संस्कृत पत्रकारिता की मानक भाषा


    भाषाई स्तर पर संस्कृत पत्रकारिता आज दो वर्गों में विभक्त है। 1. परम्परावादी, जिनकी आत्मा व्याकरण में बसती है। 2. व्यवहारवादी, जो भाषा को अभिगम और सम्प्रेषण का माध्यम मानते हैं। परम्परावादी भी सम्प्रेषणीयता को स्वीकार करते हैं पर कठिन शब्दावली का मोह नहीं छोड पाते। व्यवहारवादी शास्त्रीय संस्कृत लिखने वाले को हेय दृष्टि से देखते हैं,क्योंकि उनकी भाषा पाठक वर्ग के समझ से पड़े होता है। पत्रकारिता की भाषा इतनी सहज और सरल होनी चाहिए कि वह बड़े समूह को आसानी से समझ में आ सके। मैं अपने पूर्व के आलेख में लिख चुका हूँ कि ग्रन्थ लेखन की भाषा से पत्रकारिता की भाषा भिन्न होनी चाहिए। पुस्तक लिखने में आप तय करते हैं कि इसकी भाषा क्या हो? इसमें आप स्वतंत्र होते हैं,परन्तु पत्रिका की भाषा आम पाठक से तय होती है कि उसके समझ में किस प्रकार की भाषा आती है। पत्रकारिता का उद्येश्य भाषा ज्ञान प्रदर्शन नहीं है। भाषा का सामर्थ्य इसमें है कि पत्र- पत्रिका में जो कुछ लिखा जा रहा है,वह पाठक के समझ में आ रहा है कि नहीं।  संधि, समास, अनावश्यक विशेष्य विशेषण भाव, णिच आदि कठिन प्रत्यय युक्त, कर्मवाच्य की बहुलता,व्यंजना शैलीशास्त्रीयता का अति आग्रह  पत्रकारिता की भाषा की दुर्बलता है। कुल मिलाकर पत्रकारिता का लक्ष्य संदेश प्रेषण है,व्याकरण बोध कराना नहीं। इसमें छोटे-छोटे वाक्यों का प्रयोग किया जाना चाहिए। तिङन्त पद (क्रिया पद ) सबसे अंत में रखना चाहिए। उदाहरण के लिए बेङ्गलूरु से प्रकाशित सम्भाषणसन्देशः में प्रयोग की जानी वाली भाषा देखें- तदा सः तरुणः अवदत्। पाक्षिक पत्रिका वाक् में अयं मेलः एकमासं यावत् प्रचलिष्यति। आरम्भदिने प्रथमं शाहीस्नानं आयोज्यते। इसी प्रकार त्रैमासिक ई-पत्रिका संस्कृतसर्जना http://sanskritsarjana.in/ में भी सुबोध शब्दों के प्रयोग किये जाते हैं। हरिद्वार से प्रकाशित होने वाली मासिक संस्कृत पत्रिका भारतोदय में लिखे एक वाक्य को देखें-तदीयमनल्पकल्पनाप्रसूतिमुपलभ्य। बच्चों के लिए दिल्ली से प्रकाशित मासिक संस्कृत बाल पत्रिका की भाषा कहीं- कहीं कठिन हो गयी है यथा- अस्मद्विधानां कस्मादप्यात्मक्षतादार्तिनं भवतिअनुकम्पितास्म्यनुग्रीतास्म्यहन्तोsमुना सहयोगभावेनात्रागमनेन। क्या इस प्रकार के भाषा का प्रयोग बच्चों के लिए उचित है? अस्तु।
                        आज संस्कृत पत्रकारिता की भाषा का मानक स्थिर करने की अति आवश्यक है। अन्यथा हम अल्पसंख्यक संस्कृतज्ञों और बहुसंख्यक संस्कृत प्रेमियों के बीच अपनी पैठ नहीं बना सकते।
पत्रकारिता में नये शब्दों के निर्माण एवं प्रयोग
      विश्व में लगभग प्रतिदिन नये खोज, नये अविष्कार होते रहते हैं। उनके लिए उपयुक्त शब्दों की आवश्यकता होती है। समाज की भाषा भी नित्य परिवर्तनशील है। मुद्रित माध्यम, दूरसंचार के चैनल तथा अन्तः संजाल द्वारा चालित जनसंचार पर नये-नये शब्द आते रहते हैं। जैसे- मनरेगा, (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम MNREGA)  सीसैट, (सिविल सर्विसेज एप्टीट्यूड टेस्ट ,सीसैट) एसटीपी, (सीवरेज वाटर ट्रीटमेंट प्लांट, एसटीपी)। कहीं अंग्रेजी के शब्दों को तो कहीं हिन्दी के शब्दों का संक्षेपीकरण कर व्यवहार में लाया जाता है। क्रीडा, शिक्षा,व्यापार,स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र वैश्विक होते हैं। यहाँ के अधिकांश शब्द अंग्रेजी तथा