यदि आपसे यह कहा जाय कि राम कथा का बीज वेद में दिखाई देता है । वेद ग्रन्थों
में विशेषकर ऋग्वेद के मंत्रों से राम कथा निकली है । रामायण में उन्हें कहानी का
रूप दिया गया तो सहज विश्वास नहीं होगा। नीलकण्ठ नामक विद्वान् ने ऋग्वेद के १०४१७
मन्त्रों में से १५५ ऐसे मन्त्रों को पहचाना, जो कि रामकथापरक अर्थ को
व्यक्त करते हैं। इन मंत्रों को 'मन्त्ररामायण' नाम
दिया। वाल्मीकि ने इन्हीं मंत्रों को एक कथानक के रूप में विस्तार देकर रामायण
नामक ग्रन्थ की रचना की। रामकथा से सम्बन्धी उपलब्ध समस्त साहित्य का उपजीव्य
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि प्रणीत 'रामायण' को माना जाता है। सूक्ष्म रूप
से देखें तो रामकथा का उपजीव्य वाल्मीकिकृत रामायण न होकर वेद हैं। वाल्मीकि ने
कथानक के रूप में उनका विस्तार मात्र किया है। कुछ विद्वान् रामायण को रामकथा का
वर्णन करने वाला धार्मिक ग्रन्थ न मानकर 'महाकाव्य' मानते हैं। इसमे
चौबीस हजार श्लोक हैं। यह प्राणिमात्र के जीवन के विविध पक्षों को उपकृत करती है। इस
लेख में आपको मंत्ररामायण, रामायण, रामकथा तथा नीलकण्ठ के बारे में जानकारी दिया
गया है।
रामायण-महाभारत-पुराणादि का प्रमाण
प्रस्तुत करने के पीछे उनकी वेदमूलकता ही कारण है। यह परम्परा इन सभी को
वेदार्थविस्तारक के रूप में मान्यता प्रदान करती है अर्थात् ये सब वेदत्तत्त्व का
व्याख्यान करते हैं- 'इतिहासपुराणाभ्यां
वेदं समुपबृंहयेत्।' भारतीय मनीषा
वेदों को अनादि और ईश्वर के निःश्वास के रूप में मानती हैं।' आधुनिक विद्वान् भी वेद को विश्व का प्राचीनतम
वाड्मय मानते हैं। वेद केवल धर्म के ही मूल' नहीं अपितु समस्त भारतीय वाड्मय के मूल हैं। अतः रामकथा का बीज
वेद में है । वेद को रामकथा का (मूल) उत्स माना जाता है ।
आदिकवि महर्षि वाल्मीकि ने स्वयं
ही रामायण को वेदमूलक स्वीकार किया है। वे इसे वेदतत्त्व का उपबृंहण मानते हुए
कहते हैं कि यह रामायण महाकाव्य समस्त वेदानुकूल है। यह सम्पूर्ण पापों का प्रशमन
तथा दुष्टग्रहों का निवारण करने वाला है-
रामायणं
महाकाव्यं सर्ववेदेषु सम्मतम् ।
सर्वपापप्रशमनं
दुष्टग्रहनिवारणम् ।।
रामकथा की वेदमूलकता का
उद्घोष करते हुए रामायण में ही स्पष्टतः कहा गया है-
कुशीलवौ तु धर्मज्ञौ राजपुत्रौ यशस्विनौ।
भ्रातरौ
स्वरसम्पन्नौ ददर्शाश्रमवासिनौ ।।
स तु मेधाविनौ दृष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठितौ।
वेदोपबृंहणार्थाय
तावग्राहयत प्रभुः ।।
काव्यं रामायणं
कृत्स्नं सीतायाश्चरितं महत् ।
पौलस्त्यवधमित्येवं
चकार चरितव्रतः ।।
अर्थात्, यशस्वी, धर्मज्ञ, मधुरस्वर वाले और
आश्रम में निवास करने वाले दोनों भाइयों-राजकुमार कुश और लव को मेघावी तथा
वेदनिष्ठ जानकर महर्षि वाल्मीकि ने वेदका अर्थ-विस्तार करने के लिए सीता के महान्
चरित्र से युक्त रावण वध नामक महाकाव्य का समग्रतया अध्ययन दोनों भाइयों को
कराया।
उपर्युक्त कथन से प्रमाणित होता
है कि वाल्मीकि ने रामायण की रचना वेद का उपबृंहण (अर्थ-विस्तार) करने के लिए ही
की है। 'मन्त्ररामायण' के प्रथम श्लोक (मङ्गलाचरण) की स्वोपज्ञ व्याख्या
में भी नीलकण्ठ ने उपर्युक्त (वाल्मीकिरामायण के) श्लोकों को उद्धृत करते हुए
रामकथा की वेदमूलकता सिद्ध की है। इसी प्रसङ्ग में उन्होंने अगस्त्यसंहिता के
अधोलिखित वचन को भी उद्धृत किया है-
वेदवेद्ये परे
पुंसि जाते दशरथात्मजे ।
वेदः
प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायणात्मना।
तस्माद्
रामायणं देवि वेद एव न संशयः ।।
अर्थात्, वेदैकगोचर
परमात्मा, जब दशरथ के पुत्र राम के
मानव रूप में पृथ्वी पर अवतीर्ण हुए तब प्रचेतापुत्र वाल्मीकि के मुख से रामायण के
रूप में साक्षात् वेद भी प्रकट हुए। अतः, हे देवि ! रामायण वेद ही है-इनमें तनिक भी सन्देह नहीं है।
रामकथा के कुछ पात्रों के नाम वैदिक वाड्मय (संहिता, ब्राह्मण एवम् उपनिषद्) में यत्र तत्र पाये जाते हैं किन्तु
न तो वहाँ उनका वह रूप है जो रामकथा में प्रसिद्ध है और न ही कोई क्रमबद्ध रामकथा
ही है। यह सर्वविदित है कि राम का अवतार (जन्म) प्रसिद्ध इक्ष्वाकुवंश में हुआ था।
इक्ष्वाकु का उल्लेख ऋग्वेद के दशम मण्डल में हुआ है- 'यस्येक्ष्वाकुरूपव्रते रेवान् भराय्येधते'। इक्ष्वाकु का नामोल्लेख अथर्ववेद में भी एक
बार हुआ 'त्वा वेद पूर्वं इक्ष्वाको
यम्। दशरथ का उल्लेख ऋग्वेद में एक बार प्राप्त होता है-'चत्वारिंशद् दशरथस्य शोणाः सहस्रस्याग्रे श्रेणिं नयन्ति।
अश्वपति केकय का उल्लेख शतपथ ब्राह्मण और छान्दोग्योपनिषद् में हुआ है और दोनों
स्थलों पर प्रसङ्ग समान है।
जनक का उल्लेख वैदिक वाङ्मय में ब्रह्मवादी राजर्षि के रूप में हुआ है तथा वे
ब्रह्मोद्य सभाओं में महर्षि याज्ञवल्क्य के साथ उल्लिखित हैं। शतपथ ब्राह्मण के चार स्थलों पर तथा तैत्तिरीय ब्राह्मण में एक स्थल पर जनक का उल्लेख हुआ है ।
बृहदारण्यक उपनिषद् में भी जनक का उल्लेख है।
रामायण को 'गायत्रीबीज' कहकर नीलकण्ठ ने
रामायण की वेदमूलकता प्रतिष्ठित की है। तत्पश्चात् 'रामरक्षास्तोत्र' की योजना करके उसकी व्याख्या के माध्यम से भी रामकथा के वेदमूलकत्व को स्थापित
किया है। 'मन्त्ररामायण' का मूल कलेवर १५७ मन्त्रों द्वारा निर्मित है।
मुख्य रूप से ऋग्वेद के विभिन्न सूक्तों से स्वाभीष्ट अर्थ को व्यक्त करने वाले
१५५ मन्त्रों को सङ्कलित किया गया है। एक मन्त्र (क्रम सं. ६५) वाजसनेयि संहिता से
उद्धृत है और एक मन्त्र (क्रम सं. १५६) किसी अन्य संहिता से ग्रहण किया गया है।
'मन्त्ररामायण' की रचना वस्तुतः
नीलकण्ठ की वेद के प्रति अगाध श्रद्धा और रामकथा के प्रति उनकी असीम भक्ति का
प्रतिफल है। ऋग्वेद के १०४१७ मन्त्रों में से ऐसे १५५ मन्त्रों का चयन करना,
जो रामकथापरक अर्थ को व्यक्त करने वाले हों,
कोई साधारण कार्य नहीं है। इसके लिए नीलकण्ठ को
अपूर्व श्रम करना पड़ा होगा; किन्तु जब सामने
महान लक्ष्य हो तो मनस्वी पुरुष श्रम-श्रान्ति की परवाह किये बिना उसमें लग जाता
है और सच बात तो यह है कि जब मन रम जाता है तो श्रम की अनुभूति होती ही नहीं। फिर
मन नीलकण्ठ का रमा कहाँ? राम में और
वेद में। जब दोनों हाथ में लड्डू हों तो व्यक्ति की प्रसन्नता कितनी होगी- यह सहज
ही अनुमेय है। निश्चय ही, इस कर्तृत्व के
द्वारा नीलकण्ठ का श्रेय और प्रेय दोनों सिद्ध हुआ। मन्त्ररामायण, नीलकण्ठ की असाधारण प्रतिभा, उत्कृष्ट धारणा शक्ति, असीम धैर्य, उदात्त भक्ति,
अप्रतिम कर्मनिष्ठा और दृढ़ सङ्कल्प का परिचायक
है। विभिन्न वैदिक देवताओं की स्तुति में लिखे गये पृथक् पृथक् मन्त्रों को रामकथा
के प्रसङ्गोचित क्रम में सुयोजित कर उससे रामकथा के बीजरूप वैदिक स्वरूप का आकार
प्रदान करना, स्वयं में एक
अद्भुत सारस्वत अनुष्ठान है। रामकथा की वेदमूलकता सिद्ध करने के लिए समर्पण भाव से
किए गए इस महनीय कर्तृत्व की जितनी भी प्रशंसा की जाय कम ही है।
यदि नीलकण्ठ ने मन्त्ररामायण के
रूप में इन मन्त्रों को सङ्कलित करने मात्र से ही अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली
होती, तो सम्भवतः उनका उद्देश्य
और मन्त्ररामायण का प्रयोजन पूरा न होता। क्योंकि सङ्कलित मन्त्र तो भिन्न वैदिक
अर्थ वाले हैं। अतः उन मन्त्रों मे निहित रामकथा के तत्तत् प्रसङ्गों को उद्घाटित
करने के लिए उन्होंने मौलिक मेधा के बल से 'मन्त्ररहस्यप्रकाशिका' नामक स्वोपज्ञ व्याख्या लिखकर रामकथाभक्त जिज्ञासु
अध्येताओं का अपूर्व उपकार किया है। यदि मन्त्ररामायण की यह नीलकण्ठी टीका न होती
तो रामकथापरक गूढ़ मन्त्रार्थ को समझना अत्यन्त दुष्कर होता। यद्यपि (मेरी
निष्पक्ष) धारणा है कि नीलकण्ठ द्वारा किए गए मन्त्रार्थ शब्दशक्तियों के साथ
संघर्ष करके ही प्राप्त किए गए हैं और उन्हें सहज तथा प्रसन्न अर्थ नहीं कहा जा
सकता तथापि श्रीरामप्रभु का प्रसाद मानकर उन्हें शिरोधार्य करना ही समीचीन है।
अनुमान है कि नीलकण्ठ ने मन्त्ररामायण की रचना उन प्रतिपक्षियों का मुंह बन्द करने
के लिए की होगी, जो रामकथा को
वेदमूलक नहीं मानते होंगे। मन्त्ररहस्यप्रकाशिका के उपोद्घात में अपने उद्देश्यगत
विषय को स्पष्ट करने का पूर्णतः प्रयास करते हुए उन्होंने स्पष्टतः कहा है -
"नैष स्थाणोरपराधो यदेनमन्धो न पश्यतीति न्यायेन त्वयि वेदार्थानभिज्ञे सति न
रामायणमपराद्धयति ।।" यही कारण है कि आग्रह विशेष (हठ) पूर्वक उन्होंने सायास
मन्त्रों के अर्थ रामकथा परक किए हैं। मन्त्ररहस्यप्रकाशिका में अर्थ सम्बन्धी
जटिलतायें स्पष्टतः देखी जा सकती हैं। नीलकण्ठ द्वारा की गयी शब्द-व्युत्पत्तियाँ
भी अपूर्व ही हैं। अन्ततः हम कह सकते हैं कि मन्त्ररामायण अपनी तरह की अद्वितीय
रचना है।
नीलकण्ठ चतुर्धर
'मन्त्ररामायण' के कर्ता का नाम
नीलकण्ठ चतुर्धर है। इसके कर्तृत्व का प्रकाशन उन्होंने स्वयं मन्त्ररामायण के
अन्त में स्वोपज्ञ टीका की समाप्ति में लिखी गयी पुष्पिका में किया है-
इस उल्लेख के अनुसार इनके पिता
श्री गोविन्दसूरि चतुर्धर (चौधरी) ब्राह्मणवंश के शिरोमणि थे। वे व्याकरण मीमांसा
और न्याय शास्त्र के उद्भट विद्वान् थे। उनके नाम के आगे लगी 'सूरि' की उपाधि भी इनकी प्रकृष्ट विद्वत्ता का बोधक है। श्री नीलकण्ठ की माता का नाम
फुल्लाम्बिका था और इनका परिवार गोदावरी तट पर स्थित कूर्पर ग्राम में निवास करता
था। सम्प्रति यह स्थान महाराष्ट्र प्रान्त के अहमदनगर जनपद में 'कोपारगांव' नाम से जाना जाता है। कालान्तर में इनका कुटुम्ब कूर्पर
ग्राम से आकर काशी में बस गया। विद्वानों ने श्री नीलकण्ठ की कृतियों के रचनाकाल के
आधार पर इनका स्थितिकाल १६५० से १७०० ई. माना है। इनके पुत्र-पौत्रों का भी उल्लेख
वंशमर्यादानुरूप अच्छे विद्वान् लेखकों के रूप में प्राप्त होता है।
संस्कृत साहित्य में नीलकण्ठ एक
उत्कृष्ट टीकाकार के रूप में विख्यात हैं। महाभारत पर 'भारतभावप्रदीप' नामक इनकी टीका अत्यन्त प्रामाणिक मानी जाती है, यह 'नीलकण्ठी' नाम से भी प्रसिद्ध है। नीलकण्ठ ने इस टीका को लिखने से पूर्व, महाभारत पर प्राप्त अपने पूर्ववर्ती टीकाकारों
की प्रायः सभी टीकाओं को यत्नपूर्वक प्राप्त कर उनका गहन अध्ययन
किया था तथा महाभारत के मूलरूप को प्रकाशित करने के उद्देश्य से अपनी टीका में
सर्वोपयुक्त पाठों का निर्धारण किया था-
इन्होंने अपने 'भारतभावप्रदीप' में महाभारत के पूर्ववर्ती प्रमुख टीकाकारों - देवबोध,
विमलबोध, अर्जुनमिश्र, रत्नगर्भ, सर्वज्ञनारायण
आदि का उल्लेख करते हुए उनके द्वारा स्वीकृत पाठों को उद्धृत किया है।' महाभारत के अतिरिक्त 'गणेश गीता' तथा 'शिवताण्डव' पर भी इन्होंने टीकायें लिखी है।
नीलकण्ठ ने मन्त्ररामायण की
पद्धति में 'मन्त्रभागवत'
नामक ग्रन्थ की भी रचना की है। मन्त्रभागवत में
भी ऋग्वेद से मन्त्रों का संकलन करके इस प्रकार उन्हें प्रस्तुत किया है कि उन
मन्त्रों से सम्पूर्ण भागवत की क्रमबद्ध संक्षिप्त कथा व्यक्त हो जाती है। ऋग्वेद
के उन मन्त्रों का भागवतकथापरक अर्थ करने के लिए नीलकण्ठ ने 'मन्त्रभागवत' पर भी स्वोपज व्याख्या लिखी है।
'भारतभावप्रदीप' के जो हस्तलेख
उपलब्ध होते हैं, उनका प्रतिलिपि
काल १६८७ ई. से १६६५ ई. तक है। नीलकण्ठ कृत शिवताण्डव टीका का रचनाकाल १६८० ई. तथा
गणेशगीता की टीका का रचनाकाल १६६३ ई. है। अनुमान किया जाता है कि महाभारत की टीका
का समय १६८० ई. से पूर्व ही रहा होगा। मन्त्ररामायण और मन्त्रभागवत का रचनाकाल
उपलब्ध नहीं है। सम्भवतः उनकी रचना नीलकण्ठ ने महाभारतादि की टीकाओं के बाद की
होगी।
श्री नीलकण्ठ चतुर्धर के पुत्र का
नाम भी गोविन्द था। इस गोविन्द के पुत्र अर्थात् नीलकण्ठ के पौत्र शिव ने पैठण में
निवास करते हुए सन् १७४६ ई. में 'धर्मतत्वप्रकाश'
नामक ग्रन्थ की रचना की थी।
यावत्स्थास्यन्ति गिरयः
सरितश्च महीतले।
तावद् रामायणी कथा लोकेषु
प्रचरिष्यति ।।
भारतीय समाज, साहित्य और संस्कृति को युगों-युगों से
अनुप्राणित करने वाली रामकथा की अलौकिक महिमा को शब्द सीमा में बाँधना नितान्त
असम्भव है। सभी वर्णों और सभी आश्रमों के लिए पुरुषार्थचतुष्टय की साधिका और मानव
मात्र के लिए सञ्जीविनी रामनामामृतरसायन-परमपावन भक्तिसुधारसस्रोतस्विनी रामकथा
अनिर्वचनीय परमपद प्राप्त कराने वाली है। रामकथा में निबद्ध आदर्श चरित्र और
अनुकरणीय महनीय चरित केवल भारत के लिए ही नहीं अपितु समस्त विश्व के लिए समान रूप
से मङ्गलप्रद और कल्याणकारी हैं। मानवीय संवेदना के उत्स से आविर्भूत रामकथा समस्त
मानवीय गुणों के उदात्तानुदात्त पक्षों से संवलित होकर मानव व्यवहार का दर्पण बनती
है-'रामादिवद्वर्तितव्यं न
रावणादिवत्।'
रामकथा में जिन चरित्रों का
उपनिबन्धन हुआ है, वे चरित्र केवल
अतीत की वस्तु नहीं है; अपितु आज भी
हमारे समाज में अनुभूत तथा काम्य हैं। श्रीराम का आदर्शोज्ज्वल चरित्र मारे समाज
में मर्यादापुरुषोत्तम के रूप में अवतरित हुआ है। इस चरित्र की आज भी इतनी
प्रतिष्ठा है कि राम नाम के श्रवण-सङ्कीर्तन मात्र से जन्म-जन्मान्तर के पापपुञ्ज
विगलित हो जाते हैं। सीता तो पतिव्रता स्त्रियों की आदर्शभूता हैं। यह रामकथा
महर्षि आदिकवि के ही शब्दों में सीता का महनीय चरित ही है- 'सीतायाश्चरितं महत्।' रामायाण में चित्रित भक्ति, भ्रातृप्रेम, वात्सल्य आदि ऐसे अमूल्य तत्त्व हैं, जिनका लवमात्र प्राप्त कर जीवन की कृतार्थता सिद्ध हो जाती है। यही कारण है कि
सनातन धर्मों परिवारों में जीवन का कोई ऐसा क्षण नहीं है जो राममय न हो।
शाश्वत मूल्यों की सहज प्रतिष्ठा
और उदात्त गुण-गौरव-ख्याति के कारण ही रामकथा देश और काल के बन्धन से निर्मुक्त
होकर विश्वसाहित्य में छा गयी है। जब हम भारत समेत दक्षिण पूर्व एशिया तथा संसार
के अन्य देशों की विभिन्न भाषाओं में विरचित और प्रचलित रामकथा को देखते हैं,
तो गोस्वामी तुलसीदास की मान्यता-'रामायन सत कोटि अपारा' में कहीं भी अतिशयोक्ति की प्रतीति नहीं होती। इस विषय पर
अनेक विद्वानों और अनुसन्धाताओं ने व्यापक गवेषणापूर्ण मौलिक कार्य करके विपुल
रामायण-साहित्य का उद्घाटन किया है।
हिन्दी शब्दार्थ -तपस्वी = तापस, तपस्या करने वाला ।वाल्मीकिः = वल्मीक से उत्पन्न तथा 'प्राचेतस' नाम से प्रथित रामायण प्रणेता आदि
कवि वाल्मीकि ने । तपः स्वाध्यायनिरतम् = तपस्या तथा स्वाध्याय में तत्पर ।वाग्विदां = शब्द वेत्ताओं, वाणी-विशेषज्ञों में। वरं = श्रेष्ठ
।मुनिपुङ्गवं = मुनि-प्रवर । नारदं = ब्रह्मपुत्र नारद से । परिपप्रच्छ =
विस्तारपूर्वक पूछा ।
हिन्दी भावार्थ - तपस्वी वाल्मीकि ने (अपने आश्रम में समागत) तपस्या तथा स्वाध्याय में संलग्न, शब्द-वेत्ताओं में उत्कृष्ट एवं
श्रेष्ठ मुनि नारद जी से (इस प्रकार) विस्तारपूर्वक पूछा ।
'वाग्विदांवरम्' में 'यतश्च निर्धारणे' इस पाणिनि सूत्र के द्वारा वैकल्पिक षष्ठी विभक्ति है । 'नारदं परिपप्रच्छ' में 'दुह= याच्– पच् -' इत्यादि नियम के अनुसार 'परि' उपसर्ग-पूर्वक 'प्रच्छ्' धातु के योग में 'नारदं' पद में द्वितीया एकवचन का प्रयोग हुआ है ।
टिप्पणी- परिपप्रच्छ - परि + प्रछँ
ज्ञीप्सायाम् - तुदादिः - लिट् लकार परस्मैपद प्रथमपुरूष, एकवचन । लिट् लकार का प्रयोग
अनद्यतन भूतकाल ( अनद्यतन परोक्ष) में होता है।
यहाँ सहज प्रश्न उठता है कि पूछने रूपी क्रिया अनद्यतन परोक्ष में कैसे हो
सकती है? परिपप्रच्छ यह क्रियापद लिट् लकार का है, जो कि अनद्यतन परोक्ष क्रिया में
प्रयोग की जाती है। यहाँ प्रश्न का परोक्षत्व इसलिए दिखाया गया है क्योंकि आगे कहा
जाने वाला श्लोक भगवान श्री राम के गुणों के अनुसन्धान से जुड़ा है। 'सुप्तोऽहं किल विललाप' इस वाक्य की तरह भी यहाँ अनद्यतन
परोक्ष का प्रयोग हुआ है। "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"
इस वाक्य की तरह परिपप्रच्छ में अपना विनय दिखाने के लिए प्रथम पुरुष का निर्देश
किया गया हैृ। अपने से अन्यत्व दिखाने के
लिए भी परोक्ष क्रिया का निर्देश किया
गया। अपने से श्रेष्ठ व्यक्ति से सीधे बात करना अविनय माना जाता है। परिपप्रच्छ
परि विशेषेण पृष्टवान्।
हिन्दी शब्दार्थ -नु = वितर्क के अर्थ को सूचित करने वाला अव्यय-पद । कः = कौन ।साम्प्रतम् = इस समय । अस्मिन् लोके = इस लोक (मर्त्य-लोक) में । गुणवान् = प्रशंसनीय
गुणों से सम्पन्न । कः = कौन (है) । वीर्य्यवान् = बलवान्, पराक्रमी । धर्म्मज्ञः = धर्म के
तत्त्व को जानने वाला । कृतज्ञः = दूसरों के द्वारा किये गये कार्य (के श्रम या
मूल्य) को जानने वाला ।सत्यवाक्यः = सत्य वचनों वाला, सत्य बोलने वाला । दृढव्रतः = दृढ
संकल्प वाला, दृढतापूर्वक नियम पालन करने वाला ।
हिन्दी भावार्थ - वितर्क है कि इस समय (वर्तमान काल में) इस लोक (मर्त्य लोक)
में कौन महापुरुष प्रशस्त गुणों से सम्पन्न, महनीय शक्तिशाली, धर्म (के गूढ तत्त्वों) का ज्ञाता, कृतज्ञता स्वीकार करने वाला, सत्य (अमोघ) वचनों वाला तथा दृढ
संकल्पों (या नियमों) से युक्त है ?
