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योग की महायात्रा

       योग की यात्रा उपनिषदों से शुरु होकर बौद्ध, जैन, तन्त्रागम, संहिता होते हुए गीता में पूर्ण होती है। इससे सिद्ध है कि योग के अनेक पथ परन्तु एक लक्ष्य है। उसे ही आत्मा और परमात्मा का मिलन अथवा समाधि कहा गया है। पातञ्जलयोग दर्शन में पतंजलि ने अपने से पूर्ववर्ती औपनिषदिक तथा सांख्य के आचार्यों के सिद्धान्तों को लेकर योग विद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। इसे अष्टांगयोग अथवा राजयोग कहते हैं। प्रस्तुत आलेख में पूर्वोक्त विषयों के साथ योग की परिभाषा, चित्त का स्वरुप, चित्त की अवस्था तथा अष्टांग साधन की चर्चा की गयी है।
   
   
मैं अपने इस ब्लाग पर प्रतिवर्ष विश्व योग दिवस के अवसर पर भारतीय योग विद्या पर लेख लिखता आया हूँ।गत वर्ष 21 जून 2016 को योग दिवस के अवसर पर योगः एक प्रायोगिक विज्ञान नामक लेख लिखा था।
योग की समस्त पुस्तकें संस्कृत भाषा में लिखी है। यहाँ अनेक पारिभाषिक शब्द होते हैं,जिसका सही अर्थ जानने के लिए हमें अन्य सन्दर्भ ग्रन्थों की सहायता लेनी पड़ती है। विना संस्कृत पढ़े गूढ़ विषय की सही जानकारी नहीं हो पाती। मेरा बचपन और अब युवावस्था इन्हीं संस्कृत ग्रन्थों के अध्ययन करते बीता। अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मुझसे जितना सम्भव हो रहा है इस वर्ष भी इस विषय पर प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध करा रहा हूँ।
भारतीय दर्शन परम्परा में योग परम्परा को तीन खण्डों में विभाजित किया जाता है। 
1. वैदिक काल (वेद तथा उपनिषद् साहित्य )
2. उत्तर वैदिक काल ( जैन, बौद्ध साहित्य, योग वाशिष्ठ, संहिता, तन्त्र, आगम ग्रन्थ आदि )
3. दर्शन काल ( पातंजल योग, गीता तथा विभिन्न शास्त्रों के दर्शन ग्रन्थ )
 उपर्युक्त योग की अविच्छिन्न परम्परा में लक्ष्य/साध्य एक ही है,परन्तु साधन भिन्न- भिन्न है। संस्कृत के ग्रन्थों में योग शब्द का प्रयोग अनेक अर्थों में किया गया है। इसका मूल कारण यह है कि इस योग शब्द की उत्पत्ति तीन अलग-अलग धातुओं से हुई है। ये मूल धातुएँ हैं-
1. युज् समाधौ- दिवादि गण   समाधि अर्थ में पतंजलि तथा सांख्य में प्रोक्त
2. युजिर् योगे-रुधादि गण      योग अर्थ में न्याय, वैशेषिक तथा वेदान्त दर्शन में प्रयुक्त
3. युज् संयमने- चुरादि गण    संयमन अर्थ में  
युजिर् में भी युज् शेष बचता है। युज् धातु से घञ् प्रत्यय करने पर योग शब्द बनता है।  भारत के प्राचीन शास्त्र ग्रन्थों में योग की परिभाषा अलग-अलग की गयी है।
 उपनिषदों में युजिर् योगे धातु से सम्पन्न योग है। संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनोः। यह जीवात्मा और परमात्मा के संयोग को लक्षित करता है,जबकि पतंजलि तथा सांख्य प्रोक्त योग युज् समाधौ धातु से सम्पन्न होने के कारण समाधि को लक्षित करता है। योग साध्य है,जिसका साधन अष्टाङ्ग है।  प्रस्तुत आलेख में गीता में कहे समत्वं योग उच्यते को आधार माना हूँ। छान्दोग्य, बृहदारण्यक,श्वेताश्वतर उपनिषद् में योग के बारे में सूत्रात्मक जानकारी मिलती है। योग दर्शन पर कुछ स्वतंत्र उपनिषदें भी प्राप्त होती है। महर्षि पतंजलि (ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी) योग के प्रथम प्रतिष्ठित आचार्य माने जाते हैं। इन्होंने ही सर्वप्रथम योग विद्या को सुव्यवस्थित रूप दिया। व्याकरण (अष्टाध्यायी पर महाभाष्य) तथा आयुर्वेद के अतिरिक्त इन्होंने योग दर्शन नामक पुस्तक की रचना की। श्रावण कृष्ण पंचमी(नागपंचमी) को वारणसी में स्थित नागकूँआ मुहल्ले में आज भी संस्कृत विद्वानों का शास्त्रार्थ होता है। माना जाता है कि इसी स्थान पर इसी तिथि को महर्षि पतंजलि का अवतार हुआ था। पतञ्जलि को शेषनाग का अवतार माना जाता है।
              योगेन चित्तस्य पदेन वाचां मलं शरीरस्य च वैद्यकेन।
