रविवार, 20 अप्रैल 2014

रसों की संख्या

            सामान्य रूप से रस नौ होते हैं। संस्कृत काव्यशास्त्र के मूर्धन्य आचार्य मम्मट ने अपनी कृति काव्य-प्रकाशकी प्रथम कारिका में ही कवि निर्मित कविताके लिए ‘‘नवरसरूचिराम्‘‘ विशेषण का प्रयोग किया है जिसकी व्याख्या प्रसिद्ध टीकाकार वामन ने दो प्रकार से की है-‘‘नवसंख्याकाः रसाः श्रृगारदयो यस्यां सा नवरसा, सा चासौ अतएव रूचिरा मनोहरा च ताम्‘‘ अथवा ’’नव अवयवाः यस्य साः नवायवः, स चासौ रसश्च नवरसः, तेन रूचिराम्।’’ आचार्य मम्मट का यह कथन संस्कृत-साहित्य-शास्त्र के इतिहास में रसों की कुल संख्या नौ होने की सार्वभौम मान्यता का परिचायक है। यशस्तिलक चम्पू नामक प्रसिद्ध साहित्यक कृति में भी यही मान्यता स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त हुई है -
                         त्रिमूलकं द्विधोत्थार्न पच्चशाखं चतुश्छदम्।
                        यो अंगं वेति नवच्छायं दशभूमि स काव्यकृत्।।
यहां नवच्छायं से नौ प्रकार के रसों का श्लेष के द्वारा उल्लेख किया गया है। इसका अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार नये वृक्ष का सर्वसामान्य को मिलने वाला सुख उसकी घनी होती है उसी प्रकार काव्यगत रसों का सुख सभी सामाजिकों की कृतियों में रसों की कुल संख्या नौ के स्थान पर आठ का ही उल्लेख प्राप्त होता है। कविकुलगुरू कालिदास ने नाट्य को भष्टरसाश्रय कहा हेै-
                    मुनिना भरतेन यः प्रयागो भवतीस्वष्टरसाश्रयो नियुक्तः।
आचार्य दण्डी ने कवि की वाणी को अष्टरसायताका विशेषण दिया है।
इनके अतिरिक्त भी अनेक ऐसे उल्लेख उपलब्ध होते हैं जिनमें रसों की संख्या के दस, बारह या इससे भी अधिक होने का विधान हुआ है। ऐसी स्थिति में इस प्रश्न को लेकर शोध की प्रक्रिया से इनका निरूपण सर्वधा उपादेय है। भरत के नाट्यशास्त्र से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ की कृति उपादेय है।
भरत के नाट्यशास्त्र से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ की कृति रसगंगाधर तक के संस्कृत-साहित्य-शास्त्र के ग्रन्थों में उपलभ्यमान एतद् विषयक सामग्री का सम्यक् रूप से ऊहापोह करते हुए रसों की संख्या की विविधता के पीछे निहित आधारभूत सिद्धान्तों को प्रकाश में लाना एवं उनका परीक्षण आवश्यक है।
            संस्कृत-साहित्या-शास्त्र के सभी इतिहासकार इस तथ्य को एकमत से स्वीकार करते है कि अबतक की उपलब्ध सामग्री के आधार पर रस का सैद्धान्तिक विवेचन करने वाला आद्य ग्रन्थ ‘‘भरत-नाट्यशास्त्र‘‘ है। नाट्यशास्त्र में रस का उल्लेख सम्पूर्ण ग्रन्थ में अनेकत्र प्राप्त होता है। विवेचन के लिए विनियोजित हुये हैं जिनमें पृष्ठ अध्याय विशुद्ध रूप से रसपरक है। अध्याय के आरम्भ में ही रसों के नाम एवं उनकी संख्या का परिगणन करते हुए कहा है-
                        श्रृगांरहास्यकरूणा रौद्रवीरभयानकाः।
                         बीभत्साद्भुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः।।
एते हाष्टौ रसाः प्रोक्ता दुहिणेन महात्मना।।
यहां यह बताया गया है कि द्रुहिणा अर्थात् ब्रह्ाा ने जिस नाट्यवेद की रचना की और भरत को जिसका उपदेश दिया उसमें श्रृंगार, हास्य, करूणा, रौद्र, वीर, भयानक, वीभत्स एवं अद्भुत नामक आठ रसों का ही विधान था। अध्याय के अन्त में भी रसविषयक विवेचन का समापन करते हुए रसों की आठ संख्या का पुनरूल्लेख इस बात का पुष्कल प्रमाण है कि नाट्यशास्त्र में हुआ है-
                                    एवमेते रसा ज्ञेयास्त्ववष्टौ लक्षणालक्षिताः।।
            नाट्यशास्त्र के ही सप्तम भावाध्याय में निरूपित स्थायिभावों से भी रसों की इस आठ संख्या की ही पुष्टि होती है। क्योंकि स्थायी भाव ही विभावादि से संवलित होकर रसके रूप में परिगाात होते हैं। इस प्रकार स्थायिभावों की ंख्या के अनुसार भी रसों की कुल संख्या आठ ही सिद्ध होती है। कविकुलगुरू कालिदास का यह कथन कि मुनि भरत ने आठ रसों से युक्त नाट्य के प्रयोग का अपनी कृति में विधान किया है, इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि कालिदास के समय तक भरत का नाट्यशास्त्र रसों की आठ संख्या के सिद्धान्त का ही प्रतिपादक था।
            किन्तु नाट्यशास्त्र के इसी पृष्ठ अध्याय में नवम शान्त रस का निरूपण भी उपलब्ध होता है जिसे मोक्ष का प्रवर्तक कहा गया है। इस अंश का निरूपण भी अन्य रसों के निरूपण के समान पहले गद्यात्मक अनन्तर कारिकाओं में किया गया है। पर बडौदा संस्करण में इन श्लोंको को कोई संख्या नहीं दी गई है तथा अन्तिम श्लोक में कहा है-
                                   एवं नवरसा छष्टा नाट्यज्ञैर्लक्षान्विताः।
            इतना ही नहीं इसी सन्दर्भ में शान्त को सभी भावों एवं रसों की मूल-प्रकृति होने का विधान भी किया है जिसका अभिप्राय यह है कि सभी प्रकार के भाव शान्त के ही विकार है तथा शान्त ही उनकी मूल प्रकृति है-
भावा विकारा रत्याद्याः शान्तस्तु प्रकृतिर्मतः
नाट्यशास्त्र के रसों की संख्या विषयक इन दोनों अंशो में विरोध स्पष्ट है। अतः शान्तरस परक अंश को निश्चित रूप से मौलिक नहीं कहा जा सकता। वैसे तो सम्पूर्ण नाट्यशास्त्र किसी एक व्यक्ति के द्वारा कृत किसी एक व्यक्ति के द्वारा कृत किसी एक काल की रचना नहीं कहा जा सकता। वैसे तो सम्पूर्ण नाट्यशास्त्र किसी एक व्यक्ति के द्वारा कृत किसी एक काल की रचना नहीं है तथापि इसके अपने वर्तमान स्वरूप को प्राप्त करने की निम्नतम काल सीमा तृतीया शताब्दी ईस्वी मानी गई है। पर शान्तरस विषयक उक्त विवेचन को उस सीमा के भीतर का स्वीकार करने में अनेक विप्रतिपत्तियां उठ खड़ी होती है। रसों की आठ संख्या के विधान का विरोध तो आपाततः परिलक्षित होता ही है। इसके अतिरिक्त जहां आठ रसों के विधान के साथ ब्रह्ाा का नाम जुड़ा हुआ है वहां नव रसों के विधान को नाट्यज्ञों के द्वारा हष्ट मानना स्वये असम्पृक्त एवं विशुद्ध रूप से प्रक्षिप्त मानने में भी हमारे समक्ष अनेक कठिनाइयां हैं। जिनमें से एक कठिनाई यह है कि इस अंश पर भी अभिनवगुप्त की टीका ‘‘अभिनव-भारती’’ उसी प्रकार विस्तृत रूप में उपलब्ध होती है। जिस प्रकार अध्याय के शेष भाग पर। इतना ही नहीं अभिनवगुप्त ने अपनी टीका में शान्त के भी रस होने की बात का बड़े ही वैदुष्यपूर्ण ढंग से समर्थन किया है। के शेष भाग पर। इतना ही नही अभिनवगुप्त ने अपनी टीका में ‘‘शान्त के भी रस होने की बात का बड़े ही वैदुष्यपूर्ण ढंग से समर्थन किया है। उनके द्वारा पूर्वपक्ष के रूप में उपस्थापित एवं तर्कों का अनुशीलन करने से स्पष्ट प्रतीत होता है कि उन दिनों शान्त रस मनीषियों के विवाद का मुख्य विषय बना हुआ था। तथा इसके पक्ष एवं विषक्ष में नाना प्रकार के मतमान्तर प्रचलित हो गये थे। अभिनवगुप्त ने अपनी विलक्षण प्रतिभा से शान्त रस के विरोधियों के तर्कों का निरसन करते हुए साहित्यिक समीक्षा के क्षेत्र में उसकी प्रतिष्ठा में बहुत बड़ा योग दिया। इसका मुख्य कारण यह है कि शान्त रस की स्थापना से रससिद्धान्त की आध्यात्मिक व्याख्या करने में अभिनवगुप्त को बड़ी सहूलियत हुई। अतएव उन्हें वीर एवं बीभत्स रसों में शान्त के अन्तर्भाव की बात कथमपि ग्राह् नहीं हुई।
