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संस्कृतसर्जना उपयोगी बातें

मित्राणि 
         भवन्तः संस्कृतसर्जना ई-पत्रिकायाः सदस्यता स्वीकृतवन्तः इति प्रमोदावहम्। अत्र भवन्तोपि स्व-स्वलेखं प्रदाय पुष्कलविचारेण पत्रिकामिमां पूरयन्तु। मित्राणि अनेकाः पत्रिकाः धनेनैव क्रेतुं शक्यन्ते परन्तु संस्कृतस्य सम्वर्धनं भवतु इति धिया केचन संस्कृतसमुपासकाः यथाशक्यं स्वलेखप्रदानेन सहयोगं कुर्वन्ति । येन एषा पत्रिका समयेन प्रकाशिता भवति। अत्र नूतनशोधलेखाः अन्याः समसामयिकविषययुताः रचना अवश्यं प्रेषणीया पठनीया च। 
      प्रश्नोत्तर
प्रश्न- श्रीमन् कृपया अवगत करायें संस्कृतसर्जना पत्रिका कैसे प्राप्त होगी ?
     यह संस्कृत और हिन्दी भाषा में प्रकाशित होती है। अक्सर पाठकों का आग्रह रहता है कि पत्रिका मेरे  पते पर भेज दीजिये। आदरणीय पाठक! यह एक ई- पत्रिका है। इसे कागज पर छापा नहीं जाता। आप इसे संस्कृतसर्जना के वेबसाइट पर जाकर निःशुल्क पढ सकते हैं।

प्रश्न- क्या इसके साईट से संस्कृतसर्जना ई-पत्रिका को पढ़ने के लिए डाऊनलोड किया जा सकता है सर ? 

उत्तर- हाँ। संस्कृतसर्जना ई-पत्रिका के पुराने अंक को इस लिंक पर जाकर Download किया जा सकता है।
संस्कृतसर्जना पत्रिका हरेक तीन महीने जनवरी, अप्रैल, जुलाई और अक्टुबर में प्रकाशित होती है। इसमें संस्कृत, हिन्दी तथा अंग्रेजी भाषा में संस्कृत के बारे में लेख प्रकाशित होता है। यह जितना संस्कृत पढने वाले के लिए उपयोगी है उससे कहीं अधिक संस्कृत न पढे लोगों के लिए उपयोगी व मार्गदर्शक  है। आपको अपने मोबाइल, लैपटाप या कम्प्यूटर में इसे पढने में असुविधा हो तो हमारे तकनीकि सम्पादक से सम्पर्क करें।
पुस्तकों की समीक्षा 
प्रश्न- यहाँ किस- किस प्रकार की सूचनायें प्रकाशित होती है?
    उत्तर-  क्या आपने संस्कृत में कोई नयी पुस्तक लिखी हैं और पाठकों तक उसकी सूचना देना चाहते हैं? के ईमेल पर पुस्तक का फोटो, प्रकाशक का नाम, पता, पुस्तक के मूल्य के साथ उसकी समीक्षा भेज दें। इस पत्रिका में नवीन प्रकाशित पुस्तकों की समीक्षा प्रकाशित की जाती है।
यहाँ पर संस्कृत जगत् में होने वाले विशिष्ट आयोजनों के बारे में समीक्षात्मक आलेख प्रकाशित होता है।
प्रश्न- क्या पत्रिका के अतिरिक्त इसके बेवसाइट पर अन्य किसी प्रकार की शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध है?
उत्तर संस्कृतसर्जना ई- पत्रिका के बेवसाइट पर संस्कृत शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित शोध लेखों की सूची, विषय निर्देश के साथ उपलब्ध है।  इसमें कुल 6 फिल्ड हैं। 
शोध पत्रिकाओं के प्रकाशक/सम्पादक यदि अपनी अपनी पत्रिका के शीर्षक की टंकित प्रति उपलब्ध करा दें तो हमें अतिरिक्त श्रम की आवश्यकता नहीं होगी। इस प्रकार शोध पत्रिकाओं का विज्ञापन भी होता रहेगा।
प्रश्न- मैं इस पत्रिका के प्रकाशन में अपना योगदान किस प्रकार से दे सकता / सकती हूँ?
   उत्तर-   सबसे पहले आप इस पत्रिका की सदस्यता ले लें, ताकि प्रकाशन समिति को आपसे सम्पर्क करने में सुविधा हो। संस्कृतसर्जना पत्रिका के प्रत्येक अंक में एक संस्कृत विद्यालय का परिचय दिया जाता है। आप यदि किसी संस्कृत विद्यालय में पढ रहे हो या पढा रहे हों तो अपने विद्यालय का फोटो सहित पूरा विवरण हमारे ईमेल पर भेज दें। इस लेख में संस्कृत विद्यालयों में प्रवेश की प्रक्रिया, वहाँ उपलब्ध व्यवस्था, शैक्षणिक स्तर तथा विद्यालय की उपलब्धि दर्शाया गया हो। आपसे फिर आग्रह है पत्रिका में सर्जनात्मक आलेख  हमारे ईमेल पर भेजें। आपको अपनी रचना या लेख प्रकाशित कराने के लिए किसी भी प्रकार का शुल्क नहीं देना होगा। रचना या लेख प्रकाशित करने के पूर्व आपसे एक ही आग्रह - आप संस्कृत सर्जना का सदस्य बनें।
संस्कृतसर्जना में लेख भेजते समय निम्न बातों का ध्यान रखें-
1. लेख का वर्ड तथा PDF दोनों फाइल भेजें। लेख के अंत में अपना नाम, पता एवं दूरभाष संख्या अवश्य दें।
2. फाईल को अपने नाम से बनायें, क्योंकि डाउनलोड के बाद आप द्वारा फाइल को पहचाना जा सके।
3. अपना चित्र साथ भेजें।
सूचना


