लघुसिद्धान्तकौमुदी (बहुव्रीहि- समासः)


अथ बहुव्रीहिः


९६८ शेषो बहुव्रीहिः

अधिकारोऽयं प्राग्‍द्वन्‍द्वात् ।।

द्वन्द्व समास से पूर्व तक बहुव्रीहि समास का अधिकार है। 

यह अधिकारसूत्र हैं  इसका अधिकार तेन सहित तुल्ययोगे  (2.3.28)तक रहता है। तात्पर्य यह हुआ कि शेषो बहुव्रीहिः से लेकर तेन सहित तुल्ययोगे  तक के सूत्रों द्वारा किया जाने वाला समास बहुव्रीहि संज्ञक होता है। इसी सूत्र के अधिकार में होने वाले समास को बहुव्रीहिसमास कहा जाता है। उक्तादन्यः शेषः कहने के बाद जो  शेष बचेउसे शेष कहते है। जो अव्ययीभावतत्पुरूष से बचा हुआ है किन्तु द्वन्द्व नहीं है, वह बहुव्रीहि है।

९६९ अनेकमन्‍यपदार्थे

अनेकं प्रथमान्‍तमन्‍यस्‍य पदस्‍यार्थे वर्तमानं वा समस्‍यते स बहुव्रीहिः ।।

अन्यपद के अर्थ में विद्यमान समस्त पदों से भिन्न एक से अधिक प्रथमान्त पद परस्पर में विकल्प से समास को प्राप्त हों और उसे बहुव्रीहि समास कहते हैं।  समास में आये पद यदि अपने से अतिरिक्त किसी अन्य पद का बोध कराते हों तो वह बहुव्रीहि समास होता है। बहुव्रीहि समास में भी प्रातिपदिकसंज्ञासुप् का लुक्सु आदि विभक्ति की उत्पति आदि पूर्ववत् होंगे। 
९७० सप्‍तमीविशेषणे बहुव्रीहौ

सप्‍तम्‍यन्‍तं विशेषणं च बहुव्रीहौ पूर्वं स्‍यात् । अत एव ज्ञापकाद्व्‍यधिकरणपदो बहुव्रीहिः ।।

बहुव्रीहि समास में सप्तम्यन्त शब्द तथा विशेषण शब्द का पूर्व में प्रयोग होता है 
अतः समस्यमान शब्दों में जो शब्द विशेषण बना हुआ है उसका और जो शब्द सप्तमी विभक्ति से युक्त हैउसका पूर्व में प्रयोग करना चाहिए। चुँकि इस सूत्र से सप्तम्यन्त का पूर्वप्रयोग हुआ हैअतः यह ज्ञात होता है कि कभी कभी बहुव्रीहिसमास में समानाधिकरण अर्थात् समान विभक्ति के अतिरिक्तभिन्न भिन्न विभक्ति वाले पदों का भी समास होता है ।
दो पदों में प्रथमान्त निर्दिष्ट पद की उपसर्जन संज्ञा तथा उपसर्जनं पूर्वम् से उपसर्जन संज्ञक का पूर्व प्रयोग होने का विधान है। इस विधान के अनुसार अनेकमन्यपदार्थे सूत्र में अनेकम् पद प्रथमान्त है। अतः उपसर्जन संज्ञक होने से उपसर्जनं पूर्वम् से उसका पूर्वप्रयोग प्राप्त होता है। किन्तु अनेकम्’ पद से समास के सभी पदों का बोध होता हैइसीलिए यह निर्णय नहीं हो पाता कि किस पद को पहले रखा जाय। इसी समस्या को हल करने के लिए सप्तमी विशेषणे बहुव्रीहौ सूत्र से सप्तम्यन्त और विशेषणवाचक पद को पहले प्रयोग का विधान किया गया है। उदाहरण के लिए पीतम् अम्बरम्’ - इस विग्रह में ‘पीतम्’ और अम्बरम्’ दोनों ही प्रथमान्त हैअतः उपसर्जन-संज्ञक होने से  उपसर्जनं पूर्वम् से दोनों का ही पूर्वप्रयोग प्राप्त होता है। किन्तु प्रकृत सूत्र से उसका बा होकर विशेषण-वाचक पद प्राप्तम्’ का पहले प्रयोग होता है। इसी प्रकार कण्ठे कालो यस्य’ इस विग्रह में सप्तम्यन्त पद कण्ठे’ का पहले प्रयोग होगा।

