संस्कृत शिक्षण पाठशाला 3

                   विभक्तिश्चैव धात्वंशस्तद्धितः कृदिति क्रमात् ।
                 चतुर्धा प्रत्ययः प्रोक्तः टाबादिभिः पञ्चधाऽथवा ।।  शब्दशक्तिप्रकाशिका                                                           

                                              कृदन्त भाग        पाठ 14

      धातु से दो प्रकार के प्रत्यय होते हैं। तिङ् और कृत् । तिङ् प्रत्यय धातुओं से लकारों के स्थान पर होते हैं। धातुओं से होने वाले शेष प्रत्यय कृत्  संज्ञा वाले होते हैं। धातुओं से कृत् प्रत्यय लगने से वह कृदन्त बन जाता है । इसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। तिङ् प्रत्यय से भिन्न प्रत्ययों की कृत् संज्ञा होती है। इस कृत् प्रत्यय से निष्पन्न कृदन्त को चार भागों में बांटा गया है- कृत्य, पूर्वकृदन्त, उत्तरकृदन्त और उणादि। 
वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् सूत्र के अनुसार कृदन्त में उत्सर्ग (नित्य) शास्त्र को अपवाद शास्त्र के द्वारा विकल्प से बाधा जाता है। अर्थात् उत्सर्ग सूत्र भी लगेगा और विशेष सूत्र भी। कृदन्त में तव्यत्, तव्य, अनीयर् , यत्, ण्वुल् और तृच् प्रत्यय परस्पर असरूप अर्थात् असमान हैं । इस प्रकार धातुओं से होने वाले प्रत्ययों के वैकल्पिक रूप देखने को मिलेंगें। जैसे अजन्त धातु से होने वाले यत् प्रत्यय को बाधकर ऋदन्त एवं हलन्त धातु  से ण्यत् प्रत्यय होता है। 
अब यह देखना है कि कौन - कौन कृत् प्रत्यय कर्ता, कर्म और भाव में होगें। इसके लिए सूत्रों में व्यवस्था दी गयी है। 
धातुओं के साथ कृत् प्रत्यय के योग करने पर संज्ञाविशेषण या अव्यय पद बनते हैं।
सामान्य नियम
1. साधारणतः कृत् प्रत्यय कर्ता (संज्ञा) अर्थ में होते हैं। 'तृच्', 'क्तिन्', 'ण्वुल्', 'ल्युट्आदि प्रत्यय का कर्ता में होते हैं।
2.  'शतृ', 'शानच्' , 'तव्यत्' , 'अनीयर्' , 'यत्प्रत्यय का जब धातु के साथ योग होने पर विशेषणवाची पद बनते हैं।
3.  धातुओं से 'क्त्वा', 'ल्यप्' , 'तमुन्प्रत्ययों के योग होने पर अव्ययवाची पद बनते हैं।
विशेष नियम
कर्तरि कृत् कृत् प्रत्यय कर्ता में होते हैं।
तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः - धातु से कृत्य प्रत्यय, क्त तथा खलर्थ प्रत्यय भाव तथा कर्म में होते हैं। इसमें क्त प्रत्यय पूर्व कृदन्त में तथा खलर्थ प्रत्यय उत्तर कृदन्त में आते हैं।
तव्यत्तव्यानीयरः  धातु से तव्यत् , तव्य और अनीयर् प्रत्यय भाव तथा कर्म में होते हैं।  कृत्य प्रत्यय का कभी-कभी बहुलता से होते हैं। प्रसंग आने पर कौन प्रत्यय किसमें होंगें इसकी जानकारी दी जाएगी। इससे आप शुद्ध वाक्य निर्माण करना सीख सकेंगें।
1.  तव्यत् प्रत्यय का प्रयोग  विधिलिङ् लकार के स्थान में होता है ।
2. कर्म में प्रत्यय होने के कारण यह कर्म का विशेषण होता है। इसकी क्रिया कर्म के अनुसार होगी।
3. इसका पुल्लिंग में राम के समान, स्त्रीलिंग में रमा के समान तथा नपुंसक लिंग में फल के समान रूप बनते हैं।
4. ये प्रत्यय प्रायः सभी धातुओं से होते हैं।
5. अकर्मक धातु से तव्यत् प्रत्यय से युक्त क्रिया प्रथमान्त, नपुंसक लिंग तथा एकवचन में होगी।
6. जिस धातु के अंत में अम् हो यथा गम् तथा जिस धातु के अंत में आ हो जैसे पा उसमें तव्य, अनीयर् प्रत्यय सीधे जुड़ते हैं।
7. इकारान्त, ईकारन्त धातु के इ, ई को गुण होकर ए, उकारान्त धातु के उ को गुण होकर ओ तथा ऋकारन्त धातु के ऋ को गुण होकर अर् हो जाता है।
8. जिस धातु के अंतिम वर्ण व्यंजन हो तथा उससे पूर्व का स्वर वर्ण इ, , या ऋ हो तो उसे भी गुण हो जाता है।
9. खल प्रत्यय जिस अर्थ में होता है उसी अर्थ में होने वाले प्रत्यय को खलर्थ प्रत्यय कहते हैं।

      इस पाठ में हम अधोलिखित प्रत्ययों का अध्ययन करेंगें।

ण्वुल्,
ण्यत्,
क्त्वा,
णमुल्
तव्य / तव्यत् ,
क्यप्,
क्त,

अनीयर्,
शतृ
क्तवतु,

यत्,
शानच्
तुमुन्,


जिन्होंने व्याकरण का अध्ययन गहराई से नहीं किया हो, वे  सोच रहे होंगें कि ण्वुल् प्रत्यय में ण् तथा ल् को हटाने तथा वु को शेष बचाने जैसी लम्बी प्रक्रिया करने की क्या आवश्यकता हैसीधे वु आदेश कर देते। ऐसे छात्रों को संज्ञा, इत्संज्ञा, लोप आदि व्याकरण के कुछ सामान्य स्वभाव समझना चाहिए। इसे समझने पर वे प्रातिपदिक या धातु से आने वाले प्रत्ययों में वर्णों की इत्संज्ञा, लोप या अन्य संज्ञा के कारण के स्वरूप में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझ सकते हैं। वे यह जान सकते हैं कि जब पठ् + क्त = पठितः, पा + क्त = पीतः  बन सकता है तो धा + क्त = धीतः क्यों नहीं? जबकि धा + क्त = हितः बनता है।