      जो पाठक मोबाइल में 2 G का उपयोग करते हैं, वे संस्कृतसर्जना के यूनीकोड संस्करण पर क्लिक कर पत्रिका पढ़ें। बेवसाइट के बीच में दिख रहा चित्र, पत्रिका का PDF संस्करण है। यह 2 से 3 mb का होता है। इसके खुलने में देर हो सकती है। 

 संस्कृतसर्जना ई-पत्रिका अब दो संस्करणों में प्रकाशित होने लगी है। 1. यूनीकोड 2. PDF
हमसे आप twitter पर भी मिल सकते हैं। खोजें @sanskritsarjana

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                                                               or
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   बेवसाइट और ब्लाग के माध्यम से संस्कृतसर्जना पत्रिका पढाइये- 

मित्रों! आप में से कुछ मित्र ब्लाग के लेखक होगें। संस्कृतसर्जना पत्रिका को उस ब्लाग पर लें।
 प्रक्रिया- 1- पत्रिका पर क्लिक करें।
             2- सबसे नीचे दाहिनी ओर इस प्रकार का चित्र दिखायी देगा।

 3- यह संकेत facebook, Google+ आदि पर share के लिए है। इन स्थानों पर share करने पर पूरी पत्रिका वहीं पढी जा सकेगी। 

4-  खोज संकेत पर क्लिक कर स्क्रोल डाउन करें।  नीचे info share आदि विकल्प दिखेगा। आप share पर क्लिक करें। क्लिक करते ही Direct link लिखा दिखेगा। उसके नीचे के कोड को copy कर लें।


          5- आप अपने ब्लाग के layout पर जाकर Add a Gadget में जायें। वहाँ HTML/JavaScript का चयन करें । वहाँ इस code को past कर दें। अब आपके ब्लाग पर संस्कृतसर्जना पत्रिका भी दिखने लगेगी। इससे आपके ब्लाग तथा पत्रिका को अधिकाधिक पाठक मिलेंगें।
विविध

संस्कृत पत्रिका का ई – वर्जनः- फायदे अधिक नुकसान कम। इस पत्रिका के लेख को copy कर whatsApp पर अपने नाम से प्रचारित करने पर पाठकों की प्रतिक्रिया।
 संस्कृत भाषा के प्रचार का दायित्व हर हिन्दुस्तानी का है, क्योंकि संस्कृत से ही हमारी संस्कृति है। हर भारतीय प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से संस्कृत से जुड़ा हुआ है। जो प्रत्यक्ष रूप मे संस्कृत से जुड़े हुए हैं, उनका दायित्व अधिक है। यह हम सभी को स्वीकार कर यथाशक्य संस्कृत का विस्तार करना है। 

      आज कुछ लोगों की ऐसी प्रवृत्ति ही बन गई है । ये लोग नाम तथा अंक कमाने के लिए कुछ भी विचार नहीं करते । इनमें बडे बडे नाम भी हैं । संस्कृतसर्जना आदि जो पत्रिकाएं हैं, उनको तो केवल संस्कृत प्रचारार्थ निःशुल्क एवं ऑनलाइन रखना ही चाहिए, वरना इसका उद्देश्य नष्ट होता है । हम सभी जानते हैं कि फ्री होने के वावजूद लोग संस्कृत पत्रिका को पढते नहीं। सशुल्क होने पर तो भले ही मूल्य देकर सदस्यता ले लेंगे पर अध्येता कम ही होतें है । हाँ जो ऐसे चौर कार्य करते हैं ऐसे संस्कृतज्ञों की सामूहिक भर्त्स्ना करना उचित होगा ।
      संस्कृतसर्जना का आनलाइन होना अधिक अच्छा है वर्ना उसको कोई टाइप करवा कर प्रकाशित करता तो ये बात पता भी नहीं चलती ।
संस्कृतसर्जना पत्रिका पर पाठकों की प्रतिक्रिया 

