संस्कृत शिक्षण पाठशाला 4 (संस्कृत में कृदन्त प्रत्यय)


संस्कृत में कृदन्त प्रत्यय संस्कृत शिक्षण पाठशाला 4 जगदानन्द झा

                             

कृदन्त परिचय (Introduction to Kridant)

संस्कृत व्याकरण में प्रत्ययों का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। जैसा कि आचार्य भट्टोजिदीक्षित और अन्य आचार्यों ने स्पष्ट किया है, धातुओं (Verbs) के अंत में जुड़ने वाले प्रत्ययों को 'कृत्' प्रत्यय कहा जाता है, और इनसे बनने वाले शब्दों को 'कृदन्त' (कृत् + अन्त) कहते हैं। इनका प्रयोग संज्ञा, विशेषण, और अव्यय पद बनाने के लिए किया जाता है।

विभक्तिश्चैव धात्वंशस्तद्धितः कृदिति क्रमात् ।
चतुर्धा प्रत्ययः प्रोक्तः टाबादिभिः पञ्चधाऽथवा ।।
                                                                                                       — शब्दशक्तिप्रकाशिका

👉 यहाँ पर कृदन्त प्रकरण के महत्वपूर्ण प्रत्ययों से आपका विस्तृत परिचय कराया जा रहा है। कृदन्त के प्रत्ययों का क्रमबद्ध तथा विशिष्ट अध्ययन करने के लिए आप अधोलिखित (नीचे दिए गए) प्रत्यय पर चटका (क्लिक) लगायें:

📖 कृदन्त विषय-सूची (प्रत्यय पर चटका लगाकर सीधे उस पाठ पर जाएं):

✨ कृदन्त परिचय Introduction to Kridant (पाठ ३१) ✨

संस्कृत व्याकरण में धातुओं (Verbs) से मूलतः दो प्रकार के प्रत्यय होते हैं— १. तिङ् प्रत्यय और २. कृत् प्रत्यय

जिस प्रकार धातुओं से दसों लकारों के स्थान पर 'तिङ्' प्रत्यय (तिप्, तस्, झि आदि) होते हैं, उसी प्रकार धातुओं से होने वाले अन्य प्रत्ययों की 'कृत्' संज्ञा होती है। पाणिनीय नियमानुसार— तिङ् प्रत्यय से भिन्न प्रत्ययों की कृत् संज्ञा होती है।

🎯 प्रातिपदिक संज्ञा एवं पद निर्माण:
धातुओं से कृत् प्रत्यय लगने पर जो नया शब्द निष्पन्न होता है, वह 'कृदन्त' (कृत् + अन्त) कहलाता है। कृदन्त होने के कारण 'कृत्तद्धितसमासाश्च' सूत्र से इसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है और इसके बाद सुँ-औ-जस् आदि विभक्तियाँ लाकर वाक्य प्रयोग के योग्य संज्ञा, विशेषण या अव्यय पद बनाए जाते हैं।
📦 कृदन्त प्रत्ययों का चतुर्धा वर्गीकरण:
इस कृत् प्रत्यय से निष्पन्न होने वाले कृदन्त प्रपञ्च को मुख्य रूप से चार भागों में बाँटा गया है:
  1. कृत्य प्रक्रिया (Kratya)
  2. पूर्वकृदन्त (Poorva-Kridant)
  3. उत्तरकृदन्त (Uttara-Kridant)
  4. उणादि (Unadi)
⚖️ उत्सर्ग-अपवाद व्यवस्था (वैकल्पिक रूप नियम):

कृदन्त प्रकरण में "वाऽसरूपोऽस्त्रियाम्" (३/१/९४) सूत्र का बहुत बड़ा अधिकार है। इस नियम के अनुसार कृदन्त में उत्सर्ग (नित्य/सामान्य) शास्त्र को अपवाद (विशेष) शास्त्र के द्वारा विकल्प से बाधा जाता है। अर्थात् यहाँ अपवाद (विशेष) सूत्र भी लगेगा और उत्सर्ग (सामान्य) सूत्र भी काम करेगा।

असरूप प्रत्ययों का नियम: कृदन्त में तव्यत्, तव्य, अनीयर्, यत्, ण्वुल् और तृच् प्रत्यय परस्पर 'असरूप' (असमान रूप वाले) हैं। इस कारण धातुओं से होने वाले प्रत्ययों के कई वैकल्पिक रूप देखने को मिलते हैं।