टिप्पणी –आदि कवि वाल्मीकि
ने 'गुणवान्' इस सामान्य विशेषण की
व्याख्या में ही वीर्य्यवान्, धर्मज्ञ आदि पदों को प्रयुक्त
किया हैं अर्थात् गुणी वही है; जिसमें वीर्य्यं, धर्म, कृतज्ञता, सत्य वचन तथा
दृढ नियम (संकल्प) का मञ्जुल सामञ्जस्य हो ।
हिन्दी
शब्दार्थ - कः = कौन । चारित्रेण = चरित्र से,
सदाचार से । युक्तः = सम्पन्न (है)। कः च = और कौन । सर्वभूतेषु =
समस्त प्राणियों (के बारे) में। हितः = हितकारक, हितचिन्तक
(है)। विद्वान् = शास्त्रों को जानने वाला । कः = कौन । च = और । समर्थः = किसी भी
कार्य को करने, न करने तथा अन्य रूप में डाल देने में जो
निपुण हो। एक-प्रियदर्शनः = विलक्षण प्रिय स्वरूप वाला ।
हिन्दी भावार्थ - (वाल्मीकि जी नारद जी से पूछते हुए अपने प्रश्न को आगे बढ़ाते हैं कि)
कौन महापुरुष प्रशस्त चरित्र से युक्त है तथा कौन समस्त प्राणियों का हितकारक,
(कर्तव्याकर्तव्य का) विवेक रखने वाला, सर्व-समर्थ
एवं लोकोत्तर प्रिय स्वरूप वाला है ?
व्याकरण-
(क) कारक-
च– अव्ययम्
चारित्रेण– चारित्र, नपुं., तृतीया, एकवचनम्
कः- किम्-सर्वनाम, पुं., प्रथमा, एकवचनम्
युक्तः -युक्त- पुं, प्रथमा, एकवचनम्
सर्वभूतेषु – सर्वभूत- पुं, सप्तमी, बहुवचनम्
हितः –हित - पुं, प्रथमा, एकवचनम्
विद्वान् -विद्वस् - पुं, प्रथमा, एकवचनम्
'सर्वभूतेषु' में 'सप्तम्यधिकरणे च' सेवैषयिक आधार के कारण सप्तमी विभक्ति प्रयुक्त है। अर्थ हुआ- समस्त प्राणियों के विषय में।
(ख)सन्धि
समर्थश्च =
समर्थः + च (श्चुत्व सन्धि) ।
कश्चैकप्रियदर्शनः
= कः + च = कश्च (श्चुत्व) + एकप्रियदर्शन: (अ + ए = ऐ वृद्धि सन्धि ) ।
चारित्रेण -चरित्रम् एव चारित्रम्, तेन
। चरित्र + अण् ('प्रज्ञादिभ्योऽण्' इस
पा० सू० से स्वार्थ में अण्) चारित्र + तृतीया एकवचन
युक्तः -√युजिर् (युज्) + क्त + प्रथमा एकवचन ।
हितः =√ धा +
क्त (दधातेर्हि: इस पा० सू० से 'धा' को हि आदेश हित + प्रथमा, एकवचन । अथवा – 'हि' गतौ + क्त= हित + प्रथमा एकवचन अथवा हितमस्ति अस्येति हितः ।
हिन्दी
शब्दार्थ - कः = कौन । आत्मवान् = आत्मा के
स्वभाव से युक्त (है), पदार्थ के विना इस अस्तित्व में स्वयं के अस्तित्व को स्थापित
रखने वाला । जित-क्रोधः = जिसने क्रोध को जीत अर्थात् अपने वश में कर लिया है।
द्युतिमान् = प्रभायुक्त, कान्तिशाली ।
अनसूयकः = दूसरे के गुण में दोष नहीं निकालने वाला, जलन, ईर्ष्या
नहीं करने वाला। संयुगे = युद्ध में । कस्य = किसके। जातरोषस्य (समक्षम्) = क्रोध
उत्पन्न हो जाने पर । देवाश्च = देवगण भी । बिभ्यति - डर जाते हैं ।
हिन्दी
भावार्थ - कौन आत्मा के स्वभाव से युक्त (है)?कौन क्रोध-विजेता, परम कान्तिशाली तथा दूसरे
के गुण में दोष निकालने से रहित वाला अर्थात् सर्व-सहिष्णु है ? युद्ध में उत्पन्न क्रोध वाले किस (अप्रतिम योद्धा) के समक्ष देवता लोग भी
भयभीत हो जाते हैं ?
व्याकरण-
(क) कारक–
आत्मवान् – आत्मवत्- पुं०, प्रथमा, एकवचनम्
द्युतिमान् - द्युतिमत्- पुं०, प्रथमा, एकवचनम्
कस्य - किम्-सर्वनाम, पु०, षष्ठी, एकवचनम्
जातरोषस्य - जातरोष, पु०, षष्ठी, एकवचनम्
संयुगे - संयुग, पु०, षष्ठी, एकवचनम्
'कस्य जातरोषस्य देवाश्च बिभ्यति' इस वाक्य में भयार्थक 'भी' धातु के प्रयोग (बिभ्यति) को देखते हुए 'कस्य जातरोषस्य' इन दोनों पदों में षष्ठी विभक्ति अनुपपन्न प्रतीत होती है, क्योंकि यहाँ तो 'भीत्रार्थानां भयहेतुः' इस सूत्र से पञ्चमी होने पर 'कस्माद् जातरोषाद् (वै)' ऐसा होना चाहिए था। षष्ठी-प्रयोग के समर्थन में हम कह सकते हैं कि १. आर्षत्वात् पंचमी न होकर षष्ठी ही हुई है ।
२. 'कस्य जातरोषस्य' के आगे 'समक्षम्' पद का अध्याहार कर लेने पर षष्ठी प्रयोग भी उपपन्न हो जाता है। आर्ष ग्रन्थों में ऐसे प्रयोग बहुशः प्राप्य हैं ।
(ख) अलङ्कार – 'क' 'न' आदि वर्णों की आवृत्ति से अनुप्रासालंकार है। एक
ही महापुरुष में अन्वेष्टव्य गुणों की विवेचना के कारण "भाविक' अलङ्कार भी है।
(ग) रस - पद्य के पूर्वार्ध-भाग में 'शान्तरस' है ।
उत्तरार्ध-भाग में संयुगे, रोषस्य, बिभ्यति
पदों के द्वारा परिपोषित 'रौद्र' रस
अङ्गी है तथा अङ्ग रूप में 'भयानक रस' भी
उन्मीलित है ।
साहित्यदर्पणकार आचार्य विश्वनाथ ने धृष्टता के कारण गुणी
जनों के गुणों में बलात् दोष निकालने को 'असूया' कहा है: - 'असूयाऽन्यगुणर्द्धनामौद्धत्यादसहिष्णुता ।' (साहित्य-दर्पण
३।१६६) ।
टिप्पणी- इस श्लोक में 'जितक्रोधः' तथा 'जातरोषस्य' इन दो परस्पर विरुद्ध स्वभाव का एक
व्यक्ति में अन्वेषण किया जा रहा है। इसका आशय यह है कि महापुरुष लोग सामान्य
जीवन-क्षणों में क्रोध-हीन, सहिष्णु, प्रसन्नचित्त
तथा शान्त-मानस रहते हैं, किन्तु विषम परिस्थिति होने पर जब
शान्ति के आलम्बन से कार्य सिद्धि असम्भव हो जाती है तो वे हो शान्त महापुरुष,
समुद्र की ज्वार भाटा की भाँति, समयोचित क्रोध
धारण कर लेते हैं, जिनके क्रोध को देख कर देव-गण भी भयभीत हो
जाते हैं ! ।
हिन्दी
शब्दार्थ -हे महर्षे = हे महामुने ! अहं = मैं
बाल्मीकि । एतत् = पूर्वोक्त प्रश्नों का उत्तर । श्रोतुम् = सुनने को। इच्छामि
=इच्छा करता हूँ। हि- यतः, क्योंकि (अव्यय) । मे
= मम, मेरे (मन में) । परं = अत्यधिक । कौतूहलं = जिज्ञासा है
। त्वम् = तुम। एवंविधं = इस प्रकार के । नरं = मनुष्य को। ज्ञातुं = जानने के लिए।
समर्थः= सामर्थ्यशाली । असि = हो ।
हिन्दी
भावार्थ - हे महान् ऋषि नारद ! मैं वाल्मीकि
उक्त गुणों से युक्त महापुरुष के बारे में आप से सुनना चाहता हूँ,
क्योंकि मेरे (मन में) अत्यधिक जिज्ञासा है। आप इस प्रकार के
(उक्त-विशेषताओं से युक्त) मानव को जानने में समर्थ हैं।
हिन्दी
शब्दार्थ -त्रिलोकज्ञः = तीनों लोकों का
ज्ञाता। नारदः = ब्रह्मा के मानस-पुत्र महाज्ञानी देवर्षि नारद ने । वाल्मीके: = बाल्मीकि
के। एतत् = इस, पूर्वोक्त । वचः = वचन को ।
श्रुत्वा = सुन कर। 'श्रूयताम्' = 'सुनिए'
। इति = इस प्रकार । च = और । आमन्त्र्य = सत्कार पूर्वक सुनने को बुलाकर । प्रहृष्टः च (सन्) = और प्रसन्न होते हुए। वाक्यम् = वाक्य को । अब्रवीत् =
कहा ।
हिन्दी
भावार्थ -तीनों लोकों के ज्ञाता देवर्षि नारद ने महर्षि वाल्मीकि के इस पूर्वोक्त
वचन को सुनकर तथा पूछे गये महापुरुष के बारे में 'सुनिये' इस प्रकार ससम्मान सम्बोधित करके और प्रसन्न
होते हुए इस वाक्य को कहा।
हिन्दी शब्दार्थ-हे मुने = हे महर्षे! त्वया = आपके द्वारा। ये
= पूर्व में कह गये । बहवः = असंख्यक, अगणित। गुणाः = शौर्य,
उदारता, गम्भीरता आदि गुण। कीर्तिताः= कहा। (ते- वे) दुर्लभाः = दुर्लभ
है। च = और। एव (ही हैं) । अर्थात् एक ही
प्राणी में ये समस्त गुण प्राप्त होना असंभव हैं। अहम् = मैं देवर्षि नारद ।
(तान्- उन गुणों को) । बुद्ध्वा = जानकर। वक्ष्यामि= (त्वाम्- आपको)
कहूँगा । तैः= पूर्वोक्त गुणों से। युक्तः=
समन्वित, संयुक्त। नरः = पुरुष। (त्वया – आपके द्वारा) श्रूयताम् = सुना जाय।
हिन्दी भावार्थ -नारद जी ने कहा कि हे मुनिवर वाल्मीकि जी ! आपने जिन
बहुसंख्य गुणों का वर्णन किया है, वे (एक ही महापुरुष
में) प्राय: दुर्लभ ही हैं; तथापि मैं उन गुणों को जानकर बताऊँगा । (अब आप) उन
दुर्लभ गुणों से युक्त महामानव के बारे में (मुझसे) सुनें ।
हिन्दी शब्दार्थ–जनैः = लोगों
के द्वारा । श्रुतः = सुने गये (प्रख्यात) । इक्ष्वाकुवंशप्रभवः = इक्ष्वाकु कुल
में उत्पन्न । रामः = दशरथ पुत्र राम । नाम = नाम वाले। 'प्राकाश्य' (प्रसिद्धि) अर्थ में अव्यय-पद । नियतात्मा = नियन्त्रित, संयत आत्मा वाले । महावीर्यः = महान् शक्तिशाली । द्युतिमान् = कान्ति
सम्पन्न । धृतिमान् = धैर्यशाली । वशी = जितेन्द्रिय (च अस्ति) =और हैं।
हिन्दी भावार्थ - लोगों के द्वारा सुने गये
(सुविदित) इक्ष्वाकु नामक वंश में उत्पन्न राम वाले व्यक्ति, नियन्त्रित आत्मा
वाले,
महान् शक्तिशाली, कान्ति सम्पन्न, धैर्यशाली तथा जितेन्द्रिय हैं ।
हिन्दी शब्दार्थ– बुद्धिमान् = प्रतिभाशाली । नीतिमान् = नीतिज्ञ । (नीति = सदाचार-मार्ग या राजनीति) । वाग्मी = प्रशस्त वक्ता । श्रीमान् = ऐश्वर्यशाली । शत्रुनिवर्हणः = शत्रु विनाशक । विपुलांसः = विशाल या स्थूल कन्धों वाले । महाबाहुः = लम्बी भुजाओं वाले । कम्बुग्रीवः = शंख के समान गर्दन वाले । महाहनुः = विशाल ठुड्डी वाले । (अस्ति = है)
हिन्दी भावार्थ –(नारद जी वाल्मीकि से कहते हैं कि भगवान् राम) प्रतिभाशाली, नीति को जानने वाला, प्रशस्त वक्ता, ऐश्वर्य से युक्त, शत्रुओं के विनाशक, विशाल कन्धों वाले, लम्बी भुजाओं वाले, शंख के समान (तीन रेखाओं वाली) गर्दन से युक्त तथा विशाल ठुड्डी वाले हैं।
टिप्पणी – यहाँ बुद्धि और नीति पदों से मानसिक सौन्दर्य, 'वाग्मी' पद से वाचिक सौन्दर्य एवं श्रीमान्से 'महाहनुः' तक प्रयुक्त पदों से
शारीरिक सौष्ठव युक्त सामर्थ्य की अभिव्यञ्जना राम को स्पृहणीय व्यक्तित्व प्रदान
करती है। व्याख्येय महनीय पद्य में नारद ने राम के मनमोहक अङ्ग-सौन्दर्य की
झाँकी उपन्यस्त की है।
यहाँ निबर्हण शब्द बर्हँ (हिंसायाम् - चुरादिः) से बना है। यह धातु अनेक गण में अनेक अर्थ में पठित है।
हिन्दी शब्दार्थ – महोरस्कः
= चौड़े वक्षस्थल वाले । महेष्वासः = विशाल धनुष वाले।गूढजत्रुः :- गुप्त स्कन्ध-सन्धियों वाले
(जिनके कन्धे के दोनों जोड़ छिपे अर्थात् मांस-पिण्ड से ढंके हैं)। अरिन्दमः =
शत्रु नियन्ता, शत्रु विदारक । आजानुबाहुः = पैरों के
घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले । सुशिराः = विशाल मस्तक वाले । सुललाटः = सुन्दर
ललाट वाले । सुविक्रमः = महान् पराक्रमी ।
हिन्दी भावार्थ- (नारद जी कह
रहे हैं कि) भगवान् राम चौड़े वक्षःस्थल वाले, विशाल
धनुष् वाले, गुप्त अर्थात् मांस से ढ़के
स्कन्ध-सन्धियों वाले, शत्रु - गणों के विदारक, पैरों के घुटनों तक लम्बी भुजाओं वाले, विशाल
मस्तक वाले, सुन्दर ललाट वाले तथा महान् पराक्रमी हैं।
व्याकरण
(क) सन्धि-
महोरस्कः = महा + उरस्क: ( गुण सन्धि )।
महोरस्कः महेष्वासः = महोरस्को महेष्वासः । सकार को उकारः -
अतो रोरप्लुतादप्लुते (विसर्ग सन्धिः)।आद् गुणः से उकार को गुण ओकार (स्वर सन्धिः)
हिन्दी शब्दार्थ –समः = समान भाव वाले, निष्पक्ष । समविभक्ताङ्ग: = समान रूप से विभक्त अंगों वाले। स्निग्धवर्णः
= चिकने शारीरिक वर्ण वाले । प्रतापवान् = प्रतापी । पीनवक्षा: = स्थूल वक्षः स्थल
वाले । विशालाक्षः = विशाल आँखों वाले । लक्ष्मीवान् = ऐश्वर्य या शोभा से युक्त ।
शुभलक्षणः = सुन्दर लक्षणों वाले (राम हैं)।
हिन्दी भावार्थ –( नारद जी वाल्मीकि से कहते हैं
कि श्रीराम जी) समान भाव रखने वाले (समदर्शी), समान रूप
से अंगों वाले, चिकने (सुकोमल) शारीरिक वर्ण वाले, प्रतापशाली, स्थूल वक्षः-स्थल वाले, विशाल आँखों वाले, असीम शोभा या ऐश्वर्य से
सम्पन्न तथा शुभ-सूचक शारीरिक लक्षणों से युक्त हैं।
विभक्त- त्रिलिंग = वि + भज—क्त । १ पृथक्कृते २
विभिन्ने कृत-विभागे च ३ भावे क्त । ३ विभागे ४ भेदे न० । इति वाचस्पत्यम्।
टिप्पणी -श्लोक सं. ६ वें तथा १० वें में राम के अङ्गों की वीर-जनोचित दृढता, परिपुष्टता वर्णित है । ११ वें (प्रस्तुत) पद्य में राम की मानसिक कोमलता
तथा शारीरिक सुकुमारता कही गयी है ।
हिन्दी शब्दार्थ -धर्मज्ञः =
धर्म को जानने वाले। सत्यसन्धः = सत्यप्रतिज्ञा वाले । प्रजानां = प्रजा के । हिते
= कल्याण में, भलाई करने में । रतः = तत्पर, अनुरक्त । यशस्वी = यश वाले। ज्ञानसम्पन्नः = ज्ञानी । शुचिः = पवित्र
हृदय वाले । वश्यः= वश में रहने योग्य । समाधिमान् = मानसिक एकाग्रता से युक्त (श्री राम हैं)।
हिन्दी भावार्थ –(भगवान् राम) धर्म के यथार्थ
ज्ञाता, सत्य-प्रतिज्ञ, प्रजा
के कल्याण में तत्पर, कीर्तिशाली, ज्ञानी, पवित्र हृदय वाले, वश में करने योग्य तथा मन की एकाग्रता से युक्त हैं।
व्याकरण
सन्धि-
सत्यसन्धश्च = सत्यसन्धः + च (विसर्ग०, श्चुत्व ० ) ।
हिन्दी शब्दार्थ -प्रजापति-सम:
= प्रजापति (ब्रह्मा या राजा) के समान । श्रीमान्=ऐश्वर्य
सम्पन्न या शोभा-युक्त ।धाता = पालक या पोषक ।रिपु-निषूदन:= शत्रु-विध्वंसक। जीव-लोकस्य= प्राणि-समूह के । रक्षिता = रक्षक। धर्मस्य= धर्म-तत्व के। परिरक्षिता = चतुर्दिक् संरक्षक (श्री राम हैं)
हिन्दी भावार्थ -(भगवान् राम) प्रजापति (ब्रह्मा
या राजा) के समान (प्रजाओं के) पालक, ऐश्वर्य या शोभा
से युक्त, शत्रु, जनों के
विध्वंसक, प्राणि वर्ग के रक्षक तथा धर्म तत्त्व के
संरक्षक है।
व्याकरण
(क ) कारक-'प्रजापतिसमः' में समास के पूर्व तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् सूत्र से समानार्थक शब्दों के योग में तृतीया या षष्ठी विभक्ति होगी। 'जीव-लोक' तथा 'धर्मस्य' में 'कर्तृ कर्मणोः कृति' सूत्र से कर्म में षष्ठी हुई।
टिप्पणी-किसी भी समर्थ
महापुरुष में प्रजारक्षण तथा शत्रु विध्वंसन- इन दोनों गुणों का सामञ्जस्य
अपेक्षित है अर्थात् उचित अवसर या पात्र में दया तथा क्रोध का प्रयोग युक्तियुक्त
है।
भावार्थ:- सः रामः राजशासनपद्धतिरूपधर्मस्य पालकः स्वकीयकुटुम्बजनस्य
च पालकः ऋग्यजुःसामाथर्वाणां चतुर्णां वेदानां शिक्षाकल्पव्याकरण
निरुक्तच्छन्दज्यौतिषाणां वेदाङ्गानाञ्च रहस्यवेत्ता धनुर्वेदे च निष्णातोऽस्ति ।
हिन्दी शब्दार्थ - स्वस्य= अपने । धर्मस्य= यज्ञ, अध्ययन, दण्डयुद्ध आदि क्षत्रियोचित धर्म का।रक्षिता -
रक्षक। स्वजनस्य च = और अपने बन्धु बान्धवों का। रक्षिता= रक्षक।वेद-वेदाङ्ग - तत्त्वज्ञः = ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद इन चारों वेदों एवं शिक्षा, कल्प, ज्योतिष, निरुक्त, छन्द तथाव्याकरण- इन छ: वेदाङ्गों के रहस्य को
जानने वाला। धनुर्वेदे =
धनुर्विद्या (यहाँ धनुष् शब्द समस्त शस्त्रों तथा अस्त्रों का उपलक्षण है । अर्थ
हुआ = शस्त्रास्त्र विद्या ) । निष्ठितः = अभ्यस्त, कुशल । च = और (राम हैं)।
हिन्दी भावार्थ – (भगवान् राम) अपने (जातीय तथा
मानवीय) धर्म के रक्षक तथा स्वजनों के परिपालक हैं। वे चारों वेदों एवं छहों
वेदाङ्गों के रहस्य को जानने वाले और धनुर्विद्या में कुशल हैं।
व्याकरण
सन्धि-
वेदाङ्ग = वेद + अङ्ग ( दीर्घ सन्धि )।
कारक-
'स्वस्य धर्मस्य एवं 'स्वजनस्य' में 'कर्तृकर्मणोः कृतिः' से कर्म में पष्ठी है। 'धनुर्वेदे' में वैषयिक आधार के कारण सप्तमी है।
हिन्दी शब्दार्थ -सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः= समस्त शास्त्रों के अर्थ जानने वाले। स्मृतिमान् = स्मृति
(मनुस्मृति आदि स्मृति-ग्रन्थों) के ज्ञाता या स्मरण शक्ति से युक्त ।
प्रतिभानवान् = प्रतिभाशाली । सर्वलोकप्रियः = सभी लोगों के प्रिय। साधुः = सद्-विचार सम्पन्न । अदीनात्मा = अदीन (अखिन्न, अव्यथित प्रसन्न, उदार) अन्तःकरण वाला विचक्षणः = यथोचित लौकिक अलौकिक सभी क्रियाओं में कुशल, चतुर । (राम हैं)
हिन्दी भावार्थ – (वे भगवान् राम ) समस्त
शास्त्रों के अर्थ के मर्मज्ञ, मनुस्मृति आदि स्मृतियों
के ज्ञाता या स्मरण शक्ति से युक्त, प्रतिभा-शाली, समस्त लोकों या सभी लोगों को प्रिय लगने वाले सद्-विचार सम्पन्न प्रमुदित
या उदार अन्तःकरण वाले एवं व्यवहार-पटु है।
टिप्पणी-भगवान् राम में शास्त्रीय वैदुष्य
तथा लोक व्यवहार चातुरी इन दोनों तत्त्वों का समन्वय वर्णित है; क्योंकि शास्त्र -कुशल व्यक्ति
भी लोक-व्यवहार में निपुण न होने पर उपहास पात्र हो जाता है
'अपि शास्त्रेषु कुशला लोकाचार-विवर्जिताः । सर्वे ते हास्यतां यान्ति यथा ते
मूर्ख पण्डिताः ।'
(पञ्चतन्त्र ) ।
अर्थ - विभिन्न
शास्त्रों में कुशल व्यक्तिभी यदिसामाजिक व्यवहार से रहित होंतो ऐसे व्यक्ति हंसी के पात्र होते है,जैसे वे मूर्ख पण्डित उपहास के पात्र हुए।
हिन्दी शब्दार्थ -सिन्धुभिः =
