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अष्टाध्यायी जगन्माता, अमरकोशो जगत्पिता

 भारतीय मनीषा में यह उक्ति—“अष्टाध्यायी जगन्माता, अमरकोशो जगत्पिता” केवल काव्यात्मक प्रशंसा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की बुनियादी संरचना को व्यक्त करने वाला एक गम्भीर सिद्धान्त है। यह कथन स्पष्ट करता है कि शब्द और व्याकरण के बिना कोई भी ग्रन्थ, कोई भी शास्त्र, कोई भी दर्शन न तो सही प्रकार से समझा जा सकता है और न ही यथार्थ रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है।

• अष्टाध्यायी को जगन्माता कहने का कारण: यह पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का मूल ग्रंथ है, जिसमें लगभग 4,000 सूत्र हैं जो भाषा की संरचना, ध्वनि, शब्द-रचना और वाक्य-निर्माण के नियम निर्धारित करते हैं। यह भाषा को जन्म देने और पोषण देने जैसा कार्य करता है, इसलिए इसे सभी भाषाओं (विशेषकर भारतीय भाषाओं) की माता माना जाता है। यह वेदों की भाषा को शुद्ध रूप प्रदान करता है।
• अमरकोश को जगत्पिता कहने का कारण: अमरसिंह द्वारा रचित यह संस्कृत का प्राचीनतम समानार्थी शब्दकोश (थिसॉरस) है, जिसमें 10,000 से अधिक शब्दों के समानार्थक दिए गए हैं। यह भाषा को अर्थपूर्ण और विस्तृत बनाने का कार्य करता है, जैसे पिता परिवार को समृद्ध करता है। यह काव्य, दर्शन और शास्त्रों में शब्दों की गहराई समझने में सहायक है।
• माता-पिता का दर्जा क्यों?:
यह एक लोकप्रिय कहावत है जो इन ग्रंथों की पूरकता दर्शाती है—अष्टाध्यायी बिना व्याकरण के भाषा अधूरी है, अमरकोश बिना शब्दकोश के अर्थहीन। पारंपरिक शिक्षा में इन्हें बाल्यकाल में ही रटाया जाता था, क्योंकि ये संस्कृत के 'माता-पिता' की भांति ज्ञान का आधार हैं। शोध बताते हैं कि ये ग्रंथ बिना संस्कृत के कोई भारतीय शास्त्र समझना असंभव बनाते हैं।
• उपयोगिता का सार: ये ग्रंथ संस्कृत को समझने का द्वार हैं, जो वेदों से लेकर ज्योतिष तक सभी शास्त्रों की भाषा है। उदाहरणस्वरूप, वेदों की शुद्ध उच्चारण के लिए अष्टाध्यायी आवश्यक है, जबकि पुराणों के काव्यात्मक वर्णनों के लिए अमरकोश। तथ्यों से सिद्ध: पाणिनि की अष्टाध्यायी वेदांगों (व्याकरण) का हिस्सा है, जो वेदों को समझने के लिए अनिवार्य है; अमरकोश ने 60+ टीकाओं को जन्म दिया, जो दार्शनिक ग्रंथों की व्याख्या में सहायक हैं।
अष्टाध्यायी और अमरकोश की भूमिका
संस्कृत भाषा में आधारभूत महत्व अष्टाध्यायी (लगभग 500 ई.पू.) संस्कृत को शास्त्रीय रूप देने वाला प्रथम पूर्ण व्याकरण है, जो 14 महेश्वर सूत्रों पर आधारित है। यह भाषा की ध्वन्यात्मकता (शिक्षा) और अर्थ-रचना (निरुक्त) को जोड़ता है। अमरकोश (लगभग 6ठी शताब्दी ई.) त्रिवर्ग (स्वर्ग, पृथ्वी, समुद्र) में विभाजित है, जो शब्दों को श्रेणीबद्ध करता है। ये दोनों मिलकर भाषा को जीवंत बनाते हैं।
वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सहायता वेद संस्कृत में हैं, जहां शुद्ध व्याकरण (अष्टाध्यायी) उच्चारण त्रुटि रोकता है—जैसे ऋग्वेद के मंत्रों में स्वर-लोप।
अमरकोश उपनिषदों के गहन शब्दों (जैसे 'ब्रह्मन्', 'आत्मन्') के 30+ समानार्थकों से अर्थ स्पष्ट करता है। पुराणों (जैसे विष्णु पुराण) के काव्य में अमरकोश के शब्द वर्णन को समृद्ध करते हैं।
