बुधवार, 26 सितंबर 2018

लघुसिद्धान्तकौमुदी (भ्वादिगणः)

तिङन्त प्रकरण पढ़ने से पूर्व इत्संज्ञा,लोप, सूत्रों एवं नियमों की पुनरावृत्ति करें।
संज्ञा सूत्र
सुप्तिङन्तं पदम्
सुबन्त और तिङन्त की पद संज्ञा होती है।
इत् संज्ञा करने वाले सूत्र
1. उपदेशेऽजनुनासिक इत् - उपदेशावस्था में जो अनुनासिक अच् होता है उसकी इत् संज्ञा होती है।
अनुनासिक का अर्थ तो होता है ऐसा स्वर, जिसे नासिका से बोला जाये अथवा जिसके ऊपर -ँ ऐसा चिन्ह लगा हो, परन्तु धातुपाठ में तो ऐसे धातु मिलते नहीं हैं, जिन पर अनुनासिक का चिह्न लगा हो, तो यहाँ हमें परम्परा का ही आश्रय लेना पड़ता है। हमें जिनकी इत् संज्ञाकरना है, उनके अनुनासिकत्व की कल्पना करनी पड़ती है, अर्थात् बाधृ को हम बाधृँ ऐसा मान लेते हैं, तब उस अनुनासिक ऋ की, ‘इत् संज्ञाहम करते हैं। इसी प्रकार गम्लृँ में लृ की, मदी में की, गुपू में ऊ, कटे में ए की, वदि में की इत् संज्ञा हम करते हैं।
2. हलन्त्यम् - उपदेशावस्था में जो अन्तिम हल् (व्यञ्जन ), उसकी इत् संज्ञा होती है। जैसे - षप्प्रत्यय में प्की, ‘ष्नम्प्रत्यय में म्की, ‘णिच्प्रत्यय में च्की, इत् संज्ञा होती है।
इर इत्संज्ञा वाच्या - धातुओं में रहने वाले इर् की इत् संज्ञा होती है। यथा - भिदिर्’ ‘छिदिर्’, विजिर्’ ‘निजिर्में इर्है। इसकी इत् संज्ञा, इस वार्तिक से होती है।
3. न विभक्तौ तुस्माः - विभक्ति में स्थित तवर्ग, सकार तथा मकार की इत् संज्ञा नहीं होती है। ध्यान दीजिये कि आपने जो तिङ् प्रत्ययपढ़े हैं, उनका नाम विभक्तिहै। इनके अलावा सुप् प्रत्ययभी विभक्ति हैं। जिनका नाम विभक्तिहै, ऐसे प्रत्ययों के अन्त में यदि तवर्ग = त्, थ्, द्, ध्, न् अथवा स्, म् हों, तो हलन्त्यम् सूत्र से उनकी इत् संज्ञा नहीं होती है। अतः तस्, थस् आदि के स् की इत् संज्ञा न होकर इसे विसर्ग हो जाता है।
4. आदिर्ञिटुडवः - उपदेश के आदि में स्थित ´ञि, टु, तथा डु की इत् संज्ञा होती है। कुछ उदाहरण देखिये। ´ञिमदा - मिद् / टुनदि - नद् / डुकष्´- कष् आदि।
उपदेश - उपदेश का अर्थ होता है - आद्योच्चारण। अर्थात् आचार्य ने धातु प्रत्यय आदि को मूलतः जिस भी रूप में पढ़ा है, वही उपदेश है। जैसे कष् धातु की उपदेशावस्था है - डुकष्´। मिद् धातु की उपदेशावस्था है - ´ञिमिदा।
इस ब्लॉग पर धातुपाठ दिया गया है, वह पाणिनि कृत मूल धातुपाठ है। उसे ही आप धातुओं की उपदेशावस्था समझिये। उन्हें पढ़ते जाइये तथा इन तीन सूत्रों से उनके अनुबन्धों की इत् संज्ञा करते जाइये। हमने अनुबन्धों की इत् संज्ञा करके शुद्ध निरनुबन्ध धातु दे दिया है, उससे मिलाकर देखिये कि क्या आपका इत् संज्ञा करने का कार्य ठीक हो रहा है या नहीं ?
आगे कहे जाने वाले तीन सूत्र धातुओं में नहीं लगेंगे। केवल प्रत्ययों में लगेंगे।
5. शः प्रत्ययस्य - प्रत्ययके आदि में स्थित श्की इत् संज्ञा होती है। प्रत्ययस्ययह शब्द इस सू़त्र में है, अतः यह सूत्र तथा इसके आगे के सूत्र केवल प्रत्ययों में लगेंगे, धातुओं में नहीं।
अतः शाकन्, ष्वुन्, ष्वु´् आदि प्रत्ययोंके आदि षकारकी इत् संज्ञा यह सूत्र करेगा किन्तु ध्यान रहे कि ष्वद, ष्ठिवु आदि धातुओंके षकारकी इत् संज्ञा इससे कभी नहीं होगी, क्योंकि यह सूत्र केवल प्रत्ययों के आदि षकार की ही इत् संज्ञा करता है। धातुओं में यह नहीं लगता है।
6. चुटू - प्रत्ययों के आदि में स्थित चु अर्थात् चवर्ग (च्, छ्, ज्, झ्, ´्) की तथा टु अर्थात् टवर्ग (ट्, , ड्, ढ्, ण्) की इत् संज्ञा होती है। जैसे -जस्प्रत्यय के आदि में जो ज्है, यह चवर्ग है, ‘टाप्रत्यय के आदि में जो ट्है यह टवर्ग है, इनकी इत् संज्ञा इस सूत्र से हो जायेगी तो जस् में बचेगा अस् और टा में बचेगा आ। यह सूत्र भी केवल प्रत्ययों के लिये है।
7. लशक्वतद्धिते - तद्धित से भिन्न प्रत्ययों के आदि में स्थित ल्, ष् तथा कवर्ग (क्, ख्, ग्, घ्, ङ्) की इत् संज्ञा होती है। जैसे- षप्, ष्यन्, ष्ना, शानच्, षतष् ये प्रत्यय हैं। इनके आदि में ष् है। इस सूत्र से इस ष्की इत् संज्ञा कीजिये। प्रत्यय के आदि में स्थित कवर्ग की भी इत् संज्ञा कीजिये। जैसे - क्तमें क्की, ‘ख्युन्में ख्की, ‘ग्स्नुमें ग्की, ‘ङस्में ङ्की आदि।
और भी कुछ उदाहरण देखिये - ख्युन् = यु / ग्स्नु = स्नु / ष्नम् = न / षतष् = अत् / क्त्वा = त्वा / ष्ना = ना / चानष् = आन / श = अ / शानन् = आन / घ´् = अ / षतष् = अत् / ल्युट् = यु आदि।
ध्यान रहे कि केवल यही एक ऐसा सूत्र है, जो तद्धित प्रत्ययों में नहीं लगता। इस प्रकार 6 सूत्र तो सभी प्रत्ययों के लिये है किन्तु यह सूत्र तद्धित प्रत्ययों को छोड़कर शेष प्रत्ययों के लिये ही है।
8. तस्य लोपः - ऊपर कहे गये सात सूत्रों से जिनकी भी इत् संज्ञाहोती है, उन सभी का लोप हो जाता है।