              योsपाकरोत्तं प्रवरं मुनीनां पतञ्जलिं प्राञ्जलिरानतोsस्मि।

       इस पुस्तक को पातंजलयोगदर्शनम् कहा जाता है। भारतीय दर्शन में योग एक दर्शन है। तन्त्र के ग्रन्थों, उमास्वाती के तत्वार्थसूत्र में योग का वर्णन प्राप्त होते हैं। इसका चरम लक्ष्य समाधि है। पतंजलि कृत योग दर्शन पर सांख्य दर्शन का गहरा प्रभाव है। योग दर्शन के टीकाकार नारायणतीर्थ ने योगसिद्धान्त चन्द्रिका में षट्कर्म, षट्चक्र, कुण्डलिनी, शक्ति आदि नवीन विषयों की उद्भावना की। इन्होंने साधनभूत योग के क्रियायोग, चर्यायोग, कर्मयोग, हठयोग, मन्त्रयोग, ज्ञानयोग,अद्वैतयोग,लक्ष्ययोग, ब्रह्मयोग, शिवयोग, सिद्धियोग, वासनायोग, लययोग,ध्यानयोग, तथा प्रेमभक्तियोग के नाम से सूत्रों की चर्चा करते हुए राजयोग के असम्प्रज्ञात समाधि का पर्याय बताया। समाधि के दो भेदों असम्प्रज्ञात तथा सम्प्रज्ञात में अन्तर यह है कि सम्प्रज्ञात साधि चित्त की एकाग्र अवस्था में होती है,जिसमें राजसिक और तामसिक वृत्तियों का निरोध होता है। चित्त में सत्वज्ञान प्रधान वृत्तियाँ रहती है।  पतंजलि कृत राजयोग को अष्टांग योग कहा जाता है। योग की परिभाषा करते हुए पतंजलि ने कहा कि योगः चित्तवृत्तिनिरोधः। चित्त की वृत्तियों का निरोध योग है। अतः योग को समझने के पहले चित्त और उसकी वृत्ति को समझना आवश्यक है।
योग दर्शन में चित्त से मन, बुद्धि और अहंकार को लिया गया है। मन ही कर्मेन्द्रिय और ज्ञानेन्द्रिय को कार्यों में लगाये रखता है। ब्रह्मबिन्दु उपनिषद् में मन पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। एक मंत्र में कहा गया है कि-
                मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः।
                बन्धाय विषयासंगो मुक्त्यै निर्विषयं मनः ॥
अर्थात् : मन ही मानव के बंधन और मोक्ष का कारण है। इन्द्रियविषयासक्त मन बंधन का कारण है और विषयोँ से विरक्त मन मुक्ति का कारण है ।" गीता में भी अर्जुन श्रीकृष्ण से कहते हैं-
               योऽयं योगस्त्वया प्रोक्तः साम्येन मधुसूदन।
               एतस्याहं न पश्यामि चंचलत्वात्स्थितिं स्थिराम्।।6- 33
               चंचलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
               तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् || 34
अतः मन को सामान्यावस्था पर लाये विना किसी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। सुखदुःखे समे कृत्वा--। समत्वं योग उच्यते। अस्तु। 
चित्त की शुद्धि के लिए आहार और विहार (रहन सहन) का सही होना आवश्यक है, अन्यथा योग नहीं होकर केवल शारीरिक व्यायाम मात्र होकर रह जाएगा। योग के आठ अंगों को अपनाकर ही योग के चरम लक्ष्य को पाया जा सकता है। गीता में नियमित या सही-सही, नपा-तुला भोजन का निर्देश प्राप्त होता है-
              युक्ताहारविहारस्य युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु ।
              युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दु:खहा ।।6-17।।
  सत्व रज और तम इन तीनों गुणों की उद्रेक के अनुसार चित्त की निम्नलिखित तीन अवस्थाएं होती है।
1. प्रख्याशील 2. प्रकृतिशील 3. स्थितिशील। 
प्रथम अवस्था का चित्त सत्व प्रधान होता हुआ रज और तम से संयुक्त होकर अणिमा,महिमा आदि ऐश्वर्य का प्रेमी होता है। प्रकृतिशील अवस्था में तमोगुण से युक्त चित्र अधर्म, अज्ञान,अवैराग्य तथा अनैश्वर्य से संयुक्त होता है। स्थितिशील अवस्था में तम के क्षीण होने पर रजस् के अंश से युक्त होने पर चित्त सर्वत्र प्रकाशमान होता है तथा धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य से व्याप्त होता है।
         योग दर्शन में चित्त की पांच भूमियां अथवा अवस्थाएं स्वीकार की गई है। ये भूमियां है- क्षिप्त, मूढ, विक्षिप्त, एकाग्र, निरुद्ध। इन 5 अवस्थाओं का स्वरूप निर्धारण निम्नवत् है-