जैसे: अजन्त (स्वरान्त) धातुओं से होने वाले सामान्य 'यत्' प्रत्यय को बाधकर, ऋदन्त (ऋकारान्त) एवं हलन्त धातुओं से विशेष रूप में 'ण्यत्' प्रत्यय का विधान होता है।

💡 अब अग्रिम विधा में हमें यह देखना है कि इनमें से कौन-कौन से कृत् प्रत्यय 'कर्ता' (Active Voice) अर्थ में होते हैं तथा कौन-कौन से प्रत्यय 'कर्म' (Passive Voice) और 'भाव' (Impersonal Voice) के अर्थ में प्रयुक्त होते हैं। इसके लिए व्याकरण सूत्रों में जो विशिष्ट व्यवस्था दी गई है, आइए उसे समझते हैं...

📋 कृदन्त के सामान्य नियम (General Rules)

धातुओं के साथ कृत् प्रत्ययों का योग करने पर जो संज्ञा, विशेषण या अव्यय पद बनते हैं, उनके सामान्य नियम निम्नलिखित हैं:

१. कर्ता (संज्ञा) अर्थ में:
साधारणतः कृत् प्रत्यय कर्ता अर्थ में होते हैं। धातु के साथ जब 'तृच्', 'क्तिन्', 'ण्वुल्', 'ल्युट्', 'णिनि', 'अण्', 'अच्', 'क', 'ट', 'खच्', 'क्विप्' आदि प्रत्ययों का योग होता है, तब कर्तावाची (संज्ञा) पद बनते हैं।
२. विशेषणवाची पद निर्माण में:
जब धातुओं के साथ 'शतृ', 'शानच्', 'तव्यत्', 'अनीयर्', 'यत्' आदि प्रत्ययों का योग होता है, तब उनसे निष्पन्न होने वाले शब्द वाक्य में विशेषणवाची पद बनते हैं।
३. अव्ययवाची पद निर्माण में:
धातुओं से जब 'क्त्वा', 'ल्यप्' और 'तुमुन्' प्रत्ययों का योग होता है, तब उनसे बनने वाले कृदन्त शब्द अव्ययवाची पद कहलाते हैं (अर्थात् इनके रूप तीनों लिंगों और सभी विभक्तियों में सदा एक समान रहते हैं, बदलते नहीं हैं)।

📋 कृदन्त के विशेष नियम (Special Rules)

वाक्य निर्माण को शुद्ध और व्याकरण सम्मत बनाने के लिए महर्षि पाणिनि द्वारा प्रतिपादित विशेष नियम और अधिकार व्यवस्था निम्नलिखित है:

🎯 कर्तरि कृत् (३/४/६७): यह अधिकार सूत्र व्यवस्था देता है कि साधारणतः कृत् प्रत्यय 'कर्ता' (Subject) के अर्थ में ही प्रयुक्त होते हैं।
🎯 तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः (३/४/७०): धातु से होने वाले कृत्य प्रत्यय, क्त प्रत्यय तथा खलर्थ प्रत्यय केवल 'भाव' (Impersonal) तथा 'कर्म' (Passive) के अर्थ में ही होते हैं। इनमें से 'क्त' प्रत्यय पूर्वकृदन्त में तथा 'खलर्थ' प्रत्यय उत्तरकृदन्त के अंतर्गत आते हैं।
🎯 तव्यत्तव्यानीयरः (३/१/९६): धातु से होने वाले तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय भी सदैव 'भाव' तथा 'कर्म' के ही अर्थ में प्रयुक्त होते हैं।
(विशेष: कृत्य प्रत्यय कभी-कभी बहुलता से भी होते हैं। प्रसंग आने पर कौन सा प्रत्यय किस अर्थ में होगा, इसकी विस्तृत जानकारी दी जाएगी, जिससे आप शुद्ध वाक्य निर्माण करना सीख सकेंगे।)

📋 कृदन्त के विशेष नियम (Special Rules)

वाक्य निर्माण को शुद्ध बनाने के लिए महर्षि पाणिनि द्वारा प्रतिपादित विशेष नियम और अधिकार व्यवस्था:

