संस्कृत शिक्षण पाठशाला: 8 कारक प्रकरण (नियम एवं उदाहरण)

कारक-प्रकरणम्: वाक्य-निर्माण-सरणिः (भूमिका)

प्रिय छात्रो एवं पाठकवृन्द! संस्कृत भाषा में शुद्ध वाक्य निर्माण करने और लिखे हुए वाक्यों का सटीक अर्थ समझने के लिए कारक और विभक्ति नियमों का ज्ञान होना अनिवार्य है। यह संस्कृत शिक्षण पाठशाला का वह महत्वपूर्ण पड़ाव है जहाँ से आप रटने की परिपाटी को छोड़कर संस्कृत को उसकी मूल प्रकृति से समझना शुरू करेंगे।

इस पाठ का मुख्य उद्देश्य

प्रायः संस्कृत सीखते समय छात्र हिंदी वाक्यों का संस्कृत में अनुवाद (Translation Method) करने लगते हैं, जिससे वाक्य संरचना में त्रुटियाँ होती हैं। इस पाठशाला का उद्देश्य हिंदी को आधार बनाए बिना, सीधे संस्कृत-से-संस्कृत (Direct Method) की ओर बढ़ना है। यहाँ हिंदी केवल एक सहयोगी (Supportive Tool) की भूमिका में होगी, न कि सीखने के आधार के रूप में।

क्रिया ही वाक्य की आत्मा है

पाणिनीय व्याकरण का मूल सिद्धांत है— 'क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्'। इसका अर्थ है कि वाक्य में क्रिया (Verb) ही सबसे प्रधान तत्व होती है और वाक्य के अन्य सभी पद (संज्ञा, सर्वनाम आदि) किसी न किसी रूप में उसी क्रिया को पूरा करने के लिए उससे जुड़े होते हैं। क्रिया से सीधे जुड़े इसी संबंध को हम 'कारक' कहते हैं।

आकांक्षा पद्धति (चार्ट)

जब हम किसी क्रियापद को केंद्र में रखकर उससे प्रश्न पूछते हैं, तो सभी कारक एक अनुक्रम में स्वतः बाहर आते हैं। नीचे दिए गए चार्ट के माध्यम से इसे समझें:

ददाति (देता है)
कः?
कर्ता
(प्रथमा)
किम्?
कर्म
(द्वितीया)
केन?
करण
(तृतीया)
कस्मै?
सम्प्रदान
(चतुर्थी)
कुतः?
अपादान
(पञ्चमी)
कुत्र?
अधिकरण
(सप्तमी)

हम कैसे सीखेंगे?

इस पाठ में हम किसी कृत्रिम नियम या चिह्नों को रटने के बजाय "आकांक्षा पद्धति" (Syntactic Expectancy) का आश्रय लेंगे। हम वाक्य की क्रिया को केंद्र में रखेंगे और उससे संस्कृत में ही प्रश्न पूछेंगे। क्रिया से प्रश्न पूछने पर जो उत्तर प्राप्त होगा, वही हमारे कारक को तय करेगा:

  • कः/का? (कौन कर रहा है?) → कर्ता (प्रथमा विभक्ति)
  • किम्? (क्या कर रहा है / मुख्य लक्ष्य क्या है?) → कर्म (द्वितीया विभक्ति)
  • केन? (किस साधन की सहायता से कर रहा है?) → करण (तृतीया विभक्ति)
  • कस्मै? (किसके लिए या किसे संतुष्ट करने के लिए कर रहा है?) → सम्प्रदान (चतुर्थी विभक्ति)
  • कुतः? (कहाँ से अलग होकर या किस स्रोत से कार्य हो रहा है?) → अपादान (पञ्चमी विभक्ति)
  • कुत्र/कस्मिन्? (यह क्रिया किस स्थान या आधार पर घटित हो रही है?) → अधिकरण (सप्तमी विभक्ति)

जब आप क्रिया से इस प्रकार संवाद करना सीख जाएंगे, तो संस्कृत का कितना भी बड़ा या जटिल वाक्य क्यों न हो, आप स्वतः उसका सही अर्थ निकाल सकेंगे और बिना किसी डर के स्वयं शुद्ध वाक्यों का निर्माण कर सकेंगे। आइए, इसी क्रमबद्ध और वैज्ञानिक पद्धति से संस्कृत के इस सुंदर संसार में प्रवेश करें और कारक नियमों को उनके व्यावहारिक रूप में समझें।

पाठ-1: कर्ता कारक (प्रथमा विभक्ति)

अबतक हम वर्णों, शब्दों, लिंगों (अकारान्त, इकारान्त आदि) तथा उनके सुबन्त रूपों से परिचित हो चुके हैं। इस अध्याय में हम किसी हिंदी अनुवाद का आश्रय लिए बिना, सीधे क्रिया-केन्द्रित संवाद (आकांक्षा पद्धति) के माध्यम से वाक्य निर्माण और उनका शुद्ध अर्थ निकालना सीखेंगे।

अन्वय संवाद प्रणाली (व्यावहारिक उदाहरण):

केंद्रीय क्रियापद: पठति (अथवा अत्ति, लिखति, ददाति)

  • कः पठति?रमेशः पुस्तकं पठति। (रमेशः = कर्ता)
  • कं अत्ति? → मृगः तृणं अत्ति। (तृणम् = कर्म)
  • केन लिखति? → बालकः लेखिन्या पत्रं लिखति। (लेखिन्या = करण)
  • कस्मै ददाति? → पिता पुत्राय धनं ददाति। (पुत्राय = सम्प्रदान)

प्रथमा विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):

  • 1. प्रातिपादिकार्थलिंगपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा
    मूल शब्द (प्रातिपादिक) के केवल अर्थ का बोध कराने में, लिंग मात्र का ज्ञान कराने में, परिमाण (मात्रा) और संख्या/वचन का बोध कराने में प्रथमा विभक्ति होती है।
    उदारहण:
    लिंग ज्ञान: मानवः, फलम् (नियतलिंग), तटः तटी तटम् (अनियतलिंग)
    परिमाण: प्रस्थो ब्रीहिः (आधा सेर चावल) | वचन: एकः, द्वौ, बहवः
  • 2. स्वतन्त्रः कर्ता / कर्त्तरि प्रथमा
    क्रिया को करने में जो पूरी तरह स्वतंत्र हो, उसे कर्ता कहते हैं। कर्तृवाच्य के उक्त (प्रधान) कर्ता में हमेशा प्रथमा विभक्ति आती है।
    उदाहरण: हरिः पुस्तकं पठति | गोपालः गृहं गच्छति (यहाँ हरि और गोपाल क्रिया के स्वतंत्र संपादक और प्रधान हैं)।
  • 3. उक्ते कर्मणि प्रथमा (कर्मवाच्य नियम)
    जब वाक्य कर्मवाच्य (Passive Voice) में हो, तो क्रिया कर्म के अनुसार चलती है और प्रमुख कर्म में द्वितीया न होकर प्रथमा विभक्ति लगती है।
    उदाहरण: मया चन्द्रः दृश्यते | रामेण रावणः हतः (यहाँ चन्द्रः और रावणः उक्त कर्म हैं, इसलिए इनमें प्रथमा है)।
  • 4. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा
    इति, नाम और अपि अव्यय पदों के योग में संज्ञा शब्दों के साथ प्रथमा विभक्ति का विधान होता है।
    उदाहरण:
    • अमुं नारद इति अबोधि। | जनको नाम राजा अभूत्।
    • तस्य कन्या सीता नाम आसीत्। | विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम्।
  • 5. सम्बोधन में प्रथमा
    सम्बोधन को स्वतंत्र कारक नहीं माना जाता, बल्कि किसी को पुकारने के लिए शब्दरूप में आंशिक परिवर्तन के साथ प्रथमा विभक्ति का ही उपयोग किया जाता है।

विशेष्य-विशेषण अनिवार्य संरचना सूत्र:

यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।
तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥

नियम: जो लिंग, जो वचन और जो विभक्ति विशेष्य (Noun) की होगी, ठीक वही लिंग, वचन और विभक्ति उसके विशेषण (Adjective) की भी होगी। यही अटूट नियम सम्बन्धी और सम्बन्धवाची पदों पर भी लागू होता है।

व्यावहारिक अभ्यास शाला (वाक्य अनुप्रयोग)

नीचे दिए गए अभ्यासों के माध्यम से अकारान्त पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसकलिंग पदों के साथ वर्तमान काल (लट् लकार) की क्रियाओं का शुद्ध समन्वय देखें:

1. पुल्लिंग संज्ञा एवं सर्वनाम प्रयोग (लट् लकार):

  • एकवचन: अश्वः धावति | गजः धावति | सः खादति | एते प्रसन्नाः सन्ति।
  • द्विवचन: अश्वौ धावतः | गजौ धावतः | वृषभौ धावतः | तौ खादतः।
  • बहुवचन: गजाः धावन्ति | वृषभाः धावन्ति | छात्राः प्रसन्नाः सन्ति | ते खादन्ति।
  • मिश्रित वाक्य: अश्वः गजः च धावतः | अश्वः, गजः वृषभः च धावन्ति / खादन्ति।
स्वयं पूरा करें (अभ्यास):
१. ....... धावति। २. ......... खादन्ति। ३. ......... खादतः। ४. …… लिखति। (विकल्प: सः / तौ / ते)

2. नपुंसकलिंग शब्द प्रयोग:

याद रखें: जहाँ पुल्लिंग में 'सः, तौ, ते' होता है, वहाँ नपुंसकलिंग में 'तत्, ते, तानि' चलता है।

  • वाक्य प्रवाह: फलम् पतति → फले पततः → फलानि पतन्ति।
  • पत्रम् पतति → पत्रे पततः → पत्राणि पतन्ति।
  • तत् फलम् पतति | तानि फलानि पतन्ति | ते फले पततः | तत् चित्रम् पतति | तानि चित्राणि पतन्ति।

3. आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द प्रयोग:

स्त्रीलिंग में सर्वनाम रूप 'सा, ते, ताः' का प्रयोग होता है। संस्कृत की क्रियाएँ सभी लिंगों में समान रहती हैं (जैसे: 'पठति' का अर्थ पढ़ता है और पढ़ती है, दोनों है)।

    व्यावहारिक अभ्यास: धातु एवं क्रिया समन्वय (अभ्यास-3)

    नीचे दी गई संज्ञाओं या सर्वनामों के बाद पुरुष और वचन के अनुसार 'धाव्' (दौड़ना), 'खाद्' (खाना), 'लिख्' (लिखना), 'पिब' (पीना) धातुओं के सही लट् लकार रूपों को भरें:

    १. वृषभः ……………।
    २. बालकौ ……………।
    ३. तौ ……………।
    ४. रामः ……………।
    ५. ते ……………।
    ६. सः ……………।
    ७. मनुष्याः ……………।
    ८. कृष्णः ……………।

    कर्ता चयन एवं पद संगति अभ्यास (अभ्यास-4)

    दिए गए कर्ता पद: मोहनः, वृषभौ, वृषभाः, गजः, वानरौ, गजाः, मयूरः, अश्वौ, अश्वाः।
    क्रिया के वचन को पहचानकर रिक्त स्थान में केवल एक बार सही कर्ता पद का प्रयोग करें:

    १. ……… धावतः।
    २. ……… खादति।
    ३. ……… धावन्ति।
    ४. ……… पिबन्ति।
    ५. ……… वदतः।
    ६. ……… धावन्ति।
    ७. ……… खादतः।
    ८. ……… धावति।

    शब्दरूप परिचय एवं सर्वनाम चयन (अभ्यास-5)