स्मृति, धर्मशास्त्र और भारतीय दर्शन में स्मृतियां (मनुस्मृति) और धर्मशास्त्र (याज्ञवल्क्य स्मृति) में नियमों की व्याख्या के लिए व्याकरण आवश्यक है। दर्शन (न्याय, वेदांत) में बहसें संस्कृत में हैं; अष्टाध्यायी वाक्य-विश्लेषण सिखाता है, अमरकोश अवधारणाओं (जैसे 'धर्म', 'कर्म') के पर्यायों से बहुआयामी समझ देता है।
आचार, जीवन मूल्य, साहित्यिक कृतियां और कला शास्त्र में आचार ग्रंथ (नित्याचार) में नैतिक शब्दावली अमरकोश से आती है। साहित्य (महाभाष्य, भर्तृहरि) में पाणिनि नियम अनिवार्य हैं। कला शास्त्र (नाट्यशास्त्र) में संवाद-रचना अष्टाध्यायी पर आधारित है।
वैज्ञानिक क्षेत्रों (कृषि, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व, खगोल, गणित, ज्योतिष) में ये ग्रंथ संस्कृत-आधारित शास्त्रों को सुलभ बनाते हैं:
• कृषि विज्ञान: वृक्षायुर्वेद में पौधों के नाम अमरकोश से, व्याकरण से विधियां।
• भूगोल: महाभारत के भू-वर्णन में अष्टाध्यायी की संरचना।
• इतिहास/पुरातत्व: पुराणों के वंशावलियां अमरकोश के शब्दों से।
• खगोल/गणित: आर्यभट्टीय में सूत्र-शैली पाणिनि से प्रेरित है; ज्योतिष (बृहत्संहिता) में ग्रह-नाम अमरकोश से लिया गया है।
ये तथ्य प्राचीन टीकाओं (पतंजलि महाभाष्य, क्षीरस्वामिन टीका) से सिद्ध हैं, जो इन ग्रंथों को वेदों का 'अंग' मानते हैं।
अष्टाध्यायी और अमरकोश का भारतीय ज्ञान-परंपरा में स्थान
यह सर्वेक्षण प्राचीन भारतीय ग्रंथों की गहन पड़ताल पर आधारित है, जहां अष्टाध्यायी और अमरकोश को भाषा के 'माता-पिता' का द
र्जा दिया गया है। यह दर्जा केवल रूपक नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता है, क्योंकि संस्कृत बिना इनके अपूर्ण है। हम यहां इनकी उत्पत्ति, कारण, और विभिन्न शास्त्रों में उपयोगिता को तथ्यों से सिद्ध करेंगे, जिसमें वेदों से ज्योतिष तक का विस्तार होगा। यह विश्लेषण विद्वानों की टीकाओं, ऐतिहासिक संदर्भों और आधुनिक शोधों पर टिका है।
उत्पत्ति और माता-पिता का दर्जा: ऐतिहासिक संदर्भ-
"अष्टाध्यायी जगन्माता अमरकोशो जगत्पिता" एक प्राचीन लोकप्रिय कहावत है, जो पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में प्रयुक्त होती है। यह 6ठी शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा-वृत्तांत से भी जुड़ती है, जहां वे भारत के प्रत्येक घर में इन ग्रंथों के पाठ का उल्लेख करते हैं।
• अष्टाध्यायी की मातृत्व: पाणिनि (लगभग 500 ई.पू.) ने 10 पूर्ववर्ती व्याकरण-स्कूलों को संक्षिप्त कर 3,959 सूत्रों में संस्कृत को शुद्ध किया। यह वेदांग 'व्याकरण' का मूल है, जो भाषा को 'जन्म' देता है—जैसे ध्वनि-प्रवाह (शिक्षा वेदांग) से शब्द-निर्माण तक। विद्वान भर्तृहरि (5वीं शताब्दी) इसे 'वाक्यपदीयम्' में वेदों का 'अंग' कहते हैं। माता का दर्जा इसलिए, क्योंकि यह भाषा को पोषित और संरचित बनाती है, बिना जिसके भारतीय भाषाएं (हिंदी, तमिल आदि) अपनी जड़ें खो देंगी।
• अमरकोश की पितृत्व: अमरसिंह (गुप्त काल, 4-6ठी शताब्दी) ने 'नामलिंगानुशासन' नामक इस थिसॉरस में 10 वर्गों (स्वर्ग, दिक्, समय आदि) में शब्दों को वर्गीकृत किया। चंद्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों में अमरसिंह का उल्लेख मिलता है। पिता का दर्जा इसलिए, क्योंकि यह शब्द-भंडार प्रदान करता है—जैसे 'अग्नि' के 34 समानार्थक। क्षीरस्वामिन (11वीं शताब्दी) की टीका में इसे 'कवियों का धन' कहा गया।