९७१ हलदन्‍तात्‍सप्‍तम्‍याः संज्ञायाम्

हलन्‍ताददन्‍ताच्‍च सप्‍तम्‍या अलुक् । कण्‍ठेकालः । प्राप्‍तमुदकं यं स प्राप्‍तोदको ग्रामः । ऊढरथोऽनड्वान् । उपहृतपशू रुद्रः । उद्धृतौदना स्‍थाली । पीताम्‍बरो हरिः । वीरपुरुषको ग्रामः ।

हलन्त और हृस्व अकारान्त शब्दों से परे संज्ञा अर्थ में उत्तरपद के परे रहते सप्तमी विभक्ति का लुक् नहीं होता है
बहुव्रीहिसमास में समस्यमान दोनों शब्द प्रायः प्रथमान्त ही होते हैं किन्तु उपर्युक्त दो सूत्रों में बहुव्रीहि के साथ सप्तमी शब्द का उच्चारण करके सप्तमी के अलुक् के विधान से दोनों पदों में भिन्न भिन्न विभक्ति होने पर भी कहीं कहीं समास हो जाता हैयह ज्ञापन होता है। अत एव कण्ठेकालः में कण्ठे कालः यस्य इस विग्रह में पूर्व पद कण्ठ ङि सप्तम्यन्त है और उत्तरपद काल सु प्रथमान्त है। इस तरह समानाधिकरण न होकर व्यधिकरण हुआ। ऐसी स्थिति में व्यधिकरण में भी उक्त ज्ञापक के द्वारा समास होता है। 

कण्ठेकालः।  कण्ठे कालः यस्य लौकिक विग्रह और कण्ठ ङि + काल सु अलौकिक विग्रह है। इस भिन्न विभक्ति अर्थात् व्यधिकरण में उक्त ज्ञापक के द्वारा समास हुआ। सप्तम्यन्त पद कण्ठ ङि का सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ से पूर्वप्रयोग हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञासुप् का लुक् प्राप्त था किन्तु हलदन्तात् सप्तम्याः संज्ञायाम् से सप्तमी विभक्ति ङि के लोप का निषेध हुआ। इस स्थिति में उत्तरपद में विद्यमान सु के लुक् में कोई बाधा भी नहीं हुई। इस तरह कण्ठेकाल बना। स्वादिकार्य करके कण्ठेकालः सिद्ध हो गया।

प्राप्तोदकः। अन्यपदार्थ के अर्थ का उदाहरण - प्राप्तम् उदकं यं ( ग्रामम् ) लौकिक विग्रह और प्राप्त सु + उदक सु इस अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप होकर प्राप्त + उदक बना। प्राप्त + उदक में गुण करने पर प्राप्तोदक बना। इसका अन्यपदार्थ - ग्राम होने के कारण ग्राम के लिंग के समान पुँल्लिंग बनता है। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रूत्वविसर्ग करके प्राप्तोदकः सिद्ध हो जाता है। 

पीताम्बरः। अन्यपदार्थ (विष्णु) के अर्थ का उदाहरण। पीतम् अम्बरम् (अस्ति) यस्य (विष्णोः) लौकिक विग्रह और पीत सु + अम्बर सु अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से सु का लोप करने पर पीत + अम्बर बना। अन्यपदार्थ विष्णु के लिंग के समान पुँल्लिग रूप होगा। प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रूत्व, विसर्ग करके पीताम्बरः विष्णुः सिद्ध हो जाता है। इसका विग्रह बहुवचन में भी किया जाता है- पीतानि अम्बराणि यस्य। पीत जस् + अम्बर जस्=पीताम्बरः।