नदियों से । अभिगतः = संगत, सम्मिलित । समुद्रः इव = सागर के जैसे । सर्वदा= हमेशा।सद्भिः =
सज्जनों या विद्वानों से । अभिगतः=सेवित (हैं)। (सः- वह)आर्यः = श्रेष्ठ, महानुभाव ।
सर्व-समः = सभी के साथ समान व्यवहार करने वाला । सदैव= हमेशा।प्रिय-दर्शन: = मधुर आकृति वाले, आकर्षक ।( हैं)
हिन्दी भावार्थ - (भगवान् राम) सज्जनों या
विद्वानों से सर्वदा संगत रहते हैं, जैसे समुद्र नदियों
से संगत रहता है। वे श्रेष्ठ आचरण वाले, सभी के साथ
समान व्यवहार करने वाले एवं सदैव प्रिय (आकर्षक) दर्शन वाले हैं।
आर्यः = '√ऋ' गतौ + ण्यत् । शाब्दिक अर्थ है-गमनीय, अनुगमनीय या अनुकरणीय ।
(क) अलंकार-अनुप्रास तथा उपमा अलंकार हैं।
(ख) रस-ध्वनि-
सज्जनों के प्रति प्रीति-विशेष के कारण यहाँ 'भाव' ध्वनि है। रतिर्देवादि-विषया, व्यभिचारी
तथाऽञ्जितः । 'भाव:' प्रोक्तः
।' (काव्य-प्रकाश, च० उ०) ।
(ग) कोष-
सद्भिः (सन् ) = 'सत्ये साधौ विद्यमाने
प्रशस्तेऽभ्यर्हिते च सन् इत्यमरः ३/३/८३ ।
टिप्पणी-जैसे समुद्र में विशाल नदियाँ प्रत्यक्ष रूप में
मिलती हैं तथा सामान्य नदियाँ बड़ी नदियों के सहारे (अप्रत्यक्षतः) मिलती हैं, वैसे ही भगवान् राम से महापुरुष
एवं सामान्य पुरुष क्रमशः प्रत्यक्षतः तथा अप्रत्यक्षतः मिलते रहते हैं ।
हिन्दी शब्दार्थ -सर्व-गुणोपेतः
- समस्त गुणों से युक्त। सः = वह राम ।कौसल्यानन्द-वर्धनः
= अपनीमाता कौसल्या के आनन्द को बढ़ाने वाले । गाम्भीर्ये = गम्भीरता में । समुद्रः इव= सागर के समान । धैर्येण=धीरता में ।हिमवान् = हिमालय पर्वत । इव=के जैसे। च= और (हैं)।
हिन्दी भावार्थ -समस्त गुणों से सम्पन्न वे
(भगवान् राम) कौसल्या (नामक अपनी माता) के आनन्द को बढ़ाने वाले, गम्भीरता में समुद्र की भाँति ( अगाध ) तथा धैर्य के कारण हिमालय पर्वत की
भाँति (उन्नत) हैं।
व्याकरण
सन्धि-
उपेतः = उप + इतः = उपेतः (गुण संधि)
सर्वगुणोपेतः= सर्वगुण + उपेतः = सर्वगुणोपेतः ( गुण सन्धि )
टिप्पणी-जैसे गम्भीरता (गहराई, अतल-स्पृश्यता) के कारण समुद्र के
निम्नतम तल का स्पर्श, ज्ञान असम्भव है-वैसे ही
गम्भीर प्रकृति के कारण राम के हृदय-गत गूढ आशय का ज्ञान, अनुमान सर्वजन-ज्ञातव्य नहीं है। जैसे धैर्य्य (सहिष्णुता) के कारण हिमालय
शीत, वर्षा, प्रचण्ड आतप, हिम-पात आदि प्राकृतिक विपदाओं को अविचलित होकर सहता रहता है-तथैव भगवान्
राम भी मुख, दुःख, मान-अपमान
आदि द्वन्द्वात्मक वृत्तियों को एक (तटस्थ) भाव से सहते, निश्चल बने रहते है।
तिलक टीका- स चेति । स रामः सर्वैर्गुणैर्युक्त
उक्तैर्वक्ष्यमाणैश्च । कौसल्यानन्दवर्धनत्वेन महाकुलप्रसूतत्वप्रधान- महिषीपुत्रत्वादि- रूपस्याभिषेकोचितधर्मस्य
सत्ता दर्शिता । गाम्भीर्यमगाधाशयत्वं तत्र समुद्रतुल्यः । धैर्यं
मनसाप्यधृष्यत्वम्, इष्टवियोगादावनभिभूतचित्तत्वं, च रणे ऽचलतया सहायाभावे ऽपि स्थितिश्च, तेन हिमवत्सदृशः ।। 1.1.17 ।।
हिन्दी शब्दार्थ -( स रामः )वीर्य्ये =
पराक्रम में । विष्णुना=नारायण के । सदृशः= समान (हैं) ।सोमवत्= चन्द्रमा की भाँति । प्रियदर्शनः= आकर्षक स्वरूप वाले । क्रोधे= क्रोध में।कालाग्नि-सदृश: = प्रलय-कांलिक अग्नि के समान । क्षमया = सहनशीलता के द्वारा, सहिष्णुता । त्यागे = दान में ।धनदेन = कुबेर के । समः = समान । सत्ये=सत्यवचन में । अपर: = दूसरे ।धर्म इव
= धर्मराज के समान । (राम हैं)
हिन्दी भावार्थ -( वे भगवान् राम ) पराक्रम में विष्णु के समान, चन्द्रमा के समान
आकर्षक (रोचक) स्वरूप वाले, क्रोध में प्रलय-कालिक
अग्नि के समान (भयंकर), सहनशीलता में पृथ्वी के समान
(अविचलित), दान (–शीलता) में धनेश
कुबेर के समान (उदार) तथा सत्य (के पालन) में द्वितीय धर्मराज के समान (कठोर) हैं।
व्याकरण
(क) कारक – 'विष्णुना
सदृश:' धनदेन समः' इन दोनों स्थलों में
समानार्थक शब्दों के योग में (विष्णुना तथा धनदेन में) तृतीया हुई है। 'कालाग्निसदृशः तथा 'पृथिवीसम:' – इन समस्त पदों में भी समास के पूर्व कालाग्नि एवं पृथिवी में तृतीया ऊहनीय
है। 'तुल्यार्थेरतुलोपमाभ्यां तृतीयान्यतरस्याम्- ' इस सूत्र-नियम के
अनुसार ही उक्त सारे स्थलों में तृतीया हुई है ।
सत्ये = सते हितं, सताम् इदं वा
सत्यं, तस्मिन् । 'सत्'
(समीचीन, साधु, विद्वान् या विद्यमान) शब्द से 'तस्मै हितम्' अथवा 'तस्येदम्' सूत्र
से यत् प्रत्यय ज्ञातव्य है ।
सन्दर्भ-अग्रिम चारों
पङ्क्तियों में 'राजा दशरथ के द्वारा राम जैसे सर्व गुण
सम्पन्न ज्येष्ठ राजकुमार को युवराज बनाने की इच्छा करना' वर्णित है। इस प्रकार यहीं से संक्षिप्त राम-जीवन-कथा का श्रीगणेश हो रहा
है। यही संक्षिप्त राम-कथा 'मूल रामायण' भी कही जाती है :
हिन्दी शब्दार्थ -महीपतिः =
भूपति, राजा । दशरथः = अयोध्या-नरेशदशरथ । एवम् = इस प्रकार, पूर्व में कहे गये। गुणसम्पन्नम्= गुण से युक्त।सत्यपराक्रमम् = यथार्थ या अमोध शक्ति वाले । श्रेष्ठ-गुणैः = अति प्रशंसनीय सद्गुणों से । युक्तम्= समन्वित, युक्त, सम्पन्न। प्रियम्= प्रिय।ज्येष्ठम्= चारों पुत्रों में सबसे बड़े ।सुतम्= पुत्र को।प्रकृतीनां = मन्त्री, पुरोहित
आदि अट्ठारहप्रकृतियों के।हितैः = कल्याणकारक कार्यों से । तम्= उस। रामम्= राम को।प्रकृति-प्रिय-काम्यया = प्रजाओं के
अनुकूल कार्य करने की कामना से । प्रीत्या = प्रीति-पूर्वक, प्रेम-वश । यौवराज्येन = युवराज पद से। संयोक्तुम् =संयुक्त करना । ऐच्छत् = चाहा।
हिन्दी भावार्थ-अयोध्या नरेश महाराज दशरथ ने इस
प्रकार के (उपरि वर्णित) गुणों से सम्पन्न, अमोध शक्ति
से युक्त, अत्यन्त प्रशंसनीय गुणों से युक्त, प्रजाओं के प्रिय कार्यों को सम्पन्न करने में तत्पर, एवं परम प्रिय (अपने) ज्येष्ठ पुत्र राम को प्रजाओं की हित-कामना से, प्रेम-पूर्वक 'युवराज' –पद
से संयुक्त करना चाहा ।
व्याकरण
(क) समास -
एवं गुण सम्पन्नं = एवं गुणे: सम्पन्नः तम् (तृतीया तत्पुरूष ) ।
ज्येष्ठ – त्रिषु ज्येष्ठोऽतिशस्तेऽपि
इत्यमरः ३।३।४१ ।
टिप्पणी-राम के लिए प्रदत्त विशेषण-पद वस्तुतः किसी भी
भविष्णु आदर्श युवराज के लिए उपादेय एवम् अनुरूप ही हैं। युवराजोचित गुण-गणों से
मण्डित 'राम' को देख कर ही दशरथ ने उपयुक्त समय में उन्हें युवराज बनाना चाहा ।
हिन्दी शब्दार्थ -अथ= इसके
पश्चात् । अथ अथो ये दोनों समानार्थक अव्ययपद हैं। पूर्वं दत्तवरा= जिसे पहले ही
राजा दशरथ के द्वारा वर दिया जा चुका है। तस्य = दशरथ की । भार्या= पत्नी देवी =
रानी। अभिषेक-सम्भारान् = राज्याभिषेक की सामग्रियों को । दृष्ट्वा = देखकर । एनम् =
इससे अर्थात् राजा दशरथ से । वरम् = वरदान को । अयाचत= मांगा। रामस्य= युवराज बनने को तत्पर श्री राम का ।विवासनम्= निर्वासन, घर से बाहर निकालना। च = और । भरतस्य = भरत का । अभिषेचनम् = राज्याभिषेक ।
हिन्दी भावार्थ -(राम को युवराज बनाने की
इच्छा करने के बाद दशरथ ने राम के राज्याभिषेक की सामग्रियों को संकलित कराया)
इसके बाद राजा दशरथ के द्वारा पहले ही दिये गये दो वरों वाली, दशरथ की पत्नी रानी कैकयी ने (राम के) राज्याभिषेक की सामग्रियों को देखकर
(सन्तप्त हो) राजा से वर मांगा । राम का निर्वासन (घर से बाहर निकालना) अर्थात्
वन-वास तथा भरत का राज्याभिषेक ।
'एनम् अयाचत' में 'दुह, याच्– पच्.' इस वार्त्तिक- नियम से 'एनम्' में द्वितीया विभक्ति दृष्टिगत है। इदम् या एतत् शब्द की द्वितीया
विभक्ति के एकवचन में अन्वादेश (पूर्व-वर्णित व्यक्ति या वस्तु का पुनः दूसरी, तीसरी बार प्रयोग ) के कारण 'द्वितीया-टौस्वेनः:' सूत्र से इदम् या एतद् के स्थान पर 'एन' आदेश होकर 'एनम्' बना
है। इदम् + द्वितीया एकवचन= एनम् अथवा एतद् + द्वितीया एकवचन = एनम् ।
दूसरों की प्रगति पदोन्नति भाग्योदय आदि उत्कर्ष-सूचक परिस्थितियों में
मात्सर्यग्रस्त (परसन्तापी) पुरुष या नारी बाधा पहुँचाने का प्रयास करते ही है।
अतएव कैकयी को राम का राज्याभिषेक अच्छा नहीं लगा।
कैकयी के
द्वारा राजा दशरथ से दो वर मांगने की कथा प्रसिद्ध है। एक बार देवासुर-संग्राम के समय इन्द्र ने अपनी सहायता हेतु दशरथ को सादर बुलाया था। देवराज इन्द्र के पक्ष से
संग्राम करते हुए महाराज दशरथ शत्रुओं असुरों के वाणों से आहत हो गये। उस रण-स्थली
में पूरी रात जागती हुई तथा अनेक प्रयत्नों से राजा के कष्ट को दूर करती कैकयी ने
राजा के प्राणों की रक्षा की, जिससे अति सन्तुष्ट होकर
राजा ने केकयी से दो वर माँगने को कहा। कैकयी ने राजा के द्वारा प्रदत्त दोनों
वरों को राजा के पास ही धरोहर के रूप में रख दिया। अब राम के राज्याभिषेक के समय
ईर्ष्यालु कैकयी ने राजा से उन्हीं पूर्व में धरोहर के रूप में रखे दोनों वरों की
याचना की। इस घटना का उल्लेख अयोध्या काण्ड में प्राप्त होता है।
हिन्दी शब्दार्थ -धर्मपाशेन = धर्म बन्धन से।संयतः = बंधा हुआ, आबद्ध।स राजा=
वह राजा । दशरथः= दशरथ नामक । सत्यवचनात्= सत्य वचनों
के कारण। प्रियं सुतं रामं = प्रिय पुत्र
राम को ।विवासयामास = घर से बाहर निकाल दिया अर्थात् वनवास दे दिया।
हिन्दी भावार्थ -धर्म के बन्धन में आबद्ध होकर उन
राजा दशरथ ने सत्य वचन के कारण अपने प्रिय पुत्र राम को निर्वासित कर ही दिया
अर्थात् वन-वास दे ही दिया ।
व्याकरण
सन्धि-
सत्यवचनात् + राजा = सत्यवचनाद्राजा (जश्त्व
सन्धि)
कारक-
'सत्यवचनात्' में हेतु (कारण) अर्थ में पञ्चमी है। 'निमित्त-पर्याय
प्रयोगे सर्वासां प्राय-दर्शनम्' (वार्त्तिक) ।
टिप्पणी-प्रस्तुत श्लोक हमेंसत्य रूपी परम धर्म के पालन का सन्देश
देता है। सत्य की रक्षा के लिए महापुरुष अपनी प्रियतम वस्तु का भी परित्याग कर
देते हैं- 'न हि सत्यात् परो धर्मः' । अत एव सत्य वचनों की रक्षा में राजा दशरथ ने प्रियतम पुत्र 'राम' को वन में जाने का आदेश दिया, फलतः आगे चल कर अपने प्राणों को भी वे छोड़ देते हैं।
हिन्दी शब्दार्थ -कैकेय्याः = कैकयी का । प्रियकारणात् = प्रिय
(मनोरथ पूर्ण) करने में कारण। पितुर्वचन-निर्देशात् = पिता के वन-निर्देश
(आदेश) के कारण । प्रतिज्ञामनुपालयन् = ( उनकी) प्रतिज्ञा का पालन करते
हुए।स = वह ।वीर:= आदेश पालन में वीर
राम।वनं = जंगल
को ।जगाम = चले
गये।
हिन्दी भावार्थ -कैकेयी का प्रिय (मनोरथ पूर्ण)
करने में कारण पिता के वचन-निर्देश (आदेश) के अनुसार (उनकी) प्रतिज्ञा का पालन
करते हुए वे वीर वर (रामचन्द्र) वन की ओर चल पड़े।
टिप्पणी-भारतीय
संस्कृति के अमर उद्घोषों "मातृदेवो भव, पितृदेवो
भव' के अनुसार माँ कैकेयी को प्रसन्न करने के लिए तथा
पिता दशरथ की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए राम का वन-गमन मातृ-पितृ-भक्ति का अनूठा
उदाहरण है।
हिन्दी शब्दार्थ -सुमित्रानन्दवर्धनः = सुमित्रा नामक अपनी माता
के आनन्द को बढ़ाने वाले। विनय सम्पन्नः = विनीत । भ्रातुः =भाई
श्रीरामचन्द्र के । दयितः = स्नेह-पात्र ।प्रियः - अभीप्सित, अभीष्ट । भ्राता= भाई।
लक्ष्मणः=लक्ष्मण। सौभ्रात्रम् =
सुन्दर भ्रातृत्व, सद् बन्धुत्व को । अनुदर्शयन्
= दिखलाते हुए, प्रकाशित करते हुए। व्रजन्तम् =
(वन की ओर) जाते हुए । तम् = उन (श्रीराम) का । स्नेहात् = स्नेह के
कारण । भ्रातरं = भाई के साथ। अनुजगाम
= अनुगमन किया। ह = प्रसिद्धि या निश्चय अर्थ को द्योतित करने वाला अव्यय ।
हिन्दी भावार्थ -(इसके पश्चात्) सुमित्रा नामक
अपनी माता का आनन्द बढ़ाने वाले, विनीत स्वभाव वाले
(बड़े) भाई श्रीराम जी के स्नेह-पात्र तथा अभीष्ट भाई लक्ष्मण ने उत्कृष्ट भ्रातृत्व
को दिखलाते हुए; वन की ओर जाते हुए उन भाई
श्रीरामचन्द्र जी का स्नेह के कारण, अनुगमन किया। ऐसी
प्रसिद्धि है।
अनुप्रास अलङ्कार है। दयितः तथा प्रियः- इन दोनों शब्दों में एकार्थकता का
भ्रम होने के कारण 'पुनरुक्त
होने' का आभास होता है अतः 'पुनरुक्तवदाभास' नामक शब्दालंकार हैं। दयित = (दया-पात्र, स्नेह-भाजन)
तथा प्रिय- (अभीष्ट, अनुकूल) में अर्थ भेद के कारण
पुनरुक्ति दोष का निर्मूलन हो जाता है।
(ख) रस -बड़े भाई के प्रति छोटे भाई लक्ष्मण का अनुरागातिशय होने के कारण 'भाव' ध्वनि है।
हिन्दी शब्दार्थ-जनकस्य=राजा जनक के। कुले=वंश में। जाता= उत्पन्न। देवमाया = देवताओं की जगन्मोहिनी शक्ति । इव= के समान। निर्मिता = बनायी गयी । सर्वलक्षण-सम्पन्ना=सामुद्रिक शास्त्रोक्त सभी शुभ लक्षणों से युक्त।नारीणाम् उत्तमा= नारियों में
उत्कृष्ट । वधूः = नवोढा स्त्री । नित्यं= बमेशा। रामस्य = श्रीरामचन्द्र का।हिता= हित करने वाली।प्राणसमा=जीवन के समान । दयिता= प्रियतमा। भार्या=पत्नी। सीता अपि= जानकी भी। यथा= -जैसे। रोहिणी=रोहिणी नाम वाली दक्षकन्या चन्द्रमा की पत्नी ।शशिनम् = चन्द्रमा का । (अनुसरण करती है वैसे ही)पौरै:=पुर-वासी मनुष्यों के द्वारा ।च = और । पित्रा = पिता जी (दशरथ) के द्वारा ।दूरम्= दूर रास्ते तक। अनुगतः=पीछे -पीछे जाया गया।
हिन्दी भावार्थ -(इसके बाद) जनक (मिथिला-नरेश) के
कुल में उत्पन्न, देवमाया (देवताओं की विशिष्ट शक्ति)
के समान (ब्रह्मा के द्वारा निर्मित की गई-सी (अति सुन्दरी), समस्त लक्षणों से सम्पन्न, नारियों में श्रेष्ठ, नवोढा (नव-विवाहिता), सदैव राम का हित चाहने
वाली, राम को अपने प्राणों के समान प्रिय लगने वाली
(उनकी) पत्नी सीता ने भी राम का अनुगमन (उसी प्रकार) किया; जैसे रोहिणी चन्द्रमा का अनुगमन करती है। पुर-वासियों तथा पिता दशरथ ने भी
(सुमन्त्र के माध्यम से) दूर तक राम का अनुगमन किया ।
यहाँ निम्नांकित अलङ्कार हैं : (१) उपमा- 'प्राण-समा' में लुप्ता, समासगा उपमा । 'देवमाया इव' में उपमा । 'यथा रोहिणी शशिनम् अनुगता' में पूर्णोपमा ।
पुनरुक्तवदाभास-'दयिता, भार्या तथा वधूः' इन तीनों पदों में
समानार्थकता के भ्रम से 'पुनरुक्ति' का आभास होता है, अतः पुनरुक्तवदाभास' नामक शब्दालङ्कार है। क्रमशः प्रिया, पत्नी
एवं नवोढा अर्थ कर लेने पर उक्त तीनों पदों में पुनरुक्ति-दोष नहीं आ पाता है।
(ख) रस -प्रियतमा सीता के द्वारा प्रियतम
राम का अनुगमन वर्णन तथा 'रोहिणी-चन्द्र' का उपमा निदर्शन 'शृङ्गार रस' को आमन्त्रित करता है ।
(ग) कोष-
'भार्या' = 'भार्याजायाऽथ' इत्यमरः २/६/६ ।
माया = 'स्यान् माया
शाम्बरी' इत्यमरः २।१०।११ ।
टिप्पणी-शशिनं रोहिणी
यथा का उदाहरण देकर वाल्मीकि शिव पुराण की कथा का स्मरण कराते हैं। इस प्रकार
वाल्मीकि रामायण अपने साथ भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक आख्यानों का भी स्मरण
कराता है। कथा के अनुसार राजा दक्ष की 27 कन्यायें थी । इनके
नाम अश्विनी आदि है। इन कन्याओं का विवाह चंद्रमा के साथ हुआ। रोहिणी चन्द्रमा की
अतिशय प्रिय पत्नी है। यह चन्द्रमा का साथ कभी नहीं छोड़ती।राम और सीता में निरूपित पारस्परिक दृढ अनुराग दाम्पत्य प्रेम की प्रगाढता
का सूचक है। यहाँ सीता का निश्चल पातिव्रत्य प्रशंसनीय है।
हिन्दी शब्दार्थ -धर्मात्मा =
धार्मिक ।गङ्गाकूले = गङ्गा-तट पर । शृङ्गवेरपुरे=शृङ्गवेर पुर नामक स्थान पर ।प्रियम्=प्रिय।निषादाधिपतिम् =
निषादों के राजा (गूह) को । आसाद्य = प्राप्त करके । सूतम् = सारथि (सुमन्त्र) को ।
व्यसर्जयत् = लौटा दिया ।
हिन्दी भावार्थ -(इसके बाद) धार्मिक स्वभाव वाले
राम ने गङ्गा तट पर (स्थित) 'शृङ्गवेर-पुर' नामक स्थान में अपने प्रिय निषाद-राज 'गुह' को प्राप्त करके सारथि (सुमन्त्र) को लौटा दिया।
हिन्दी शब्दार्थ -गुहेन= निषाद राज गुह। लक्ष्मणेन=लक्ष्मण। सीतया च= और
जानकी । सहितः = सहित। रामः = श्री राम। ते = वे चारों लोग। वनेन वनं - एक वन से दूसरे वन को। बहूदकाः
नदीः = बहुत (अगाध) जल वाली नदियों को । तीर्त्वा = पार करके ।
भरद्वाजस्य = प्रयाग वासी मुनिवर भरद्वाज के । शासनात् = आदेश से । चित्रकूटम्=
चित्रकूट नामक पहाड़ पर। अनुप्राप्य= पहुँच कर । रम्यम् = रमणीय, आकर्षक ।आवसथं - आवास-स्थान
(पर्णकुटी) को । कृत्वा =बना कर । तत्र = वहाँ पर्णकुटी में । ते त्रयः= वे सीता राम और लक्ष्मण। वने=