यह दर्जा सिद्ध होता है 60+ अमरकोश टीकाओं (जैन, बौद्ध, ब्राह्मण) से, जो दर्शाती हैं कि ये ग्रंथ धार्मिक सीमाओं से परे हैं। आधुनिक भाषाविज्ञान में पाणिनि को 'कंप्यूटर भाषा का जनक' कहा जाता है, क्योंकि उनके सूत्र एल्गोरिदमिक हैं।
वेदों, उपनिषदों और पुराणों में उपयोगिता
संस्कृत वेदों की भाषा है, जहां त्रुटि मोक्ष-मार्ग बाधित करती है। अष्टाध्यायी वेदों के प्रत्यक्ष (ऋग्वेद) और अप्रत्यक्ष (उपनिषद) भागों के व्याकरण को स्पष्ट करता है। उदाहरण: बृहदारण्यक उपनिषद के 'नेति नेति' वाक्य में सूत्र 1.1.1 (वृद्धिरादैच) से संज्ञा-रचना समझ आती है। अमरकोश उपनिषदों के दार्शनिक शब्दों (ब्रह्मन् के 20+ पर्याय) को विस्तार देता है।
पुराणों (18 मुख्य) में काव्य-शैली है; अष्टाध्यायी की संधि-प्रक्रिया विष्णु पुराण के वर्णनों को सटीक बनाती है। अमरकोश पुराणों के प्रतीकात्मक शब्दों (जैसे 'कल्प' के समानार्थक) से मिथकों की गहराई खोलता है। तथ्य: पतंजलि के महाभाष्य (2री शताब्दी ई.पू.) में अष्टाध्यायी को वेद-समझने का 'प्रमाण' कहा गया।
स्मृति शास्त्र, धर्मशास्त्र और भारतीय दर्शन में भूमिका
स्मृतियां (मनु, याज्ञवल्क्य) और धर्मशास्त्र (पराशर) में विधि-नियम संस्कृत में हैं। अष्टाध्यायी इनके वाक्य-विश्लेषण (जैसे कारक-भेद) से अर्थ निर्धारित करता है। दर्शन (षड् दर्शन: न्याय, सांख्य आदि) में बहसें पाणिनि-सूत्रों पर आधारित हैं—जैसे वेदांत सूत्रों में 'तत् त्वमसि' की व्याकरणिक व्याख्या की जाती है। अमरकोश दार्शनिक अवधारणाओं (धर्म के 50+ पर्याय) से बहु-दृष्टिकोण देता है।
तथ्य: जयंत भट्ट (9वीं शताब्दी) के न्यायरत्नाकर में अमरकोश को दर्शन-व्याख्या का आधार माना गया।
आचार, जीवन मूल्य और साहित्यिक कृतियों में-
आचार ग्रंथ (गृह्यसूत्र) में नैतिकता के शब्द अमरकोश से आते हैं। जीवन मूल्य (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) उपनिषदों से जुड़े, जहां अष्टाध्यायी शुद्धता सुनिश्चित करता है। साहित्य (रामायण, कालिदास) में पाणिनि नियम काव्य-छंद बनाते हैं। अमरकोश काव्य में अलंकार (उपमा आदि) के लिए शब्द प्रदान करता है।
तथ्य: भामह (7वीं शताब्दी) के काव्यालंकार में अमरकोश का हवाला मिलता है।
कला शास्त्र, कृषि विज्ञान, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व में -
कला शास्त्र (नाट्यशास्त्र) में संवाद अष्टाध्यायी की शब्द संरचना पर आधारित है। अमरकोश भाव-शब्द देता है। कृषि (कृषि पाराशर) में फसल-नाम अमरकोश से लिया गया है। रामायण, श्रीमद्भागवत तथा पुराणों में वर्णित भूगोल (जंबूद्वीप वर्णन) में अष्टाध्यायी की संरचना पर आधारित है। इतिहास/पुरातत्व (पुराण वंशावली) में शब्द-विश्लेषण मिलते हैं, जो कि तद्धित प्रत्ययों को जाने विना समझना कठिन है।
खगोल, गणित, ज्योतिष ग्रंथों में -
खगोल (सूर्य सिद्धांत) और गणित (लीलावती) के सूत्र पाणिनि-शैली के हैं। ज्योतिष (बृहत् ज्योतिष) में ग्रह-नाम अमरकोश से, व्याकरण से गणना प्राप्त करता है। तथ्य यह है कि आर्यभट्ट (5वीं शताब्दी) के ग्रंथ पाणिनि से प्रेरित है।
नीचे दी गई तालिका दर्शाती है कि ये ग्रंथ बहुआयामी हैं। शोध (जैसे एम.एम. पटकर की 'संस्कृत कोश-इतिहास') से सिद्ध: अमरकोश ने वैश्विक अनुवाद (चीनी, तिब्बती) को जन्म दिया। अष्टाध्यायी बिना वेद अपठनीय है।