इस प्रकार तृतीयार्थ, चतुर्थ्यर्थ का क्रमशः उदाहरण दे रहे हैं।
तृतीयार्थ – ऊढो रथो येन । ऊढरथः अनड्वान्।
चतुर्थ्यर्थ – उपहृतः पशुः यस्मै- उपहृतपशुः।
पञ्चम्यर्थ – उद्धृतः ओदनो यस्याः – उद्धृतौदना स्थाली।
षष्ठ्यर्थ – पीतानि अम्बराणि यस्य – पीताम्बरः।
सप्तम्यर्थ – वीराः पुरुषाः सन्ति यस्मिन् ग्रामे – वीरपुरुषकः ग्रामः।
वीरपुरुषकः में अन्यपदार्थ ग्राम के अर्थ में वीराः पुरूषाः सन्ति यस्मिन् ( ग्रामे ) लौकिक विग्रह और वीर जस् + पुरुष जस् अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। यहाँ पर पीताम्बरो, पुरुषको उदाहरण में दिया गया है। आपने हशि च सूत्र पढ़ा होगा। यहाँ पर बाद के शब्द के अनुसार सु, रूत्व, उत्व, गुण करके  पीताम्बरो आदि लिखा है।

(वा.) प्रादिभ्‍यो धातुजस्‍य वाच्‍यो वा चोत्तरपदलोपः) । प्रपतितपर्णःप्रपर्णः ।
प्र आदियों से परे धातुज (कृदन्त) का समर्थ सुबन्त के साथ अन्यपदार्थ के साथ समास होता है तथा विकल्प से उत्तरपद का लोप भी होता है।
प्रपर्णः। प्रपतितानि पर्णानि यस्मात् सः प्रपर्णः। प्रकर्षेण पतितः विग्रह में प्र का पतित के साथ कुगतिप्रादयः से समास होकर प्रपतितः बना। प्रपतित में प्र पूर्वपद और पतित उत्तरपद है। समास होने के बाद प्रपतित एक पद हुआ। अब प्रपतितानि पर्णानि यस्मात् इस लौकिक विग्रह और प्रपतित जस् पर्ण जस् अलौकिक विग्रह किया। अनेकमन्यपदार्थे से समास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके प्रपतित पर्ण बना। यहाँ पूर्वपद प्र है तथा उत्तर पद पतित है। अब प्रादिभ्यो धातुजस्य वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः से पूर्वपद प्र के उत्तर पद का लोप विकल्प से हुआ। प्र + पर्ण, प्रपर्ण बना। स्वादिकार्य स प्रपर्णः सिद्ध हुआ। उक्त वार्तिक से लोप के अभाव पक्ष में प्रपतितपर्णः बनेगा। इसी तरह विगतो धवो यस्याः सा विधवा, निर्गता जना यस्मात् स निर्जनो प्रदेशः, निर्गता गुणा यस्मात् स निर्गुणः, निर्गतं फलं यस्मात् तत् निष्फलं कर्म, निर्गतोऽर्थो यस्मात् तत् निरर्थकम् आदि अनेक शब्द बनाये जा सकते है।

विशेष- समास में पूर्वपद और उत्तरपद रहता है, किन्तु इस वार्तिक के लिए पूर्वपद भी ऐसा होना चाहिए, जिसका दूसरे पद के साथ में समास हो चुका हो। अर्थात् प्र आदि के साथ कुगतिप्रादयः से प्रादि समास हो चुका हो और उसके बाद बहुव्रीहिसमास में एक अन्य पद के साथ अन्वित हो रहा हो। 

(वा.) नञोऽस्‍त्‍यर्थानां वाच्‍यो वा चोत्तरपदलोपः) अविद्यमानपुत्रःअपुत्रः ।।
नञ् से परे विद्यमान अर्थ का वाचक जो पद, तदन्त का समर्थ सुबन्त के साथ अन्यपदार्थ में समास तथा उत्तरपद का लोप विकल्प से होता है।
यह भी समास किये हुए पूर्वपद में विद्यमान उत्तरपद का ही विकल्प से लोप करता है किन्तु वह उत्तरपद अस्ति के अर्थ विद्यमानता आदि वाले अर्थ वाला हो तथा वह शब्द नञ् के साथ समास को प्राप्त हो चुका हो।