1. क्षिप्त-  चंचल स्वभाव को ही यहाँ क्षिप्त कहा गया है। क्षिप्त अवस्था में चित्र चंचल होकर संसार के सुख दुख आदि के लिए परेशान रहता है। इस अवस्था में रजोगुण की प्रधानता रहती है।
2. मूढ-  चित्त की मुढ अवस्था में तमोगुण बढ़ जाता है। तमोगुण के बढ़ जाने से चित्त विवेक शून्य हो जाता है, अतः मूढ़ अवस्था में विवेक न होने के कारण पुरुष क्रोध इत्यादि के द्वारा गलत कार्यों में प्रवृत्त होता है।
3. विक्षिप्त- विक्षिप्त अवस्था में रजोगुण की अपेक्षा सतोगुण का उद्रेक रहता है। सतोगुण की अधिकता के कारण विक्षिप्त अवस्था का चित्त कभी-कभी स्थिर हो जाता है। इस अवस्था में दुख साधनों की ओर प्रवृत्ति न होकर सुख के साधनों की और प्रवृति रहती है। ये तीनों अवस्थाएं समाधि के लिए अनुपयोगी है।
स्तोत्र साहित्य भी योग दर्शन के प्रभाव से अछुता नहीं रह सका। शिवमानस पूजा में योग के तत्वों का उपयोग भक्ति की पराकाष्ठा दिखाने के लिए की गयी है। भक्त अपनी निद्रा को समाधि की स्थिति कहता है।
           आत्मा त्वं गिरिजा मतिः परिजनाः प्राणाः शरीरं गृहं
           पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रासमाधिस्थितिः ।
           संचारस्तु पदोः प्रदक्षिणविधिः स्तोत्राणि सर्वा गिरो
           यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शंभो तवाराधनम् ॥ 
4. एकाग्र- एकाग्र अवस्था वह अवस्था है, जिसमें चित्त की बाह्य वृत्तियों का निरोध हो जाता है।
5. निरुद्ध-  अनिरुद्ध अवस्था में चित्त के समस्त संस्कारों तथा समस्त वृत्तियों का विलय हो जाता है। इन 5 भूमियों में से अंतिम दो भूमियां समाधि के लिए अपेक्षित है।
          पातंजल योगसूत्र के साधनपाद में योग के आठ साधनों की चर्चा की गई है। इससे अविद्या रूपी अशुद्धि का क्षय होता है। भोजवृत्तिकार ने इन आठों अंगों को समाधि के लिए प्रत्यक्ष रुप से सहायक होने से अंतरंग साधन कहा है। इनमें से कुछ  बाधक रूप से विद्यमान हिंसा आदि वितर्कों को निर्मूल करने के द्वारा समाधि को सिद्ध करते हैं। आसन प्रत्याहार आदि के लिए भी यम नियम का पालन करना उपकारक है। यह साधन है- 
        यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोष्टाङ्गानि। 29।
1. यम 2.नियम 3. आसन 4. प्राणायाम 5. प्रत्याहार 6. धारणा 7. ध्यान तथा 8. समाधि। यह आठ साधन योग के अंग भी कहलाते हैं। संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-
1. यम- यम का अर्थ संयम है। सत्य, अहिंसा, अस्तेय (चोरी नहीं करना)ब्रह्मचर्य, एवं अपरिग्रह (आवश्यकता से अधिक संग्रह नहीं करना) यम कहे जाते हैं। गीता में इसे दैवी सम्पत् कहा गया है।
     अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्याग: शान्तिरपैशुनम्। दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम्।
    तेज: क्षमा धाति: शौचमद्रोहो नातिमानिता। भवन्ति संपदं दैवीमभिजातस्य भारत॥
2. नियम- नियम के भी पांच भेद होते हैं। शौच,(पवित्र), संतोष, तप, स्वाध्याय तथा ईश्वर प्रणिधान(ईश्वर के लिए स्वयं का समर्पण)।
3. आसन-  योग दर्शन में स्थिर और सुख प्रदान करने वाले बैठने के प्रकार को आसन करते हैं। उपासना में आसन सिद्धि की अत्यंत उपादेयता है। आसन सिद्धि चित्त की एकाग्रता में अत्यंत सहायक होती है। मैंने 9 जून 2015 के योग से मेरा परिचय लेख में हठयोग प्रदीपिका आदि ग्रन्थों में वर्णित आसनों के विस्तृत विवरण दे चुका हूँ।
4. प्राणायाम- श्वास को अन्दर खींचने और बाहर छोड़ने का नाम प्राणायाम है। इसमें श्वास- प्रश्वास की गति को विच्छेदित भी किया जाता है। पतंजलि ने योग सूत्र के अंतर्गत वाह्य, आभ्यंतर, स्तंभवृत्ति तथा प्राणायाम या केवल कुंभक प्राणायाम यह चार भेद बताए गए हैं।
