कारक-प्रकरणम्: वाक्य-निर्माण-सरणिः (भूमिका)
प्रिय छात्रो एवं पाठकवृन्द! संस्कृत भाषा में शुद्ध वाक्य निर्माण करने और लिखे हुए वाक्यों का सटीक अर्थ समझने के लिए कारक और विभक्ति नियमों का ज्ञान होना अनिवार्य है। यह संस्कृत शिक्षण पाठशाला का वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से आप रटने की परिपाटी को छोड़कर संस्कृत को उसकी मूल प्रकृति से समझना शुरू करेंगे।
इस पाठ का मुख्य उद्देश्य
प्रायः संस्कृत सीखते समय छात्र हिंदी वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद (Translation Method) करने लगते हैं, जिससे वाक्य संरचना में त्रुटियाँ होती हैं। इस पाठशाला का उद्देश्य हिंदी को आधार बनाए बिना, सीधे संस्कृत-से-संस्कृत (Direct Method) की ओर बढ़ना है। यहाँ हिंदी केवल एक सहयोगी (Supportive Tool) की भूमिका में होगी, न कि सीखने के आधार के रूप में।
क्रिया ही वाक्य की आत्मा है
पाणिनीय व्याकरण का मूल सिद्धांत है— 'क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्'। इसका अर्थ है कि वाक्य में क्रिया (Verb) ही सबसे प्रधान तत्व होती है और वाक्य के अन्य सभी पद (संज्ञा, सर्वनाम आदि) किसी न किसी रूप में उसी क्रिया को पूरा करने के लिए उससे जुड़े होते हैं। क्रिया से सीधे जुड़े इसी संबंध को हम 'कारक' कहते हैं।
आकांक्षा पद्धति (चार्ट)
जब हम किसी क्रियापद को केंद्र में रखकर उससे प्रश्न पूछते हैं, तो सभी कारक एक अनुक्रम में स्वतः बाहर आते हैं। नीचे दिए गए चार्ट के माध्यम से इसे समझें:
हम कैसे सीखेंगे?
इस पाठ में हम किसी कृत्रिम नियम या चिह्नों को रटने के बजाय "आकांक्षा पद्धति" (Syntactic Expectancy) का आश्रय लेंगे। हम वाक्य की क्रिया को केंद्र में रखेंगे और उससे संस्कृत में ही प्रश्न पूछेंगे। क्रिया से प्रश्न पूछने पर जो उत्तर प्राप्त होगा, वही हमारे कारक को तय करेगा:
- कः/का? (कौन कर रहा है?) → कर्ता (प्रथमा विभक्ति)
- किम्? (क्या कर रहा है / मुख्य लक्ष्य क्या है?) → कर्म (द्वितीया विभक्ति)
- केन? (किस साधन की सहायता से कर रहा है?) → करण (तृतीया विभक्ति)
- कस्मै? (किसके लिए या किसे संतुष्ट करने के लिए कर रहा है?) → सम्प्रदान (चतुर्थी विभक्ति)
- कुतः? (कहाँ से अलग होकर या किस स्रोत से कार्य हो रहा है?) → अपादान (पञ्चमी विभक्ति)
- कुत्र/कस्मिन्? (यह क्रिया किस स्थान या आधार पर घटित हो रही है?) → अधिकरण (सप्तमी विभक्ति)
जब आप क्रिया से इस प्रकार संवाद करना सीख जाएंगे, तो संस्कृत का कितना भी बड़ा या जटिल वाक्य क्यों न हो, आप स्वतः उसका सही अर्थ निकाल सकेंगे और बिना किसी डर के स्वयं शुद्ध वाक्यों का निर्माण कर सकेंगे। आइए, इसी क्रमबद्ध और वैज्ञानिक पद्धति से संस्कृत के इस सुंदर संसार में प्रवेश करें और कारक नियमों को उनके व्यावहारिक रूप में समझें।
पाठ-1: कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति)
अबतक हम वर्णों, शब्दों, लिंगों (अकारान्त, इकारान्त आदि) तथा उनके सुबन्त रूपों से परिचित हो चुके हैं। इस अध्याय में हम किसी हिंदी अनुवाद का आश्रय लिए बिना, सीधे क्रिया-केन्द्रित संवाद (आकांक्षा पद्धति) के माध्यम से वाक्य निर्माण और उनका शुद्ध अर्थ निकालना सीखेंगे।
अन्वय संवाद प्रणाली (व्यावहारिक उदाहरण):
केंद्रीय क्रियापद: पठति (अथवा अत्ति, लिखति, ददाति)
- • कः पठति? → रमेशः पुस्तकं पठति। (रमेशः = कर्ता)
- • कं अत्ति? → मृगः तृणं अत्ति। (तृणम् = कर्म)
- • केन लिखति? → बालकः लेखिन्या पत्रं लिखति। (लेखिन्या = करण)
- • कस्मै ददाति? → पिता पुत्राय धनं ददाति। (पुत्राय = सम्प्रदान)
प्रथमा विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):
-
1. प्रातिपादिकार्थलिंगपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा
मूल शब्द (प्रातिपादिक) के केवल अर्थ का बोध कराने में, लिंग मात्र का ज्ञान कराने में, परिमाण (मात्रा) और संख्या/वचन का बोध कराने में प्रथमा विभक्ति होती है।उदारहण:
• लिंग ज्ञान: मानवः, फलम् (नियतलिंग), तटः तटी तटम् (अनियतलिंग)
• परिमाण: प्रस्थो ब्रीहिः (आधा सेर चावल) | वचन: एकः, द्वौ, बहवः -
2. स्वतन्त्रः कर्ता / कर्त्तरि प्रथमा
क्रिया को करने में जो पूरी तरह स्वतंत्र हो, उसे कर्ता कहते हैं। कर्तृवाच्य के उक्त (प्रधान) कर्ता में हमेशा प्रथमा विभक्ति आती है।उदाहरण: हरिः पुस्तकं पठति | गोपालः गृहं गच्छति (यहाँ हरि और गोपाल क्रिया के स्वतंत्र संपादक और प्रधान हैं)। -
3. उक्ते कर्मणि प्रथमा (कर्मवाच्य नियम)
जब वाक्य कर्मवाच्य (Passive Voice) में हो, तो क्रिया कर्म के अनुसार चलती है और प्रमुख कर्म में द्वितीया न होकर प्रथमा विभक्ति लगती है।उदाहरण: मया चन्द्रः दृश्यते | रामेण रावणः हतः (यहाँ चन्द्रः और रावणः उक्त कर्म हैं, इसलिए इनमें प्रथमा है)। -
4. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा
इति, नाम और अपि अव्यय पदों के योग में संज्ञा शब्दों के साथ प्रथमा विभक्ति का विधान होता है।उदाहरण:
• अमुं नारद इति अबोधि। | जनको नाम राजा अभूत्।
• तस्य कन्या सीता नाम आसीत्। | विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम्। -
5. सम्बोधन में प्रथमा
सम्बोधन को स्वतंत्र कारक नहीं माना जाता, बल्कि किसी को पुकारने के लिए शब्दरूप में आंशिक परिवर्तन के साथ प्रथमा विभक्ति का ही उपयोग किया जाता है।
विशेष्य-विशेषण अनिवार्य संरचना सूत्र:
यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।
तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥
नियम: जो लिंग, जो वचन और जो विभक्ति विशेष्य (Noun) की होगी, ठीक वही लिंग, वचन और विभक्ति उसके विशेषण (Adjective) की भी होगी। यही अटूट नियम सम्बन्धी और सम्बन्धवाची पदों पर भी लागू होता है।