       बहुत ही चित्ताकर्षक पत्रिका है । उत्तरोत्तर प्रगति करे , यही कामना है । आशा करता हूँ आगे चलकर पृष्ठ और बढेंगे ।।शुभकामना ।। Anand Vardhan Dubey

       श्रीमान जी ! संस्कृत सर्जन कब से प्रकाशित हो रही है और संस्थापक सम्पादक, उप सम्पादक, सम्पादक, प्रकार, वार्षिक शुल्क आदि के बारे में, तथा और कोई समाचार पत्रिका के बारे में भी ज्ञात हो तो ... विस्तृत जानकारी देने की कृपा करेंगे! 
क्योकि मेरे संस्कृत पत्रकारिता से सम्बन्धित लघु शोध प्रबन्ध में में जोड़ सकूँ 
घनश्याम जी www.sanskritsarjana.in पर जायें यहाँ संस्कृतसर्जना के बारे में पूरी जानकारी मिल जाएगी। 

पत्रिका को सशुल्क रखा जाय या निःशुल्क- 

जिस वस्तु को हम निशुल्क पाते है, उसका महत्व भी कम आँकते है। Anil Sharma 
    जिन्हें संस्कृत विकास एवं प्रचार प्रसार की चिंता है वैसे लोग सशुल्क पढेंगे और ग्राहक बनायेंगे ,कुछ शुल्क निर्धारित किया जाना चाहिए ताकि पत्रिका सतत् संचालित रहे। Susheel Kumar Jha 

     अवश्य | शुल्क के बदले सहयोग कह लें, पर शुल्क होना ही चाहिए | नि:शुल्क मिलने वाली चीजों की महत्ता समाप्त हो जाती है, भले ही वे कितनी ही उपयोगी हों | हवा और पानी के प्रदूषण का यही तो कारण है कि वे नि:शुल्क हैं - कोई मिनरल वाटर की बोतल का प्रदूषण क्यों नहीं करता ? Aditya Ranjan Pathak 

       शुल्क चाहे कम ही रखें लेकिन खैरात में बांटने से वस्तु का महत्व कम हो जाता है । अतः शुल्क भी लें और धनी लोगों से दान लेकर उन्हें भी जोड़ें । पिछले 70 साल में संस्कृत का महत्व इसलिए घटा कि संस्कृत और संस्कृति के प्रचार प्रसार के लिए धनी लोगों से धन लेने वाले विद्वान नहीं रहे । Attri 
      संस्कृतसर्जना के वेबसाइट पर विभिन्न शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों के शीर्षक, लेखक, विषय, पत्रिका नाम, पता आदि के विवरणों का एक डाटाबेस तैयार किया जा रहा है। इस डाटाबेस से इच्छित सामग्री खोजने के लिए एक सर्च इंजन लगाया जाएगा। शोधार्थी इसकी सहायता से अपने विषय से सम्बद्ध विविध पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों की सूचना एकत्र पा सकेंगें। 

पाठक प्रतियोगिता- 

  संस्कृतसर्जना के प्रत्येक अंक में पत्रिका में प्रकाशित लेख पर एक प्रतियोगिता करायी जाती है.  प्रतियोगिता के माध्यम से उपहार की घोषणा भी करती है जैसे ---
   नीचे लिखे प्रश्न का सही उत्तर 17-2-16 को दें और निःशुल्क पायें एक संस्कृत पुस्तक।
प्रश्न- संस्कृतसर्जना वर्ष 2 अंक 1 के किस लेख में अमरकोश की चर्चा की गयी है? 

      फेसबुक पर पत्रिका से संबंधित एक प्रश्न का सटीक और त्वरित उत्तर देने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शोध छात्र श्री सतीश प्रताप सिंह को आदरणीय श्री जगदानन्द झा जी ने पुरस्कार प्रदान किया। संस्कृतसर्जना और मेरी ओर से बधाई और शुभकामनाएं। 

"फ्री में पत्रिका पढ़िये पाईये नगद इनाम" आप www.sanskritsarjana.in पर संस्कृत सर्जना पत्रिका फ्री में पढ़कर इनाम जीत सकते हैं, अर्थात अपने मोबाइल पर रु 50 का रिचार्ज पा सकते हैं ।
ये करें --------
1- संस्कृतसर्जना के बेवसाइट पर जाकर निःशुल्क सदस्यता लें।    
2-  संस्कृतसर्जना में प्रकाशित संस्कृत लेखों में से 30-30 सेकेन्ड का कुल 5 रिकार्डिग बनाये।
3- WhatsApp 7271032746 पर अपना नाम तथा मोबाइल नंबर तथा रिकार्ड किये  सभी ध्वनियों को  भेजें।
4-  रिकार्डिग में पत्रिका का वर्ष तथा अंक बोलें।
5-  सदस्यता सूची से नाम तथा पत्रिका के संस्कृत लेख से ध्वनि (रिकार्डिग) मिलाने के बाद रुपये 50 का रिचार्ज कराया जाता है । समय-समय पर यह योजना चलायी जाती है, जो सिर्फ़ छात्रों/ छात्राओं के लिए होती है। योजना की जानकारी के लिए इस पेज को Like करें- 
सन्देश 
Thanks for subscribing to Sanskritsarjana. We hope you will find valuable tips. Visit this link to suggest. http://sanskritsarjana.in
 आगामी लेख में पढिये - संस्कृतसर्जना बेवसाइट के संचालन की विधि।  बेवसाइट में कहाँ क्या है?
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संस्कृतसर्जना के बेवसाइट पर उपलब्ध सामग्री तथा इसके अनुप्रयोग की विधि