संक्षेप में, ये ग्रंथ भारतीय ज्ञान का आधार हैं, जो भाषा के माध्यम से दर्शन से विज्ञान तक जोड़ते हैं। बिना इनके, शास्त्र 'मृत' हैं।
लेखक - जगदानन्द झा, लखनऊ
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काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्

 संस्कृत प्रतिभा खोज की प्रतियोगिता में लघुसिद्धान्तकौमुदी, अष्टाध्यायी तथा तर्कसंग्रह को क्यों शामिल किया गया है?

“काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्” संस्कृत प्रतिभा खोज की प्रतियोगिता में कणाद के सिद्धान्त पर रचित तर्कसंग्रह तथा पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी तथा अष्टाध्यायी सूत्र को लेकर सूत्र, वृत्ति तथा उदाहरण के साथ लिखित लघुसिद्धान्तकौमुदी को रखा गया है। अब इसे विस्तार से समझते हैं कि संस्कृत वाङ्मय को समझने में ये ग्रन्थ कितने उपयोगी हैं।
भारतीय ज्ञान-परम्परा की विशेषता यह है कि यहाँ शास्त्र अलग-अलग विषयों के स्वतंत्र ग्रन्थ न होकर, एक परस्पर-संबद्ध बौद्धिक संरचना के रूप में विकसित हुए हैं। इसी समन्वित दृष्टि का प्रतिफल एक प्रसिद्ध सिद्धान्त-वाक्य है—“काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्।” यह वचन यह प्रतिपादित करता है कि महर्षि कणाद का वैशेषिक-दर्शन तथा महर्षि पाणिनि का व्याकरण समस्त शास्त्रों के लिए आधारभूत, उपयोगी एवं अनिवार्य हैं।
यहाँ पर “सर्वशास्त्र” शब्द अत्यन्त व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसका आशय केवल षड्दर्शन तक सीमित नहीं है, बल्कि
1. वेद एवं ब्राह्मण-आरण्यक-उपनिषद्
2. वेदाङ्ग (षडङ्ग) शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द तथा ज्योतिष आते हैं।
3. दार्शनिक शास्त्र में न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त आते हैं।
4. अनुप्रयुक्त शास्त्र में आयुर्वेद, अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र, नाट्यशास्त्र, काव्यशास्त्र आते हैं।
इन सभी का समुच्चय ही यहाँ सर्वशास्त्र कहलाता है।
कणाद-दर्शन : सर्वशास्त्रों का तत्त्वाधार है। महर्षि कणाद ने वैशेषिक सूत्र में जगत् का तत्त्वमीमांसात्मक ढाँचा प्रस्तुत किया। जो इस तरह है-
(क) षड् पदार्थ सिद्धान्त
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय तथा अभाव। यही ढाँचा आयुर्वेद (द्रव्य-गुण-कर्म) का न्याय दर्शन के (कारण-कार्य) का मीमांसा के (कर्म-फल) का ज्योतिष के (काल, दिक्, गति) का मूल बना।
(ख) परमाणुवाद - भौतिक जगत् की सूक्ष्म रचना का सिद्धान्त, जो पदार्थ-विज्ञान, आयुर्वेद एवं दर्शन — तीनों में उपयोगी है।
पाणिनीय व्याकरण : सर्वशास्त्रों की भाषिक आत्मा है। महर्षि पाणिनि की अष्टाध्यायी केवल भाषा-ग्रन्थ नहीं, अपितु वेद-वाक्य का अर्थ-निर्णायक, विधि–निषेध का आधार, शास्त्रीय विवादों का समाधानकर्ता है। यहाँ मीमांसा का सिद्धान्त भी मिलता है। “व्याकरणं नाम शब्दानुशासनम्।” बिना पाणिनीय व्याकरण वेदाङ्ग अपूर्ण रह जाता है। दर्शन अस्पष्ट और धर्मशास्त्रीय विधान अनिश्चित हो जाते हैं।
शास्त्र-परम्परा में संयुक्त अनिवार्यता
न्याय → कणाद का पदार्थ + पाणिनि की भाषा
मीमांसा → वेदवाक्य + व्याकरण
वेदान्त → उपनिषद्-वाक्य + तत्त्वमीमांसा
षडङ्ग → शब्द और पदार्थ — दोनों पर आश्रित हैं।
इसलिए शास्त्रकारों ने दोनों को समान रूप से अनिवार्य माना। अतः प्रारंभिक अवस्था में इन ग्रन्थों के कंठस्थीकरण पर जोड़ दिया जाता है।
“काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्” वचन का आधार यह शाश्वत सिद्धान्त है— शब्दोऽर्थस्य प्रकाशकः (प्रत्येक शब्द अर्थ को व्यक्त करता है) अर्थस्तत्त्वस्य आधारः। (तत्व का आधार अर्थ है)
पाणिनि शब्द देते हैं-
कणाद तत्त्व देते हैं-
दोनों के बिना शास्त्र न पूर्ण हैं, न प्रमाणिक।
महर्षि कणाद ने शास्त्रों को तत्त्व का स्वरूप दिया,
महर्षि पाणिनि ने उन्हें अभिव्यक्ति का साधन दिया।
इसी कारण भारतीय शास्त्रीय परम्परा का यह निष्कर्ष आज भी अक्षुण्ण है— “काणादं पाणिनीयं च सर्वशास्त्रोपकारकम्।”
अतएव संस्कृत प्रतिभा खोज की प्रतियोगिता में लघुसिद्धान्तकौमुदी, अष्टाध्यायी तथा तर्कसंग्रह को प्रतियोगिता में रखा गया है। इन ग्रन्थों को कंठस्थ करने के उपरांत छात्र संस्कृत भाषा में लिखित ग्रन्थों को ठीक से समझने लगता है।
लेखक- जगदानन्द झा
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प्रौढमनोरमा

 पाणिनि व्याकरण को दो प्रकार से अध्ययन किया जाता है।

१.अष्टाध्यायी क्रम - इसे प्राचीन व्याकरण कहते हैं।

२. सिद्धांतकौमुदी क्रम - इसे नव्य व्याकरण कहा जाता है । दोनों पद्धति में अष्टाध्यायी के सूत्रों को ही पढ़ा जाता है। बस सूत्रों को पढ़ने का क्रम बदल जाता है।

प्रयोगसिद्धि की दृष्टि को ध्यान में रखते हुए (कार्यकाल पक्ष को अङ्गीकार कर) अनेक आचार्यों ने नवीन दृष्टिकोण से ग्रन्थों की रचना की।  इस नवीन दृष्टि तथा क्रम को नव्य व्याकरण कहा जाता है। प्रयोग सिद्धि की दृष्टि से जब जिस सूत्र की आवश्यकता हुई उसके अनुसार सूत्रों के स्थापन से यह परिवर्तन  सरल प्रतीत हुआ तथा परिवर्तनानुकूल सूत्रों की वृत्तियों में भी नवीनता लाई गयी। इस परिवर्तन के प्रवर्तकों में रामचन्द्राचार्य, शेष श्रीकृष्ण, भट्टोजीदीक्षित, नागेश आदि उल्लेखनीय हैं।