व्यावहारिक अभ्यास शाला (वाक्य अनुप्रयोग)
नीचे दिए गए अभ्यासों के माध्यम से अकारान्त पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग पदों के साथ वर्तमान काल (लट् लकार) की क्रियाओं का शुद्ध समन्वय देखें:
1. पुल्लिंग संज्ञा एवं सर्वनाम प्रयोग (लट् लकार):
- एकवचन: अश्वः धावति | गजः धावति | सः खादति | एते प्रसन्नाः सन्ति।
- द्विवचन: अश्वौ धावतः | गजौ धावतः | वृषभौ धावतः | तौ खादतः।
- बहुवचन: गजाः धावन्ति | वृषभाः धावन्ति | छात्राः प्रसन्नाः सन्ति | ते खादन्ति।
- मिश्रित वाक्य: अश्वः गजः च धावतः | अश्वः, गजः वृषभः च धावन्ति / खादन्ति।
१. ....... धावति। २. ......... खादन्ति। ३. ......... खादतः। ४. …… लिखति। (विकल्प: सः / तौ / ते)
2. नपुंसकलिंग शब्द प्रयोग:
याद रखें: जहाँ पुल्लिंग में 'सः, तौ, ते' होता है, वहाँ नपुंसकलिंग में 'तत्, ते, तानि' चलता है।
- वाक्य प्रवाह: फलम् पतति → फले पततः → फलानि पतन्ति।
- पत्रम् पतति → पत्रे पततः → पत्राणि पतन्ति।
- तत् फलम् पतति | तानि फलानि पतन्ति | ते फले पततः | तत् चित्रम् पतति | तानि चित्राणि पतन्ति।
3. आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द प्रयोग:
स्त्रीलिंग में सर्वनाम रूप 'सा, ते, ताः' का प्रयोग होता है। संस्कृत की क्रियाएँ सभी लिंगों में समान रहती हैं (जैसे: 'पठति' का अर्थ पढ़ता है और पढ़ती है, दोनों है)।
- • अशोकः सम्राट् आसीत्। (सम्राट अशोक थे।)
- • मदनमोहन-मालवीयः देशभक्तः आसीत्। (मदनमोहन मालवीय देशभक्त थे।)
- • रमेशः किम् पठति? → Rameshah पुस्तकं पठति। (पुस्तकम् = कर्म)
- • विप्रः किम् पाठयति? → Adhyapakah संस्कृतं पाठयति। (संस्कृतम् = कर्म)
- • रामः कुत्र गच्छति? → Ramah विद्यालयं गच्छति। (विद्यालयम् = गन्तव्य कर्म)
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1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म (सामान्य नियम)
क्रिया के द्वारा कर्ता का जो सबसे अधिक इच्छित (तपतम) पदार्थ होता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है और उसमें द्वितीया विभक्ति लगती है।विशिष्ट उदाहरण: रामः पयसा ओदनं खादति। (यहाँ राम दूध और भात दोनों खा रहा है, परन्तु उसका मुख्य इच्छित 'भात' है, अतः दूध में तृतीया तथा भात यानी 'ओदनम्' में द्वितीया विभक्ति हुई है)। -
2. अधिशीङ्स्थासां कर्म (उपसर्ग योग नियम)
जब शीङ् (शयन करना), स्था (बैठना) और आस् (रहना) धातुओं के पूर्व 'अधि' उपसर्ग लगा हो, तो क्रिया का आधार अधिकरण (सप्तमी) न होकर कर्म (द्वितीया) बन जाता है।उदाहरण: सः आसन्दं अधितिष्ठति। (वह कुर्सी पर बैठता है। यहाँ 'अधि' उपसर्ग के कारण कुर्सी आधार होते हुए भी द्वितीया विभक्ति में आई है)। -
3. उपपद अव्यय योग नियम (विशेष शब्द योग)
कुछ विशिष्ट अव्यय शब्दों का जिससे प्रत्यक्ष संयोग होता है, उस पद में अनिवार्य रूप से द्वितीया विभक्ति होती है:• उभयतः / सर्वतः / धिक्: उभयतः विद्यालयं बालकाः सन्ति।
• उपर्युपरि / अधोधः / अध्यधि: (ठीक ऊपर / ठीक नीचे)
• अभितः / परितः / समया / निकषा / हा / प्रति: विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति। | मां प्रति तस्य कोपः वर्तते।
• अन्तरा / अन्तरेण: (बीच में / बिना या छोड़कर) के योग में भी द्वितीया होती है। -
4. क्रियाविशेषणे द्वितीया
जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं (Adverbs), वे हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में रहते हैं और उनमें द्वितीया विभक्ति होती है।उदाहरण: गीता मधुरं गायति। | कोकिलः मधुरं कूजति। | मन्दं मन्दं नुदति पवनः। | अर्धो घटः अधिकं शब्दायते। -
5. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे
जब किसी काल (समय) या अध्वन् (मार्ग/दूरी) का क्रिया के साथ लगातार या अतिशय जुड़ाव (व्याप्ति) प्रकट हो, तब कालवाची और मार्गवाची पदों में द्वितीया होती है।उदाहरण: सः मासमधीते व्याकरणम्। (महीने भर लगातार पढ़ता है) | क्रोशं कुटिला नदी। (नदी कोस भर तक टेढ़ी है) - 1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म (सामान्य): उदाहरण: रामः ओदनं खादति।
- 2. अधिशीङ्स्थासां कर्म: अधि+शी/स्था/आस् धातुओं के योग में। उदाहरण: सः आसन्दम् अधितिष्ठति।
- 3. अभितः, परितः, प्रति, निकषा आदि: इन अव्ययों के योग में। उदाहरण: विद्यालयं परितः वृक्षाः।
- 4. क्रियाविशेषणे द्वितीया: उदाहरण: सा मधुरं गायति।
- 5. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे: निरंतर समय/दूरी। उदाहरण: मासमधीते।
- • बालकः केन पत्रं लिखति? → बालकः लेखन्या पत्रं लिखति।
- • सः केन जलं पिबति? → सः चषकेण जलं पिबति।
- • त्वं केन पश्यसि? → अहं उपनेत्रेण पश्यति।
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1. कर्तृकरणयोस्तृतीया / अनुक्त कर्ता नियम
कर्मवाच्य के वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान) हो जाता है, इसलिए उसमें प्रथमा के स्थान पर तृतीया विभक्ति लगती है।उदाहरण: रामेण रावणः हतः। (यहाँ राम अनुक्त कर्ता हैं) -
2. सहयुक्तेऽप्रधाने (उपपद नियम)
सह, साकं, समं, सार्धं (साथ) शब्दों के योग में जो अप्रधान व्यक्ति होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।उदाहरण: अश्वः मोहनेन सह गच्छति | सः मित्राभ्यां सह उपवने क्रीडति | मात्रा सह रामः गच्छति। -
3. येनाङ्गविकारः (अंग-विकार नियम)
शरीर के जिस अंग विशेष में कोई खराबी या विकार दिखाई दे, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।उदाहरण: मम नेता कर्णेन बधिरः अस्ति। (कान से बहरा) -
4. पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम्