    संस्कृतसर्जना । संस्कृत जगत का बहुचर्चित नाम । मित्रों यह पत्रिका नही संस्कृत प्रचार प्रसार का, संस्कृत के संरक्षण का, संस्कृत के शास्त्रों के संरक्षण का, संस्कृत मे नवीन प्रतिभाओं को उभारने का एक संसाधनों हॆ । एक बार अवश्य पढें । अगर आपको अच्छा लगे तो सदस्यता अवश्य ग्रहण करें ।           प्रो.मदन मोहन झा     
           संस्कृत में पत्रकारिता भी एक विधा है। इसके द्वारा हम नवीनतम जानकारी प्राप्त करते हैं। हमारी पकड़ संस्कृत भाषा में मजबूत होती है। प्रचलन में आये नवीन शब्दों का संस्कृत प्रयोग देखते हैं। पाठ्य पुस्तकें ससीम होती है, पुरानी भी परन्तु पत्र पत्रिकाएं नित्य नूतन।

    संस्कृतसर्जना का प्रतीक चिह्न



लेखकों द्वारा अक्सर पूछा जाता है कि संस्कृतसर्जना में किस प्रकार के लेख प्रकाशित किये जाते हैं?
 उत्तर पाने के लिए पत्रिका की बेवसाइट  http://www.sanskritsarjana.in/ खोलें। चित्र में लाल रंग के घेरे में अस्मद् विषये बटन दिखाया गया है। यहाँ क्लिक करने पर इस प्रकार  पत्रिका के विषयवस्तु  सामने खुलकर आयेंगें।



लेख  भेजने की पूरी प्रक्रिया जानने के लिए सामान्य निर्देशः बटन पर क्लिक करें। क्लिक करते ही ई-मेल – sanskritsarjana@gmail.com पर अपना पूरा पता एवं स्वयं का फोटो, विषय से सम्बन्धित फोटो भेजने का आग्रह प्राप्त होता है।  Kruti Dev 010 फाण्ट में टंकित word की soft copy तथा एक PDF प्रति प्रेषित करने जैसे प्रक्रिया की जानाकारी मिलती है ।



सदस्यता आमन्त्रण

संस्कृतसर्जना ई- पत्रिका के बेवसाइट पर पाठकों तथा लेखकों को निःशुल्क सदस्यता प्राप्त करने की सुविधा दी गयी है। इस पर एक बार नाम, पता, ईमेल आदि उपलब्ध करा देने पर पत्रिका के नवीन अंक आगमन की सूचना दी जा सकती है। सम्पादकीय समिति आपसे अमूल्य सुझाव प्राप्त कर सकता है। पुरस्कार योजना में सम्मिलित किया जाता है आदि। सदस्यता पाने की प्रक्रिया इस चित्र में दिखाया गया है-
मोबाइल संख्या के शुरु में 0 अंक नहीं लिखें। ईमेल में @ के आगे पीछे स्थान न दें।




ई संसाधन
    संस्कृतसर्जना पत्रिका के बेवसाइट पर ई संसाधन नामक बटन दिख रहा होगा। यहाँ पर क्लिक करने पर तीन विकल्प सामने खुलकर आता है। 1- लेखक समग्र 2- विडियो 3- आडियो। लेखक समग्र में लेखकों की रचनाएँ तथा ब्लाग के लिंक उपलब्ध हैं। विडियो एवं आडियो में चार विकल्प दिये गये हैं। 1. गीत 2. व्याख्यान  3. कविता पाठ तथा 4. सस्वर वेद पाठ। यदि आप आडियो के माध्यम से सुनना चाहते हैं तो आडियो पर क्लिक कर संस्कृत गीत, विविध विषयों पर ट्यूटोरियल या अन्य व्याख्यान सुन सकते हैं। इसी प्रकार विडियो के लिंक के भी लिंक उपलब्ध कराये गये हैं। संस्कृत सीखने के लिए उपयोगी लिंक भी शीघ्र उपलब्ध कराया जाएगा।
शोध पत्रिका लेख सूची
      यहाँ शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हिन्दी और संस्कृत के शोध लेखों को एकत्र कर विषयानुक्रम से उपलब्ध कराया गया है। उदाहरण- क्या आप यदि साहित्य से सम्बन्धित शोध लेख खोज रहे हैं? रुकिये, अब आपको विभिन्न शोध पत्रिकाओं को पलटकर इच्छित लेख ढूँढने की आवश्यकता नहीं है। यह लिंक तमाम पत्रिकाओं में प्रकाशित लेखों को एक जगह उपलब्ध करा देगा। यह इतना ही नहीं करता। यह शोध लेखों की गुणवत्ता भी सुनिश्चित करता है। इसकी प्रक्रिया इस चित्र के माध्यम से समझाया जा रहा है।