कृदन्त के ण्वुल्, तव्य / तव्यत् ,  अनीयर् यत् , ण्यत् क्यप् शतृ,   शानच्,   क्त्वा क्तक्तवतुतुमुन्णमुल् प्रत्ययों के कारण होने वाले लोप, आगम, विकार और प्रयोग विशिष्टता को समझ लेने पर कठिन से कठिन प्रश्न को सुलझाया जा सकता है। यहाँ पर कृदन्त प्रत्यय के महत्वपूर्ण प्रत्ययों से परिचय कराया जा रहा है। कृदन्त का क्रमबद्ध तथा विशिष्ट अध्ययन के लिए आप अधोलिखित लिंक पर चटका लगायें।


ण्वुल् प्रत्यय

ण्वुल्तृचौ धातु से ण्वुल् और तृच् प्रत्यय होते हैं। कर्तरि कृत् सूत्र के नियम से ण्वुल् प्रत्यय कर्ता अर्थ में होगा। तिङ् और शित् से भिन्न होने का कारण ण्वुल् प्रत्यय की आर्धधातुक संज्ञा होती है। अतः आर्धधातुक संज्ञा के कारण होने वाले अनेक कार्य ण्वुल् प्रत्यय में होते हैं। यथा- अस्तेर्भूः से अस् धातु को भू आदेश, ब्रुवो वचिः से ब्रु के स्थान पर वच् आदेश आदि।
ण्वुल् में ण् की चुटू से तथा ल् की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हो जाने पर वु शेष रहता है। युवोरनाकौ सूत्र से वु के स्थान में अक आदेश हो जाता है। कृ + वु, वु को अक, कृ + अक, ण्वुल् में णकार की इत्संज्ञा होने के कारण कृ के ऋ को वृद्धि आर् हुआ, कार् + अक = कारक । प्रातिपदिक संज्ञा सु विभक्ति आने पर सु का रुत्व विसर्ग होकर कारकः बनेगा। कारकः का अर्थ होगा- करने वाला।
उदाहरण- 
कृ + ण्वुल् = कारकः       पठ् + ण्वुल् = पाठकः       पाठि + ण्वुल् = पाठकः       शिक्ष + ण्वुल् = शिक्षकः       दृश् + ण्वुल् = दर्शकः     भुज् + ण्वुल् = भोजकः       वह् + ण्वुल् = वाहकः           अश् + ण्वुल् = आशिका 
अस् + ण्वुल् = भावकः    ब्रू + ण्वुल् =  वाचकः

 तव्यत् , तव्य और अनीयर्

 तव्यत् में त् की इत्संज्ञा तथा लोप होता है। लोप होने के पश्चात् तव्यत् और तव्य प्रत्यय से बने शब्द एक समान होते हैं। धातु से उक्त प्रत्यय होने से निम्नलिखित रूप बनेंगें।
                                                                                  
 धातु      विधिलिङ्       तव्यत् (पु.)        तव्यत् (स्त्री.)     तव्यत् (नपुं.)           अनीयर्
गम्       गच्छेत्           गन्तव्यः              गन्तव्या             गन्तव्यम्              गमनीयम्
पठ्       पठेत्              पठितव्यः             पठितव्या           पठितव्यम्            पठनीयम्
लिख्     लिखेत्            लेखितव्यः            लेखितव्या         लेखितव्यम्
खादृ      खादेत्            खादितव्यः           खादितव्या         खादितव्यम्
पा        पिबेत्             पातव्यः               पातव्या            पातव्यम्
नी        नयेत्               नेतव्यः               नेतव्या              नेतव्यम्
गा        गायेत्              गातव्यः              गातव्या             गातव्यम्
दृश्       पश्येत्              द्रष्टव्यः               द्रष्टव्या               द्रष्टव्यम्
दा        दद्यात्              दातव्यः              दातव्या             दातव्यम्
कृ         कुर्यात्              कर्तव्यः               कर्तव्या             कर्तव्यम्
पृच्छ्     पृच्छेत्               प्रष्टव्यः               प्रष्टव्या              प्रष्टव्यम्  
विश्      उपविशेत्          ----------      ----------              उपवेष्टव्यम्
इन प्रत्ययों के बारे में अधिक जानकरी लेने तथा अभ्यास करने के लिए तव्यत् अनीयर् पर चटका लगायें।

यत् प्रत्यय

अजन्त धातु से यत् प्रत्यय होता है। यत् प्रत्यय का अर्थ होता है योग्य । जैसे- पा पाने धातु से यत् = पेयम् (पीने योग्य )
यत् प्रत्यय में त् की इत्संज्ञा तथा लोप होने से य शेष बचता है। यत् एक आर्धधातुक प्रत्यय है अतः धातुओं में निम्न परिवर्तन होगें। यह प्रत्यय भाव तथा कर्म में होता है।
1.  जिस धातु के अंत में इक् प्रत्याहार के वर्ण होंगें उसे गुण हो जाएगा। जैसे- चि + य = चेयम्
2.  यत् प्रत्यय का आदि वर्ण य है अतः यह यादि प्रत्यय है। यादि होने के कारण वान्तो यि प्रत्यये से धातु के
     अंतिम ओ वर्ण को अव्  तथा औ वर्ण को आव् आदेश होगा।
     जैसे- नियम 1 लू + य, लू के ऊ को गुण ओ , लो + य,
    नियम 2 लो के ओ को अव् आदेश ल् + अव् + य = लव्यम्
3.  आकारन्त धातु के आ को इ हो जाता है। जैसे - पा + यत्, पी + यपे + य = पेयम्
विशेष नियम
4.  जिस धातु के अंत में पवर्ग हो तथा अंतिम पवर्ग के ठीक पूर्व का वर्ण अ हो तो ऐसे धातु से भी यत् प्रत्यय होता है।
     जैसे - शप् + यत्शप् + य = शप्यम्, लभ् + य = लभ्यम्, रम् + य = रम्यम्
5. तक्, शस्, चत्, जन्, शक्, सह् इतने हलन्त धातु से यत् प्रत्यय होता है। तक्यम्, शस्यम् रूप बनेगा।
6. हन् धातु से यत् प्रत्यय विकल्प से होता है तथा हन् को वध् आदेश हो जाता है। जैसे हन् + य, वध् + य = वध्यः
7. उपसर्ग से रहित गद्, मद्, चर्, और यम् धातु से यत् प्रत्यय होता है। गद् + य = गद्यम् । धातु के पूर्व उपसर्ग
     रहने  पर ण्यत् होगा जैसे प्रगाद्यम्
अभ्यास-
 क्षि + यत् =                    ध्या + यत् =                   श्रु + यत् =                     गम् + यत् =                       दा + यत् =                   यम् + यत् =                  आ + सह् + यत्