विशेष - इन 8 सूत्रों को सदा स्मरण में रखें। इनमें से 6 सूत्र इत्संज्ञा करते है। एक सूत्र (न विभक्तौ तुस्माः) इत् संज्ञा का निषेध करता है तथा एक सूत्र (तस्य लोपः) जिनकी इत् संज्ञा होती है उन इत्संज्ञकों का लोप करता है।
जो सू़त्र नाम (संज्ञा) करते हैं, वे संज्ञा सूत्र कहलाते हैं तथा जो सूत्र कुछ काम (विधान) करते हैं, वे विधिसूत्र कहलाते हैं। जो सूत्र विधिसूत्रों की गति में कहीं कहीं रोक लगा देते हैं, वे निषेध सूत्र कहलाते हैं।
इस प्रकार तस्य लोपःसूत्र तो लोप करने का काम कर रहा है, अतः यह विधिसूत्रहुआ और अन्य सभी सूत्र इत् संज्ञा करने के कारण संज्ञा सूत्रकहलाये। न विभक्तौ तुस्माःनिषेध करने के कारण निषेध सूत्र कहलाया। इत्संत्र तथा लोप इन दोनों कार्यों को अनुबन्ध लोप भी कहा जाता है।
इन सूत्रों के सहारे से धातुओं तथा प्रत्ययों के अनुबन्धों की इत् संज्ञा करके शुद्ध धातु तथा शुद्ध प्रत्यय बना लिया जाता है। 
          अनुबन्ध लोप के बाद भी यह ध्यान रखना चाहिये कि जिनमें क्की इत् संज्ञा हुई है, वे प्रत्यय कित् कहलाते हैं। जिनमें ङ्भी इत् संज्ञा हुई है, वे ङित् कहलाते हैं। जिनमें ष्की इत् संज्ञा हुई है, वे षित् कहलाते हैं। इसी प्रकार  ‘ण्की इत् संज्ञा से णित्, आदि, ऐसे प्रत्ययों के नाम जानना चाहिये।
इसी प्रकार धातुओं को भी जानना चाहिये कि ञिमिदा, ञिष्विदा आदि धातुओं में की इत् संज्ञा हुई है, अतः ये धातु आदित् कहलायेंगे। वदि, मदि, भदि आदि में की इत् संज्ञा होती है, अतः ये धातु इदित् कहलायेंगे। मदी जैसे ईकारान्त में की इत् संज्ञा होती है, अतः ये धातु ईदित् कहलायेंगे। इसी प्रकार गाहू, गुपू आदि ऊदित् कहलायेंगे। कटे, चते आदि एदित् कहलायेंगे।

इस प्रकार से जिस भी अनुबन्ध की आप इत् संज्ञा करें, उसी इत् के नाम से उस धातु को विशेषित करके, उसका नाम स्मरण रखें। इसकी आवश्यकता आगे पड़ेगी।
                                                   अथ तिङन्‍ते भ्‍वादयः

लट्, लिट्, लुट्, लृट्, लेट्, लोट्, लङ्, लिङ्, लुङ्, लृङ् । एषु पञ्चमो लकारश्‍छन्‍दोमात्रगोचरः ।।
३७५ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्‍यः
लकाराः सकर्मकेभ्‍यः कर्मणि कर्तरि च स्‍युरकर्मकेभ्‍यो भावे कर्तरि च ।।
लकार सकर्मक धातु से कर्म और कर्ता में तथा अकर्मक धातु से भाव और कर्म में हो।
३७६ वर्तमाने लट्
वर्तमान क्रिया वृत्तेर्धातोर्लट् स्‍यात् । अटावितौ । उच्‍चारण सामर्थ्याल्लस्‍य नेत्‍वम् । भू सत्तायाम् ।। १ ।।              कर्तृ विवक्षायां भू ल् इति स्‍थिते
वर्तमान क्रिया को कहने वाले धातु से लट् लकार हो। लट् का ट् तथा अ इत्संज्ञक हैं। उच्‍चारण सामर्थ्य से ल् की इत्संज्ञा नहीं होती है। भू का अर्थ है- सत्ता (होना) कर्ता की विवक्षा में लट् का ल् रहकर भू ल् हुआ।
३७७ तिप्‍तस्‍झिसिप्‍थस्‍थमिब्‍वस्‍मस्‍ताताञ्झथासाथाम्‍ध्‍वमिड्वहिमहिङ्
एतेऽष्‍टादश लादेशाः स्‍युः ।।
लकार के स्थान पर तिप्, तस्, झि सिप् , थस्, थ मिप् , वस्, मस् त, आताम्, झ थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महिङ् ये अट्ठारह आदेश हो।
३७८ लः परस्‍मैपदम्
लादेशाः परस्‍मैपद संज्ञाः स्‍युः ।।
लकार के स्थान पर हुए तिप् आदि आदेश की परस्मैपद संज्ञा हो।
३७९ तङानावात्‍मनेपदम्
तङ् प्रत्‍याहारः शानच्‍कानचौ चैतत्‍संज्ञाः स्‍युः । पूर्व संज्ञाऽपवादः ।।

तङ् प्रत्याहार, शानच् और कानच् की आत्मनेपद संज्ञा हो। सूत्र में पठित आन पद से शानच् और कानच् प्रत्ययों का भी ग्रहण होता है। यह पूर्व लः परस्मैपदम् सूत्र का अपवाद है । उक्त सूत्र लकार मात्र की परस्मैपद संज्ञा करता है, अतः उसे बाधकर आत्मनेपद का विधान किया गया है।
३८० अनुदात्तङित आत्‍मनेपदम्
अनुदात्तेतो ङितश्‍च धातोरात्‍मनेपदं स्‍यात् ।।

अनुदात्तेत् तथा ङित् धातु आत्मनेपदसंज्ञक हो। एध धातु का अकार अनुदात्त है तथा इसकी इत्संज्ञा हो जाती है। यह धातु अनुदात्तेत् है। स्वर सहित धातुपाठ से अनुदात्तेत् धातुओं का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। जिन धातुओं के साथ ङ् अनुबन्ध लगा है, वह ङित् होगा।
३८१ स्‍वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले
स्‍वरितेतो ञितश्‍च धातोरात्‍मनेपदं स्‍यात्‍कर्तृगामिनि क्रियाफले ।।
३८२ शेषात्‍कर्तरि परस्‍मैपदम्
आत्‍मनेपद निमित्त हीनाद्धातोः कर्तरि परस्‍मैपदं स्‍यात् ।।
३८३ तिङस्‍त्रीणि त्रीणि प्रथममध्‍यमोत्तमाः
तिङ उभयोः पदयोस्‍त्रिकाः क्रमादेतत्‍संज्ञाः स्‍युः ।।
३८४ तान्‍येकवचनद्विवचनबहुवचनान्‍येकशः
लब्‍धप्रथमादि संज्ञानि तिङस्‍त्रीणि त्रीणि प्रत्‍येकमेकवचनादि संज्ञानि स्‍युः ।।