    
सबसे पहले आप जिस भाषा में लिखित शोध लेख ढूँढना चाहते हैं उसे सैलेक्ट करें पुनः जिस विषय सम्बन्धित शोध लेख खोज रहे हैं, उसका चयन कर लें। संस्कृत के लगभग सभी विषय यहाँ प्रदर्शित हैं। अब submit पर क्लिक करें। मैंने यहाँ भाषा संस्कृत विषय नाट्यशास्त्र का चयन किया है,जिसका परिणाम निम्नानुसार है-

Action के नीचे Details पर क्लिक करने से पत्रिका का नाम, व्याख्यात्मक शीर्षक, पत्रिका वर्ष, अंक / खण्ड, आवधिकता , प्रकाशक वर्ष की जानकारी मिल जाएगी।

   




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sanskritsarjan E- magazine

 संस्कृतसर्जना  त्रैमासिकी ई. पत्रिका


http://sanskritsarjana.in/ तः हिन्दीसंस्कृतभाषयोः प्रकाशिताया अस्याः पत्रिकायाः आरम्भः जनवरी 2015 वर्षे जातः। इयं डी.202/4, कूर्माञ्चल नगरलखनऊ नगरात्  उषा किरण महोदयायाः सम्पादने  प्रकाश्यते।  सर्जना,  संस्मरणं, साक्षात्कारः, वैचारिकनिबन्धाः, शिक्षा, तकनीकिशिक्षा, पर्यटनं. पुस्तकपरिचयः, वार्तादिविषयाः अस्याः मुख्यविषयाः।

 संस्कृतसर्जना नाम्नी ई. पत्रिकायाः प्रथमवर्षस्य द्वितीयांके एते निबन्धाः सम्मुखोपस्थितपृष्ठसंख्यानुसारेण प्रकाशिताः सन्ति।

लेखाः                                               पृष्ठम्



नैजं किंचित् 2

गुरुकुल प्रभात आश्रम एक परिचय           3
लेखनीपंचकम् 11
फेसबुकमहिमा 12
नेतृमहिमा 13
श्रीकृष्णं प्रति                                        15
यथार्थ कथा 16
भूतस्य मन्त्रः 19
डॉ वीरभद्र मिश्रः-यथा दृष्टो यथा मतः 24
असममेघालयप्रान्तयोः पर्यटनस्थलानि 27
वर्तमान शिक्षा प्रणाली में संस्कृत की आवश्यकता 29
आधुनिक परिवेश में संस्कृत के अध्ययन की भूमिका 32
साक्षात्कारः  प्रो. ओम्प्रकाश पाण्डेय 33
रामनवमी                               37
आधुनिकवैद्युतशोधोपकरणानि              39
अभिक्रमिताधिगमे सङ्गणकसहानुदेशनम् 42
भारतीयकालगणनासिद्धान्तः 42
पालि एवं बौद्ध वाङ्मय में सन्दर्भ ग्रन्थ       45
पुस्तक समीक्षा                                       49
पत्रिका परिचय                                        50

वार्ता                                                       51

 इस पत्रिका के बेवसाइट बारे में अधिक जानने के लिए चटका लगायें और पढें- संस्कृतसर्जना 

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संस्कृत सर्जना त्रैमासिक ई-पत्रिका का विषय वस्तु

               E- Mail                                             website
      
       संस्कृत सर्जना त्रैमासिक ई-पत्रिका में प्रकाशित होने वाले लेखों के विषय वस्तु को इस लेख में स्पष्ट किया जा रहा हैं। इस पत्रिका का मुख्य उद्देश्य मौलिक लेखन को प्रोत्साहित करना  हैं। इस पत्रिका में मुख्यतः अधोलिखित विषयों पर लेख प्रकाशित किये जाते हैं-

1- संस्मरण-

      अपने प्रयोगधर्मी गतिविधियों द्वारा  जन-जन तक संस्कृत को पहुँचाने के लिये जीवन अर्पित किये विद्वानों के प्रेरणादायी जीवन का संस्मरण।

2- साक्षात्कार

       ऐसे व्यक्ति जो अपने सार्वजनिक तथा बहुआयामी जीवन द्वारा संस्कृत का प्रचार-प्रसार कर रहें हो़ उनका  समसामयिक, ज्वलंत तथा सर्वस्पर्शी विषयों पर साक्षात्कार। 