ण्यत् प्रत्यय

"ऋहलोर्ण्यत्' से ऋवर्णान्त तथा हलन्त धातुओं से ण्यत् प्रत्यय होता है।  
ण्यत् प्रत्यय में 'णकारकी 'चुटूसे तथा 'तकारकी 'हलन्त्यम्सूत्र से इत् संज्ञा करके तस्य लोपः से लोप हो जाता है। ण्यत् में य शेष रहता है। इस प्रत्यय में णकार की इत्संज्ञा होने के कारण यह णित् प्रत्यय है। जिस प्रत्यय में णकार की इत्संज्ञा होती है, उसके पूर्व के स्वर वर्ण की वृद्धि हो जाती है।
 जैसे 
कार्यम्। कृ धातु से ऋहलोर्ण्यत् सूत्र से ण्यत् प्रत्यय हुआ। कृ + ण्यत् हुआ। यहाँ ण्यत् के 'ण्की 'चुटूसे तथा 'त्की 'हलन्त्यम्सूत्र से इत् संज्ञा करके तस्य लोपः से लोप हो जाता है। कृ + य शेष बचा। प्रत्यय के णकार की इत्संज्ञा होने से उसके पूर्व के स्वर वर्ण, अर्थात् ऋ को वृद्धि आ हो गयी। का + य बना। आ को बाद रपर होकर कार्यम् रूप सिद्ध हुआ। इसी तरह अन्य उदाहरण देखें- 
हृ + ण्यत् =  हार्यम् । धृ + ण्यत् = धार्यम् । 
वच्  + ण्यत् =  वाक्यम्।  पच् + ण्यत् =   पाक्यम्


क्‍यप् प्रत्यय

एतिस्‍तुशास्‍वृदृजुषः क्‍यप्
, स्तु, शास्, वृ, दृ, जुष् तथा वृत्, वृध् आदि अन्यान्य धातुओं से क्यप् होता है। क्यप् में ककार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और पकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा और दोनों का तस्य लोपः से लोप होकर केवल य शेष बचता है। पित् करने का फल हृस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक् का आगम है और कित् करने का फल क्ङिति च से गुण का निषेध करना है।  क्यप् प्रत्यय में य शेष रहता है।
नोट- क्यप् प्रत्यय में पकार की इत्संज्ञा होती है अतः यह पित् प्रत्यय है। पित् कृत् प्रत्यय के परे ह्रस्वान्त धातु में तुक् (त् ) हो जाता है। इसके नियम इस प्रकार है-
ह्रस्‍वस्‍य पिति कृति तुक्
पित् कृत् के परे रहने पर हृस्व वर्ण को तुक् का आगम होता है।
तुक् में उकार और ककार की इत्संज्ञा होती है। त् बचता है। कित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ के नियम से अन्तावयव होकर तकार बैठेगा।
उदाहरण -
इत्यः। इण् गतौ। गत्यर्थक इ धातु से अचो यत् से यत् प्रत्यय की प्राप्ति थी, उसे बाधकर एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप् से क्यप् हुआ, अनुबन्धलोप हुआ, इ + य में हृस्वस्य पिति कृति तुक् से तुक्  आगम हुआ, अनुबन्धलोप होकर कित् होने के कारण हृस्व वर्ण इ के (बाद में) अन्तावयव  बैठा, इत्य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुं, रूत्वविसर्ग करके इत्यः बना। यदि यत् होता तो तुक् न हो पाता और गुण होकर अय् आदेश होकर अयः ऐसा अनिष्ट रूप बनने लगता।
स्तुत्यः। ष्टुञ् स्तुतौ, स्तु धातु से भी इसी तरह क्यप्, तुक्, सु, रूत्वविसर्ग करके स्तुत्यः रूप बनता है।
शास इदङ्हलोः
अङ् या हलादि कित् और ङित् परे रहते शास् धातु की उपधा को हृस्व इकार आदेश हो।
 उदाहरण -  शिष्‍यः । वृत्‍यः । आदृत्‍यः । जुष्‍यः ।।
शिष्यः। (शासु अनुशिष्टौ) शास् धातु से ण्यत् प्राप्त था उसे बाधकर एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप् से क्यप् हुआ। शास् + य में शास इदङ्हलोः से शास् के आकार को इकार आदेश हुआ शिस् + य हुआ। शिस् के इकार से परे सकार को शासिवसिघसीनां च से षत्व होकर शिष्य बना। प्रातिपदिकसंज्ञा, सुविभक्ति, रूत्वविसर्ग होकर शिष्यः सिद्ध हुआ।
वृ से क्यप् और तुक् करके वृत्यः, आ पूर्वक दृ से आदृत्यः बना । जुष् से क्यप् होकर जुष्यः बनता है।
मृजेर्विभाषा
मृज् धातु से क्यप् प्रत्यय विकल्प से हो।
मृज्‍यः ।।
मृज्यः। मृज् से विकल्प से क्यप् हुआ । क्यप् में ककार तथा पकार का अनुबन्ध लोप होने पर य शेष रहा। मृज् + य हुआ। क्यप् का य कित् होने के कारण क्ङिति च से लघूपधगुण नहीं हुआ- मृज्यः।
क्यप् ने होने के पक्ष में ऋहलोर्ण्यत् से ण्यत् होकर मृजेर्वृद्धिः से वृद्धि और चलोः मृज्यः। क्यप् न होने के पक्ष में ऋहलोर्ण्यत् से ण्यत् होकर मृजेर्वृद्धिः से वृद्धि और चजोः कु घिण्ण्यतोः से जकार को कुत्व होकर मार्ग्यः बनता है।
उदाहरण -
इन-क्यप् ( य ) = इन् तुक् य < इन् त् य = इत्यः।
ऐसे ही स्तु- स्तुत्यः । शास्- शिष्यः । वृ- वृत्यः । आ + दृ - आदृत्यः । जुष् - जुष्यः । वृत्यम्, वृध्यम् आदि। 
इत्‍यः । स्‍तुत्‍यः । शासु अनुशिष्‍टौ ।।

