पाणिनीय पद-शिल्प (भाग-2): अव्ययों का उपसर्गवत् व्यवहार — गति-संज्ञा और क्रिया-चमत्कार
1. मुख्य सूत्र और नियम: भूषणेऽलम्
महर्षि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में स्पष्ट निर्देश दिया है:
(अष्टाध्यायी 1.4.64 — भूषणे विद्यमानं अलमित्यव्ययं गतिसज्ञकं स्यात्।)
यह सूत्र कहता है कि जब 'अलम्' अव्यय का प्रयोग 'भूषण' (सजाना या अलंकृत करना) के अर्थ में किया जाता है, तब उसकी 'गति' संज्ञा हो जाती है। व्याकरण शास्त्र में जिन अव्ययों की गति संज्ञा होती है, वे क्रियापद के साथ ठीक उपसर्गों की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं और क्रिया के मूल अर्थ को सर्वथा परिवर्तित कर देते हैं।
2. गति-संज्ञक 'अलम्', 'पुरः' तथा 'स्वी' के व्यावहारिक उदाहरण
गति संज्ञा होने के कारण ये अव्यय 'कृ' (करणे) धातु के साथ मिलकर नित्य समास (कु-गति-प्रादि समास) बनाते हैं और इनके रूप इस प्रकार सिद्ध होते हैं:
-
अलङ्करोति (अलम् + कृ): अलंकृत करना / सजाना।
(कृ करणे धातु तथा अलम् गति-अव्यय। रूप: उभयपदी लट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन में 'अलङ्करोति' बनता है।) -
पुरस्करोति (पुरः + कृ): आगे बढ़ाना / आदर या पुरस्कार देना।
('पुरश्च' सूत्र से पुरः अव्यय की गति संज्ञा होकर कृ धातु के योग में विसर्ग को 'स' होकर पुरस्करोति बनता है।) -
तिरस्करोति (तिरः + कृ): तिरस्कार करना / ओझल करना।
('तिरोऽन्तर्धौ' सूत्र से अंतर्धान या अनादर अर्थ में गति संज्ञा होती है।) -
स्वीकरोति (स्वी + कृ): अपनाना / अंगीकार करना।
('ऊर्यादिच्विचश्च' सूत्र से अभूततद्भाव अर्थ में च्वि प्रत्यय लगकर गति संज्ञा होती है और स्वीकरोति पद निष्पन्न होता है।)
🔍 गति-संज्ञक अव्यय और उनके क्रिया-परिवर्तन का विन्यास
| गति-संज्ञक अव्यय | क्रियापद रूप | परिवर्तित विशिष्ट अर्थ |
|---|---|---|
| अलम् (भूषण अर्थ में) | अलङ्करोति | सुसज्जित करना / आभूषणों से सजाना |
| पुरः (अग्रभाग अर्थ में) | पुरस्करोति | सम्मानित करना / किसी को आगे लाना |
| तिरः (अनादर/ओझल अर्थ में) | तिरस्करोति | अपमानित करना / अवहेलना करना |
| स्वी (अंगीकरण अर्थ में) | स्वीकरोति | अपनाना / स्वीकार करना |
'स्वीकरोति' की सिद्धि और च्वि-प्रत्यय का चमत्कार
1. अभूततद्भावे कृभ्वस्तियोगे च्विः
(अष्टाध्यायी 5.4.50)
- यह सूत्र कहता है कि जो वस्तु पहले वैसी नहीं थी, उसका अब वैसा हो जाना (अभूततद्भाव) प्रकट करने के लिए 'कृ', 'भू' and 'अस्' धातुओं के योग में मूल शब्द के आगे 'च्वि' (व्) प्रत्यय लगाया जाता है।
- उदाहरण: जो वस्तु पहले 'स्व' (अपनी) नहीं थी, उसे अब 'स्व' (अपनी) बना लेना ही 'स्वीकरण' या 'स्वीकृति' है। यहाँ मूल प्रातिपदिक शब्द 'स्व' (सर्वनाम/संज्ञा) है, कोई अव्यय नहीं।
2. अकार का ईकार में परिवर्तन: अस्य च्वौ
(अष्टाध्यायी 7.4.32)
यह सूत्र नियम बनाता है कि च्वि प्रत्यय परे होने पर शब्द के अंतिम अकार (अ) को ईकार (ई) में बदल दिया जाता है। इसी नियम के प्रभाव से 'स्व' का अंतिम अकार बदलकर 'स्वी' हो जाता है।
प्रक्रिया: स्व + च्वि → स्वी
3. च्व्यन्त रूपों की गति संज्ञा: गतिश्च
(अष्टाध्यायी 1.4.60)
पाणिनि का यह सूत्र स्पष्ट करता है कि च्वि प्रत्यय से बने हुए ये जो रूप होते हैं (जैसे— स्वी, शुक्ली, कृष्णी), इनकी भी क्रिया के योग में 'गति संज्ञा' हो जाती है। गति संज्ञा होने के कारण ये रूप क्रियापद के साथ ठीक उपसर्गों की तरह ही व्यवहार करने लगते हैं। इसी कारण से व्याकरण में 'स्वीकृतिः' तथा 'स्वीकरोति' जैसे साधु पद निष्पन्न होते हैं।
निष्कर्षतः, पाणिनीय तंत्र में क्रिया से पूर्व जुड़ने वाला हर शब्द उपसर्ग नहीं होता। चाहे 'अलम्' जैसे अव्यय की भूषण अर्थ में गति संज्ञा हो, या 'स्व' जैसे प्रातिपदिक की च्वि-प्रत्यय के बाद 'गतिश्च' से गति संज्ञा हो— ये सभी पाणिनीय व्याकरण की उस अनुपम और वैज्ञानिक पद-शिल्प व्यवस्था को प्रकट करते हैं जहाँ अर्थ के अनुकूल शब्दों का आंतरिक स्वरूप और कार्य स्वतः निर्धारित होता है। यहाँ यह लेख पूर्ण हुआ।





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