अरण्ये। रममाणाः = आनन्दानुभूति
करते हुए। देव-गन्धर्व-सङ्काशा: = देवताओं तथा गन्धर्वो के समान (तेजस्वी
तथा सुन्दर)। सुखं = सुख-पूर्वक (क्रिया-विशेषण-पद है)। न्यवसन् =
रहने लगे ।
हिन्दी भावार्थ -निषाद-राज गुह, लक्ष्मण तथा सीता के साथ श्रीरामचन्द्र - एक वन से दूसरे वन को जाकर
(मार्ग में) पर्याप्त जल वाली नदियों को पार करके (तथा भरद्वाज-आश्रम में पहुँच
कर) भरद्वाज जी के आदेशसे चित्रकूट (नामक पर्वत पर)
पहुँच कर वहाँ वन में आनन्द प्राप्त करते हुए देवताओं तथा गन्धर्वो के समान
(तेजस्वी और सुन्दर) वे तीनों लोग रमणीय आवास स्थल (पर्णशाला) बना कर सुख-पूर्वक
रहने लगे ।
व्याकरण
(क) कारक
'गुहेन लक्ष्मणेन सीतया च सहितः' में
सह-पर्याय वाची 'सहित' के
योग में गुह, लक्ष्मण तथा सीता शब्द में तृतीया हुई है
('सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र से) ।
मुखम् =यह क्रिया-विशेषण पद है। अतएव 'सामान्ये
नपुंसकम्' के नियमानुसार नपुंसकलिंग एकवचन का प्रयोग है।
आवसथ = 'समौ
संवसथ-ग्रामौ' इत्यमरः २।२।१९। (आवसथ तथा संवसथ दोनों एक ही
धातु 'वस्' से निष्पन्न
हैं।)
टिप्पणी-यहाँ न्यवसन् सुखम् कहकर वाल्मीकि जंगल में भीमंगल हो सकता यदि लक्ष्मण जैसा भाई और सीता जैसी पत्नी के साथ में हो तो।
इस श्लोक में राम के वन-निवास-प्रकार की प्रथम झलक प्राप्त होती है।
श्लोक का अन्वय करते
समय विशेष्य पदों को विशेषण पदों के साथ रखने में अत्यधिक सावधानी की आवश्यकता होती
है। अन्यथा अर्थ परिवर्तन हो जाता है।
भावार्थः- रामे चित्रकूटं गते सति तस्मिन् काले पुत्रशोकाकुलः
राजा दशरथः सुतं रामं हा राम! हा राम! इत्येवं विलापं कुर्वन् सुरलोकं जगाम।
हिन्दी शब्दार्थ -रामे
= श्री राम के। चित्रकूटम्=चित्रकूट नामक पर्वत पर। गते = चले जाने पर। तदा = तब उसके
बाद । पुत्र-शोकातुरः - पुत्र 'राम'
के शोक के कारण व्याकुल (होकर) । राजा दशरथः= राजा दशरथ। सुतं
विलपन् - पुत्र (राम) के बारे में विलाप करते हुए। स्वर्गम्=स्वर्ग को।
जगाम = चले गये ।
हिन्दी भावार्थ -राम के चित्रकूट चले जाने पर
उसके बाद (सुमन्त्र से सारे समाचार जान कर) पुत्र के शोक में व्याकुल राजा दशरथ ने
पुत्र के बारे में विलाप करते हुए (राम, राम कह कर रोते
हुए) स्वर्ग प्रयाण किया ।
व्याकरण
(क) कारक–
'चित्रकूटं गते तथा 'स्वर्ग जगाम' इन दोनों स्थलों में गम् धातु (गत्यर्थक) के योग में 'गत्यर्थकर्मणि द्वितीया०' सूत्र से (चित्रकूटं
तथा स्वर्गं में) द्वितीया विभक्ति हो सकी है।
टिप्पणी-इस श्लोक में पुत्र जन्य वियोग को दिखाया गया है। कोई भी पिता शोकाकुल
होता ही है, पर 'शोक ग्रस्त
हो प्राण त्याग कर देना' पुत्र-शोक की चरम पराकाष्ठा है
जिसका निदर्शन दशरथ की प्रस्तुत स्वर्ग-प्राप्ति-घटना से ही प्राप्त होता है ।
तिलक टीका- तथा पुत्रशोकातुरो ऽनिर्वाच्यपुत्रवियोगजन्यशोकपीडितः ।।
1.1.32 ।।
गते तु तस्मिन् भरतो वसिष्ठप्रमुखैर्द्विजैः ।। ३३।।
नियुज्यमानो राज्याय नैच्छद्राज्यं महाबलः ।
स जगाम वनं वीरो रामपादप्रसादकः ।।३४।।
अन्वयः- तस्मिन् तु गते (सति) वशिष्ठ-प्रमुखैः द्विजैः राज्याय नियुज्यमानः, महाबल: भरतः राज्यं न ऐच्छत्,
(प्रत्युत) राम-पाद-प्रसादकः, वीरः स वनं
जगाम ।
हिन्दी शब्दार्थ-तस्मिन् = दशरथ के। गते (सति) = स्वर्ग चले जाने पर। वशिष्ठ-प्रमुखैः
= वशिष्ठ आदि के द्वारा द्विजैः=ब्राह्मणों के द्वारा। राज्याय = राज्य प्राप्त करने के लिए । नियुज्यमानः= नियुक्त किये जाते हुए । महाबलः = महान् बलशाली। भरतः= कैकेयी
का पुत्र भरत। राज्यम्= राज्य को। नैच्छत् = नहीं चाहा । राम-पाद-प्रसादकः
= राम के चरणों को प्रसन्न करने वाला, राम के चरणों का
सेवक ।वीरः = राज्य
संचालन में समर्थ । सः = वह भरत। वनम् = जंगल को। जगाम= गया
।
हिन्दी भावार्थ -उन (दशरथ) के स्वर्ग चले जाने पर
वशिष्ठ आदि प्रमुख ब्राह्मणों के द्वारा नियुक्त किये जाते हुए (भी) महान् बल-शाली
भरत ने राज्य की इच्छा नहीं की, (बल्कि) श्री रामचन्द्र के
चरणों को प्रसन्न करने वाले (राम चरण-सेवक) वीर भरत ने वन की ओर ही प्रस्थान किया।
हिन्दी शब्दार्थ -आर्य-भाव-पुरस्कृतः =सज्जनता की भावना से ओत-प्रोत । सः= वह भरत । सत्यपराक्रमम्= अमोघ
शक्ति सम्पन्न। महात्मानम् = महान् स्वभाव वाले महानुभाव
। भ्रातरम्=भाई । रामम्= राम के पास । गत्वा = जाकर । अयाचत् = याचना (निवेदन) किया। त्वम्
एव=आप ही। धर्मज्ञः= धर्म को जानने वाले, सत्कर्तव्य या न्याय। राजा=अयोध्या का राजा
हैं। इति=इस प्रकार। वचः =
वचन को । रामम्= श्रीरामचन्द्र को ।अब्रवीत् = कहा ।
हिन्दी भावार्थ -सज्जनोचित भावनाओं से ओत-प्रोत
भरत ने अमोघ पराक्रम एवं उदार चरित वाले भाई राम के पास जाकर याचना (प्रार्थना ) की
और यह वचन कहा कि 'धर्म (सत्कर्तव्य या न्याय) के
मर्मज्ञ आप ही राजा हों।
व्याकरण
(क)कारक- 'भ्रातरम् अयाचत्' में तथा 'रामम् अब्रवीत्' में क्रमशः 'याच्' के
योग में 'भ्रातरम्' में तथा 'ब्रू' के कारण 'रामम्' में द्वितीया विभक्ति हुई है। ('दुह-याच्... के नियम
से) ।
'अयाचत्' = √याच् + लङ् + प्रथमा, पु० एकवचन। यद्यपि 'याच्' धातु आत्मनेपदी है और उससे लङ् लकार प्रथमा, पु० एकवचन में 'अयाचत' रूप बनेगा, न कि
प्रस्तुत स्थल वाला 'अयाचत्' । परस्मैपदी धातु होने पर ही अयाचत् रूप बन सकता है । इसका समाधान 'पद-कार्यमनित्यम्' इस परिभाषा के द्वारा किया जा सकता है। आत्मनेपदी आदि धातुओं में पद-कार्य की अनित्यता (अनियमित स्थिति) के कारण 'याच्' का आत्मनेपदित्व ही अनित्य है । अतएव प्रस्तुत स्थल पर √याच् को परस्मैपदी मान कर 'अयाचत्' रूप भी
बनेगा। अथवा - रामायण आर्ष ग्रन्थ है, आर्षत्वात्
यह प्रयोग मान्य है ।
हिन्दी शब्दार्थ-परमोदार: = महान् दयालु । सुमुखः
= सुन्दर मुख-मण्डल वाले । सुमहायशाः = प्रशस्त एवं व्यापक यश वाले । महाबलः
= महान् पराक्रमी । रामः अपि= राम भी।पितुः= पिता दशरथ की ।आदेशात्= आज्ञा से।राज्यम्= अयोध्या का राज्य ।नच= नहीं।ऐच्छत्= चाहा।
हिन्दी भावार्थ -महान् दयालु, प्रसन्न मुख, परम यशस्वी तथा अतिबलशाली राम भी अपने
पिता दशरथ की आज्ञा का पालन करने के लिए राज्य को नहीं चाहा।
(ख) रस -भरत एवं राम की विशुद्ध
धर्म-परायणता के कारण 'धर्म-वीर' रस की निष्पत्ति है (धनञ्जय-कृत 'दशरूपक' के अनुसार) ।
टिप्पणी-भरत भी प्रसन्न हो जायें, उनके हृदय में
असन्तोष या अपमान भी न हो— साथ ही साथ पिता के आदेश का
उल्लङ्घन भी न हो- इन सारी ध्यातव्य बातों का सन्तोषजनक सर्वमान्य उभय-पक्ष-सम्मत
समाधान कर देना राम की तीक्ष्ण प्रतिभा का परिचायक है।
हिन्दी शब्दार्थ-ततः = उसके बाद, चित्रकूट से।भरताग्रजः = भरत के बड़े भाई (राम) ने।राज्याय = राज्य संचालन के लिए। न्यासम्
= धरोहर रूप,।पादुके - दोनों चरण
पादुकाओं (खड़ाऊँ) को । अस्य = भरत को। दत्वा= देकर । भरतम्= अपने छोटे भाई भरत को ।पुनः पुनः = बार-बार (समझा-बुझाकर ) । निवर्तयामास=लौटा दिया।
हिन्दी भावार्थ -तब
इसके बाद भरत के अग्रज राम ने राज्य के लिए धरोहर रूप में अपनी दोनों चरण पादुकाएँ
उन्हें (भरत को) देकर बार-बार (समझा-बुझाकर) भरत को लौटा दिया ।
व्याकरण
(क)कारक- 'अस्य दत्त्वा' में देने के अर्थ का योग होने पर भी चतुर्थी नहीं हुई है, क्योंकि दान की परिभाषा 'स्व-स्वत्व
परित्याग-पूर्वकं पर स्वत्वोपपादनं दानम्' के अनुसार
यहाँ पादुकाएँ सदा के लिए भरत को नहीं दी जा रही हैं बल्कि केवल धरोहर रूप में, वनवास काल तक के लिए ही । वन-वास से लौटने पर ये पादुकाएँ राम के द्वारा
ले ली जायेंगी । अतएव चतुर्थी (अस्मै) न होकर षष्ठी एकवचन(अस्य) का प्रयोग समीचीन
ही है । जैसे— 'रजकस्य वस्त्रं ददाति' ।
हिन्दी शब्दार्थ-कामम् = मनोरथ को। अनवाप्य =न प्राप्त करके । एव = ही । रामपादौ = राम के चरणों को ।उपस्पृशन्= स्पर्श करते
हुए। सः= वह भरत।रामागमनकाङ्क्षया= राम के आगमन की इच्छा (=प्रतीक्षा) से।नन्दिग्रामे= नन्दीग्राम नामक स्थान में।राज्यम् =प्रजा पालन। अकरोत्=किया।
हिन्दी भावार्थ -अपने मनोरथ को न प्राप्त करके
अर्थात् इच्छा पूर्ति के बिना ही राम के दोनों चरणों का स्पर्श करते हुए वे (भरत)
राम के (लौट कर) आने वे की इच्छा (=प्रतीक्षा) से 'नन्दिग्राम' में राज्य करने लगे।
व्याकरण
(क) कारक-'रामागमन-काङ्क्षया' में 'हेतौ' सूत्र से
हेतु अर्थ में तृतीया विभक्ति हुई है।
टिप्पणी-वीतराग भरत का राम-योग्य राजसिंहासन पर न बैठना तथा राम की आज्ञा को
शिरोधार्य करके राज्य संम्हालना (नन्दिग्राम में ही रह कर ) - परम औचित्य का
परिपालन है।
हिन्दी शब्दार्थ-भरते= कैकेयी पुत्र भरत के । तु= पादपूर्ति के लिए अव्यय। गते (सति) = चले जाने पर । श्रीमान्
= दीप्तिमान् शोभा सम्पन्न।सत्य-सन्धः = सत्य प्रतिज्ञा वाले । जितेन्द्रियः = इन्द्रियों को जीतने ( वश
में करने ) वाले । तत्र - वहाँ (चित्रकूट में) । नागरस्य जनस्य =
नागरिक (नगर-वासी) लोगों का । आगमनम्=आगमन को।आलक्ष्य
= देख कर, भाँप कर । एकाग्रः = सुस्थिर, तल्लीन होकर । दण्डकान् = दण्डक वन के भू-प्रदेशों में । प्रविवेश
= प्रवेश किया । ह = निश्चय, प्रसिद्धि अर्थ वाला
निपात-पद (अव्यय) । यह पाद-पूरणार्थंक भी होता है। च भी पाद-पूरण में निपात है।
हिन्दी भावार्थ -भरत के लौट जाने पर दीप्ति-शाली, सत्य प्रतिज्ञा वाले तथा इन्द्रिय-विजयी राम ने वहाँ (चित्रकूट में) फिर
भी नागरिक जनों का आगमन देख कर सुस्थिर (परम शान्त) होकर दण्डकारण्य (के भू-भागों)
में प्रवेश किया । ऐसी प्रसिद्धि है ।
हिन्दी शब्दार्थ-राजीव-लोचनः = कमल की भाँति लोचनों वाले। रामः तु = राम ने। महारण्यम् = विशाल वन ( दण्डकारण्य) में । प्रविश्य = प्रवेश करके । राक्षसम्= निशाचर। विराधम्= विराधको। हत्वा = मार कर । शरभङ्गम्=शरभङ्ग नामकं मुनि ।तथा = और।सुतीक्ष्णं च= सुतीक्ष्ण मुनि को।अगस्त्यम् अपि=अगस्त्यमुनि को भी।अगस्त्यभ्रातरम् = अगस्त्य के भाई को।
ददर्श = देखा है- निश्चय, प्रसिद्धि
अर्थ में, पादपूर्ति लिए भी इसका प्रयोग होता है।
हिन्दी भावार्थ -कमल के समान विशाल नेत्रों
वाले राम ने तो विशाल वन ( दण्डकारण्य) में प्रवेश करके, विराध-नामक राक्षस का हनन करके शरभङ्ग तथा सुतीक्ष्ण, भगस्त्य एवम् अगस्त्य के भाई का भी दर्शन किया। ऐसी प्रसिद्धि है।
टिप्पणी-वन-वास काल में राम के दो ही पुनीत कर्त्तव्य रहे :- दानव दलन तथा मुनिजन
दर्शन, इन दोनों लक्ष्यों का श्रीगणेश दण्डक-वन में प्रवेश
करते ही हो रहा है।
भावार्थ:- परमप्रीतः रामः अगस्त्यमुनेः
आदेशात् एव खड्गं च इन्द्रसम्बन्धिधनुः च अक्षयसायकौ तूणीरौ च स्वीचकार ।
हिन्दी शब्दार्थ-परम- प्रीतः = अत्यन्त प्रसन्न
(होकर) । (राम)अगस्त्य-वचनात् = अगस्त्य मुनि के कथनानुसार ऐन्द्रम् = इन्द्र के । शरासनम् = धनुष को । खड्गम् = तलवार को । अक्षय्य-सायकौ = कभी समाप्त न होने वाले
बाणों से युक्त । तूणी = दो तरकसों को । जग्राह = ग्रहण किया ।
हिन्दी भावार्थ -(अगस्त्य के आश्रम में प्रवेश
करने के बाद) अत्यन्त प्रसन्न होकर श्रीराम ने अगस्त्य मुनि के कथनानुसार ही
इन्द्र से सम्बद्ध (ऐन्द्र) धनुष, तलवार तथा कभी समाप्त न होने योग्य बाणों से परिपूर्ण दो तूणीरों (तरकसों) को ग्रहण किया ।
यद्यपि तूण, तूणीर तथा तूणी (स्त्री०) इन शब्दों के अतिरिक्त 'तूणि' (पुल्लिँग या स्त्री०) का उल्लेख अमर कोष में
नहीं है ('पद्य में प्रयुक्त 'तूणी' पद तो तूणि (पुल्लिँग ) + द्वि०, द्वि० व० का
ही रूप है), तथापि आर्षत्वात् पुल्लिँग तूणि शब्द को
स्वीकृत कर लेने पर उक्त प्रयोग सिद्ध हो जाएगा ।
टिप्पणी-विकराल दुर्घर्ष दानवों के दलन हेतु देवों तथा ऋषियों के शुभाशीर्वाद
चुम्बित शस्त्रों-अस्त्रों को स्वीकार करना राम की क्षत्रियोचित मर्यादा के अनुकूल
ही है।
हिन्दी शब्दार्थ - वने=जंगल में।वनचरैः सह = वनवासी प्राणियों के
साथ।वसतः = निवास करते हुए । तस्य = उस ।रामस्य = राम के। (पास में)असुर-रक्षसाम् = असुरों तथा राक्षसों के। वधाय=वध करने के लिए। ऋषयः = ऋषिगण ।अभ्यागमत् = अभिमुख आ गये।
हिन्दी भावार्थ -दण्डक वन में वन-वासी प्राणियों
के साथ निवास करते हुए राम के पास समस्त ऋषिगण असुरों (दैत्यों) तथा राक्षसों के
वध हेतु (निवेदन करने) सामने आ गये ।
व्याकरण
(क) कारक-वनचरै: सह' में 'सह' के योग के कारण 'वनचरै:' में तृतीया विभक्ति हुई।
टिप्पणी-कश्यप की पत्नी दिति के पुत्र, शुक्राचार्य के शिष्य तथा देवों के सनातन शत्रु 'असुर' कहे गये हैं। रक्षस या राक्षस तो मद्यपान, रक्तपान (कोणप) तथा मांस-भक्षण (पिशिताशन) में निरत 'निशाचर' और मायावी होते हैं, जो निर्ॠति के वंशज माने गये हैं । द्रष्टव्य; अमरकोष १॥१॥१२ तथा १।१।५६-६० ।
'मुनि' शास्त्रों के मनन कर्ता होते हैं- 'शास्त्र-तत्त्व-मन्तारो मुनयः' । 'ऋषयो मन्त्रद्रष्टारः,''ऋषि' वेद-मन्त्रों के द्रष्टा होते हैं,।
हिन्दी शब्दार्थ - तदा = ऋषियों की प्रार्थना सुनने के बाद । वने=जंगल में।सः = श्रीराम ने ।
दण्डकारण्यवासिनाम् = दण्डकारण्य-निवासी । अग्निकल्पानाम् = अग्नि के समान (तेजस्वी)
। तेषाम्=मुनीनाम् ।ऋषीणां (समक्षं)=ऋषियों को समक्ष ।राक्षसानां = निशाचरों के । (वधं= वध करना) प्रतिशुश्राव = (बारे में सुना) प्रतिज्ञा किया, वचन दिया। संयति च = और युद्ध में।
रक्षसां= राक्षसों के । वधः प्रतिज्ञातः = वध की
प्रतिज्ञा की ।
हिन्दी भावार्थ -राक्षस-वध हेतु ऋषियों की
प्रार्थना सुनने के बाद उस वन में रामचन्द्र जी ने दण्डकारण्य-वासी और अग्नि के
समान तेजस्वी उन ऋषियों के समक्ष ही राक्षसों का वध करना स्वीकृत कर लिया तथा
युद्ध में राक्षसों के वध की प्रतिज्ञा की ।
टिप्पणी-उपद्रवी, धर्म-द्रोही, यज्ञ-विध्वंसक राक्षसों के वध हेतु की गई ऋषियों की प्रार्थना को स्वीकृत
करने से राम का अधर्म-विनाशक, राक्षस-मर्दक, यज्ञ पालक, धर्म-समर्थक, ऋषिरक्षक तथा विनीत स्वरूप प्रकाशित होता है ।
हिन्दी शब्दार्थ -तत्र एव=उसी दण्डक-वन में । वसता =
रहते हुए। तेन = भगवान् राम के द्वारा । जनस्थान-निवासिनी = ( दण्डकारण्य के ही एक
भाग का नाम 'जनस्थान' था, जहाँ जन समुदाय सपरिवार रहता था और जहाँ का
स्वामित्य खर एवं दूषण के हाँथों में था)। उसी 'जनस्थान' में रहने वाली । कामरूपिणी = इच्छानुसार रूप धारण करने वाली अर्थात्
मायाविनी । राक्षसी शूर्पणखा = शूर्पणखा नामक राक्षसी । विरूपिता = विकृत रूप वाली बना दी गई ।
हिन्दी भावार्थ -उसी दण्डक-वन में निवास करते हुए
उन श्रीराम ने 'जनस्थान' में निवास करने वाली, स्वेच्छा से रूप बना लेने वाली
शूर्पणखा नामक राक्षसी को (लक्ष्मण के द्वारा) विकृत स्वरूप वाली बना दिया।
शूर्पणखा= शूर्पनख + टाप् ('नखमुखात् संज्ञायाम्' सूत्र से ङीष् का निषेध
होने पर टाप् होता है), स्त्री०, प्रथमा, एकवचन।
(क) अलंकार-
अनुप्रास तथा 'शूर्पणखा' में समासगा उपमा है ।
(ख) रस -विरूप करने के कारणहास्य रस है।
(ग) कोष-'इच्छा मनोभवो कामी' इत्यमरः ३।३।१३८ ।
टिप्पणी-यद्यपि नारियों पर शस्त्रास्त्र प्रहार, अङ्गभङ्ग
आदि कार्यों का निषेध शास्त्रसम्मत है तथापि जिन दुरावारिणी महिलाओं के दुराचार से
सभ्य समाज खिन्न, दूषित तथा पीडित हो रहा हो उनका वध कर
देना समाज हित के अनुकूल ही है— 'आततायी वधार्हण:' (महाभारत ) । अतएव मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने ताड़का का वध तथा शूर्पणखा का
नासिका खण्डन करना उचित समझा ।
हिन्दी शब्दार्थ - ततः = शूर्पणखा को अङ्ग - विकृत कर देने के बाद । रामः= राम ने।शूर्पणखा-वाक्यात् = शूर्पणखा
के वचनों से। उद्युक्तान् = उकसाये गये, लड़ाई के लिए सन्नद्ध । सर्वराक्षसान्=सभी राक्षसों को।खरम्= खर नामक निशाचर को।त्रिशिरसं चैव - त्रिशिरा नामक राक्षस