            रसों की विविधता के आधार का अनुसंधान करते हुए आचार्य अभिनव गुप्त ने पुरूषार्थ-चतुष्टय को ही इनके विभेद का आधार निर्धारित किया तथा तदनुसार ही रसों का वर्गीकरण करते हुए वीर को धर्मप्रधान, रौद्र को अमर्ष (अर्थ) प्रधान, श्रृंगार को कामप्रधान तथा शान्त को मोक्ष फलक रस कहा है। नाट्यशास्त्र के मूल में रसों की आठ संख्या के होने के स्पष्ट विधान से अभिनवगुप्त को नवम शान्त रस के समर्थन में कठिनाई का अनुभव अवश्य हुआ। अतएव नाट्यशास्त्र के संख्यापरक उल्लेखों को वे बहुत महत्व नही देना चाहते। इस सम्बन्ध में एक तर्क उपस्थापित करते हुए वह कहते हैं कि भरत ने स्वायि-भावों की संख्या का जो स्पष्ट उल्लेख नहीं किया है उसका कोई रहस्य अवश्य है और वह यह है कि ये स्थायी भाव विभावादि से जब पूर्णतया परिपुष्ट नहीं होते तो मात्रव्यभिचारी रह जाते है। अतः रसों के विषय में भी संख्या का उल्लेख उपलक्षणा मात्र है, इदतित्थं रूप से निर्धारण नही। आचार्य अभिनवगुप्त द्वारा कृत रसों की नौ संख्या के समर्थनात्मक विवेचन के पीछे रसों में शान्तकी कल्पना एवं उसके अन्र्तभाव के कारण का एक इतिहास है जिसका सम्यक् रूप से ऊहापोह हुए बिना रसों की संख्या विषयक जिज्ञासा को शान्ति नहीं मिल सकती।
            अभिनव के पूर्ववती आचार्यों में से रूद्रट ने अपनी कृति काव्यालंकारमें भरतप्रोक्त उक्त आठ रसों के अतिरिक्त शान्त एवं प्रेयान् नामक दो और रसों के होने का विधान किया है-
                          श्रृंगारवीकरूणा बीभत्सभयानकादभुता हास्यः।
                           रौद्रः शान्तः प्रेयानिति मन्तव्या रसाः सर्वे।।
            इनके अनुसार शान्त तो रस है ही प्रेयान् को भी रस का स्थान प्राप्त है और इस प्रकार रसों की कुल संख्या दस हो जाती है। रूद्रट का तर्क है कि आचार्यों ने श्रृंगार आदि को रस इसलिए कहा है कि उनमें रसनीयता अर्थात् अनुभव में आने की योग्यता है। चूंकि यह योग्यता निर्वेद और स्नेह आदि भावों में पायी जाती है अतः शान्त एवं प्रेयान् के भी रस होने में कोई विप्रतिप्रत्ति नहीं होनी चाहिए-
                       रसनाद्रसत्मेषां मधुरादीनामिवोक्तमाचायेः।
                       निर्वेदादिष्वपि तन्निकाममस्तीति ते अपि रसाः।।
रूदट के टीकाकार नमिसाधु का तो यहां तक कहना है कि चित्त की कोई भी वृत्ति ऐसी नहीं है जो परिपोष पाकर रस के रूप में परिगात न हो जाय। उनका है कि जो आठ या नौ संख्या कही है उसका भी आधार सह्दयों के ह्दय के आवर्जन में प्रचुरता का होना ही है। रूद्रट के भी पूर्ववर्ती आचार्य उद्भट ने भी रसवत् आदि अलंकारों के निरूपण के प्रसंग में रसों के नाम और उनकी संख्या का परिगणन करते हुए नाट्य में भी शान्त सहित नौ रसों के होने का विधान किया है-
                       श्रृंगारहास्यकरूणाारौद्रवीरभयानकः।
                       वीभत्साद्भुतशान्ताश्च नव नाट्ये रसाः स्मृताः।।
यहां शान्त को रसों में परिगणित कर इदमित्थं रूप से उनकी नौ संख्या का उल्लेख इस तथ्य का द्योतक है कि शान्त को रस मानने की परम्परा के जन्मदाता अभिनवगुप्त ही नहीं है अपितु उनसे पर्याप्त पूर्व काल से ही वह प्रचलित थी। भट्टोद्वट के निरूपण में नाट्यपद का उल्लेख विशेष महत्व का है। ऐसा प्रतीत होता है कि शान्त रस केक नाट्य में निष्पन्न न होने की बात उस समय भी कही जाती थी जिसके प्रतिरोध में आचार्य ने विशेष रूप से नाट्य पद का समुल्लेख आवश्यक समझा। किन्तु आगे चलकर मम्मट प्रभूति आचार्यों ने भी शान्त रस की अभिनेयता को असंभावित बताकर नाटय में उसकी संभावना का सर्वथा निरसान कर दिया। उद्रट के टीकाकार प्रतिहारेन्दु राज ने जो अभिनवगुप्त के साहित्यिक गुरू भी थे काव्यालंकारसासंग्रहकी उपर्युक्त कारिका की टीका करते हुए कहा है कि श्रृंगारादि ये नौ रस धर्माथंकाममोक्ष रूप पुरूषार्थ चतुष्टय की प्राप्ती के उपाय के रूप में ही काव्य में उपनिबद्ध होते है। इनके रस होने का रहस्य इन्होंने भी रूदट के समान ही रत्यादि भावों की आस्वादनीयता को ही बताया है। इसी को वे रस शब्द की तान्त्रिकता कहते है। समर्थन में प्रतिहारेन्दुराज ने रूदट की उपर्युक्त कारिका को भी समुद्धत किया है। उद्धट के समसामयिक आचार्य वामन ने कान्ति नामक गुण में ही रसों का समावेश माना है। अतः उनके नाम तथा संख्या का उल्लेख उनकी लेखनी से कहीं भी नहीं हुआ है। किन्तु उनके ग्रन्थ की प्रसिद्ध टीका कामधेनु ने शान्त सहित सभी नौ रसों को अपनी टीका में उदाह्त किया है।
            वामन के पूर्ववर्ती दाक्षिणात्य आचार्य दण्डी ने अपनी महनीय कृति काव्यादर्शमें भरत प्रोक्त रति आदि आठों स्थायिभावों के रस रूप में परिणत होने का अलग-अलग उल्लेख किया है। अन्त में काव्य में रस की स्थिति को आठ रसों से युक्त कहकर इन्होंने भटृटोदट से लेकर अभिनव गुप्त तक के आचार्यों द्वारा निरूपित नवम शान्त रस की सत्ता से सर्वथा अपरिचित होने का द्रष्टान्त प्रस्तुत किया है-
            दण्डी के पूर्ववर्ती आचार्य भामह के विवेचनों में सभी रसों के नाम या उनकी कुल संख्या का उल्लेख कथमपि नहीं हुआ है। वे श्रृंगारादि रस कहकर ही रह जाते हैं। इसका अभिप्राय यह है कि वे रससिद्वान्त से तो परिचय है पर रसों की संख्या के विषय में किसी प्रकार के विवाद की जानकारी उन्हें नहीं है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि भरत के नाट्यशास्त्र में उपलभ्यमान शान्त रस के विवेचन के प्रक्षेप का काल निश्चित रूप से भामह और दण्डी के बाद का है। आचार्य दण्डी तक रसों की संख्या के केवल आठ तक सीमित रहने की बात ही प्रमाणित होती है। नाट्यशास्त्र में शान्त रस के प्रक्षेप का काल भट्टोद्रट के बाद का ही है जिसका संकेत रूद्रट कृत काव्यालंकार की टीका में नमिसाधु ने ‘‘भरतेन’’ अष्टौ वा नव वा रसा उक्ताःकी उक्ति से किया हैं।
            आचार्य आनन्दवर्धन के द्वारा ध्वनि-सिद्धान्त की प्रस्थापना से काव्य के आधायक दोष, गुण, अलंकार, रीति एवं रस प्रभूति तत्वों के स्वरूप में पर्याप्त निखार आया। स्वंय आनन्दवर्धन ने किसी भी तथ्य का ग्रहण या तिरस्कार किसी की मान्यता के अनुसार न करते हुए युक्ति एवं तर्क के  आधार पर ही किया। इन्होंने रसों के रसत्व प्राप्ति का आधार सह्दय सामाजिक के चित्त की द्रूति, दीप्ति एवं उसके विकास को बताया। श्रृंगार एवं करूण रसों में चित्त की द्रुति पायी जाती है तथा रौद्र आदि चित्त की दीप्ति से परिलक्षित किये जाते हैं। वीर आदि में चित्त का विकास पाया जाता है। अतः उनके अनुसार जो भाव काव्य में निरूपित होकर सह्दय सामाजिक के चित्त को द्रुति, दीप्ति या उसके विकास में समर्थ हो पाते हैं वे सभी रस कहे जाने योग्य हैं। भौतिक सुखों को भोगने की तृष्णा के क्षय से होने वाला जो सुख है उसी का परिपोष शान्त रस के रूप में होता है जिसकी अनुभूति यद्यपि सभी सह्दयों को समान रूप में नहीं हो पाती तथापि जिनको होती है उनमें शान्त रस की स्थिति स्वीकार करनी होगी। वीर रस में शान्त के अन्तर्भाव की बात का आनन्दवर्धन ने यह कहकर निराकरण किया कि दोनों रसों में चित्त की भिन्न-भिन्न अवस्थायें होती हैं। जहां वीर में अहंकार का प्रकर्ष एवं चित्त का विकास होता है वहां शान्त में अहंकार का प्रशम एवं चित्त की द्रुति। अतः आनन्दवर्धन ने शान्त रस की स्वतन्त्र सत्ता को स्वीकार कर रसों की संख्या के विषय में कुछ न कहते हुए भी परोक्ष से नौ संख्या के पक्ष का ही समर्थन किया है। महाभारत को शान्त विकास होता है वहां शान्त रस की स्वतन्त्र सत्ता को स्वीकार कर रसों की संख्या के विषय में कुछ न कहते हुए भी परोक्ष से नौ संख्या के पक्ष का ही समर्थन किया है। महाभारत को शान्त रसप्रधान काव्य बताना भी रसों की कुल संख्या के नौ होने के पक्ष की ही प्रकारान्तर से पुष्टि करना है।
            आनन्दवर्धन के परवर्ती पर अभिनवगुप्त के पूर्ववर्ती आचार्य धनज्जय ने स्थायिभावों का परिगणन करते हुए शम के भी स्थायी भाव होने का प्रश्न उठाया है और यह कहकर निषेध किया है कि नाट्य में इसकी पुष्टि नहीं हो पाती-
                रत्युत्साहजुगुप्साः क्रोधो हासः स्मयो भयं शोकः।
                शममपि के चित्प्राहुः पुष्टिनाट्यिेषु नैतस्य।।
