टता को आधुनिक जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ने की क्षमता विकसित करे।
यही फर्क “संस्कृत को लोकप्रिय बनाना” और “संस्कृत को प्रासंगिक बनाना” के बीच है।
21. लेख का केंद्रीय निष्कर्ष
संस्कृत की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि विद्यार्थी संस्कृत पढ़ना नहीं चाहते; समस्या यह है कि संस्कृत शिक्षा विद्यार्थी को यह पर्याप्त स्पष्टता से नहीं बता पा रही कि वह संस्कृत क्यों पढ़े, कितना पढ़े, संस्कृत पढ़कर क्या कर सकता है और संस्कृत उसके जीवन में कौन-सा ऐसा बौद्धिक मूल्य जोड़ती है जिसे वह कहीं और से उसी रूप में प्राप्त नहीं कर सकता।
और इससे भी आगे—
संस्कृत के लिए लक्ष्य यह नहीं होना चाहिए कि वह Engineering, Medicine या Commerce जितने विद्यार्थी पैदा करे। लक्ष्य यह होना चाहिए कि जो विद्यार्थी संस्कृत चुने, उसे इतना गहरा, व्यापक और आधुनिक अनुभव मिले कि उसे अपने चुनाव पर पछतावा न हो और समाज को भी उसके चुनाव का मूल्य दिखाई दे।
एक सावधानी
2023-24 की नई AISHE तालिकाएँ विषय-स्तर पर अधिक सूक्ष्म आँकड़े देती हैं। इसलिए Indian Language और Sanskrit को एक ही चीज मानना उचित नहीं होगा। 2023-24 में संस्कृत के लिए PG में 34,602 और Ph.D. में 2,235 का प्रत्यक्ष subject-level आँकड़ा उपलब्ध है।





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