अविद्यमानः पुत्रः अपुत्रः। न विद्यमानः में नञ् तत्पुरूष समास होकर अविद्यमान बना। अब अविद्यमान सु पुत्र सु में अनेकमन्यपदार्थे से समास, प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लुक् करके अविद्यमान पुत्र बना। यहाँ पूर्वपद है - नञ् का अ तथा उत्तरपद है - विद्यमान, इस विद्यमान का नञोऽस्त्यर्थानां वाच्यो वा चोत्तरपदलोपः से लोप होकर  अपुत्र बना। अपुत्र से स्वादिकार्य करने पर अपुत्रः बना। लोप के अभाव पक्ष में अविद्यमानपुत्रः बनेगा। इसी तरह अविद्यमानो नाथो यस्य स अनाथः, अविद्यमानः क्रोधो यस्य स अक्रोधः आदि अनेक इस वार्तिक के द्वारा सिद्ध किये जा सकते हैं। 

९७२ स्‍त्रियाः पुंवद्भाषितपुंस्‍कादनूङ्समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु

उक्तपुंस्‍कादनूङ् ऊङोऽभावोऽस्‍यामिति बहुव्रीहिः । निपातनात्‍पञ्चम्‍या अलुक् षष्‍ठ्यश्‍च लुक् । तुल्‍ये प्रवृत्तिनिमित्ते यदुक्तपुंस्‍कं तस्‍मात्‍पर ऊङोऽभावो यत्र तथाभूतस्‍य स्‍त्रीवाचकशब्‍दस्‍य पुंवाचकस्‍येव रूपं स्‍यात् समानाधिकरणे स्‍त्रीलिङ्गे उत्तरपदे न तु पूरण्‍यां प्रियादौ च परतः । गोस्‍त्रियोरिति ह्रस्‍वः । चित्रगुः । रूपवद्भार्यः । अनूङ् किम् ? वामोरूभार्यः ।। पूरण्‍यां तु –

प्रवृत्तिनिमित्त समान होते हुए उक्त पुंस्क शब्द, उससे परे ऊङ् प्रत्यय जहाँ न किया गया हो ऐसे स्त्रीवाचक शब्द का पुंवाचक शब्द के समान रूप होता है, समान विभक्तिक स्त्रीलिंग उत्तरपद परे रहते, किन्तु पूरणार्थक प्रत्ययान्त शब्दों तथा प्रिया आदि शब्दों के परे न हो तो। 
पुवंत् का अर्थ- पुँल्लिंग की तरह रूप बन जाना।
भाषितपुंस्क - जिस विशेषता के कारण कोई शब्द अपने अर्थ को प्रकट करता है, उस शब्द की वह विशेषता ही उसका प्रवृत्तिनिमित्त को लेकर अन्य लिंग में भी प्रवृत्त हो तो उसे भाषितपुंस्क कहते हैं। जैसे- घट शब्द में घड़े को बोध कराने का निमित्त घटत्व है, यदि उसमें घटत्व नहीं मिलता तो उसे कोई घट नहीं कहता। प्रत्येक शब्द का अपने अर्थ का बोधन कराने के लिए कोई न कोई निमित्त अवश्य ही होता है। उस निमित्त को प्रवृत्तिनिमित्त कहते है।
अनूङ् - ऐसे भाषितपुंस्क शब्द से परे ऊङ्-प्रत्यय न हुआ हो।
पूरणीप्रियादि- प्रथम, द्वितीय, तृतीय आदि क्रमवाचक विशेषणों को पूरणी करहा जाता है। मट्, डट् आदि पूरणार्थक प्रत्यय हैं। प्रिय आदि एक गण है।