धनज्जय का तर्क है कि निर्वेद आदि चित्त के वे भाव हैं जो क्षणिक होते हैं। अतः उनमें स्थायी भाव होने की क्षमता ही नहीं है। फिर वे रस के रूप में सामाजिक की वासना का विषय किस प्रकार हो सकते हैं ? क्योंकि ये तो वस्तुतः रत्यादि अन्य भावों के अभाव रूप होते हैं। इनके परिपोष से नाट्य में विरसता की आशंका होती है अतः इनको स्थायी भाव ही नहीं मानना चाहिए। फलतः स्थायिभावों की कुल संख्या आठ ही समुचित है-
                  निर्वेदाादिरतादू्रप्यादस्थायी स्वदते कथम्।
                 वैरस्यायैव तत्पोषस्तेनाष्टौ स्थायिनो मताः।।
            दशरूपकार ने स्थायिभावों एवं रसों की आठ-आठ संख्या के पीछे निहित मनोवैज्ञानिक तथ्य की ओर संकेत करते हुए कहा है कि श्रृंगार, वीर, बीभत्स एवं रौद्र चार ही मौलिक रस है। क्योकि काव्यनार्थ के संभेद से सह्दय सामाजिक के मन प्रतिक्रिया विकास, विस्तार, क्षोभ एवं विक्षेप के रूप में चार ही प्रकार की होती है। श्रृंगार में चित्त का विकास, वीर में ही मुदिता, मैत्री करूणा एवं उपेक्षा की संज्ञा दी गई है। हास्य, अद्भुम, करूणा एवं भयानक रसों में भी क्रमशः चित्त की वही विकास, विस्तार, क्षोभ एवं विक्षेप वृत्तियां जन्म ले लेती है अतएव इन्हें श्रृंगारादि मूलरसों से ही उत्पन्न माना गया है।
            भरत के नाट्यशास्त्र में भी श्रृंगार से हास्य, वीर से अभ्दुत, रौद्र एवं बीभत्स नामक चार रसों के ही मौलिक होने का विधान हुआ है-
                        तेषामुत्पत्तिहेतवश्चत्वारो रसाः।
                        तथा श्रृंगारो रौद्रों वीरो वीभत्स इति। 
यहाँ दशरूपक के टीकाकार 
                भवेद्धास्यो करूणो रसः। वीराच्चैवाभ्दुतोत्पतिर्बीभत्साच्च भयानकः।।
दशरूपक के टीकाकार धनिक ने अपनी टीका अवलोकमें इसका निरूपण बहुत ही विस्तार एवं गहन रूप में किया है। इसी पुस्तक के रस मनोविज्ञाननामक पच्चम पक्ष में इसका पर्याप्त विवेचन किया जा चुका है। यहां हम इतना ही कहना चाहेंगे कि भरत ने चार ही रसों के मौलिक होने की बात जो कही थी उसके आधार भूत सिद्धान्श्त का प्रतिपादन धनज्जय एवं धनिक ने किया। फलतः मूलतः रसों की संख्या चार है तथा उनके परिणाम स्वरूप शेष चारों के योग से रसों की कुल संख्या आठ तक ही समुचित सिद्ध होती है।
            रसों की संख्या के विषय में भोज का सिद्धान्त सबसे निराला है। उनकी मान्यता है कि रस अनेक नहीं हो सकते। अपि तु परीक्षा करने पर केवल श्रृंगार ही एकमात्र रस प्रमाणित होता है। भावों में से आठ स्थायी, आठ ही सात्विक तथा तैतीस व्यभिचारी के होने का सिद्धान्त भी उनकी दृष्टि से सही नहीं हैं। ये सभी उनचास भाव स्थिति के अनुसार कभी व्यभिचारी, कभी स्थायी तो कभी सात्विक की संज्ञा के भागी हुआ करते हैं। क्योंकि इन सब की उत्पत्ति का स्थल होता है मानव मन, जहां कोई भी भाव निरन्तर स्थायी रूप से बना नहीं रह सकता।
            रत्यादि स्थायिभावों के ही परम प्रकर्ष भाव को प्राप्त कर रस होने की बात का खण्डन करते हुए भोज कहते हैं कि यदि परम प्रकर्षभाव को प्राप्त करने पर ही कोई भाव रस हो सकता होता तो हर्ष आदि को भी रस कहा जाना चाहिए। यदि निरन्तर अनुभूयमान हर्ष आदि भाव प्रकृष्टता आदि को पाकर रस क्यों कहे जाते हैं। भोज की तो घोषणा है कि रस आठ ही होते हैं यह बात कथमपि स्वीकार्य नहीं। शान्त, प्रेयान्, उद्धत एवं ऊर्जास्वित् के भी रस होने के विधान यत्र तत्र प्राप्त होते हैं।
            श्रृंगार आदि चार रसों से हास्य आदि चार की उत्पत्ति का भरत का सिद्वान्त भी भोज को ग्राह नहीं है। उनका कहना है कि इसके पीछे कोई निश्चित नियम काम नहीं करता। उदाहरणातः श्रृंगार के बिना भी हास्य की उत्पत्ति देखी जाती है, तथा श्रृंगार रस के बिना भी हास्य की उत्पत्ति देखी जाती है तथा श्रृंगार के रहते हुए भी उससे उत्पन्न न होकर हास्य की अन्य प्रकार से भी सृष्टि होती है। यही स्थिति करूणा, अभ्दुत एवं भयानक रसों की भी है। इस प्रकार भरतनाट्यशास्त्र द्वारा प्रवर्तित तथा धनन्जय एवं धनिक द्वारा समर्थन रसों की मौलिक संख्या के चार ही होने के सिद्धान्त का भी भोज ने अपलाप कर दिया है।
            भोज का यह भी मत है कि प्रकर्ष को प्राप्त करने पर ही यदि रस की स्थिति माननी है तो भरत प्रोक्त सभी उनचास भाव जिनमें स्थायी, सात्विक एवं व्यभिचारी सभी सम्मिलित है, विभावादि से परिपुष्ट होकर रस होने की क्षमताा रखते हैं। फिर तो रसों की कुल संख्या आठ या नौ तक ही सीमित न होकर उनचास ही मानती होगी। इसलिये यही मानना समुचित होगा कि रस तो एक मात्र श्रृंगार ही है। जिस प्रकार एक ही अग्नि को पृथ्वी से सम्बन्धित होने पर आग, आकाश में संचरण वाली को दिव्य नक्षत्र तथा उदर में स्थित होकर भोजन को पचाने वाली को जठराग्नि आदि भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित किया जाता है तथा इनकी क्रियाओं को क्रमशः दाह, प्रकाश एवं पाक की संज्ञा देते है और धूम, ज्योति एवं श्रृंगार की भी रस एवं उनके आभास आदि अनेक जातियां होती है। उत्कण्ठा आदि क्रियाऐं होती हैं तथा उत्पत्ति, अभिवृद्ध एवं स्थिरता आदि विविध अवस्थायें होती हैं।
            महाराजा भोज का यह श्रृंगार वस्तुतः रस नहीं अपितु रसिकता है जिसके अभाव में रस क्या वस्तु एवं अलंकारों के सौन्दर्य की भी अनुभूति व्यक्ति नहीं कर सकता। अथवा फ्रायड की तरह ही भोज भी इस बात को बताना चाहते है कि साहित्यिक किसी भी प्रकार की गतिविधि के मूल में श्रृंगार मयी होती है तथा श्रृंगार भाव का होना अनिवार्य है। सह्दया श्रृंगार मयी होती है तथा उसी से आंकी भी जाती है। भोज आत्मा के विशेष गुण अहंकार से रस का तादात्म्य स्थापित करते हुए इसे वृद्धि, सुख, दु;, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, आदि आत्मीय गुणों के उत्कर्ष के बीज की संज्ञा देते हैं।
                अप्रातिकूलिकतया मनसोमुदरदेअनुभवहेतुरिहाभिमानः।
                 ज्ञेयो रसः से रसनीयतयात्मशक्ते रत्यादिभूमनि पुनर्वितथा रसोक्तिः।
            संस्कृत-साहित्य-शास्त्र के इतिहास में मम्मट का आचार्यमनि पुनर्वितथा रसोक्तिः।
पूर्वोत्तरवर्ती सभी कृतियों में सर्वातिशयी होने का गौरव प्राप्त है। किसी नये सिद्धान्त के उद्भ्य न होने पर भी मम्मट का आचार्यत्व इसलिए अद्वितीय माना जाता है कि इन्होंने काव्यशास्त्रीय तत्वों और सिद्धान्तों का जो प्रमाणिक विवेचन अपने ग्रन्थ में कर दिया वह अन्यत्र दुर्लभ है। आचार्य मम्मट ने अपने ग्रन्थ के चतुर्थ उल्लास के आरम्भ में ही रसों के नाम का परिगणान करते हुए नाट्य में इनकी संख्या के आठ होने का निर्धारण भी किया है-
                     श्रृंगारहास्यकरूणा रौद्रवीरभयानकाः।
                      वीभत्साभ्दुतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः।।
            काव्य प्रकाश के टीकाकारों ने कारिका में प्रयुक्त अष्टौ’  पद की व्याख्या अनेक प्रकार से की है। यहां अष्टौ की अवधारणात्मक पद मान-कर उसका अर्थ अष्टौ एवं अर्थात् केवल आठ हीकिया है। जिससे ज्ञात होता है कि रूदट एवं भोज प्रभूति आचार्यों ने जिन प्रेयांस आदि का रस के रूप मे निरूपण किया था उनको मम्मट ने भावों में ही स्थान दिया। इस प्रकार लौल्य, भक्ति एवं कार्पण्य जिनके स्थायी भाव क्रमशः अभिलाष, श्रद्धा एवं स्पृहा है, रस कहे जाने से वच्चित हो गये। क्योंकि तीनों का अन्तर्भाव में ही स्वीकृति हो गये। यहां कारिका प्रयुक्त अष्टौऔर नाट्ये पदों को कुछ टीकाकार उपलक्षण मात्र मानते हैं। अतः स्वंय ग्रन्थकार ने शान्त को नवम रस के रूप में स्वीकार किया है। जिसका स्थायीभाव निर्वेदमाना है-
                              निर्वेदस्थायिभावोस्ति शान्तोअपि नवमो रसः।