अन्य विदेशी भाषा के होते हैं। संस्कृत पत्रकारिता में उनमें से किन-किन शब्दों के अनुवाद की आवश्यकता है अथवा किन्हें सीधे स्वीकार कर प्रयोग में लाया जाय? इसी प्रकार भारत में ही अनेक आंचलिक शब्द हैं। महिलाओं के नाम पुलिंगवाची होते हैं। संस्कृत में सद्यः प्रसूत शब्दों के भाव को व्यक्त करने योग्य शब्दों के निर्माण का सामर्थ्य है। यही इसकी खामी भी है और खूबी भी। खामी यह कि एक शब्द के लिए अनेक विद्वानों द्वारा अनेक शब्द पैदा कर दिये जाते हैं, जो भोले पाठकों को भ्रमित और परेशान करने वाले होते हैं। उसे चलन में लाने में भारी असुविधा होती है। एक ही वस्तु या भाव के लिए अलग-अलग शब्दों का प्रयोग न कर एक ही शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। । शब्द निर्माण की प्रक्रिया में कुछ संस्कृतज्ञ सम्पादक ऐसे कठिन शब्द का निर्माण कर बैठते हैं कि वह पाठकों को उच्चारण करने में असंभव सा दिखता है। नये शब्द ऐसे हों जो पाठकों को रंजित करे, भयभीत नहीं।
      नित नूतन उत्पन्न होने वाले शब्दों के मानकीकरण के लिए एक शब्दकोश के निर्माण की आवश्यकता है, जो पत्रिका के सम्पादकों तथा आम जन के लिए सहायक सिद्ध हो।
            पत्रिकाओं में लिखी जानी वाली भाषा स्पष्ट, सटीक तथा छोटे-छोटे वाक्य वाले हों। यहां यथा सम्भव व्यंजना तथा लक्षणा का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए। कथा, उदाहरण के लिए कल्पित नाम में विविधता एवं समाज में प्रचलित नाम के अनुरुप होना चाहिए। देवदत्त और यज्ञदत्त ही न रख दिये जायें। पत्रकारिता का उद्देश्य सम्प्रेष्ण और अभिगम है। भाषा ज्ञान प्रदर्शन नहीं। समाज की भाषा से पत्रकारिता में प्रयुक्त संस्कृत भाषा बहुत पृथक् न दिखे। यह देखना चाहिए कि समाज में प्रचलित शब्दों में से कितने शब्द ऐसे हैं, जो वाक्य विन्यास की दृष्टि से भी भारतीय भाषा के निकट हो।  इसकी भाषा इतनी सहज और सरल हो कि संस्कृत की आरम्भिक कक्षा में पढ़ने वाले छात्र भी सहजतया समझ सकें। संधि, समास तथा विजन्त प्रयोग से बाहर निकलकर सरल तथा व्याकरण सम्मत वाक्य का प्रयोग किया जाना चाहिए। नये शब्दों को गढ़ने तथा प्रचलन में लाने में संस्कृत पत्रकारों की महती भूमिका है। कुछ ऐसी भी संस्कृत पत्रिका उद्भूत हुई है, जिसका नाम अंगेजी में रखा गया है। स्वयं को प्रगतिशील और संस्कृत के सरलीकरण के पुरोधा सम्पादक सरल संस्कृत के स्थान पर बनावटी संस्कृत का प्रयोग करने लगे हैं। सरलता के मोह में अनुशासनहीन भाषा कभी स्वीकार नहीं की जा सकती। उर्दू तथा अंग्रेजी के शब्दों को यथावत् स्वीकार कर संस्कृत रूप में प्रयोग कहाँ तक उचित है? हमेशा याद रखना चाहिए कि संस्कृत में शब्द निर्माण का सामर्थ्य है, परन्तु वह सामर्थ्य अनुशासन के परिधि से बाहर नहीं है। अनुशासन हमारी ऋषि परम्परा है। अथ शब्दानुशासनम्। अथ योगानुशासनम्। मैं जोर देकर कहता हूँ। पत्रिका की भाषा ऐसी हो कि मानक के विनिश्चय के लिए लोग संस्कृत पत्रिका को उठाकर देखें।