भट्टोजीदीक्षित ने अष्टाध्यायी के समान लौकिक और वैदिक शब्दों की सिद्धि तथा वार्तिकों एवं प्राचीन वैयाकरणों के सिद्धान्तों का यथास्थान समावेश कर सिद्धांतकौमुदी ग्रन्थ की रचना की । तत्पश्चात् इस सिद्धांतकौमुदी पर प्रौढमनोरमा की व्याख्या लिखी।

मैं बाल्यकाल में अष्टाध्यायी पढ़ा तत्पश्चात् नव्य व्याकरण को। आज मेरे सम्मुख भट्टोजिदीक्षित कृत सिद्धान्तकौमुदी की व्याख्या प्रौढमनोरमा उपस्थित है। यह नव्य व्याकरण की पुस्तक है।

इस लेख में मैं आपको प्रौढमनोरमा पुस्तक तथा उसपर की गयी टीका की जानकारी दे रहा हूं।

इस ग्रन्थ पर उनके पौत्र हरिदीक्षितने वृहच्छब्दरत्न तथा लघुशब्दरत्न दो व्याख्याएँ लिखी हैं। यह व्याख्या विषम स्थलों पर भाष्योक्त निर्णय को प्रकाशित करती है। लघुशब्दरत्न पर भी टीकाएँ रची गयीं। इसके अतिरिक्त सिद्धान्त कौमुदी की २४ टीकाएँ ज्ञात हैं।

पायगुण्डोपाह्व वैद्यनाथ कृत सशब्दरत्न प्रौढ़मनोरमा की व्याख्या भावप्रकाशका रचना काल प्रायः १७५० वैक्रमाब्द है, व्याख्याकार महामहोपाध्याय नागेश भट्ट के शिष्य है। भावप्रकाश व्याख्या कारक प्रकरणान्त ही उपलब्ध है।

भैरवमिश्र कृत सशब्दरत्न प्रौढ़मनोरमा की व्याख्या रत्नप्रकाशिका” (कारकान्त) है। इसका रचना काल प्रायः १८७५ वैक्रमाब्द है। रत्नप्रकाशिका को "भैरवी" भी कहा जाता है।

 काशीनाथ के शिष्य भागवतोपनामक हरिशास्त्रिकृत शब्दरत्न व्याख्या चित्रप्रभा (कारक पर्यन्त) है।

सभापतिशर्मोपाध्यायकृत रत्नप्रभाटीका (अव्ययीभावान्त) का रचनाकाल २००० वैक्रमाब्द है।

महामहोपाध्याय माधव शास्त्री भाण्डारी की प्रभानाम्नी टिप्पणी (अव्ययीभावान्त) है।

महामहोपाध्याय जगन्नाथ शास्त्रीकृत रत्नदीपकटिप्पणी (अव्ययीभावान्त) है।

 जगन्नाथ शास्त्रीकृत सशब्दरत्न प्रौढ़मनोरमा व्याख्या ज्योत्सनाभी उपलब्ध है।

 पं. सदाशिव शास्त्रीकृत विभाटिप्पणी (अव्ययीभावान्त) प्रकाशित है।

प्रौढ़मनोरमा के खण्डन में रसगङ्गाधरकार पण्डितराज जगन्नाथ कृत कुचमर्दिनीव्याख्या पञ्चसन्ध्यन्त मिलती है।

महामहोपाध्याय नित्यानन्द पन्त पर्वतीय के शिष्य श्री गोपालशास्त्रि नेने ने  प्रौढ़मनोरमा के "लघुशब्दरत्न" (अव्ययी भावान्त) पर सरला नामक टिप्पणी लिखा। इसका रचना काल १९९९ वैक्रमाब्द के लगभग है।

 ‘प्रौढ़मनोरमाएक व्याख्या ग्रन्थ है, जिसपर अनेक टीका ग्रन्थ प्राप्त होते हैं।

मेरा सौभाग्य रहा है कि अपने छात्र जीवन में मैंने गुरुमुख से भैरवी सहित अनेक टीकाओं का अध्ययन श्रवण किया था। यह नव्य व्याकरण के कठितम टीकाओं में से एक है।

ध्यात्वा देवं परं ब्रह्म जानकीपतिमव्ययम् ।

विदुषां प्रीतिदां लध्वीमृज्वीं रत्नप्रकाशिकाम् ॥ १ ॥

नत्वा तातं जगद्वन्द्यं भवदेवाभिधं गुरुम् ।

सीताख्यां जननीं कुर्वे भैरवोऽगस्त्यसम्भवः ॥
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संस्कृत व्याकरण का अनुपम ग्रन्थ प्रबोध चन्द्रिका

वैजलभूपति कृत 'प्रबोध चन्द्रिका'व्याकरण विषयक ग्रन्थ है। आज इस पुस्तक को जब पढ़ना आरम्भ किया तो आनन्द बढ़ता चला गया। ग्रंथकार भी हमें इस पुस्तक को पढ़ने का आह्वान करते हुए लिखते हैं - इस पुस्तक से पहले अनेक प्रक्रिया ग्रंथों की रचना हो चुकी है। यदि प्रक्रिया की विधियां बहुत सी हैंतो रहेंउससे क्या हानि हैअथवा भ्रमरों के द्वारा क्या चमेली और मधु का पान अनादृत किया जाता है अर्थात् नहीं। उसी प्रकार व्याकरण की पुस्तकें रहते हुए भी जिज्ञासु पाठक अन्य प्रक्रिया ग्रन्थों के समान इस पुस्तक का भी आदर करेंगे । ३५ ।