मम्मट के उक्त विवेचन में पूर्वाचार्यों के द्वारा कृत रसों की संख्या विषयक विधान का यथोचित रूप में व्यवस्थापन ही है। अपना स्वयं का विशेष मत नहीं। क्योंकि भरत ने नाट्यशास्त्र में रसों के आठ होने का ही विधान किया था। अनन्तर भट्टोभ्दट, रूदट, आनन्दवर्धन एवं अभिनव गुप्त ने शांत के भी रस होने का विधान एवं समर्थन किया। जिनके पक्ष एवं विपक्ष में धनज्जय एवं भोज प्रभूति आचार्यों ने भी अपने मत व्यक्त किये थे। आचार्य मम्मट ने सभी पक्षों का सम्यक् रूप से अवगाहन कर अपनी स्पष्ट व्यवस्था दी कि नाट्य में तो आठ ही रस सम्भावित है पर श्रव्यकाव्य में उन आठों के अतिरिक्त नवम शान्त के भी रस के रूप में निरूपित होने की बात प्रमाण पुष्ट ही है जिसका निराकरण नहीं किया जा सकता। मम्मट के द्वारा प्रदत्त इस व्यवस्था से भरत से आ रही परम्परा का परिपालन भी हो जाती है।
मम्मट की उपर्युक्त उक्ति का साहित्यशास्त्र के क्षेत्र में स्वागत तो हुआ ही, विरोध भी हुआ। संगीत रत्नाकार शाडर््गदेव ने भी अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि नाट्य में आठ ही रसों के होने की जो व्यवस्था दी गई है वह समुचित न होने से ग्राह नही हैं। उनका अभिप्राय यह है कि नवम रस शान्तको यह कहकर नाट्य से बहिभूर्त रखा जाता है कि उसके स्थायी भाव निर्वेद तथा उसके विभावादि का अभिनय संभव नहीं। किन्तु यह उक्ति तभी सटीक होती जब अभिनेता को भी रस का आस्वाद होता। वह तो वस्तुतः उन भावों से अभिभूत हुए बिना ही उनका अभिनयात्मक प्रदर्शन करता है-
                        अष्टवेवरसा नाट्येष्विति केचिद्चुदन्।
                        तदचोद्यं यतः किच्चिन्न रसं स्वदते नटः।।
            मम्मट की उक्त व्यवस्था से भक्तिरसवादियों का क्षुब्ध होना भी अत्यन्त स्वाभाविक ही था। क्योंकि भरत की व्यवस्था के व्याज से निखिल भक्त जनों के ह्दय में निरंतर विद्यमान भगवद् विषयक रतिभाव को रस की पदवी प्रदान करने से वंचित रखना उन्हें सह् नहीं था। मम्मट की व्यवस्था के अनुसार कान्ता-विषयक-रति की तो श्रृंगार रस के रूप में परिगाति सुतरां स्वीकार्य थी। पर भगवद्-विषयक-रति को मैत्री, वात्सल्य एवं आबन्ध के समान भाव का ही स्थान दिया गया था।
            भक्ति को रस का स्थान दिलाने का आन्दोलन साहित्य-शास्त्र के क्षेत्र में बहुत पुराना नहीं है तथापि निश्चित रूप से शान्त रस की उदावना के बहुत बाद का है। श्रीमद्ागवतपुराण के प्रचार के साथ-साथ दक्षिण से भक्ति आन्दोलन का सूत्रपात हुआ। जिसका चरमोत्कर्ष बंगाल में चैतन्य महाप्रभु के भक्ति आन्दोलन ने ग्रहण किया। फलतः वेष्णाव भक्ति के प्रचार एवं प्रसार के साथ-साथ भक्ति परक विपुल साहित्य की सृष्टि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह संस्कृत में भी हुई। चैतन्य महाप्रभु के पट्ट शिष्य एवं प्रसिद्ध वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामी ने अपनी कृतियों भक्तिरसामृतसिन्धुएवं उज्जवलनीलमणिमें भक्तिरस का विस्तार-पूर्वक विवेचन प्रस्तुत किया। इनके अनुसार निखिल भक्त जनों के ह्दय में स्थायी रूप से विद्यमान भगवद् विषयक मधुर रति भाव ही विभाव, अनुभाव एवं व्यभिचारिभावों से परिपुष्ट होकर जब अनुभव का विषय होने लगता है तो उसे भक्ति रस कहते हैं। वह यद्यपि परमानन्द स्वरूप होने से स्वंय प्रकाश तथा अखण्ड होता है तथापि रति भाव के अनुसार वह मुख्य एवं गोैण दो प्रकार का हो जाता है। रूप गोस्वामी ने शान्त, प्रीति, प्रेयान्, वत्सल एवं मधुर नामक पांच मुख्य तथा हास्य, अद्भुत, वीर, करूणा, रौद्र, भयानक एवं वीभत्स नामक सात गौण मिलाकर रसों की कुल संख्या बारह हो जाती है-
                   एवं भक्तिरसों भेदाद् द्वयोद्वदिशधोच्यते
            रूपगोस्वामी ने रसों की उक्त संख्या के पीछे निहित सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि सभी प्रकार के भक्ति-रसों का आस्वाद पांच रूप में ही सम्भव होता है। ये हैं पूर्ति, विकास, विस्तार, विक्षेप तथा शोभ। शान्त में पूर्ति, प्रीति, प्रेयान्, वात्सल्य, मधुरः, हास्य में प्रीतिः, प्रेयान्, वात्सल्य, मधुरः हास्य में प्रीतिः वीर तथा अद्भुत में विस्तारः करूणा तथा रौद्र में विक्षेप एवं भयानक और वीभत्स में क्षोभ होता है। ये वस्तुतः चित्त की अवस्थाऐं है। भक्तिरसामृतसिन्धु के इस निरूपण पर दशरूपक के विवेचन का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता हैै। इन अवस्थाओं के निरूपण से वस्तुतः रसों का वर्गीकरण ही साधित होता होता है संख्या का अवधारणा नहीं। रूपगोस्वामी द्वारा निरूपित मुख्य एवं गौण उभयविध बारह रसों को यहां गौण रस कहा गया है। श्रृंगार का नामतः उल्लेख न होने पर भी उसके स्थायी भाव रति के माध्यम से परिणित होने का विधान हुआ है और इस प्रकार यहां रति के माध्यम से शान्त, प्रीति, प्रेयान् तथा वत्सल भावों का ग्रहण कर उन्हें रस की संज्ञा दे दी गई है। ग्रन्थकार की स्वंय की उक्ति है कि उक्त पांचों मुख्य रसों में एक ही रति के होने से वस्तुतः मुख्य रूप से भक्ति रस एक ही होता है-
                  पंचधापि रतेरैक्यान्मुख्यस्वेक इहोदितः।
            रसों की संख्या के विषय में रसगंगाधरकार पंडितराज जगन्नाथ ने यद्यपि कोई नई बात नहीं है तथापि उनके विवेचनों से इस सम्बन्ध में कुछ विलक्षण तथ्य प्रकाश में आते हैं। सामान्यतया उन्होंने शान्त को भी रस स्वीकार करते हुए नौ रसो के सिद्धान्त को वे केवल परम्परा का पालन मात्र मानते हेंैं-रसानां नवत्वगणना च मुनि-वचन नियन्त्रिता भज्येत इति यथाशास्त्रमेव ज्यायः।

            रसों की कुल संख्या के विषय में भरत के नाट्यशास्त्र से लेकर पंडितराज जगन्नाथ की कृति रसगंगाधर तक के लगभग दो महस्त्र वर्षों तक विकसित साहित्य-शास्त्र के इतिहास में उपलभ्यमान सामग्री का यही निर्गलित है जिसमें इदमित्थं रूप से यही कहा जा सकता है कि भरत ने इस सम्बन्ध में जिस सिद्वान्त का प्रतिपादन अपनी कृति नाट्य शास्त्र में किया था उसका आज के सन्दर्भ में भी कम महत्व नहीं है। महामहोपाध्याय पी0वी0 काणे ने प्रसिद्ध पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक मैक्डूगल के द्वारा उदावित मूलप्रवृत्तियों (इन्स्टिक्ट्स) के सिद्धान्त के अनुसार स्थायीभावों और रसों का विवेचन प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। किन्तु मैक्डूगल के मूलप्रवृत्तियों के सिद्वान्त का अन्य वैज्ञानिकों द्वारा सर्वथा निरसन कर देने से वह विवेचन भी अब प्रमाणित नहीं माना जा सकता। भरत के चार मूल रसों के सिद्धान्त के पीछे मूलतः चार प्रकार की चित्तवृतियों के होने की बात की परीक्षा आधुनिक मनोविज्ञान के सिद्धान्तों के आधार पर होनी आवश्यक है तभी भावों के स्थायी और व्यभिचारी होने का सिद्धान्त टिक सकेगा। यह कार्य एक स्वतन्त्र शोध का विषय है। यहां हमारा उद्देश्य संस्कृत की साहित्यशास्त्रीय कृतियों में उपलभ्यमान तथ्यों का अनुसंधानात्मक विवेचन उपस्थापित करना ही रहा है।

पुराणधर्मशास्त्रेषु आचारमीमांसा

       आङ्पूर्वकाच्चरधातोः घञ्प्रत्यये कृते सत्याचारशब्दस्य निष्पत्तिर्भवति। आचरतीति व्युत्पत्या आचार पदे लोके व्यावहारिक कृत्य एव गृह्îते। गीतायामप्युक्तं यत् ‘‘यद्यदाचरति  श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः। स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते’’ इत्यनेन स्पष्टो भवति यत् श्रेष्ठोजनः तमेव कथ्यते यः शास्त्रविधानेन विहितं वर्णश्रमानुकूलं कर्ममाचरति। अन्यथा आचारपदेन दुराचारोऽपि भवितुंशक्यते। शास्त्रेण प्रतिपादितो विहितो विनिर्दिष्टो वाआचार एवं सदाचार पदेनोच्यते। मानवजीवने सदाचारस्यैव महत्त्वमस्ति यः पुरुषः सदाचार विरहितोऽस्ति तं पुरुषंवेदाअपि पवित्रयितुं न शक्यते अतः एव लिखितमस्ति यत् ‘‘आचारहीनं  न पुनन्ति वेदाः’’। एतेन ज्ञायते सदाचारस्य मानवजीवने विशिष्टं महत्वपूर्णं स्थानमस्ति। 