पृथक, विना और नाना शब्दों के योग में विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है। (वैकल्पिक रूप में द्वितीया और पञ्चमी भी होती है)। -
5. हेतोः / इत्थंभूतलक्ष्णे
जिस कारण (हेतु) से कोई कार्य हो या जिस विशेष चिह्न से कोई व्यक्ति पहचाना जाए, वहाँ तृतीया होती है।उदाहरण: धनं परिश्रमेण मिलति। | मम परिवेशी चतुःचक्रिकया (चार पहिया गाड़ी से) धनिकः प्रतीयते। - • कः यच्छति? (कौन देता है?) → जनकः यच्छति। (जनकः = कर्ता)
- • किं यच्छति? (क्या देता है?) → जनकः धनम् यच्छति। (धनम् = कर्म)
- • कस्मै यच्छति? (किसको देता है?) → जनकः पुत्राय धनं यच्छति। (पुत्राय = सम्प्रदान)
- • कुतः यच्छति? (कहाँ से देता है?) → जनकः कोषात् पुत्राय धनं यच्छति। (कोषात् = अपादान)
- • छात्रः किमर्थं विद्यालयं गच्छति? → छात्रः पठनाय / शिक्षायै विद्यालयं गच्छति।
- • यूयं किमर्थं क्रीडाङ्गणं गच्छथ? → वयं क्रीडनाय / स्वास्थ्याय क्रीडाङ्गणं गच्छामः।
- • भिक्षुकः किमर्थं भ्रमति? → भिक्षुकः भिक्षायै / रोटिकायै ग्रामे भ्रमति।
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1. कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् / क्रिया या यमभिप्रैति
दान देने के कार्य से या किसी विशेष प्रयोजन वाली क्रिया से जो अभिप्रेत हो, वह सम्प्रदान है।उदाहरण: बालकाय पुस्तकं ददाति। | श्रमिकः रोटिकायै नगरे वसति। | छात्रः शिक्षायै विद्यालयं गच्छति। -
2. रुच्यर्थानां प्रीयमाणः (रुचि नियम)
रुच् (अच्छा लगना) धातु या इसके समान अर्थ वाली धातुओं के योग में जो व्यक्ति प्रसन्न होने वाला (प्रीयमाण) होता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।उदाहरण: मल्लाय घृतं रोचते | मोहनाय आम्राणि रोचन्ते | मह्यं संस्कृतं रोचते। -
3. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च (विशिष्ट उपपद नियम)
नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा और स्वधा शब्दों के सीधे योग में हमेशा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।उदाहरण: भगवते विष्णवे नमः | तुभ्यं स्वस्ति। | रामाय स्वाहा।
*ध्यातव्य: उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी नियम के अनुसार यदि इनके साथ कोई क्रियापद (जैसे 'नमस्करोति') जुड़ जाए, तो वहाँ कारक प्रधान होने से द्वितीया विभक्ति हो जाएगी (जैसे: मुनित्रयं नमस्कृत्य)। -
4. क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः
क्रोध करना (क्रुध), द्रोह करना (द्रुह), ईर्ष्या करना और दूसरों के गुणों में दोष निकालना (असूया)— इन धातुओं के योग में जिसके प्रति कोप (क्रोध) किया जाए, वह सम्प्रदान होता है।उदाहरण:
• माता पुत्राय क्रुध्यति। (माता पुत्र पर क्रोध करती है।)
• नेता जनताभ्यः द्रुह्यति। (नेता जनता से द्रोह करता है।)
*अपवाद (विशेष नियम):
यदि इन (क्रुध/द्रुह) धातुओं के पहले कोई उपसर्ग (जैसे 'अभि') लगा हो, तो वहाँ चतुर्थी न होकर द्वितीया विभक्ति होती है, जैसे—
• अध्यापकः शिष्यं अभिक्रुध्यति। (अध्यापक शिष्य पर क्रोध करता है।) - • मुरारिः कुतः आयाति? → मुरारिः ग्रामात् आयाति। (गाँव से अलग होना)
- • वृषभाः कुतः पतन्ति? → वृक्षेभ्यः पत्राणि पतन्ति। (वृक्षों से पत्तों का अलगाव)
- • सुदेशः कुतः भ्रमणाय गच्छति? → सुदेशः भ्रमणाय गृहात् गच्छति। (घर से बाहर जाना)
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1. ध्रुवमपायेऽपादानम् / अपादाने पञ्चमी (सामान्य नियम)
अपाय, विश्लेष, विलगाव या पृथक् होने के अर्थ में जिस सुनिश्चित व्यक्ति या स्थान से अलग हुआ जाता है, वह अपादान कहलाता है।व्यावहारिक उदाहरण:
• बालकः द्विचक्रिकात् (साइकिल से) पतति।
• छात्राः कक्षेभ्यः बहिः आगच्छन्ति।
• ते विद्यालयात् गृहं गच्छन्ति। | आकाशात् जलम् पतति।
• (अश्वारोही) धावतः अश्वात् पतति। (यहाँ दौड़ता हुआ घोड़ा स्थिर/ध्रुव है, जिससे अलगाव हो रहा है। 'धावत्' शब्द शतृ प्रत्ययान्त होकर विशेषण होने के कारण इसमें भी पञ्चमी है।) -
2. भीत्रार्थानां भयहेतुः (भय एवं रक्षा नियम)
भयार्थक (जिससे डर मालूम हो) और त्राणार्थक (जिससे भय के कारण रक्षा करनी हो) धातुओं के प्रयोग में जो भय का मुख्य कारण होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है।उदाहरण: सः बिडालात् विभेति। (बिल्ली से डरता है) -
3. आख्यतोपयोगे (नियमपूर्वक विद्या ग्रहण नियम)
जिनसे नियम पूर्वक विद्या या कोई ज्ञान ग्रहण किया जाता है, वह वक्ता/आख्याता अपादान के अंतर्गत आता है।उदाहरण: विद्यालये गुरोः अधीते। (गुरु से नियमपूर्वक पढ़ता है) -
1. औपश्लेषिक आधार: जिसके साथ आधेय का भौतिक सम्बन्ध बना हुआ हो।
उदाहरण: वानरः वृक्षे निvusati। (बन्दर पेड़ पर रहता है) -
2. वैषयिक आधार: जिसके साथ आधेय का बौद्धिक या मानसिक सम्बन्ध बना हुआ हो।
उदाहरण: मम अध्ययने रुचिः अस्ति। (मेरी अध्ययन में रुचि है) -
3. अभिव्यापक आधार: जिसके साथ आधेय का व्याप्य-व्यापकभाव सम्बन्ध बना हुआ हो।
उदाहरण: पुस्तके अक्षराणि सन्त। (पुस्तक में अक्षर हैं) - • कः पश्यति? (कौन देखता है?) → मोहनः पश्यति। (मोहनः = कर्ता)
- • किं पश्यति? (क्या देखता है?) → मोहनः शोभां पश्यति। (शोभाम् = कर्म)
- • कस्य शोभां पश्यति? (किसकी शोभा देखता है?) → मोहनः उद्यानस्य शोभां पश्यति। (उद्यानस्य = सम्बन्ध - षष्ठी)
- • कस्य वर्णः श्यामः अस्ति? → कृष्णस्य / मम / तस्य वर्णः श्यामः अस्ति।
- • कस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति? → अस्माकम् विद्यालयस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति।
- • युष्माकं कस्य नाम किम् अस्ति? → युष्माकं संस्कृतशिक्षकस्य नाम किम् अस्ति?