    निम्नलिखित अकारान्त पुल्लिंग एवं नपुंसकलिंग शब्दों का लिंग और वचन देखकर रिक्त स्थानों में सही सर्वनाम शब्द (सः, तौ, ते / तत्, ते, तानि) भरें:

    … बालकौ
    … पत्राणि
    … अश्वः
    … बालकाः
    … दुग्धम्
    … गृहम्
    … पत्रे
    … चक्रे
    … पुष्पाणि

    विशिष्ट भाषाई अनुप्रयोग: प्रथमा विभक्ति (भूतकाल)

    संस्कृत में केवल वर्तमान काल ही नहीं, बल्कि भूतकाल के संदर्भों में भी कर्ता अपनी प्रथमा विभक्ति के मूल स्वरूप को अक्षुण्ण रखता है, जैसे—

    • • अशोकः सम्राट् आसीत्। (सम्राट अशोक थे।)
    • • मदनमोहन-मालवीयः देशभक्तः आसीत्। (मदनमोहन मालवीय देशभक्त थे।)

    समेकित सर्वनाम अभ्यास (अभ्यास-6)

    संपूर्ण पाठ के आधार पर लिंग और वचन को पहचानकर "सः, तौ, ते; तत्, ते, तानि; सा, ते, ताः" में से सर्वथा शुद्ध विकल्प का चयन कर रिक्त स्थान भरें:

    १. …….. बालकाः क्रीडन्ति।
    २. …….. बालकौ हसतः।
    ३. …….. शीला अस्ति।
    ४. …….. कन्याः हसन्ति।
    ५. …….. पत्राणि पतन्ति।
    ६. …….. बालिके लिखतः।
    ७. …….. कृष्णः अस्ति।
    ८. …….. फले पततः।
    ९. …….. अश्वः खादति।
    १०. …….. सुधा अस्ति।

    पाठ-2: कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)

    क्रिया-केन्द्रित प्रवाह (आकांक्षा पद्धति) के अंतर्गत कर्ता अपनी क्रिया के द्वारा जिसे सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, वह कर्म में आता है। बिना हिंदी के 'को' चिह्न को रटे, सीधे क्रिया से 'किम्' (क्या) अथवा 'कम् / काम्' (किसको) प्रश्न पूछकर हम कर्म कारक को पहचानते हैं।

    अन्वय संवाद प्रणाली (व्यावहारिक उदाहरण):

    केंद्रीय क्रियापद: पठति (अथवा खादति, गच्छति)

    • रमेशः किम् पठति? → Rameshah पुस्तकं पठति। (पुस्तकम् = कर्म)
    • विप्रः किम् पाठयति? → Adhyapakah संस्कृतं पाठयति। (संस्कृतम् = कर्म)
    • रामः कुत्र गच्छति? → Ramah विद्यालयं गच्छति। (विद्यालयम् = गन्तव्य कर्म)

    द्वितीया विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):

    • 1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म (सामान्य नियम)
      क्रिया के द्वारा कर्ता का जो सबसे अधिक इच्छित (तपतम) पदार्थ होता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है और उसमें द्वितीया विभक्ति लगती है।
      विशिष्ट उदाहरण: रामः पयसा ओदनं खादति। (यहाँ राम दूध और भात दोनों खा रहा है, परन्तु उसका मुख्य इच्छित 'भात' है, अतः दूध में तृतीया तथा भात यानी 'ओदनम्' में द्वितीया विभक्ति हुई है)।
    • 2. अधिशीङ्स्थासां कर्म (उपसर्ग योग नियम)
      जब शीङ् (शयन करना), स्था (बैठना) और आस् (रहना) धातुओं के पूर्व 'अधि' उपसर्ग लगा हो, तो क्रिया का आधार अधिकरण (सप्तमी) न होकर कर्म (द्वितीया) बन जाता है।
      उदाहरण: सः आसन्दं अधितिष्ठति। (वह कुर्सी पर बैठता है। यहाँ 'अधि' उपसर्ग के कारण कुर्सी आधार होते हुए भी द्वितीया विभक्ति में आई है)।
    • 3. उपपद अव्यय योग नियम (विशेष शब्द योग)
      कुछ विशिष्ट अव्यय शब्दों का जिससे प्रत्यक्ष संयोग होता है, उस पद में अनिवार्य रूप से द्वितीया विभक्ति होती है:
      उभयतः / सर्वतः / धिक्: उभयतः विद्यालयं बालकाः सन्ति।
      उपर्युपरि / अधोधः / अध्यधि: (ठीक ऊपर / ठीक नीचे)
      अभितः / परितः / समया / निकषा / हा / प्रति: विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति। | मां प्रति तस्य कोपः वर्तते।
      अन्तरा / अन्तरेण: (बीच में / बिना या छोड़कर) के योग में भी द्वितीया होती है।
    • 4. क्रियाविशेषणे द्वितीया
      जो शब्द क्रिया की विशेषता बताते हैं (Adverbs), वे हमेशा नपुंसकलिंग एकवचन में रहते हैं और उनमें द्वितीया विभक्ति होती है।
      उदाहरण: गीता मधुरं गायति। | कोकिलः मधुरं कूजति। | मन्दं मन्दं नुदति पवनः। | अर्धो घटः अधिकं शब्दायते।
    • 5. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे
      जब किसी काल (समय) या अध्वन् (मार्ग/दूरी) का क्रिया के साथ लगातार या अतिशय जुड़ाव (व्याप्ति) प्रकट हो, तब कालवाची और मार्गवाची पदों में द्वितीया होती है।
      उदाहरण: सः मासमधीते व्याकरणम्। (महीने भर लगातार पढ़ता है) | क्रोशं कुटिला नदी। (नदी कोस भर तक टेढ़ी है)

    स्मरण रखें: पूर्व पाठ के नियम 'उक्ते कर्मणि प्रथमा' के अनुसार जब वाक्य कर्मवाच्य में होता है तब कर्म प्रधान होने से उसमें प्रथमा होती है (जैसे: मया चन्द्रः दृश्यते)। यहाँ हम केवल कर्तृवाच्य के अप्रधान कर्म (द्वितीया विभक्ति) का अभ्यास कर रहे हैं।

    त्रिलिंग वाक्य निर्माण एवं अभ्यास तालिका

    अधोलिखित पदों के वचनानुसार तीनों वचनों में शुद्ध संस्कृत वाक्य संरचना का अभ्यास करें:

    पाठ-3: कर्म कारक (द्वितीया विभक्ति)

    कर्ता जिसे क्रिया द्वारा सबसे अधिक प्राप्त करना चाहता है, वह कर्म है (कर्तुरीप्सिततमं कर्म), और उसमें द्वितीया विभक्ति (कर्मणि द्वितीया) होती है।

    द्वितीया विभक्ति के प्रमुख नियम (सूत्र):

    • 1. कर्तुरीप्सिततमं कर्म (सामान्य): उदाहरण: रामः ओदनं खादति।
    • 2. अधिशीङ्स्थासां कर्म: अधि+शी/स्था/आस् धातुओं के योग में। उदाहरण: सः आसन्दम् अधितिष्ठति।
    • 3. अभितः, परितः, प्रति, निकषा आदि: इन अव्ययों के योग में। उदाहरण: विद्यालयं परितः वृक्षाः।
    • 4. क्रियाविशेषणे द्वितीया: उदाहरण: सा मधुरं गायति।
    • 5. कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे: निरंतर समय/दूरी। उदाहरण: मासमधीते

    अभ्यास तालिका (द्वितीया विभक्ति)

    मूल पद (लिंग) एकवचनम् (द्वितीया) द्विवचनम् (द्वितीया) बहुवचनम् (द्वितीया)
    पाठः (पुल्लिंग) सः पाठं पठति। सः पाठौ पठति। सः पाठान् पठति।
    श्लोकः / मन्त्रः ………………… ………………… …………………
    देवालयः (पुल्लिंग) माता देवालयं गच्छति। ………………… …………………
    ग्रामः / आपणः ………………… ………………… …………………
    पत्रिका (स्त्रीलिंग) छात्रः पत्रिकां पठति। छात्रः पत्रिके पठति। छात्रः पत्रिकाः पठति।
    पद (लिंग) एकवचन द्विवचन बहुवचन
    पाठ (पु.) पाठम् पाठौ पाठान्
    पत्रिका (स्त्री.) पत्रिकां पत्रिके पत्रिकाः
    पुस्तक (नपुं.) पुस्तकम् पुस्तके पुस्तकानि

    वाक्य अभ्यास (कोष्टकगत शब्द)

    कोष्ठक के शब्दों में द्वितीया लगाकर वाक्य पूरे करें:

    १. सेवकः आसन्दं (आसन्दः) आनयति।
    २. सा वार्तां (वार्ता) श्रुणोति।
    ३. अहं पुस्तकं (पुस्तकम्) क्रीणामि।
    ४. सः ग्रामं (ग्रामः) गच्छति।
    ५. छात्राः संस्कृतं (संस्कृतम्) पठन्ति।
    *(अन्य अभ्यास के लिए मूल सामग्री देखें)*

    पाठ-4: करण कारक (तृतीया विभक्ति)

    कर्ता जिसकी सबसे अधिक सहायता से अपने कार्य को पूर्ण करता है, उसे करण कहते हैं (साधकतमं करणम्)। तृतीया विभक्ति मुख्य रूप से दो स्थानों पर होती है: 1. करण कारक में और 2. अनुक्त (अप्रधान) कर्ता में (कर्मवाच्य या भाववाच्य के वाक्यों में)।

    अन्वेषण संवाद (साधन पहचान):

    केंद्रीय क्रियापद: लिखति / पिबति / पश्यति

    • बालकः केन पत्रं लिखति? → बालकः लेखन्या पत्रं लिखति।
    • सः केन जलं पिबति? → सः चषकेण जलं पिबति।
    • त्वं केन पश्यसि? → अहं उपनेत्रेण पश्यति।

    तृतीया विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):

    • 1. कर्तृकरणयोस्तृतीया / अनुक्त कर्ता नियम
      कर्मवाच्य के वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान) हो जाता है, इसलिए उसमें प्रथमा के स्थान पर तृतीया विभक्ति लगती है।
      उदाहरण: रामेण रावणः हतः। (यहाँ राम अनुक्त कर्ता हैं)
    • 2. सहयुक्तेऽप्रधाने (उपपद नियम)
      सह, साकं, समं, सार्धं (साथ) शब्दों के योग में जो अप्रधान व्यक्ति होता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है।
      उदाहरण: अश्वः मोहनेन सह गच्छति | सः मित्राभ्यां सह उपवने क्रीडति | मात्रा सह रामः गच्छति।
    • 3. येनाङ्गविकारः (अंग-विकार नियम)
      शरीर के जिस अंग विशेष में कोई खराबी या विकार दिखाई दे, उस अंगवाचक शब्द में तृतीया विभक्ति होती है।
      उदाहरण: मम नेता कर्णेन बधिरः अस्ति। (कान से बहरा)
    • 4. पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम्
      पृथक, विना और नाना शब्दों के योग में विकल्प से तृतीया विभक्ति होती है। (वैकल्पिक रूप में द्वितीया और पञ्चमी भी होती है)।
    • 5. हेतोः / इत्थंभूतलक्ष्णे
      जिस कारण (हेतु) से कोई कार्य हो या जिस विशेष चिह्न से कोई व्यक्ति पहचाना जाए, वहाँ तृतीया होती है।
      उदाहरण: धनं परिश्रमेण मिलति। | मम परिवेशी चतुःचक्रिकया (चार पहिया गाड़ी से) धनिकः प्रतीयते।

    वाक्य रूपांतरण अभ्यास (पुरुष-वचन परिवर्तन):

