लघुसिद्धान्तकौमुदी (तनादिप्रकरणम्)



तनु विस्‍तारे ।। १ ।।
६७६ तनादिकृञ्भ्‍य उः
तनादेः कृञश्च उः प्रत्ययः स्यात्। शपोऽपवादः । तनोतितनुते । ततानतेने । तनितासितनितासे । तनोतु । तनुताम् । अतनोत्अतनुत । तनुयात्तन्‍वीत । तन्‍यात्तनिषीष्‍ट । अतानीत्अतनीत् ।।

तनोति (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, एकवचन)

1.  धातु निर्देश: 'तनु विस्तारे' धातु (फैलना अर्थ में) से 'वर्तमाने लट्' सूत्र द्वारा लट् लकार प्राप्त होता है।

2.  प्रत्यय विधान: लट् के स्थान पर 'तिप्तस्झि...' सूत्र से प्रथम पुरुष एकवचन में 'तिप्' प्रत्यय आता है।

    *   अवस्था: तन् + ति (यहाँ 'तनु' के उकार की इत् संज्ञा होकर 'तन्' शेष रहता है)।

3.  विकरण (शप् का बाध): सामान्यतः कर्ता अर्थ में 'शप्' प्रत्यय प्राप्त होता है, किन्तु उसे बाधकर 'तनादिकृञ्भ्य उः' (सूत्र संख्या ६७४) सूत्र से '' प्रत्यय (विकरण) होता है।

    *   अवस्था: तन् + उ + ति

4.  संज्ञा निर्धारण:

    *   यह '' विकरण न तो 'शित्' (श् की इत् संज्ञा वाला) है और न ही 'पित्' (प् की इत् संज्ञा वाला), अतः इसकी सार्वधातुक संज्ञा नहीं होती बल्कि 'आर्धधातुकं शेषः' से आर्धधातुक संज्ञा हो जाती है।

    *   'ति' प्रत्यय 'तिङ्' होने के कारण सार्वधातुक है।

5.  गुण कार्य: 'ति' (सार्वधातुक प्रत्यय) परे होने के कारण, प्रत्यय के उकार (जो कि इगन्त अंग है) को 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' सूत्र से गुण (ओ) हो जाता है।

    *   अवस्था: तन् + ओ + ति

6.  वर्ण सम्मेलन: वर्णों को आपस में जोड़ने पर 'तनोति' रूप सिद्ध होता है।

 

विशेष तथ्य:

*   तनादिप्रकरण धातु-प्रकरण में आठवां प्रकरण है।

*   इस गण की धातुओं में 'शप्' को बाधकर '' विकरण का होना ही मुख्य विशेषता है।

*   'तिप्', 'सिप्' और 'मिप्' प्रत्यय 'पित्' होने के कारण गुण के प्रति बाधक नहीं होते, जबकि अन्य 'अपित्' प्रत्ययों के परे होने पर 'क्निति च' सूत्र से गुण का निषेध हो जाता है (जैसे: तनुतः)।

तनुतः (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, द्विवचन)

1.  धातु एवं लकार: 'तनु विस्तारे' धातु से 'वर्तमाने लट्' सूत्र द्वारा वर्तमान काल की विवक्षा में लट् लकार प्राप्त होता है।

2.  प्रत्यय विधान: लट् के स्थान पर प्रथम पुरुष द्विवचन में 'तस्' प्रत्यय आता है।

    *   अवस्था: तन् + तस् (धातु के उकार की इत् संज्ञा और लोप होने पर 'तन्' शेष रहता है)।

3.  विकरण (उ प्रत्यय): तनादिगण होने के कारण 'कर्तरि शप्' से प्राप्त 'शप्' विकरण का बाध करके 'तनादिकृञ्भ्य उः' (सूत्र संख्या ६७४) सूत्र से '' विकरण होता है।