३८५ युष्‍मद्युपपदे समानाधिकरणे स्‍थानिन्‍यपि मध्‍यमः
तिङ्वाच्‍यकारकवाचिनि युष्‍मदि प्रयुज्‍यमानेऽप्रयुज्‍यमाने च मध्‍यमः ।।
३८६ अस्‍मद्युत्तमः
तथाभूतेऽस्‍मद्युत्तमः ।।
३८७ शेषे प्रथमः
मध्‍यमोत्तमयोरविषये प्रथमः स्‍यात् । भू ति इति जाते ।।
३८८ तिङ्शित्‍सार्वधातुकम्
तिङः शितश्‍च धात्‍वधिकारोक्ता एतत्‍संज्ञाः स्‍युः ।।
३८९ कर्तरि शप्
कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे धातोः शप् ।।
३९० सार्वधातुकार्धधातुकयोः
अनयोः परयोरिगन्‍ताङ्गस्‍य गुणः । अवादेशः । भवति । भवतः ।।
३९१ झोऽन्‍तः
प्रत्‍ययावयवस्‍य झस्‍यान्‍तादेशः । अतो गुणे । भवन्‍ति । भवसि । भवथः । भवथ ।।
३९२ अतो दीर्घो यञि
अतोऽङ्गस्‍य दीर्घो यञादौ सार्वधातुके । भवामि । भवावः । भवामः । स भवति । तौ भवतः । ते भवन्‍ति । त्‍वं भवसि । युवां भवथः । यूयं भवथ । अहं भवामि । आवां भवावः । वयं भवामः ।।
३९३ परोक्षे लिट्
भूतानद्यतन परोक्षार्थवृत्ते र्धातोर्लिट् स्‍यात् । लस्‍य तिबादयः ।
३९४ परस्‍मैपदानां णलतुसुस्‍थलथुसणल्‍वमाः
लिटस्‍तिबादीनां नवानां णलादयः स्‍युः । भू अ इति स्‍थिते
३९५ भुवो वुग्‍लुङि्लटोः
भुवो वुगागमः स्‍यात् लुङि्लटोरचि ।।
३९६ लिटि धातोरनभ्‍यासस्‍य
लिटि परेऽनभ्‍यासधात्‍ववयस्‍यैकाचः प्रथमस्‍य द्वे स्‍त आदिभूतादचः परस्‍य तु द्वितीयस्‍य । भूव् भूव् अ इति स्‍थिते
३९७ पूर्वोऽभ्‍यासः
अत्र ये द्वे विहिते तयोः पूर्वोऽभ्‍याससंज्ञः स्‍यात् ।।
३९८ हलादिः शेषः
अभ्‍यासस्‍यादिर्हल् शिष्‍यते अन्‍ये हलो लुप्‍यन्‍ते । इति वलोपः ।।
३९९ ह्रस्‍वः
अभ्‍यासत्‍याचो ह्रस्‍वः स्‍यात् ।।
४०० भवतेरः
भवतेरभ्‍यासोकारस्‍य अः स्‍याल्‍लिटि ।।
४०१ अभ्‍यासे चर्च
अभ्‍यासे झलां चरः स्‍युर्जशश्‍च । झशां जशः खयां चर इति विवेकः । बभूव । बभुवतुः । बभूवुः ।।
४०२ लिट् च
लिडादेशस्‍तिङ्ङार्धधातुकसंज्ञः ।।
४०३ आर्धधातुकस्‍येड्वलादेः
वलादेरार्धधातुरस्‍येडागमः स्‍यात् । बभूविथ । बभूवथुः । बभूव । बभूव । बभूविव । बभूविम ।
४०४ अनद्यतने लुट्
भविष्‍यत्‍यनद्यतनेऽर्थे धातोर्लुट् स्‍यात् ।।
४०५ स्‍यतासी लृलुटोः
धातोः स्‍य तासि एतौ प्रत्‍ययौ स्‍तो लृलुटोः परतः । शबाद्यपवादः । लृ इति लृङ्लृटोर्ग्रहणम् ।
४०६ आर्धधातुकं शेषः
तिङि्शद्भ्‍योऽन्‍यो धातोरिति विहितः प्रत्‍यय एतत्‍संज्ञः स्‍यात् । इट् ।।
४०७ लुटः प्रथमस्‍य डारौरसः
डा रौ रस् एते क्रमात्‍स्‍युः । डित्‍वसामथ्‍र्यादभस्‍यापि टेर्लोपः । भविता ।।
४०८ तासस्‍त्‍योर्लोपः
तासेरस्‍तेश्‍च सस्‍य लोपस्‍स्‍यात् सादौ प्रत्‍यये परे ।
४०९ रि च
रादौ प्रत्‍यये तथा । भवितारौ । भवितारः । भवितासि । भवितास्‍थः । भवितास्‍थ । भवितास्‍मि । भवितास्‍वः । भवितास्‍मः।
४१० लृट् शेषे च
भविष्‍यदर्थाद्धातोर्लृट् क्रियार्थायां क्रियायां सत्‍यामसत्‍यां वा । स् य इट् । भविष्‍यति । भविष्‍यतः । भविष्‍यन्‍ति । भविष्‍यसि । भविष्‍यथः । भविष्‍यथ । भविष्‍यामि । भविष्‍यावः । भविष्‍यामः।
४११ लोट् च
विध्‍याद्यर्थेषु धातोर्लोट् ।।
विधि निमंत्रण आमंत्रण अधीष्ट सम्प्रश्न एवं प्रार्थना अर्थ में धातु से लोट् लकार हो।
४१२ आशिषि लिङ्लोटौ
आशीर्वाद अर्थ में धातु से लिङ् और लोट् लकार हो।
४१३ एरुः
लोट इकारस्‍य उः । भवतु ।।
लोट् लकार से सम्बन्धित इकार के स्थान पर उकार आदेश हो।
४१४ तुह्‍योस्‍तातङ्ङाशिष्‍यन्‍यतरस्‍याम्
आशिषि तुह्‍योस्‍तातङ् वा । परत्‍वात्‍सर्वादेशः । भवतात् ।।
आशीर्वाद अर्थ में तु और हि के स्थान पर तातङ् आदेश हो विकल्प से
४१५ लोटो लङ्वत्
लोटस्‍तामादयस्‍सलोपश्‍च ।।
लोट् लकार लङ् लकार के समान हो।
४१६ तस्‍थस्‍थमिपां तान्तन्तामः
ङितश्‍चतुर्णां तामादयः क्रमात्‍स्‍युः । भवताम् । भवन्‍तु ।।
ङित् लकारों के स्थान पर हुए तस् थस् थ और मिप् के स्थान क्रमशः ताम् तम् त और अम् आदेश होते हैं।
४१७ सेर्ह्यपिच्‍च
लोटः सेर्हिः सोऽपिच्‍च ।।
लोट् के सि को हि आदेश हो। वह हि अपित् हो।
४१८ अतो हेः
अतः परस्‍य हेर्लुक् । भव । भवतात् । भवतम् । भवत ।
अत् से परे हि का लुक् हो।
४१९ मेर्निः
लोटो मेर्निः स्‍यात् ।।
लोट् लकार के मि के स्थान पर नि आदेश हो।
४२० आडुत्तमस्‍य पिच्‍च
लोडुत्तमस्‍याट् स्‍यात् पिच्‍च । हिन्‍योरुत्‍वं न, इकारोच्‍चारण सामर्थ्‍यात् ।।
लोट् लकार के उत्तम पुरुष को आट् का आगम हो औप वह आट् सहित उत्तम पुरुष पित् होता है। हि और नि को उत्व नहीं होता है, उच्चारण सामर्थ्य के कारण।
४२१ ते प्राग्‍धातोः
ते गत्‍युपसर्गसंज्ञा धातोः प्रागेव प्रयोक्तव्‍याः ।।
४२२ आनि लोट्
उपसर्गसिथान्निमित्तात्‍परस्‍य लोडादेशस्‍यानीत्‍यस्‍य नस्‍य णः स्‍यात् । प्रभवाणि ।

(दुरः षत्‍वणत्‍वयोरुपसर्गत्‍वप्रतिषेधो वक्तव्‍यः)। दुःस्‍थितिः । दुर्भवानि। 