विशेष-राज्ञा सोतव्यः वा राजा ( सोमः ) सूयते । यहाँ (राजन् + सू+क्यप् )=राजसूयः, राजसूयम् । सरति आकाशे इति-सूर्यः । ( सृ+क्यप् ) । मृषा + वद् + क्यप् = मृषोद्यम् । रुच्+क्यप्-रुच्यम् ।। गुप + क्यप् = गुप्यम् ( सोना चाँदी से भिन्न धन )। कृष्ट स्वयमव। पच्यन्ते = कृष्टपच्याः ( कृष्ट + पच् + क्यप् )। न व्यथते=अव्यथ्यः। (न+व्यथ्+क्यप् )।
शतृ औप शानच् प्रत्यय
लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे--3.2.124
प्रथमा विभक्ति को छोड़कर शेष विभक्तियों में समानाधिकरण होने पर लट् के स्थान पर शतृ तथा शानच् प्रत्यय होते हैं।

मुख्य स्मरणीय नियम

1. शतृशानच् प्रत्यय लट् लकार के स्थान पर होता है ।
2. परस्मैपदी धातुओं से शतृ प्रत्यय तथा आत्मनेपदी धातु से शानच् प्रत्यय होता है।
3. उभयपदी धातुओं से शतृ और शानच् दोनों प्रत्यय होते हैं।
4. यह प्रत्यय लट् के स्थान में होता हैअतः यह वर्तमानकालिक प्रत्यय है। 
5.  यह प्रत्यय प्रथमा विभक्ति को छोड़कर अन्य विभक्तियों में लगता है। 
6. कहीं कहीं (विकल्प से) प्रथमा समानाधिकरण में भी ये दोनों प्रत्यय होते हैं।
7. शतृ में अन् तथा शानच् में आन या मान शेष रहता है। 
8. इसमें वही लिंग होगा जो विशेष्य में होगा । अतः इनके विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगोंसभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं। 
9. जो धातु जिस गण का होउस गण का विकरण भी धातु के साथ प्रयोग होता हैजैसेःपठ्- शप्- शतृपठत् । पठ् धातु भ्वादि गण का हैइसमें शप् विकरण होता है । इस पेज पर सभी गण हो के विकिरण दिए गए हैं शतृ और शानच् प्रत्यय लगाने के पहले यह देखना चाहिए कि वह धातु किस गण का है और उसमें कौन सा विकिरण लगेगा।
10. शतृ प्रत्ययान्त शब्द का रूप पुल्लिङ्ग में पठत्‌ के समान,स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान तथा नपुंसक लिंग में जगत्‌ के समान रूप चलेगें।

 इसमें मूल धातु के साथ  इस प्रकार रूप बनेगा । 
धातु                  पुल्लिंग          स्त्रीलिंग          नपुंसकलिंग             अर्थ
पा    (पीना)       पिबन्             पिबन्ती                पिबत्                पीता हुआ/ पीती हुई
घ्रा (सूंघना)        जिघ्रन्               जिघ्रन्ती             जिघ्रत्               सूंघता हुआ/ सूंघती हुई    
वाक्यों द्वारा उदाहरण-
पिबन्तं बालकं पश्य। माता जिघ्रन्तीं बालिकां आह्वयति।
शतृ प्रत्ययान्त शब्दों के स्त्रीलिंग में  नुमागम का सामान्य नियम
चुंकि पहले ही कहा जा चुका है कि शतृ प्रत्यय विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगोंसभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं और उसके तीनों लिंगों का उदाहरण भी दिखाया गया है। इन उदाहरणों के स्त्रीलिंग में पिबन्ती, लिखन्ती, खेलन्ती आदि रूप बनता है। अहं खेलन्तीं बालिकां पश्यामि। मैं खेलती हुई बालिका को देखता हूँ। इसमें न् तथा ई वर्ण अतिरिक्त रूप से दिखायी दे रहा है। यह न् तथा ई किस- किस अवस्था में किस सूत्र से लगेगा इसपर विचार करेंगें। 
 पा धातु में शतृ प्रत्यय लगने से पिबत् रूप बना। जब यह किसी स्त्रीलिंग के विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाएगा तो इसे भी स्त्रीलिंग बनाना पड़ेगा। स्त्री लिंग बनाने के लिए स्त्री प्रत्यय लगाया जाता है। शतृ प्रत्यय से कौन सा स्त्री प्रत्यय लगता है इस पर विचार किया जाता है-