    इन वाक्यों के पुरुष तथा वचन परिवर्तन के स्वरूप को ध्यान से देखें और अभ्यास करें:

    एकवचन: सः वामहस्तेन लिखति। | त्वं केन हस्तेन लिखसि? | अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि।
    द्विवचन: तौ वामहस्तेन लिखतः। | युवां केन हस्तेन लिखथः? | आवां दक्षिणहस्तेन लिखावः।
    बहुवचन: ते वामहस्तेन लिखन्ति। | यूयं केन हस्तेन लिखथ? | वयं दक्षिणहस्तेन लिखामः।

    पाठ-5: सम्प्रदान कारक (चतुर्थी विभक्ति)

    दान क्रिया के कर्म के द्वारा कर्ता जिसे पूरी तरह संतुष्ट या प्रसन्न करना चाहता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है (कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम्)। सम्प्रदान कारक में हमेशा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।

    चतुर्थी विभक्ति - अन्वेषण संवाद (आकांक्षा पद्धति):

    जब हम क्रियापद को केंद्र में रखकर सीधे प्रश्न पूछते हैं कि कार्य "किसके लिए" (कस्मै / कस्यै) किया जा रहा है या क्रिया का मुख्य लक्ष्य क्या है, तब सम्प्रदान कारक स्वतः उभरता है।

    केंद्रीय क्रियापद (Verb Anchor): यच्छति / ददाति (देता है)

    • कः यच्छति? (कौन देता है?) → जनकः यच्छति। (जनकः = कर्ता)
    • किं यच्छति? (क्या देता है?) → जनकः धनम् यच्छति। (धनम् = कर्म)
    • कस्मै यच्छति? (किसको देता है?) → जनकः पुत्राय धनं यच्छति। (पुत्राय = सम्प्रदान)
    • कुतः यच्छति? (कहाँ से देता है?) → जनकः कोषात् पुत्राय धनं यच्छति। (कोषात् = अपादान)
    पदों का क्रमिक संयोजन:
    [जनकः] → [कोषात्] → [पुत्राय] → [धनम्] → [यच्छति]

    निर्मित शुद्ध वाक्य: "जनकः कोषात् पुत्राय धनं यच्छति।"
    (इस वैज्ञानिक विधि से छात्र बिना किसी हिंदी कारक चिह्न 'के लिए' को रटे, सीधे 'कस्मै' की आकांक्षा जगाकर शुद्ध वाक्य संरचना सीख जाते हैं।)

    प्रयोजनवाची सम्प्रदान अभ्यास (किमर्थम्):

    जब कोई क्रिया किसी प्रयोजन या उद्देश्य (Purpose) के लिए की जाती है, तब क्रियापद से 'किमर्थम्' (किसलिए) प्रश्न पूछकर वाक्य का विस्तार किया जाता है:

    • • छात्रः किमर्थं विद्यालयं गच्छति? → छात्रः पठनाय / शिक्षायै विद्यालयं गच्छति।
    • • यूयं किमर्थं क्रीडाङ्गणं गच्छथ? → वयं क्रीडनाय / स्वास्थ्याय क्रीडाङ्गणं गच्छामः।
    • • भिक्षुकः किमर्थं भ्रमति? → भिक्षुकः भिक्षायै / रोटिकायै ग्रामे भ्रमति।

    चतुर्थी विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):

    • 1. कर्मणा यमभिप्रैति स सम्प्रदानम् / क्रिया या यमभिप्रैति
      दान देने के कार्य से या किसी विशेष प्रयोजन वाली क्रिया से जो अभिप्रेत हो, वह सम्प्रदान है।
      उदाहरण: बालकाय पुस्तकं ददाति। | श्रमिकः रोटिकायै नगरे वसति। | छात्रः शिक्षायै विद्यालयं गच्छति।
    • 2. रुच्यर्थानां प्रीयमाणः (रुचि नियम)
      रुच् (अच्छा लगना) धातु या इसके समान अर्थ वाली धातुओं के योग में जो व्यक्ति प्रसन्न होने वाला (प्रीयमाण) होता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।
      उदाहरण: मल्लाय घृतं रोचते | मोहनाय आम्राणि रोचन्ते | मह्यं संस्कृतं रोचते।
    • 3. नमःस्वस्तिस्वाहास्वधाऽलंवषड्योगाच्च (विशिष्ट उपपद नियम)
      नमः (नमस्कार), स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा और स्वधा शब्दों के सीधे योग में हमेशा चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग होता है।
      उदाहरण: भगवते विष्णवे नमः | तुभ्यं स्वस्ति। | रामाय स्वाहा।
      *ध्यातव्य: उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी नियम के अनुसार यदि इनके साथ कोई क्रियापद (जैसे 'नमस्करोति') जुड़ जाए, तो वहाँ कारक प्रधान होने से द्वितीया विभक्ति हो जाएगी (जैसे: मुनित्रयं नमस्कृत्य)।
    • 4. क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः
      क्रोध करना (क्रुध), द्रोह करना (द्रुह), ईर्ष्या करना और दूसरों के गुणों में दोष निकालना (असूया)— इन धातुओं के योग में जिसके प्रति कोप (क्रोध) किया जाए, वह सम्प्रदान होता है।
      उदाहरण:
      • माता पुत्राय क्रुध्यति। (माता पुत्र पर क्रोध करती है।)
      • नेता जनताभ्यः द्रुह्यति। (नेता जनता से द्रोह करता है।)

      *अपवाद (विशेष नियम):
      यदि इन (क्रुध/द्रुह) धातुओं के पहले कोई उपसर्ग (जैसे 'अभि') लगा हो, तो वहाँ चतुर्थी न होकर द्वितीया विभक्ति होती है, जैसे—
      • अध्यापकः शिष्यं अभिक्रुध्यति। (अध्यापक शिष्य पर क्रोध करता है।)

    व्यावहारिक वाक्य विन्यास एवं गद्य अनुप्रयोग:

    • सः दरिद्राय धनं यच्छति।
    • त्वं किं भिक्षुकाय भिक्षां यच्छसि?
    • अहं तृषार्ताय जलं यच्छामि।
    • माधवः क्षुधिताय भोजनं यच्छति।
    • अध्यापकः छात्रेभ्यः / जितेन्द्राय / गणेशाय मोदकानि यच्छति।

    पाठ-6: अपादान कारक (पञ्चमी विभक्ति)

    जब कोई वस्तु या व्यक्ति किसी निश्चित स्थान या वस्तु से अलग (विश्लेष/विलगाव) होता है, तो उस स्थिर या ध्रुव स्थान की अपादान संज्ञा होती है (ध्रुवमपायेऽपादानम्)। अपादान कारक में हमेशा पञ्चमी विभक्ति (अपादाने पञ्चमी) का प्रयोग किया जाता है।

    अन्वेषण संवाद (स्रोत/उत्पत्ति पहचान):

    केंद्रीय क्रियापद: आयाति / पतति / गच्छति

    • मुरारिः कुतः आयाति? → मुरारिः ग्रामात् आयाति। (गाँव से अलग होना)
    • वृषभाः कुतः पतन्ति?वृक्षेभ्यः पत्राणि पतन्ति। (वृक्षों से पत्तों का अलगाव)
    • सुदेशः कुतः भ्रमणाय गच्छति? → सुदेशः भ्रमणाय गृहात् गच्छति। (घर से बाहर जाना)

    पञ्चमी विभक्ति के अनिवार्य शास्त्रीय नियम (सूत्र):

    • 1. ध्रुवमपायेऽपादानम् / अपादाने पञ्चमी (सामान्य नियम)
      अपाय, विश्लेष, विलगाव या पृथक् होने के अर्थ में जिस सुनिश्चित व्यक्ति या स्थान से अलग हुआ जाता है, वह अपादान कहलाता है।
      व्यावहारिक उदाहरण:
      • बालकः द्विचक्रिकात् (साइकिल से) पतति।
      • छात्राः कक्षेभ्यः बहिः आगच्छन्ति।
      • ते विद्यालयात् गृहं गच्छन्ति। | आकाशात् जलम् पतति।
      • (अश्वारोही) धावतः अश्वात् पतति। (यहाँ दौड़ता हुआ घोड़ा स्थिर/ध्रुव है, जिससे अलगाव हो रहा है। 'धावत्' शब्द शतृ प्रत्ययान्त होकर विशेषण होने के कारण इसमें भी पञ्चमी है।)
    • 2. भीत्रार्थानां भयहेतुः (भय एवं रक्षा नियम)
      भयार्थक (जिससे डर मालूम हो) और त्राणार्थक (जिससे भय के कारण रक्षा करनी हो) धातुओं के प्रयोग में जो भय का मुख्य कारण होता है, उसकी अपादान संज्ञा होती है।
      उदाहरण: सः बिडालात् विभेति। (बिल्ली से डरता है)
    • 3. आख्यतोपयोगे (नियमपूर्वक विद्या ग्रहण नियम)
      जिनसे नियम पूर्वक विद्या या कोई ज्ञान ग्रहण किया जाता है, वह वक्ता/आख्याता अपादान के अंतर्गत आता है।
      उदाहरण: विद्यालये गुरोः अधीते। (गुरु से नियमपूर्वक पढ़ता है)

    अधिकरण कारक (सप्तमी विभक्ति)

    क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं (आधारोऽधिकरणम्) और अधिकरण वाचक पदों में हमेशा सप्तमी विभक्ति (सप्तम्याधिकरणे च) प्रयुक्त होती है। पाणिनीय शास्त्र के अनुसार आधार मुख्य रूप से तीन प्रकार के होते हैं:

    • 1. औपश्लेषिक आधार: जिसके साथ आधेय का भौतिक सम्बन्ध बना हुआ हो।
      उदाहरण: वानरः वृक्षे निvusati। (बन्दर पेड़ पर रहता है)
    • 2. वैषयिक आधार: जिसके साथ आधेय का बौद्धिक या मानसिक सम्बन्ध बना हुआ हो।
      उदाहरण: मम अध्ययने रुचिः अस्ति। (मेरी अध्ययन में रुचि है)
    • 3. अभिव्यापक आधार: जिसके साथ आधेय का व्याप्य-व्यापकभाव सम्बन्ध बना हुआ हो।
      उदाहरण: पुस्तके अक्षराणि सन्त। (पुस्तक में अक्षर हैं)

    व्यावहारिक वाक्य विन्यास एवं गद्य अनुप्रयोग:

    • मम मनसि सन्देहः वर्तते।
    नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति।
    जीवने किमपि असाध्यं कार्यं नास्ति।
    भवत्सु कः कर्मवीरः?
    • वयं लोके निवसामः।

    वाक्य में प्रयोग एवं आत्म-परीक्षण शृंखला:

    • अहम् औषधालये वसामि। | अहं भोजनालये खादामि।
    • अहं विद्यालये पठामि। | सः कार्यालये तिष्ठति।
    • सः तत्रैव खादति। | सः आपणे न खादति। | सः भाट्यावासे न वसति।

    संस्कृत में स्वयं उत्तर दें (आकांक्षा पद्धति अभ्यास):
    १. त्वं कुत्र वससि? → अहं ………………… वसामि।
    २. त्वं कुत्र खादसि? → अहं ………………… खादामि।
    ३. त्वं कुत्र पठसि? → अहं ………………… पठामि।
    ४. सः कुत्र तिष्ठति? → सः ………………… तिष्ठति।

    पाठ-7: सम्बन्ध मात्र (षष्ठी विभक्ति)

    षष्ठी विभक्ति - अन्वेषण संवाद (आकांक्षा पद्धति):