(अन्‍तश्‍शब्‍दस्‍याङि्क विधिणत्‍वेषूपसर्गत्‍वं वाच्‍यम्)। अन्‍तर्भवाणि ।।
४२३ नित्‍यं ङितः
सकारान्‍तस्‍य ङिदुत्तमस्‍य नित्‍यं लोपः । अलोऽन्‍त्‍यस्‍येति सलोपः । भवाव । भवाम ।
४२४ अनद्यतने लङ्
अनद्यतन भूतार्थ वृत्ते र्धातो र्लङ् स्‍यात् ।।
४२५ लुङ्लङ्लृङ्क्ष्वडुदात्तः
एष्‍वङ्गस्‍याट् ।।
४२६ इतश्‍च
ङितो लस्‍य परस्‍मैपदमिकारान्‍तं यत्तदन्‍तस्‍य लोपः । अभवत् । अभवताम् । अभवन् । अभवः । अभवतम् । अभवत । अभवम् । अभवाव । अभवाम ।।
४२७ विधिनिमन्‍त्रणामन्‍त्रणाधीष्‍टसंप्रश्‍नप्रार्थनेषु लिङ्
एष्‍वर्थेषु धातोर्लिङ् ।।
४२८ यासुट् परस्‍मैपदेषूदात्तो ङिच्‍च
लिङः परस्‍मैपदानां यासुडागमो ङिच्‍च ।।
४२९ लिङः सलोपोऽनन्‍त्‍यस्‍य
सार्वधातुकलिङोऽनन्‍त्‍यस्‍य सस्‍य लोपः । इति प्राप्‍ते
४३० अतो येयः
अतः परस्‍य सार्वधातुकावयवस्‍य यास् इत्‍यस्‍य इय् । गुणः ।।
४३१ लोपो व्‍योर्वलि
भवेत् । भवेताम् ।
४३२ झेर्जुस्
लिङो झेर्जुस् स्‍यात् । भवेयुः । भवेः । भवेतम् । भवेत । भवेयम् । भवेव । भवेम ।।
४३३ लिङाशिषि
आशिषि लिङस्‍तिङार्धधातुकसंज्ञः स्‍यात् ।।
४३४ किदाशिषि
आशिषि लिङो यासुट् कित् । स्‍कोः संयोगाद्योरिति सलोपः ।।
४३५ क्‍ङिति च
गित्‍किन्‍ङिन्निमित्ते इग्‍लक्षणे गुणवृद्धी न स्‍तः । भूयात् । भूयास्‍ताम् । भूयासुः । भूयाः । भूयास्‍तम् । भूयास्‍त । भूयासम् । भूयास्‍व । भूयास्‍म ।
४३६ लुङ्
भूतार्थे धातोर्लुङ् स्‍यात् ।।
४३७ माङि लुङ्
सर्वलकारापवादः ।।
४३८ स्‍मोत्तरे लङ् च
स्‍मोत्तरे माङि लङ् स्‍याच्‍चाल्‍लुङ् ।।
४३९ च्‍लि लुङि
शबाद्यपवादः ।।
४४० च्‍लेः सिच्
इचावितौ ।।
४४१ गातिस्‍थापाभूभ्‍यः सिचः परस्‍मैपदेषु
एभ्‍यः सिचो लुक् स्‍यात् । गापाविहेणादेशपिबती गृह्‍यते ।।
४४२ भुसुवोस्‍तिङि
भू सू एतयोः सार्वधातुके तिङि परे गुणो न । अभूत् । अभूताम् । अभूवन् । अभूः । अभूतम् । अभूत । अभूवम् । अभूव । अभूम ।
४४३ न माङ्योगे
अडाटौ न स्‍तः । मा भवान् भूत् । मा स्‍म भवत् । मा स्‍म भूत् ।।
४४४ लिङि्नमित्ते लृङ् क्रियातिपत्तौ
हेतुहेतुमद्भावादि लिङि्नमित्तं तत्र भविष्‍यत्‍यर्थे लृङ् स्‍यात् क्रियाया अनिष्‍पत्तौ गम्‍यमानायाम् । अभविष्‍यत् । अभविष्‍यताम् । अभविष्‍यन् । अभविष्‍यः । अभविष्‍यतम् । अभविष्‍यत । अभविष्‍यम् । अभविष्‍याव । अभविष्‍याम । सुवृष्‍टिश्‍चेदभविष्‍यत्तदा सुभिक्षमभविष्‍यत्, इत्‍यादि ज्ञेयम् ।। अत सातत्‍यगमने ।। २ ।। अतति ।।
४४५ अत आदेः
अभ्‍यासस्‍यादेरतो दीर्घः स्‍यात् । आत । आततुः । आतुः । आतिथ । आतथुः । आत । आत । आतिव । आतिम । अतिता । अतिष्‍यति । अततु ।।
४४६ आडजादीनाम्
अजादेरङ्गस्‍याट् लुङ्लङ्लृङ्क्षु । आतत् । अतेत् । अत्‍यात् । अत्‍यास्‍ताम् । लुङि सिचि इडागमे कृते
४४७ अस्‍तिसिचोऽपृक्ते
विद्यमानात् सिचोऽस्‍तेश्‍च परस्‍यापृक्तस्‍य हल ईडागमः ।।
४४८ इट ईटि
इटः परस्‍य सस्‍य लोपः स्‍यादीटि परे । (सिज्‍लोप एकादेशे सिद्धो वाच्‍यः) । आतीत् । आतिष्‍टाम् ।।
४४९ सिजभ्‍यस्‍तविदिभ्‍यश्‍च
सिचोऽभ्‍यस्‍ताद्विदेश्‍च परस्‍य ङित्‍संबन्‍धिनो झेर्जुस् । आतिषुः । आतीः । आतिष्‍टम् । आतिष्‍ट । आतिषम् । आतिष्‍व । आतिष्‍म । आतिष्‍यत् ।। षिध गत्‍याम् ।। ३ ।।
४५० ह्रस्‍वं लघु
४५१ संयोगे गुरु
संयोगे परे ह्रस्‍वं गुरु स्‍यात् ।।
४५२ दीर्घं च
गुरु स्‍यात् ।।
४५३ पुगन्‍तलघूपधस्‍य च
पुगन्‍तस्‍य लघूपधस्‍य चाङ्गस्‍येको गुणः सार्वधातुकार्धधातुकयोः । धात्‍वादेरिति सः । सेधति । षत्‍वम् । सिषेध ।।
४५४ असंयोगाल्‍लिट् कित्
असंयोगात्‍परोऽपिल्‍लिट् कित् स्‍यात् । सिषिधतुः । सिषिधुः । सिषेधिथ । सिषिधथुः । सिषिध । सिषेध । सिषिधिव । सिषिधिम । सेधिता । सेधिष्‍यति । सेधतु । असेधत् । सेधेत् । सिध्‍यात् । असेधीत् । असेधिष्‍यत् । एवम् - चिती संज्ञाने ।। ४ ।। शुच शोके ।। ५ ।। गद व्‍यक्तायां वाचि ।। ६ ।। गदति ।।
४५५ नेर्गदनदपतपदघुमास्‍यतिहन्‍तियातिवातिद्रातिप्‍सातिवपतिवहतिशाम्‍यति चिनोतिदेग्‍धिषु च
उपसर्गस्‍थान्निमित्तात्‍परस्‍य नेर्नस्‍य णो गदादिषु परेषु । प्रणिगदति ।।
४५६ कुहोश्‍चुः
अभ्‍यासकवर्गहकारयोश्‍चवर्गादेशः ।।
४५७ अत उपधायाः
उपधाया अतो वृद्धिः स्‍यात् ञिति णिति च प्रत्‍यये परे । जगाद । जगदतुः । जगदुः । जगदिथ । जगदथुः । जगद ।।
४५८ णलुत्तमो वा
उत्तमो णल् वा णित्‍स्‍यात् । जगाद, जगद । जगदिव । जगदिम । गदिता । गदिष्‍यति । गदतु । अगदत् । गदेत् । गद्यात् ।।
४५९ अतो हलादेर्लघोः
हलादेर्लघोरकारस्‍य वृद्धिर्वेडादौ परस्‍मैपदे सिचि । अगादीत्, अगदीत् । अगदिष्‍यत् ।। णद अव्‍यक्ते शब्‍दे ।। ७ ।।
४६० णो नः
धात्‍वादेर्णस्‍य नः । णोपदेशास्‍त्‍वनद्र्नाटिनाथ्‍नाध्‍नन्‍दनक्‍कनॄनृतः ।।
४६१ उपसर्गादसमासेऽपि णोपदेशस्‍य
उपसर्गस्‍थान्निमित्तात्‍परस्‍य धातोर्नस्‍य णः । प्रणदति । प्रणिनदति । नदति । ननाद ।।
