1. डॉ. अरविंद कुमार तिवारी: "विलसति संस्कृतप्रतिभा" और "संस्कृतप्रतिभान्वेषणधन्यवादगानम्"
विषय और भाव: ये रचनाएँ संस्कृत भाषा और संस्कृति के पुनर्जनन और प्रचार पर केंद्रित हैं। "विलसति संस्कृतप्रतिभा" गुरु-शिष्य परंपरा और संस्कृत शिक्षा की प्रशंसा करता है, जिसमें बाणभट्ट और पाणिनि जैसे विद्वानों का उल्लेख है। "संस्कृतप्रतिभान्वेषणधन्यवादगानम्" संस्कृत के प्रचार में योगदान देने वाले शिक्षकों और आयोजकों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है।
काव्य शैली: दोनों गीत प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक हैं। भाषा सहज और लयबद्ध है, जो पाठकों में संस्कृत के प्रति उत्साह जगाती है। "धन्यवादं ते" की पुनरावृत्ति कृतज्ञता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है।
मूल्यांकन: ये रचनाएँ संस्कृत के शैक्षिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करती हैं। ये युवा पीढ़ी को संस्कृत के प्रति प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
1. डॉ. अरविंद कुमार तिवारी: "विलसति संस्कृतप्रतिभा"
विषय और भाव: ये रचनाएँ संस्कृत भाषा और संस्कृति के पुनर्जनन और प्रचार पर केंद्रित हैं। "विलसति संस्कृतप्रतिभा" गुरु-शिष्य परंपरा और संस्कृत शिक्षा की प्रशंसा करता है, जिसमें बाणभट्ट और पाणिनि जैसे विद्वानों का उल्लेख है।
काव्य शैली: दोनों गीत प्रेरणादायक और उत्साहवर्धक हैं। भाषा सहज और लयबद्ध है, जो पाठकों में संस्कृत के प्रति उत्साह जगाती है। "धन्यवादं ते" की पुनरावृत्ति कृतज्ञता को प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है।
मूल्यांकन: ये रचनाएँ संस्कृत के शैक्षिक और सांस्कृतिक महत्व को रेखांकित करती हैं। ये युवा पीढ़ी को संस्कृत के प्रति प्रेरित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
विलसति संस्कृतप्रतिभा
विलसति संस्कृतप्रतिभा
विलसति संस्कृतप्रतिभा
विलसति संस्कृतप्रतिभा
विलसति संस्कृतप्रतिभा
कृतज्ञा योजकाः प्रीत्या वदामो धन्यवादं ते।।१।।
उपस्थित्या स्वसंस्थाने वदामो धन्यवादं ते।।२।।
विमलनिष्ठां प्रदर्शितवान् वदामो धन्यवादं ते।।३।।
समर्थनयोगदानार्थं वदामो धन्यवादं ते।।४।।
मनो नोऽचोरयत्त्वरितं वदामो धन्यवादं ते।।५।।
वटो! प्रतिभागितां कृतवान् वदामो धन्यवादं ते।।६।।
विनयकुसुमैर्मुहुर्मुदिता वदामो धन्यवादं ते।।७।।
2. श्रीनिवास रथ: "तदेव गगनं सैव धरा"
विषय और भाव: यह गीत सामाजिक परिवर्तनों और नैतिक दुविधाओं को चित्रित करता है, जो आधुनिक समाज में परंपराओं के टकराव को दर्शाता है। "तदेव गगनं सैव
धरा" की पुनरावृत्ति जीवन की निरंतरता और बदलते मूल्यों के बीच तनाव को
प्रभावी ढंग से उजागर करती है। गीत में पाप-पुण्य, कर्मफल,
और सामाजिक रीतियों जैसे दहेज और विवाह की समस्याओं पर गहन चिंतन
है। "केन हेतुना विलपति सीता" और "वृन्दावनं न काशी वा मथुरा"
जैसे पंक्तियाँ आध्यात्मिकता और परंपराओं के प्रति समकालीन उदासीनता को रेखांकित
करती हैं।
काव्य शैली: भाषा सरल किंतु गहन है, जिसमें संस्कृत की छंदबद्धता
और आधुनिक विचारों का सुंदर समन्वय है। प्रतीकात्मकता (जैसे सीता और मिथिला का
उल्लेख) रचना को भावनात्मक गहराई प्रदान करती है।
मूल्यांकन: यह रचना विचारोत्तेजक है और आधुनिक समाज की विसंगतियों को संस्कृत के
माध्यम से प्रभावी ढंग से व्यक्त करती है। हिंदी अनुवाद इसे गैर-संस्कृत पाठकों के
लिए भी सुलभ बनाता है।
तदेव गगनं सैव धरा
जीवनगतिरनुदिनमपरा
तदेव
गगनं सैव धरा।।
पापपुण्यविधुरा
धरणीयं
कर्मफलं
भवतादरणीयम्।
नैतद्-वचोऽधुना
रमणीयं
तथापि
सदसद्-विवेचनीयम्।।
मतिरतिविकला
सीदति विफला
सकला परम्परा। तदेव....