          सदाचार परिपालनेन मानवः सुखमायुः स्वर्गं मोक्षंलभते तथा आचारादेव कुसंस्काराः समाप्यन्ते, यः पुरुषः सदाचार विरहितोवर्तते सः लोके अतिनिन्दितो दुःखभागी, सततंव्याधितोऽल्पायुरेव चोपलभ्यते। अनाचारादेव नरस्य निवासो विशिष्टतया नरके नियतं भवति। सदाचार परिपालनेन मानवः परलोकं (सुखस्वरूपं स्वर्गं)  लभते। अत्र तावद्विचार्यते यदाचारस्य स्वरूपं किम्? एतेन प्रवोधः, मूत्रपुरीषोत्सर्गः, शौचविधिः, सन्ध्यावन्दनम् सन्ध्याकालः, गायत्री जपः, देव पूजा, वैश्वदेवः, भोजनम्, भोजनोत्तरकृत्यादयः कैः कैर्विधैः करणीयमित्यादयः आचारपदेन कथ्यते। 
सुप्तोत्थानकालः- तत्र तावत्सर्वप्रथमं लौकिककार्ये संलग्नात् प्रागेवास्माकं किं कर्तव्यं भवति? इत्यस्मिन् जिज्ञासायामेव सुप्तोत्थानविषये विचारयामि यत् ‘‘ब्राह्मे मुहूत्र्ते जागरणं कर्तव्यम्, ततो धर्मार्थावनुचिन्तयेत्।। अनन्तरं कायक्लेशान्, तन्मूलान्वेदतत्वार्थमेव चिन्तयेत्। तत्र तावत् ब्राह्ममुहूर्तपदेन रात्रेरूपान्त्यो मुहूर्तं पुराणेषु प्रतिपादितं यथा-‘‘ब्रह्मोनाभस्वतश्चैवमुहूर्तः क्रमशो निशि। रात्रेस्तु पश्चिमोभागो मुहूत्र्तोब्राह्म  उच्यते।। अथ यः पुरुषो व्राह्ममुहूत्र्ते जागरणं न करोति तस्मैप्रायश्चिन्तं करणीयं भवति यतो हि-‘‘व्राह्मे  मुहूर्ते या निद्रा सापुण्यक्षय कारिणी। तां करोति द्विजो मोहात् पादकृच्छेण शुद्धîति।। 
       प्रातःस्मरणम्ः- ‘‘उत्तिष्ठत् जागत् प्राप्यवरान्निवोधत्’’ इत्युपनिषद्वाक्यानुसारेण जागरणानन्तरं वरान्प्राप्तये मातुर्पितुर्गुरोः प्रणामं कुर्यात् यतो हि-‘‘अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपसेविनः, चत्वारि तस्य वर्द्धन्ते आयुर्विद्यायशोवलम्।। अथ च प्रातः काले स्मरणीयं भवति यत् ‘‘धर्मोनित्यः सुख-दुःखे त्वनित्ये, जीवो नित्यो हेतुरस्यत्वनित्यः।। प्रातः  स्मरामि .......... धृत शङ्खचक्रः’’ इत्यादिनाहरिं स्मरेत्। प्रातः स्मरामि ............. सुतमीश्वरस्य।। इत्यादिना विघ्नविनायकंस्मरेत्।।। प्रातः स्मरामि ................. विमोचनमादिदेवम्।। इत्यादिना सूर्यं स्मरेत्। प्रातः स्मरामि ................ परस्य विष्णोः। इत्यादिना विष्णुंस्मरेत्। प्रातः स्मरामि ................ औषधमद्वितीयम्।। इत्यादिना भगवतः शङ्करस्य स्मरणं कर्तव्यम्, तदनन्तरं भू प्रार्थना करणीया यथा ‘‘समुद्रवसने देवि पर्वतस्तन मण्डिते। विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं  क्षमस्व मे’’। अत एवं पùपुराणे अपि प्रातः स्मरणम् प्रतिपादितम् यथा-‘‘शयनीयात्समुत्थाय रात्र्यंशे द्विज सत्तमः। देवांश्चैव स्मरेन्नित्यं तथा पुण्यवतो ध्रुवम्।। गोविन्दं माधवंकृष्णं हरिं दामोदर तथा। नारायणं जगन्नाथं वासुदेवमजं विभुम्।। सरस्वतीं महालक्ष्मीं सावित्रीं वेदमातरम्।। ब्रह्माणंभास्करं चन्द्रं दिक्पालांश्च ग्रहांस्तथा। शङ्करं च शिवं शम्भुमीश्वरं  महेश्वरम् च। गणेशं च तथा स्कन्दं गौरीं भागीरथीं शिवाम्।। पुण्यश्लोको नलो राजा पुण्यश्लोको जनार्दनः।। पुण्यश्लोका च वैदेही पुण्यश्लोको युधिष्ठिरः।। अत्वत्थामा वर्लिव्यासो हनूमांश्च विभीषणः। कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः। एतान्यस्तु स्मरेन्नित्यं प्रातरूथाय मानवः। ब्रह्महत्त्यादिभिर्पापैः मुच्यते नात्रशंसयः।। सकृदुच्चरिते तात सर्वयज्ञफलंलभेत्। गवांशतसहस्राणां दानस्य  फलमश्नुते।। 
मूत्रपुरीषोत्सर्गविधिः- पश्चिमे रात्रे (ब्राह्ममुहूत्र्ते) उत्थायोदकंचाचम्य तदनन्तरं तृणैर्भूमिमाविध्य (अन्तर्धाय) शिरो वाससा (वस्त्रेण) प्रावृत्यशुचै देशे समाहितो मूत्रपुरीषोत्सर्गं  कुर्यात्। तदेव पùपुराणे ‘‘ततश्चापि शुचै देशे मलमूत्रं परित्यजेत्।  दिवा, सन्ध्यासु व्रह्मसूत्रं (यज्ञोपवीतं) दक्षिणकर्णे स्थिरीकृत्योदङ्मुखो भूत्वा, रात्रौ दिवाकुर्यादुदङमुखः।।  
मूत्रपुरीषोत्सर्गे मौनमेव  समाचरेत्। मूत्रपुरीषोत्सर्गकाले करस्थोदकं मूत्रसदृशमेव भवति, अस्मात्कारणात् तज्जलं  त्याज्यमेव। यदा मलमूत्र परित्याग समये विस्मृत्य कर्णोपरि न धारितं तदा तदुत्सृज्य अन्यन्नवं  धारणीयम्।। 
शौचम्ः- शौच पदेन शरीरस्य शुद्धकरणमेव भवति। अतो मभ्दिः जलैश्च लेपनेन आलस्यं विहाय गन्धलेपक्षयकरं शौचं  कुर्यात्। शौचकर्मणि जलान्तर्गताया मृत्तिकायाः समुपयोगः कर्तव्यम्।  अथवाऽभावे यादृशी मृत्तिकां जलं प्राप्तुमर्हति तेनैव शौचं करणीयम्।।  तीर्थे शौचं न कुर्वीत्, यदा कुर्वीत् तदेव वारिणोद्धतं कुर्यात्। मूत्रशौचे चामलकमात्राद्र्रा मृत्तिकायाः प्रयोगः करणीयः। पुरीषोत्सर्गानन्तरं लिङ्गे द्वे मृतिके देये, गुदे पंचमृत्तिके देये, करे दशमृतिके गृहस्थानां शौचमेतत्पूर्वोक्तविधिना भवति। गुरुनिवासिनां छात्राणां शिष्याणांच कृतेऽपि पूर्वोक्तमैव शौचविधिः।। वनस्थानां द्विगुणं यतीनां त्रिगुणं शौचं भवति। परन्तु यावत्कालं द्विजाः नोपनीयन्ते तावत्कालपर्यन्तं ते, अंगनाश्च कवेलं गन्धलेपक्षयकरं शौचं विधीयते। स्त्रीशूद्रयोरर्द्धमानं मनीषिभिः शौचं प्रोक्तम्। दिवाशौचास्यार्द्धंरात्रौ, पथि पादो विधीयते। अतो यथा शक्तिः शौचं कार्यमिति। अत एव पùपुराणेऽपीत्थमेव प्रतिपादितम् यद्यथा ‘‘एका लिंगेगुदेस्रिस्तथा वामकरे दश। उभयोः सप्तदातव्या मृदःशुद्धिमभीप्सिता। 
दन्तधावनम्ः- ‘‘दन्तान् प्रक्षाल्यस्नायादिति’’ छान्दोग्यपरिशिष्टे तु दर्शपूर्णमासाभ्यामिस्ट्वा सोमेन यजेत्। नन्दासु नवम्यांच दन्तकाष्ठं विवर्जयेत्।  श्राद्धे, यज्ञे, नियमे, (व्रते) च दन्तधावन निषेधः।  ब्रह्मचारी-विधवाऽङ्गना, यतिः दीक्षितो नित्यममायां काष्ठदन्तधावनं विवर्जयेत्।  प्रतिपद् षष्ठीषु नवम्यां काष्ठदन्तधावनं न कर्तव्यम् ।। मध्यान्हे, श्राद्धकाले स्नानवेलायां दन्तधावनेन पितृभिः सह देवता  गच्छन्ति। रजस्वलासूतिका दन्तधावनं वर्जयेत् । हस्तौ पादौ मुखंच प्रक्षाल्य दक्षिणंवाहुं उद्धृत्य तदनन्तरं तिक्तं कषायं कटुकं काण्टकान्वितं क्षीरिणः दन्तधावनं भक्षयेत् (कुर्यादित्यभिप्रायः) । द्वादशाङ्गुललसमस्थूलंत्वचा (छाल) सहितं काष्ठेन दन्तस्याग्रभावो धावनीयम्।  मनीषिभिस्तु विप्राय द्वादशांगुलिकस्य दन्तधावनस्यावश्यकता प्रतिपादिताः। शूद्रविट्क्षत्रजातीनां नवषट्चतुरंगुलं दन्तधावनस्य विधानमस्ति।  नारीणां कृतेऽपि चतुरंगुलमेक दन्तधावनस्य विधानम्।  आम्रस्य, निम्बस्य, वेणोः, तितिण्डेः, अपामार्गस्य विल्वस्य, अर्कस्य, औदुम्बरस्य, दन्तधावनस्यैव प्राशस्त्यम्। सर्जेधैर्यंवटे दीप्तिः, करंजे विजयो रणे।  प्लक्षजे चार्थसम्पत्तिर्वदर्यां मधुरस्वरः।। खादिरे च सौभाग्यं विल्वेविपुलंधनम्। औदुम्बरे वाक्सिद्धि वन्धूके दृढामतिः। सैन्ध्रे कीर्तिः सौभाग्यं पलाशे चोत्तमासिद्धिः।। कदम्बे सकलालक्ष्मी आम्रेआरोग्यमेव च।। अपामार्गे श्रुतिर्मेधा प्रज्ञावाप्तिः वर्षुश्रुतिः। आयुर्शीलं यशोलक्ष्मीः सौभाग्यं चोपजायते। अर्केण रोगान् हन्ति, बीजपूरेण व्यथां हन्ति।  प्रतीची दक्षिणाशां दन्तधावनं वर्जयेत्। शिरसि तैलस्थिते सति काष्ठदन्तधावनं न कुर्यात्।  हर्षिंतदिने (एकादश्यां) श्रीकामी पुरुषः काष्ठदन्तधावनं न कुर्यात् दन्तधावनं तु केवलं प्रांगमुखो विधाय करणीयमिति। यतो हि दक्षिणेनकष्टं पश्चिमे पराजयः, उत्तरेण गवां स्त्रीणां सेवकानां नाशो भवति।  
मन्त्रः आयुर्वलं यशोक्र्चः प्रजाः पशुवशूनिच। व्रह्मप्रज्ञांच मेधांच  त्वंनोदेहिवनस्पते पùपुराणेऽपि यथा-‘‘परतोदन्तकाष्ठंच तृणैरुदुम्बरादिभिः’’  इति। 