    संस्कृत व्याकरण में क्रिया से साक्षात् संबंध न होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता (शेषे षष्ठी)। यहाँ हम क्रियापद के बजाय किसी संज्ञा पद से "किसका / किसकी" (कस्य / कस्याः) प्रश्न पूछकर दो संज्ञाओं के बीच का संबंध तय करते हैं।

    केंद्रीय क्रियापद एवं संज्ञा: पश्यति (देखता है) ← शोभां / गृहम्

    • कः पश्यति? (कौन देखता है?) → मोहनः पश्यति। (मोहनः = कर्ता)
    • किं पश्यति? (क्या देखता है?) → मोहनः शोभां पश्यति। (शोभाम् = कर्म)
    • कस्य शोभां पश्यति? (किसकी शोभा देखता है?) → मोहनः उद्यानस्य शोभां पश्यति। (उद्यानस्य = सम्बन्ध - षष्ठी)
    पदों का क्रमिक संयोजन (Slot Locking):
    [मोहनः] → [उद्यानस्य] → [शोभां] → [पश्यति]

    निर्मित शुद्ध वाक्य: "मोहनः उद्यानस्य शोभां पश्यति।"
    (इस विधि से छात्र बिना हिंदी चिह्नों 'का, की, के' को रटे, सीधे संज्ञा पद के साथ 'कस्य' की आकांक्षा जगाकर सम्बन्ध मात्र में षष्ठी विभक्ति का शुद्ध प्रयोग करना सीख जाते हैं।)

    सर्वनाम पद सम्बन्ध अभ्यास (कस्य / कस्याः):

    जब वाक्यों में सर्वनाम पदों के साथ स्व-स्वामी या जन्य-जनक सम्बन्ध दर्शाना हो, तो 'कस्य' के उत्तर में अस्मद्-युष्मद् आदि के षष्ठी विभक्ति रूपों का प्रयोग होता है:

    • कस्य वर्णः श्यामः अस्ति? → कृष्णस्य / मम / तस्य वर्णः श्यामः अस्ति।
    • कस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति? → अस्माकम् विद्यालयस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति।
    • • युष्माकं कस्य नाम किम् अस्ति? → युष्माकं संस्कृतशिक्षकस्य नाम किम् अस्ति?

    संस्कृत व्याकरण में क्रिया से साक्षात् संबंध न होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता, यह शेषे षष्ठी (सम्बन्ध) को दर्शाता है। यह मुख्य रूप से दो संज्ञाओं के बीच सम्बन्ध सूचित करती है।

    प्रमुख सूत्र एवं उदाहरण:

    • 1. शेषे षष्ठी
      स्व-स्वामी आदि संबंधों को प्रकट करने के लिए। (उदाहरण: देवदत्तस्य पुत्रः)
    • 2. संबंध मात्र की विवक्षा
      जहाँ अन्य कारक की जगह केवल संबंध दर्शाना अभीष्ट हो। (उदाहरण: सर्पिषो जानीते)
    • 3. कर्तृकर्मणोः कृतिः
      कृदन्त पदों के योग में कर्ता या कर्म में।

    अभ्यास वाक्य:

    कृष्णस्य वर्णः श्यामः अस्ति।
    • मम देहस्य वर्णोऽपि श्यामः अस्ति।
    विद्यालयस्य नाम...

    विशेष विवेचन: उपपद विभक्ति का सिद्धांत

    संस्कृत व्याकरण में विभक्तियाँ दो प्रकार से निर्धारित होती हैं। जब वाक्य में किसी विशिष्ट अव्यय या पद (जैसे— नमः, स्वस्ति, प्रति, सह, विना आदि) की उपस्थिति के कारण कोई निश्चित विभक्ति आती है, तो उसे उपपद विभक्ति कहते हैं। इसके विपरीत, क्रिया के साथ सीधे संबंध (कारकSlot) के कारण जो विभक्ति आती है, उसे कारक विभक्ति कहा जाता है।

    अटूट व्याकरणिक नियम (बलवत्ता सूत्र):

    पदमाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः उपपदविभक्तिः।
    क्रियामाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः कारकविभक्तिः।
    उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी॥

    इस सिद्धांत का व्यावहारिक अर्थ एवं अनुप्रयोग:

    यदि किसी वाक्य में एक ही पद को लेकर उपपद विभक्ति और कारक विभक्ति दोनों के नियम एक साथ प्राप्त हो रहे हों, तो वहाँ हमेशा कारक विभक्ति ही बलवान (बलीयसी) मानी जाएगी, और उपपद का नियम स्वतः निरस्त हो जाएगा।

    व्यावहारिक उदाहरण से समझें:

    नियम विरुद्ध स्थिति (भ्रम): 'नमः' पद के योग में सामान्यतः चतुर्थी विभक्ति का नियम है (रामाय नमः)। इस आधार पर यदि वाक्य हो 'मुनित्रय को नमस्कार करके', तो छात्र भ्रमवश चतुर्थी लगाकर "मुनित्रयाय नमस्कृत्य" लिख देते हैं, जो कि अशुद्ध है।

    शुद्ध कारक स्थिति: यहाँ 'नमः' के साथ 'करोति' (कृ धातु) क्रियापद का सीधा योग है। क्रिया आश्रित होने के कारण यहाँ कारक विभक्ति (द्वितीया) बलवान होगी। इसलिए शुद्ध वाक्य बनेगा—
    → "मुनित्रयं नमस्कृत्य" (यहाँ द्वितीया विभक्ति ही शास्त्रसम्मत है)।

    संवादात्मक अभ्यास एवं पद विश्लेषण शाला

    कारक, सन्धि, तिङन्त, कृदन्त शब्दों का डिजिटल विश्लेषण करने, वाक्यों को आपस में मिलाने और परिचय प्राप्त करने के लिए नीचे दिए गए डिजिटल संसाधनों का उपयोग करें:

    📖

    विशेष छात्र मार्गदर्शन: पाणिनीय सूत्र एवं सविस्तार अध्ययन

    प्रिय छात्रो! अबतक आपने इस पाठ के ऊपरी भाग में "आकांक्षा पद्धति" (Direct Method) के माध्यम से क्रियापद से सीधे प्रश्न पूछकर वाक्य का मूल ढांचा (Slots) तैयार करना सीखा है। वाक्य-निर्माण और अर्थ-बोध का यह आपका पहला व्यावहारिक चरण था।

    संस्कृत भाषा की अगाध शुद्धता, शास्त्रीय सूक्ष्मताओं और परीक्षाओं में पूछे जाने वाले विशिष्ट नियमों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त करने के लिए पाणिनीय सूत्रों का गहरा ज्ञान होना अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य हेतु इस पृष्ठ पर नीचे की ओर प्रत्येक विभक्ति को उसके सभी मूल सूत्रों, वार्तिकों, विशेष अपवादों तथा विविध शास्त्रीय उदाहरणों के साथ यथावत् सविस्तार प्रस्तुत किया गया है।

    💡 आपके अध्ययन का सही मार्ग:
    • 1. नीचे स्क्रॉल करें: इस बॉक्स के ठीक नीचे से प्रत्येक विभक्ति (प्रथमा से सप्तमी) का विस्तृत विवरण आरंभ हो रहा है।
    • 2. सूत्रों का संधि-विच्छेद समझें: नीचे दिए गए कठिन पाणिनीय सूत्रों को ध्यान से पढ़ें ताकि परीक्षा में सूत्र-उल्लेखपूर्वक विभक्ति पहचानने में कोई त्रुटि न हो।
    • 3. अपवादों पर विशेष ध्यान दें: जहाँ सामान्य नियम काम नहीं करते, वहाँ पाणिनी जी के विशेष सूत्र कैसे काम करते हैं, उन्हें नीचे दिए गए उदाहरणों से आत्मसात् करें।

    👇 नीचे स्क्रॉल करें और प्रत्येक विभक्ति के प्रामाणिक सूत्रों का गहन अध्ययन आरंभ करें! 👇

     

      पाठ- 1 
    अब तक आप संस्कृत शिक्षण पाठशाला 1 में संस्कृत भाषा के वर्ण तथा शब्द के स्वरूप से भली भाँति परिचित हो गये। इसके बाद के अध्यायों में हम अधोलिखित वाक्य पर विचार  करेंगें।
    1. वाक्यों में क्रिया का कारक के साथ सम्बन्ध/ समन्वय के लिए कारक विभक्ति तथा उपपद विभक्ति।
    2. सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर विचार (षष्ठी विभक्ति) 
    वाक्य विचार में पहले कारक (विभक्ति) की चर्चा करेंगें। उपपद विभक्ति कारक विभक्ति से अलग होती है। जब कोई अव्यय पद का योग संज्ञा पद के साथ होता है तब उसे उपपद विभक्ति कहते है। 
    कारक (विभक्ति) पर विचार के बाद विशेष्य और विशेषण पर विचार तथा उसके बाद सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर विचार करेंगें। विशेष्य और विशेषण लिए एक श्लोक है। यही नियम सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर भी लागू होता है।
               
    यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।
    तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥


        पाठ- 2    

    कारक (विभक्ति)
    अबतक हम संस्कृत के वर्णों तथा शब्दों के सभी स्वरूप से परिचित हो चुके हैं। हम उन शब्दों/ पदों के लिंग, अकारान्त, इकारान्त आदि स्वर और क्, ह् आदि व्यंजनान्त शब्दों के सभी लिंगों एवं विभक्तियों से परिचय पा चुके हैं। इस अध्याय में हम उन पदों से वाक्य बनाने पर विचार करेंगें। संस्कृत भाषा में वाक्य बनाना सीखेंगें। 
    क्रिया के निष्पादन (जनकत्व) में कारण होने से सुबन्त पदों को कारक कहा जाता है। 
    अथवा 
    क्रिया की पूर्ति में जो सहायक होता हैउसे कारक कहते हैं। 
    अथवा 
    क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध होता हैउसे कारक कहते हैं। 
    जैसे- बालकः पठति। इसमें पठति क्रिया का निष्पादन/ क्रिया की पूर्ति में सहायक/ क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध रा का हैइसीलिए राम कर्ता है।  संस्कृत में 6 कारक माने गए हैं।

    कर्ता कर्म च करणं सम्‍प्रदानं तथैव च ।
    अपादानाधिकरणमित्‍याहु: कारकाणि षट् ।। 
    1.कर्ता 2.कर्म 3.करण 4.संप्रदान 5.अपादान 6.अधिकरण
    सम्बन्ध तथा सम्बोधन का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होने से इसे कारक नहीं माना गया है। इसका शब्द रूप बनता है। प्रत्येक कारक के लिए विभक्ति नियत है। हम वाक्यों के प्रयोग में उस कारक के स्थान पर विभक्तियों का प्रयोग करते हैं। जैसे कर्ता कारक के लिए प्रथमा विभक्ति। आप इस विधि को अपनाकर कारकों की पहचान कर सकते हैं । क्रिया से किसका सीधा सम्बन्ध है, इसे जांचने के लिए एक एक कर क्रमशः वाक्य लें। जैसे-
           वाक्य                                          प्रश्न                 उत्तर
    1. रमेशः पुस्तकं पठति।                       कः पठति।             रमेशः
    2. मृगः तृणं अत्ति।                               कं अत्ति।              तृणम्
    2. बालकः लेखिन्या पत्रं लिखति।         केन लिखति            लेखिन्या       
    3. पिता पुत्राय धनं ददाति।                कस्मै ददाति             पुत्राय
     इस प्रकार  उपर्युक्त वाक्य में कः‘ लगाकर प्रश्न करने से जो उत्तर आता है उसे कर्ता कारक कहते हैं। इसी प्रकार कस्मात्, कस्य, कस्मिन् आदि प्रश्न के द्वारा वाक्य में निहित कारक को समझा जा सकता है। आप इस तालिका को पूरा करें। आप प्रत्येक वचन, लिंग और विभक्ति वाला वाक्य का निर्माण करें। उसकी एक- एक तालिका बनाकर अभ्यास कर सकते हैं-          
               1. कर्ता कारक -    प्रथमा विभक्ति  