-
1. शेषे षष्ठी
स्व-स्वामी आदि संबंधों को प्रकट करने के लिए। (उदाहरण: देवदत्तस्य पुत्रः) -
2. संबंध मात्र की विवक्षा
जहाँ अन्य कारक की जगह केवल संबंध दर्शाना अभीष्ट हो। (उदाहरण: सर्पिषो जानीते) -
3. कर्तृकर्मणोः कृतिः
कृदन्त पदों के योग में कर्ता या कर्म में। - 1. नीचे स्क्रॉल करें: इस बॉक्स के ठीक नीचे से प्रत्येक विभक्ति (प्रथमा से सप्तमी) का विस्तृत विवरण आरंभ हो रहा है।
- 2. सूत्रों का संधि-विच्छेद समझें: नीचे दिए गए कठिन पाणिनीय सूत्रों को ध्यान से पढ़ें ताकि परीक्षा में सूत्र-उल्लेखपूर्वक विभक्ति पहचानने में कोई त्रुटि न हो।
- 3. अपवादों पर विशेष ध्यान दें: जहाँ सामान्य नियम काम नहीं करते, वहाँ पाणिनी जी के विशेष सूत्र कैसे काम करते हैं, उन्हें नीचे दिए गए उदाहरणों से आत्मसात् करें।
व्यावहारिक अभ्यास: धातु एवं क्रिया समन्वय (अभ्यास-3)
नीचे दी गई संज्ञाओं या सर्वनामों के बाद पुरुष और वचन के अनुसार 'धाव्' (दौड़ना), 'खाद्' (खाना), 'लिख्' (लिखना), 'पिब' (पीना) धातुओं के सही लट् लकार रूपों को भरें:
कर्ता चयन एवं पद संगति अभ्यास (अभ्यास-4)
दिए गए कर्ता पद: मोहनः, वृषभौ, वृषभाः, गजः, वानरौ, गजाः, मयूरः, अश्वौ, अश्वाः।
क्रिया के वचन को पहचानकर रिक्त स्थान में केवल एक बार सही कर्ता पद का प्रयोग करें:
शब्दरूप परिचय एवं सर्वनाम चयन (अभ्यास-5)
निम्नलिखित अकारान्त पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग शब्दों का लिंग और वचन देखकर रिक्त स्थानों में सही सर्वनाम शब्द (सः, तौ, ते / तत्, ते, तानि) भरें:
विशिष्ट भाषाई अनुप्रयोग: प्रथमा विभक्ति (भूतकाल)
संस्कृत में केवल वर्तमान काल ही नहीं, बल्कि भूतकाल के संदर्भों में भी कर्ता अपनी प्रथमा विभक्ति के मूल स्वरूप को अक्षुण्ण रखता है, जैसे—
समेकित सर्वनाम अभ्यास (अभ्यास-6)
संपूर्ण पाठ के आधार पर लिंग और वचन को पहचानकर "सः, तौ, ते; तत्, ते, तानि; सा, ते, ताः" में से सर्वथा शुद्ध विकल्प का चयन कर रिक्त स्थान भरें:
पाठ-2: कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)
क्रिया-केन्द्रित प्रवाह (आकांक्षा पद्धति) के अंतर्गत कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, वह कर्म में आता है। बिना हिंदी के 'को' चिह्न को रटे, सीधे क्रिया से 'किम्' (क्या) अथवा 'कम् / काम्' (किसको) प्रश्न पूछकर हम कर्म कारक को पहचानते हैं।
अन्वय संवाद प्रणाली (व्यावहारिक उदाहरण):
केंद्रीय क्रियापद: पठति (अथवा खादति, गच्छति)
द्वितीया विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):
स्मरण रखें: पूर्व पाठ के नियम 'उक्ते कर्मणि प्रथमा' के अनुसार जब वाक्य कर्मवाच्य में होता है तब कर्म प्रधान होने से उसमें प्रथमा होती है (जैसे: मया चन्द्रः दृश्यते)। यहाँ हम केवल कर्तृवाच्य के अप्रधान कर्म (द्वितीया विभक्ति) का अभ्यास कर रहे हैं।
त्रिलिंग वाक्य निर्माण एवं अभ्यास तालिका
अधोलिखित पदों के वचनानुसार तीनों वचनों में शुद्ध संस्कृत वाक्य संरचना का अभ्यास करें:
पाठ-3: कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)
कर्ता जिसे क्रिया द्वारा सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, वह कर्म है (कर्तुरीप्सिततमं कर्म), और उसमें द्वितीया विभक्ति (कर्मणि द्वितीया) होती है।
द्वितीया विभक्ति के प्रमुख नियम (सूत्र):
अभ्यास तालिका (द्वितीया विभक्ति)
| मूल पद (लिंग) | एकवचनम् (द्वितीया) | द्विवचनम् (द्वितीया) | बहुवचनम् (द्वितीया) |
|---|---|---|---|
| पाठः (पुल्लिंग) | सः पाठं पठति। | सः पाठौ पठति। | सः पाठान् पठति। |
| श्लोकः / मन्त्रः | ………………… | ………………… | ………………… |
| देवालयः (पुल्लिंग) | माता देवालयं गच्छति। | ………………… | ………………… |
| ग्रामः / आपणः | ………………… | ………………… | ………………… |
| पत्रिका (स्त्रीलिंग) | छात्रः पत्रिकां पठति। | छात्रः पत्रिके पठति। | छात्रः पत्रिकाः पठति। |
| पद (लिंग) | एकवचन | द्विवचन | बहुवचन |
|---|---|---|---|
| पाठ (पु.) | पाठम् | पाठौ | पाठान् |
| पत्रिका (स्त्री.) | पत्रिकां | पत्रिके | पत्रिकाः |
| पुस्तक (नपुं.) | पुस्तकम् | पुस्तके | पुस्तकानि |
वाक्य अभ्यास (कोष्टकगत शब्द)
कोष्ठक के शब्दों में द्वितीया लगाकर वाक्य पूरे करें:
२. सा वार्तां (वार्ता) श्रुणोति।
३. अहं पुस्तकं (पुस्तकम्) क्रीणामि।
४. सः ग्रामं (ग्रामः) गच्छति।
५. छात्राः संस्कृतं (संस्कृतम्) पठन्ति।
*(अन्य अभ्यास के लिए मूल सामग्री देखें)*
पाठ-4: करण कारक (तृतीया विभक्ति)
कर्ता जिसकी सबसे अधिक सहायता से अपने कार्य को पूर्ण करता है, उसे करण कहते हैं (साधकतमं करणम्)। तृतीया विभक्ति मुख्य रूप से दो स्थानों पर होती है: 1. करण कारक में और 2. अनुक्त (अप्रधान) कर्ता में (कर्मवाच्य या भाववाच्य के वाक्यों में)।
अन्वेषण संवाद (साधन पहचान):
केंद्रीय क्रियापद: लिखति / पिबति / पश्यति
तृतीया विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):
वाक्य रूपांतरण अभ्यास (पुरुष-वचन परिवर्तन):
इन वाक्यों के पुरुष तथा वचन परिवर्तन के स्वरूप को ध्यान से देखें और अभ्यास करें:
• द्विवचन: तौ वामहस्तेन लिखतः। | युवां केन हस्तेन लिखथः? | आवां दक्षिणहस्तेन लिखावः।
• बहुवचन: ते वामहस्तेन लिखन्ति। | यूयं केन हस्तेन लिखथ? | वयं दक्षिणहस्तेन लिखामः।
पाठ-5: सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)
दान क्रिया के कर्म के द्वारा कर्ता जिसे पूरी तरह संतुष्ट या प्रसन्न करना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है (कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्)। सम्प्रदान कारक में हमेशा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।
चतुर्थी विभक्ति - अन्वेषण संवाद (आकांक्षा पद्धति):
जब हम क्रियापद को केंद्र में रखकर सीधे प्रश्न पूछते हैं कि कार्य "किसके लिए" (कस्मै / कस्यै) किया जा रहा है या क्रिया का मुख्य लक्ष्य क्या है, तब सम्प्रदान कारक स्वतः उभरता है।
केंद्रीय क्रियापद (Verb Anchor): यच्छति / ददाति (देता है)
निर्मित शुद्ध वाक्य: "जनकः कोषात् पुत्राय धनं यच्छति।"
(इस वैज्ञानिक विधि से छात्र बिना किसी हिंदी कारक चिह्न 'के लिए' को रटे, सीधे 'कस्मै' की आकांक्षा जगाकर शुद्ध वाक्य संरचना सीख जाते हैं।)
जब कोई क्रिया किसी प्रयोजन या उद्देश्य (Purpose) के लिए की जाती है, तब क्रियापद से 'किमर्थम्' (किसलिए) प्रश्न पूछकर वाक्य का विस्तार किया जाता है:
चतुर्थी विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):
व्यावहारिक वाक्य विन्यास एवं गद्य अनुप्रयोग:
• सः दरिद्राय धनं यच्छति।
• त्वं किं भिक्षुकाय भिक्षां यच्छसि?