स्नानम्ः- स्नानेन विना जपहोमादिकं किमपि कार्यं नाचरेत्। यतो हि यदापुमान् शयनादुत्थितो भवति तदा लालास्वेदसमाकीर्णो भवित। सुषुप्तस्य इन्द्रियाणि स्रवन्ति स्विद्यन्ति च। कायो हि अत्यन्त मलिनो यतो हिनवच्छिद्रः समायुक्तो नरः प्रातः कालस्नानेनैव शरीरस्य विशोधनं भवति।  प्रातः स्नायी नरः जपादिकं शुद्धात्मा सर्वमर्हति। प्रातः स्नानेन मानवेषु दशगुणाः संजायन्ते। यथा-रूपं तेजो बलं शौचमायुष्यंमारोग्यमलोलुप्त्वं दुखप्रणाशो यशश्च मेधादयः।  गांगं पयः पुनात्याशु पापमामरणन्तिकम् । नन्दिनी नलिनी सीता मालती च महापगा। विष्णु पादाग्रसम्भूता गंगा त्रिपथगामिनी।ं भागीरथी भोगवती जान्हवी चित्रजटेश्वरी। द्वादशैतानि नामानि यत्र यत्र जलाशये।। स्नानोद्यतः सदा कुर्यात् तत्र तत्र वसाम्प्यहम्  ‘‘ऊँ आपो अस्मानिति स्मरणं विधाय सूर्याभिमुखः स्थितः ‘‘इदं विष्णुः’’ इति जपित्वा प्रतिस्रोतो निमज्जनं कार्यम्। स्नानादनन्तरं पितृ देवताः तर्पयेत्। स्नाविषये पùपुराणेऽपि वर्णितं तद्यथा-‘‘ततः समाचरेत् स्नानं यथाज्ञानेन यत्नतः। अंग प्रक्षालयित्वातु मृद्भिःसंलेपयेत्ततः।। शिरोदेशेललाटेच नासिकायां हृदिभु्रवो। वाह्वोः पाश्र्वे तथा नाभौ जान्वोरङिघ्रद्वये तथा। अश्वक्रान्ते रथक्रान्ते विष्णुक्रान्ते वसुन्धरे।। मृत्तिके हर में पापं यन्मया दुष्कृतंकृतम्।। अनेनैव तु मन्त्रेण मृत्तिकां यस्तनौ क्षिपेत सर्वपापक्षयस्तस्य शुचिर्भवति मानवः। ततो मत्र्यः सर्वपापक्षयाय विधिवत् नद्यां नदे तथाकूपे पुष्करिण्यां तटाकके जलराशौ स्नानं कुर्यात्।। प्रातः स्नानं महापुण्यं सर्वपापप्रणासनम्।। यः कुर्यात सततं विप्रो विष्णुलोके महीयते। प्रातः सन्ध्या समीपेच यादवद्दण्डचतुष्टयम्। तावत्पानीयममृतं भवति पितृणामुपतिष्ठते। परतो घटिकायुग्मं यावद्यामैकमान्हिकम्। मधुतुल्यं जलं तस्मिन् पितृणां प्रीतिवर्द्धनम्।। ततस्तु साध्र्यामैक जलं क्षीरमयं स्मृतम्। क्षीरमिश्रं जलं तावद्यावद्दण्डचतुष्टयम्। अतः परंचपानीयं यावद्धि  प्रहरत्रयम्। 
तर्पणम्ः- स्नानादनन्तरं पितृर्षिदेवतान् तर्पयेत्। देवनामृषीणां जलेऽ´्जलीन् दद्यात्। असंस्कृतप्रमीताना स्थले जलं दद्यात्। 
जलदान मन्त्रः- अग्निदग्धाश्च ये जीवा येऽप्यदग्धाः कुले मम। भूमौ दन्तेन तोयेन तृप्ता यान्ति परांगतिम्।। ये पितरः लोकान्तरं गताः ते यदि सलिलं न प्राप्नुवन्ति तदा तेषां विना मत्र्यवासिनोजना अपि सलिल दुष्प्राप्यं भवति। तस्मात् पुत्र पौत्र शिष्य दौहित्रिकादिभिः तथान्यैः वन्धुवर्गैः पितृव्रतैः तर्पणीयम्। जलस्य देवता विष्णुः सर्वलोकेषु गीयते। जलपूतो भवेद्यस्तु विष्णुस्तच्छङ्करो भवेत्। जलं गण्डूषमात्रंतु पीत्वापूतो भवेन्नरः। विशेषात्कुशसंसर्गात्पीयूषादधिकं जलम्। सर्वदेवालयोदर्भोमयोऽयं निर्मितः पुरा।। कुशमूल भवेद्ब्रह्मा कुशमध्ये तु केशवः।। कुशाग्रे शकरं विद्धि कुश एते प्रतिष्ठिताः। कुशाहस्तः सदामेध्यः स्तोत्रं मन्त्रं पठेद्यदिं। सर्वं शतगुणं प्रोक्तं तीर्थे साहस्रमुच्यते। कुशाः काशा स्तथा दूर्वा यव पात्राणि व्रीहयः। यत्स्नानं मन्त्रेण विना सर्वतन्निष्फलं भवेत्। अमृतात्स्वादुतामेति संस्पर्शाच्च तिलस्य च। तस्माद्वुधः तिलजलैर्नित्यं यः स्नात्वा तिलमिश्रोदकैः नित्यं पित्न् तर्पयेत् सः भयङ्कुलं समुद्धृत्य ब्रह्मणः स्थानं याति। तिलैः पितृन् तर्पयित्वाऽक्षयं स्वर्गमाप्नोति। वर्षासु पितृणां दीपदानेनानृणो भवेत्। यः जले आर्द्रवासा जलतर्पणं कुर्यात्  तस्य पितरः देवैः सहतृप्यति ।
वस्त्रधारणम्ः- वस्त्र धौत क्रिया स्वयमेव करणीयम्। एकवस्त्रं परिधाय भोजनं न करणीयं, देवार्चनमपि वस्त्रैणेकेने न करणीयम्। रजकैः क्षालितं वस्त्रं अशुद्धं कवयो विदुः। हस्तप्रक्षालने चैव पुनर्वस्त्रं तु शुद्धयति।  शुचै देशे शुक्लवासाः पितृन् तर्पयेत्। ततो दशगुणेनैव तुष्यन्ति पितरो ध्रुवम्।। पूर्वोक्त विवेचनेन ज्ञायते यत् वस्त्रं स्वयं प्रक्षालनं कर्तव्यम्।। 
यज्ञोपवीतधारणम- यज्ञोपवीते द्वे धार्ये श्रौत्रे स्मार्ते च कर्मणि। तृतीयमुत्तरीयार्थे वस्त्राभावे तदिष्यते ।। 
तिलकम्ः- पर्वताग्र-नदीतीर-रामक्षेत्र-सिन्धुतीर-वाल्मीकि-तुलसीमूलमाश्रिताया मृत्तिका तिलक योग्या  भवति। यः पुरुष गोपीचन्दनादूध्र्वपुण्डंकं तिलकं करोति तस्य सर्वाणि पापनि नश्यन्ति। अंगुष्ठेन तिलकधारणेन पुष्टिर्भवति, मध्यमेनायुर्करी, अनामिकयाऽन्नप्राप्तिः, प्रदेशिन्या तिलकं नित्यं मुक्तिर्भवति। तिलकधारणमन्त्राः- ललाटे केशवं विद्यान्नारायणमथोदरे। माधवहृदि विन्यस्य गोविन्दं कण्ठकूपके।। उदरे दक्षिणपाश्र्वे विष्णुरित्यभिधीयते। तत्पाश्र्वे वाहुमध्ये तु विन्यसेन् मधुसूदनम्।। त्रिविक्रमं कर्ण देशे वामकुक्षौ तु वामनम्। श्रीधरं वाहुके वामे हृषीकेशं तु दक्षिणे।। पृष्ठदेशे पùनाभंककुद्दामोदरं स्मरेत्।। द्वादशैतानि नामानि वासुदेवेति मूर्द्धनि।। संकर्षणादिभिः कृष्णे शुक्ले चेत्केशवादिभिः।।  ऊध्र्वपुण्डंª विना सर्वं कार्यनिष्फलं भवति। ऊध्र्वपुण्ड्रमध्ये त्रिपुण्ड्रमध्ये शून्यं धारयेत्। यतो हि तन्मध्ये पार्वतीश्रिया सहितो हरिशंकरश्च वासं कुर्वन्ति। यो भक्त्यानियतं शंखचक्राद्यंकन तुलसीभक्षणंच करोति सः परमांगतिं प्राप्नोति स्नात्वा मृत्तिकया, चन्दनेन, भस्मना, जलेन, वा तिलकं प्रकर्तव्यम्। श्राद्धे यज्ञे जपे होमे वैश्वदेव सुरार्चने। मानवः धृत त्रिपुण्ड्रः पूतात्मा मृत्युंजयति। यो हि त्रिपुण्डं न धारयोत् तस्य सत्यं शौचं जपो होमः तीर्थं देवादिपूजनं सर्वं व्यर्थ भवति।  ललाटे हृदये नाभौ गलंेऽशे बाहुसन्धिषु। पृष्ठदेशे शिरसि तिलकं धारयेत्। गृहिणाः तु जल संयुक्तं त्रिपुण्डं भस्मं धार्यम्। यतीनां स्त्रीणां जलवर्जितं भस्मत्रिपुण्डं धार्यम्। वानप्रस्थानां कन्यानां दीक्षाहीननृणां मध्यान्हप्राग्जलैर्युक्तं त्रिपुण्डं स्वदक्षिणकस्य मध्याङ्गुलित्रयेणैव विद्वान्तिलकं धारयेत्। मध्यमानामिकाङ्गुष्ठै- रनुलोमविलोमतः अतिस्वल्पमनायुष्यमतिदीर्घं तपक्षयः नेत्रयुग्म प्रमाणेन त्रित्पुण्डं धारयेत्। ‘‘षडङ्गुलप्रमाणेन ब्राह्मणानां त्रिपुण्ड्रकं, नृपाणां चतुरङ्गुल्यं तु वैश्यानां द्वयङ्गुलं तथा। शूद्राणां सर्वेषामन्येषामेकाङ्गुलं चिपुण्ड्रकम् विद्वान ब्राह्मणः त्रिपुण्डं, ऊध्र्वपुण्ड्रं वा मनसापि न लङ्घयेत् । यतो हि त्रिपुण्ड्र, ऊध्र्वपुण्ड्रवात्यागी पतितो भवति। 
आचमनम्:- मूत्रं पुरीषं वा कृत्वाऽऽचमनं कुर्यात्। वेदमध्येष्यमाणायां तथा अन्नमश्नंच सर्वदाऽऽचमनं कुर्यात्।  भोजने परिश्रमे, उच्छिष्टं मानवं स्पृष्टवाऽऽचमनं कुर्यात् । मार्जारम्, रजकम्, वेणम्, धीवरम्, नटम्, दष्ट्वापि आचमेत्।  चाण्डालम्लेच्छ सम्भाषे, स्त्रीशूद्रोच्छिष्ट भोजने तथाविधमाचरेत् अश्रुपातेआचमनं कुर्यात्। स्त्रीणां नीवीं स्पर्शें जाते सत्यप्याचमनं  कुर्यात् उत्तीर्यावतीर्य चाऽऽचमनं कुर्यात्।।  देवार्चनादिकार्याणि, गुर्वभिवादनम्, भुजिक्रियाम्, तद्वदेव सम्यगाचमनं कुर्यात्।  ‘‘परिवेषणं कुर्वन्नुच्छिष्टस्पृष्ट तदन्नपानादिकं भूमौ निधायाचम्य तदभ्युक्ष्य पुनस्तदादाय प्रचरेत’’  इति तु नोचितम्। यतो हि भूमौ निधानमात्रस्योक्तेः पुनरादाने मानभावात्। रात्रावरण्ये, पथि, चोरव्याघ्राकुलेऽनुदके मूत्रं पुरीषं कृत्वाद्रव्यहस्तो न दुष्यति।  सुप्ते, भुक्ते, रथ्योपसर्पणे, श्रुतेः स्नात्वा पीत्वा च पुनः सम्यगाचमनं कुर्यात्।।  जपे, होमार्चने, दाने, भोजनकाले, उभयोर्सन्ध्ययोः पुनराचमनं कुर्यात्।  चत्वरं श्मशानं वा समागम्य द्विजोत्तमः पुनराचमेत्। भोजने हवने दाने उपहारे प्रतिग्रहे हविभक्षणकाले द्विराचमनं करणीयम्।  
सन्ध्यावन्दनम्ः सन्ध्यावन्दनं नित्यं करणीयं यतो हि यः सन्ध्यां न जानाति सन्ध्योपासनं न करोति स जीविते सत्यपि शूद्रो जायते। पंचत्वप्राप्त्यनन्तरं श्वयोनौ जायते।  यः सन्ध्या हीनः सोऽपवित्रो भवति। सर्वकर्मसु योग्यतां न प्राप्नोति। सो हि यद्यत् कर्म करोति तस्य फलं तस्मै न मिलति।  आत्मविदेन द्विजेन सर्वदा सन्ध्यात्रयं प्रकत्र्तव्यम्।  ये जनाः शंसितव्रताः सततं सन्ध्योपासनं कुर्वन्ति। ते पापरहितो भूत्वा सनातनं व्रह्मलोकं प्रयान्ति उद्यन्तमस्तं  यन्तमादित्यमभिध्यायन् कुर्वन् व्राह्मणो विद्वान, सकलं भद्रं अश्नुतेऽसावादित्यो व्रह्मति ब्रह्मैव सन् ब्रह्माप्येति स एवं वेद इति 