को। दूषणम्=दूषण नामक राक्षस को । राक्षसम्= निशाचर को।तेषां= खर-दूषण आदि राक्षसों के । पदानुगान्= चरणों के पीछे-पीछे चलने वाले, अनुचरों को। रणे = युद्ध में। निजघान = मार डाला ।
हिन्दी भावार्थ -शूर्पणखा के नासिका खण्डन के बाद
श्रीराम ने शूर्पणखा के द्वारा उकसाये गये ( युद्ध करने के लिए उद्यत) समस्त
राक्षसों तथा खर, विशिरा एवं दूषण नामक (विशिष्ट)
राक्षसों और उनके चरणानुगामियों (अनुचरों) को युद्ध में मार डाला।
हिन्दी शब्दार्थ -तस्मिन् वने = उस दण्डकवन में । निवसता = निवास करते हुए (
राम के द्वारा) ।जनस्थाननिवासिनां ='जन स्थान' नामक स्थान पर रहने वाले । चतुर्दश सहस्राणि = १४ हजार । रक्षसां=राक्षसों को।निहतानि आसन् = मारे थे ।
हिन्दी भावार्थ -उस दण्डक-वन में निवास करते हुए
श्रीराम के द्वारा 'जन स्थान' में रहने वाले चौदह हजार राक्षस मारे गये थे ।
व्याकरण
सन्धि-
निहतान्यासन् = निहतानि + आसन्, (यण् सन्धि) ।
(ख) समास -
जनस्थान-निवासिनाम् = जनस्थाने निवसन्ति तेषाम् (उप पद त०) ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = इसके बाद अर्थात् चौदह हजार
राक्षसों के वध के बाद । ज्ञाति-वधम् = खर, दूषण, त्रिशिरा आदि राक्षस बन्धओं का वध को।श्रुत्वा=सुनकर।क्रोधमूच्छितः =कोप से विह्वल । रावणः = लङ्कापति दशानन रावण ने । मारीचं नाम राक्षसं= मारीच नामक ताडकापुत्र राक्षस से । सहायम् = सहयोग (को) । वरयामास = माँगा ।
हिन्दी भावार्थ -इसके बाद अर्थात् चौदह हजार
राक्षसों के साथ खर, दूषणादि प्रमुख राक्षसों के वध के
पश्चात् अपने बान्धवों के विनाश को सुन कर क्रोध-विह्वल रावण ने मारीच नामक
राक्षस से सहयोग माँगा ।
व्याकरण
(क) कारक -'दुह, याच्-पच्-' के नियमानुसारमारीचं
राक्षसं वरयामास' में याच् धातु के समानार्थक 'वृ' धातु के रूप 'वरयामास' के योग में मारीचं तथा उसके विशेषण-पद 'राक्षसं' में द्वितीया हुई है।
टिप्पणी-त्रैलोक्य-विजयी महाबली रावण द्वारा माया-पटु मारीच से सहायता मांगना यह
ध्वनित करता है कि अवसर पर तुच्छ व्यक्ति भी महान् व्यक्ति के लिए उपयोगी हो जाता
है।
वार्यमाणः सुबहुशो मारीचेन स रावणः ॥५०॥
न विरोधो बलवता क्षमो रावण तेन ते ।
अन्वयः -रावण ! तेन
बलवता (सह) ते विरोध न क्षम: (इत्थं) मारीचेन स रावणः, सुबहुशः वार्यमाणः (आसीत्) ।
हिन्दी शब्दार्थ -'हे रावण!= हे रावण! तेन बलवता =
उन बलवान् श्रीराम के (साथ) । ते =तुम्हारा। विरोधः = विरोध करना, शत्रुता मोल लेना । न क्षमः = उचित नहीं
है। (इत्थम्= इस प्रकार) मारीचेन= मारीच नामक राक्षस के द्वारा। सः= वह लङ्काधिपति। सुबहुशः = अनेकों बार । वार्यमाणः (आसीत्) = रोका जा रहा था, मना किया जा रहा था ।
हिन्दी भावार्थ - 'हे रावण ! उन परम बलशाली राम के
साथ तुम्हारा विरोध-कार्य उचित (या हितकर) नहीं है' (इस
प्रकार) मारीच के द्वारा वह रावण अनेकों भाँति (बहुत प्रकार से) रोका जा रहा था ।
व्याकरण
(क) कारक– 'तेन बलवता' में गम्यमान 'सह' के योग में 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र से तृतीया हुई ।
टिप्पणी-सच्चा हितैषी बन्धु या मित्र या स्वजन वही है, जो
अपनों को या - अपने स्वामी को अनिष्ट, अहितकर कार्य
करने से रोक दे, सत्-परामर्श देकर मना कर दे। भारवि ने
किरातार्जुनीयम् (प्रथम सर्ग) में इसी तथ्य का विवेचन किया है : 'स किं सखा, साधु न शास्ति योऽधिपम् ।' इसीलिए रावण को मारीच ने पहले ही समझाने का प्रयास किया ।
हिन्दी शब्दार्थ -तु = परन्तु।तदा = उस
समय । कालचोदितः = काल (विपरीत काया यमराज) के
द्वारा प्रेरित होकर) । रावणः= लङ्का के रावण।तद्-वाक्यम् = उस मारीच के वाक्य को ।अनादृत्य = ठुकराकर करके । सह-मारीचः = मारीच के साथ। तस्य = श्रीराम के ।आश्रमपदम् = आश्रम-स्थान की ओर ।जगाम = गया ।
हिन्दी भावार्थ - (यद्यपि मारीच ने बहुत रोका)
परन्तु उस समय (या मृत्यु) से प्रेरित होकर रावण उस मारीच के वाक्य का अनादर करके
भारीच के साथ उनके (श्रीराम के) आश्रम स्थान को गया।
व्याकरण
सन्धि-
तस्याश्रमपदम्= तस्य + आश्रमपदम्।
तद्-वाक्यम् = तत् + वाक्यम् (जश्त्व) ।
(ख) समास -
तद्वाक्यम्= तस्य वाक्यम् (षष्ठी तत्पुरूष)
कालचोदितः = कालेन चोदितः,
(तृतीयात०)
आश्रमपदम् =आश्रमस्य पदम् (षष्ठी तत्पुरूष)
सहमारीचः= मारीचेन सहइति सहमारीचः । सुप्सुपा से समास
(ग)धातु-प्रत्ययादि-पद परिचयः
अनादृत्य = आ + √दृ + क्त्वा > ल्यप् = आदृत्य, न आदृत्य = अनादृत्य । (नञ् त०) ।
टिप्पणी-अपने हितेच्छु जनों के सत्-परामर्शों की अवहेलना करने वाला पतन गर्त में जा
गिरता है। भारवि के शब्दों में : 'हितान्न य: संशृणते स किं प्रभुः ।'
मारीच जैसे अन्यान्य हितैषियों की हितकर बातें न मानने वाला
रावण दुर्गति पाता है ।
भावार्थ:- ऐन्द्रजालिकविद्याभिज्ञेन
सुवर्णमृगरूपधारिणा मारीचेन राजपुत्रौ रामलक्ष्मणौ आश्रमात् दीर्घमध्वानमपसार्य
नीतौ यस्मात् कारणात् रावणः श्रीरामचन्द्रस्य पत्नी सीतामपहृतवान्। गमनकाले च मार्गे
विघ्नकर्तारं सीताविमोचनार्थमुपस्थितं जटायुनामानम् बृहदाकारपक्षिविशेषं
सम्पातिभ्रातरम् व्यापाद्य सः लङ्काधिपतिः रावणः लङ्काभिमुखं प्रस्थितः।
हिन्दी शब्दार्थ - (रावणः)मायाविना =
माया रचने में निपुण, मायावी
मृग का रूप धारने वाले । तेन = उस मारीच के द्वारा । नृपात्मजौ =
दोनों राजकुमारों (राम और लक्ष्मण को) । दूरम् = दूर तक । अपवाह्य =
हटा कर । (रावणः) भार्यां = पत्नी, सीता
को । जहार = चुरा लिया। जटायुषम् =जटायु नामक गृध्र को । हत्वा
= मार कर । लङ्कां ययौ = लङ्का की ओर चला गया ।
हिन्दी भावार्थ -रावण ने उस मायावी (मृग-रूप-धारी) मारीच के द्वारा दोनों राज-पुत्रों (राम और
लक्ष्मण) को दूर तक हटा कर राम की पत्नी सीता का हरण कर लिया और (वह) गृध्र जटायु
को मार कर (लङ्का चला गया) ।
हिन्दी शब्दार्थ -राघवः = रामचन्द्र जी । निहतम् =
रावण के द्वारा मारे गये। गृध्रम् = जटायु को। दृष्ट्वा = देख कर । मैथिलीम् =जनकनन्दिनी सीता को । हृताम् = चुरा कर ले जाई गई । श्रुत्वा = सुन कर । शोकसन्तप्तः =
शोक से व्यथित होकर । आकुलेन्द्रियः ( च सन्) = तथा विकल इन्द्रियों वाले होकर ।
विललाप = विलाप करने लगे ।
हिन्दी भावार्थ - (इसके पश्चात् माया-मृग मारीच को
मारकर लौटे हुए) रामचन्द्र जी मारे गये जटायु गृध्र को देख कर तथा (उसी से) चुरा
कर ले जाई गई सीता के बारे में सुन कर शोक से व्यथित तथा विकल इन्द्रियों वाले होकर
विलाप करने लगे।
टिप्पणी-हितचिन्तक प्राणी तथा सहधर्मिणी प्रियतमा पर आई विपत्तियों पर शोक-सन्तप्त
होना मानवीय मर्यादा के अनुकूल ही है, अतएव मर्यादा
पुरुषोत्तम ने लोक-शिक्षा हेतु विलाप किया।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = जटायु मृत्यु तथा सीता-हरण
के बाद । तेन एव = उसी । शोकेन = शोक से (युक्त होकर) । दग्ध्वा = जलाकर, दाहक्रिया करके । जटायुषम्= जटायु नामक। गृध्रम् =सम्पाति के भाई गीध को । दग्ध्वा=जलाकर, दाह संस्कार करके।वने = वन में । सीताम्=सीता को।मार्गमाणः = खोजते हुए। राक्षसम्= निशाचर को।सन्ददर्श = देखा ।ह= निश्चय तथा प्रसिद्धि के अर्थ में अव्यय । पाद-पूर्ति के लिए भी यह
प्रयुक्त होता है।
हिन्दी भावार्थ -इसके बाद (जटायु-मृत्यु तथा
सीता-हरण के बाद) राम ने उसी शोक के साथ गृध्र जटायु का दाह-संस्कार करके (पुनः)
वन में सीता को खोजते हुए (उन्होंने) एक राक्षस (कबन्ध) को देखा। ऐसी प्रसिद्धि है
।
हिन्दी शब्दार्थ -महाबाहुः = विशाल भुजाओं वाले (राम
ने) । रूपेण = स्वरूप में । विकृतम् - विकार युक्त। घोर-दर्शनम् = देखने में
भयङ्कर प्रतीत होने वाले ।तम् = उस, पूर्वोक्त । कबन्धं नाम = इन्द्र के द्वारा
छिन्न-भिन्न जङ्घाओं और मस्तक वाले तथा ब्रह्मा के वरदान से दीर्घायु बने हुए 'कबन्ध' नामक राक्षस को । नाम = प्रसिद्धि-सूचक अव्यय है ।निहत्य = मार कर ।
ददाह = जला दिया, (गड्ढे में) दाह क्रिया कर दी। सः = वह
कबन्ध । स्वः = स्वर्ग को ('स्वर्' स्वर्गवाचक अव्यय है) । गतः = चला गया ।
हिन्दी भावार्थ -विशाल भुजाओं वाले श्रीराम ने
(सीता को खोजते समय मार्ग में) स्वरूप से विकृत (कुरूप) तथा देखने में भयङ्कर उस
(पूर्व-दृष्ट) कबन्ध नामक राक्षस को मार कर (दाहक्रिया द्वारा) दग्ध कर दिया और वह
राक्षस स्वर्ग चला गया ।
व्याकरण
(क)कारक
- 'रूपेण
विकृतम्' में 'येनाङ्गविकार:' सूत्र से या 'प्रकृत्यादिभ्य उपसंख्यानम्' इस वार्त्तिक से तृतीया हुई है ।
टिप्पणी-चूंकि कबन्ध ने राम से कहा था कि यदि आप मुझे जलायें। सीताहरण करने वाले
तथा सीता की खोज में सहयोग करने वाले के बारे में बता सकूंगा । अतएव
प्रयोजन-सिद्धि के लिए, साथ ही ऋषि-शाप से उसे मुक्त
करने के लिए राम ने उस कबन्ध का दहन किया।
हिन्दी शब्दार्थ -स च = उस कबन्ध ने। अस्य = इनसे, राम से। कथयामास (यत्) = कहा (कि) । 'हे राघव!= हे राम! ।धर्मचारिणीम् = धर्म
का आवरण करने वाली, तपस्विनी ।धर्मनिपुणाम्
= धर्म पालन में प्रवीण ।श्रमणाम् = संन्यासिनी ।शबरीम् = शबर-जातीय वृद्धा स्त्री की ओर । अभिगच्छ = समीप जाइए । इति= इस प्रकार के वचन को।
हिन्दी भावार्थ -और उस कबन्ध ने (स्वर्ग जाते
समय) श्रीरामचन्द्र से यह कहा कि हे रघुनाथ राम जी ! आप धर्माचरण करने वाली
(तपस्विनी) तथा धर्म-प्रवीणा संन्यासिनी शबरी के पास जाइए ।
व्याकरण
(क) कारक– 'अस्य कथयामास' में 'कथ' धातु के 'ब्रू' के समानार्थक होने पर भी 'दुह्-याच्-पच् के
नियम से द्वितीया नहीं हुई, क्योंकि अपादानादि के
अविवक्षित होने पर ही उक्त नियम से अकथित कर्म संज्ञा तथा द्वितीया विभक्ति होती है, अपादानादि की विवक्षा में तो पञ्चमी आदि होंगी ही। अतः सम्बन्ध की विवक्षा
में 'अस्य' में षष्ठी हुई।
हिन्दी शब्दार्थ -शत्रु-सूदनः= शत्रु विनाशक ।
महातेजाः = महान् प्रतापी । दशरथात्मजः =दशरथ के पुत्र । सः रामः = वहश्रीरामचन्द्र।शबरीम्= शबरी की तरफ । अभि अगच्छत् = गये । ततः = उसके बाद ।शबर्या = शबरी के द्वारा । पूजितः = सम्मानित किये गये ।
हिन्दी भावार्थ -शत्रुओं के विनाशक, महान् प्रतापशाली, दशरथ-नन्दन राम शबरी की तरफ
गये और शबरी के द्वारा सम्मानित किये गये ।
हिन्दी शब्दार्थ -पम्पा-तीरे = किष्किन्धा के पास
ऋष्यमूक पर्वत के निकटवर्ती 'पम्पा' नामक सरोवर के तट पर ।वानरेण = वानर। हनुमता= हनुमान्
से। सङ्गतः = मिले । हनुमद्-वचनात् च एव = और हनुमान जी के कहने से ही । सुग्रीवेण =
सुग्रीव नामक बालि-भ्राता वानर राज से । समागतः =समागम किया, भेंट किया।
हिन्दी भावार्थ -वे रामचन्द्र जी पम्पा सरोवर के
तट पर हनुमान् नामक वानर से मिले तथा हनुमान जी के ही कथन से सुग्रीव (नामक
वानर-राज) से जा मिले ।
हिन्दी शब्दार्थ -महाबलः = महान् पराक्रमी । रामः= श्री रामचन्द्र ने।सुग्रीवाय = सुग्रीव के लिए, सुग्रीव से। = आदितः = प्रारम्भ से लेकर । तत् सर्वम् = उन समस्त घटित
वृत्तान्तों को । विशेषतः = विशेष रूप से । सीतायाः = सीता के सम्बन्ध में। यथावृत्तम् = जो घटना घटित हुई। तत् = उन सारी बातों को । शंसत् (अशंसत्) = बता दिया।
हिन्दी भावार्थ -महान् पराक्रमी राम ने सुग्रीव
से उन सारी बातों को (जो राम के साथ घटित हुई थीं) प्रारम्भ से बता दिया तथा विशेष
रूप से सीता के बारे में जो वृत्तान्त घटित हुआ, उसे
बताया ।
टिप्पणी-राम के द्वारा प्रथम भेंट और परिचय के समय आदि से लेकर सीता हरण तक के
वृत्तान्त को सुग्रीव से बता देना भावी निश्छल मैत्री की पूर्वपीठिका है। मित्रता
में कुछ भी छिपाना घोर अपराध माना जाता है।
सुग्रीवश्चापि तत्सर्वं श्रुत्वा रामस्य वानरः ॥६०॥
चकार सख्यं रामेण प्रीतश्चैवाग्निसाक्षिकम् ।
अन्वयः-वानरः सुग्रीवः च अपि रामस्य तत्
सर्वं (वृत्तं) श्रुत्वा, प्रीतः (सन्) च रामेण (सह) एव अग्निसाक्षिकम् सख्यं चकार ।
हिन्दी शब्दार्थ -वानरः = कपि । सुग्रीवः च = सुग्रीव ने भी। रामस्य =श्रीरामचन्द्र का। तत् सर्वं (वृत्तम् ) = उन समस्त
अतीत में घटित वृत्तान्तों को । श्रुत्वा = सुनकर । प्रीतः (सन्) च = और प्रसन्न
होते हुए। रामेण एव= राम से, राम के साथ ही।
अग्निसाक्षिकम् = साक्षी अग्नि से युक्त । सख्यम् = मैत्री, मित्रता । चकार = कर ली ।
हिन्दी भावार्थ -वानर सुग्रीव ने भी राम की उन
सारी बातों को सुनकर और प्रसन्न होकर श्रीराम के साथ अग्नि को साक्षी मानकर
मित्रता कर ली।
व्याकरण
(क) कारक-'रामेण सख्यं' में गम्यमान 'सह' के
योग में 'सहयुक्तेऽप्रधाने' सूत्र
से रामेण में तृतीया विभक्ति हुई।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = राम से मित्रता करने के बाद
। दुःखितेन = (सता) = खिन्न होकर । वानरराजेन = सुग्रीव ने । वैरानुकथनम् =
शत्रुता की चर्चा । प्रति = के बारे में । प्रणयात् = स्नेह से। सर्वं = सब कुछ । रामाय = श्रीराम को।आवेदितम् = बता दिया ।
हिन्दी भावार्थ -इसके पश्चात् (राम के साथ मैत्री
करने के बाद) खिन्न होकर वानरराज सुग्रीव ने बालि से बैर होने की चर्चा आदि सारी
बातों के बारे में प्रेम-वश श्रीराम को बता दिया ।
व्याकरण
(क) कारक–'वैरानुकथनं प्रति' में 'अभितः - परितः - समया- निकषा-हा-प्रति-योगेऽपि के नियमानुसार द्वितीया हुई
है।
टिप्पणी-मित्रता हो जाने पर मित्र से सारी बातें अविकल रूप में बता देना ही
श्रेयस्कर होता है। इसीलिए सुग्रीव ने राम से बाली के साथ बढ़ी शत्रुता के बारे
में प्रणय से ( प्रेम के कारण या बालि का वध करने की याचना के कारण या अतिविश्वास
के कारण) बता दिया, क्योंकि 'प्रणय' के तीनों अर्थ होते हैं। विश्वास, याचना तथा प्रेम (द्रष्टव्य, अमरकोप ३।३।१५२) ।
प्रतिज्ञातं च रामेण तदा बालिवधं प्रति ॥६२॥
बालिनश्च बलं तत्र कथयामास वानरः ।
सुग्रीवः शङ्कितश्चासीन्नित्यं वीर्येण राघवे ॥६३॥
अन्वयः-तदा रामेण बालि-वधं प्रति
प्रतिज्ञातम्, वानरः च तत्र बालिनः बलं कथयामास, सुग्रीवः च वीर्येण राघवे नित्यं शङ्कितः आसीत् ।
हिन्दी शब्दार्थ -तदा = उस समय, सुग्रीव के मुख से उसकी व्यथा
की कथा सुन लेने पर । रामेण =. श्रीराम के द्वारा । बालि-वधं प्रति = बाली का वध करने के बारे में। प्रतिज्ञातम्
= प्रतिज्ञा की । वानरः च= और वानर सुग्रीव ने । तत्र = राम के समक्ष । बालिनः =
बाली के ।बलम् = पराक्रम के बारे में। कथयामास = कहा। सुग्रीवः च= और सुग्रीव ने ।वीर्येण = बल के निमित्त, बल के विषय में ।
राघवे =राम पर । नित्यम् = हमेशा, सदैव । शङ्कितः = सन्देह-युक्त, सन्दिग्ध । आसीत् =
रहता था।
हिन्दी भावार्थ -तब (सुग्रीव की व्यथा-कथा सुन
लेने पर) श्रीराम ने बाली का वध करने के विषय में प्रतिज्ञा की और वानर-राज
सुग्रीव ने राम के समक्ष बाली के (प्रचण्ड) बल का वर्णन किया क्योंकि सुग्रीव बल
के विषय में राम पर सदैव शङ्का - ग्रस्त रहता था ।
व्याकरण
(क) कारक–'बालिवधं प्रति' में 'अभितः परितः -समया' के नियमानुसार द्वितीया
विभक्ति हुई है । 'राघवे' में
वैषयिक आधार में सप्तमी है। 'वीर्येण' में तृतीया है ।
वीर्य, बल = 'वीर्यं बले प्रभावे च ।' इत्यमरः (३।३।१५५) ।
वधं = 'घातोन्माथ-वधा' इत्यमरः (२/८/११५)
टिप्पणी-सुग्रीव एवं राम में मैत्री हो जाने के बाद सर्व प्रथम राम के द्वारा ही
मित्रोचित साहाय्य का सम्पादन किया गया, इससे राम के
लोकोत्तर औदार्य एवं समयोचित कर्तव्य-पालन की पुष्टि होती है। राम पर सुग्रीव की
शंका, ब्रह्म पर जीव की शंका के समान अल्पज्ञता को
सूचित करती है ।
हिन्दी शब्दार्थ - तु = किन्तु । सुग्रीवः = सुग्रीव ने।राघव-प्रत्ययार्थम् = राम पर
विश्वास करने के लिए। महा-पर्वतसन्निभम् = विशाल पर्वत के समान । दुन्दुभेः =
दुन्दुभि नामक भयङ्कर दैत्य का । उत्तमम् = अत्यन्त उन्नत।कायम्
= शरीर को । दर्शयामास = दिखलाया ।
हिन्दी भावार्थ -सुग्रीव ने तो राम के बल पर
विश्वास करने के लिए महान पर्वत के समान दीख पड़ने वाले दुन्दुभि नामक महान् दैत्य