    1. 'प्रातिपादिकार्थलिंगपरिमाणवचनमात्रे प्रथमाशब्द के मूल रूप ( बिना विभक्ति के ) को प्रातिपादिक कहते हैं। मूल शब्द के अर्थ बोध मेंलिंग ज्ञान के लिएमात्रा जानने तथा वचन के अर्थ में प्रथमा विभक्ति होती है। जब तक हम किसी मूल शब्द में विभक्ति नहीं लगाते हैं तब तक उसका अर्थ ज्ञान नहीं हो पाता है। संज्ञासर्वनामविशेषण तथा अव्यय शब्दों के अर्थ ज्ञान के लिए मूल शब्द में प्रथमा विभक्ति लगाते हैं। किस शब्द का किस लिंग में प्रयोग होता है,यह जानकारी प्रथमा विभक्ति द्वारी होती हैजैसे केवल एक लिंग- मानवःफलम्। अनेक लिंग की जानकारी के लिए- तटः तटी तटम्। मात्रा का उदाहरण- प्रस्थो ब्रीहिः- आधा सेर चावल। संख्या का उदाहरण- एकः द्वौबहवः ।

    2. स्वतन्त्रः कर्ता- क्रिया के सम्पादन में जो स्वतन्त्र होउसे कर्ता कारक कहते है। जैसे- हरिः पुस्तकं पठति । यहाँ पढ़ने की क्रिया का सम्पादक 'हरिहै। अतः हरि में प्रथमा विभक्ति हुई ।

    3. 'कर्त्तरि प्रथमा ' अथवा 'उक्ते कर्तरि प्रथमा' – क्रिया के सम्पादक को कर्ता कारक कहते हैं । कर्तृवाच्य के कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है जैसे- गोपालः गृहं गच्छति । यहाँ जाने की क्रिया को सम्पन्न करनेवाले कर्त्ताकारक 'गोपालमें प्रथमा विभक्ति हुई है। कर्तृवाच्य की क्रिया में कर्त्ता उक्त अर्थात् प्रधान रहता है। अतः कर्तृवाच्य के कर्त्ता में यहाँ प्रथमा विभक्ति हुई । 

    4. सम्बोधन में प्रथमा- सम्बोधन को कारक के अन्तर्गत नहीं मान जाता। इसके लिए प्रथमा विभक्ति का उपयोग किया जाता है। किसी किसी शब्द का सम्बोधन में आंशिक रूप परिवर्तन हो जाता है। अतः शब्दरूप में सम्बोधन का भी शब्दरूप लिखा जाता है।

    6. संस्कृत में क्रिया अथवा व्यापार को ही मुख्य माना जाता है। इस भाषा में क्रिया के आधार पर ही कारक निश्चित होते हैं। क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। इस नियम के कारण पचतिखेलतिपठति आदि में कालपुरुष तथा वचन निश्चित हैंअतः उसी के अनुसार कारक का प्रयोग होता है। 

    7. कर्तृवाच्य में क्रिया का सम्बन्ध कर्ता के साथ होता है अतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती हैजबकि कर्म वाच्य में क्रिया के साथ कर्म का सम्बन्ध होता है अतः वहाँ पर कर्ता में प्रथमा विभक्ति नहीं होती। यही स्थिति भाववाच्य की भी है। वाच्य के बारे में एक अलग अध्याय में पृथक् से चर्चा की जाएगी। 

    8. 'उक्ते कर्मणि प्रथमा'- कर्म वाच्य में कर्म के उक्त (प्रधान/मुख्य) रहने पर उसमें (उक्त या प्रमुख कर्म में ) प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रिया कर्म के अनुरूप होती है। अर्थात् क्रिया में वही विभक्ति तथा वचन होंगें ,जो कि कर्म में है। जैसे- मया चन्द्रः दृश्यते । रामेण रावणः हतः । यहाँ 'चन्द्रऔर 'रावणकर्मवाच्य के उक्त कर्म है। अतः इनमें प्रथमा विभक्ति हुई है।

    9. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा – इति, नाम और अपि अव्ययों के योग में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे- अमुं नारद इति अबोधि ( उनको नारद ऐसा जाना ) । जनको नाम राजा अभूत् ( जनक नाम के राजा हुए ) । तस्य कन्या सीता नाम आसीत् ( उनकी कन्या का नाम सीता था ) । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम्      ( विष के पेड़ को भी बढ़ाकर अपने आप काटना उचित नहीं है ) । 

     अभ्यास- 1

    अकारान्त पुल्लिंग शब्दों की प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें ।

    पुल्लिंग संज्ञा शब्द एकवचन का प्रयोग-

    अश्वः धावति । गजः धावति । अश्वः गजः च धावतः । अश्वःगजः वृषभः च धावन्ति ।

    अश्वः खादति । गजः खादति । वृषभः खादति । अश्वःगजः च खादतः । अश्वःगजः वृषभः च खादन्ति ।

    पुल्लिंग संज्ञा शब्द द्विवचन का प्रयोग-

    अश्वौ धावतः । गजौ धावतः । वृषभौ धावतः ।

    पुल्लिंग संज्ञा शब्द बहुवचन का प्रयोग-

    गजाः धावन्ति । वृषभाः धावन्ति । छात्राः प्रसन्नाः सन्ति।

    सर्वनाम शब्द एकवचनद्विवचन तथा बहुवचन का प्रयोग-

    सः खादति । तौ खादतः । ते खादन्ति । । तौ धावतः । ते धावन्ति । एते प्रसन्नाः सन्ति ।

    अभ्यास- 2

    रिक्त स्थान पर सः तौ ते में से किसी एक का चयन कर सही शब्द लिखें।

    . …….धावति । ……… खादन्ति। ……… खादतः । …… लिखति।

    अभ्यास- 3

    निम्नलिखित संज्ञाओं या सर्वनामों के बाद 'धाव्' 'खाद्' 'लिख्पिव्'  धातुओं की क्रिया को लिखें।

    वृषभः ………। बालकौ ………। तौ ………  राम: ………। ते ………  सः ………। मनुष्याः ………  कृष्णः ………। ते ………

    अभ्यास- 4

    निम्नलिखित क्रियाओं से पूर्व कर्ता चुनकर लगाइए। यह ध्यान रहे कि कर्ता जिस वचन का हैक्रिया भी उसी वचन का हो। रिक्त स्थान पर एक बार एक शब्द का ही प्रयोग कीजिए:

    कर्ता- मोहनः  वृषभौ  वृषभाः  गजः  वानरौ  गजाः। मयूरः  अश्वौ  अश्वाः ।

    ……… धावतः । ……… खादति। ……… धावन्ति । ………  पिवन्ति । ……… वदतः । ……… धावन्ति । ……… खादतः । ……… धावति । ……… यच्छति ।

    अभ्यास- 5

    अकारान्त पुल्लिंग तथा नपुंसकलिंग शब्दों की प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें । पुल्लिंग में जिस अर्थ में 'सःतौतेका प्रयोग होता हैउसी अर्थ में नपुंसकलिंग के शब्दों के लिए 'तत्तेतानि का प्रयोग होता है।

    फलम् पतति । फले पततः। फलानि पतन्ति ।

    पत्रम् पतति । पत्रे पततः । पत्राणि पतन्ति ।

    तत् फलम् पतति । तत् पत्रम् पतति ।

    तानि फलानि पतन्ति । तानि पत्राणि पतन्ति ।

    सः बालकः पतति । तौ बालकौ पततः । ते बालकाः पतन्ति ।

    तत्र पत्राणि फलानि च पतन्ति । सः अश्वः पतति । तौ अश्वौ पततः। ते अश्वाः पतन्ति ।  ते फले पततः । तत् चित्रम् पतति। ते चित्रे पततः । तानि चित्राणि पतन्ति ।

    ध्यान रखिए कि ह्रस्व अ से समाप्त होने वाले पुंलिंग शब्दों के रूप तो 'अश्वया 'बालकके समान चलेंगे और नपुंसकलिंग शब्दों के रूप 'फलकी तरह।

    अभ्यास- 6

    अकारान्त पुल्लिंग शब्द :- मनुष्यपुरुषअध्यापकछात्रसिंहमयूरशशकवृक्षवानर और अकारान्त नपुंसकलिंग शब्दों पुस्तकगृहचक्रपुष्पनेत्रजलदुग्धचित्रआम्र शब्द के रूपों का तीन-तीन बार उच्चारण कीजिए। जैसे- मनुष्यःमनुष्यौमनुष्याः । फलम्फलेफलानि।

    निम्न शब्दों से पूर्व लिंग और वचन देखकर सः तौते। तत्तेतानिमें से ठीक शब्द भरिए

    ………… बालकौ । ………… पत्राणि । ………… अश्वः । ………… बालकाः । ………… अश्वः । ………… दुग्धम् । ………… गृहम् । ………… पत्राणि । ………… पत्रे । ……… तीर्थौ । ………… चक्रे।  ………… पुष्पाणि।

    अभ्यास- 7

    आकारान्त स्त्रीलिंग शब्दों के प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों का प्रथम पुरुष की क्रियाओं का वर्तमान काल (लट्) के साथ प्रयोग देखें । 

    पुल्लिंग में जिस अर्थ में 'सःतौतेका प्रयोग किया जाता हैंउसी अर्थ में स्त्रीलिंग में 'सातेताःका प्रयोग होता है।

    बालिकाः पठन्ति। बालिका पठति । सा बालिका सीता अस्ति । सा तत्र पठति । ते रमा लीला च पठतः । ते तत्र पठतः । ते अत्र पठतः । रमा लीला च तत्र पठतः । लताललिताअर्चनासुषमा च तत्र पठन्ति । ताः अत्र न पठन्ति । ताः बालिकाः तत्र पठन्ति ।

    गीता क्रीडति । शुभा सरिता च क्रीडतः । ताः बालिकाः सन्ति । ताः हसन्ति । सीता लिखति । सा लिखति । सीता गीता च लिखतः । ते लिखतः । रमाउमाशीला च धावन्ति । ताः धावन्ति । ताः पठन्ति । ताः क्रीडन्ति । ताः हसन्ति ।

    उपर्युक्त की तरह- लता (बेल)अजा (बकरी)कलिका (कली)कन्यासरिता (नदी)नौकावाटिकाबाला रमासीताशीलासुभद्राशोभा शब्द से सभी वचनों में वाक्य बनायें।

    याद रखें कि हिन्दी में कर्ता के अनुसार क्रिया का भी लिंग होता है परन्तु संस्कृत की क्रियाएँ सभी लिंगों में समान होती हैं। जैसे 'पठतिका अर्थ पढ़ता है और पढ़ती है, दोनों है। 

    प्रथमा विभक्ति, भूतकाल का उदाहरण-

    अशोकः सम्राट् आसीत् । मदनमोहन-मालवीयः देशभक्तः आसीत् । 

    शब्दकोश-

    सा = वह एक (she)       ते = वे दो (those two ) ताः वे सब (those)

    पठ् = पढ़ना (to read)    हस् = हँसना (to laugh) लिख् = लिखना (to write)         क्रीड् = खेलना (to play) अस्ति = है (is)  सन्ति = हैं (are)

    अभ्यास- 8

    सर्वनाम का अभ्यास

    नीचे दिए वाक्यों में रिक्त स्थानों पर लिंग और वचन को देखकर "सःतौतेतत्तेतानिसाते ताः" में से ठीक शब्द लिखें।