          गायत्री जपं कुर्वन् समीप्सितं फलमथवा व्रह्मः प्राप्तो भवति। भगवतः सूर्यस्यैव कालभेदेन बहूनि नामानि सन्ति यथा-‘‘पूर्वाह्णे तु गायत्री नाम, मध्यमे दिने सावित्री, सायान्हे सरस्वती, सैव त्रिषु सन्ध्यासु स्मरणीयः।।  केचिन्मतं यत् ‘‘सन्धि काले समुपास्यात्वात् सन्ध्यानाम। पूर्वो हि पूर्वाह्णे रक्तवर्णां तु मध्यान्हे शुक्ल वर्णिकाम् सायं सरस्वतीं कृष्णां द्विजो ध्यायेद्यथाविधि7 ।।  केचित्कथयन्ति यत सम्यग्ध्येयत्वात्सन्ध्या। उभयथा सूर्य एवं ध्येयः। गायत्री रक्तवर्णाः भवेत्, सावित्री शुक्लवर्णिका, सरस्वती कृष्णवर्णा भवेदिति वर्णभेदतः उपासना योग्याः। गायत्री व्रह्मरूपा, सावित्री, रूद्रस्वरूपिणी। सरस्वती विष्णुरूपेति रूपभेदत उपासनायोग्याः। गायत्री प्रोच्यते पातकात् उपपातकात् प्रतिग्रहदोषो तु न भवेदिति। सवितृद्योतनात् सावित्री जगतः प्रसवित्रीत्वात् सरस्वती। यः मनवत्कमलासने समुपस्थितां गायत्री चिन्तयेत् स धर्माधर्म विनिर्मुक्तः परमां गतिं याति। 
कालः प्रातः काले (ब्राह्ममुहूत्र्ते) यदाऽऽकाशे तारा भवन्ति तस्मिन् समये या सन्ध्या सा सन्ध्यासु सोत्तमा कथ्यते। यदाऽऽकाशे तारा लुप्ता भवन्ति तदा या सन्ध्या सा मध्यमेति कथ्यते। सूर्योदये जाते सति या सन्ध्या साऽधमेति निगद्यते। सायं काले सूर्यास्त प्रागेव या सन्ध्या साऽधमेति निगद्यते। सायंकाले सूर्यास्त प्रागेव या सन्ध्या सोत्तमा, यदालुप्ततारका (सूर्यास्तानन्तरं तारा उदयात्पूर्वं) या सन्ध्या सा मध्यमेति। यदा सायंकालेऽऽकाशे ताराः संजायन्ते, तदा या सन्ध्या सा कनिष्ठेति निगद्यते। विप्रस्य सन्ध्याकालः उदयात् प्रागेव (सूर्योदयात्) द्विमुहूत्र्तकं यावत्। क्षत्रियेकं, वैश्यस्यार्द्धमुहूर्तकं संध्याकाल। 
आसनम्ः- कौशेयस्य, कम्बलस्य, मृगचर्मस्य, वस्त्रस्य, दारूजस्य, तालपात्रस्यासनं कल्पनीयम्। कृष्णमृगचर्मस्यासने ज्ञानसिद्धिर्भवति। व्याघ्रचर्मासने तु मोक्ष श्रीः प्राप्तो भवति। सूतके मृतके वाऽऽपिप्राणायाममन्त्रकं करणीयम्।  
हवनविधिः सन्ध्या कर्म समाप्ते सति स्वयं हवनं करणीयम्। असमर्थे तु ऋत्विजेन, ऋत्विजपुत्रेण, गुरुभ्रात्रा, भागिनेयेन, जामात्रावा हवनं कारयेत यावत्सर्वतः सम्यगाकाशे तारादयः न भाव्यन्ते तावत्हवनं  करणीयमिति। 
नित्यदानम्ः- एकस्मिन्नपि दानविवर्जिते दिने व्यतीते सत्यपि दस्युभि धनं मुषित्वा धनं हरिष्यन्ति, अतः प्रतिदिनं दानमवश्यं करणीयम्। विभवानुसारेण प्रतिदिनमपि दानं करणीयमिति।  
मंगलदर्शनम्ः- लोकेऽस्मिन् ब्राह्मणो, गौः वन्हिः, हिरण्यं, सर्पिः आदित्यं, आपः नृपः, अष्टसंख्याकानां दर्शनेन मंगलं  भवति। 
द्वितीयभागकृत्यम्ः- द्वितीयभागे वेदानां स्वाध्यायं विधीयते। वेद-अध्ययनेन वेदाभ्यासो लक्ष्यते यतो हि पूर्वं वेदं स्वीकरणं भवति तदनन्तरं विचारो भवति, तदनन्तरमभ्यासो भवति। तदनन्तरं जपंजपान्ते शिष्येभ्यो विद्यादानमिति वेदाभ्यासपदेन  गृह्यन्ते।। 
तृतीयभागकृत्यम्ः- तृतीये भागे धनमिच्छेत् यतो हि पोष्यवर्गार्थसाधनमेव धनमिति। अतो मात्रे पित्रे गुरवे, भार्यायै, अभ्यागताय, अतिथये अर्थ सिद्धयर्थं धन प्राप्तये कार्यं करणीयम्।।  
चतुर्थभागकृत्यम्ः- मध्यान्हे स्नानं विधाय मध्यान्हिकं संध्या करणीया। 
पंचमहायज्ञाः अत्र विचारयामि यत् पंचमहायज्ञाः के? तदासमायाति यत् ‘‘देवयज्ञो, व्रह्मयज्ञो, भूतयज्ञो, पितृयज्ञो, मनुष्ययज्ञेति। तदग्नौ जुहोति यत् तद् देवयज्ञः, यत्स्वाध्यायमधीयते स ब्रह्मयज्ञः, यद्वलिं करोति स भूतयज्ञः, यतृ पितृभ्यो ददाति सः पितृयज्ञः, यन्मनुष्येभ्यः स मनुष्ययज्ञः। तान्-यज्ञान् अहरहः कुर्वीदिति। अस्मिनग्नौ पचदेन्नं तस्मिन् होमो विधीयते इति देव यज्ञः।।  
देवपूजाः व्रह्माणं शंकर सूर्यं मधुसूदनं तथा अन्यानभिमतान् देवान् नरो भक्त्या पुष्पैर्पत्रैश्च तथाम्वुभिः नित्यमर्चयेत्।  बुधः जलदेवं (सूर्यं) नमस्कृत्य पौरुषेण सूक्तेन विष्णु समर्चयेत्।  व्रह्माकृतयुगे देवाः त्रेतायां भगवान् रविः द्वापरे भगवान्विष्णुः कलौ देवो महेश्वरः  ये नराः कलौ सर्वपापहरं कलिमलध्वंसकं हरिमर्चयन्ति तेऽपि तथैव वन्दनीया यथा हरिः ।। 
पुष्पाणिः गिरिसम्भवैः, अरण्यसम्भूतैः, अपर्युषितैः, छिद्ररहितैः प्रोच्छितैः जन्तुरहितैः, आत्मारामोö, पत्रैः पुष्पैर्वा भक्त्या देवान् सम्पूजयेत्।। सुपुष्पाणामलाभै पत्रैरेव पूजनं कुर्यात्।  पत्राणामलाभेऽपि फलैरेवपूजनं कुर्यादिति। फलानामप्यभावेऽलाभे तृणैरेव पूजनं कुर्यात्। सर्वाभावे तु भक्त्या एवं पूजनं कुर्यात्। धर्मार्जनक्रीतैरेव पुष्पैः पूजनं करणीयमिति।  देवोपरिधृतं, वामहस्तधृतं, जलेऽन्तःक्षालितं पुष्पं देवता न गृहणन्ति, अतः तेन पूजनं न करणीयमिति।  जातीपुष्पं तु केवलं प्रहरमेव शुद्धःतदनन्तरपूजनकर्मणि वहिष्कृतः। करवीर त्वहर्निशं पूजनयोग्यः तुलस्यां, विल्वपत्रेषु, जलेषुमालाकारगृहेषु स्थितं पुष्पं पर्युषितो न भवति।  शिवाय केतकी शिरीष वन्धूककुसुमानि विवर्जयेत्।। 
शालग्रामशिलार्चने स्त्रीणां निषेधः शालिग्रामशिलार्चने स्त्रीणां शूद्रपतितादीनां विधवानां विकर्मणां नैवाधिकारो वर्तते।। शूद्रैः मद्यपान विवर्जितैः दीक्षायुक्तैः ब्राह्मण द्वारा शालग्रामशिलार्चनम् विधातुं शक्यन्ते।  
शालग्रामशिलविसर्जनावाहनस्य निषेधः शालग्रामस्यार्चनेआवाहनस्य, विसर्जनस्य चाऽवश्यकता न भवति यतो हिशालग्रामे भगवान् हरिः सदा समुद्भूताः’’  इति।। 
भोजनम्ः हस्तौ पादौ तथाऽऽस्यं (मुखं) प्रक्षाल्य एवं भोजनं कुर्यात अत एवं पùपुराणेऽषि प्रतिपादितं यथा-‘‘हस्तपादे मुखे चैव पंच आद्र्रो भोजनं चरेत्। पंचार्द्रकस्तु भुंजानः शतं वर्षाणि  जीवति सुवर्ण-रजत-ताम्र-पंकज-पलाशपात्रे भोजनेन त्रिरात्रिफलं भवन्ति, विमले कांस्य भाजनेऽपि भोजनेनायुः प्रज्ञा यशोबलंच  वर्द्धन्ते। तन्मनाभूत्वाऽऽश्नीयादिति मधुरं रसं भुंजीदिति। मध्ये लवण समन्वितौ कटुतिक्त भुंजीत। पूर्वं द्रवमश्नीयात् मध्येकठिनाश अन्ते पुनः द्रवाशी वलारोग्यैर्न मुंचति । भुंजानः कदाचन वामहस्तेनान्नं न स्पृशेत् ।। अति वुभुक्षितोऽपि भोजनं न कुर्यात्, आर्दवस्त्रेणार्दशिरसाऽथवा देवालयगतेन भोजनं कुर्यात्। प्रसारितपादस्तु न भुंजीत्।। पादारोपितापाणिना भोजनं न कुर्यात्। वेष्टिशिरश्चापि भोजने न कुर्यात्। वृथाऽन्नं न विकिरेत । अर्द्धरात्रे मध्यान्हे च भोजनं न कुर्यात्।।  यो हि दक्षिणाभिमुखो वेष्टितशिरो वामपाद करः स्थित्वा भोजनं करोति तन्निश्चयेन राक्षसभोजनमिति ।। 
सायंकाले दीपदानम्ः सूर्यास्तानन्तरं दीपं प्रज्वाल्य प्राङमुखे स्थापयेत् यतो हि प्राङ्मुखो दीपोऽऽयुप्र्रदानं करोति। उदड.मुखो धनदश्चेति। प्रत्यङमुखो दुखदः दक्षिणमुखो  हानिदः।। 
शयनम्ः शयनसमये शिरः स्थाने माङ्गल्यं पूर्णकुम्भं स्थापयेत् तदनन्तरं पादौ प्रक्षाल्य शुष्कं विधाय च शुचै शय्यायां शयनं करणीयम्। शयनात्पूर्वमभीष्ट देवतां स्मृत्वा शयितव्यमिति । 
स्त्रीकृत्यम्ः भर्तुः पादौ नमस्कृत्य पश्चाच्छय्यां समाविशेत्।। 
          पुत्रस्य भ्रातुर्वधूं स्वपुत्रीं गुरुपत्नी नेक्षेत् स्पर्शंच न कारयेत्। कुकर्मकारिणीं कलहप्रियां स्त्रियं दूरादेव  परिवर्जयेत्।। 

रीति सम्प्रदाय