४६२ अत एकहल्‍मध्‍येऽनादेशादेर्लिटि
लिण्‍निमित्तादेशादिकं न भवति यदङ्गं तदवयवस्‍यासंयुक्तहल्‍मध्‍यस्‍थस्‍यात एत्‍वमभ्‍यासलोपश्‍च किति लिटि । नेदतुः । नेदुः ।।
४६३ थलि च सेटि
प्रागुक्तं स्‍यात् । नेदिथ । नेदथुः । नेद । ननाद, ननद । नेदिव । नेदिम । नदिता । नदिष्‍यति । नदतु । अनदत् । नदेत् । नद्यात् । अनादीत्, अनदीत् । अनदिष्‍यत् ।। टु नदि समृद्धौ ।। ८ ।।
४६४ आदिर्ञिटुडवः
उपदेशे धातोराद्या एते इतः स्‍युः ।।
४६५ इदितो नुम् धातोः
नन्‍दति । ननन्‍द । नन्‍दिता । नन्‍दिष्‍यति । नन्‍दतु । अनन्‍दत् । नन्‍देत् । नन्‍द्यात् । अनन्‍दीत् । अनन्‍दिष्‍यत् । अर्च पूजायाम् ।। ९ ।। अर्चति ।।
४६६ तस्‍मान्नुड् द्विहलः
द्विहलो धातोर्दीर्घीभूतात्‍परस्‍य नुट् स्‍यात् । आनर्च । आनर्चतुः । अर्चिता । अर्चिष्‍यति । अर्चतु । आर्चत् । अर्चेत् । अच्‍र्यात् । आर्चीत् । आर्चिष्‍यत् ।। व्रज गतौ ।। १० ।। व्रजति । वव्राज । व्रजिता । व्रजिष्‍यति । व्रजतु । अव्रजत् । व्रजेत् । व्रज्‍यात् ।।
४६७ वदव्रजहलन्‍तस्‍याचः
एषामचो वृद्धिः सिचि परस्‍मैपदेषु । अव्राजीत् । अव्रजिष्‍यत् ।। कटे वर्षावरणयोः ।। ११ ।। कटति । चकाट । चकटतुः । कटिता । कटिष्‍यति । कटतु । अकटत् । कटेत् । कट्यत् ।।
४६८ ह्‍म्‍यन्‍तक्षणश्वसजागृणिश्व्येदिताम्
हमयान्‍तस्‍य क्षणादेण्‍र्यन्‍तस्‍य श्वयतेरेदितश्‍च वृद्धिर्नेडादौ सिचि । अकटीत् । अकटिष्‍यत् ।। गुपू रक्षणे ।। १२ ।।
४६९ गुपूधूपविच्‍छिपणिपनिभ्‍य आयः
एभ्‍य आयः प्रत्‍ययः स्‍यात् स्‍वार्थे ।।
४७० सनाद्यन्‍ता धातवः
सनादयः कमेर्णिङन्‍ताः प्रत्‍यया अन्‍ते येषां ते धातुसंज्ञकाः । धातुत्‍वाल्‍लडादयः । गोपायति ।।
४७१ आयादय आर्धधातुके वा
आर्धधातुकविवक्षायामायादयो वा स्‍युः । (कास्‍यनेकाच आम् वक्तव्‍यः) । लिटि आस्‍कासोराम्‍विधानान्‍मस्‍य नेत्त्वम् ।।
४७२ अतो लोपः
आर्धधातुकोपदेशे यददन्‍तं तस्‍यातो लोप आर्धधातुके ।।
४७३ आमः
आमः परस्‍य लुक् ।।
४७४ कृञ् चानुप्रयुज्‍यते लिटि
आमन्‍ताल्‍लिट्पराः कृभ्‍वस्‍तयोऽनुप्रयुज्‍यन्‍ते । तेषां द्वित्‍वादि ।।
४७५ उरत्
अभ्‍यासऋवर्णस्‍यात् प्रत्‍यये । रपरः । हलादिः शेषः । वृद्धिः । गोपायाञ्चकार । द्वित्‍वात्‍परत्‍वाद्यणि प्राप्‍ते -
४७६ द्विर्वचनेऽचि
द्वित्‍वनिमित्तेऽचि अच आदेशो न द्वित्‍वे कर्तव्‍ये । गोपायाञ्चक्रतुः ।।
४७७ एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्
उपदेशे यो धातुरेकाजनुदात्तश्‍च तत आर्धधातुकस्‍येण्‍न ।
              ऊदॄदन्‍तैर्यौतिरुक्ष्णुशीङ्स्‍नुनुक्षुश्विडीङ्- श्रिभिः ।
              वृङ्वृञ्भ्‍यां च विनैकाचोऽजन्‍तेषु निहताः स्‍मृताः ।।
कान्‍तेषु शक्‍लृ एकः । चान्‍तेषु पच्- मुच्- रिच्- वच्- विच्- सिचः षट् । छान्‍तेषु प्रच्‍छि एकः । जान्तेषुत्यज् निज् भज् भञ्ज् भुज् भ्रस्ज मस्ज् यज् युज् रुज् रञ्ज् सृज् इति पञ्जदश। दान्तेषु अद् क्षुद् खिद् छिद् तुद् नुद् पद्य भिद् विद्यति  विनद् विन्द् शद् सद् स्विद्य स्कन्द हदः षोडश। धान्तेषु क्रुध् क्षुध्बुध्यबन्धयुध्   रुध्   राध्   व्यध्   शुध्   साध्   सिध्यतय एकादश। नान्‍तेषु मन्‍यहनी द्वौ । पान्‍तेषु आप्‍छुप्‍िक्षप्‍तप्‍तिप्‍तृप्‍यदृप्‍यलिपलुप्‍वप्‍शप्‍स्‍वप् सृपस्‍त्रयोदश । भान्‍तेषु यभ्रभ्‍लभस्‍त्रयः । मान्‍तेषु गम्‍यम्‍नम्रमश्‍चत्‍वारः । शान्‍तेषु क्रश्‍दंश्‍दिश्‍दृश्‍मृश्रिश्रुश्‍लिश्विश्‍स्‍पृशो दश । षान्‍तेषु कृष् त्‍विष्‍तुष्‍द्विष्‍पुष्‍यपिष्‍विष्‍शिष्‍शुष्‍श्‍िलष्‍या एकादश ।। सान्‍तेषु घस्‍वसती द्वौ । हान्‍तेषु दह्‍दिह्‍दुह्‍नह्‍मिह्रुह्‍लिह्‍वहोऽष्‍टौ ।
अनुदात्ता हलन्‍तेषु धातवस्‍त्र्यधिकं शतम् ।
गोपायाञ्चकर्थ । गोपायाञ्चक्रथुः । गोपायाञ्चक्र । गोपायाञ्चकार । गोपायाञ्चकर । गोपायाञ्चकृव । गोपायाञ्चकृम । गोपायाम्‍बभूव, गोपायामास । जुगोप । जुगुपतुः । जुगुपुः ।।
४७८ स्‍वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा
स्‍वरत्‍यादेरूदितश्‍च परस्‍य वलादेरार्धधातुकस्‍येड् वा स्‍यात् । जुगोपिथ, जुगोप्‍थ । गोपायिता, गोपिता, गोप्‍ता । गोपायिष्‍यति, गोपिष्‍यति, गोप्‍स्‍यति । गोपायतु । अगोपायत् । गोपायेत् । गोपाय्‍यात्, गुप्‍यात् । अगोपायीत् ।।
४७९ नेटि
इडादौ सिचि हलन्‍तस्‍य वृद्धिर्न । अगोपीत्, अगौप्‍सीत् ।।
४८० झलो झलि
झलः परस्‍य सस्‍य लोपो झलि । अगौप्‍ताम् । अगौप्‍सुः । अगौप्‍सीः । अगौप्‍तम् । अगौप्‍त । अगौप्‍सम् । अगौप्‍स्‍व । अगौप्‍स्‍म । अगोपायिष्‍यत्, अगोपिष्‍यत्, अगोप्‍स्‍यत् ।। िक्ष क्षये ।। १३ ।। क्षयति । चिक्षाय । चििक्षयतुः । चििक्षयुः । एकाच इति निषेधे प्राप्‍ते -
४८१ कृसृभृवृस्‍तुद्रुस्रुश्रुवो लिटि
क्रादिभ्‍य एव लिट इण्‍न स्‍यादन्‍यस्‍मादनिटोऽपि स्‍यात् ।।