शास्त्रगता
परिभाषाऽधीता
गीतामृतकणिकापि
निपीता ।
को
जानीते तथापि भीता
केन
हेतुना विलपति सीता ।।
सुतरां
शिथिला
सहते
मिथिला
परिकम्पितान्तरा
। तदेव.......
जनताकृतिः शान्तिसुखहीना
संस्कृति-दशाऽतिमलिना
दीना।
केवल-निजहित-साधनलीना
राजनीतिरचना
स्वाधीना ।।
न तुलसीदलं
न गङ्गाजलं
स्वदते यथा सुरा । तदेव.....
देवालयपूजा
भवदीया
कथं
भाविनी प्रशंसनीया।
धर्म-धारणा
यदि परकीया
नैव
रोचते यथा स्वकीया।।
भक्तिसाधनं
न वृन्दावनं
काशी वा मथुरा। तदेव..
स्पृहयति
धनं स्वयं जामाता
परिणय-रीतिराविला
जाता।
सुता
न परिणीतेति विधाता
वृथा
निन्द्यते रोदिति माता ॥
चरणवन्दनं
भीतिबन्धनं
मोहमयी मदिरा । तदेव ...
सपदि
समाजदशा विपरीता
परम्परा
व्यथते ननु भीता ।
अपरिचिता
नूतननैतिकता
शनैः
शनैः प्रतिगृहमापतिता ।।
त्यज चिरन्तनं
हृदयमन्थनं
गतिरपि नास्त्यपरा । तदेव....
भारतीयसंस्कृतिमञ्जूषा
प्रतिनवयुग-संस्कार-विभूषा
।
स्वर-परिवर्तन-कृताभिलाषा
सम्प्रति
लोक-मनोरथभाषा ।
नवयुगोचिता
मनुज-संहिता
विलसतु रुचिरतरा । तदेव......
वही आकाश वही धरती
गति जीवन की नित नयी बदलती, है वही
आकाश वही धरती ।
पाप पुण्य का भार धरा पर कर्म के अनुरूप मिलता फल, माना, अब ये
बातें नहीं सुहाती फिर भी भले बुरे का तो कुछ करना होगा कही विवेचन । चकराने लगता
है माथा समूची परम्परा लगती विफल सिसकती । है वही...
शास्त्रों वाली परिभाषायें पढ़ ली, पी गये अमृत बिन्दु सम वचनों वाली गीता, फिर भी किसे पता है ? किस कारण डरी डरी रोती है सीता ?
इसीलिए बेहाल कापते अन्तर से है मिथिला सब सहती । है
वही..
सुख शान्ति से है दूर जनता, केवल अपने
ही हित साधन में लीन राजनीति के हर करतब को मिल गयी स्वाधीनता ।
न तुलसी दल न गंगा जल में कहीं वह स्वाद या वह भावना
दिखती, कि जितनी मन भावन रसीली अब सुरा लगती । है वही..
आपके मन्दिर की, पूजा की
प्रशंसा कौन करेगा ? कैसी ! अगर परायी धर्म-धारणा नयी सुहाती खुद अपनी ही
पूजा जैसी ।
वृन्दावन नहीं भक्ति का साधन न काशी या मथुरा भक्ति भक्त
के मन में बसती । है वही......
जमाई राज अब खुद हो कर चाहने लगा वधू से बढ़ कर धन, हुए व्याह के तौर तरीके दूषित, भाग्य को बेकार कोसती माता
है दिन रात रोती चरण वन्दन ये
डरावने बन्धन एक मदिरा है भरम भरती । है वही......