    ……..  बालकाः क्रीडन्ति । …….. बालकौ हसतः । …….. शीला अस्ति । …….. कन्याः हसन्ति । …….. पत्राणि पतन्ति । …….. बालिके लिखतः । …….. कृष्णः अस्ति । …….. फले पततः । …….. अश्वः खादति । …….. तत्र क्रीडतः । …….. तत्र पठन्ति । ……..  सुधा अस्ति। …….. कन्ये हसतः । …….. लिखति । 

     पाठ- 3 

    2. कर्म कारक -  द्वितीया  विभक्ति    

    1. क्रिया के द्वारा कर्ता का जो सबसे अधिक इच्छित होता है उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। (सामान्य नियम) जैसे- राम सीता को बुलाता है। रामः सीतां आह्वयति। यहाँ क्रिया के द्वारा कर्ता राम को इच्छित है सीता को बुलाना। अतः सीता में द्वितीया विभक्ति होगी। सबसे इच्छित में द्वितीया विभक्ति का दूसरा उदाहरण- राम दूध के साथ भात खाता है। इसमें राम दूध तथा भात दोनों खा रहा हैपरन्तु इन दोनों में से इच्छित है- भात (ओदन) खाना। अतः इसमें द्वितीया विभक्ति होकर रामः पयसा ओदनं खादति बनेगा। 

    सामान्य नियम के अनुसार हिन्दी में "को" जिस शब्द के अंत में हो उसमें  द्वितीया विभक्ति लगाना चाहिए।

    2. उपसर्ग के साथ क्रिया का योग होने पर नियम में परिवर्तन हो जाता हैं-
    शीङ् (शयन करना), स्था (बैठना) आस् (रहना) इन तीन धातुओं के पूर्व यदि अधि उपसर्ग लगा हो तो इन क्रियाओं का आधार कर्म कारक होता है। अर्थात् अधिकरण कारक के स्थान पर कर्म कारक होता है। जैसे- कुर्सी पर बैठता है = आसन्दं अधितिष्ठति। यहाँ कुर्सी आधार है। इससे द्वितीया विभक्ति होती है।
     3. अव्यय के साथ क्रिया का योग होने पर नियम में परिवर्तन हो जाता हैं-
    उभयतः (दोनों ओर), सर्वतः (सभी ओर), धिक्(धिक्कार), उपर्युपरि (ठीक ऊपर), अधोधः (ठीक नीचे) तथा अध्यधि (ठीक ऊपर) शब्दों का जिससे संयोग हो उसमें द्वितीया विभक्ति होती है।
    उभयतः विद्यालयं बालकाः सन्ति। आदि
    अभितः (चारों ओर या सब ओर), परितः (सब ओर), समया (समीप), निकषा (समीप), हा (हाय), प्रति (ओर) शब्द के योग में भी द्वितीया विभक्ति होती है।
    अन्तरा ( बीच में) तथा अन्तरेण (विषय में, बिना, छोड़कर) के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।

    4. क्रियाविशेषणे द्वितीया- जो क्रिया की विशेषता बताता हैउसे क्रियाविशेषण कहते हैं और क्रियाविशेषण में द्वितीया विभक्ति होती है। जैसे गीता मधुरं गायति । अर्धो घटः अधिकं शब्दायते ( अधजल गगरी छलकत जाय ) । मन्दं मन्दं नुदति पवनः । कोकिल: मधुरं कूजति । यहाँ मधुरम्, अधिकम् और मन्दं मन्दं क्रियाविशेषण हैं। अतः इनमें द्वितीया विभक्ति हुई है । 

    5. 'कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे'अत्यन्त संयोग ( अतिशय लगावलगातार या व्याप्ति ) अर्थ रहने पर कालवाची और मार्गवाची पदों में द्वितीया विभक्ति होती है । जैसेस मासमधीते व्याकरणम् ( बिना व्यवधान के वह महीने भर व्याकरण पढ़ता है ) । क्रोशं कुटिला नदी ( नदी कोश भर तक टेढ़ी-मेढ़ी है ) । यहाँ अत्यन्त संयोग में कालवाची 'मासम्और मार्गवाची 'क्रोशम्में द्वितीया हुई।

    6. अव्यययोगे प्रथमा / निपातेनाभिहिते प्रथमा – इति, नाम और अपि अव्ययों के योग में प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे- अमुं नारद इति अबोधि ( उनको नारद ऐसा जाना ) । जनको नाम राजा अभूत् ( जनक नाम के राजा हुए ) । तस्य कन्या सीता नाम आसीत् ( उनकी कन्या का नाम सीता था ) । विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तुम् असाम्प्रतम् ( विष के पेड़ को भी बढ़ाकर अपने आप काटना उचित नहीं है ) ।

    7. 'उक्ते कर्मणि प्रथमा'- कर्म वाच्य में कर्म के उक्त (प्रधान/मुख्य) रहने पर उसमें (उक्त या प्रमुख कर्म में ) प्रथमा विभक्ति होती है तथा क्रिया कर्म के अनुरूप होती है। अर्थात् क्रिया में वही विभक्ति तथा वचन होंगें ,जो कि कर्म में है। जैसे- मया चन्द्रः दृश्यते । रामेण रावणः हतः । यहाँ 'चन्द्रऔर 'रावणकर्मवाच्य के उक्त कर्म है। अतः इनमें प्रथमा विभक्ति हुई है। क्रिया प्रथम पुरुष एकवचन की हुई।

    द्वितीया विभक्ति का उदाहरण-

    विद्यालयं परितः वृक्षाः सन्ति । विप्रः वेदान् पठति । व्याघ्रः मृगं हन्ति । श्वः शकुन्तला श्वसुरालयं गमिष्यति । रामः विद्यालयं गच्छति । मां प्रति तस्य कोपः वर्तते । रावणः सीतां अहरत् । अध्यापकः संस्कृतं पाठयति ।

    कर्मवाच्य पर आगे विस्तार से चर्चा की जाएगी। यहाँ कर्तृवाच्य का अभ्यास करें।


      अभ्यासः
    अधोलिखित पदों के अनुसार वाक्य बनायें। 
    पुल्लिङ्गम्       एकवचनम्      द्विवचनम्       बहुवचनम्
    पाठः           सः पाठं पठति ।  सः पाठौ पठति । सः पाठान् पठति ।
    श्लोकः                ----------- ------  -----------
    मन्त्रः                 ----------- ------  -----------
    प्रश्नः                  ----------- ------  -----------
    ग्रन्थः                 ----------- ------  -----------
    विषयः              ----------- ------  -----------
    अध्यायः              ----------- ------  -----------
    देवालयः        माता--------------गच्छति ।   माता देवालयं गच्छति ।  
    ग्रामः                 ----------- ------  -----------
    आपणः              ----------- ------  -----------
    विदेशः              ----------- ------  -----------
    प्रकोष्ठः              ----------- ------  -----------
    विद्यालयः          ----------- ------  -----------
    वित्तकोषः          ----------- ------  -----------
    चिकित्सालयः     ----------- ------  -----------
    महाविद्यालयः    ----------- ------  -----------
    कार्यालयः          ----------- ------  -----------
                              स्त्रीलिङ्गम्      
    एकवचनम्               द्विवचनम्       बहुवचनम्
    पत्रिका            
    छात्रः पत्रिकां पठति । छात्रः पत्रिके पठति । छात्रः पत्रिकाः पठति ।
    वार्ता                 ----------- ------  ----------- ----------
    कथा                  ----------- ------  ----------- ----------
    गीता                 ----------- ------  ----------- ----------
    कविता              ----------- ------  ----------- ----------
    संहिता               ----------- ------  ----------- ----------
    सूचना               ----------- ------  ----------- ----------
    हास्यकणिका      ----------- ------  ----------- ----------
    स्त्रीलिङ्गम्           एकवचनम्                  द्विवचनम्                       बहुवचनम्
    अङ्कनी              छात्रा अङ्कनीं क्रीणाति ।  छात्रा अङ्कन्यौ क्रीणाति । छात्रा अङ्कनीः क्रीणाति ।
    कूपी                  ----------- ------  -----------
    घटी                  ----------- ------  -----------
    लेखनी               ----------- ------  -----------
    कर्तरी                ----------- ------  -----------
    मार्जनी              ----------- ------  -----------
    वेल्लनी              ----------- ------  -----------
    दूरवाणी            ----------- ------  -----------
    वर्णलेखनी          ----------- ------  -----------      
    पुनःपूरणी          ----------- ------  -----------
    नदी              बाला----------------तरति ।         
    स्त्रीलिङ्गम्                 एकवचनम्                               
    अष्टाध्यायी        छात्रा अष्टाध्यायीं पठति ।                        
    सप्तदशी             -----------------   पुरी                              
    सप्तशती             ----------- ------  नगरी                           
    कादम्बरी           ----------- ------ देहली                           
    अभ्यासदर्शिनी    ----------- ------ राजधानी                      
    सिद्धान्तकौमुदी   ----------- ------ उज्जयिनी                      
    कौशलबोधिनी    ----------- ------- वाराणसी                      
    नपुंसकलिङ्गम्          तीनों वचनों में वाक्य बनायें                  
    पुस्तकम्                   पिता पुस्तकं क्रीणाति ।                 
    शास्त्रम्              सा---------------जानाति ।           
    फलम्                ----------- ------  -----------
    पर्णम्                 ----------- ------  -----------
    पुष्पम्                ----------- ------  -----------
    चित्रम्               ----------- ------  -----------
    गृहम्                 ----------- ------  -----------
    गीतम्                ----------- ------  -----------
    काव्यम्              ----------- ------  -----------
    राज्यम्              ----------- ------  -----------
    मन्दिरम्            ----------- ------  -----------
    नाटकम्             ----------- ------  -----------
    फेनकम्              ----------- ------  -----------
    कङ्कतम्           ----------- ------  -----------
    करयानम्           ----------- ------  -----------
    करवस्त्रम्           ----------- ------  -----------
    कोष्ठक में दिये शब्द को द्वितीया विभक्ति  बनाकर रिक्त स्थान पूरा करें -
    सेवकः ------------------ (आसन्दः) आनयति ।                     
    मित्रं ------------------  (सन्देशः) प्रेषयति ।             
    शोधार्थी ------------------  (लेखः) लिखति ।                       
    अतिथिः ----------------- (पुष्पगुच्छः) स्वीकरोति ।             
    वटुकः ------------------- (मन्त्रः) वदति ।                           
    छात्रः ------------------ (सूचना) विस्मरति ।                       
    निरीक्षकः ------------------ (कक्ष्या) आगच्छति ।                
    गृहिणी ------------------  (कपाटिका) क्रीणाति ।                 
    प्रमुखः------------------ (संस्था) सञ्चालयति ।                     
    माता------------------ (पाकशाला) प्रविशति ।                    
    सेविका------------------ (योजिनी) आनयति ।                    
    शिशुः------------------- (अङ्गुली) स्पृशति ।                       
    अधिकारी------------------ (दैनन्दिनी) उद्घाटयति । 
    अग्रजः ------------------ (दूरवाणी) करोति ।                      
    भ्राता ------------------ (घटी) क्रीणाति ।                            
    विजेता ------------------ (पदकम्) धरति ।                     
    अभिनेता------------------ (नाटकं) करोति ।            
    भक्तः------------------ (पुष्पं) चिनोति ।                              
    चित्रकारः ------------------  (चित्रं) रचयति ।                     
    पण्डितः------------------- (शास्त्रं) जानाति ।                       
    वैदेशिकः------------------  (देहली) आगच्छति ।                 
    विदूषकः------------------ (हास्यकणिका) वदति ।               
    ग्राहकः ------------------ (पत्रिका) क्रीणाति ।                     
    पितामही ------------------ (कथा) श्रावयति ।                     
    सा ------------------ (द्विचक्रिका) चालयति ।                      
    नटी------------------ (शाटिका) धरति ।                             
    विद्यार्थी------------------ (संहिता) पठति ।             
    भवती ------------------ (शृङ्खला) आनयति ।                    
    बालिका ------------------ (पाञ्चालिका) आनयति ।            
    लुण्ठाकः ------------------ (छुरिका) प्रदर्शयति । 
     पाठ- 4                   