उगितश्च 4.1.6

उगित अन्त में हो जिस प्रातिपदिक के ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है। शतृ प्रत्यय में अंतिम स्वर ऋ की इत्संज्ञा होती है। यह उक् (उ ऋ ऌ ) प्रत्याहार में आता है अतः पठत् उगित् है। ऐसे उगित प्रतिपदिक पठत् से ङीप् प्रत्यय होगा । ङीप् में ङ् तथा प् की इत्संज्ञा लोप हो जाता है। ई शेष बचता है। पठत् +  = पठती रूप बना। अब बची बात पठन्ती में न् के आने की इसके लिए सूत्र है-
शप्श्यनोर्नित्यम् 7.1.81
शप् और श्यन् (विकरण/प्रत्यय) के अवर्ण से परे जो शतृ का अवयव तदन्त को नित्य ही नुमागम होता है, शी और नदी संज्ञक (ङीप् के ईकार की नदी संज्ञा होती है) प्रत्यय बाद में हो तो।
भ्वादि, चुरादि में शप् का अकार और दिवादि में श्यन् के यकारोत्तरवर्ती अकार तथा तुदादि में श का अकार उससे परे शतृ प्रत्यय रहने पर शतृ के अवयव अत् को नुमागम होगा। यहाँ तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य के अनुसार त् के पूर्व नुम् का आगम होगा। यह सूत्र आच्छीनद्योर्नुम् द्वारा विहित वैकल्पिक नुम् का बाधक है।  इसलिए इन गणों के धातुओं में नित्य नुमागम  होगा। 
भ्वादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में- 
भू + शप् + शतृ+ ङीप्
भो + अ + अत् + ई
भव + अ + अ नुम् त् + ई
भवन्ती होगा। विस्तृत प्रक्रिया दिवादि में देख लें।

दिवादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में- 
तुष् + लट्लटः शतृ सूत्र से लट् को शतृ आदेश हुआ।
तुष् + श्यन् + शतृ             दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन्
तुष् + य + अत्                 अतो गुणे से पररूप एकादेश
तुष्यत् 
तुष्यत् + ,                    नपुंसक लिंग प्रथमा / द्वितीया द्विवचन
तुष्यत् + शी,                    नपुंसकाच्च से  औ को शीशी के श् का अनुबन्ध लोप
तुष्यत् +                       शप्श्यनोर्नित्यम् से शतृ के अत् को नुम्   
तुष्य + नुम् + त् +          नुम् के उकार तथा मकार को अनुबन्ध लोप
तुष्यन्त् +  = तुष्यती         तुष्यन्ती नगरे रामः अशोकश्च निवसतः।  संतुष्ट होने वाले दो नगरों में राम और अशोक निवास करता है।         
स्त्रीत्व की विवक्षा (स्त्रीलिंग) में
तुष्यत्
तुष् + ङीप् ,    उगितश्च से ङीप् तथा शप्श्यनोर्नित्यम् से शतृ के अत् को नुम् का आगम हुआ। तुष्य + नुम् + त् + , नुम् के उ तथा मकार की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ। न् बचा। तुष्यन्त् +  = तुष्यती बनेगा। संतुष्ट होने वाली महिला। 

चुरादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में-
चुर् + णिच् + शप् + शतृ + ङीप्
चोरय् + अ + अत् + ई
चोरय् + अ + अ नु + त् + ई
चोरयन्ती सिद्ध हुआ।

आच्छीनद्योर्नुम्
अवर्णान्त अंग से परे जो शतृ का अवयव तदन्त अंग को नुम् का आगम विकल्प से हो, शी और नदी (ङीप् प्रत्यय का ई) परे रहते।
तुदादि गण के धातुओं में विकल्प से नुम् का आगम होगा। अतः इसके शतृ प्रत्ययान्त स्त्रीलिंग के प्रतिपदिक में विकल्प से नुम् का आगम होकर तुदन्ती तथा तुदति इस प्रकार दो रूप बनेंगे। 
इसी प्रकार जहाँ औ विभक्ति को शी आदेश होगा वहाँ भी नुमागम होगा। उपर्युक्त 4 गणों को छोड़कर शेष गणों के धातुओं से नुमागम नहीं होता। 
ध्यातव्य है कि आच्छीनद्योर्नुम् के अनुसार जिस धातु के अंत में अ या आ हो ऐसे अङ्ग को नुम् का आगम करता है अतः अदादि गण के कुछ धातुओं में भी नुमागम होता है -
अदादिगण
इस गण में शप् विकरण / प्रत्यय का लोप हो जाता है, अतः अदन्त धातु बहुत ही कम मिलते हैं। परन्तु कुछ धातु स्वतः अदन्त होते हैं उनमें नुमागम विकल्प से होता है जैसे -
या + शप् + शतृ + ङीप्
या + 0 + शतृ + ङीप्
यहाँ शप्-प्रत्यय का लुक् हो जाने पर भी 'या' धातु आकारान्त अङ्ग है। इसलिए उसमे “ आच्छीनद्योर्नुम् ” इस सूत्र से नुमागम विकल्प से होता है।
या + नुम् +शतृ + ई
या + न् + अत् + ई
यान्ती सिद्ध होगा।
विकल्प में 'यातीरूप बनेगा।
           यान्ती  यान्त्यौ  यान्त्यः
           याती   यात्यौ   यात्यः
वा भा ष्णा श्रा द्रा प्सा पा रा ला दा ख्या प्रा मा आदि आकारान्त धातु हैं। ऐसे धातुओं से नुमागम विकल्प से होगा। जुहोत्यादि गण के अदन्त धातु को नुमागम का निषेध हो जाता है। देखें सूत्र-  नाभ्यस्तच्छतुः। शतृ प्रत्यय से सम्बन्धित और अधिक जानकारी के लिए इन सूत्रों को देखें- (1) वा नपुंसकस्य (2) सम्बोधने च 3.2.125 (3) लक्षणहेत्वोः क्रियायाः 3.2.126 (4) इङ्धार्योः शत्रकृच्छ्रिणि (5) द्विषोऽमित्रे (6) सुञो यज्ञसंयोगे (7) अर्हः प्रशंसायाम् (8)  ऌटः सद्वा (9) पूरणगुणसुहितार्थ-- (10) न लोकाव्ययनिष्ठा.. (11) विदेः शतुर्वसुः 
शानच् प्रत्यय वाले धातुओं से "मुक्" का आगम
अदादि तथा जुहोत्यादि गण को छोड़कर शेष गणों के ण्यन्त--सन्नन्त धातुओं से जब "शानच्" (आन) प्रत्यय होगातब "आने मुक्" से "आन" से पूर्व "मुक्" का आगम होगा । "मुक्" का "म्" शेष रहता है। 
जैसेः---पचमानःमोदमानःआदि ।
अदादि. और जुहोत्यादिगण की धातुओं के साथ सीधा-सीधा "आन" ही जोड देते हैं । जैसेः--सन्दिहानव्याचक्षाणःसञ्जिहानः ।
लृट् स्थानीय "शानच्" प्रत्ययान्त के रूप भी इसी प्रकार से चलेंगे । जैसेः--
पुल्लिंग में -यतिष्यमाणःस्त्री लिंग में -यतिष्यमाणानपुंसक लिंग में -यतिष्यमाणम् ।
"शानच्" प्रत्यय दो वाक्यों को जोड़ने का भी काम करता है । जैसे---
लताः कम्पन्ते । लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।
कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।