5. प्रत्याहार- जब वाह्य विषयों से इंद्रियों का निरोध (रुकावट) हो जाता है तो उसे प्रत्याहार कहते हैं। मन को वश में कर इन्द्रयों को बाह्यविषयों से रोकने का अभ्यास। इस स्थिति में इंद्रियों की वृत्ति अंतर्मुखी हो जाती है।
6. धारणा-  किसी स्थान विशेष में चित्त को लगा देना धारणा कहलाता है। स्थान विशेष से तात्पर्य नाभिचक्र, हृदयकमल, मूर्धा स्थित ज्योति, नाक के आगे का भाग तथा जिहवा के आगे भाग आदि से है।
7. ध्यान- नाभि आदि उपर्युक्त स्थान विशेष में ध्यान करने योग्य वस्तु का ज्ञान जब एकाकार होकर प्रवाहित होता है तो उसे ध्यान करते हैं। ध्यान में ध्यान ध्याता और ध्येय का भेद बना रहता है।
8. समाधि- जब ध्यान वस्तु का आकार ग्रहण कर लेता है और अपने स्वरूप से शून्यता को प्राप्त हो जाता है तो उसे समाधि कहते हैं। समाधि में ध्यान और ध्याता का भेद मिट जाता है।
विभिन्न ग्रन्थों में प्रतिपाादित योग का स्वरूप
1. योगः कर्मसु कौशलम्- कर्म में कुशलता ही योग है। (गीता)
2. तं विद्यादुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्। दुःख के संयोग से रहित को योग समझो।  (गीता)
3. संयोगो योग इत्युक्तो जीवात्मपरमात्मनोः। जीवात्मा और परमात्मा का संयोग योग कहा गया है।(अहिर्बुध्न्य संहिता)
3. समत्वं योग उच्यते। (गीता)
4. तत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया। (गीता)
5. पश्य मे योगमैश्वरम्। (गीता)
                                                                                 लेखक- जगदानन्द झा
                                                                                 ब्लागर- संस्कृतभाषी
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योगः एक प्रायोगिक विज्ञान

विश्व योग दिवस पर विशेष--

                      तपस्विभ्योऽधिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः ।
                       कर्मिभ्यश्चाधिको योगी तस्माद्योगी भवार्जुन ॥ गीता 6-46
योग एक शास्त्र है। इसमें मानव को सात्विक जीवन व्यतीत करने का उपाय बताया गया है। योगासान के अभ्यास से स्वास्थ्य में चमत्कारी परिवर्तन आता है। आइये, इसकी उत्पत्ति तथा विस्तार पर विहगावलोकन करें।
योग मधुविद्या है। योगप्रवृत्तिं प्रथमां वदन्ति कहकर श्वेताश्वतर उपनिषद् ने इसकी प्रशंसा की है। अमृतनादोपनिषद् अमृतबिन्दूपनिषद्, तेजोबिन्दूपनिषद्, योगतत्वोपनिषद्, त्रिशिखिब्राह्मणोपनिषद् आदि उपनिषदों में योग के प्रसिद्ध छः अंगों, समाधि आदि का वर्णन किया गया है।
योगकुण्डल्युपनिषद् में खेचरी विद्या के प्रयोग की विधि, प्रणवाभ्यास, नाडीशोधन का वर्णन प्राप्त होता है। योगशाखोपनिषद्, मुण्डक, कठ, श्वेताश्वतरोपनिषद् सहित अनेक उपनिषदों में क्रियात्मक योग का वर्णन किया गया है। उपनिषदों के बाद कपिल के सांख्ययोग का प्रभाव क्रमशः कम होता गया। इस बात की की चर्चा गीता के अधोलिखित श्लोक में की गयी।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥ गीता 4.2
सांख्ययोग का उद्धार गीता के छठे अध्याय में किया गया। भगवद्गीता, जो महाभारत का एक अंश है, में कर्मसन्यास, विभूति, आत्मसंयम, गुणत्रय विभाग आदि अनेकविध योगों का वर्णन किया गया है, जिससे आप सुपरिचित ही होंगे।
भारतीय दर्शन का योग विद्या एक अंग  है। दर्शन का संस्कृतियों पर गहरा प्रभाव होता है। भारतीय कला में भी योग के विभिन्न मुद्राओं को उकेरा गया है। भगवान बुद्ध सर्वोत्कृष्ट योगी थे। बुद्ध की योगमुद्रायुक्त प्रस्तरकला विश्व विख्यात है। योगशास्त्र में वर्णित विभिन्न मुद्राओं का विकास नाट्यशास्त्र में देखने को मिलता है। भरत ने साठ हस्तमुद्राओं का उल्लेख किया है।