इस तरह सूत्रार्थ हुआ- पूरणी और प्रियादि शब्दों को छोड़कर अन्य समानाधिकरण स्त्रीलिंग उत्तरपद परे होने पर ऊङ् प्रत्ययान्त भिन्न स्त्रीवाचक भाषितपुंस्क पद के रूप पुँल्लिग के समान होते हैं। यह सूत्र पुंवद्धाव करता है। 
चित्रगुः। चित्राः गावः यस्य में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। यहाँ गो शब्द के बाद जस् विभक्ति है और चित्रा में भी जस् विभक्ति है, दोनो में समान ही विभक्ति लगी है, इसलिए समानविभक्तिक या समानाधिकरण हैं। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से जस् का लोप करके चित्रा + गो बना।  चित्रा + गो में ऊङ् प्रत्यय नहीं हुआ है तथा पूरणी अर्थ के वाचक प्रत्यय वाले शब्द और प्रियादि शब्द भी पर में नहीं है। स्त्रीलिंग है और गायों का वाचक चित्रा स्त्रीलिंग है तथा भाषितपुंस्क भी,क्योंकि इसका  पुँल्लिंग  चित्रः, चित्रौ आदि भी बनता है । अतः स्त्रियाः पुंवद्धाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु से गो शब्द के परे होने पर चित्रा को पुंवत् ( पुंवद्धाव ) हुआ अर्थात् पुँल्लिंग की तरह चित्र के रूप में परिवर्तन हुआ।, चित्र + गो बना। इसके बाद गोस्त्रियो. से गो के ओकार को ह्रस्व हो गया। चित्रगु बना। स्मरणीय है कि ओकार को ह्रस्व उकार होता है। अतः गो से गु बना। चित्रा और गो दोनों शब्द स्त्रीलिंग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिंग में हो गया। प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रुत्वविसर्ग करके चित्रगुः सिद्ध हुआ। 
रूपवद्भार्यः। रूपवती भार्या यस्य लौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा हुई और सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से दोनों सु का लोप करके रूपवती + भार्या बना। रूपवती स्त्रीलिंग है और भार्या भी स्त्रीलिंग है, दोनों में समान ही विभक्ति लगी थी, इसलिए समानविभक्तिक भी हैं। रूपवती शब्द पुँल्लिंग में रूपवान् ऐसा बनता है, इसलिए भाषिकपुंस्क भी है। अतः स्त्रियाः पुंवद्धाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु से भार्या शब्द परे होने पर रूपवती को पुंवत् (पुंवद्भाव) हुआ। अतः पुँल्लिग की तरह रूपवत् हुआ। रूपवत् + भार्या बना। भार्या के भकार के परे होने पर झलां जशोऽन्ते से जश्त्व होकर दकार बन गया, रूपवद् + भार्या बना, वर्णसम्मलेन हुआ- रूपवद्धार्या बना। गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य से भार्या में स्त्रीप्रत्यय के टाप् ते आकार को ह्रस्व होकर रूपवद्धार्य बना। प्रकृत सूत्र से समस्त शब्द पुँल्लिंग में बदल गया। रूपवती भार्या है जिस पुरुष की, वह पुरुष। सु विभक्ति रुत्वविसर्ग करके रूपवद्धार्थः सिद्ध हुआ।

अनूङ् किमिति? स्त्रियाः पुंवद्धाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु में भाषितपुंस्क से परे ऊङ् न हो ऐसा क्यों कहा ? उत्तर देते है- वामोरूभार्यः। यहाँ वाम शब्द पूर्वक ऊरु शब्द से संहितशफलक्षणवामादेश्च से ऊङ् प्रत्यय हुआ है। उसके बाद वामोरूः भार्या यस्य में समास तथा उपसर्जनसंज्ञक भार्या शब्द को ह्रस्व होकर दीर्घ उकार वाला वामोरूभार्यः बनता है। यदि भाषितपुंस्क से परे ऊङ् न हो ऐसा नहीं कहते तो इसमें भी उक्त सूत्र से पुंवद्भाव होकर ह्रस्व उकार वाला वामोरुभार्यः ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता। 