शानच् प्रत्यय
याच् (मांगना)    याचमानः          याचमाना          याचमानम्         मांगते हुए/ हुई
शीङ् (सोना)       शयानः              शयाना              शयानम्             सोते हुए/ सोती हुई
 शानच्‌ प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिङ्ग में रामस्त्रीलिङ्ग में रमा व नपुंसक लिंग पुस्तक के समान रूप चलेगें। इस प्रत्यय के प्रयोग के लिए प्रत्येक गण के विकरण का स्मरण करना चाहिए।

यह लृट् प्रत्यय के स्थान पर भविष्यत् काल में विकल्प से होता है। लृटः सद्वा 3.3.14
क्त्वा / ल्यप् प्रत्यय 

क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग

प्रथम नियम
जब दो धातुओं (कार्यों) का कर्ता एक हो तो पूर्वकालिक क्रिया से क्त्वा प्रत्यय होता है।
समानकर्तृकयोः पूर्वकाले 3/4/21
समानकर्तृकयोः धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात्।
क्त्वा प्रत्यय के क्त्वा में "त्वा" शेष रहता हैक् हट जाता है।
क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः-              दा + क्त्वा = दत्वा
                                                पठ् + क्त्वा = पठित्वा
                                                तृ + क्त्वा = तीर्त्वा
द्वितीय नियम
अलं कृत्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा 3/4/18  
निषेधवाची अलं तथा खलु शब्द यदि किसी क्रिया के पूर्व में हो तो उस क्रिया में भी क्त्वा प्रत्यय होता है।
 ध्यान देने योग्य प्रयोग अथवा वैकल्पिक प्रयोग
कुछ छात्र भ्रमित हो जाते हैं कि लिखित्वा प्रयोग सही है या लेखित्वा। अधोलिखित नियम के अनुसार दोनों प्रयोग सही हैं।
रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च 1/2/26
इवर्ण तथा उवर्ण हो उपधा में जिसके ऐसे रलन्त धातुओं से परे इट् सहित क्त्वा एवं सन् विकल्प से कित् होते  है।
इट् सहित क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः- लिख्+क्त्वा = लिखित्वालेखित्वा
                              गुप् + क्त्वा = गोपित्वागुप्त्वा
                              क्षुध् + क्त्वा = क्षुधित्वाक्षोधित्वा

क्त्वा प्रत्यय के अन्य उदाहरण-
कृ + क्त्वा = कृत्वा                      नम् + क्त्वा = नत्वा                     दृश् + क्त्वा = दृष्ट्वा                 
खाद् + क्त्वा = खादित्वा             पा + क्त्वा = पीत्वा                     स्मृ + क्त्वा = स्मृत्वा
प्रच्छ् + क्त्वा = पृष्ट्वा                ज्ञा + क्त्वा = ज्ञात्वा                    हन् + क्त्वा = हत्वा                    
पूज् + क्त्वा = पूजयित्वा              नृत् + क्त्वा = नर्तित्वा                 यज् + क्त्वा = इष्ट्वा
वप् + क्त्वा = उप्त्वा                    कथ् + क्त्वा = कथयित्वा             अस् + क्त्वा = भूत्वा  
                 
 क्त्वा प्रत्यय के अभ्यास के लिए यहाँ क्लिक करें।


आगे और पढ़ें  ----    वच्+क्त्वा = उक्त्वा का प्रयोग कैसे होता है?

क्तक्तवतु प्रत्यय

क्तक्तवतु निष्ठा
क्तक्तवतु प्रत्यय में ततवत् शेष रहता है। यह प्रत्यय भूतकालिक क्रिया के अर्थ में वर्तमान धातु से क्त और क्तवतु प्रत्यय होता है।
नियम-1
 ‘क्त‘ प्रत्यय  भाव और कर्म में होता हैं।
क्तवतु प्रत्यय कर्ता में होता हैं।
उदाहरण - मया हसितम्भक्तेन कृष्णः स्तुतःविष्णुः विश्वं कृतवान्।
नियम-2
 गत्यर्थकअकर्मक एवं  श्लिष्शीड्स्थाआस्वस्जन्रूहजृ- इतने (उपसर्ग पूर्वक सकर्मक) धातुओं से भाव और कर्म के साथ कर्ता में भी ‘क्त‘ होता है।
उदाहरण - गृहं गतः। बालः भीतः। प्रियामाश्लिष्टः। हरिः शेषमधिशयितः। वैकुण्ठमधिष्ठितः। कृष्णमुपासितः।                    हरिदिनमुपोषितः। लक्ष्मणो भरतम् अनुजातः। यानमारूढ़ः। विश्वमनुजीर्णः।
नियम-3
इच्छार्थकज्ञानार्थक तथा पूजार्थक धातुओं से वर्तमानकाल में ‘क्त‘ प्रत्यय होता है। उदाहरण - मम मतःइष्टः। मम बुद्धंविदितमस्ति। पूजितःअर्चितः आदि।
तुमुन् प्रत्यय
को अथवा के लिए को प्रकट करने के लिए तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। तुमुन् में  उन् हट जाता है एवं तुम् शेष रहता है । तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग अव्यय की तरह होता है। अतः इसके रूप नहीं चलते हैं।
उदाहरण
धातु                  तुमुन् प्रत्ययान्त रूप                     अर्थ
कथ् (कहना)       कथितुम्                                     कहने के लिए
स्था (ठहरना)     स्थातुम्                                      ठहरने के लिए
विशेष-
कालवाची शब्दों के योग में भी तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग होता है। जैसे- भोक्तुं कालः समागतः।
ईच्छार्थक धातुओं के योग में भी तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग होता है। जैसे- गृहं गन्तुं इच्छामि