४८२ अचस्‍तास्‍वत्‍थल्‍यनिटो नित्‍यम्
उपदेशेऽजन्‍तो यो धातुस्‍तासौ नित्‍यानिट् ततस्‍थल इण्‍न ।।
४८३ उपदेशेऽत्‍वतः
उपदेशेऽकारवतस्‍तासौ नित्‍यानिटः परस्‍य थल इण्‍न स्‍यात् ।।
४८४ ऋतो भारद्वाजस्‍य
तासौ नित्‍यानिट ऋदन्‍तादेव थलो नेट् भारद्वाजस्‍य मते । तेन अन्‍यस्‍य स्‍यादेव । अयमत्र संग्रहः — 

               अजन्‍तोऽकारवान्‍वा यस्‍तास्‍यनिट्थलि वेडयम् ।
               ऋदन्‍त ईदृङि्नत्‍यानिट् क्राद्यन्‍यो लिटि सेड्भवेत् ।।
चिक्षयिथ, चिक्षेथ । चििक्षयथुः । चििक्षय । चिक्षाय, चिक्षय । चििक्षयिव । चििक्षयिम । क्षेता । क्षेष्‍यति । क्षयतु । अक्षयत् । क्षयेत् ।।
४८५ अकृत्‍सार्वधातुकयोर्दीर्घः
अजन्‍ताङ्गस्‍य दीर्घो यादौ प्रत्‍यये न तु कृत्‍सार्वधातुकयोः । क्षीयात् ।।
४८६ सिचि वृद्धिः परस्‍मैपदेषु
इगन्‍ताङ्गस्‍य वृद्धिः स्‍यात् परस्‍मैपदे सिचि । अक्षैषीत् । अक्षेष्‍यत् ।। तप सन्‍तापे ।। १४ ।। तपति । तताप । तेपतुः । तेपुः । तेपिथ, ततप्‍थ । तेपिव । तेपिम । तप्‍ता । तप्‍स्‍यति । तपतु । अतपत् । तपेत् । तप्‍यात् । अताप्‍सीत् । अताप्‍ताम् । अतप्‍स्‍यत् ।। क्रमु पादविक्षेपे ।। १५ ।।
४८७ वा भ्राशभ्‍लाशभ्रमुक्रमुक्‍लमुत्रसित्रुटिलषः
एभ्‍यः श्‍यन्‍वा कर्त्रर्थे सार्वधातुके परे । पक्षे शप् ।।
४८८ क्रमः परस्‍मैपदेषु
क्रमो दीर्घः परस्‍मैपदे शिति । क्राम्‍यति, क्रामति । चक्राम । क्रमिता । क्रमिष्‍यति । क्राम्‍यतु, क्रामतु । अक्राम्‍यत्, अक्रामत् । क्राम्‍येत् । क्रामेत् । क्रम्‍यात् । अक्रमीत् । अक्रमिष्‍यत् ।। पा पाने ।। १६ ।।
४८९ पाघ्राध्‍मास्‍थाम्‍नादाण्‍दृश्‍यर्तिसर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्‍ठमनयच्‍छपश्‍यर्च्छधौशीयसीदाः
पादीनां पिबादयः स्‍युरित्‍संज्ञकशकारादौ प्रत्‍यये परे । पिबादेशोऽदन्‍तस्‍तेन न गुणः । पिबति ।।
४९० आत औ णलः
आदन्‍ताद्धातोर्णल औकारादेशः स्‍यात् । पपौ ।।
४९१ आतो लोप इटि च
अजाद्योरार्धधातुकयोः क्‍ङिदिटोः परयोरातो लोपः । पपतुः । पपुः । पपिथ, पपाथ । पपथुः । पप । पपौ । पपिव । पपिम । पाता । पास्‍यति । पिबतु । अपिबत् । पिबेत् ।।
४९२ एर्लिङि
घुसंज्ञकानां मास्‍थादीनां च एत्‍वं स्‍यादार्धधातुके किति लिङि । पेयात् । गातिस्‍थेति सिचो लुक् । अपात् । अपाताम् ।।
४९३ आतः
सिज्‍लुकि आदन्‍तादेव झेर्जुस् ।।
४९४ उस्‍यपदान्‍तात्
अपदान्‍तादकारादुसि पररूपमेकादेशः । अपुः । अपास्‍यत् ।। ग्‍लै हर्षक्षये ।। १७ ।। ग्‍लायति ।।
४९५ आदेच उपदेशेऽशिति
उपदेशे एजन्‍तस्‍य धातोरात्‍वं न तु शिति । जग्‍लौ । ग्‍लाता । ग्‍लास्‍यति । ग्‍लायतु । अग्‍लायत् । ग्‍लायेत् ।।
४९६ वाऽन्‍यस्‍य संयोगादेः
घुमास्‍थादेरन्‍यस्‍य संयोगादेर्धातोरात एत्‍वं वार्धधातुके किति लिङि । ग्‍लेयात्, ग्‍लायात् ।।
४९७ यमरमनमातां सक् च
एषां सक् स्‍यादेभ्‍यः सिच इट् स्‍यात्‍परस्‍मैपदेषु । अग्‍लासीत् । अग्‍लास्‍यत् ।। ह्‍वृ कौटिल्‍ये ।। १८ ।। ह्‍वरति ।।
४९८ ऋतश्‍च संयोगादेर्गुणः
ऋदन्‍तस्‍य संयोगादेरङ्गस्‍य गुणो लिटि । उपधाया वृद्धिः । जह्‍वार । जह्‍वरतुः । जह्‍वरुः । जह्‍वर्थ । जह्‍वरथुः । जह्‍वर । जह्‍वार, जह्‍वर । जह्‍वरिव । जह्‍वरिम । ह्‍वर्ता ।।
४९९ ऋद्धनोः स्‍ये
ऋतो हन्‍तेश्‍च स्‍यस्‍येट् । ह्‍वरिष्‍यति । ह्‍वरतु । अह्‍वरत् । ह्‍वरेत् ।।
५०० गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः
अर्तेः संयोगादेर्ऋदन्‍तस्‍य च गुणः स्‍याद्यकि यादावार्धधातुके लिङि च । ह्‍वर्यात् । अह्‍वार्षीत् । अह्‍वरिष्‍यत् ।। श्रु श्रवणे ।। १९ ।।
५०१ श्रुवः शृ च
श्रुवः शृ इत्‍यादेशः स्‍यात् श्‍नुप्रत्‍ययश्‍च । शृणोति ।।
५०२ सार्वधातुकमपित्
अपित्‍सार्वधातुकं ङिद्वत् । शृणुतः ।।
५०३ हुश्‍नुवोः सार्वधातुके
हुश्‍नुवोरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्‍योवर्णस्‍य यण् स्‍यादचि सार्वधातुके । शृण्‍वन्‍ति । शृणोषि । शृणुथः । शृणुथ । शृणोमि ।।
५०४ लोपश्‍चास्‍यान्‍यतरस्‍यां म्‍वोः
असंयोगपूर्वस्‍य प्रत्‍ययोकारस्‍य लोपो वा म्‍वोः परयोः । शृण्‍वः, शृणुवः । शृण्‍मः, शृणुमः । शुश्राव । शुश्रुवतुः । शुश्रुवुः । शुश्रोथ । शुश्रुवथुः । शुश्रुव । शुश्राव, शुश्रव । शुश्रुव । शुश्रुम । श्रोता । श्रोष्‍यति । शृणोतु, शृणुतात् । शृणुताम् । शृण्‍वन्‍तु ।।
५०५ उतश्‍च प्रत्‍ययादसंयोगपूर्वात्
असंयोगपूर्वात्‍प्रत्‍ययोतो हेर्लुक् । शृणु, शृणुतात् । शृणुतम् । शृणुत । गुणावादेशौ । शृणवानि । शृणवाव । शृणवाम । अशृणोत् । अशृणुताम् । अशृण्‍वन् । अशृणोः । अशृणुतम् । अशृणुत । अशृणवम् । अशृण्‍व, अशृणुव । अशृण्‍म, अशृणुम । शृणुयात् । शृणुयाताम् । शृणुयुः । शृणुयाः । शृणुयातम् । शृणुयात । शृणुयाम् । शृणुयाव । शृणुयाम । श्रूयात् । अश्रौषीत् । अश्रोष्‍यत् ।। गम्‍लृ गतौ ।। २० ।।
