तनोति (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, एकवचन)
1.
धातु निर्देश: 'तनु विस्तारे' धातु (फैलना अर्थ में) से 'वर्तमाने लट्' सूत्र द्वारा लट् लकार प्राप्त होता
है।
2.
प्रत्यय विधान: लट् के स्थान पर 'तिप्तस्झि...' सूत्र से प्रथम पुरुष
एकवचन में 'तिप्' प्रत्यय आता है।
* अवस्था: तन् + ति (यहाँ 'तनु' के उकार की इत् संज्ञा होकर 'तन्' शेष रहता है)।
3.
विकरण (शप् का बाध): सामान्यतः कर्ता अर्थ में 'शप्' प्रत्यय प्राप्त होता है, किन्तु उसे बाधकर 'तनादिकृञ्भ्य उः' (सूत्र संख्या ६७४) सूत्र से 'उ' प्रत्यय (विकरण) होता है।
* अवस्था: तन् + उ + ति
4.
संज्ञा निर्धारण:
* यह 'उ' विकरण
न तो 'शित्' (श् की इत् संज्ञा वाला)
है और न ही 'पित्' (प् की इत् संज्ञा
वाला), अतः इसकी सार्वधातुक संज्ञा नहीं होती बल्कि 'आर्धधातुकं शेषः' से आर्धधातुक संज्ञा हो जाती है।
* 'ति' प्रत्यय 'तिङ्' होने के कारण सार्वधातुक है।
5.
गुण कार्य: 'ति' (सार्वधातुक प्रत्यय) परे होने के कारण, प्रत्यय के उकार (जो कि इगन्त अंग है) को 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः'
सूत्र से गुण (ओ) हो जाता है।
* अवस्था: तन् + ओ + ति
6.
वर्ण सम्मेलन: वर्णों को आपस में जोड़ने पर 'तनोति' रूप सिद्ध होता है।
विशेष तथ्य:
*
तनादिप्रकरण धातु-प्रकरण में आठवां प्रकरण है।
*
इस गण की धातुओं में 'शप्' को बाधकर 'उ' विकरण का होना ही मुख्य विशेषता है।
*
'तिप्', 'सिप्' और 'मिप्' प्रत्यय 'पित्' होने के कारण गुण के प्रति बाधक नहीं होते, जबकि
अन्य 'अपित्' प्रत्ययों के परे होने पर
'क्निति च' सूत्र से गुण का निषेध हो
जाता है (जैसे: तनुतः)।
तनुतः (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, द्विवचन)
1.
धातु एवं लकार: 'तनु विस्तारे' धातु से 'वर्तमाने
लट्' सूत्र द्वारा वर्तमान काल की विवक्षा में लट् लकार
प्राप्त होता है।
2.
प्रत्यय विधान: लट् के स्थान पर प्रथम पुरुष द्विवचन में 'तस्' प्रत्यय आता है।
* अवस्था: तन् + तस् (धातु के
उकार की इत् संज्ञा और लोप होने पर 'तन्' शेष रहता है)।
3.
विकरण (उ प्रत्यय): तनादिगण होने के कारण 'कर्तरि शप्' से प्राप्त 'शप्' विकरण का बाध करके 'तनादिकृञ्भ्य
उः' (सूत्र संख्या ६७४) सूत्र से 'उ'
विकरण होता है।
* अवस्था: तन् + उ + तस्
4.
ङित् भाव (गुण का निषेध): 'तस्' प्रत्यय 'अपित्' (जिसमें 'प्' की इत् संज्ञा नहीं हुई है) है। 'सार्वधातुकमपित्'
सूत्र के अनुसार, जो सार्वधातुक प्रत्यय 'पित्' नहीं होते, वे 'ङित्' की तरह माने जाते हैं।
5.
गुण निषेध: चूँकि 'तस्' प्रत्यय 'ङित्' की तरह है, इसलिए 'क्निति च' सूत्र के कारण यहाँ अंग के उकार को
प्राप्त होने वाला गुण (ओ) नहीं होता है।
6.
रूप निष्पत्ति:
* अवस्था: तन् + उ + तस्
* 'स' को 'ससजुषो
रुः' से रुत्व और 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः'
से विसर्ग करने पर 'तः' बनता
है।
* वर्ण सम्मेलन करने पर 'तनुतः' रूप सिद्ध होता है,।
मुख्य अंतर: जहाँ 'तनोति' (एकवचन) में 'तिप्' प्रत्यय 'पित्' होने के कारण गुण कार्य होता है, वहीं 'तनुतः' में 'तस्' प्रत्यय के 'अपित्'
और 'ङित्' होने के कारण 'क्निति च' सूत्र से गुण का निषेध हो जाता है।
तन्वन्ति (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, बहुवचन)
1.
धातु एवं लकार: 'तनु विस्तारे' धातु से वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' सूत्र द्वारा लट् लकार प्राप्त होता
है।
2.
प्रत्यय विधान: 'तिप्तस्झि...' सूत्र से प्रथम पुरुष बहुवचन में 'झि' प्रत्यय आता है।
* अवस्था: तन् + झि (यहाँ 'तनु' के उकार की इत् संज्ञा होकर 'तन्' शेष रहता है)।
3.
झकार को अन्तादेश: 'झोऽन्तः' सूत्र से 'झ' के स्थान पर 'अन्त्'
आदेश होता है, जिससे प्रत्यय 'अन्ति' बन जाता है।
* अवस्था: तन् + अन्ति
4.
विकरण (उ प्रत्यय): तनादिगण की धातु होने के कारण 'शप्' का बाध करके 'तनादिकृञ्भ्य उः' सूत्र से 'उ' विकरण होता है।
* अवस्था: तन् + उ + अन्ति
5.
ङित् भाव और गुण निषेध: 'अन्ति' प्रत्यय 'अपित्' (जिसमें 'प्' की इत् संज्ञा नहीं है) है। 'सार्वधातुकमपित्'
सूत्र से इसे 'ङित्' माना
जाता है, जिसके कारण 'क्निति च'
सूत्र से यहाँ गुण (ओ) का निषेध हो जाता है।
6.
यण् सन्धि: चूँकि गुण का निषेध हो चुका है, इसलिए 'तन् + उ + अन्ति'
की स्थिति में 'इको यणचि' सूत्र प्रवृत्त होता है। यहाँ 'उ' (इक्) के बाद 'अ' (अच्) आने के
कारण 'उ' के स्थान पर 'व्' (यण्) आदेश हो जाता है।
* अवस्था: तन् + व् + अन्ति
7.
वर्ण सम्मेलन: वर्णों को आपस में जोड़ने पर 'तन्वन्ति' रूप सिद्ध होता है।





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