९७३ अप्‍पूरणीप्रमाण्‍योः

पूरणार्थप्रत्‍ययान्‍तं यत्‍स्‍त्रीलिङ्गं तदन्‍तात्‍प्रमाण्‍यन्‍ताच्‍च बहुव्रीहेः अप्स्‍यात् । कल्‍याणी पञ्चमी यासां रात्रीणां ताः कल्‍याणी पञ्चमा रात्रयः । स्‍त्री प्रमाणी यस्‍य स स्‍त्रीप्रमाणः । अप्रियादिषु किम् ? कल्‍याणीप्रिय इत्‍यादि ।।

पूरणार्थक प्रत्ययान्त जो स्त्रीलिंग शब्द, तदन्त बहुव्रीहि से तथा प्रमाणीशब्दान्त बहुव्रीहि से समासान्त अप् प्रत्यय हो। कल्याणीपञ्चमा रात्रयः। कल्याणी पञ्चमी यासां रात्रीणाम् में पञ्चन् इस संख्यावाचक शब्द से पूरणार्थक प्रत्यय होकर स्त्रीलिंग में पञ्चमी बना है। अनेकमन्यपदार्थे से समास होकर, सुप् के लुक् होने के बाद कल्याणी पञ्चमी बना। यहाँ पर समानाधिकरण स्त्रीलिंग के उत्तरपद परे होने पर भी अपूरणीप्रियादिषु से निषेध होने के कारण स्त्रियाः पुंवद्धाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु से पुंवद्भाव नहीं हुआ किन्तु अप् पूरणीप्रमाण्योः से समासान्त अप् प्रत्यय होकर कल्याणीपञ्चमी अ बना। यस्येति च से ईकार का लोप, वर्णसम्मलेन होकर कल्याणीपञ्चम् बना। अब अजाद्यतष्टाप् से टाप्, अनुबन्धलोप, दीर्घ होकर कल्याणीपञ्चमा बना। जस् विभक्ति का रूप कल्याणीपञ्चमाः सिद्ध हुआ। 
स्त्रीप्रमाणः। स्त्री प्रमाणी यस्य सः में समास, सुप् के लक् होने के बाद स्त्रीप्रमाणी बना । यहाँ पर स्त्री शब्द भाषितपुंस्क नहीं है। अतः पुंवद्धाव प्राप्त नहीं है। यहाँ अप् पूरणीप्रमाण्योः से समासान्त अच् प्रत्यय होकर स्त्रीप्रमाणी अ बना। यस्येति च से ईकार का लोप, वर्णसम्मलेन होकर स्त्रीप्रमाण बना। सु रुत्व, विसर्ग करने पर स्त्रीप्रमाणः सिद्ध हुआ।
अप्रियादिषु किम्? कल्याणीप्रियः। यह पूर्वसूत्र में दिये अपूरणी-प्रियादिषु का प्रत्युदाहरण है। वहाँ पूरणार्थक प्रत्ययान्त शब्द तथा प्रियादि शब्द के  परे रहने पर पुंवद्धाव का निषेध किया गया है। स्त्रियाः पुंवद्धाषितपुंस्कादनूङ् समानाधिकरणे स्‍त्रियामपूरणीप्रियादिषु में यदि अप्रियादिषु यह नहीं कहते तो प्रिय आदि के परे होने पर भी पूर्व विद्यमान स्त्रीलिंग शब्द में पुंवद्भाव होकर कल्याणप्रियः ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता।
विशेष - एकस्य पूरणः प्रथमः, द्वयोः पूरणो द्वितीयः, त्रयाणां पूरणः तृतीयः, आदि में संख्यावाचक शब्दों से तद्धित पूरणार्थक प्रत्यय होते हैं। ऐसे शब्दों के साथ में समास होने पर पुंवद्भाव न होकर समासान्त अप् प्रत्यय इस सूत्र के द्वारा किया जाता है। 