बौद्धमूर्ति कला में अभयमुद्रा, वरदमुद्रा, शिक्षामुद्रा, ज्ञानमुद्रा, भूमिस्पर्शमुद्रा आदि अनेक मुद्राओं को अंकित किया गया है। वस्तुतः बौद्ध और हिन्दू दोनों धर्मों में अनेक स्तर पर एकरूपता है। कुछ विन्दुओं को छोड़ पूरा बौद्ध सम्प्रदाय हिन्दू धर्म की भित्ति पर खड़ा है। बौद्ध के चारों तान्त्रिक श्रेणियों-- क्रियातन्त्र, चर्यातन्त्र, योगतन्त्र और अनुत्तरयोगतन्त्र पूर्ववर्ती योग क्रियाओं का विस्तार मात्र है। जिस  4 आर्यसत्य की चर्चा बौद्ध ग्रन्थों में मिलता है, वह योग का एक अंग यम और नियम  है। यम और नियम के विना योग पूर्णतः शारीरिक व्यायाम मात्र है। इससे मन का योग ही नहीं हो पाता। यम नियम में अहिंसा, सत्य, स्तेय, ब्रह्चर्य, अपरिग्रह, शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान आते हैं। इसके अनन्तर क्रम आता है आसन और प्राणायाम का।  हठयोग प्रदीपिका में अधिक भोजन करना ,अधिक श्रम करना, व्यर्थ की बातें करना, नियम पालन में आग्रह,अधिक लोक सम्पर्क तथा मन की चंचलता इन 6 कार्य को योग का विनाशक कहा है।
            अत्याहारः प्रयासश्च प्रजल्पो नियमाग्रहः ।
             जनसङ्गश्च लौल्यं च षडभिर्योगो विनश्यति ।।
योग का अंग आसन
पतंजलि कृत योगसूत्र साधनापाद के स्थिरसुखमासनम् पर व्यास भाष्य में तद्यथा पद्मासनं वीरासनं भद्रासनं स्वस्तिकं दण्डासनं सोपाश्रयं पर्यङ्कं क्रौञ्चनिषदनं हस्तिनिषदनमुष्ट्रनिषदनं समसंस्थानं स्थिरसुखं यथासुखं चेत्येवमादीनि कह कर उदाहरण स्वरुप पद्मासन, वीरासन, भद्रासन, स्वस्तिक, दण्डासन, सोपाश्रय, पर्यङ्क,क्रौञ्चनिषदन (क्रौंच पक्षी की बैठने की रीति से बैठना), हस्तिनिषदन (क्रौंच पक्षी की बैठने की रीति से बैठना),, उष्ट्रनिषदन, समसंस्थानस्थिरसुख अर्थात् यथासुख का उल्लेख करते हुए चेत्येवमादीनि कहा अर्थात् इस प्रकार के और भी स्थिर आसन होते हैं। आदिशब्देन मयूराद्यासनानि ग्राह्यानि यावत्यो जीवजातयः तावन्त्येवासनानीति संक्षेपः (योगवार्तिक) घेरन्ड संहिता द्वितीयोपदेश में  32 आसनों के नाम एवं उसके प्रयोग की विधि बतायी गयी हैं
आसनानि समस्तानि यावन्तो जीवजन्तवः।
चतुरशीतिलक्षाणि शिवेन कथितानि च।।1।।
तेषां मध्ये विशिष्टानि षोडशोनंशतं कृतम्।
तेषां मध्ये मर्त्यलोके द्वात्रिंशदासनं शुभम्।।2।।
अथ आसनानां भेदाः।
सिद्धं पद्मं तथा भद्रं मुक्तं वज्रञ्च स्वस्तिकम्।
सिंहञ्च गोमुखं वीरं धनुरासनमेव च।।3।।
मृतं गुप्तं तथा मत्स्यं मत्येन्द्रासनमेव च।
गोरक्षं पश्चिमोत्तानं उत्कटं सङ्कटं तथा।।4।।
मयूरं कुक्कुटं कूर्म्मं तथाचोत्तानकूर्म्मकम्।
उत्तानमण्डुकं वृक्षं मण्डुकं गरुडं वृषम्।।5।।
शलभं मकरं चोष्ट्रं भुजङ्गञ्चयोगासनम्।
द्वात्रिंशदासनानितु मर्त्त्यलोकेहि सिद्धिदम्।।6।।
हठयोगप्रदीपिका पर क्लिक करें। यहाँ विभिन्न आसनों के नाम तथा उसे करने की विधि वर्णित है। आसन के सम्बन्ध में राजयोग की अपेक्षा हठयोग के ग्रन्थों में विस्तृत वर्णन प्राप्त होते हैं। चिन्तामणि अपरनाम स्वात्माराम योगीन्द्र कृत हठयोग प्रदीपिका के पूर्व इस विषय पर शिवसंहिता, गोरक्षसंहिता,विवेक मार्तण्ड, सिद्धसिद्धान्त पद्धति, घेरण्डसंहिता, योगबीज, तथा योगोपनिषद् जैसे आसन तथा नाडीशोधन विषय बहुलक ग्रन्थ प्रकाश में आ चुके थे।  हठयोग प्रदीपिका के लेखन का काल 1360 से 1650 के मध्य माना जाता है। इस पुस्तक में हठयोग के पूर्वोक्त गोरक्षशतक आदि ग्रन्थों के मत का सम्वर्धन किया गया है। इसमें 382 श्लोक तथा 4 अध्याय हैं। इस ग्रन्थ के प्रणयन के बाद योगचिन्तामणि, हठरत्नावली, हठसंकेत चन्द्रिका,हठनत्व कौमुदी आदि की रचना की गयी। हठयोग में रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं को चाहिए कि उक्त ग्रन्थ में वर्णित आसन आदि के द्वारा मन की अमनस्कता का निवारण करें।  आसन के बारे में पुराणों में भी संक्षेप में जानकारी मिलती है।
गरुडपुराणम् अध्यायः २३८
          आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्धासनं तथा ।। 1,238.11 ।।
प्राणः स्वदेहजो वायुरायामस्तन्निरोधनम् ।
कूर्मपुराणम्-उत्तरभागः/एकादशोऽध्यायः
आसनं स्वस्तिकं प्रोक्तं पद्ममर्द्धासनं तथा ।
साधनानां च सर्वेषामेतत्साधनमुत्तमम् ।। 11.43
ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्राः कृत्वा पादतले उभे ।
समासीनात्मनः पद्ममेतदासनमुत्तमम् ।। 11.44
एकं पादमथैकस्मिन् विष्टभ्योरसि सत्तमाः ।
आसीनार्द्धासनमिदं योगसाधनमुत्तमम् ।। 11.45
उभे कृत्वा पादतले जानूर्वोरन्तरेण हि ।
समासीतात्मनः प्रोक्तमासनं स्वस्तिकं परम् ।। 11.46
श्रीदत्तात्रेयकल्प तथा जाबालदर्शन उपनिषद् के खण्ड 3 में लगभग एक समान इन आसनों के नाम प्राप्त होते हैं।
आसनानि पृथग्वक्ष्ये श्रृणु वाचस्पतेऽधुना ।।
स्वस्तिकं गोमुखं पद्मं वीरं सिंहासनं तथा ।।1।।
भद्रं मुक्तासनं चैव मयूरासनमेव च ।
 सुखासनसमाख्यां च नवमं मुनिपुंगव ।।2।।
जानूर्वोरन्तरे विप्र कृत्वा पादतले उभे ।
            समग्रीवशिरः कायः स्वस्तिकं परिचक्षते ।।3।।
वामे दक्षिणगुल्फं तु पृष्ठपार्श्वे निवेशयेत् ‍ ।
            दक्षिणेपि तथा सव्यं गोमुखं परिचक्षते ।।4।।
अंगुष्ठावपि गृह्णीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमेण तु ।
 ऊर्वोरुपरि विप्रेन्द्र कृत्वा पादतलद्वयम् ।।5।।
पद्मासनं भवेदेतत्पापरोगभयापहम् ।
            दक्षिणोत्तरपादं तु सव्ये ऊरूणि विन्यसेत् ‍ ।।6।।
दक्षिणोत्तरपादं तु दक्षिणोरूणि विन्यसेत् ‍ ।
 ऋजुकायः सुखासीनो वीरासनमुदाहृतम् ।।7।।
गुल्फौ तु वृषणस्याधः सीवन्याः पार्श्वयोः क्षिपेत् ‍ ।
            दक्षिणं सव्यगुल्फेन वामं दक्षिणगुल्फतः ।।8।।
हस्तौ च जान्वोःसंस्थाप्य स्वांगुलीश्व प्रसार्य च ।
            नासाग्रं च निरीक्षेत भवेत्सिंहासनं हि तत् ‍ ।।9।।
पार्श्वपादौ च पाणिभ्यां द्दढं बध्वा सुनिश्चलम् ।
 भद्रासनं भवेदेतद्विषरोगविनाशनम् ।।10।।
निष्पीडय सीवनीं सूक्ष्मां दक्षिणोत्तरगुल्फतः ।
            वामं वामेन गुल्फेन मुक्तासनमिदं भवेत् ‌ ।।11।।
मेढ्रोपरि विनिक्षिप्य सव्यं गुल्फंततोपरि ।
 गुल्फांतरं च संक्षिप्य मुक्तासनमिदं भवेत् ‍ ।।12।।
कूर्पराग्रौ मुनिःश्रेष्ठ निक्षिपेन्नाभिपार्श्वयोः ।
            भूम्यां पादतलद्वन्द्वं निक्षिप्यैकाग्रमानसः ।।13।।
समुन्नतशिरः पादो दंडवद्वयोम्नि संस्थितः ।
 मयूरासनमेतत्स्यात्सर्वपापप्रणाशनम् ।।14।।
येनकेन प्रकारेण सुखं धैर्यं च जायते ।
            तत्सुखासनमित्युक्तमशक्तस्तत्समाश्रयेत् ‍ ।।15।।
आसनं विजितं येन जितं तेन जगत्रयम् ।
            आसनं सकलं प्रोक्तं मुने वेदविदां वर ।।16।।
अनेन विधिना युक्तः प्राणायामं सदा कुरु ।।17।।
देवीभागवत के चतुर्थ अध्याय देवीगीता में आसनविधि -
पद्मासनं स्वस्तिकं च भद्रं वज्रासनं तथा ।
            वीरासनमिति प्रोक्तं क्रमादासनपंचकम् ‍ ।।8।।
ऊर्वोरुपरि विन्यस्य सम्यक् ‍ पादतले उभे ।
 अंगुष्ठौ च निबध्नीयाद्धस्ताभ्यां व्युत्क्रमात्ततः ।।9।।
पद्मासनमिति प्रोक्तं योगिनां हृदयङ्‍गमम् ।
            जानूर्वोरन्तरे सम्यक् ‍ कृत्वा पादतले उभे ।।10।।
ऋजुकायो विशेद्योगी स्वस्तिकं परिचक्षते ।
            सीवन्याः पार्श्वयोर्न्यस्य गुल्फयुग्मं सुनिश्चितः ।।11।।
वृषणाधः पादपार्ष्णि - पाणिभ्यां परिबंधयेत् ‍ ।
            भद्रासनमिति प्रोक्तं योगिभिः परिपूजितम् ‌ ।।12।।
ऊर्वौ पादं क्रमान्न्यस्य जान्वोः प्रत्यङ्‍मुखाङ्‍गुली ।
 करौ विदध्यादाख्यातं वज्रासनमनुत्तमम् ।।13।।
एकपादमधः कृत्वा विन्यस्योरु तथोत्तरे ।
 ऋजुकायो विशेद्योगी वीरासनमनुत्तमम् ।।14।। इति
 आसन नाडी शुद्धि आदि का विस्तार पूर्वक वर्णन और प्रयोग हठयोग के ग्न्थों में वर्णित हैं। बंध आदि मुद्रायें भी आसन के अन्तर्गत ही परिगणित किये जाते हैं। हठयोग प्रदीपिका के तृतीय उपदेश में 10 प्रकार के मुद्राओं को जरा और मरण को नाश करने वाला कहा गया है।
महामुद्रा महाबंधो महावेधश्च खेचरी।
उड्यानं मूलबंधश्च बंधो जालंधराभिध:।।
 करणी विपरीताख्या वज्रोली शक्तिचालनम्।
            इदं हि मुद्रादशकं जराभरणनाशनम्।। 7।।
घेरन्ड संहिता के तृतीयोपदेश में 25 मुद्राओं के नाम तथा प्रयोग कहे गये हैं।