          संस्कृत अलंकार शास्त्र में रीति सम्प्रदाय का अपना विशेष महत्व रहा है। इन रीतियों का उद्भव देश विशेष से जुड़ा हुआ है। ये शनैः शनैः प्रदेशगत शैलियों के विशिष्ट प्रकार से सार्वभौमिक लेखन प्रकारों के रूप में प्रचलित हुई। रीति सम्प्रदाय के प्रधान प्रवर्तक आचार्य वामन माने जाते है। वामन के पूर्ववर्ती आचार्य दण्डी ने रीतियों के वर्णन को अपने ग्रन्थ में पर्याप्त स्थान एवं महत्व दिया है। इन्होंने अपने काव्यादर्श में  वैदर्भी तथा गौडी इन दो रीतियों का वर्णन किया है।  कुछ और उत्तरवर्ती लेखकों ने भी इस दिशा में महनीय प्रयास किए है, परन्तु वामन के ग्रन्थ में रीति का जो महत्व उपलब्ध है, वह इस विषय के किसी ग्रन्थ में नहीं हैं। इन्होंने दण्डी से आगे बढ़कर पाञ्चाली रीति का निर्देश कर अपनी मौलिकता स्थापित की। वामन रीति को शैली ही नहीं मानते थे अपितु काव्य का सारभूत तत्व (आत्मा) भी इसे ही स्वीकार करते हैं। उन्होंने अपने तीन सूत्रों में स्पष्ट कहा है, रीतिरात्मा काव्यस्य।  इस रीति को भी उन्होंने स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया है ‘‘विशिष्टपदरचना रीतिः ‘‘। पदों की यह विशिष्टता ही वास्तव में काव्य में महत्वशाली तत्व है। यह वैशिष्ट्य पदों में काव्य गुणों के कारण ही आता है, अन्यथा पद सामान्य ही रहते है। अतः रीति गुणों पर आधारित काव्य तत्व है-विशेषो गुणात्मा। इसलिए विद्वानों की एक परम्परा रीति सम्प्रदाय को ही गुण सम्प्रदाय कहने के पक्ष में है।
      काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में सर्वप्रथम गुणों का वर्णन भरत के नाट्यशास्त्र में उपलब्ध है। नाट्यशास्त्र के 16 वें अध्याय में उन्होंने श्लेष, प्रसाद, समता, समाधि, माधुर्य, ओज, सुकुमारता, अर्थव्यक्ति, उदारता तथा कान्ति इन दश गुणों को स्वीकार किया है। रूद्रदामन् के गिरनार शिलालेख (1500) में माधुर्य, औदार्य, स्पष्टता। दण्डी भी इन 10 गुणों को मानते हैं किन्तु दोंनों के क्रम में कुछ भेद देखे जाते हैं। भरत से उनकी व्याख्या अनेक प्रकार विकसित होते हुए दिखाई देते हैं।  बाण जो कि प्रायः सभी ज्ञात अलंकारशास्त्रियों से पूर्ववर्ती माने जाते है, प्रदेशगत विशेष रचना शैलियों का उल्लेख अपने हर्षचरित के प्रथम उच्छास में करते हैं श्लेषप्रायमुदीच्येषु प्रतीच्येष्वर्थमात्रकम् । उत्प्रेक्षा दाक्षिणात्येषु गौडेष्वक्षरडेम्बरः ।। 1.7 परन्तु गुणों की विशिष्ट सत्ता सर्वप्रथम भरत ही स्वीकार करते है। गुणों में शब्दगत एवं अर्थगत दोनों प्रकार का वैशिष्ट्य स्वीकार करना दण्डी को अभीष्ट था। वे इन गुणों को केवल वैदर्भ मार्ग या वैदर्भी मार्ग या वैदर्भी रीति का प्राण मानते हैं तथा इनकी विपर्यय को गोडीय मार्ग का प्रतिपादक स्वीकार करते है। गौड मार्ग में वे अर्थव्यक्ति, उदारता और समाधि को ही मानते हैं।
‘‘इति वैदर्भमार्गस्य प्राणाः दशगुणाः स्मृता।
एषां विपर्ययः प्रायो दृश्यते काव्यवर्त्मनि ।।
भामह रीतियों की भिन्नता को स्वीकार नहीं करते।  एषां विपर्ययः प्रायो दृश्यते काव्यवर्त्मनि॥
वामन ने गुणों की कल्पना, इनके बोध, महत्व तथा व्याख्या को सर्वथा मौलिक एवं नूतन रूप दिया है। इन्होंने गुण तथा अलंकार में भेद प्रदर्शित करने तथा अलंकारों की अपेक्षा गुणों को विशेष महत्व देने के लिए काव्यशोभायाः कर्तारो धर्माः गुणाः (का. सू. 3/3/1) तथा तदतिशयहेतवस्त्वलङ्काराः (का. सू. 3/3/2)  इन दो सूत्रों को लिखा। गुण काव्यशोभा के उत्पादक होते हैं,जबकि अलंकार उसकी शोभा को बढ़ाने वाले होते हैं।  वामन ने गुणों को दो प्रकार का माना है- शब्द गुण तथा अर्थ गुण। इन दोनों प्रकार के गुणों में नाम साम्य अवश्य है, किन्तु स्वरूप भेद पर्याप्त हैं।  भामह ने गुणों की संख्या तीन स्वीकार की थी-आनन्दवर्धन, मम्मट, हेमचन्द्र और विश्वनाथ सभी मत का अनुसरण करते हैं। प्रायः ये सभी अलंकारिक वामन के गुणों को माधुर्य, ओज, प्रसाद में ही अन्तर्भूत कर देते हैं। कुछ गुणों को वे केवल दोषाभाव मात्र मानते हैं। उनकी सकारात्मक सत्ता का अभाव हैं। और वामन के कुछ गुण तो वास्तव में गुण न होकर दोष हैं और कुछ कोरी कल्पना मात्र। वामनोत्तर अलंकारिक रीतियों की सत्ता तथा काव्य शोभा इन्हीं तीन गुणों पर आधारित मानते हैं। मम्मट तो गुणों को रस के अनिवार्य धर्म मानने के पक्ष में है। काव्य शोभा का उद्भावक के रूप में नहीं। उनका कथन हैः
                       ये रसस्याङ्गिनो धर्माः शौर्यादय इवात्मनः।
                       उत्कर्ष हेतवस्ते स्युरचलस्थितयो गुणाः। का. प्र. 8/66
      वे इन्हीं पर विभिन्न रीतियों को आधृत मानते हैं। वामन के मार्ग का थोड़ा सा अनुसरण भोजराज अवश्य करते हैं। परन्तु उन्होंने भी गुणों के विभाजन तथा स्वरूप दोनों में विशेष अन्तर कर दिया है। भोजराज गुणों के तीन भेद मानते हैं 1.बाह्य गुण 2. अन्तर गुण 3. वैशेषिक गुण। गुणों की संख्या भी उनके मत में 24 हैं।
      रीति का विकास- रीति साहित्य शास्त्र में अनेकों नाम से जानी जाती है। इसका प्राचीन नाम मार्ग या पन्था हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखन शैली के उद्भव के साथ ही इसकी भी कल्पना की गई होगी। धीरे-धीरे इसका स्वरूप प्रदेशगत हो गया होगा। प्रायः एक ही प्रदेश के रचनाधर्मी जब एक सी ही पद रचना में नैपुण्य दिखाने लगे तो उन्हीं प्रदेशों के आधार पर इन रीतियों का भी नामकरण हो गया होगा। आरम्भ में वैदर्भ और गौड़ ये दो मार्ग ही प्रसिद्ध थे। इनमें से वैदर्भ को काव्य का श्रेष्ठ एवं रमणीय मार्ग माना जाता था तथा गौड़ मार्ग को दुरूहता, शब्दकाठिन्य, तथा श्रवण कटुता के कारण निन्दनीय माना जाता था। आरम्भिक आचार्य भामह इस पद्धति का अनुसरण नहीं करते थे। उनके मत में तो वैदर्भ मार्ग की प्रशंसा करनी चाहिए और न गौड़ मार्ग की निन्दा, अपितु काव्य के शोभन गुणों की और गौड़ीया मार्ग में केवल कुछ गुणों की सत्ता स्वीकार करते है। दण्डी की दृष्टि में वैदर्भ मार्ग कवियों के लिए आदर्श तथा अनुकरणीय है। गौड़ो में अक्षराडम्बर और वैदर्भ मार्ग की सरलता के सूक्ष्म अनन्तर के कारण ही इन दोनों की लोकप्रियता में मूल अनन्तर दिखाई है।
दण्डी के अनन्तर रीति को सुदढ़ आधार तथा महत्वपूर्ण स्थान दिलाने का श्रेय वामन को है। उन्होंने रीतियों को संख्या में भी पूर्ववर्ती आलंकारिकों की अपेक्षा वृद्धि की है। यह वृद्धि वास्तविक तथा तथ्यों के अधिक अनुकूल है। अब तक की दो रीतियों गौडी और वैदर्भी में वे पाञ्चाली को और जोड़ देते हैं जो सम्भवतः पाञ्चाल क्षेत्र में विशेष लोकप्रिय थी।
रीति सम्प्रदाय का महत्वः- रीति सम्प्रदाय में अलंकार सम्प्रदाय के प्रारम्भिक विकास की तुलना में काव्यसिद्धान्तों के विकास का स्तर प्रायः उन्नत दिखाई देता है। जहां अलंकार सम्प्रदाय काव्य के केवल अंगों, शब्द तथा अर्थ तक ही सीमित है, वहां रीतिसम्प्रदाय में पहली बार काव्य के सूक्ष्म तत्व के उन्मोलन में रीतिसम्प्रदाय के आचार्य ने अपनी क्षमता दिखाई है। यह प्रकारान्तर से वामन की ही प्रशंसा है।
रीति सम्प्रदाय को ही गुण और अलंकार के स्वरूप और क्षेत्र विभाजन का श्रेय जाता है। भामह ने गुण और अलंकार के व्यापक अर्थ में सीमित करते हैं। उनकी दृष्टि में काव्य शोभा के सभी धर्मों को अलंकार के व्यापक अर्थ में सीमित करते हैं। उनकी दृष्टि में काव्य शोभा को बढ़ाने वाले गुण होते हैं और उसका अतिशय करने वाले अलंकार। काव्य में अलंकार की अपेक्षा गुण अधिक महत्वपूर्ण हैं क्योकि उनकी स्थिति काव्य में नित्य तथा अपरिहार्य हे काव्य शोभा के इस सम्प्रदाय का विशेष महत्व है।
अलंकार सम्प्रदाय के आचार्यों की तुलना में रीतिवादी आचार्यों की दृष्टि सूक्ष्म, गहरी, तीक्ष्ण एवं पैनी है। वामन ने रस को बहिरङ्गता के क्षेत्र से लाकर अन्तरंगता में रस का निवेश करते हैं। वामन वक्रोक्ति में अविवक्षित वाच्यध्वनि का अन्तर्भाव भी उपलब्ध होता है। इस प्रकार काव्य तत्वों का विवेचन इस सम्प्रदाय में अधिक व्यापक उपलब्ध होता है। ध्वनिवादी आचार्य भी रीति की सत्ता स्वीकार करते है और ध्वनि के साथ इसका पूर्ण सामंजस्य दिखाते हैं। आचार्य कुन्तक ने रीति को एक और महत्व प्रदान किया। उन्होंने रीति को कविस्वभाव से सम्बद्ध मानकर इस की अपरिहार्यता की प्रतिष्ठा की। उन्होंने रीतियों को मार्ग कहकर इनके नए नाम दिए-सुकुमार, वैदर्भी, विचित्र, गौड़ी, मध्यमा, पांचाली।