९७४ बहुव्रीहौ सक्‍थ्‍यक्ष्णोः स्‍वाङ्गात्‍षच्

स्‍वाङ्गवाचिसक्‍थ्‍यक्ष्यन्‍ताद्बहुव्रीहेः षच् स्‍यात् । दीर्घसक्‍थः । जलजाक्षी । स्‍वाङ्गात्‍किम् ? दीर्घसिक्‍थ शकटम् । स्‍थूलाक्षा वेणुयष्‍टिः । अक्ष्णोऽदर्शनादिति वक्ष्यमाणोऽच् ।।
स्वाङ्गवाची सक्थि या अक्षि शब्द जिसके अन्त में हो, ऐसे बहुव्रीहि से समासान्त षच् प्रत्यय हो।
दीर्घसक्थः। दीर्घे सक्थिनी यस्य में अनेकमन्यपदार्थे से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुप् का लोप करने पर दीर्घ + सक्थि बना। सक्थि शरीर का अंग है। अतः बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् से समासान्त षच् प्रत्यय हुआ। षकार की षः प्रत्ययस्य से इत्संज्ञा और चकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हो जाने पर अ शेष बचा। दीर्घ + सक्थि + अ हुआ। यस्येति च से सक्थि के इकार के लोप होने पर  दीर्घसक्थ् + अ हुआ। परस्पर वर्णसम्मलेन होकर दीर्घसक्थ बना। दीर्घ और सक्थि दोनों शब्द नपुंसकलिंग के थे किन्तु समास करने से समासशक्ति के बल पर समस्त शब्द पुँल्लिंग में बदल गया। एकदेशविकृतन्यायेन प्रातिपदिक मानकर सु विभक्ति, रूत्वविसर्ग करके दीर्घसक्थः सिद्ध हुआ।
जलजाक्षी। जलजे इव अक्षिणी यस्याः में समास आदि कार्य करने के बाद बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् से षच् हुआ । अनुबन्धलोप, यस्येति च से अक्षि के इकार का लोप करने पर जलजाक्ष शब्द बना। स्त्रीत्व की विवक्षा में षिदन्त मानकर षिद्गौरादिभ्यश्च से ङीष् प्रत्यय, अनुबन्ध लोप, पुनः यस्येति च से जलजाक्ष के अन्त्य अकार को लोप करके जलजाक्षी बना। प्रातिपदिक मानकर सु, हल्ङयादि लोप करके जलजाक्षी सिद्ध हुआ।

स्वाङ्गात् किम्? दीर्घसक्थि शकटम्। स्थूलाक्षा वेणुयुष्टिः। बहुव्रीहौ सक्थ्यक्ष्णोः स्वाङ्गात् षच् में यदि स्वाङ्गात् न कहते तो दीर्घसक्थि शकटम् ( लम्बे फड़ वाली गाड़ी, ) और स्थूलाक्षा वेणुयष्टिः ( मोटी ग्रन्थियों वाली बाँस की छड़ी ) यहाँ पर भी षच् होता और दीर्घसक्थम् तथा स्थूलाक्षी  ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता। अतः उक्त सूत्र में स्वाङ्गात् कहा गया। स्वाङ्गात् कहने से षच् प्रत्यय तथा षित्वात् ङीष् भी नहीं हुआ।  स्थूलाक्षा में अक्ष्णोऽदर्शनात् सूत्र से अ प्रत्यय होकर अजाद्यतष्टाप् से टाप् होता है।  

९७५ द्वित्रिभ्‍यां ष मूर्ध्‍नः
आभ्‍यां मूर्ध्‍न षः स्‍याद्बहुव्रीहौ । द्विमूर्धः । त्रिमूर्धः ।।
बहुव्रीहि समास में द्वि तथा त्रि शब्द से परे मूर्धन् शब्द को समासान्त ष प्रत्यय हो।
द्विमूर्धः। । द्वौ मूर्धानौ यस्य सः में अनेकमन्यपदार्थे से समास होकर द्विमूर्धन् बना। द्वित्रिभ्यां ष मूर्ध्नः से समासान्त षच् प्रत्यय, अनुबन्ध लोप करने पर द्विमूर्धन् + अ बना। द्विमूर्धन् के अन् भाग की टि संज्ञा, नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप करने पर द्विमूर्ध् + अ हुआ। वर्णसंयोग होने पर द्विमूर्ध हुआ। इससे सु प्रत्यय करके द्विमूर्धः बना। स्त्रीत्व विवक्षा में षित्त्वात् षिद्गौरादिभ्यश्च से ङीष् होकर द्विमूर्ध्नी बनता है।