बहवः प्रक्रिया पन्थाः सन्ति चेत् सन्तु का क्षतिः ।

मालती-मधुनो भृङ्गः किं वा पानमनादृतम् ॥३५॥



मैं श्लोकबद्ध व्याकरण की पुस्तकें पहले भी देखा हूँ परन्तु इतना रोचक और सरल भाषा में लिखित पुस्तक दुर्लभ है। इसमें व्याकरण के सूत्रों के स्थान पर उनके नियमों का उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। राम के जीवनवृत्त को लक्ष्य में रखकर व्याकरण के प्रयोग को प्रदर्शित करना, यह अपने आप में मुग्धकर है। लगता है लेखक को राम के प्रति प्रगाढ़ प्रीति रही होगी। वर्षों तक इस प्रकार के ग्रन्थों के द्वारा व्याकरण को सरस तथा सरल बनाने का प्रयास किया जाता रहा है।  

 यह ग्रन्थ सारस्वत व्याकरण में कहे स्यादि तथा त्यादि विभक्ति के नाम को यथावत् स्वीकार करता हैं। अथ विभक्तिः विभाव्यते। सा द्विधा । स्यादिस्त्यादिश्च ।

इसमें विभक्ति के लिए १२२ श्लोक, कारक के लिए ४६ श्लोक, त्यादिविभक्ति, तद्धित प्रत्यय, कृत्प्रत्यय तथा समास के द्वारा जो कारक होता है- अर्थात् जो कारक उक्त/अभिहित होता है, उसके लिए ६४ श्लोक, समास के लिए ३९ श्लोक, तद्धित के लिए ३८ श्लोक, कृत प्रत्ययों के लिए ३६ श्लोक तथा सन्धि के लिए ७० श्लोकों की रचना की है। यह संस्कृत भाषा सीखने के लिए भी अति उपयोगी है।  व्याकरण शास्त्र पढ़ने के बाद इस ग्रंथ को एक बार पढ़ लेने से दृष्टि और भी खुल जाती है। एक उदाहरण देखें -

विभक्तिज्ञानतो यस्मात्प्रबोधः प्रतिपद्यते ।

तस्मादिह प्रथमतो विभक्तिः प्रतिपद्यते ॥३६॥

विभक्ति ज्ञान से प्रबोध [शब्द बोध] होता है । अतः यहाँ सर्वप्रथम विभक्तियों का प्रतिपादन किया जा रहा है ।

विभक्ति दो हैं-स्यादि और त्यादि । २१ स्यदि विभक्तियाँ हैं। उनमें प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, पष्ठी और सप्तमी इन सात विभक्तियों में एकवचन द्विवचन और बहुवचन ये तीन वचन होते हैं ।

ध्यातव्य - विभक्ति शब्द का अर्थ होता है- विभज्यते पृथक् क्रियन्ते कर्तृकर्मादयो यया सा विभक्तिः । इनमें स्यादि विभक्ति नाम अर्थात् [प्रातिपदिक] शब्दों के आगे जुड़ती है। विभक्तिरहित, धातुवर्जित और अर्थवान् शब्द स्वरूप को नाम कहते है। कृदन्त, तद्धितान्त और समस्त पदों [समास] को भी नाम पद से अभिहित किया जाता है। नाम शब्द का पर्याय 'प्रातिपदिक' शब्द पाणिनीय व्याकरण में उपलब्ध होता है । 'अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम्' कृत्तद्धितसमासाश्च । त्यादि विभक्ति धातुओं के आगे जुड़ती है ।

प्रथम च द्वितीया च तृतीया च यथाक्रमम् ।

चतुर्थी पंचमी पष्ठी सप्तमी चेतिताः क्रमात् ॥३८॥

उनमे क्रमशः प्रथमा, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पञ्चमी, पष्ठी तथा सप्तमी विभक्तियाँ हैं ।३८।

प्रथमैव विभक्तिः स्यादुक्ते कर्तरि कर्मणि ।

अनुक्ते कर्म कर्त्रादौ द्वितीयाद्या विभक्तयः ॥३६॥

उक्त [अभिहित] कर्त्ता और कर्म में प्रथमा विभक्ति ही होती है । अनभिहित [अनुक्त] कर्म, कर्त्ता आदि में द्वितीयादि विभक्ति होती है ।

विशेष: प्रथमादि विभक्तियाँ कर्तृत्वादि कारकों की सूचक हैं। "तत्र क्रियासिद्ध्युपकारकं कारकम् । तत्र द्वितीयादयो विभक्तयो भवन्ति अनुक्ते । तच्च षड् विधम् ।

कर्ता कर्म च करणं सम्प्रदानं तथैव च ।

अपादानादिकरणे चेत्याहु:कारकाणि षट् ।

उक्तानुक्ततया द्वेधा कारकाणि भवन्ति षट् ।

उक्ते तु प्रथमैव स्यादनुक्ते तु यथाक्रमम् ।

यस्मिन् प्रत्ययो विहितः स उक्तः । न उक्तः अनुक्तः । अभिधानं च प्रायेण तिङ्कृत्तद्धितसमासैः । तिङ्, हरिः सेव्यते । कृत्, लक्षम्या सेवितः। तद्धितः, शतेन क्रीतः शत्यः । समास, प्राप्तः आनन्दोऽयं स प्राप्तानन्दः । क्वचिन्निपातेनाभिधानम् यथा विषवृक्षोऽपि संवर्ध्य स्वयं छेत्तमसाम्प्रतम् । साम्प्रतमित्यस्य हि युज्यत इत्यर्थः ।