• अहं तृषार्ताय जलं यच्छामि।
• माधवः क्षुधिताय भोजनं यच्छति।
• अध्यापकः छात्रेभ्यः / जितेन्द्राय / गणेशाय मोदकानि यच्छति।
पाठ-6: अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति)
जब कोई वस्तु या व्यक्ति किसी निश्चित स्थान या वस्तु से अलग (विश्लेष/विलगाव) होता है, तो उस स्थिर या ध्रुव स्थान की अपादान संज्ञा होती है (ध्रुवमपायेऽपादानम्)। अपादान कारक में हमेशा पञ्चमी विभक्ति (अपादाने पञ्चमी) का प्रयोग किया जाता है।
अन्वेषण संवाद (स्रोत/उत्पत्ति पहचान):
केंद्रीय क्रियापद: आयाति / पतति / गच्छति
पञ्चमी विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):
अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)
क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं (आधारोऽधिकरणम्) और अधिकरण वाचक पदों में हमेशा सप्तमी विभक्ति (सप्तम्याधिकरणे च) प्रयुक्त होती है। पाणिनीय शास्त्र के अनुसार आधार मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:
व्यावहारिक वाक्य विन्यास एवं गद्य अनुप्रयोग:
• मम मनसि सन्देहः वर्तते।
• नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति।
• जीवने किमपि असाध्यं कार्यं नास्ति।
• भवत्सु कः कर्मवीरः?
• वयं लोके निवसामः।
वाक्य में प्रयोग एवं आत्म-परीक्षण शृंखला:
• अहम् औषधालये वसामि। | अहं भोजनालये खादामि।
• अहं विद्यालये पठामि। | सः कार्यालये तिष्ठति।
• सः तत्रैव खादति। | सः आपणे न खादति। | सः भाट्यावासे न वसति।
१. त्वं कुत्र वससि? → अहं ………………… वसामि।
२. त्वं कुत्र खादसि? → अहं ………………… खादामि।
३. त्वं कुत्र पठसि? → अहं ………………… पठामि।
४. सः कुत्र तिष्ठति? → सः ………………… तिष्ठति।
पाठ-7: सम्बन्ध मात्र (षष्ठी विभक्ति)
षष्ठी विभक्ति - अन्वेषण संवाद (आकांक्षा पद्धति):
संस्कृत व्याकरण में क्रिया से साक्षात् संबंध न होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता (शेषे षष्ठी)। यहाँ हम क्रियापद के बजाय किसी संज्ञा पद से "किसका / किसकी" (कस्य / कस्याः) प्रश्न पूछकर दो संज्ञाओं के बीच का संबंध तय करते हैं।
केंद्रीय क्रियापद एवं संज्ञा: पश्यति (देखता है) ← शोभां / गृहम्
निर्मित शुद्ध वाक्य: "मोहनः उद्यानस्य शोभां पश्यति।"
(इस विधि से छात्र बिना हिंदी चिह्नों 'का, की, के' को रटे, सीधे संज्ञा पद के साथ 'कस्य' की आकांक्षा जगाकर सम्बन्ध मात्र में षष्ठी विभक्ति का शुद्ध प्रयोग करना सीख जाते हैं।)
जब वाक्यों में सर्वनाम पदों के साथ स्व-स्वामी या जन्य-जनक सम्बन्ध दर्शाना हो, तो 'कस्य' के उत्तर में अस्मद्-युष्मद् आदि के षष्ठी विभक्ति रूपों का प्रयोग होता है:
संस्कृत व्याकरण में क्रिया से साक्षात् संबंध न होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता, यह शेषे षष्ठी (सम्बन्ध) को दर्शाता है। यह मुख्य रूप से दो संज्ञाओं के बीच सम्बन्ध सूचित करती है।
प्रमुख सूत्र एवं उदाहरण:
अभ्यास वाक्य:
• कृष्णस्य वर्णः श्यामः अस्ति।
• मम देहस्य वर्णोऽपि श्यामः अस्ति।
• विद्यालयस्य नाम...
विशेष विवेचन: उपपद विभक्ति का सिद्धांत
संस्कृत व्याकरण में विभक्तियाँ दो प्रकार से निर्धारित होती हैं। जब वाक्य में किसी विशिष्ट अव्यय या पद (जैसे— नमः, स्वस्ति, प्रति, सह, विना आदि) की उपस्थिति के कारण कोई निश्चित विभक्ति आती है, तो उसे उपपद विभक्ति कहते हैं। इसके विपरीत, क्रिया के साथ सीधे संबंध (कारकSlot) के कारण जो विभक्ति आती है, उसे कारक विभक्ति कहा जाता है।
पदमाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः उपपदविभक्तिः।
क्रियामाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः कारकविभक्तिः।
उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी॥
इस सिद्धांत का व्यावहारिक अर्थ एवं अनुप्रयोग:
यदि किसी वाक्य में एक ही पद को लेकर उपपद विभक्ति और कारक विभक्ति दोनों के नियम एक साथ प्राप्त हो रहे हों, तो वहाँ हमेशा कारक विभक्ति ही बलवान (बलीयसी) मानी जाएगी, और उपपद का नियम स्वतः निरस्त हो जाएगा।
• नियम विरुद्ध स्थिति (भ्रम): 'नमः' पद के योग में सामान्यतः चतुर्थी विभक्ति का नियम है (रामाय नमः)। इस आधार पर यदि वाक्य हो 'मुनित्रय को नमस्कार करके', तो छात्र भ्रमवश चतुर्थी लगाकर "मुनित्रयाय नमस्कृत्य" लिख देते हैं, जो कि अशुद्ध है।
• शुद्ध कारक स्थिति: यहाँ 'नमः' के साथ 'करोति' (कृ धातु) क्रियापद का सीधा योग है। क्रिया आश्रित होने के कारण यहाँ कारक विभक्ति (द्वितीया) बलवान होगी। इसलिए शुद्ध वाक्य बनेगा—
→ "मुनित्रयं नमस्कृत्य" (यहाँ द्वितीया विभक्ति ही शास्त्रसम्मत है)।
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विशेष छात्र मार्गदर्शन: पाणिनीय सूत्र एवं सविस्तार अध्ययन
प्रिय छात्रो! अबतक आपने इस पाठ के ऊपरी भाग में "आकांक्षा पद्धति" (Direct Method) के माध्यम से क्रियापद से सीधे प्रश्न पूछकर वाक्य का मूल ढांचा (Slots) तैयार करना सीखा है। वाक्य-निर्माण और अर्थ-बोध का यह आपका पहला व्यावहारिक चरण था।
संस्कृत भाषा की अगाध शुद्धता, शास्त्रीय सूक्ष्मताओं और परीक्षाओं में पूछे जाने वाले विशिष्ट नियमों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के लिए पाणिनीय सूत्रों का गहरा ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य हेतु इस पृष्ठ पर नीचे की ओर प्रत्येक विभक्ति को उसके सभी मूल सूत्रों, वार्तिकों, विशेष अपवादों तथा विविध शास्त्रीय उदाहरणों के साथ यथावत् सविस्तार प्रस्तुत किया गया है।