महामुद्रा नभोमुद्रा उड्डीयानं जलन्धरम्।
मूलबन्धो महाबन्धो महावेधश्च खेचरी।1।।
विपरीतकरणी योनिर्वज्रोली शक्तिचालिनी।
ताडागीमाण्डवीमुद्रा शाम्भवीपञ्चधारणा।2।।
आश्विनी पाशिनी काकी मातंगी च भुजंगिनी।
पञ्चविंशति मुद्राणि सिद्धिदाश्चेहयोगिनाम्।।3।।
 इसके बारे में अनेक प्रकार की जानकारी उपलब्ध है। अतः यहां चर्चा करना अपेक्षित नहीं है। षट्कर्म का वर्णन हठयोग प्रदीपिका, शिव संहिता, घरेण्ड संहिता आदि योग के ग्रन्थों में विपुलता से प्राप्त है। आसन के सिद्ध होने पर साधक शीत उष्ण आदि द्वन्द्व से पीडित नहीं होता।
             धौती बस्ती तथा नेती त्राटकं नौलिकं तथा।
            कपाल माती चैतानि षट्कर्माणि प्रचक्षते।।
प्रत्यभिज्ञा दर्शन में शिव और आत्मा के अभेद ज्ञान को योग कहा गया है। तान्त्रिक परम्पराओं में कुण्डलिनी के स्वरूप सहित सुरति योग तक जग जाहिर है।
भारतीय परम्परा में परस्पर दो विरूद्ध विचारधारा एक साथ प्रवाहित होते दिखती है। एक ओर तान्त्रिकों का सुरतयोग तो दूसरी ओर रामायण, मनुस्मृति, महाभारत आदि ग्रन्थों का पातिव्रत योग।
अब आपको तय करना है कि आप किस योग के अनुयायी बनना चाहते हैं।
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पातंजल योग एक परिचय

     पातञ्जल योगसूत्र में चित्तवृत्तियों के निरोध को योग कहा गया हैं। अन्तः करण की वृत्तियाँ योगक्रिया द्वारा क्रमशः शान्त होते-होते जब पूर्णतः शान्त हो जाती हैं, उस अवस्था का नाम योगयुक्त अवस्था हैं। उसी अवस्था में द्रष्टा अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकट होता हैं। साधकों में दृश्यमान विभेद के कारण विज्ञान भिक्षु प्रणीत योगसार संग्रह के द्वतीयोंश में योग के साधन को कहते हुए उत्तम, मध्यम तथा अधम के भेद से तीन प्रकार के योगाधिकारी का वर्णन आया है । ये तीन योगाधिकारी हैं-
1. आरुरुक्ष
2. युञ्जान और 
3. योगारूढ।
          उत्तम अधिकारी वे होते हैॆ, जिन्होंने पूर्व जन्म में ही बहिरंग साधनों को सिद्ध कर लिया है, अतः उनकी अपेक्षा के विना ही वे योग मार्ग पर आगे बढ जाते हैं। उनकी योग सिद्धि में अभ्यास एवं वैराग्य ही
मुख्य साधन है। इसी प्रकार ‘‘क्रियायोग’’ मध्यम अधिकारियों के लिए तथा ‘‘अष्टांग योग’’ अधम अधिकारियों के लिए हैं। क्रियायोग के अन्तर्गत तप, स्वाध्याय एवं ईश्वरप्रणिधान- इन तीन साधनों का विधान हैं। अष्टांग योग के अन्तर्गत यम, नियम, आसन, प्रणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान एवं समाधि-इन आठ योगांगों की चर्चा हैं। ये आठ अंग की आठ सीढि़याँ हैं, जिन पर योग-सिद्धि में सहायक होते है। जिस प्रकार किसी वस्तु को रखने से पूर्व बर्तन को साफ करना पड़ता हैं, उसी प्रकार यम-नियम के पालन से अन्तःकरण के जन्म जन्मान्तरों से दूषित संस्कारों को दूर कर उसे निर्मल  बनाना होता है। प्रणायाम आदि योग-सिद्धि के साक्षात् साधन हैं। अतः इन्हें अन्तरंग साधन माना गया है। कुछ विद्वानों के अनुसार यम से लेकर प्रत्याहार तक योग के बहिरंग साधन हैं और धारणा, ध्यान, समाधि अन्तरंग। परन्तु सर्वसम्मति है कि ये आठ अंग ही योग के आधार हैं।

 पातज्जल योगसूत्र-

महर्षि पतञ्जलि विरचित योगसूत्र योगविषयक एक महत्वपूर्ण ग्रन्थ है, जिसका प्रारम्भ ‘अथ योगानुशासनम्’ सूत्र से होता है। यह सूत्र इस बात का प्रतीक है कि महर्षि पतज्जलि योग के आदि प्रणेता नहीं थे। उन्होंने तो अपने से पूर्व प्रचलित समस्त साधना-पद्धतियों को समन्वित करके उनकी दार्शनिक समीक्षा की है तथा यत्र-तत्र बिखरे हुए योग-सम्बन्धी विचारों, सिद्धान्तों तथा पद्धतियों को एक व्यवस्थित रूप प्रदान किया है। इस ग्रन्थ में उन्होंने संक्षेप से योग के महत्व को प्रकट करते हुए उसकी सांगोपांग प्ररूपणा की हैं।
योगसूत्र का मुख्य उद्देश्य मनुष्य को सुख-दुःख रूप कर्मबन्धन और उसके और उसके परिणामस्वरूप जन्म-मुत्यु के चक्र से छुटकारा दिलाकर आत्म-कल्याण का सीधा, सच्चा और क्रियात्मक मार्गदर्शन कराना है।