    *   अवस्था: तन् + उ + तस्

4.  ङित् भाव (गुण का निषेध): 'तस्' प्रत्यय 'अपित्' (जिसमें 'प्' की इत् संज्ञा नहीं हुई है) है। 'सार्वधातुकमपित्' सूत्र के अनुसार, जो सार्वधातुक प्रत्यय 'पित्' नहीं होते, वे 'ङित्' की तरह माने जाते हैं।

5.  गुण निषेध: चूँकि 'तस्' प्रत्यय 'ङित्' की तरह है, इसलिए 'क्निति च' सूत्र के कारण यहाँ अंग के उकार को प्राप्त होने वाला गुण (ओ) नहीं होता है।

6.  रूप निष्पत्ति:

    *   अवस्था: तन् + उ + तस्

    *   '' को 'ससजुषो रुः' से रुत्व और 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से विसर्ग करने पर 'तः' बनता है।

    *   वर्ण सम्मेलन करने पर 'तनुतः' रूप सिद्ध होता है,

 

मुख्य अंतर: जहाँ 'तनोति' (एकवचन) में 'तिप्' प्रत्यय 'पित्' होने के कारण गुण कार्य होता है, वहीं 'तनुतः' में 'तस्' प्रत्यय के 'अपित्' और 'ङित्' होने के कारण 'क्निति च' सूत्र से गुण का निषेध हो जाता है।

तन्वन्ति (तनु विस्तारे - तनादिगण, परस्मैपद, प्रथम पुरुष, बहुवचन)

 

1.  धातु एवं लकार: 'तनु विस्तारे' धातु से वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' सूत्र द्वारा लट् लकार प्राप्त होता है।

2.  प्रत्यय विधान: 'तिप्तस्झि...' सूत्र से प्रथम पुरुष बहुवचन में 'झि' प्रत्यय आता है।

    *   अवस्था: तन् + झि (यहाँ 'तनु' के उकार की इत् संज्ञा होकर 'तन्' शेष रहता है)।

3.  झकार को अन्तादेश: 'झोऽन्तः' सूत्र से '' के स्थान पर 'अन्त्' आदेश होता है, जिससे प्रत्यय 'अन्ति' बन जाता है।

    *   अवस्था: तन् + अन्ति

4.  विकरण (उ प्रत्यय): तनादिगण की धातु होने के कारण 'शप्' का बाध करके 'तनादिकृञ्भ्य उः' सूत्र से '' विकरण होता है।

    *   अवस्था: तन् + उ + अन्ति

5.  ङित् भाव और गुण निषेध: 'अन्ति' प्रत्यय 'अपित्' (जिसमें 'प्' की इत् संज्ञा नहीं है) है। 'सार्वधातुकमपित्' सूत्र से इसे 'ङित्' माना जाता है, जिसके कारण 'क्निति च' सूत्र से यहाँ गुण (ओ) का निषेध हो जाता है।

6.  यण् सन्धि: चूँकि गुण का निषेध हो चुका है, इसलिए 'तन् + उ + अन्ति' की स्थिति में 'इको यणचि' सूत्र प्रवृत्त होता है। यहाँ '' (इक्) के बाद '' (अच्) आने के कारण '' के स्थान पर 'व्' (यण्) आदेश हो जाता है।

    *   अवस्था: तन् + व् + अन्ति

7.  वर्ण सम्मेलन: वर्णों को आपस में जोड़ने पर 'तन्वन्ति' रूप सिद्ध होता है।

 