दशा समाज की फिलहाल है विपरीत दुखी है परम्परा भयभीत । हर घर आँगन में उतर रही है धीरे धीरे एक नयी नैतिकता अपरिचित ।
छोड़ो चिरन्तन
हृदय-मन्थन गति भी कोई और नही दिखती । है वही...
भारतीय संस्कृति की मंजूषा सक्षम है करने में नवयुग के
संस्कार अलंकृत । स्वर परिवर्तन की अभिलाषा व्यक्त कर रही सम्प्रति जन मानस की भाषा ।
3. जानकीवल्लभ शास्त्री: "भारतीवसन्तगीतिः"
विषय और भाव: यह गीत वसंत ऋतु की रमणीयता और प्रकृति के साथ मानव मन के सामंजस्य को चित्रित करता है। "कलिन्दात्मजायाः सवानीरतीरे" और "मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुंजे" जैसे वर्णन प्रकृति की सुंदरता को जीवंत करते हैं। यह रचना प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और आध्यात्मिक सौंदर्य को दर्शाती है।
काव्य शैली: गीत में शास्त्रीय काव्य परंपरा का उपयोग है, जिसमें उपमा और रूपक जैसे अलंकारों का समावेश है। "निनादय नवीनामये वाणी वीणाम्" की पुनरावृत्ति इसे संगीतमय और लयबद्ध बनाती है।
मूल्यांकन: यह रचना संस्कृत साहित्य के सौंदर्य और भावात्मक गहराई को उजागर करती है। यह प्रकृति प्रेमियों और काव्य रसिकों के लिए एक आनंददायक अनुभव है।
भारतीवसन्तगीतिः
निनादय नवीनामये
वाणी वीणाम् ।
मृदुं गाय गीतिं
ललित नीति लीनाम् ॥
मधुर - मञ्जरी-
पिञ्जरीभूत- माला:
वसन्ते लसन्तीह
सरसा रसाला:
कलापा
कलित-कोकिला-काकलीनाम्
निनादय नवीनामये
वाणी वीणाम् ॥
वहति मन्द-मन्दं
समीरे सनीरे
कलिन्दात्मजाया:
सवानीर-तीरे
नतां
पंक्तिमालोक्य मधुमाधवीनाम्
निनादय नवीनामये
वाणी वीणाम् ॥
चलितपल्लवे
पादपे पुष्पपुंजे,
मलयमारुतोच्चुम्बिते मञ्जुकुंजे
स्वनन्तीन्ततिम्प्रेक्ष्य
मलिनामलीनाम्।
निनादय नवीनामये
वाणि ! वीणाम्।।
लतानां नितान्तं
सुमं शान्तिशीलम्,
चलेदुच्छलेत्कान्तसलिलं सलीलम्-
तवाकर्ण्य
वाणीमदीनां नदीनाम्।
निनादय नवीनामये
वाणि वीणाम्।।
उदयति मिहिरो,
विगलति तिमिरो
भुवनं कथमभिरामम्
प्रचरति चतुरो
मधुकरनिकरो
गुंजति
कथमविरामम्॥
विकसति
कमलं, विलसति सलिलम्
पवनो वहति सलीलम्
दिशिदिशि धावति,कूजति नृत्यति
खगकुलमतिशयलोलम्॥
शिरसि तरूणां
रविकिरणानाम्
खेलति
रुचिररुणाभा
उपरि दलानाम्
हिमकणिकानाम्
कापि हृदयहरशोभा॥
लेखक- जानकीवल्लभ शास्त्री
संस्कृतभाषी ब्लॉग की यह पोस्ट आधुनिक संस्कृत साहित्य की जीवंतता और प्रासंगिकता का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। श्रीनिवास रथ की रचना सामाजिक चिंतन को, जानकीवल्लभ शास्त्री की रचना प्रकृति के सौंदर्य को, और अरविंद तिवारी की रचनाएँ संस्कृत के प्रचार को उजागर करती हैं। हिंदी अनुवाद और संरचित प्रस्तुति इसे व्यापक पाठकों के लिए सुलभ बनाती है। यह पोस्ट संस्कृत साहित्य के प्रेमियों, छात्रों, और शोधकर्ताओं के लिए एक प्रेरणादायक और ज्ञानवर्धक संसाधन है। यह शास्त्रीयता और आधुनिकता के मिश्रण को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करती है।
आप भी इस ब्लॉग को पढ़ें और संस्कृत की समृद्ध परंपरा का हिस्सा बनें!