3- वैचारिक निबन्ध

      संस्कृत के विकास एवं प्रसार के लिये चिन्तन तथा युगानुरूप अनुप्रयोग करने वाले बुद्धिजीवियों के वैचारिक निबन्ध।

4- पर्व तथा उत्सव

      संस्कृत भाषा में निरुपित सद्यः आने वाले पर्वों तथा उत्सवों का जन जीवन पर पडे प्रभाव का विश्लेषण।

5- जनोपयोगी संस्कृत विषयक सामग्री

      जन सामान्य के दैनन्दिन उपयोग में आने वाले ज्योतिष, धर्मशास्त्रीय निर्णय, आयुर्वेद आदि विषय। 

6- शिक्षा

     छात्रों एवं संस्कृत सीखने के इच्छुक व्यक्तियों के लिए  संस्कृत शिक्षा से जुड़ी सामग्री और शोध कार्य में सहायक पुस्तकें, संस्कृत सीखने के लिए पाठ्यक्रम, प्रतियोगी परीक्षा के तैयारी के लिए सुझाव आदि।

7- तकनीकि शिक्षा

 आज के तकनीकि से परिचित नहीं होने के कारण संस्कृत क्षेत्र के बहुशः लोग जीवन में इसका प्रयोग नहीं कर पाते हैं। फलतः अन्तर्जाल पर उपलब्ध सामग्री का उपयोग कर पाते है न ही अभिदान। संस्कृतज्ञ त्वरित सूचना के प्रवाह से अछूते  न रहें  एतदर्थ तकनीकि शिक्षा।
(संस्कृत विषयक सामग्री इण्टरनेट पर बहुतायत में उपलब्ध हैं, जिसकी जानकारी आम संस्कृतज्ञ को नहीं होती हैं।   इस माध्यम से एकत्रित जानकारी  यहां उपलब्ध करायी जाती हैं। )

8-पुस्तक परिचय

        कुछ लेखक अपने पुस्तक का स्वयं प्रकाशन करते हैं, उसका प्रचार नहीं हो पाता है। पुस्तक समीक्षा के माध्यम से  पुस्तक का प्रचार किया जाता है। 

9- सर्जना- 

         नयी पीढी के संस्कृत लेखकों की कथा, कविता आदि मौलिक रचना।

10-वार्ता

      सामान्यतः संस्कृत क्षेत्र की वार्तायें भी इसमें प्रकाशित होती हैं।

11- पर्यटन 

          तीर्थस्थलों  तथा अन्य पर्यटन स्थलों के बारे में सचित्र संस्कृत भाषा में लेख प्रस्तुत करना। इसमें पर्यटन स्थल पर ठहरने, गमनागमन के साधन, आसपास के दर्शनीय स्थल तथा अन्य उपयोगी सुझाव ।

12- संस्था परिचय

          संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों, विश्वविद्यालयों, शोध केन्द्रों, पुस्तकालयों आदि में प्रवेश के नियम, उपलब्ध संसाधन आदि की जानकारी लेख के माध्यम से जनसामान्य को उपलब्ध कराना ताकि लोग वेहतर विकल्प का चयन कर सकें। उन संस्थाओं से लाभ ले सकें।
यह पत्रिका संस्कृत के प्रचार के लिये कटिबद्ध कुछ स्वयंसेवियों द्वारा आरम्भ किया गया, जिसका मूल उद्देश्य मात्र संस्कृत भाषा का प्रचार करना हैं।

  इस पत्रिका से सम्बन्धित कुछ प्रश्न बार-बार पूछे जाते हैं, जिसका समाधान यहां प्रस्तुत हैं-

प्रश्न-    क्या मेरा लेख इसमें प्रकाशित हो पाएगा ? क्या शुल्क लगेगा ?
उत्तर-  इस पत्रिका में सभी लेख निःशुल्क प्रकाशित किये जाते हैं वशर्ते कि आपने इस पत्रिका की सदस्यता ले ली होजो कि निःशुल्क हैं। सदस्यता के लिए यहाँ क्लिक करें।

प्रश्न-   इस पत्रिका में प्रकाशित होने वाले लेख का विषय वस्तु क्या होता हैं ?
उत्तर-  शास्त्रीय शोध निबन्ध ( जो प्रायः पाठ्यक्रमों में निर्धारित हैं ) को छोड़कर सभी प्रकार के लेख इसमें प्रकाशित होते है। लेखों की भाषा संस्कृत/हिन्दी होनी चाहिये और संयत होनी चाहिए। आप अपनी कल्पना को संस्कृत भाषा में पिरोकर उपलब्ध करायें। यथा- गोरैया संरक्षण, जंगली एवं पालतू पशुओं का परिचय आदि प्रकाशित किया जायेगा। विषयवस्तु की कोई भी सीमा नहीं हैं।