५०६ इषुगमियमां छः
एषां छः स्‍यात् शिति । गच्‍छति । जगाम ।।
५०७ गमहनजनखनघसां लोपःक्‍ङित्‍यनङि
एषामुपधाया लोपोऽजादौ क्‍ङिति न त्‍वङि । जग्‍मतुः । जग्‍मुः । जगमिथ, जगन्‍थ । जग्‍मथुः । जग्‍म । जगाम, जगम । जग्‍मिव । जग्‍मिम । गन्‍ता ।।
५०८ गमेरिट् परस्‍मैपदेषु
गमेः परस्‍य सादेरार्धधातुकस्‍येट् स्‍यात् परस्‍मैपदेषु । गमिष्‍यति । गच्‍छतु । अगच्‍छत् । गच्‍छेत् । गम्‍यात् ।।
५०९ पुषादिद्युताद्य्लृदितः परस्‍मैपदेषु
श्‍यन्‍विकरणपुषादेर्द्युतादेर्लृदितश्‍च च्‍लेरङ् परस्‍मैपदेषु । अगमत् । अगमिष्‍यत् ।।
इति परस्‍मैपदिनः
एध वृद्धौ ।। १ ।।
५१० टित आत्‍मनपदानां टेरे
टितो लस्‍यात्‍मनेपदानां टेरेत्‍वम् । एधते ।।
५११ आतो ङितः
अतः परस्‍य ङितामाकारस्‍य इय् स्‍यात् । एधेते । एधन्‍ते ।।
५१२ थासः से
टितो लस्‍य थासः से स्‍यात् । एधसे । एधेथे । एधध्‍वे । अतो गुणे । एधे । एधावहे । एधामहे ।।
५१३ इजादेश्‍च गुरुमतोऽनृच्‍छः
इजादिर्यो धातुर्गुरुमानृच्‍छत्‍यन्‍यस्‍तत आम् स्‍याल्‍लिटि ।।
५१४ आम्‍प्रत्‍ययवत्‍कृञोऽनुप्रयोगस्‍य
आम्‍प्रत्‍ययो यस्‍मादित्‍यतद्गुणसंविज्ञानो बहुव्रीहिः । आम्‍प्रकृत्‍या तुल्‍यमनुप्रयुज्‍यमानात् कृञोऽप्‍यात्‍मनेपदम् ।।
५१५ लिटस्‍तझयोरेशिरेच्
लिडादेशयोस्‍तझयोरेश् इरेजेतौ स्‍तः । एधाञ्चक्रे । एधाञ्चक्राते । एधाञ्चक्रिरे । एधाञ्चकृषे । एधाञ्चक्राथे ।।
५१६ इणः षीध्‍वंलुङि्लटां धोऽङ्गात्
इणन्‍तादङ्गात्‍परेषां षीध्‍वंलुङि्लटां धस्‍य ढः स्‍यात् ।। एधाञ्चकृढ्वे । एधाञ्चक्रे । एधाञ्चकृवहे । एधाञ्चकृमहे । एधाम्‍बभूव । एधामास । एधिता । एधितारौ । एधितारः । एधितासे । एधितासाथे ।।
५१७ धि च
धादौ प्रत्‍यये परे सस्‍य लोपः । एधिताध्‍वे ।।
५१८ ह एति
तासस्‍त्‍योः सस्‍य हः स्‍यादेति परे । एधिताहे । एधितास्‍वहे । एधितास्‍महे । एधिष्‍यते । एधिष्‍येते । एधिष्‍यन्‍ते । एधिष्‍यसे । एधिष्‍येथे । एधिष्‍यध्‍वे । एधिष्‍ये । एधिष्‍यावहे । एधिष्‍यामहे ।।
५१९ आमेतः
लोट एकारस्‍याम् स्‍यात् । एधताम् । एधेताम् । एधन्‍ताम् ।।
५२० सवाभ्‍यां वामौ
सवाभ्‍याम् परस्‍य लोडेतः क्रमाद्वामौ स्‍तः । एधस्‍व । एधेथाम् । एधध्‍वम् ।।
५२१ एत ऐ
लोडुत्तमस्‍य एत ऐ स्‍यात् । एधै । एधावहै । एधामहै ।। आटश्‍च । ऐधत । ऐधेताम् । ऐधन्‍त । ऐधथाः । ऐधेथाम् । ऐधध्‍वम् । ऐधे । ऐधावहि । ऐधामहि ।।
५२२ लिडः सीयुट्
सलोपः । एधेत । एधेयाताम् ।।
५२३ झस्‍य रन्
लिङो झस्‍य रन् स्‍यात् । एधेरन् । एधेथाः । एधेयाथाम् । एधेध्‍वम् ।।
५२४ इटोऽत्
लिङादेशस्‍य इटोऽत्‍स्‍यात् । एधेय । एधेवहि । एधेमहि ।।
५२५ सुट् तिथोः
लिङस्‍तथोः सुट् । यलोपः । आर्धधातुकत्‍वात्‍सलोपो न । एधिषीष्‍ट । एधिषीयास्‍ताम् । एधिषीरन् । एधिषीष्‍ठाः । एधिषीयास्‍थाम् । एधिषीध्‍वम् । एधिषीय । एधिषीवहि । एधिषीमहि । ऐधिष्‍ट । ऐधिषाताम् ।।
५२६ आत्‍मनेपदेष्‍वनतः
अनकारात्‍परस्‍यात्‍मनेपदेषु झस्‍य अदित्‍यादेशः स्‍यात् । ऐधिषत । ऐधिष्‍ठाः । ऐधिषाथाम् । ऐधिढ्वम् । ऐधिषि । ऐधिष्‍वहि । ऐधिष्‍महि । ऐधिष्‍यत । ऐधिष्‍येताम् । ऐधिष्‍यन्‍त । ऐधिष्‍यथाः । ऐधिष्‍येथाम् । ऐधिष्‍यध्‍वम् । ऐधिष्‍ये । ऐधिष्‍यावहि । ऐधिष्‍यामहि ।। कमु कान्‍तौ ।। २ ।।
५२७ क्रमेर्णिङ्
स्‍वार्थे । ङित्त्वात्तङ् । कामयते ।।
५२८ अयामन्‍ताल्‍वाय्‍येत्‍न्‍िवष्‍णुषु
आम् अन्‍त आलु आय्‍य इत्‍नु इष्‍णु एषु णेरयादेशः स्‍यात् । कामायाञ्चक्रे । आयादय इति णिङ् वा । चकमे । चकमाते । चकमिरे । चकमिषे । चकमाथे । चकमिध्‍वे । चकमे । चकमिवहे । चकमिमहे । कामयिता । कामयितासे । कमिता । कामयिष्‍यते, कमिष्‍यते । कामयताम् । अकामयत । कामयेत । कामयिषीष्‍ट ।।
५२९ विभाषेटः
इणः परो य इट् ततः परेषां षीध्‍वंलुङि्लटां धस्‍य वा ढः । कामयिषीढ्वम्, कामयिषीध्‍वम् । कमिषीष्‍ट । कमिषीध्‍वम् ।।
५३० णिश्रिद्रुश्रुभ्‍यः कर्तरि चङ्
ण्‍यन्‍तात् श्र्यादिभ्‍यश्‍च च्‍लेश्‍चङ् स्‍यात् कर्त्रर्थे लुङि परे । अकामि अ त इति स्‍थिते
५३१ णेरनिटि
अनिडादावार्धधातुके परे णेर्लोपः स्‍यात् ।
५३२ णौ चङ्युपधाया ह्रस्‍वः
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्‍योपधाया ह्रस्‍वः स्‍यात् ।।
५३३ चङि
चङि परे अनभ्‍यासस्‍य धात्‍ववयवस्‍यैकाचः प्रथमस्‍य द्वे स्‍तोऽजादेर्द्वितीयस्‍य ।।
५३४ सन्‍वल्‍लघुनि चङ्परेऽनग्‍लोपे
चङ्परे णौ यदङ्गं तस्‍य योऽभ्‍यासो लघुपरः, तस्‍य सनीव कार्यं स्‍याण्‍णावग्‍लोपेऽसति ।।
५३५ सन्‍यतः
अभ्‍यासस्‍यात इत् स्‍यात् सनि ।।
५३६ दीर्घो लघोः
लघोरभ्‍यासस्‍य दीर्घः स्‍यात् सन्‍वद्भावविषये । अचीकमत, णिङ्भावपक्षे — (कमेश्‍च्‍लेश्‍चङ् वाच्‍यः) । अचकमत । अकामयिष्‍यत, अकमिष्‍यत ।। अय गतौ ।। ३ ।। अयते ।।