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अब तक आप संस्कृत शिक्षण पाठशाला 1 में संस्कृत भाषा के वर्ण तथा शब्द के स्वरूप से भली भाँति परिचित हो गये। इसके बाद के अध्यायों में हम अधोलिखित वाक्य पर विचार करेंगें।
1. वाक्यों में क्रिया का कारक के साथ सम्बन्ध/ समन्वय के लिए कारक विभक्ति तथा उपपद विभक्ति।
2. सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर विचार (षष्ठी विभक्ति)
1. 'प्रातिपादिकार्थलिंगपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा' - शब्द के मूल रूप ( बिना विभक्ति के ) को प्रातिपादिक कहते हैं। मूल शब्द के अर्थ बोध में, लिंग ज्ञान के लिए, मात्रा जानने तथा वचन के अर्थ में प्रथमा विभक्ति होती है। जब तक हम किसी मूल शब्द में विभक्ति नहीं लगाते हैं तब तक उसका अर्थ ज्ञान नहीं हो पाता है। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा अव्यय शब्दों के अर्थ ज्ञान के लिए मूल शब्द में प्रथमा विभक्ति लगाते हैं। किस शब्द का किस लिंग में प्रयोग होता है,यह जानकारी प्रथमा विभक्ति द्वारी होती है, जैसे केवल एक लिंग- मानवः, फलम्। अनेक लिंग की जानकारी के लिए- तटः तटी तटम्। मात्रा का उदाहरण- प्रस्थो ब्रीहिः- आधा सेर चावल। संख्या का उदाहरण- एकः द्वौ, बहवः ।
2. स्वतन्त्रः कर्ता- क्रिया के सम्पादन में जो स्वतन्त्र हो, उसे कर्ता कारक कहते है। जैसे- हरिः पुस्तकं पठति । यहाँ पढ़ने की क्रिया का सम्पादक 'हरि' है। अतः हरि में प्रथमा विभक्ति हुई ।
3. 'कर्त्तरि प्रथमा ' अथवा 'उक्ते कर्तरि प्रथमा' – क्रिया के सम्पादक को कर्ता कारक कहते हैं । कर्तृवाच्य के कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है जैसे- गोपालः गृहं गच्छति । यहाँ जाने की क्रिया को सम्पन्न करनेवाले कर्त्ताकारक 'गोपाल' में प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्तृवाच्य की क्रिया में कर्त्ता उक्त अर्थात् प्रधान रहता है। अतः कर्तृवाच्य के कर्त्ता में यहाँ प्रथमा विभक्ति हुई ।
4. सम्बोधन में प्रथमा- सम्बोधन को कारक के अन्तर्गत नहीं मान जाता। इसके लिए प्रथमा विभक्ति का उपयोग किया जाता है। किसी किसी शब्द का सम्बोधन में आंशिक रूप परिवर्तन हो जाता है। अतः शब्दरूप में सम्बोधन का भी शब्दरूप लिखा जाता है।
6. संस्कृत में क्रिया अथवा व्यापार को ही मुख्य माना जाता है। इस भाषा में क्रिया के आधार पर ही कारक निश्चित होते हैं। क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। इस नियम के कारण पचति, खेलति, पठति आदि में काल, पुरुष तथा वचन निश्चित हैं, अतः उसी के अनुसार कारक का प्रयोग होता है।
7. कर्तृवाच्य में क्रिया का सम्बन्ध कर्ता के साथ होता है अतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है, जबकि कर्म वाच्य में क्रिया के साथ कर्म का सम्बन्ध होता है अतः वहाँ पर कर्ता में प्रथमा विभक्ति नहीं होती। यही स्थिति भाववाच्य की भी है। वाच्य के बारे में एक अलग अध्याय में पृथक् से चर्चा की जाएगी।
8. 'उक्ते कर्मणि प्रथमा'- कर्म वाच्य में कर्म के उक्त (प्रधान/मुख्य) रहने पर उसमें (उक्त या प्रमुख कर्म में ) प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रिया कर्म के अनुरूप होती है। अर्थात् क्रिया में वही विभक्ति तथा वचन होंगें ,जो कि कर्म में है। जैसे- मया चन्द्रः दृश्यते । रामेण रावणः हतः । यहाँ 'चन्द्र' और 'रावण' कर्मवाच्य के उक्त कर्म है। अतः इनमें प्रथमा विभक्ति हुई है।
9. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा – इति, नाम और अपि अव्ययों के योग में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे- अमुं नारद इति अबोधि ( उनको नारद ऐसा जाना ) । जनको नाम राजा अभूत् ( जनक नाम के राजा हुए ) । तस्य कन्या सीता नाम आसीत् ( उनकी कन्या का नाम सीता था ) । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम् ( विष के पेड़ को भी बढ़ाकर अपने आप काटना उचित नहीं है ) ।
अभ्यास- 1
अकारान्त पुल्लिंग शब्दों की प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें ।
पुल्लिंग संज्ञा शब्द एकवचन का प्रयोग-
अश्वः धावति । गजः धावति । अश्वः गजः च धावतः । अश्वः, गजः वृषभः च धावन्ति ।
अश्वः खादति । गजः खादति । वृषभः खादति । अश्वः, गजः च खादतः । अश्वः, गजः वृषभः च खादन्ति ।
पुल्लिंग संज्ञा शब्द द्विवचन का प्रयोग-
अश्वौ धावतः । गजौ धावतः । वृषभौ धावतः ।
पुल्लिंग संज्ञा शब्द बहुवचन का प्रयोग-
गजाः धावन्ति । वृषभाः धावन्ति ।
सर्वनाम शब्द एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन का प्रयोग-
सः खादति । तौ खादतः । ते खादन्ति । । तौ धावतः । ते धावन्ति ।
अभ्यास- 2
रिक्त स्थान पर सः तौ ते में से किसी एक का चयन कर सही शब्द लिखें।
. …….धावति । ……… खादन्ति। ……… खादतः । …… लिखति।
अभ्यास- 3
निम्नलिखित संज्ञाओं या सर्वनामों के बाद 'धाव्' 'खाद्' 'लिख्' पिव्' धातुओं की क्रिया को लिखें।
वृषभः ………। बालकौ ………। तौ ………। राम: ………। ते ………। सः ………। मनुष्याः ………। कृष्णः ………। ते ………।
अभ्यास- 4
निम्नलिखित क्रियाओं से पूर्व कर्ता चुनकर लगाइए। यह ध्यान रहे कि कर्ता जिस वचन का है, क्रिया भी उसी वचन का हो। रिक्त स्थान पर एक बार एक शब्द का ही प्रयोग कीजिए:
कर्ता- मोहनः । वृषभौ । वृषभाः । गजः । वानरौ । गजाः। मयूरः । अश्वौ । अश्वाः ।
……… धावतः । ……… खादति। ……… धावन्ति । ……… पिवन्ति । ……… वदतः । ……… धावन्ति । ……… खादतः । ……… धावति । ……… यच्छति ।
अभ्यास- 5
अकारान्त पुल्लिंग तथा नपुंसकलिंग शब्दों की प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें । पुल्लिंग में जिस अर्थ में 'सः, तौ, ते' का प्रयोग होता है, उसी अर्थ में नपुंसकलिंग के शब्दों के लिए 'तत्, ते, तानि का प्रयोग होता है।