 त्रिमूर्धः। द्विमूर्धः की तरह ही त्रिमूर्धः बनेगा।

९७६ अन्‍तर्बहिभ्‍यां च लोम्‍नः

आभ्‍यां लोम्‍नोऽप्‍स्‍याद्बहुव्रीहौ । अन्‍तर्लोमः । बहिर्लोमः ।।

बहुव्रीहि समास में अन्तर् और बहिस् इन अव्यय शब्दों से परे लोमन् शब्द से समासान्त अप् प्रत्यय हो।
अन्तर्लोमः। अन्तर्लोमानि यस्य सः लौकिक विग्रह और अन्तर् + लोमन् जस् अलौकिक विग्रह में अनेकमन्यपदार्थे से समास होकर अन्तर्लोमन् बना। अन्‍तर्बहिभ्‍यां च लोम्‍नः से समासान्त अप् प्रत्यय करके अन्तर्लोमन् + अ बना। नस्तद्धिते से टिसंज्ञक अन् का लोप करके अन्तर्लोम  बना। इससे सु प्रत्यय, रुत्व, विसर्ग करके अन्तर्लोमः रूप बना।

बहिर्लोमः। बहिर्लोमानि यस्य सः लौकिक विग्रह और बहिस् + लोमन् जस् अलौकिक विग्रह में समास तथा समासान्त अप् प्रत्यय, टिलोप आदि कार्य करके अन्तर्लोमः की तरह बहिर्लोमः बनता है।

९७७ पादस्‍य लोपोऽहस्‍त्‍यादिभ्‍यः

हस्‍त्‍यादिवर्जितादुपमानात्‍परस्‍य पादशब्‍दस्‍य लोपः स्‍याद्बहुव्रीहौ । व्‍याघ्रस्‍येव पादावस्‍य व्‍याघ्रपात् । अहस्‍त्‍यादिभ्‍यः किम् ? हस्‍तिपादः । कुसूलपादः ।।


९७८ संख्‍यासुपूर्वस्‍य

पादस्‍य लोपः स्‍यात्‍समासान्‍तो बहुव्रीहौ । द्विपात् । सुपात् ।।

९७९ उद्विभ्‍यां काकुदस्‍य

लोपः स्‍यात् । उत्‍काकुत् । विकाकुत् ।।

९८० पूर्णाद्विभाषा

पूर्णकाकुत् । पूर्णकाकुदः ।।

९८१ सुहृद्दुर्हृदौ मित्रामित्रयोः

सुदुभ्‍र्यां हृदयस्‍य हृद्भावो निपात्‍यते । सुहृन्‍मित्रम् । दुर्हृदमित्रः ।।

९८२ उरः प्रभृतिभ्‍यः कप्

९८३ सोऽपदादौ

पाशकल्‍पककाम्‍येषु विसर्गस्‍य सः ।।

९८४ कस्‍कादिषु च

एष्‍विण उत्तरस्‍य विसर्गस्‍य षोऽन्‍यस्‍य तु सः । इति सः । व्‍यूढोरस्‍कः ।।

९८५ इणः षः

इण उत्तरस्‍य विसर्गस्‍य षः पाशकल्‍पककाम्‍येषु परेषु । प्रियसर्पिष्‍कः ।।

९८६ निष्‍ठा

निष्‍ठान्‍तं बहुव्रीहौ पूर्वं स्‍यात् । युक्तयोगः ।।

९८७ शेषाद्विभाषा

अनुक्तसमासान्‍ताद्बहुव्रीहेः कब्‍वा । महायशस्‍कःमहायशाः ।।

इति बहुव्रीहिः ।। ४ ।।

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