    3. करण कारक -  तृतीया विभक्ति     

    कर्ता जिसकी सबसे अधिक सहायता से कार्य करता है उसे करण कहते हैं। जैसे- मोहनः लेखन्या लिखति। यहाँ पर मोहन लेखनी की सहायता से लिखता है,अतः लेखनी करण है। इसमें तृतीया विभक्ति होगी। 
    तृतीया विभक्ति दो स्थानों पर होती हैं। 1. जहाँ कर्ता अनुक्त (अप्रधान) हो उस कर्ता में तथा 2.  करण कारक में । 
    वाच्य परिवर्तन के अध्याय में उक्त तथा अनुक्त कर्ता के बारे में विशेष चर्चा होगी। यहाँ  उक्त तथा अनुक्त कर्ता के कतिपय उदाहरण दिया जा रहा है।
    जिस क्रिया में कर्ता की प्रधानता होती है वहाँ कर्ता उक्त होता है तथा जिस क्रिया में कर्ता गौण होता है उसे अनुक्त कर्ता कहते हैं।

    रामः रावणं अहनत् -    इस वाक्य में कर्ता उक्त (प्रधान ) हैअतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति हुई।

    रामेण रावणः अहन्यत - इस वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान ) हैअतः कर्ता में तृतीया विभक्ति हुई।

    रामेण रावणः हतः - इस वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान ) हैअतः कर्ता में तृतीया विभक्ति हुई।

    करण में तृतीया विभक्ति का उदाहरण-

    बालकः चषकेण जलं पिबति। सः उपनेत्रेण पश्यति।

    विशेष नियम

    कतिपय धातुओं के साथ साधकतम कारक (सबसे अधिक सहायक कारक) का योग होने पर में तृतीया विभक्ति के नियमों में परिवर्तन हो जाता है। कहीं पर कुछ विशेष शब्दों या अर्थों के कारण भी तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-

    1. दिवः कर्म च

    दिव् (जुआ खेलना) धातु के साधकतम करण की विकल्प से कर्म और करण संज्ञा होती है। उदाहरण-

    कृषकः अक्षैः दीव्यति। इसमें तृतीया विभक्ति हुई।

    कृषकः अक्षान् दीव्यति। इसमें द्वितीया विभक्ति हुई।
    2. सहयुक्तेऽप्रधाने
    सह के योग में अप्रधान (प्रधान के सहायक) को तृतीया होती है। जैसे- अध्यापकेन सह शिष्यः आगतः। इसी प्रकार साकं समं और सार्धं के योग में भी तृतीया विभक्ति होती है।
    3. पृथग्विनानानाभिस् तृतीया ऽन्यतरस्याम्
    पृथक् , विना, नाना के योग में विकल्प से तृतीया होती है। वैकल्पिक पक्ष में द्वितीया अथवा पंचमी विभक्ति होगी। अहं दशदिनानि यावत् शुभ्रां शुभ्रेण शुभ्रात् पृथक् न निवसामि। इसी प्रकार विना, नाना के योग में तीनों विभक्तियाँ होगी।
    4. येनाङ्गविकारः
    जिस अंग विशेष में विकार हो उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- मम नेता कर्णेन बधिरः अस्ति।
    5. इत्थंभूतलक्ष्णे
    जब कोई विशेष चिह्न से या जिस कारण से जाना जाय उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- मम परिवेशी चतुःचक्रिकया धनिकः प्रतीयते।
    6. हेतोः

    जिस कारण से कोई कार्य होता है या किया जाता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- अध्ययनेन धनं मिलति। धनं परिश्रमेण मिलति। इसमें अध्ययन तथा परिश्रम कारण (हेतु)  है।
    नोट-   अध्ययनार्थियों को इसके अतिरिक्त अन्य नियमों की भी जानकारी करनी चाहिए। 

    उदाहरण -

    अश्वः  मोहनेन सह गच्छति । अश्वः अपि तेन सह धावति । सः मित्राभ्यां सह उपवने क्रीडति । मात्रा सह रामः गच्छति । मम सुखेन कालः याति । रामः पितुराज्ञया वनं अगच्छत् । 

    सः वामहस्तेन लिखति । त्वं केन हस्तेन लिखसि अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि । सः वामपादेन चलति । त्वं केन पादेन चलसि अहं केन अपि पादेन न चलामि । त्वं कथं चलसि अहं पादाभ्यां चलामि। त्वं कथम् आकर्णयसि अहं कर्णाभ्याम् आकर्णयामि । त्वम् इक्षुदण्डं कथं चर्वसि अहं दन्तै: इक्षुदण्डं चर्वामि । त्वं केन सह खेलसि अहं कृष्णेन सह खेलामि।

    इन वाक्यों का पुरुष तथा वचन परिवर्तन कर लिखें ।

    सः वामहस्तेन लिखति । त्वं केन हस्तेन लिखसि अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि । तौ वामहस्तेन लिखतः । युवां केन हस्तेन लिखथः आवां दक्षिणहस्तेत लिखावः । ते वामहस्तेन लिखन्ति । यूयं केन हस्तेन लिखथ वयं दक्षिणहस्तेन लिखामः ॥


    विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। यहाँ सभी विभक्तियों का अभ्यास दिया गया है। इसमें से तृतीया विभक्ति पर जाकर इसका अभ्यास करें। अधिक विस्तार के भय से यहाँ अभ्यास नहीं दिया जा रहा है।

     पाठ- 5    

    4. सम्प्रदान कारक - चतुर्थी विभक्ति


    जिसे संप्रदान संज्ञा होती होती उसे चतुर्थी विभक्ति होती है। इस पाठ में हम देखेंगें कि किसे-किसे सम्प्रदान सेज्ञा होती है। इसमें कुछ सामान्य नियम है और कुछ विशेष नियम।

    सामान्य नियम-

    1.कर्मणा यमभिप्रैति स सम्‍प्रदानम् ।

    दान क्रिया के कर्म के द्वारा कर्ता जिसे सन्तुष्ट करना चाहता है, वह सम्प्रदान कहलाता है।

    2.क्रियया यमभिप्रैति सोऽपि सम्पादानम्।

    किसी विशेष क्रिया के द्वारा जो इच्छित व्यक्ति या वस्तु हो उसकी भी सम्प्रदान संज्ञा हो।

    चतुर्थीं सम्प्रदाने

    सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है।

    उदाहरण- बालकाय पुस्तकं ददाति। बालक के लिए पुस्तक देता है। इस वाक्य में देना दान कर्म है। इस कर्म के द्वारा कर्ता बालक को सन्तुष्ट करना चाहता है अतः कर्मणा यमभिप्रैति सूत्र के नियम के अनुसार बालक की सम्प्रदान संज्ञा हुई। चतुर्थीं सम्प्रदाने से सम्प्रदान संज्ञक बालक में चतुर्थी विभक्ति होकर बालकाय हुआ।

    क्रिया के द्वारा अभिप्रेत का उदाहरण- श्रमिकः रोटिकाय नगरे वसति। रोटी के लिए नगर में निवास करता है। इसमें निवास करना क्रिया विशेष है। इस निवास करने का विशेष प्रयोजन है- रोटी। यदि कहीं और रोटी मिल जाय तो वह नगर में निवास नहीं करेगा। अतः क्रिया विशेष के द्वारा इच्छित रोटिका में चतुर्थीं विभक्ति होकर श्रमिकः रोटिकाय नगरे वसति प्रयोग होगा। इसी प्रकार छात्रः शिक्षायै विद्यालयं गच्छति आदि प्रयोग होंगें।

    विशेष नियम
    (1) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः
    रुच् धातु और उसके अर्थ वाली अन्य धातुओं के योग में प्रसन्न होने वाला सम्प्रदान कहलाता है ।
    उदाहरण-  मल्लाय घृतं रोचते। पहलवान को घी अच्छा लगता है। इस वाक्य में प्रसन्न होने (रुचने) वाला मल्ल है। इसकी सम्प्रदान संज्ञा होकर चतुर्थी विभक्ति हुई। अन्य उदाहरण देखें-
     धनिकेभ्यः रजतं रोचते। धनिकों को चांदी अच्छी लगती है।
    विडालेभ्यः मूषकं रोचते। बिल्लियों को चूहा अच्छा लगता है।
    मह्यं भक्तिः न रोचते। मुझे भक्ति अच्छी नहीं लगती है।
     (2) नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च  
    नमःस्वस्ति (कल्याण)स्वाहास्वधा (कल्याण)अलम् (समर्थ)वषट् (स्वाहा) शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
    भवते नमः- आपको नमस्कार है।
    तुभ्यं स्वस्ति- आपका कल्याण हो।
    रामाय स्वाहा- राम को यह अर्पण है।

    ध्यातव्य बातें- उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी नियम के अनुसार पद को लेकर दो विभक्ति होती है उससे क्रिया के सम्बन्ध के कारण होने वाली विभक्ति बलवान होती है। अतः मुनित्रयं नमस्कृत्य जैसे स्थान पर नमः के साथ करोति आदि क्रिया पद के योग होने से पद को केन्द्र में रखकर होने वाली चतुर्थी विभक्ति नहीं होती। यहाँ द्वितीया विभक्ति हो जाती है।
    (3) क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः
    क्रुध= क्रोध करना, द्रुह = द्रोह करना,ईर्ष्या = ईर्ष्या करना, असूया = दूसरे के गुण में दोष निकालना, जलन करना इन धातुओं तथा इन धातुओं के समान अर्थ रखने वाले धातुओं के योग में जिसके ऊपर क्रोध किया जाता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।
    उदाहरण-
    माता पुत्राय क्रुध्यति।  इस वाक्य में माता पुत्र के ऊपक क्रोध करती है,अतः पुत्र की सम्प्रदान संज्ञा एवं चतुर्थी सम्प्रदाने से चतुर्थी विभक्ति होती है। इसी प्रकार नेता जनताभ्यः द्रुह्यति। कर्मचारिणः मह्यं ईर्ष्यति। चौराः रक्षकाय असूयति। 

    परन्तु जब क्रुध और द्रुह धातु उपसर्ग के साथ होता है तब जिसके प्रति क्रोध या द्रोह किया जाता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है। जैसे- अध्यापकः शिष्यं अभिक्रुध्यति। यहाँ क्रुध के साथ अभि उपसर्ग लगे होने के कारण शिष्य में चतुर्थी विभक्ति नहीं होकर द्वितीया विभक्ति हुई।
    (4)तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या (वार्तिक)
    जिस प्रयोजन के लिए कोई कोई कार्य किया जाता है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।

    शिशुः पठनाय गच्छति । 
    छात्रः छात्रवृत्तये यतति। इन वाक्यों में शिशु और छात्र का जो प्रयोजन है पढ़ना, छात्रवृत्ति पाना। अतः इसमें  चतुर्थी विभक्ति हुई।
    कुछ अन्य उदाहरण देखें। यहाँ चतुर्थी विभक्ति को मोटे अक्षर में प्रदर्शित किया गया है-