प्रश्न-    क्या कलात्मक अभिरूचियों को यदि संस्कृत भाषा में लिखा जाये तो यहां प्रकाशित हो सकता हैं ?
उत्तर-  अवश्य। मान लीजिये आपकी अभिरूचि नेल पालिश, केश सज्जा, रंगोली, व्यंजन निर्माण, अचार निर्माण की विधि, गृह सज्जा, पेंटिग, कढ़ाई आदि क्षेत्रों में हैं और आपके पास इस प्रकार के चित्रों का संग्रह भी हैं। संस्कृत भाषा में उसके निर्माण की विधि, कलात्मकता, उसका सौन्दर्य वर्णन लिख कर चित्र के साथ भेजे जाने पर प्रकाशित किये जाते हैं। इसमें कलाओं को भाषायी अभिव्यक्ति दिया जाना मुख्य हैं। जैसे-आपने कहीं किसी के हाथों में मेंहदी सुसज्जित किया हो, बस उसका एक चित्र खींचकर उसका पूरा वर्णन संस्कृत में लिख कर भेजें।

प्रश्न-    क्या हम अपने पालतू पशुओं के रूप सौन्दर्य,संस्मरण का भी वर्णन यहां प्रकाशित करा सकते हैं ?
उत्तर-   जी हाँ, यदि आपके घर में कोई पालतू पशु हो तो उसकी दिनचर्या, संस्मरण, व्यवहारों आदि का वर्णन संस्कृत  भाषा में लिखे होने पर सचित्र प्रकाशित किये जाते है।

प्रश्न-    अपनी रचना या लेख के साथ और क्या-क्या चीज भेजा जाना आवश्यक है ?
उत्तर-  आपके अपने ई-मेल से लेख या रचना भेजा गया हो। 2. लेखक का फोटो, संक्षिप्त परिचय तथा विषयवस्तु से  सम्बद्ध छाया चित्र साथ में भेजा जाना चाहिए। 3. यह पत्रिका किसी के यशोगान या प्रचार का माध्यम नहीं हैं। अतः इस प्रकार के लेखों/रचनाओं से बचना चाहिए

प्रश्न-     क्या हम अपने क्षेत्र के विद्यालयों/संस्कृत प्रचार में संलग्न संस्थाओं का परिचय भेज सकते हैं ?
उत्तर-   आप अपने क्षेत्र के उन सभी विद्यालयों, संस्थाओं, व्यक्तियों के बारे में लेख दे सकते हैं। जिनकी जानकारी पाकर   लोग उनसे जुड़ सके। क्षेत्र विशेष में संस्कृत शिक्षा की स्थिति आदि पर भी आप लेखन कर सकते हैं।

प्रश्न-     क्या इसमें हास्य विनोद, चुटकुले, सुभाषित आदि भी प्रकाशित किये जाते हैं ?
उत्तर-   जी इतना ही नहीं आप अपना संस्मरण, यात्रा वृतान्त, आदतें भी संस्कृत में लिख कर भेजे इसमें अवश्य  प्रकाशित किया जायेगा। जैसे-आपने अपने कुछ मित्रों के साथ कोई सुखद यात्रा की हो, उस सुखद संस्मरण  को संस्कृत में लिख कर चित्र के साथ भेजे। हास्य विनोद चुटकुले आदि तो प्रकाशित किये ही जाते हैं

प्रश्न-    मेरे क्षेत्र में स्थानीय मेला लगता हैं। कभी वह धार्मिक उत्सव का मेला होता हैं तो कभी वाणिज्यिक। क्या मैं उन  मेलों के बारे में अपना लेख आपके पत्रिका में प्रकाशनार्थ भेज सकता हूँ।
उत्तर-   आप जो कुछ भी कल्पना कर सकते हों, जो कुछ भी घटित हो रहा हो उसका सचित्र वर्णन भेज सकते हैं। शर्त  यह हैं कि उसकी भाषा संस्कृत होनी चाहिये यदि आपके क्षेत्र में कोई मधुमक्खी पालन, बकरी, मत्स्य आदि  पालन का व्यवसाय किया हो उसके बारे में भी आप पूरी जानकारी संस्कृत भाषा के माध्यम से भेज सकते हैं।

प्रश्न-    क्या यह पत्रिका डाक द्वारा मेरे पते पर आ सकती है? इसे मंगवाने के लिए क्या करना होगा और क्या 
       चार्ज  लगेगा?  बहुश: शुभकामना: महोदय, एषा पत्रिका अस्माकं पार्श्वे कथम् आगमिष्यति ।।
उत्तर-   यह एक ई- पत्रिका है। इसे आप अपने मोबाइल/लैपटाप/कम्प्यूटर पर ऑनलाइन पढ सकते हैं। इसे कागज पर  प्रिंट नहीं किया जाता। इस पत्रिका का कोई मान्य नियम नहीं हैं। न ही यह किसी भी सर्जनात्मक परिधि से बंधा है। बस भाषा अश्लील न हो, किसी को ठेस न पहुंचाने वाली हो, इस प्रकार समस्त रचनाओं का यहां स्वागत है।