के अत्यन्त उन्नत शरीर को (राम को) दिखलाया ।
टिप्पणी-महा भयङ्कर दैत्य दुन्दुभि वर प्राप्त कर प्रचण्ड बल के कारण समुद्र तथा
हिमालय को भी भयभीत कर चुका था, जिसे वाली ने
युद्ध-कौशल से पराजित कर मार डाला था तथा कई योजन दूर मतङ्गमुनि के आश्रम में
(ऋष्यमूक पर्वत के पास ) फेंक दिया था। उसी दुन्दुभि राक्षस के अस्थि-पुञ्ज को
फेंकने के अभिप्राय से सुग्रीव ने उसकी ओर राम को सूचित किया था कि यदि वाली की
तरह राम इसे फेंक दें तो विश्वास हो जायेगा कि राम भी वाली के समान बलवान् हैं और
कथञ्चित् बाली से युद्ध कर सकते हैं ।
हिन्दी शब्दार्थ -महाबाहुः = विशाल भुजाओं वाले ।
महाबलः = महान् बलशाली (राम ने) । उत्स्मयित्वा = कुछ मुस्कराकर कर । अस्थि =
दुन्दुभि के उस अस्थि समुदाय को । प्रेक्ष्य = देख कर ।च =और । पादाङ्गुष्ठेन = पैर के
अँगूठे से । सम्पूर्णं = उस समस्त अस्थि-समुदाय को । दश-योजनम्=१० योजन दूरी पर ।
चिक्षेप = फेंक दिया।
हिन्दी भावार्थ -विशाल भुजाओं वाले तथा महान्
बलशाली श्री राम ने कुछ ने मुसकरा कर और (दुन्दुभि के) उस अस्थि-पुञ्ज को देखकर, पैर के अंगूठे से उस समस्त अस्थिपुञ्ज को दस योजन दूर फेंक दिया।
व्याकरण
(क) कारक-'दशयोजनम्' में 'कालाध्वनोः
सूत्र के नियमानुसार द्वितीया का प्रयोग है।
हिन्दी शब्दार्थ -तदा = तब । पुनःच = फिर भी । प्रत्ययम्
= (सुग्रीव के हृदय में) विश्वास को । जनयन्= उत्पन्न करते हुए (श्रीराम ने) । एकेन =
एक ही। महेषुणा= महान् बाण से । सप्त तालान्= ताड़ के सात पेड़ों को। गिरिम् = पर्वत
को । रसातलं च एव = और रसातल को भी। विभेद = छिन्न-भिन्न कर दिया।
हिन्दी भावार्थ -तब (अस्थि-पुज को अंगूठे से
फेंकने के बाद) पुनः (सुग्रीव के हृदय में) विश्वास उत्पन्न करते हुए श्रीराम ने
एक ही महान् बाण से ताड़ के सात वृक्षों, पर्वत तथा
रसातल को भी छिन्न-भिन्न कर दिया।
भावार्थ:- रामपराक्रमदर्शनानन्तरं महावानरः सुग्रीवः दुन्दुभिनाम्नः
राक्षसस्य देहकङ्कालप्रक्षेपेण सप्ततालविच्छेदनकर्मणा च विश्वस्तः प्रसन्नचित्तः
सन् रामेण सह तदानीं किष्किन्धानाम्नीं पर्वतकन्दरां जगाम।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके बाद । तेन = उन राम के द्वारा ।
विश्वस्तः = विश्वास बनाये गये। सः= वह ।महाकपिः = महा वानर
। प्रीतमनाः = प्रसन्न मन वाले हो गये।तदा = तब । राम-सहितः = राम के साथ ।किष्किन्धां= किष्किन्धा नामक गुहा में । जगाम = गये।
हिन्दी भावार्थ -उसके बाद (सात ताल-वृक्षों को
छिन्न-भिन्न कर डालने के बाद) उन श्रीराम के द्वारा विश्वस्त किये गये वे महा-वानर
सुग्रीव प्रसन्नचित्त हो गये तब राम को साथ लेकर वे किष्किन्धा गुफा में गये।
व्याकरण
(क) कारक - 'गत्यर्थ-कर्मणि द्वितीया इस सूत्र से 'गुहां
जगाम' में गत्यर्थक 'जगाम' के योग में 'गुहां' में
द्वितीया हुई है।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = राम की शक्ति पर विश्वस्त हो जाने के बाद । हेम-पिङ्गलः - सुवर्ण के समान पीत-बभ्रु, (पीलापन से युक्त भूरे) वर्ण वाले । हरिवरः = कपि में श्रेष्ठ । सुग्रीवः = वानरों के राजा बालि का अनुज सुग्रीव । अगर्जत् = गर्जना करने लगे । तेन = उस । महता = विशाल, ऊँची । नादेन = गर्जना से, गर्जना के कारण । हरीश्वरः = वानर राज बाली । निर्जगाम = गुफा से बाहर निकला ।
हिन्दी भावार्थ - तब ( राम के अप्रतिम पराक्रम पर विश्वास हो जाने के पश्चात्) सुवर्ण की भाँति पीलापन से युक्त भूरे वर्ण वाले वानर-श्रेष्ठ सुग्रीव ने गर्जना की; उस समय उस विशाल गर्जन-ध्वनि के कारण (कुपित हो) वानर राज बाली गुफा से बाहर निकला ।
व्याकरण
(क) कारक–'तेन महता नादेन'–में 'हेतौ' से तृतीया ज्ञातव्य है । 'एकेन शरेण' में करण अर्थ में तृतीया है ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके बाद । ताराम् = तारा नामक अपनी पत्नी को । अनुमान्य = आश्वस्त
करके, समझा-बुझा कर । सुग्रीवेण = सुग्रीव के साथ ।समागतः= आये हुए । तत्रएव = वहीं, उसी युद्ध-स्थल पर ।
राघवः = राम ने । एकेन शरेण = एक ही बाण से। निजघान = मार डाला ।
हिन्दी भावार्थ -तब वानर राज बाली तारा (नामक अपनी पत्नी) को आश्वस्त
करके (समझा-बुझा कर) सुग्रीव के साथ आये श्रीराम ने एक ही बाण से उस बाली को मार डाला ।
टिप्पणी- श्लोक संख्या ६८ तथा ६९ का एक साथ अन्वय करने पर हरीश्वरः ताराम् अनुमान्य निर्जगाम इस प्रकार अन्वय होगा। बालीतारा (नामक अपनी पत्नी) को आश्वस्त करके (समझा-बुझा कर) गुफा से निकला । यह अर्थ हो जाता है।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके बाद अर्थात् बाली और
सुग्रीव के भिड़ जाने पर । राघवः = राम ने । सुग्रीव-वचनात् = सुग्रीव के
कथनानुसार । आहवे = युद्ध में । बालिनम् = बाली को । हत्वा = मारकर । तद्राज्ये =उस
बाली के राज्य पर । सुग्रीवम् एव = सुग्रीव को ही । प्रत्यपादयत् = प्रतिष्ठापित
कर दिया ।
हिन्दी भावार्थ -उसके पश्चात् (अर्थात् सुग्रीव
के साथ वाली के भिड़ जाने - पर) श्रीराम ने सुग्रीव के कहने से उस युद्ध में वाली
को (एक वाण से) मार कर, उसके अधिकृत राज्य पर सुग्रीव
को ही प्रतिष्ठापित कर दिया ।
टिप्पणी-तात्पर्य यह है कि मित्रता की रस्सी को दृढ से दृढतम बनाने के लिए
पारस्परिक स्वीकृत वचनों, प्रतिज्ञाओं तथा गूढ
मन्त्रणाओं एवं शपथ वचनों पर अविचल विश्वास तथा यथा-समय ही उनका परिपालन अत्यन्त.
अनिवार्य तत्त्व है । अतएव मर्यादा पुरुषोत्तम राम अपने उद्देश्य (सीता प्राप्ति)
को पीछे रख कर मित्र मुग्रीव को आश्वस्त, विश्वस्त करने
के लिए सर्व प्रथम उसी के इष्ट उद्देश्य (घोर शत्रु बाली का हनन तथा राज्य
प्राप्ति) की सर्वात्मना पूर्ति करते हैं। परार्थ-सम्पादन के बाद ही
स्वार्थ-सम्पादन में प्रवृत्त होना महापुरुषत्व का सर्वोपरि लक्षण है।
सन्दर्भ-स्वार्थ पूर्ति से प्रसन्न-चित्त हो सुग्रीव ने अपने
मित्र राम को प्रसन्न करने के लिए सीता का पता लगाने हेतु वानरों को चारों दिशाओं
में भेजा ।
स च सर्वान् समानीय वानरान् वानरर्षभः ।
दिशः प्रस्थापयामास दिदृक्षुर्जनकात्मजाम् ॥७१॥
अन्वयः-जनकात्मजां दिदृक्षुः वानरर्षभः
सः सर्वान् वानरान् समानीय दिश: प्रति प्रस्थापयामास च ।
हिन्दी शब्दार्थ -जनकात्मजाम् = जनकतनया सीता को।
दिदृक्षुः= देखने को इच्छुक । वानरर्षभः = वानर श्रेष्ठ ।सः = सुग्रीव ने ।सर्वान् वानरान्= समस्त वानरों को । समानीय = लेकर, बुलाकर। दिश: (प्रति) = दिशाओं की ओर । प्रस्थापयामास = प्रेषित किया, भेज दिया, प्रस्थित किया । च= और ।
हिन्दी भावार्थ -जनकनन्दिनी सीता को देखने के लिए
इच्छुक (सीता का पता लगाने की इच्छा करने वाले ) वानर-शिरोमणि सुग्रीव ने समस्त
(अधीनस्थ ) वानरों को बुलाकर चारों दिशाओं की ओर भेज दिया।
(ग) कारक-दिशः (प्रति) प्रस्थापयामास' इस अंश के 'दिशः' पद में अध्याहार्य 'प्रति' के योग में 'अभितः परित: समया
निकषा-हा-प्रति-योगेऽपि इस नियम से द्वितीया हुई । ( दिशः = दिश् (स्त्री०) +
द्वि०, बहुवचन) ।
टिप्पणी-प्रतिज्ञा-पालक राम की तरह सुग्रीव भी मित्रवर राम के अभी प्सित
कार्य-विशेष को निष्पन्न करने के लिए सन्नद्ध हो गया; यह
बहुत बड़ी बात थी उस वानरजातीय सुग्रीव के लिए। (यद्यपि काम-मद और आलस्य में
प्रमत्त हो वह सुग्रीव कृतघ्नता की सेज पर सोने लगता है, पर राम-प्रेरित लक्ष्मण के वचन-वाण-फूत्कारों से सुग्रीव की मूर्च्छा, तन्द्रा दूर हो जाती है और वह तुरन्त पूर्व स्वीकृत राम कार्य को सिद्ध
करने में तत्पर हो जाता है ।) द्रष्टव्य, वाल्मीकीय रा०, किष्किन्धा का० सर्ग - ३१-४१ ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः= उसके पश्चात् अर्थात् सुग्रीव
के द्वारा चारों तरफ वानरों के भेज दिये जाने के बाद । बली= अत्यन्त शक्तिशाली ।
हनुमान् = अञ्जनानन्दन पवन कुमार हनुमान जी । गृध्रस्य सम्पाते: - जटायु के बड़े
भाई गृध्रराज सम्पाति के। वचनात् = वचनों के अनुसार । शतयोजन-विस्तीर्णम् = चार सौ
कोसों तक फैले हुए (१ योजन = ४ कोस) । लवणार्णवम् = खारे समुद्र को । पुप्लुवे =
कूद कर लाँघ गये ।
हिन्दी भावार्थ - (सुग्रीव के द्वारा चतुर्दिक्
वानरों के भेज दिये जाने पर) उसके बाद महाबली हनुमान् जी गृध्रराज सम्पाति के
वचनानुसार सौ योजनों अर्थात् चार सौ कोसों तक फैले हुए उस खारे समुद्र को कूद कर
लाँघ गये ।
टिप्पणी-सम्पाति ने समुद्र तथा लङ्का का वर्णन किया, साथ
ही लंकेश रावण : के द्वारा सुरक्षित की गई सीता के बारे में विस्तार से बताया।
जाम्बवान् ने भी हनुमान जी की अवतरण-कथा तथा असीम पराक्रम का विस्तृत विवेचन किया।
फलतः निसर्ग-सिद्ध तेजस्वी, ओजस्वी एवं मनस्त्री हनुमान
जी के हृदय णित स्फूर्ति तरङ्गावली उत्तरङ्गित हो उठी और वे जय श्रीराम' की गर्जना के साथ अपने सामर्थ्य-गुणों का उद्घोष करके, वानरों को आश्वस्त; विश्वस्त करते हुए विशाल
सागर को वैसे ही लाँघ गये, जैसे वह सागर मानों गौ का
खुर-गत हो –'गोष्पदीकृत-वारीशं वन्दे – ऽनिलात्मजम्' ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके पश्चात् अर्थात् समुद्र
को लांघने के बाद । रावण-पालिताम् = रावण के द्वारा सुरक्षित की गई। लङ्कापुरीम् =
लङ्का नगरी को । समासाद्य= प्राप्त कर पहुँचकर । अशोकवनिकां गताम् = अशोक स्थित ।
ध्यायन्तीम् = अपने प्रियतम राम का ध्यान, चिन्तन करती हुई । ददर्श = देखा ।
हिन्दी भावार्थ -उसके पश्चात् अर्थात् समुद्र को
लाँधने के बाद (हनुमान् जी ने) रावण के द्वारा रक्षित लङ्का नामक नगरी को प्राप्त
करके अर्थात् वहाँ पहुँचकर (वहाँ) अशोक वाटिका में स्थित तथा चिन्तन-रत सीता को
देखा।
टिप्पणी-हनुमान जी ने गहन अन्वेषण-श्रम करने के पश्चात् चिन्ता-सागर में डूबी तथा
अपने उद्धार का कोई भी उपाय देखती-सी सीता का अवलोकन कर स्वयं दुःखार्त हो गये ।
किसी-किसी पाठ में तत्र लङ्कां के स्थान पर ततो लङ्कां पाठ मिलता है।
निवेदयित्वाऽभिज्ञानं प्रवृत्तिं विनिवेद्य च ।
समाश्वास्य च वैदेहीं मर्दयामास तोरणम् ॥७४॥
अन्वयः-(ततः हनुमान्) अभिज्ञानं
निवेदयित्वा प्रवृत्तिं च विनिवेद्य, वैदेहीं समाश्वास्य
तोरणं च मर्दयामास।
हिन्दी शब्दार्थ -(हनुमान्) अभिज्ञानम् = पहुँचान या पहुँचान का साधन 'अंगूठी' (राम के द्वारा दी गई) ।निवेदयित्वा = अर्पित करके, निवेदित करके ।प्रवृत्तिम् च = (राम और लक्ष्मण के) और समाचार को । विनिवेद्य = ठीक से बता कर ।
वैदेहीम् =
सीता जी को । समाश्वास्य = सम्यक् आश्वासन देकर । तोरणम् = अशोक वाटिका
के बाहरी द्वार को । च = और।मर्दयामास = तोड़
डाला ।
हिन्दी भावार्थ - (सीता जी को देखने के बाद
दुःखाकुल होकर हनुमान जी ने) पहुँचान के साधन-स्वरूप (राम-प्रदत अंगूठी) को सीता
को देकर तथा राम के समाचार को ठीक से बता कर और जनकनन्दिनी सीता को आश्वस्त करके
अशोक वाटिका के बाहरी द्वार का मर्दन कर डाला (चूर-चूर कर दिया) ।
निवेदयित्वा = निः + √विद्
(ज्ञाने) + णिच् + क्त्वा ('समासेऽनञ्- पूर्वे क्त्वो ल्यप्
से यहाँ ल्यप् होना आवश्यक था और रूप बनना चाहिए था- 'निवेद्य', जैसे कि द्वितीय चरण में विनिवेद्य है। पर, आर्षत्वात्
सह्य है) ।
टिप्पणी-सीता को विश्वास दिलाने के लिए हनुमान् ने अभिज्ञान (पहुँचान = अंगूठी)
दिया, जिससे कि अंगूठी को पहचान कर सीता विश्वस्त हो
सकें कि अंगूठी देने वाले हनुमान् राम के द्वारा ही प्रेषित किये गये सन्देश-वाहक
हैं, न कि माया-पटु रावण के द्वारा प्रेषित कोई गुप्तचर
।
हिन्दी शब्दार्थ - पञ्च = पाँच ।सेनाग्रगान्= सेना के अग्रगामी
सेनापतियों को । सप्त = सात ।मन्त्रिसुतान् = मन्त्रियों के पुत्रों को । हत्वा =मार कर। शूरं = वीर।
अक्षम् = रावण-पुत्र अक्षकुमार को । निष्पिष्य = पीस कर अर्थात् पूर्णतया चूर-चूर
करके। ग्रहणम् = मेघनाद के ब्रह्मपाश के बन्धन में । समुपागमत् = स्वतः आ गये ।
हिन्दी भावार्थ - (हनुमान् जी ने अशोकवाटिका में
तैनात) पाँच सेनापतियों तथा सात मन्त्रि-पुत्रों को मार कर और अक्षकुमार को
चकना-चूर करके (मेघनाद के ब्रह्म-पाश के) बन्धन में स्वतः आ गये ।
व्याकरण
(क) कारक- 'ग्रहणं समुपागमत्' में 'गत्यर्थ - कर्मणि द्वितीयासूत्र से
द्वितीया हुई ।
टिप्पणी-हनुमान् जी ने सेनापतियों, मन्त्रि-पुत्रों तथा
विशेष करके अक्षकुमार नामक रावण-पुत्र को इसलिए मारा ताकि उन्हें रावण
के पास किसी तरह उपस्थित होने का अवसर मिले। वे पितामह ब्रह्मा के द्वारा अजेय, अवध्य तथा अग्राह्य होने का वर प्राप्त करने पर भी सर्व-वन्द्य पितामह
ब्रह्मा जी का सम्मान-वर्धन करने के लिए तथा रावण के पास जाने की तीव्र उत्कष्ठा
की पूर्ति के लिए स्वतः मेघनाद के ब्रह्म-पाश में बंध गये ।
हिन्दी शब्दार्थ -वीरः = महावीर हनुमान् जी।
पैतामहाद्= पितामह ब्रह्मा जी के । वरात् = वर से वरदान के कारण । आत्मानम् = अपने
को। अस्त्रेण = ब्रह्मास्त्र या ब्रह्म-पाश से। उन्मुक्तम्= छूटा हुआ। ज्ञात्वा (अपि)
=जान कर भी। तान् = उन । यन्त्रिणः == बाँधने वाले । राक्षसान् = राक्षसों को ।
मर्षयन् = सहते हुए । ('ग्रहणं समुपागमत्' इतना अंश पूर्व-पद्य ७५ वे के अन्तिम चरण से ले लेने पर अर्थ सुस्पष्ट हो
जाता है) ।
हिन्दी भावार्थ -वे वीर हनुमान जी पितामह ब्रह्मा
जी के वरदान के कारण अपने को ब्रह्मास्त्र से मुक्त जान कर भी (अपने शरीर को)
बाँधने वाले उन राक्षसों को सहते हुए स्वेच्छा से (पकड़ में या
बन्धन में आ गये) ।
व्याकरण
(क)सन्धि-
अस्त्रेणोन्मुक्तम् =
अस्त्रेण + उन्मुक्तम् ( गुण सन्धि )।
टिप्पणी-चूंकि समुचित तथा सुविधानुकूल समय पाकर ही हनुमान जी लङ्का दहन करना चाहते
थे, अतएव विविध बहानों से रावण के समक्ष प्रस्तुत हो
स्वतः स्वेच्छया बन्धन- ग्रस्त हो गये ।
ततो दग्ध्वा पुरीं लङ्कामृते सीतां च मैथिलीम् ।
रामाय प्रियमाख्यातुं पुनरायान्महाकपिः ॥७७॥
अन्वयः-ततः महाकपिः मैथिलीं सीताम् ऋते लङ्कां पुरीं दग्ध्वा, रामाय च प्रियम् आख्यातुं पुनः आयात् ।
भावार्थ:- मेघनादप्रयुक्तब्रह्मास्त्रबन्धनेनाबद्धो
भूत्वा कपिश्रेष्ठः हनुमान् रावणेन सह विहितसंवादानन्तरं
लङ्काधिपतिरावणस्यादेशेन लाङ्गूलयोजितेनाग्निना मिथिलादेशोद्भवां सीतां सीतानिवास
स्थानमशोकवाटिकां च विभीषणगृहं च विना लङ्कानगरीं दग्ध्वा सीतावाप्तिमुत्सुकाय
दाशरथये इष्टं संवादम् आख्यातुं पुनः रामसमीपमाययौ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके बाद अर्थात् (स्वेच्छा
पूर्वक राक्षसों के बन्धन में पड़कर । महाकपिः = महान् वानर, वानर-मूर्धन्य हनुमान् । मैथिलीम् = जनकनन्दिनी (सीता) के। ऋते = विना के अतिरिक्त । लङ्कांपुरीम् = नगरी को । दग्ध्वा = जलाकर । रामाय = राम के लिए, राम को । प्रियम् = प्रिय बात, अनुकूल समाचार । आख्यातुम् = बताने के लिए । पुनः= फिर । आयात् = आ गये ।
हिन्दी भावार्थ -उसके पश्चात् अर्थात् बन्धन में
आ जाने के बाद वानर मूर्धन्य हनुमान जी जनकनन्दिनी सीता के अतिरिक्त (सम्पूर्ण)
लङ्का नगरी को जलाकर राम के लिए अनुकूल समाचार बताने हेतु ( राम के पास) पुनः आ
गये ।
व्याकरण
(क) कारक-'मैथिली सीताम्' इन दोनों क्रमशः विशेषण = विशेष्य पदों में पाणिनि-सूत्र 'अन्यारादितरर्ते-दिवशब्दाञ्चूत्तरपदाजाहि-युक्त' से 'ऋते' के योग में
पञ्चमी विभक्ति का प्रयोग होना चाहिए था; पर रामायण के
प्राचीनतम ग्रन्थ होने के कारण यहाँ 'ऋते द्वितीया च' इस चान्द्र-व्याकरण-गत सूत्र से द्वितीया ज्ञातव्य है ।
टिप्पणी-हनुमान जी के समान निश्छल, कृतज्ञ, अकारण-करुण, अद्वैतुक कृपालु, भक्ति-निष्ठ तथा भक्तवत्सल दूसरा कौन देव या मानव हो सकता है ? अपने राजा सुग्रीव के रक्षक, परिवाण-कर्ता होने
पर भी वे उनके आदेश तथा अपने आराध्य भगवान् राम के सविनय सन्देश का अविचल पालन कर
सकुशल लौट आये- राम को सीता का कुशल समाचार बताने तथा लङ्का दहनादि प्रिय घटनाओं
को कहने !!