तत्रोक्ते कर्तरि यथा रामो जयति वैरिणः ।

रणे रामौ च रामाश्च जयतश्च जयन्ति च ॥४०॥

उनमें अभिहित कर्ता में प्रथमा विभक्ति के विधान के उदाहरण - 'रामो वैरिणः जयति' (राम वैरियों को जीतता है) 'रामौ वेरिणः जयत': (दो राम वैरियों को जीतता हैं) तथा रामा: वैरिणः जयन्ति (बहुत से राम वैरियों को जीतते हैं।) यहाँ क्रमश: एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन का उदाहरण दिया गया है।

विशेष:- प्रस्तुत वाक्यों में जी' धातु से कर्त्रर्थ में लट् लकार विहित है अत: राम उक्त कर्ता है। यहाँ राम शब्द के साथ प्रथमा विभक्ति की गई है।

संस्कृत में तीन वाच्य होते हैं - १ कर्तृवाच्य २ कर्मवाच्य तथा ३. भाव वाच्य । सकर्मक धातुओं से कर्तृवाच्य और कर्म वाच्य में प्रत्यय होते हैं। अकर्मक धातुओं से कर्तृवाक्य और भाववाच्य में प्रत्यय होते हैं। कर्तृवाच्य में कर्ता मुख्य होता है, क्रिया कर्ता के अनुसार चलती है । कर्ता में प्रथमा, कर्म में द्वितीया प्रौर क्रिया कर्ता के अनुसार होती है ।

 सम्बोधनेऽपि प्रथमा विभक्तिर्भवति ध्रुवम् ।

यथा हे राम हे रामौ हे रामाः इत्यनुक्रमात् ।।४१॥

निश्चित ही सम्बोधन में भी प्रथमा विभक्ति होती है। जैसे- 'हे राम, हे, रामौ, है रामाः" इन वाक्यों में राम शब्द से प्रथमा विभक्ति विहित है।

ध्यातव्य - "आभिमुख्याभिव्यक्तये हे शब्दस्य प्राक्प्रयोगः" इस नियम के अनुसार राम के आभिमुख्य की अभिव्यक्ति के लिये हे शब्द का प्रयोग किया गया है।

हे शब्देन विनापि स्यात्क्वचिदंतेऽपि हे भवेत् ।

यथा राम प्रसीद त्वं राम हे त्वां भजाम्यहम् ।।४२।।

 हे शब्द के बिना भी प्रथमा विभक्ति होती है। कहीं अन्त में भी 'हे' हो तो इसका विधान होता है जैसे 'राम ! त्वं प्रसीद' 'राम ! हे ! अहं त्वां भजामि" – इसके प्रथम वाक्य में हे शब्द के बिना सम्बोधन में राम शब्द का प्रयोग किया गया है तथा द्वितीय वाक्य में शब्द के अन्त में हे का प्रयोग किया गया है । इन दोनं स्थितियों में प्रथमा विभक्ति विहित है ॥४२।।

विशेष:- हे शब्द के विना भी सम्बोधन में प्रथमा विभक्ति के उदाहरण निम्न श्लोक में दृष्टव्य है:-

मां समुद्धर गोबिन्द ! प्रसीद परमेश्वर ।

कुमारौ स्वरमासाथां क्षमध्वं भो तपस्विनः ।

इत्युदाहरणं दत्तमुक्ते कर्तरि केवलम् ।

अथोदाहरणं किञ्चदुक्ते कर्मणि दीयते ॥४३॥

इस प्रकार यह अभिहित कर्ता में प्रथमा विभक्ति का उदाहरण दिया गया है। अब अभिहित कर्म में प्रथमा विभक्ति का कुछ उदाहरण दिया जा रहा है।

न जीयते न जीयेते न जीयन्ते रथाङ्गणे ।

रामो रामौ च रामाश्च शत्रुभिश्चेति निश्चितम् ।।४४।।

 'निश्चितं रणाङ्गणे शत्रुभिः रामः न जीयते' निश्चित ही युद्ध स्थल में शत्रुओं के द्वारा राम नहीं जीता जाता है ।' रणाङ्गणे शत्रुभिः रामौ न जीयेते' (युद्ध स्थल में शत्रुओं के द्वारा दो राम नहीं जीते जाते हैं। 'रणाङ्गणे शत्रुभिः रामाः न जीयन्ते' युद्ध स्थल में शत्रुओं के द्वारा बहुत से राम नहीं जीते जाते हैं।

विशेष:- प्रस्तुत वाक्यों में 'जि जये' धातु से कर्मार्थ में प्रत्यय हुआ है। अतः 'कर्म' राम शब्द उक्त होने के कारण कर्म में प्रथमा विभक्ति को गई है। यह 'कर्मवाच्य' का उदाहरण है। कर्मवाच्य में कर्म मुख्य होता है और कर्म के अनुसार ही क्रिया, पुरुष, वचन तथा लिंग होता है। कर्मवाच्य में कर्त्ता में तृतीया, कर्म में प्रथमा और किया कर्म के अनुसार होती है।