फलम् पतति । फले पततः। फलानि पतन्ति ।
पत्रम् पतति । पत्रे पततः । पत्राणि पतन्ति ।
तत् फलम् पतति । तत् पत्रम् पतति ।
तानि फलानि पतन्ति । तानि पत्राणि पतन्ति ।
सः बालकः पतति । तौ बालकौ पततः । ते बालकाः पतन्ति ।
तत्र पत्राणि फलानि च पतन्ति । सः अश्वः पतति । तौ अश्वौ पततः। ते अश्वाः पतन्ति । ते फले पततः । तत् चित्रम् पतति। ते चित्रे पततः । तानि चित्राणि पतन्ति ।
ध्यान रखिए कि ह्रस्व अ से समाप्त होने वाले पुंलिंग शब्दों के रूप तो 'अश्व' या 'बालक' के समान चलेंगे और नपुंसकलिंग शब्दों के रूप 'फल' की तरह।
अभ्यास- 6
अकारान्त पुल्लिंग शब्द :- मनुष्य, पुरुष, अध्यापक, छात्र, सिंह, मयूर, शशक, वृक्ष, वानर और अकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों पुस्तक, गृह, चक्र, पुष्प, नेत्र, जल, दुग्ध, चित्र, आम्र शब्द के रूपों का तीन-तीन बार उच्चारण कीजिए। जैसे- मनुष्यः, मनुष्यौ, मनुष्याः । फलम्, फले, फलानि।
निम्न शब्दों से पूर्व लिंग और वचन देखकर सः तौ, ते। तत्, ते, तानि' में से ठीक शब्द भरिए
………… बालकौ । ………… पत्राणि । ………… अश्वः । ………… बालकाः । ………… अश्वः । ………… दुग्धम् । ………… गृहम् । ………… पत्राणि । ………… पत्रे । ……… तीर्थौ । ………… चक्रे। ………… पुष्पाणि।
अभ्यास- 7
आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें ।
पुल्लिंग में जिस अर्थ में 'सः, तौ, ते' का प्रयोग किया जाता हैं, उसी अर्थ में स्त्रीलिंग में 'सा, ते, ताः' का प्रयोग होता है।
बालिकाः पठन्ति। बालिका पठति । सा बालिका सीता अस्ति । सा तत्र पठति । ते रमा लीला च पठतः । ते तत्र पठतः । ते अत्र पठतः । रमा लीला च तत्र पठतः । लता, ललिता, अर्चना, सुषमा च तत्र पठन्ति । ताः अत्र न पठन्ति । ताः बालिकाः तत्र पठन्ति ।
गीता क्रीडति । शुभा सरिता च क्रीडतः । ताः बालिकाः सन्ति । ताः हसन्ति । सीता लिखति । सा लिखति । सीता गीता च लिखतः । ते लिखतः । रमा, उमा, शीला च धावन्ति । ताः धावन्ति । ताः पठन्ति । ताः क्रीडन्ति । ताः हसन्ति ।
उपर्युक्त की तरह- लता (बेल), अजा (बकरी), कलिका (कली), कन्या, सरिता (नदी), नौका, वाटिका, बाला, रमा, सीता, शीला, सुभद्रा, शोभा शब्द से सभी वचनों में वाक्य बनायें।
याद रखें कि हिन्दी में कर्ता के अनुसार क्रिया का भी लिंग होता है परन्तु संस्कृत की क्रियाएँ सभी लिंगों में समान होती हैं। जैसे 'पठति' का अर्थ पढ़ता है और पढ़ती है, दोनों है।
प्रथमा विभक्ति, भूतकाल का उदाहरण-
शब्दकोश-
सा = वह एक (she) ते = वे दो (those two ) ताः = वे सब (those)
पठ् = पढ़ना (to read) हस् = हँसना (to laugh) लिख् = लिखना (to write) क्रीड् = खेलना (to play) अस्ति = है (is) सन्ति = हैं (are)
अभ्यास- 8
सर्वनाम का अभ्यास
नीचे दिए वाक्यों में रिक्त स्थानों पर लिंग और वचन को देखकर "सः, तौ, ते; तत्, ते, तानि; सा, ते ताः" में से ठीक शब्द लिखें।
…….. बालकाः क्रीडन्ति । …….. बालकौ हसतः । …….. शीला अस्ति । …….. कन्याः हसन्ति । …….. पत्राणि पतन्ति । …….. बालिके लिखतः । …….. कृष्णः अस्ति । …….. फले पततः । …….. अश्वः खादति । …….. तत्र क्रीडतः । …….. तत्र पठन्ति । …….. सुधा अस्ति। …….. कन्ये हसतः । …….. लिखति ।
पाठ- 3
2. कर्म कारक - द्वितीया विभक्ति
1. क्रिया के द्वारा कर्ता का जो सबसे अधिक इच्छित होता है उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। (सामान्य नियम) जैसे- राम सीता को बुलाता है। रामः सीतां आह्वयति। यहाँ क्रिया के द्वारा कर्ता राम को इच्छित है सीता को बुलाना। अतः सीता में द्वितीया विभक्ति होगी। सबसे इच्छित में द्वितीया विभक्ति का दूसरा उदाहरण- राम दूध के साथ भात खाता है। इसमें राम दूध तथा भात दोनों खा रहा है, परन्तु इन दोनों में से इच्छित है- भात (ओदन) खाना। अतः इसमें द्वितीया विभक्ति होकर रामः पयसा ओदनं खादति बनेगा।
सामान्य नियम के अनुसार हिन्दी में "को" जिस शब्द के अंत में हो उसमें द्वितीया विभक्ति लगाना चाहिए।
4. क्रियाविशेषणे द्वितीया- जो क्रिया की विशेषता बताता है, उसे क्रियाविशेषण कहते हैं और क्रियाविशेषण में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे गीता मधुरं गायति । अर्धो घटः अधिकं शब्दायते ( अधजल गगरी छलकत जाय ) । मन्दं मन्दं नुदति पवनः । कोकिल: मधुरं कूजति । यहाँ मधुरम्, अधिकम् और मन्दं मन्दं क्रियाविशेषण हैं। अतः इनमें द्वितीया विभक्ति हुई है ।
5. 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे'- अत्यन्त संयोग ( अतिशय लगाव, लगातार या व्याप्ति ) अर्थ रहने पर कालवाची और मार्गवाची पदों में द्वितीया विभक्ति होती है । जैसे—स मासमधीते व्याकरणम् ( बिना व्यवधान के वह महीने भर व्याकरण पढ़ता है ) । क्रोशं कुटिला नदी ( नदी कोश भर तक टेढ़ी-मेढ़ी है ) । यहाँ अत्यन्त संयोग में कालवाची 'मासम्' और मार्गवाची 'क्रोशम्' में द्वितीया हुई।
6. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा – इति, नाम और अपि अव्ययों के योग में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे- अमुं नारद इति अबोधि ( उनको नारद ऐसा जाना ) । जनको नाम राजा अभूत् ( जनक नाम के राजा हुए ) । तस्य कन्या सीता नाम आसीत् ( उनकी कन्या का नाम सीता था ) । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम् ( विष के पेड़ को भी बढ़ाकर अपने आप काटना उचित नहीं है ) ।