हिन्दी शब्दार्थ -अमेयात्मा = असीम बुद्धि, धैर्य या शरीर वाले। सः = वे
हनुमान् । महात्मानम् = महनीय स्वभाव या बुद्धि वाले ('राम' का विशेषण है) । अभिगम्य = पास पहुँचकर । प्रदक्षिणं कृत्वा च= और
प्रदक्षिणा करके । तत्त्वतः = वस्तुतः, वास्तव में, यथार्थता पूर्वक । (मया) सीता दृष्टा= मेरे द्वारा सीता जी देख ली गई हैं
। इति = इस प्रकार । न्यवेदयत् = बताया, निवेदित किया ।
हिन्दी भावार्थ -असीम बुद्धि (या धैर्य या शरीर)
वाले उन हनुमान जी ने महान् स्वभाव या बुद्धि बाले महापुरुष राम के पास पहुँचकर और
उनकी प्रदक्षिणा करके अर्थात् उन्हें दाहिनी ओर करके 'मैंने
वास्तव में सीता जी को देख लिया है' ऐसा निवेदन-पूर्वक
बताया।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = हनुमान् जी से सीता का
समाचार जानने के बाद । सुग्रीव-सहितः = सुग्रीव के सहित (श्रीराम ने) । महोदधेः =
महासागर के । तीरम् = तट पर । गत्वा = जाकर। आदित्य-सन्निभैः = सूर्य के समान
देदीप्यमान ।शरैः =
वाणों से । समुद्रम् = सागर को । क्षोभयामास = कम्पित कर दिया, आकूलित कर दिया।
हिन्दी भावार्थ -तब ( हनुमान जी के द्वारा सीता
का कुशल- समाचार सुन कर) सुग्रीव के सहित श्रीराम ने महासागर के तट पर जाकर सूर्य
के समान देदीप्यमान वाणों से समुद्र को आकम्पित कर दिया।
टिप्पणी-समुद्र के उस पार दक्षिणी भाग पर स्थित लङ्का में जाने के लिए समुद्र को
पार करना नितान्त आवश्यक था, अतएव राम ने समुद्र से
मार्ग की याचना की। समुद्र के शान्त रहने पर राम को वाण सञ्चालन करना पड़ा, जिससे जलचर-सहित समुद्र का अन्तस्तल आन्दोलित हो उठा !!
हिन्दी शब्दार्थ -सरिताम् = नदियों के । पतिः = स्वामी । समुद्रः = समुद्र ने । आत्मानम् = अपने
स्वरूप को दर्शयामास= प्रदर्शित किया, प्रकट हो दिखलाया। (रामः)समुद्र-वचनात् च = और समुद्र के कथनानुसार । एव = ही । नलम् = नल से । सेतुम् = पुल को । अकारयत् = बनवाया ।
हिन्दी भावार्थ - --(राम के वाणों से आकम्पित हो)
नदियों के स्वामी समुद्र ने अपने साकार स्वरूप को दिखला दिया और समुद्र के कथनानुसार
ही (श्री राम ने) नल से सेतु-निर्माण कराया ।
व्याकरण
(क) कारक ='नलं सेतुम् अकारयत्' में 'नलःसेतुम् अकार्षीत्, रामः तं प्रेरिरत् इति 'राम: नलं सेतुम्
अकारयत्' । यहाँ 'ह्रीक्रोरन्यतरस्याम्' सूत्र से अणिजन्त का कर्ता 'नल' कर्म फलतः द्वितीया एकवचन 'नलम्' हो गया है ।
(ख) सन्धि-
चात्मानम्= च + आत्मानम्
समुद्र-वचनाच्चैव = समुद्र वचनात् + च + एव ( त्व० तथा वृद्धि०) ।
टिप्पणी-देव वरदान के कारण सिद्धहस्त शिल्पकला-कोविद नल एवं नील के आध्यक्ष्य में
सागर में भी पुल बँध सका, जो समग्र विश्व के दैविक
इतिहास की विलक्षणतम घटना है। अतएव यहाँ अद्भुत रस का परिस्फुरण है।
हिन्दी शब्दार्थ -रामः = श्रीराम
। तेन = नलनिर्मित उस पुल से । लङ्कां पुरीम् = लङ्का नगरी में।गत्वा = जाकर । आहवे = युद्ध में । रावणम् = रावण को। हत्वा = मार कर
। सीताम् = सीता को । अनुप्राप्य = प्राप्त करके । पराम् = अत्यधिक । व्रीडाम्= लज्जा
को । उपागमत् = प्राप्त हुए।
हिन्दी भावार्थ -श्रीराम उससे (नल-निर्मित पुल
से) लङ्का पुरी को जाकर, युद्ध में रावण को मार कर तथा
सीता को प्राप्त कर परम लज्जा को प्राप्त हुए।
(क) अलंकार-अनुप्रास अलङ्कार है तथा कई क्रियाओं के कारण तुल्ययोगिता
अलंकार है।
(ख) रस -वीररस है तथा घृणा से अनुप्राणित लज्जा के कारण
बीभत्स रसोचित उद्दीपन विभाव है।
(ग) कोष-
'जपा ब्रीडा लज्जा' इत्यमरः (१७७२३) ।
आह्व= 'सङ्ग्रामाभ्यागमाहवा' इत्यमरः (२१८/१०४) ।
टिप्पणी-जन वर्ग में सम्भावित अपवाद (रावण-गृह में पर्याप्त दिनों तक सीता के रहने
के कारण अनुमानित दोषारोपण) से बचने के लिए तथा अपने ही निर्विकार हृदय की तरह
लोगों के मन में भी निर्दोष सीता के प्रति निर्मल भावना लाने के लिए ऊपर से कुछ
लज्जित हुए श्रीराम ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः= उसके बाद, सीता को देख कर राम के लज्जित
होने पर। रामः= श्री रामचन्द्र। जनसंसदि = लोगों की सभा में। ताम्= उस
सीता से। परुषम्= कठोरतापूर्वक या कठोर वचन ।उवाच = कहा । सती = पतिव्रता, सदाचारिणी ।
(तत्) अमृष्यमाणा= उसे न सहन करती हुई । ज्वलनं विवेश = अग्नि में प्रविष्ट हो गई ।
हिन्दी भावार्थ -उसके पश्चात् अर्थात् सीता को
देख कर लज्जित होने के बाद धीराम ने जन-सभा में सीता के प्रति कठोरता पूर्वक कुछ
कहा, जिसे न सहती हुई वे सदाचारिणी (पतिव्रता) सीता
अग्नि में प्रविष्ट हो गईं।
व्याकरण
(क)कारक-'ताम् उवाच' में 'दुह्याच्-पच् ' इस वात्तिर्कार्थ-संग्रह वाक्य के नियमानुसार 'ताम्' में द्वितीया हुई है।
टिप्पणी-शङ्कित चित्त वाले लोगों के बीच में ही उनके मनो-निहित आरोपों से सम्बद्ध
निष्ठुर वचनों का प्रयोग करके राम ने सीता की अग्नि-परीक्षा करा दी। कोई भी
पतिव्रता नारी अपने पवित्र चरित्र पर मिथ्या आरोप नहीं सहन करती है। अतः सीता की
असहिष्णुता तथा अग्नि-प्रवेश; उनके सतीत्व की अक्षुष्ण
पहचान के कारण, समुचित ही है।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः - अग्नि में सीता के प्रविष्ट
हो जाने के बाद । अग्नि-वचनात् = अग्निदेव के वचनानुसार सीतां = सीता को । विगतकल्मषाम् निष्पाप, निर्दोष ।
ज्ञात्वा = जान कर (सन्तुष्ट हुए) महात्मनः = महान् धैर्यशाली । राघवस्य = श्री
राम के तेन उस महता = महान् । कर्मणा = कार्य से । सदेर्वाधि-गणम् = देवताओं तथा ऋषियों के समूहों से युक्त । सचराचरम् = चराचर सहित । त्रैलोक्यम् = तीनों लोक।
तुष्टम् = प्रसन्न हो गये। (अर्थ) सर्व-देवतः = समस्त देवताओं द्वारा । पूजितः =
सम्मानित ( होने पर ) । सम्प्रहृष्टः = अत्यन्त प्रसन्न हो । रामः = श्रीराम जी । बभौ
= सुशोभित हुए।
हिन्दी भावार्थ -उसके बाद अर्थात् अग्नि में सीता
के प्रविष्ट हो जाने के बाद (प्रकट हुए) अग्निदेव के वचन से सीता जी को निर्दोष
ज्ञान कर (निश्चिन्त हुए) महा-धैर्यशाली श्रीराम के उस महान् कार्य से देवताओं तथा
ऋषियों युक्त चराचर सहित तीनों लोक प्रसन्न हो उठे। (अब ) समस्त देवों के द्वारा
सम्मानित होने पर अत्यन्त प्रमुदित हो श्रीराम जी सुशोभित होने लगे ।
देवत= 'वृन्दारका दैवतानि पुंसि वा देवताः स्त्रियाम्' इत्यमरः (१1१६) ।
टिप्पणी-अग्नि परीक्षा द्वारा सीता को विशुद्ध एवं निष्कलङ्क घोषित करने के उपक्रम
को देख कर देवों एवं ऋषियों सहित त्रिभुवन के प्राणी आश्चर्य चकित रह गये और राम के
सद्-गुण-गणों की प्रशंसा करने लगे ।
हिन्दी शब्दार्थ -लंकायाम् = लङ्का में, लङ्का के
राज्य पर । राक्षसेन्द्रम् = निशाचर कुल के श्रेष्ठ।विभीषणम् = विभीषण को । अभिषिच्य=अभिषेक करके ।तदा = इसके बाद । रामः = राम । कृत-कृत्यः = कृतार्थ (हो कर) ।विज्वरः = सन्ताप रहित, निश्चिन्त । च= और ।प्रमुमोद= प्रमुद्रित हुए। ह =
प्रसिद्धि तथा पादपूरणार्थक निपात ।
हिन्दी भावार्थ -इसके बाद श्रीराम लङ्का (के राज्य)
पर राक्षस-शिरोमणि विभीषण कोअभिषिक्त करके निश्चिन्त और कृतार्थ होते हुए अत्यन्त आनन्दित हुए।
टिप्पणी-लङ्कानरेश रावण को पराजित करके इन्द्र-कुबेरादि के अनन्त ऐश्वर्य को
पराभूत करने वाली लङ्का-गत समृद्धिराशि की सर्वथा उपेक्षा करके पूर्ण निरीह भाव से
उस लङ्का-राज्य पर रावण के ही वंशज (अनुज) विभीषण को स्थापित करना राम के लोकोत्तर
प्रभुत्व, निष्काम कर्म-योग तथा न्याय-प्रियता का
जाज्वल्यमान निदर्शन है।
भावार्थः- ततः रामः इन्द्रादिदेवेभ्यः
आशीर्वादं लब्ध्वा युद्धे राक्षसैः हृतान् वानरान् भल्लूकाँश्च पुनः जीवयित्वा
सुग्रीवविभीषणहनुमदङ्गादिपरिवेष्टितः सन् विभीषणेन समर्पितपुष्पकविमानेन
अयोध्यामुद्दिश्य प्रस्थितः।
हिन्दी शब्दार्थ - (अथ) रामः= (इसके बाद) राम ।देवताभ्यः = देवताओं से । वरं = वरदान को । प्राप्य = प्राप्त करके । वानरान्च = और (मृत) बानरों को । समुत्थाप्य - उठा कर अर्थात् जीवित करके । सुहृद्वृतः =
शुभचिन्तक मित्रों से घिरे हुए। पुष्पकेण= पुष्पक विमान के द्वारा । अयोध्यां
(प्रति) = अयोध्या नगरी की ओर । प्रस्थितः = प्रस्थान किया ।
हिन्दी भावार्थ - (लङ्का के राज-सिहासन पर विभीषण
को राज्याभिषिक्त करके) श्रीराम जी देवताओं से अनुकूल वर प्राप्त करके तथा (युद्ध
में मृत) वानरों को उठा कर अर्थात् जीवित करके शुभचिन्तक मित्रों से घिरे हुए पुष्पक विमान के द्वारा अयोध्या की ओर चल पड़े।
वर = देवाद् वृते वरः श्रेष्ठे' इत्यमरः
(३।३।१७३) ।
पुष्पक= विमानं तु पुष्पकम्' इत्यमरः (१//१/१७०) ।
सुहृत् = अथ मित्रं सखा सुहृद्' इत्यमरः
(२०१२)
टिप्पणी-रावण-पीडित कुबेर के पुष्पक विमान पर आरूढ हो सीता सहित भगवान् राम अपनी
सुधावर्षिणी कृपा-दृष्टि से निर्जीव वानरों को जीवनदान करके सुग्रीव, हनुमान, विभीषण आदि के साथ अयोध्या की ओर चल
पड़े।
टिप्पणी-अयोध्या से काफी दूरी पर प्रयाग में भरद्वाज के आश्रम पर ही
अयोध्या का आन्तरिक समाचार जान लेने के लिए राम वहाँ उतरे और आश्रम में ठहरे। वहीं
से हनुमान् जैसे बलवान् एवं बुद्धिमान् दूत को भरत के पास भेज कर अयोध्यावासियों
की मानसिक धारणा तथा परिवर्तित या अपरिवर्तित राजनीति की जिज्ञासा का प्रयास करना राम की दूरदर्शिता
तथा नीतिपटुता का परिचायक है।
प्रस्तुत श्लोक में गत्वा रामः इस प्रकार का पाठ है। गत्वारामः को एक साथ लिखने परगत्वा + आरामः यह विच्छेद होता है । इसमें आरामः का अर्थ इस प्रकार होगा- आरामः = आसमन्ताद् रमयति = आनन्दयति जनान् इति आरामः, आ + √रम् + अण् (कर्मणि) ।
हिन्दी शब्दार्थ -ततः = उसके बाद । सुग्रीव-सहितः = सुग्रीव के सहित (राम) । आख्यायिकाम् =
पूर्वानुभूत विषयों के वर्णन से भरी कहानियों को। जल्पन् = कहते हुए । तत्
पुष्पकम् = उसी पुष्पक पर । पुनः = फिर । समारुह्य = चढ़कर । तदा = तब ।
नन्दिग्रामम् = जहाँ भरत राम के आगमन की प्रतीक्षा में तपोरत थे, उसी स्थान की ओर। ययौ= गए।
हिन्दी भावार्थ -इसके पश्चात् अर्थात् हनुमान को
भरत के पास भेज देने के में बाद, सुग्रीव के सहित
श्रीराम जी अनुभूत विषयों वाली कहानी कहते हुए उसी पुष्पक पर पुनः आरूढ होकर तब
नन्दिग्राम गए।
टिप्पणी-राम अपनी जन्मभूमि अयोध्या की ओर अब चलने लगे हैं। सुदूर दक्षिण दिशावर्ती
सुग्रीव आदि को शृङ्गवेरपुर, गङ्गा जी, भरद्वाज मुनि, प्रयाग, अयोध्या, चित्रकूट आदि उत्तरी तत्त्वों के बारे
में जानकारी नहीं थी-अतः राम ने उन्हें उत्तर दिशा की उन-उन तात्त्विक
बातों की ऐतिहासिक तथा लोक-विश्रुत कहानियाँ सुना दी। साथ ही, कहीं सुग्रीव आदि अपनी उपेक्षा, अनादर आदि का
अनुभव न करें, इसलिए भी समदर्शी तथा सब को मान देने
वाले राम अब उन्हीं की ओर उन्मुख हो मनोऽनुकूल बातें करने लगे।
हिन्दी शब्दार्थ -अनधः= निष्कल निर्विकार, पाप रहित । रामः = दशरथ के पुत्र राम । नन्दिग्रामे = नन्दिग्राम नामक स्थान में।जटाम् = वनवास काल में बढ़ हुई जटा को । हित्वा =
छोड़ कर, परित्याग
करके । भ्रातृभिः सहितः = अपने तीनों भाइयों के साथ। सीताम् = सीता को। अनुप्राप्य
= अपने पीछे लेकर । पुनः = फिर । राज्यम् = अयोध्या का राज्य । अवाप्तवान् =
प्राप्त किया ।
हिन्दी भावार्थ -पाप रहित श्रीराम ने नन्दिग्राम
में जटा को छोड़ कर (कटा कर) अपने भाइयों
के साथ, सीता को पीछे लेकर पुनः (कैकयी के कारण १४ वर्ष
पूर्व छोड़े गये) राज्य को प्राप्त कर लिया ।
(क) अलंकार-अनुप्रास, समुच्चय तथा
तुल्ययोगिता अलङ्कार हैं।
(ख) रस -भ्रातृभिः सहितः' के कारण वत्सल रस है।
(ग) कोष-
अघ = 'कलुषं वृजिनैनोऽघमंह' इत्यमरः
(१।४।२३) ।
जटा = 'व्रतिनस्तु सटा जटा ' इत्यमरः (२/१६/९७) ।
टिप्पणी-कैकयी की वर-याचना के कारण अयोध्या का जो राज्य राम के द्वारा तृणवत्
परित्यक्त कर दिया गया था, आज वही राज्य, चित्रकूट में वशिष्ठ-प्रभृति गुरुजनों के समक्ष भरत से की गई वार्ता को
ध्यान में रख कर पुनः अपना लिया गया। यही 'पुन:' पद से द्योतित निर्गलित व्यङ्ग्यार्थ है ।
प्रदृष्टमुदितो लोकस्तुष्टः पुष्टः सुधार्मिकः ।
निरामयो ह्यरोगश्च दुर्भिक्षभयवर्जितः ॥९०॥
अन्वयः-(राम-राज्ये) लोकः प्रहृष्टमुदितः तुष्टः, पुष्टः, सुधार्मिक, निरामयः, अरोग: दुर्भिक्ष-भय-वर्जितः च हि (भविष्यति) ।
हिन्दी शब्दार्थ -लोकः = सम्पूर्ण संसार या सारे लोग। प्रहृष्ट-मुदितः= अत्यन्त हर्षित (हृदय से) तथा
आनन्दित (प्रफुल्ल मुखमण्डलादि से परिलक्षित) । तुष्ट:= सन्तुष्ट । पुष्ट:= शरीर
से सुदृढ । सुधार्मिकः = प्रशस्त धर्मनिष्ठ । निरामयः = निर्विकार (सकुशल) । अरोगः =
नीरोग (स्वस्थ ) । दुर्भिक्ष-भय-वर्जितः = अकाल के भय से रहित । च = और । हि = निश्चय हीं। (होंगे)
हिन्दी भावार्थ -(राम-राज्य में) सम्पूर्ण संसार या
जन-समुदाय (आन्तरिक रूप से, हृदय से) अत्यन्त हर्षित
तथा (मुखमण्डल की प्रफुल्लता से अनुमेय, अतः बाहर से)
आनन्दित, सन्तुष्ट (यथा प्राप्त वस्तु से ही सन्तोष
करने वाला), पुष्ट शरीर वाला, प्रशस्त धर्मानुरागी, (मन से) विकार रहित, (शरीर से) निरोग अर्थात् स्वस्थ तथा अकाल पड़ने के भय से रहित होगा ।
टिप्पणी- 'यथा राजा तथा प्रजा' इस लोकोक्ति के अनुसार ही
सदाचारी, धर्मरक्षण-सक्षण तथा परोपकारी राम के
राज्याधिरूढ होने पर प्रजाओं में भी धर्मानुराग, नैरोग्य, सदाचार आदि सत्-प्रवृत्तियों का उदय हो गया था । दुराचारी राजा के राज्य
में तो पृथ्वी में फसल, अन्न, रस, फल आदि की न्यूनता हो जाने पर दुर्भिक्ष
पड़ता ही है : 'राज्ञोऽपचारात् पृथिवी स्वल्प-सस्या
भवेत् किल ।'
न पुत्रमरणं केचिद्रक्ष्यन्ति पुरुषाः क्वचित् ।
नार्यश्चाविधवा नित्यं भविष्यन्ति पतिव्रताः ॥९१॥
अन्वयः- (राम-राज्ये) केचिद् (अपि)
पुरुषाः क्वचिद् (अपि) पुत्र-मरणं न द्रक्ष्यन्ति, नार्यः च अविधवाः, नित्यं पतिव्रताः भविष्यन्ति ।
हिन्दी शब्दार्थ -केचिद् (अपि) = कोई भी । पुरुषाः = नर
। क्वचिद् (अपि) = कहीं भी। पुत्र-मरणम् = अपने पुत्रों की मृत्यु । न द्रक्ष्यन्ति
= नहीं देखेंगे। नार्यः च = और स्त्रियाँ । अविधवाः = वैधव्य रहित अर्थात् सुहागिन ।
नित्यम् = सदैव । पतिव्रताः = पति-परायणा, सदाचारिणी । भविष्यन्ति = होंगी।
हिन्दी भावार्थ -रामराज्य में कोई भी पुरुष कहीं
भी अपने पुत्रों का निधन नहीं देखेंगे और नारियाँ सुहागिन तथा सदैव पतिव्रता
(सदाचारिणी) होंगी।