            पत्रिका की भाषा शालीन हो। अपनी बात पुरजोर ढंग से रखा जा सकता है। दूसरे से असहमति प्रकट की जा सकती, परन्तु संस्कृत परम्परा के अनुसार। हमारे शास्त्रकार/व्याख्याकार अपने मत की स्थापना और विरोघी मत का खण्डन के समय भी आदर सूचक शब्दों के प्रयोग करते हैं। यथाह गुरुः। वाक्यतत्वविदां मीमांसकानां पदतत्वविदां वैयाकरणानां च मतेन---। भावों को व्यक्त करने के लिए लगाये गये चित्र शालीन हों।  नये शब्दों के निर्माण, उसे चलन में लाना पत्रकारिता के लिए चुनौती है। सर्वप्रथम वही स्थिर करता है कि कौन सा शब्द समाज के लिए बोधगम्य होगा और किसे चलन में लाना है। इस प्रकार संस्कृत के उत्थान और नवनिर्माण में संस्कृत पत्रकारिता की महती भूमिका है। जिस पत्रिका की भाषा सरल और बोधगम्य होती है, उससे पाठक जुडना पसन्द करते हैं। आसानी से जुडते हैं।
संस्कृत की शोध पत्रिकायें और उसकी भाषा
 संस्कृत में बहुतायत शोध पत्रिकायें प्रकाशित होती है। अनेक  शोध पत्रिकाओं के प्रकाशक धन लेकर शोध पत्र छापने लगे हैं। उनका मूल उद्येश्य शोध पत्रिका द्वारा धनार्जन है।  यहाँ न तो शोध लेख की भाषा पर ध्यान दिया जाता है न ही विषय वस्तु पर। एक निर्धारित Font में लेख मंगवाने के बाद उसे यथावत् प्रकाशित कर दिया जाता है।इसका स्वामित्व किसी और के पास होता है। इसमें ऐसे- ऐसे लोग सम्पादक बनते हैं,जिन्हें संस्कृत में पकड़ तो होती ही नहीं, पत्रकारिता का ककहरा भी नहीं जानते। किसी पत्रकार सम्मेलन में नहीं जाते।  कुछ पत्रिकायें संस्कृत विषय पर हिन्दी तथा अन्य भाषा में लेख छापते हैं।  इस प्रकार की पत्रिका से भाषा के मानकीकरण की अपेक्षा नहीं की जा सकती। ऐसे सम्पादक द्वारा सम्पादित पत्रिका में वह भाषायी संस्कार नहीं दिखता, जो संस्कृत पत्रकारिता के लिए आवश्यक है।
  दूसरी श्रेणी की पत्रिका वह है, जो किसी सरकारी संस्था के स्वामित्व में प्रकाशित होती है। यहाँ के सम्पादकों को केवल भाषा चयन की स्वतंत्रता रहती है, विषय चयन की नहीं। ये सुनिश्चित मानदेय पर नियुक्त होते हैं। इनमें पत्रकारिता की वह धार नहीं होती। ये निष्पक्ष लेखन नहीं कर सकते। इनके कथ्य सीमित तथा शास्त्र के आवरण में लिपटा रह जाता है। अतः नये शब्दों के निर्माण, उसे प्रचलन में लाने से ये सर्वथा वंचित रहते हैं। फिर भी उनमें ये स्वतंत्रता शेष है कि वे पत्रिका की मानक भाषा का निर्धारण या अनुगमन कर सकें। यहाँ मालिकों का पूर्वाग्रह नहीं है। 
      संस्कृत का दुर्भाग्य यह है कि अभी हम पत्रकारिता के लिए ऐसे युवा पीढी को अधिक मात्रा में तैयार नहीं कर पा रहे हैं,जो समसामयिक विभिन्न मुद्दों पर पत्रकारिता की भाषा में आलेख लिख सकें। उनमें संस्कृत पत्रकारिता का जज्वा हो,उत्साह हो। जो उत्साह आदरणीय वीरभद्र मिश्र में था। डॉ.शिवबालक द्विवेदी में है। हमें शोध पत्रिकाओं में दो लेख छपवाने की मानसिकता से बाहर आना होगा। शोध पत्रिका की भाषा न तो आम लोगों के समझ में आती है, न ही उन्हें इसकी जरुरत है।
        अनेक संस्कृत पत्रिकाओं में अनुवाद की पत्रकारिता की जाती है।  सम्वाद या लेख प्रदाता इतना सशक्त नहीं होता कि वह सीधे संस्कृत में लेख या संवाद लिख कर भेज सके। यहाँ  किसी तरह अनुदित कर सूचना या आलेख को प्रकाशित कर दिया जाता है। वर्तमान की अनेक संस्कृत पत्रिकाओं के युवा सम्पादक संस्कृत में अच्छी पकड़ तो रखते ही  हैं, साथ ही वे पत्रकारिता की भाषा भी बखूवी जानते हैं। इन्हीं के दम पर संस्कृत पत्रकारिता जिन्दा है। इनके द्वारा सम्पादित पत्रिकाओं की भाषा बदलते हुए समय के अनुरुप बदल रही है। यहाँ नवाचारी प्रयोग भी देखने को मिलता है।ये युवा पीढियों तक पहुँच रही है । युवा पसन्द कर रहे हैं। बस निरन्तर सुधार के लिए मिलजुल कर सामुहिक अभियान चलाने की आवश्यकता है।


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