५३७ उपसर्गस्‍यायतौ
अयतिपरस्‍योपसर्गस्‍य यो रेफस्‍तस्‍य लत्‍वं स्‍यात् । प्‍लायते । पलायते ।।
५३८ दयायासश्‍च
दय् अय् आस् एभ्‍य आम् स्‍याल्‍लिटि । अयाञ्चक्रे । अयिता । अयिष्‍यते । अयताम् । आयत । अयेत । अयिषीष्‍ट । विभाषेटः । अयिषीढ्वम्, अयिषीध्‍वम् । आयिष्‍ट । आयिढ्वम्, आयिध्‍वम् । आयिष्‍यत ।। द्युत दीप्‍तौ ।। ४ ।। द्योतते ।।
५३९ द्युतिस्‍वाप्‍योः सम्‍प्रसारणम्
अनयोरभ्‍यासस्‍य सम्‍प्रसारणं स्‍यात् । दिद्युते ।।
५४० द्युद्भ्‍यो लुङि
द्युतादिभ्‍यो लुङः परस्‍मैपदं वा स्‍यात् । पुषादीत्‍यङ् । अद्युतत्, अद्योतिष्‍ट । अद्योतिष्‍यत ।। एवं श्विता वर्णे ।। ५ ।। ञिमिदा स्‍नेहने ।। ६ ।। ञिष्‍विदा स्‍नेहनमोचनयोः ।। ७ ।। मोहनयोरित्‍येके । ञिक्ष्विदा चेत्‍येके ।। रुच दीप्‍तावभिप्रीतौ च ।। ८ ।। घुट परिवर्तने ।। ९ ।। शुभ दीप्‍तौ ।। १० ।। क्षुभ संचलने ।। ११ ।। णभ तुभ हिंसायाम् ।। १२-१३ ।। स्रंसु भ्रंसु ध्‍वंसु अवस्रंसने ।। १४-१५-१६ ।। ध्‍वंसु गतौ च ।। स्रम्‍भु विश्वासे ।। १७ ।। वृतु वर्तने ।। १८ ।। वर्तते । ववृते । वर्तिता ।।
५४१ वृद्भ्‍यः स्‍यसनोः
वृतादिभ्‍यः पञ्चभ्‍यो वा परस्‍मैपदं स्‍यात्‍स्‍ये सनि च ।।
५४२ न वृद्भ्‍यश्‍चतुर्भ्‍यः
वृतुवृधुशृधुस्‍यन्‍दूभ्‍यः सकारादेरार्धधातुकस्‍येण् न स्‍यात् तङानयोरभावे । वर्त्‍स्‍यति, वर्तिष्‍यते । वर्तताम् । अवर्तत । वर्तेत । वर्तिषीष्‍ट । अवर्तिष्‍ट । अवर्त्‍स्‍यत् , अवर्तिष्‍यत् ।। दद दाने ।। १९ ।। ददते ।।
५४३ न शसददवादिगुणानाम्
शसेर्ददेर्वकारादीनां गुणशब्‍देन विहितो योऽकारस्‍तस्‍य एत्त्वाभ्‍यासलोपौ न । दददे । दददाते । दददिरे । ददिता । ददिष्‍यते । ददताम् । अददत । ददेत । ददिषीष्‍ट । अददिष्‍ट । अददिष्‍यत ।। त्रपूष् लज्‍जायाम् ।। २० ।। त्रपते ।।
५४४ तॄफलभजत्रपश्‍च
एषामत एत्त्वमभ्‍यासलोपश्‍च स्‍यात् किति लिटि सेटि थलि च । त्रेपे । त्रपिता, त्रप्‍ता । त्रपिष्‍यते, त्रप्‍स्‍यते । त्रपताम् । अत्रपत । त्रपेत । त्रपिषीष्‍ट, त्रप्‍सीष्‍ट । अत्रपिष्‍ट, अत्रप्‍त । अत्रपिष्‍यत, अत्रप्‍स्‍यत ।।
इत्‍यात्‍मनेपदिनः।।
                                                     अथोभयपदिनः
श्रिञ् सेवायाम् ।। १ ।। श्रयति, श्रयते । शिश्राय, शिश्रिये । श्रयितासि, श्रयितासे । श्रयिष्‍यति, श्रयिष्‍यते । श्रयतु, श्रयताम् । अश्रयत्, अश्रयत । श्रयेत्, श्रयेत । श्रीयात्, श्रयिषीष्‍ट । चङ् । अशिश्रियत्, अशिश्रियत । अश्रयिष्‍यत्, अश्रयिष्‍यत ।। भृञ् भरणे ।। २ ।। भरति, भरते । बभार । बभ्रतुः । बभ्रुः । बभर्थ । बभृव । बभृम । बभ्रे । बभृषे । भर्तासि, भर्तासे । भरिष्‍यति, भरिष्‍यते । भरतु, भरताम् । अभरत्, अभरत । भरेत्, भरेत ।।
५४५ रिङ् शयग्‍लिङ्क्षु
शे यकि यादावार्धधातुके लिङि च ऋतो रिङ् आदेशः स्‍यात् । रीङि प्रकृते रिङि्वधानसामर्थ्‍याद्दीर्घो न । भ्रियात् ।।
५४६ उश्‍च
ऋवर्णात्‍परौ झलादी लिङि्सचौ कितौ स्‍तस्‍तङि । भृषीष्‍ट । भृषीयास्‍ताम् । अभार्षीत् ।।
५४७ ह्रस्‍वादङ्गात्
सिचो लोपो झलि । अभृत । अभृषाताम् । अभरिष्‍यत्, अभरिष्‍यत ।। हृञ् हरणे ।। ३ ।। हरति, हरते । जहार । जहर्थ । जिह्रव । जिह्रम । जह्रे । जिह्रषे । हर्तासि, हर्तासे । हरिष्‍यति, हरिष्‍यते । हरतु, हरताम् । अहरत्, अहरत । हरेत्, हरेत । ह्रियात्, हृषीष्‍ट । हृषीयास्‍ताम् । अहार्षीत्, अहृत । अहरिष्‍यत्, अहरिष्‍यत ।। धृञ् धारणे ।। ४ ।। धरति, धरते ।। णीञ् प्रापणे ।। ५ ।। नयति, नयते ।। डुपचष् पाके ।। ६ ।। पचति, पचते । पपाच । पेचिथ, पपक्‍थ । पेचे । पक्तासि, पक्तासे ।। भज सेवायाम् ।। ७ ।। भजति, भजते । बभाज, भेजे । भक्तासि, भक्तासे । भक्ष्यति, भक्ष्यते । अभाक्षीत्, अभक्त । अभक्षाताम् ।।
यज देवपूजा सङ्गतिकरणदानेषु ।। ८ ।। यजति, यजते ।।
५४८ लिट्यभ्‍यासस्‍योभयेषाम्
वच्‍यादीनां ग्रह्‍यादीनां चाभ्‍यासस्‍य सम्‍प्रसारणं लिटि । इयाज ।।
५४९ वचिस्‍वपियजादीनां किति
वचिस्‍वप्‍योर्यजादीनां च संप्रसारणं स्‍यात् किति । ईजतुः । ईजुः । इयजिथ, इयष्‍ठ । ईजे । यष्‍टा ।।
५५० षढोः कः सि
यक्ष्यति, यक्ष्यते । इज्‍यात्, यक्षीष्‍ट । अयाक्षीत्, अयष्‍ट ।। वह प्रापणे ।। ९ ।। वहति, वहते । उवाह । ऊहतुः । ऊहुः । उवहिथ ।।
५५१ झषस्‍ताथोर्धोऽधः
झषः परस्‍योस्‍तथोर्धः स्‍यान्न तु दधातेः ।।
५५२ ढो ढे लोपः
५५३ सहिवहोरोदवर्णस्‍य
अनयोरवर्णस्‍य ओत्‍स्‍याड्ढलोपे । उवोढ । ऊहे । वोढा । वक्ष्यति । अवाक्षीत् । अवोढाम् । अवाक्षुः । अवाक्षीः । अवोढम् । अवोढ । अवाक्षम् । अवाक्ष्व । अवाक्ष्म । अवोढ । अवक्षाताम् । अवक्षत । अवोढाः । अवक्षाथाम् । अवोढ्वम् । अविक्ष । अवक्ष्वहि । अवक्ष्महि ।।
इति भ्‍वादयः ।। १ ।।

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