टिप्पणी-रामराज्य में 'शतायुर्वै पुरुष:' के नियमानुसार मानव की आयु १०० वर्षों की होती थी, इससे कम आयु में किसी का भी निधन नहीं होता था। फलतः लोग पुत्र-मरण की
दुस्सह पीडा से रहित थे, सभी पुत्र-पौत्र-समन्वित थे।
द्रक्ष्यन्ति आदि भविष्यत् कालिक क्रियाओं से ज्ञात होता है कि राम के राजा बनते
ही नारद जी ने बाल्मीकि से रामकथा कही ।
न चाग्निजं भयं किञ्चिन्नाप्सु मज्जन्ति जन्तवः ।
न वातजं भयं किञ्चिन्नापि ज्वरकृतं तथा ॥९२॥
अन्वयः-(राम-राज्ये) किञ्चिद् अग्निजं
भयं न ( भविष्यति), जन्तवः च अप्सु न मज्जन्ति, किञ्चिद् वातजंभयं न ( भविष्यति), तथा
ज्वर-कृतम् अपि किञ्चिद् भयं न (भविष्यति) ।
हिन्दी शब्दार्थ - रामराज्य में। किञ्चिद् = थोड़ा भी।अग्निजम् = अग्नि से उत्पन्न । भयम् = डर । न = नहीं ( होगा) ।अप्सु= जल में। जन्तवः = प्राणिमात्र । न मज्जन्ति
= नहीं डूबते हैं । किञ्चित्= थोड़ा भी। वातजम् = वातरोग से उत्पन्न या तीव्र झञ्झावातादि से
उत्पन्न । भयम् = डर। न = नहीं (होगा)। तथा = उसी प्रकार ।ज्वर-कृतम् = ज्वर आदि शारीरिक रोगों से उत्पन्न । ज्वर शब्द रोगमात्र का
उपलक्षण है। अपि किञ्चित् =थोड़ा भी। भयं= डर। न = नहीं (होगा)।
हिन्दी भावार्थ -(राम-राज्य में) अग्नि से
उत्पन्न होने वाला कोई भी भय नहीं रहेगा, कोई भी प्राणी
(उत्पीडित होने पर या दैव-वशात्) पानी में नहीं डूबेंगे, वायु (रोग या प्रचण्ड झञ्झावात) से उत्पन्न तथा ज्वर आदि रोगों से उत्पन्न
थोड़ा भी भय नहीं रहेगा।
टिप्पणी-रामराज्य में न तो प्राकृतिक रूप से एकाएक कहीं आग लगने का भय था, न ही विद्वेष के कारण कोई दुष्ट व्यक्ति किसी के घर, खलिहान आदि में ही आग लगाता रहा। इसी तरह जल, बात
बादि से उत्पन्न भय के प्रसंग में भी प्राकृतिक तथा विद्वेष-कृत भय का तात्पर्य
समझना चाहिए। संकेत पच- राम राज्य में सारा देश भूख, प्यास
की ज्वाला से रहित तथा सतयुग की भाँति धनधान्य सम्पन्न रहेगा ।
मज्जन्ति क्रिया पद का प्रयोग निकटतम समय में घटनाओं की सम्भावना रहने पर (भविष्यत् काल में भी) वर्तमान काल की क्रिया (लट् लकार) का प्रयोग व्याकरण-सम्मत ही है- 'वर्तमान सामीप्ये वर्तमानवद् वा' (पा० सू० ३/३/३१) ।
न चापि क्षुद्भयं तत्र न तस्करभयं तथा ।
नगराणि च राष्ट्राणि धनधान्ययुतानि च ॥९३॥
नित्यं प्रमुदिताः सर्वे यथा कृतयुगे तथा ।
अन्वयः-तत्र क्षुद्भयं न (भविष्यति) तथा तस्करभयम् अपि चन (भविष्यति), नगराणि राष्ट्राणि च धन-धान्य-युतानि च (भविष्यन्ति), यथा सर्वे कृतयुगे नित्यं प्रमुदिता
(आसन्), तथा (रामराज्येऽपि सर्वे नित्यं प्रमुदिता
भविष्यन्ति) ।
शब्दार्थ -तत्रक्षुद्भयं = क्षुधाभीतिः । न = नैव (भविष्यति)। तथा = तद्वत्। तस्करभयम् = चौरभीतिः । च= अपि । न = न (भविष्यति)। नगराणि = पुराणि । राष्ट्राणि च =जनपदाश्च। धनधान्ययुतानि च = वित्तशस्यसम्पन्नानि च (भविष्यति)। यथा = येन प्रकारेण । सर्वे= समस्ताः जनाः। कृतयुगे = सत्ययुगे । नित्यं प्रमुदिताः= अहर्निशं प्रसन्नचित्ताः आसन्। तथा = तेनैव प्रकारेण त्रेतायामपि सर्वे जनाः। नित्यम् = निरन्तरम् । प्रमुदिताः = हर्षान्विताः (भविष्यन्ति)।
हिन्दी शब्दार्थ -तत्र = वहाँ, उस रामराज्य में । क्षुद्भयम् = भूख का डर । न = नहीं होगा। तथा = उसी तरह । तस्करभयम् = चोरों से उत्पन्न डर। च= और । न = नहीं (होगा) । नगराणि = शहर। राष्ट्राणि च = और राज्यों के मुख्यालय, = राजाओं की राजधानी वाले
नगर (सारे शासन-क्षेत्र ) । धन = रत्नादि । धान्ययुतानि च = अनाज आदि से परिपूर्ण (होगा)। यथा = जैसे। सर्वे = सभी प्राणी ।कृतयुगे = सतयुग में । नित्यं प्रमुदिताः= अहर्निशं प्रसन्नचित्त थे।तथा = वैसे ही। नित्यम् =
हमेशा, सदा । प्रमुदिताः = प्रसन्न-चित्त (रहेंगे) ।
हिन्दी भावार्थ -उस राम-राज्य में लोगों को न भूख
का डर रहेगा और न ही चोरों का भय रहेगा। सारे नगर तथा सारे राष्ट्र (देश के शासन
क्षेत्र) धनराशि तथा अन्रराशि से सम्पन्न रहेंगे। सत्य युग की ही तरह समस्त प्राणी
सदैव आनन्दित रहेंगे।
व्याकरण
(क) सन्धि-
चापि= च + अपि ( दीर्घ सन्धि )।
(ख) समास -
क्षुद्भयम् = क्षुद्भ्यः भयम् (पं० त०) ।
तस्करभयम् = तस्करेभ्यः भयम् (पं० त०) ।
धनधान्य-युतानि = धनानि च धान्यानि च तैः युतानि (द्वन्द्वभित तृतीया तत्पुरूष
) ।
अनुप्रास अलङ्कार है। आदर्श शासन व्यवस्था तथा राष्ट्र-समृद्धि के वर्णन के
कारण 'उदात्त' अलङ्कार है- 'उदात्तं वस्तुनः सम्पत्';
'महतां चोपलक्षणम्' (मम्मट: काव्यप्रकाश १०
उ०) ।
टिप्पणी-उक्त पथ में प्रजाओं की अनुकूल सुख-सम्पत्ति, निर्विघ्न
सुविधाएँ तथा समस्त राष्ट्र की असीम समृद्धि के वर्णन से शासक श्रीराम की
न्याय-प्रियता, निष्पक्षता तथा प्रशासन-पटुता प्रमाणित
होती है ॥
हिन्दी शब्दार्थ -महायशाः = महान् यशस्वी । राघवः =
श्रीरामः । बहु-सुवर्णकैः= पर्याप्त स्वर्णराशियों (की दक्षिणा) से युक्त। अश्वमेध-शतैः
= सैकड़ों अश्वमेध यज्ञों से । इष्ट्वा =यजन करके । विद्वद्भ्यः = विद्वानों को । विधि-पूर्वकम् = सविधि विधान पूर्वक । गवां
कोट्ययुतम् = दस हजार करोड़ (१ खरब) गौओं को (कोटि = करोड़ । अयुत = १० हजार । )। दत्वा = देकर । ब्राह्मणेभ्यः = ब्राह्मणों के लिए।असंख्येयम् = अगणित । धनम् = वित्त। दत्वा = देकर।शतगुणान् = सौ गुने । राजवंशान् = राजाओं के वंशों को । स्थापयिष्यति = स्थापित करेंगे।
अस्मिन् लोके = इस संसार में । चातुर्वण्यम् = चारों वर्गों को । स्वे-स्वे =
अपने-अपने । धर्मे = निर्धारित कर्तव्यों में । नियोक्ष्यति = नियुक्त करेंगे, प्रवृत्त करेंगे ।
हिन्दी भावार्थ -महान् यशस्वी श्रीरामचन्द्र जी
पर्याप्त स्वर्ण-राशियों (की दक्षिणा) से युक्त सैकड़ों अश्वमेध-यज्ञानुष्ठानों
द्वारा देव-यजन करके, (यज्ञ संलग्न तथा अन्य) विद्वानों को
विधिपूर्वक एक खरब गौओं का दान देकर तथा ब्राह्मणों को अपरिमित धनराशि देकर सौगुने
राज-कुलों को (शासन-सोविध्य के लिए) संस्थापित करेंगे और चारों वर्णों (की प्रजाओं)
को अपने-अपने (निर्धारित) कर्तव्य-कलापों में प्रवृत्त करेंगे।
बहुत-सी क्रियाएँ एक कर्तृक हैं, अतः समुच्चय तथा तुल्ययोगिता अलङ्कार है । अखण्ड ऐश्वर्य, दान कौशल तथा प्रतापातिरेक के कारण 'उदात्त' अलङ्कार हैं। भाविक एवम् अनुप्रास का भी सौरभ है।
(ख) रस -धर्म-वीर, दानवीर, दयावीर रस द्योतित हैं। (दशरूपक के अनुसार) ।
टिप्पणी-लोक-शिक्षा तथा आदर्श राज्य व्यवस्था के द्वारा परवर्ती नरेशों में
कर्तव्य बुद्धि को जागृत करने की दृष्टि से श्रीराम के द्वारा किये गये सैकड़ों
राजकुलों की स्थापना तथा वर्णाश्रम धर्मो का प्रवर्तन प्रशंसनीय हैं। सैकड़ों
यज्ञों में इन्द्र की सहिष्णुता तथा विरोध-शून्यता भी ध्यातव्य है- विष्णु के
वामना वतार में इन्द्र अग्रज हो चुके हैं तथा विष्णु = राम उपेन्द्र हैं। अतः
इन्द्र का विघ्नोपस्थापन अनुचित होने के कारण, राम के
सैकड़ों यज्ञ निर्विघ्न सविधि सम्पन्न हो गये, इन्द्र
शान्त तथा प्रसन्न बने रहे।
दशवर्षसहस्राणि दशवर्षशतानि च ।
रामो राज्यमुपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ॥९७॥
अन्वयः-रामः दश-वर्ष-सहस्राणि दश-वर्ष-शतानि च राज्यम् उपासित्वा ब्रह्मलोकं प्रयास्यति ।
हिन्दी शब्दार्थ -राम: = श्रीराम जी ।
दशवर्ष-सहस्राणि = दस हजार वर्षों तक । दशवर्ष-शतानि च = और दस सौ अर्थात् १ हजार
वर्षों तक। दोनों मिलाकर कुल ११ हजार वर्षों तक । राज्यम् = भू-मण्डल के राज्य का उपासित्वा =
सेवन करके, परिपालन करके
। ब्रह्मलोकम् = परब्रह्म-धाम की ओर। प्रयास्यति = प्रयाण करेंगे, चले जाएँगे ।
हिन्दी भावार्थ - (इस तरह प्रजा-वर्ग को आनन्दित
करते हुए) श्रीराम जी ग्यारह हजार वर्षों तक (भूमण्डल पर ) राज्य करके
परब्रह्म-धाम की ओर (स्या) प्रस्थान करेंगे।
व्याकरण
(क) कारक-कालाध्वनो- ' के नियमानुसारदशवर्ष-सहस्राणि' तथा 'दशवर्षशतानि' में द्वितीया हुई है।
(ख) समास -
दशवर्ष-सहस्राणि= दश च तानि वर्षाणि तेषां सहस्राणि = तानि (द्वितीया, नपुंसकलिंग) ।
दशवर्षशतानि = दश व तानि वर्षाणि तेषां शतानि, तानि (द्वितीया,नपुंसकलिंग )
उपासित्वा= उप + √आस् (उपवेशने अदादि) + क्त्वा। यहाँ 'उप' उपसर्ग के
कारण क्त्वाके स्थान पर 'ल्यप्' होना चाहिए, पर आर्ष काव्य होने के कारण 'ल्यप्' नहीं हुआ है।
प्रयास्यति= प्र + √या + लृट् (प्रथम, पु० ए०)।
(क) अलंकार-अनुप्रास, अतिशयोक्ति तथा
उदात्त अलंकार है।
(ख) रस -शान्त रस है। अमानुषोचित आयु का
वर्णन होने से अद्भुत रस भी है।
टिप्पणी-धीराम के विष्णु अवतार होने के कारण तथा बिगड़ी हुई विलास विकृत राज्य
व्यवस्था को मर्यादित बनाने में समयाधिक्य की अपेक्षा होने के कारण एकादश सहस्र
(११ हजार) वर्षों तक उनका शासन-काल आश्चर्यजनक होने पर भी असम्भव नहीं लगता है।
इदं पवित्रं पापघ्नं पुण्यं वेदैश्च सम्मितम् ।
यः पठेद्रामचरित्रं सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥९८॥
अन्वयः-यःपवित्रं पापघ्नं पुण्यंवेदैः च सम्मितम्इदंरामचरितंपठेद्
(सः) सर्व-पापैः प्रमुच्यते ।
हिन्दी शब्दार्थ -यः = जो (मानव) । पवित्रम् = निर्मल । पापघ्नं = पाप-विनाशक । पुण्यम् = पुण्यमय ।वेदैः सम्मितम् = वेदों के समान ।इदम् = इस । रामचरितम् = श्रीराम की कथा को । पठेत् = पढ़े। सः = वह । सर्व- पापैः = समस्त पापों से । प्रमुच्यते = विमुक्त
हो जाता है।
हिन्दी भावार्थ -जो व्यक्ति वेदों के समान निर्मल, पाप-विनाशक तथा पुण्य मय इस राम-कथा को पढ़े, वह
समस्त पापों से मुक्त हो जाता है अर्थात् वह भी पवित्र हो जाता है।
व्याकरण
(क) कारक-'वेदैः सम्मितम्' में 'तुल्यार्थेरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतस्याम्' इस सूत्र से 'वेदै:' में तृतीया हुई।
वेद - 'श्रुतिः स्त्री
वेद आम्नाय' इत्यमरः (१।६।३) ।
टिप्पणी-वाल्मीकीय रामायण ही लौकिक संस्कृत साहित्य का आदि-काव्य है। इसके पूर्व
तो वैदिक संस्कृत-बद्ध रचनायें ही रहीं। फलतः 'वेदों के
समान' कहने से लोगों में रामायण के प्रति भी वेदवत्
समादर-भाव जागृत करना ही उद्देश्य है। 'वेदैः सम्मितम्';
'पवित्रम्, 'पापघ्नम्' तथा 'पुण्यम् लगभग समानार्थी शब्द हैं। इन शब्दों से
रामायण की अति पवित्रता कही गयी है।
हिन्दी शब्दार्थ - एतत् = इस । आयुष्यम्= आयु बढ़ाने वाले । रामायणम् आख्यानम् = रामायण की कथा
को । पठन् = पढ़ता हुआ, पढ़ने वाला ।
नरः = मनुष्य । प्रेत्य = मरने पर। स-पुत्र-पौत्र:= पुत्रों तथा पौत्रों के साथ । सगणः = अन्य अनुचरगणों के साथ । स्वर्गे = स्वर्ग लोक में । महीयते = पूजित होता
है, सम्मानित होता है ।
हिन्दी भावार्थ -इस आयुर्वर्धक रामायण कथा को
पढ़ने वाला मनुष्य मृत्यु के बाद पुत्रों एवं पौतों के साथ तथा अन्य अनुचरगणों के
साथ स्वर्ग-लोक में सम्मानित होता है ।
टिप्पणी-आयुर्वधक तथा स्वर्ग-प्रद होने के कारण रामायण-काव्य की वेद तुल्यता तथा
अलोकिता स्वतः प्रस्फुटित होती है। लोगों को रामायण के प्रति आकर्षित, आवर्जित करने में समर्थ यह उक्ति एक 'प्ररोचना' है।
भावार्थ:- ब्राह्मणः यदि इदं रामायणं पठेत्
तदा सः वाग्मी भवेत्, क्षत्रियो यदि एतत् रामायणं पठेत् तदा सः साम्राज्यं प्राप्नुयात्, वैश्यः यदि पठेत् चेत् तदा सः व्यापारे
बहुवित्तं प्राप्नुयात् शूद्रः जनश्च यदि इदं रामायणं पठेत् तदा सः खलु सर्वत्र
सम्मानं प्राप्नुयात्।
हिन्दी शब्दार्थ -पठन् = पढ़ता हुआ । द्विजः = ब्राह्मण । वागृषभत्वम् = वाणी में उत्कृष्टता को, वाक्पटुता को । ईयात् = प्राप्त हो, प्राप्त करे। स्यात् = यदि हो । क्षत्रियः = क्षत्रिय। भूमिपतित्वम् = भूपतित्व, भू-स्वामित्व । ईयात् = प्राप्त हो, प्राप्त करे। वणिग्जनः =
वैश्य-जन । पण्य-फलत्वम् = व्यापार-फल (आय) । ईयात् = प्राप्त करे। शूद्रः जनः = चतुर्थ वर्ण वाले शूद्र जन। च अपि = भी निश्चय ही।महत्त्वम् = बड़प्पन, गौरव । ईयात् = प्राप्त करे।
हिन्दी भावार्थ -रामायण को पढ़ता हुआ ब्राह्मण
वाक्पटुता को प्राप्त करे, यदि इसे पढ़ने वाला क्षत्रिय
हो तो वह भू-पतित्व (राज्य-सुख या भू-स्वामित्व) प्राप्त करें । रामायण को पढ़ता हुआ
वैश्य-जन व्यापार- फल ( लाभ) को प्राप्त करे तथा रामायण पढ़ने वाला शूद्र व्यक्ति
भी (सामाजिक) गौरव प्राप्त करे।
पण - 'पणो द्यूतादिषूत्सृष्टे भृतौ मूल्ये धनेऽपि च' इत्यमरः ।
टिप्पणी-भगवान् राम चातुर्वर्ण्य के जनक और व्यवस्थापक दोनों हैं। ऋग्वेद के
पुरुष-सूक्त के मन्त्र 'ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीत्' इत्यादि के अनुसार परमेश्वर के मुख, बाहुयुगल, ऊरु-युगल तथा पाद-युगल से क्रमशः ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र उद्भूत हुए। इसी वैदिक सत्य का अनुस्मरण गीता में कृष्ण
ने कहा है-, 'चातुर्वर्ण्यं मया
सृष्टं गुणकर्म-विभागशः ।' उसी परमेश्वर के
अवतार-स्वरूप श्रीराम अपने प्रशासन काल में चारों वर्णों के नियत कर्तव्य-कलापों
के पालक, प्रेरक, अनुमोदक, प्रोत्साहक तथा प्रवर्तक थे । अतः उनकी हृदय-ताप-हारिणी
श्रुति-सुधा-वर्षिणी अभिराम राम कथा यदि चारों वर्णों के लिए फलप्रद है ! वेदों का पारायण, अध्ययन-मनन-पाठन-वाचन भले ही कतिपय जनों के लिए दुष्कर, दुर्लभ रहा है— पर वेद-तुल्य तथा वेद की
दुरूहता से दूर सुललित, सर्व सुगम, सर्वजन-ग्राह्य यह लोकप्रिय रामायण तो चातुर्वर्ण्य-चित्त-चन्द्रिका है, जो सञ्चित लोक-सन्ताप के प्रगाढ निगूढ ध्वान्त-पटल का निवारण कर ज्ञान का
सुखद आलोक बिखेरती है । अन्तिम पद्य की फल-श्रुति यही मङ्गलमयी आशंसा करती है 'सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद् दुःखभाग् भवेत् । धर्मों के अनुकूल फल को देखते हुए वैश्यों के लिए 'पुण्य' के स्थान पर 'पण्य' का प्रयोग तर्क-संगत है ।
यह मूलरामायणम् वाल्मीकिरामायणम् के बालकाण्ड का प्रथम सर्ग है।
दण्डि के अनुसार काव्य तथा सर्ग का लक्षण-
नगरार्णवशैलर्तुचन्द्रार्कोदयवर्णनैः ।
उद्यानसलिलक्रीडामधुपानरतोत्सवैः ।।
विप्रलम्भैर्विवाहैश्च कुमारोदयवर्णनैः।
मन्त्रद्यूतप्रयाणाजिनायकाभ्युदयैरपि।।
अलङ्कृतिमसंक्षिप्तं रसभावनिरन्तरम्।
सगैरनतिविस्तीर्णैः श्राव्यवृत्तैः सुसन्धिभिः ।।
सर्वत्र भिन्नवृत्तान्तैरुपेतं लोकरञ्जनम्।
काव्यं कल्पान्तरस्थायि जायते सदलङ्कृतिः ॥
काव्यादर्श
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये बालकाण्डे सङ्क्षिप्तरामायणं
नाम प्रथमः सर्गः