संस्कृतसर्जना के वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री तथा इसके अनुप्रयोग की विधि पढने के लिए लिंक पर चटका लगायें।

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संस्कृत सर्जना ई-पत्रिका

   संस्कृत सर्जना ई-पत्रिका में आपकी रचनाएँ प्रकाशनार्थ सादर आमन्त्रित हैं। यह एक त्रैमासिक पत्रिका है जो  प्रत्येक वर्ष के जनवरीअप्रैलजुलाई एवं अक्टूबर में संस्कृतहिन्दी भाषा में प्रकाशित होती है। इसे  संस्कृतसर्जना पर संस्थापित किया गया है।

 सर्जनात्मक ई- पत्रिका के उद्देश्य

1- संस्कृत सर्जकों (लघुकथा, एकांकी, गीत, गजल, निबन्ध, यात्रावृतान्त आदि लेखकों) को मंच प्रदान              करना तथा उनकी प्रतिभा को पाठकों के सम्मुख लाना ।
2. संस्कृत के नूतन लेखकों, अध्येताओं, छात्रों में भाषा विकास के साथ-साथ सर्जनात्मकता विकसित करना।
3. संस्कृत एवं संस्कृतेतर जगत् को संस्कृत विद्या की जीवन्तता, इसमें निगूढ़ तत्व से परिचित करना तथा       समसामयिक, ज्ञानवर्द्धक तथा जनोपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना।
4. ऐसे समस्त ज्ञान सम्पदा को प्रकाश में लाना, जो संस्कृत विद्या व भाषा के प्रसार-प्रचार में उपयोगी हो।

विषयवस्तु

1. संस्थाओं,संगठनों द्वारा आयोजित संस्कृत, पालि, प्राकृत विषयक कार्यक्रमों की सूचना।
2. संस्कृत भाषा के सम्वर्धन में प्रयुक्त किये जा रहे नवाचारों की रूपरेखा, तदर्थ निर्मित योजनाओं पर
     वैचारिक निबन्ध।
3. समसामयिक संस्कृत से सम्बद्ध घटनाक्रमों, संस्कृत से जुडी समकालीन समस्या उसके निदान पर विशेषज्ञ
     विद्वानों के आलेख।
4. नवीन मौलिक प्रकाशित पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय।
5. संस्कृत के दिग्गज विद्वानों, प्रचार-प्रसार में संघर्षरत बुद्धिजीवियों के साक्षात्कार  ।
6. संस्कृत को बढ़ावा देने हेतु कार्यरत विविध संस्थाओं, संगठनों के क्रियाकलापों तथा उनके  बारे में               
    परिचय।
7. संस्कृत के पुरस्कार प्राप्त विद्वानों की जीवनी,संस्मरण ।
8. पर्यटन स्थल , यात्रावृतान्त, तीर्थ परिचय, संस्कृत से जुडी ऐतिहासिक घटना।
9. संस्कृत लघुकथा, कविता, गजल, गीत. एकांकी नाटक, मनोरंजक सामग्री ।
10. बालोपयोगी सामग्री,जो बच्चों में संस्कृत भाषा के विकास में सहायक हो।
11. जनोपयोगी विषयः- यथा ज्योतिष, कर्मकाण्ड, धर्मशास्त्र,आयुर्वेद।
12. पुरस्कार,पदभार ग्रहण, रोजगार, निधन आदि की सूचना।
13. अन्तर्जाल पर उपलब्ध संस्कृत विषयक सामग्री की जानकारी देना।
14 पाठकों द्वारा प्राप्त पत्र,संदेश इसमें प्रकाशित किये जायेगें।
इसमें लगभग 32 से 40 पृष्ठ होंते हैं ।  पत्रिका सचित्र व आकर्षक है ।  इस पत्रिका में प्रकाशित श्रेष्ठ सर्जना को वर्ष में एक बार चयन कर पुरस्कृत करने पर विचार किया जा सकता है।
प्रत्येक लेख पर स्वत्वाधिकार लेखकों एवं सम्पादकों का रहेगा । पत्रिका में प्रकाशित लेख से सम्पादक/प्रकाशक का सहमत होना आवश्यक नहीं होगा। तथ्यों की प्रामाणिकता एवं मौलिकता हेतु लेखक स्वयं उत्तरदायी होंगें। Kruti Dev 010 फाण्ट में अथवा देवनागरी यूनीकोड में अपनी रचना की टंकित प्रति sanskritsarjana@gmail.com पर प्रेषित करने का अनुरोध है।
सम्पादक सहित समस्त पद परिवर्तनीय एवं अवैतनिक हैं। न्यायिक परिवाद क्षेत्र लखनऊ होगा।
ई. पत्रिका में अन्ताराष्ट्रीय मानकों का अनुपालन किया गया है । 
                                                                                               भवदीया
                                                                                               उषा किरण
                                                                                            
                                                                                                                 
                                                                              
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