    अध्यापकः छात्रेभ्यः मोदकानि यच्छति।

    अध्यापकः जितेन्द्राय मोदकं यच्छति ।

    अध्यापकः गणेशाय मोदके यच्छति।

    अध्यापक: ज्येष्ठेभ्यः बालकेभ्यः मोदकानि यच्छति ।

    ब्राह्मणेभ्यः मधुरं प्रियम् । भगवते विष्णवे नमः । मोहनाय आम्राणि रोचन्ते । मह्यं पायसं स्वदते। विप्राय धनं ददाति । मह्यं संस्कृतं रोचते ।  मह्यं चत्वारि फलानि देहि ।

    (5) श्लाघह्नुङ्स्थाशपां ज्ञीप्स्यमानः

    श्लाघृँ कत्थने - भ्वादिः ( प्रशंसा करना)ह्नुङ् अपनयने - अदादिः ( छिपाना)ष्ठा गतिनिवृत्तौ - भ्वादिः (ठहरना)तथा शपँ आक्रोशे - भ्वादिः ( उपालम्भ करना ) धातुओं के योग में जिसकी प्रशंसा आदि की जाय उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। जैसे- गोपी कामात् कृष्णाय श्लाघते। नन्दिनी स्मरात् कृष्णाय श्लाघते, ह्रुतेतिष्ठतेशपते वा ।

    अन्य नियमों की जानकारी के लिए व्याकरण की मूल पुस्तक अष्टाध्यायी या सिद्धान्तकौमुदी का अध्ययन करें।

    चतुर्थी विभक्ति का वाक्य में प्रयोग-

    सः दरिद्राय धनं यच्छति । त्वं किं भिक्षुकाय भिक्षां यच्छसिअहं तृषार्ताय जलं यच्छामि । माधवः क्षुधिताय भोजनं यच्छति । 


    नोट- विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। यहाँ सभी विभक्तियों का अभ्यास दिया गया है। इसमें से चतुर्थी विभक्ति पर जाकर इसका अभ्यास करें। अधिक विस्तार के भय से यहाँ अभ्यास नहीं दिया जा रहा है।

     पाठ- 6   

    5. अपादान कारक - पञ्चमी विभक्ति

    सामान्य नियम
     अपादाने पञ्चमी
    अपादान में पञ्चमी होती है।

    (मुरारिः) ग्रामाद् आयाति।  यहाँ मुरारिः कर्ता तथा आयाति क्रिया है । मुरारि का गाँव से अलगाव हो रहा है । गाँव से अलगाव होने के कारण गाँव ध्रुव (स्थिर) हैअतः ग्राम की ध्रुवमपायेऽपादानम् से अपादानसंज्ञा और अपादाने पञ्चमी से उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई- मुरारिः ग्रामादायाति। ग्रामाद् आयाति = गांव से आता है।
    (अश्वारोही) धावतः अश्वात् पतति। इस वाक्य में दौड़ता हुआ घोड़ा ध्रुव है। यहाँ दौड़ते  हुए घोड़े से अलगाव हो रहा हैअतः अश्व की अपादानसंज्ञा और पञ्चमी विभक्ति होकर अश्वात् हुआ। धावत् यह शतृ प्रत्ययान्त शब्द अश्वात् का विशेषण है अतः धावत् में भी पञ्चमी है। (अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति = घुड़सवार दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है।
    अपाय, विश्लेष, विलगाव, पृथक् होना, अलग होना समानार्थी हैं। जिस किसी सुनिश्चित व्यक्ति या स्थान से अलग हुआ जाता है, वह अपादान कहलाता है। जैसे- साइकिल से गिरता है। इसमें साइकिल अपादान है। जो अपादान होता है, उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है। 
    उदाहरण-
     बालकः द्विचक्रिकात् पतति। छात्राः कक्षेभ्यः बहिः आगच्छन्ति ।ते विद्यालयात् गृहं गच्छन्ति । वृक्षेभ्यः पत्राणि पतन्ति । आकाशात् जलम् पतति । सुदेशः भ्रमणाय गृहात् गच्छति ।

    विशेष नियम

    1. भीत्रार्थानां भयहेतुः

    भयार्थक (जिससे डर मालूम हो) और त्राणार्थक (जिससे भय के कारण रक्षा करनी हो), उस कारक की अपादान संज्ञा होती है।

    उदाहरण- बिडालात् विभेति। इसमें बिडाल से डरता है। 
    2. आख्यतोपयोगे
    जिनसे नियम पूर्वक विद्या ली जाती है, वह अपादान होता है।
    जैसे-  विद्यालये गुरोः अधीते। 
    नोट- विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। यहाँ सभी विभक्तियों का अभ्यास दिया गया है। इसमें से अपादान  विभक्ति पर जाकर इसका अभ्यास करें। अधिक विस्तार के भय से यहाँ अभ्यास नहीं दिया जा रहा है।

    6. अधिकरण कारक - सप्तमी विभक्ति

    सामान्य नियम
    आधारोऽधिकरणम् । सप्तम्याधिकरणे च
    क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं। अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। आधार तीन प्रकार के होते हैं।
    1.    जिसके साथ आधेय का भौतिक सम्बन्ध बना हुआ हो, औपश्लेषिक आधार कहा जाता है।
    2.   जिसके साथ आधेय का बौद्धिक सम्बन्ध बना हुआ हो, वैषयिक आधार कहा जाता है।
    3.    जिसके साथ आधेय का व्याप्य- व्यापकभाव सम्बन्ध बना हुआ हो, अभिव्यापक आधार कहा जाता है।
    उदाहरण-  
    वानरः वृक्षे निवसति- औपश्लेषिक आधार का उदाहरण है। 
    मम अध्ययने रूचिः अस्ति- यहाँ वैषयिक आधार है। 
    पुस्तके अक्षराणि सन्ति - व्याप्य- व्यापकभाव रूपी आधार है।
    उदाहरण-

    मम मनसि सन्देहः वर्तते । नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति । जीवने किमपि असाध्यं कार्यं नास्ति । भवत्सु कः कर्मवीरः वयं लोके निवसामः ।

    सप्तमी विभक्ति का वाक्य में प्रयोग करें-

    अहम् औषधालये वसामि । अहं भोजनालये खादामि । अहं विद्यालये पठामि । सः कार्यालये तिष्ठति । सः तत्रैव खादति । सः आपणे न खादति । सः भाट्यावासे न वसति । 

    संस्कृत में उत्तर लिखें- त्वं कुत्र वससि त्वं कुत्र खादसि त्वं कुत्र पठसि तिष्ठति सः कुत्र खादति सः कुत्र वसति सः दीननाथः कुत्र गच्छति ? पुलिनेषु कः विहसति ?

    नोट- विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। यहाँ सभी विभक्तियों का अभ्यास दिया गया है। इसमें से विभक्ति पर जाकर इसका अभ्यास करें। अधिक विस्तार के भय से यहाँ अभ्यास नहीं दिया जा रहा है।

     पाठ- 7   

    षष्ठी विभक्ति- 

    शेषे षष्ठी -  कारक के अतिरिक्त स्व स्वामी आदि संबंधों में षष्ठी विभक्ति होती है। 
    क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता है। संबंधों दो के बीच में होता है ।यह विभक्ति प्रायशः एक संज्ञा शब्द का दूसरे संज्ञा शब्द के साथ सम्बन्ध सूचित करता है।  यह संबंध अनेक प्रकार का होता है जैसे पिता पुत्र के बीच जन्य जनक भाव संबंध,  दो पदार्थों के बीच प्रकृति विकृति भाव संबंध,  कार्य कारण भाव संबंध,स्व स्वामी भाव संबंध आदि। 
    यह षष्ठी विभक्ति जिसका संबंध होगाउसमें होती है जैसे देवदत्तस्य पुत्रः यज्ञदत्तः अस्ति। इस वाक्य में देवदत्त का सम्बन्ध यज्ञदत्त से है अतः देवदत्त में षष्ठी विभक्ति हुई।

    उदाहरण- 
    मोहनः उद्यानस्य शोभां पश्यति । 

    विशेष नियम

     जहां पर कर्म आदि कारकों की अविवक्षा तथा संबंध मात्र की विवक्षा हो वहां षष्ठी विभक्ति होती है। विवक्षा = बोलने की इच्छा । जैसे शतां गतं वाक्य में गम् धातु से नपुंसकत्व विशिष्ट भाव में क्त प्रत्यय हुआ । भाव में क्त होने से  तृतीया विभक्ति होकर शतेन गतम् वाक्य  होना चाहिए था परंतु इस वाक्य में तृतीया विभक्ति की अविवक्षा है और संबंध मात्र की विवक्षा होने से षष्ठी विभक्ति होती है। सम्बन्ध को विशेष रूप से प्रदर्शित करना चाहता है ।  इसे एक अन्य उदाहरण के द्वारा और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। मोहनः सर्पिषो जानीते में सर्पिषः में षष्ठी विभक्ति है। वाक्य होना चाहिए सर्पिषा जानीते / भुंक्ते ।  मोहन को भूख तो लगी है लेकिन वह खा नहीं रहा है। जब उसे घी देने की लालच दी जाती है तो वह खाने को तैयार हो जाता है।  मोहन को अन्य खाद्य पदार्थ से सम्बन्ध नहीं है बल्कि घी से संबंध हैजिसके कारण वह भोजन करने को तैयार हो गया ।अतः भी सर्पष् में षष्ठी विभक्ति हो जाती है।
    कर्तृकर्मणोः कृतिः  सूत्र से ज्ञात होता है कि षष्ठी भी कारक है। कृदन्त के योग में कर्ता एवं  कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है।
    इसके अतिरिक्त कृत्यानां कर्तरि वायतश्च निर्धारणेनित्यपर्याय प्रयोगे सर्वासां विभक्तिदर्शनम् सूत्र को भी देखना चाहिए ।

    षष्ठी विभक्ति का वाक्य में प्रयोग-

    कृष्णस्य वर्णः श्यामः अस्ति । मम देहस्य वर्णोऽपि श्यामः अस्ति । तस्य देहस्य वर्ण: कः अस्ति ? — श्यामः वा गौर: वा अस्य देहस्य वर्णः ताम्रः अस्ति । तव केशस्य रङ्गः कृष्णः अस्ति । अस्माकं विद्यालयस्य नाम संस्कृतशिक्षणपाठशाला अस्ति । युष्माकं विद्यालयस्य नाम किम् अस्ति तेषां विद्यालयस्य नाम किम् अस्ति एतेषां विद्यालयस्य नाम किम्  अस्तियुष्माकं संस्कृतशिक्षकस्य नाम किम् अस्ति ?


    नोट- विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। यहाँ सभी विभक्तियों का अभ्यास दिया गया है। इसमें से चतुर्थी विभक्ति पर जाकर इसका अभ्यास करें। अधिक विस्तार के भय से यहाँ अभ्यास नहीं दिया जा रहा है।

     उपपद विभक्ति-  नमः, स्वस्ति, प्रति, सह, विना आदि शब्द पद कहे जाते हैं। कारक प्रकरण में कुछ विभक्तियां पदों के कारण निर्धारित होती है। यथा नमः के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। सह के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यदि किसी विभक्ति में पद तथा कारक दोनों विभक्ति प्राप्त हो तो कारक विभक्ति होती है। पदमाश्रित्योत्पन्नाविभक्तिः उपपदविभक्तिः। क्रियामाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः  कारकविभक्तिः। उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः वलीयसी।

     अभ्यास के लिए  विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। कारक, सन्धि, तिङन्त, कृदन्त शब्दों का विश्लेषण, निर्माण पदों को आपस में मिलाने परिचय आदि विभिन्न कार्यों के लिए संसाधनी पर क्लिक करें। इसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया। 

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