165 सूत्रों में निबद्ध यह ग्रन्थ समाधि, साधन, विभूति और कैवल्य नामक पाद-चतुष्टय में विभक्त हैं। प्रथम समाधिपाद में योग का लक्षण, लक्षणस्थ पदों का विवेचन, योग का उद्देश्य चित्तवृत्तियों का निरूपण, योग की प्राप्ति के उपायों तथा समाधि के भेदों आदि का वर्णन हैं। साधन पाद नामक द्धितीय अध्याय में क्रियायोग, क्लेश, कर्म, कर्मों के भेद, करण, स्वरूप, कर्मविपाक, दुःख, दुःख हेतु, हान और हानोपाय का विवेचन है। विभूतिपाद नामक तृतीय अध्याय में धारणा, ध्यान और समाधि -इन तीन अंतरंग योगांगों के स्वरूप का एक-एक सूत्र में निर्देश दिया गया है। कैवल्यपाद नामक चतुर्थ अध्याय में पूर्व वर्णित सिद्धियों को जन्म, औषधि, मंत्र, तप और समाधि-इन पाँच निमित्तों से उत्पन्न होने वाली बताया गया हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ विज्ञानवाद के निराकरण पूर्वक, निर्माण-चित्त, धर्ममेघसमाधि एवं कैवल्य-प्राप्ति की प्रक्रिया तथा कैवल्य के स्वरूप का वर्णन हैं।
पातञ्जलयोगसूत्र का अक्षरशः अनुकरण करके जैन और बौद्ध सम्प्रदायों में अभ्यास और वैराग्य के स्तम्भ खड़े किये गये हैं। योग के यमनियमादि आठ अंग प्रायः सभी दर्शनों में मान्य हैं। इस ग्रन्थ के सर्वप्रिय होने में एक विशेषता यह भी है कि यह राजयोग के अन्तर्गत आता है। इसमें हठयोग व्यर्थ समझा जाता है। राजयोग का यह सिद्धान्त है कि हठयोग राजयोग की प्राप्ति के लिए आवश्यक नहीं, वरन् किंचित् बाधक है।

पातज्जल योगसूत्र से सम्बन्धित साहित्य

महर्षि पतज्जलि प्रणीत योगसूत्र से सम्बन्धित साहित्य में उन सभी भाष्यों, टीकाओं, उपटीकाओं वृत्तियों का समावेश होता है जो योगदर्शन  के निगूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने के लिए समय पर लिखे गये। योगसूत्र पर तीन भाष्य उपलब्ध होते हैं-
1. व्यास भाष्य
2. ज्ञानानन्द भाष्य
3. स्वामिनारायण भाष्य।
इनमें से सबसे प्रामाणिक भाष्य व्यास मुनि का है, जिसमें सूत्रों के अर्थों को अत्यन्त सारगर्भित शैली में समझाया गया है। पातज्जलयोग सूत्रों के रहस्यों को समझने के लिए व्यासभाष्य प्रवेश द्वार के तुल्य है।
व्यासभाष्य के गहन तत्वों के स्पष्टीकरण हेतु वाचस्पति मिश्र ने तत्ववैशारदी, विज्ञानभिक्षु ने योगवार्तिक तथा हरिहरानन्द आरणयक ने भास्वती नामक टीकाएँ लिखी हैं। योगसूत्र के मर्म को समझने के लिए ये टीकाएँ अत्यन्त उपयोगी हैं। तत्ववैशारदी के कठिन शब्दों एवं वाक्यों को सुबोध बनाने के लिए राघवानन्द सरस्वती ने ‘पातज्जलरहस्य’ नामक उपटीका की रचना की है। सूत्रों के भावार्थ को समझने के लिए भाष्यकारों एवं टीकाकारों के साथ-साथ अनेक वृत्तिकारों ने भी अपना-अपना योगदान दिया है, जिनमें से कुछ वृत्तियाँ प्रकाशित हैं और कुछ अप्रकाशित। उदाहरणतः भोजदेव कृत राजमार्तण्ड, नारायणतीर्थ कृत सूत्रार्थबोधिनी, अनन्तदेव पण्डितकृत पदचन्द्रिका, नागेशभट्टकृत योगसूत्र-लध्वीवृत्ति, नागेशभट्ट कृत योगसूत्र-बृहतीवृत्ति, भावगणेशकृत योगसूत्रवृत्ति (योगदीपिका), नारायणतीर्थकृत योगसिद्धान्तचन्द्रिका, रामानन्द सरस्वती कृत योगसुधाकर, यशोविजयकृत योगसूत्रवृत्ति, उदयंकर कृत योगसूत्रवृत्ति (अप्रकाशित), रामानन्द सरस्वती मणिप्रभा, क्षेमानन्द दीक्षित कृत नवयोगकल्लोलवृत्ति अप्रकाशित, ज्ञानानन्द कृत योगसूत्रवृत्ति, भवदेव कृत अभिनव भाष्य अप्रकाशित, भवदेवकृत योगसूत्रटिप्पण, महादेवकृत योगसूत्रवृत्ति, शंकर भगवत्पाद कृत पातज्जलयोगसूत्रभाष्य-विवरणम्, राधानन्दन कृत पातज्जलरहस्यप्रकाश, उमापति मिश्र प्रणीत योगसूत्रवृत्ति अप्रकाशित, स्वामी हरिप्रसाद कृत  योगसूत्र-वैदिकवृत्ति, बलदेव मिश्र कृत योगप्रदीपिका, स्वामी तुलसीराम कृत योगसूत्रभाष्य, तथा वृदानन्द शुक्लकृत वृत्ति आदि।

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