7. 'उक्ते कर्मणि प्रथमा'- कर्म वाच्य में कर्म के उक्त (प्रधान/मुख्य) रहने पर उसमें (उक्त या प्रमुख कर्म में ) प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रिया कर्म के अनुरूप होती है। अर्थात् क्रिया में वही विभक्ति तथा वचन होंगें ,जो कि कर्म में है। जैसे- मया चन्द्रः दृश्यते । रामेण रावणः हतः । यहाँ 'चन्द्र' और 'रावण' कर्मवाच्य के उक्त कर्म है। अतः इनमें प्रथमा विभक्ति हुई है। क्रिया प्रथम पुरुष एकवचन की हुई।
द्वितीया विभक्ति का उदाहरण-
विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति ।
कर्मवाच्य पर आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी।
3. करण कारक - तृतीया विभक्ति
कर्ता जिसकी सबसे अधिक सहायता से कार्य करता है उसे करण कहते हैं। जैसे- मोहनः लेखन्या लिखति। यहाँ पर मोहन लेखनी की सहायता से लिखता है,अतः लेखनी करण है। इसमें तृतीया विभक्ति होगी।वाच्य परिवर्तन के अध्याय में उक्त तथा अनुक्त कर्ता के बारे में विशेष चर्चा होगी। यहाँ उक्त तथा अनुक्त कर्ता के कतिपय उदाहरण दिया जा रहा है।
सः वामहस्तेन लिखति । त्वं केन हस्तेन लिखसि ? अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि । सः वामपादेन चलति । त्वं केन पादेन चलसि ? अहं केन अपि पादेन न चलामि । त्वं कथं चलसि ? अहं पादाभ्यां चलामि। त्वं कथम् आकर्णयसि ? अहं कर्णाभ्याम् आकर्णयामि । त्वम् इक्षुदण्डं कथं चर्वसि ? अहं दन्तै: इक्षुदण्डं चर्वामि । त्वं केन सह खेलसि ? अहं कृष्णेन सह खेलामि।
इन वाक्यों का पुरुष तथा वचन परिवर्तन कर लिखें ।
सः वामहस्तेन लिखति । त्वं केन हस्तेन लिखसि ? अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि । तौ वामहस्तेन लिखतः । युवां केन हस्तेन लिखथः ? आवां दक्षिणहस्तेत लिखावः । ते वामहस्तेन लिखन्ति । यूयं केन हस्तेन लिखथ ? वयं दक्षिणहस्तेन लिखामः ॥
4. सम्प्रदान कारक - चतुर्थी विभक्ति
अध्यापकः छात्रेभ्यः मोदकानि यच्छति।
अध्यापकः जितेन्द्राय मोदकं यच्छति ।
अध्यापकः गणेशाय मोदके यच्छति।
अध्यापक: ज्येष्ठेभ्यः बालकेभ्यः मोदकानि यच्छति ।
ब्राह्मणेभ्यः मधुरं प्रियम् । भगवते विष्णवे नमः । मोहनाय आम्राणि रोचन्ते । मह्यं पायसं स्वदते। विप्राय धनं ददाति । मह्यं संस्कृतं रोचते । मह्यं चत्वारि फलानि देहि ।
(5) श्लाघह्नुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः
श्लाघृँ कत्थने - भ्वादिः ( प्रशंसा करना), ह्नुङ् अपनयने - अदादिः ( छिपाना), ष्ठा गतिनिवृत्तौ - भ्वादिः (ठहरना), तथा शपँ आक्रोशे - भ्वादिः ( उपालम्भ करना ) धातुओं के योग में जिसकी प्रशंसा आदि की जाय उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। जैसे- गोपी कामात् कृष्णाय श्लाघते। नन्दिनी स्मरात् कृष्णाय श्लाघते, ह्रुते, तिष्ठते, शपते वा ।
अन्य नियमों की जानकारी के लिए व्याकरण की मूल पुस्तक अष्टाध्यायी या सिद्धान्तकौमुदी का अध्ययन करें।
चतुर्थी विभक्ति का वाक्य में प्रयोग-
सः दरिद्राय धनं यच्छति । त्वं किं भिक्षुकाय भिक्षां यच्छसि? अहं तृषार्ताय जलं यच्छामि । माधवः क्षुधिताय भोजनं यच्छति ।
5. अपादान कारक - पञ्चमी विभक्ति
सामान्य नियमअपादाने पञ्चमी
6. अधिकरण कारक - सप्तमी विभक्ति
मम मनसि सन्देहः वर्तते ।
सप्तमी विभक्ति का वाक्य में प्रयोग करें-
अहम् औषधालये वसामि । अहं भोजनालये खादामि । अहं विद्यालये पठामि । सः कार्यालये तिष्ठति । सः तत्रैव खादति । सः आपणे न खादति । सः भाट्यावासे न वसति ।
संस्कृत में उत्तर लिखें- त्वं कुत्र वससि ? त्वं कुत्र खादसि ? त्वं कुत्र पठसि ? तिष्ठति ? सः कुत्र खादति ? सः कुत्र वसति ? सः दीननाथः कुत्र गच्छति ? पुलिनेषु कः विहसति
षष्ठी विभक्ति-
शेषे षष्ठी - कारक के अतिरिक्त स्व स्वामी आदि संबंधों में षष्ठी विभक्ति होती है।क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता है। संबंधों दो के बीच में होता है ।यह विभक्ति प्रायशः एक संज्ञा शब्द का दूसरे संज्ञा शब्द के साथ सम्बन्ध सूचित करता है। यह संबंध अनेक प्रकार का होता है जैसे पिता पुत्र के बीच जन्य जनक भाव संबंध, दो पदार्थों के बीच प्रकृति विकृति भाव संबंध, कार्य कारण भाव संबंध,स्व स्वामी भाव संबंध आदि।
कृष्णस्य वर्णः श्यामः अस्ति । मम देहस्य वर्णोऽपि श्यामः अस्ति । तस्य देहस्य वर्ण: कः अस्ति ? — श्यामः वा गौर: वा ? अस्य देहस्य वर्णः ताम्रः अस्ति । तव केशस्य रङ्गः कृष्णः अस्ति । अस्माकं विद्यालयस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति । युष्माकं विद्यालयस्य नाम किम् अस्ति ? तेषां विद्यालयस्य नाम किम् अस्ति ? एतेषां विद्यालयस्य नाम किम् अस्ति? युष्माकं संस्कृतशिक्षकस्य नाम किम् अस्ति ?
उपपद विभक्ति- नमः, स्वस्ति, प्रति, सह, विना आदि शब्द पद कहे जाते हैं। कारक प्रकरण में कुछ विभक्तियां पदों के कारण निर्धारित होती है। यथा नमः के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। सह के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यदि किसी विभक्ति में पद तथा कारक दोनों विभक्ति प्राप्त हो तो कारक विभक्ति होती है। पदमाश्रित्योत्पन्नाविभक्तिः उपपदविभक्तिः। क्रियामाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः कारकविभक्तिः। उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः वलीयसी।
अभ्यास के लिए विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। कारक, सन्धि, तिङन्त, कृदन्त शब्दों का विश्लेषण, निर्माण पदों को आपस में मिलाने परिचय आदि विभिन्न कार्यों के लिए संसाधनी पर क्लिक करें। इसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया।






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