सारांश: 'तन्वन्ति' की सिद्धि में मुख्य अंतर यह है कि बहुवचन का प्रत्यय 'अच्' (स्वर) से शुरू होने के कारण यहाँ 'इको यणचि' से यण् संधि होती है, जबकि 'तनुतः' में प्रत्यय 'हल्' (व्यंजन) से शुरू होने के कारण संधि नहीं होती थी।
६७७ तनादिभ्‍यस्‍तथासोः
तनादेः सिचो वा लुक् स्‍यात्तथासोः । अततअतनिष्‍ट । अतथाःअतनिष्‍टाः । अतनिष्‍यत्अतनिष्‍यत ।। षणु दाने ।। २ ।। सनोतिसनुते ।।
६७८ ये विभाषा
जनसनखनामात्‍वं वा यादौ क्‍ङिति । सायात्सन्‍यात् ।।
६७९ जनसनखनां सञ्झलोः
एषामाकारेऽन्‍तादेशः स्‍यात् सनि झलादौ क्‍ङिति । असातअसनिष्‍ट ।। क्षणु हिंसायाम् ।। ३ ।। क्षणोतिक्षणुते ।। ह्‍म्‍यन्‍तेति न वृद्धिः । अक्षणीत्अक्षतअक्षणिष्‍ट । अक्षथाःअक्षणिष्‍ठाः ।। क्षिणु च ।। ४ ।। अप्रत्‍यये लघूपधस्‍य गुणो वा । क्षेणोतिक्षिणोति । क्षेणिता । अक्षेणीत्अिक्षतअक्षेणिष्‍ट ।। तृणु अदने ।। ५ ।। तृणोतितर्णोतितृणुतेतर्णुते ।। डुकृञ् करणे ।। ६ ।। करोति ।।
६८० अत उत्‍सार्वधातुके
उप्रत्‍ययान्‍तस्‍य कृञोऽकारस्‍य उः स्‍यात् सार्वधातुके क्‍ङिति । कुरुतः ।।
६८१ न भकुर्छुराम्
भस्‍य कुर्छुरोरुपधाया न दीर्घः । कुर्वन्‍ति ।।
६८२ नित्‍यं करोतेः
करोतेः प्रत्‍ययोकारस्‍य नित्‍यं लोपो म्‍वोः परयोः । कुर्वः । कुर्मः । कुरुते । चकारचक्रे । कर्तासिकर्तासे । करिष्‍यतिकरिष्‍यते । करोतु । कुरुताम् । अकरोत् । अकुरुत ।।
६८३ ये च
कृञ उलोपो यादौ प्रत्‍यये परे । कुर्यात्कुर्वीत । क्रियात्कृषीष्‍ट । अकार्षीत्अकृत । अकरिष्‍यत्अकरिष्‍यत ।।
६८४ सम्‍परिभ्‍यां करोतौ भूषणे
६८५ समवाये च
सम्‍परिपूर्वस्‍य करोतेः सुट् स्‍याद् भूषणे संघाते चार्थे । संस्‍करोति । अलङ्करोतीत्‍यर्थः । संस्‍कुर्वन्‍ति । सङ्घीभवन्‍तीत्‍यर्थः । सम्‍पूर्वस्‍य क्‍वचिदभूषणेऽपि सुट् । संस्‍कृतं भक्षा इति ज्ञापकात् ।।
६८६ उपात्‍प्रतियत्‍नवैकृतवाक्‍याध्‍याहारेषु च
उपात्‍कृञः सुट् स्‍यादेष्‍वर्थेषु चात्‍प्रागुक्तयोरर्थयोः । प्रतियत्‍नो गुणाधानम् । विकृतमेव वैकृतं विकारः । वाक्‍याध्‍याहार आकाङि्क्षतैकदेशपूरणम् । उपस्‍कृता कन्‍या । उपस्‍कृता ब्राह्‍मणाः । एधोदकस्‍योपस्‍करोति । उपस्‍कृतं भुङ्क्ते । उपस्‍कृतं ब्रूते ।। वनु याचने ।। ७ ।। वनुते । ववने ।। मनु अवबोधने ।। ८ ।। मनुते । मेने । मनिष्‍यते । मनुताम् । अमनुत । मन्‍वीत । मनिषीष्‍ट । अमतअमनिष्‍ट । अमनिष्‍यत ।।
इति तनादयः ।। ८ ।।

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