णमुल् प्रत्यय

आभीक्ष्ण्ये णमुल् च 
हमेशानिरन्तरबार बार के भाव को आभीक्ष्ण्य कहते हैं। आभीक्ष्ण्य (पौनःपुन्य) अर्थ में समानकर्तृक दो धातुओं में पूर्वकालिक धातु से णमुल्' (और क्त्वा) होता है।
आभीक्ष्ण्य द्योतित पर समान कर्तृक (बार - बार एक समान की जाने वाली क्रिया) पूर्व कालिक विद्यमान धातु से परे क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय हो। णमुल् में णकार, उकार तथा लकार की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है । अम् शेष बचता है। 
आप सोच रहे होंगें कि णमुल् में जब अम् ही शेष रखना था तब णकार, उकार तथा लकार की इत्संज्ञा तथा लोप करने की क्या आवश्यकता थी? सीधे अम् प्रत्यय ही कर देते। णमुल् प्रत्यय में अकार की इत्संज्ञा होने से यह णित् हो जाता है। 
णित् होने का फल 
(1)यह है कि जिस धातु से णमुल् प्रत्यय होगा वहाँ यदि इगन्ताङ्ग होगा तब अचो णिति 7.2.115 से इगन्ताङ्ग वृद्धि होगी। 
(2) अत उपधायाः 7.2.116 से उपधा अकार को वृद्धि होगी। 
(3) हनस्तोऽचिण्णलोः 7.3.32 से हन् को तकार आदेश होगा। 
(4) आतो युक् चिण्कृतोः 7.3.33 से आकारान्त अङ्ग को युक्-आगम होगा। 
(5) नोदात्तोपदेशस्य. 7.3.34 से उदात्तोपदेश एवं मान्त ('चमि' को छोड़कर) को उपधावृद्धि नहीं होगी।(6) जनिवध्योश्च 7.3.35 से जन् तथा वध् को (7.2.116 से) उपधा-वृद्धि नहीं होती है।
 मकारान्त कृत् प्रत्यय बन जाने का फल
1.  कृन्मेजन्तः 1.1.39 से कृदन्त मकारान्त की अव्यय संज्ञा तथा अव्ययादाप्सुपः 2.4.82 से सुप् का लोप। 
उदाहरण - 
1. स्मारं स्मारम् में स्मृ धातु से णमुल् प्रत्यय करने पर स्मृ + अम् ।  णमुल् में णकार की इत्संज्ञा होने कारण यह णित् हैअतः णित्व होने के कारण अचो ञ्णिति सूत्र से ऋ की वृद्धि और होगी आर् । स्म + आर् = स्मार् बना । स्वादि विभक्ति की उत्पत्ति प्रक्रिया पूर्ण कर स्मारं रूप बना लें। ध्यातव्य की स्मारम् में मकारांत कृत् प्रत्यय हैऐसा शब्द कृन् मेजन्तः सूत्र के नियम के अनुसार अव्यय हो जाता है। 
नित्य - वीप्सयोः 
नित्यता और वीप्सा के अर्थ पद को द्वित्व होता है। ( व्याप्त होने की इच्छा को वीप्सा कहते हैं) यह निरंतरता तिङन्त और अव्यय संज्ञक कृदन्त की क्रिया की बताई जाती है । स्मारं को नित्यता या निरंतरता के अर्थ में होने के कारण इस पद को द्वित्व हो गया।

2. भुज् + णमुल् = भोजम् (पुगन्तलघू. 7.3.86 से उपधागुण) आभीक्ष्ण्य में धातु को द्वित्व होता है।

प्रयोग- भोज भोजं व्रजति (खा खाकर चलता है)

3. पा + णमुल् = पायम् (आतो युक्. 7.3.33 से युक्)

प्रयोग- पायं पायं व्रजति (पी पीकर चलता है)। क्त्वा के पक्ष में, भुक्त्वा व्रजति, पीत्वा व्रजति। 

णमुल् प्रत्यय के बारे में विशेष- 

न यद्यनाकाक्षे 3.4.23

समानकर्तृक दो धातुओं में से पूर्वकालिक धात्वर्थ में 'यत्' शब्द के उपपद होने पर आभीक्ष्ण्ये णमुल् च 3.4.22 से होनेवाले णमुल् एवं क्त्वा नहीं होते हैं, यदि अन्य वाक्य की आकाङ्क्षा न रखनेवाला वाक्य हो।

प्रयोग- यद् अयं भुङ्क्ते ततः पठति 'यह बार-बार पहले खाता है, पीछे पढ़ता है'। यद् अयम् अधीते ततः शेते यह पहले बारबार पढ़ता है तब सोता है'। यहाँ प्रथम में भोजन अथवा द्वितीय में पठन करनेवाला वाक्य अन्य किसी वाक्य की आकाङ्क्षा नहीं रखता है। अतः णमुल नहीं हुआ।

3. विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु 3.4.24

अग्रे, प्रथम एवं पूर्व उपपद हों तो समानकर्तृक पूर्वकालिक धातु से विकल्प से क्त्वा एवं णमुल् होता है। 