प्रथमान्तस्य कर्तुश्च कर्मणश्चानुगद्यते ।

संख्यात्योदरनुक्तस्य न कदापीति बुध्यताम् ।।४५।।

प्रथमान्त कर्ता एवं प्रथमान्त कर्म के अनुसार त्यादि विभक्तियों की संख्या होती है। अनुक्त कर्ता एवं कर्म के अनुसार त्यादि विभक्तियों की संख्या कभी नहीं होती- यह ज्ञातव्य है ॥४५॥

विशेष:- अभिहित कर्ता एवं कर्म के अनुसार ही तिङ् (आख्यात) विभक्तियों में वचन होता है। अनभिहित कर्ता एवं कर्म के अनुसार तिङ् (आख्यात) विभक्तियों में वचन नहीं होता है ।

अनुक्ते कर्मणि भवेत् द्वितीया सा तु दर्श्यते ।

रामं रामौ च रामांश्च भजाम्यहमहर्निशम् ॥४६।।

अनुक्त (अनभिहित) कर्म में द्वितीया होती है। इसका उदाहरण दिया जा रहा है। जैसे-अहं अहर्णिशं रामं, रामौ रामांश्च भजामिइस वाक्य में अनुक्त कर्म राम में द्वितीया विभक्ति का विधान किया गया है । ४६ ।

अनुक्ते कर्तरि भवेतृतीया करणेऽपि च ।

यथा रामेण रामाभ्यां रामैर्वा जीयते रिपुः ।।४७।।

अनुक्त कर्ता तथा करण में तृतीया होती है। जैसे- "रामेण रामाभ्यां में रामैर्वा रिपुः जीयते" (एक राम, दो रामों अथवा तीन रामों के द्वारा शत्रु जीता जाता है) । इस वाक्य में अनुक्त कर्ता राम में तृतीया की गई है ।। ४७।।

करणे दीयते किञ्चिदुदाहरणमुत्तमम् ।

रामः शिरांशि शत्रूणां निक्रंततिशितैः शरैः ॥४८॥

करण में तृतीया के विधान का एक उत्तम उदाहरण दिया जा रहा है । ( रामः शितैः शरैः शत्रूणां शिरांसि नितति ) राम तीखे वाणों से वैरियों के सिर काटता है । यहाँ शित तथा शर शब्दों में करण में तृतीया विहित है ॥४८॥

अनुक्ते स्यात् संप्रदाने चतुर्थी सा निगद्यते ।

फलं रामाय रामाभ्यां रामेभ्योदत्तमुत्तमैः ॥४६॥

अनुक्त सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है। इसका उदाहरण है- "उत्तमैः रामाय, रामाभ्यां, रामेभ्यः फलं दत्तम्' श्रेष्ठ जनों ने एक राम, दो राम, तीन राम के लिए फल दिया ।।४६ ।।

विशेष: स्वस्वत्वनिवृत्तिपूर्वकपरसत्वापादनं सम्प्रदानम् ।

अनुक्ते स्यादपादाने पंचमी साविधीयते ।

यथा रामाञ्च रामाभ्यां रामेभ्यो भक्तिरीप्सिता ॥ ५० ॥

अनुक्त अपादान में पञ्चमी विभक्ति का विधान किया जाता है जैसे 'रामात्, रामाभ्याम् रामेभ्यो शक्तिः ईप्सिता ( राम से भक्ति चाही गई ) ।।५।।।

अनुक्ते स्यात्तु सम्बन्धे षष्ठी तस्या उदाहृतिः ।

रामस्य रामयोश्चापि रामाणां कीर्तिरुत्तमा ॥५१॥

अनुक्त सम्बन्ध में षष्ठी विभक्ति की जाती है। इसका उदाहरण है- 'रामस्य, रामयोः, रामाणामपि च कीर्तिः उत्तमा अस्ति' । राम की कीर्ति श्रेष्ठ है ।। ५१॥

अनुक्ते चाधिकरणे सप्तमी जायते यथा ।

रामे च रामयोश्चापि रामेषु श्रीर्विहारिणी ॥ ५२ ॥

अनुक्त अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। जैसे- रामे, रामयोः, रामेषु चापि श्री विहारिणी अस्ति। राम में शोभा विहार करने वाला है ।। ५२ ।।

इत्युदाहृतयो दत्ताः सप्तस्वपि विभक्तिषु ।

केनचित्कारणेनासामन्यत्रावस्थितिर्यथा ॥५३॥

इस प्रकार सातों विभक्तियों में उदाहरण दिये गये है। इन विभक्तियों की कारणान्तर से अन्यत्र भी अवस्थिति होती है। इनके उदाहरण आगे प्रस्तुत किये जा रहे हैं ।।५३।।

रामश्च वैयाकरणः सा वैयाकरणी वधूः ।

तद्व्याकरणं सैन्यमित्थं भवति तद्धितम् ।।

रामः वैयाकरणः (राम व्याकरण पढ़ने वाला या जानने वाला) सा वधूः वैयाकरणी  (वह वधू व्याकरण पढ़ने वाली या जानने वाली) , तत् सैन्यम् वैयाकरणम् (वह सैन्य व्याकरण पढ़ने वाला या जानने वाला) इस प्रकार तद्धित होता है ।

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