संस्कृत के तुलनार्थक प्रत्यय
1. दो की तुलना में तर और दो से अधिक के बीच की तुलना में तमप् प्रत्यय का प्रयोग होता है । जैसेः-
अयम् एतयोरतिशयेन लघुः-- लघुतरः,
अयम् एषामतिशयेन लघुः--लघुतमः।
इसी प्रकार युवन्-       युवतर,        युवतमः
विद्वस्-        विद्वत्तर,       विद्वत्तमः
प्रच्-           प्राक्तर,        प्राक्तमः
धनिन्-        धनितरः
गुरू-          गुरूतरः         गुरूतमः आदि।
2. क्रिया और क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होने वाले अव्ययों से तर और तम प्रत्यय होने पर उनका रूप तराम् और तमाम् हो जाता है। जैसे- 
पचतितराम्पचतितमाम्ः उच्चैस्तराम्उच्चैस्तमाम्ः नितराम्नितमाम्ः सुतराम्आदि। किन्तु विशेषण                 शब्द उच्चैस्तरः (अधिक ऊँचा) ही होगा।
3. दो की तुलना में इयस् और बहुतों की तुलना में इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह दोनों प्रत्येक गुणवाचक शब्द से            होते हैं। इयस् और इष्ठन् प्रत्यय होने पर टि का लोप हो जाता है। जैसे-
लघु शब्द से लघीयस् लघिष्ठः  
पटु शब्द से पटीयस्पटिष्ठः
महत्- महीयस्महिष्ठआदि।
यहाँ पर क्रमशः उ तथा अत् (टि) का लोप (अदृश्य) हो गया है।
अपवाद- पाचक से पाचकतरपाचकतम ही रूप बनेगें।
4. मत्वर्थक प्रत्यय विन् और मत् का तथा तृ प्रत्यय का लोप हो जाता हैबाद में यदि ईयस् तथा इष्ठ प्रत्यय हो तो। यहाँ भी टि लोप का नियम लगेगा। जैसे
मतिमत् (बुद्धिमान)--मतीयस्मतिष्ठः
मेधाविन्--मेधीयस्मेधिष्ठः
धनिन्--धनीयस्धनिष्ठः
कर्तृ--करीयस्करिष्ठ (अतिशयेन कर्ता)स्तोतृ--स्तवीयस्स्वविष्ठ। इसी प्रकार स्त्रग्विन् (मालाधारी) से                  स्रजीयस् और स्रजिष्ठ रूप होगें।
5. साधारणतः तर और तम प्रत्यय से पहले शब्द के अंतिम ई और ऊ का विकल्प से ह्रस्व हो जाता है।
 जैसे—  
श्री + तरा = श्रीतरा-श्रितराश्रीतमा-श्रितमा,
घेमूतरा-घेमुतरा (अधिक लँगड़ा)घेमूतमा-घेमुतमाइत्यादि।
ईयस् इष्ठ और ईमन् प्रत्यय बाद में होने पर ह्रस्व ऋ के स्थान पर र हो जाता है। शब्द के प्रारंभ में कोई            व्यंजन अक्षर होना चाहिए। जैसे-
शब्द                               ईयस्                             इष्ठ
            कृश (दुर्बल)                    क्रशीयस्                        क्रशिष्ठ
दृढ (बलवान्)                 द्रढीयस्                          द्रढिष्ठ
परिवृढ (मुख्य)                परिव्रढीयस्       परिव्रढिष्ठ
पृथु (विशालचौड़ा)           प्रथीयस्                      प्रथिष्ठ
भृश (अधिक)                  भ्रशीयस्                        भ्रशिष्ठ
मृदु (कोमल)                    भ्रदीयस्                       भ्रदिष्ठ

6 टिप्‍पणियां:

  1. सम्मानीय, आपके ब्लॉग से मुझे संस्कृत के किसी भी टॉपिक को समझने में बहुत मदद मिली. प्रिंट की सुविधा होती तो सरल हो जाता. पर इतने के लिए भी साधुवाद.
    शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. यहाँ सामग्री में निरन्तर परिवर्तन होता है। अभी सभी पाठ लिखा नहीं जा सका। आपसे अनुरोध है कि आप ऑनलाइन पढ़ते रहें। जब सभी पाठ पूर्ण हो जायेंगें उसके बाद इसका पीडीएफ डाउनलोड मीनू बटन में दे दिया जाएगा।

      हटाएं
  2. महोदय बहुत ही अच्छी जानकारी दी है। साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. अति उत्तम आपका ह्रदय पूवॅक धन्यवाद
    आपको शत् शत् प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
  4. मुझे णिच् के वर्तमान काल के प्रत्यय मिल सकते है करता?

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. णिच्‌ प्रत्यय का प्रयोग दो अर्थों में होता है। स्वार्थ में तथा प्रेरणा देने के अर्थ में। मैंने संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 https://sanskritbhasi.blogspot.com/p/2.html में चुरादि गण में होने वाले णिच्‌ प्रत्यय के बारे में चर्चा की है। उसका उदाहरण- चोरयति, क्षालयति, प्रेषयति, कथयति आदि है। इस णिच् प्रत्यय का वही अर्थ है, जो धातु का होता है। अर्थात् यह स्वार्थ में णिच् प्रत्यय किया गया है। इस णिच् का धातु से अलग कोई भी अर्थ नही है।
      दूरसा णिच् प्रेरणार्थक है। जब कर्ता किसी क्रिया को करने के लिए अन्य को प्रेरित करता है तब उस क्रिया को प्रेरणार्थक क्रिया कहते है। प्रेरणार्थक क्रिया का उदाहरण – रामः अध्यापेन बालकं पाठयति। यहाँ राम बालक को पढ़ाने के लिए अध्यापक को प्रेरित कर रहा है। याद ऱखें- प्रेरणार्थक वाक्यों में दो कर्ता होते हैं। एक प्रेरणा देने वाला (प्रयोजक), दूसरा क्रिया करने वाला (प्रयोज्य) । जब सकर्मक क्रिया होती है तब प्रयोज्य में तृतीया विभक्ति होती है और प्रयोजक में प्रथमा विभक्ति जैसे - रामः अध्यापेन बालकं पाठयति । यहाँ राम प्रेरित कर रहा है अतः यह प्रयोजक है। इसमें प्रथमा विभक्ति हुई तथा जिसे काम करने के लिए प्रेरणा दी जा रही हो वह प्रयोज्य होता है। इसमें तृतीया विभक्ति होती है। इसके लिए पाणिनि का एक सूत्र है- तत्प्रयोजको हेतुश्च - प्रेरणार्थक में धातु के आगे णिच् प्रत्यय का प्रयोग होता है। अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जायें-
      https://sanskritbhasi.blogspot.com/2018/09/blog-post_26.html
      गम् - गमयति । दम् - दमयति । नम् - नमयति । व्यथ् – व्यथयति
      व्यथ् - व्यथयति । त्वर् - त्वरयति । रम् - रमयति । शम् - शमयति । घट - घटयति

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