🎯 कर्तरि कृत् (३/४/६७): कृत् प्रत्यय साधारणतः 'कर्ता' (Subject) अर्थ में होते हैं।
🎯 तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः (३/४/७०): कृत्य, क्त और खलर्थ प्रत्यय केवल 'भाव' तथा 'कर्म' में होते हैं। इनमें 'क्त' पूर्वकृदन्त में तथा 'खलर्थ' उत्तरकृदन्त में आते हैं।
🎯 तव्यत्तव्यानीयरः (३/१/९६): तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय भाव तथा कर्म में होते हैं।
(विशेष: कृत्य प्रत्यय कभी-कभी बहुलता से भी होते हैं। प्रसंगानुसार इसकी जानकारी दी जाएगी ताकि आप शुद्ध वाक्य निर्माण सीख सकें।)

🛠️ तव्यत् प्रत्यय एवं कृदन्त वाक्य-निर्माण के १० मुख्य बिंदु:

१. तव्यत् प्रत्यय का प्रयोग विधिलिङ् लकार (चाहिए/योग्य) के स्थान में होता है।
२. कर्म में प्रत्यय होने के कारण यह कर्म का विशेषण होता है। इसकी क्रिया कर्म के अनुसार होगी।
३. शब्द रूप: पुल्लिंग में राम के समान, स्त्रीलिंग में रमा के समान तथा नपुंसकलिंग में फल के समान रूप बनते हैं।
४. ये प्रत्यय प्रायः सभी धातुओं से होते हैं।
५. अकर्मक धातु से तव्यत् प्रत्यय युक्त क्रिया हमेशा प्रथमान्त, नपुंसकलिंग तथा एकवचन में होगी।
६. जिस धातु के अंत में 'अम्' हो (जैसे- गम्) तथा जिसके अंत में 'आ' हो (जैसे- पा), उसमें तव्य, अनीयर् सीधे जुड़ते हैं
७. इकारान्त, ईकारान्त धातु के इ, ई को गुण 'ए', उकारान्त के उ को गुण 'ओ' तथा ऋकारान्त के ऋ को गुण 'अर्' होता है।
८. जिस धातु के अंत में व्यञ्जन हो तथा उससे पूर्व का स्वर इ, उ, या ऋ हो तो उसे भी गुण हो जाता है
९. खल् प्रत्यय जिस अर्थ में होता है, उसी अर्थ में होने वाले प्रत्यय को खलर्थ प्रत्यय कहते हैं।
१०. विशेषण वाचक शब्द: 'ण्वुल्', 'तृच्’, ‘शतृ', 'तव्यत्', 'अनीयर्', 'यत्', 'ण्यत्', 'क्यप्', 'क्त' आदि प्रत्यय से बने शब्द विशेषण वाचक होते हैं।
यथा: कृ → कारक (ण्वुल्/अक), कर्तव्यः (तव्यत्) | भिद् → भेदकः, भेद्यः, भिन्नः इत्यादि।

🤔 एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा: अनुबन्ध, इत्संज्ञा और लोप क्यों?

जिन्होंने व्याकरण का अध्ययन गहराई से नहीं किया हो, वे सोच रहे होंगे कि 'ण्वुल्' प्रत्यय में 'ण्' तथा 'ल्' को हटाने और केवल 'वु' को शेष बचाने जैसी लम्बी प्रक्रिया करने की क्या आवश्यकता है? महर्षि पाणिनि सीधे 'वु' का ही विधान कर देते!

💡 ऐसे जिज्ञासु छात्रों को संज्ञा, इत्संज्ञा, अनुबन्ध और लोप आदि व्याकरण के कुछ सामान्य स्वभाव और नियमों को समझना चाहिए। इन्हें समझ लेने पर वे प्रातिपदिक या धातु से आने वाले प्रत्ययों में वर्णों की इत्संज्ञा या अन्य संज्ञा के कारण स्वरूप में होने वाले जादुई परिवर्तनों को आसानी से समझ सकते हैं।

इन्हीं नियमों के कारण हमें यह पता चलता है कि जब—

  • पठ् + क्त = पठितः बनता है,
  • पा + क्त = पीतः बन सकता है,
  • तो फिर धा + क्त = धीतः क्यों नहीं बनता? जबकि धा + क्त करने पर पाणिनीय नियमानुसार 'हितः' रूप सिद्ध होता है।

कृदन्त के ण्वुल्, तव्य/तव्यत्, अनीयर्, यत्, ण्यत्, क्यप्, शतृ, शानच्, क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् आदि प्रत्ययों के कारण होने वाले लोप, आगम, विकार और उनके प्रयोग की विशिष्टता को एक बार अच्छी तरह समझ लेने पर परीक्षा के कठिन से कठिन प्रश्न को भी चुटकियों में सुलझाया जा सकता है।

१. ण्वुल् प्रत्यय (पाठ ३१)

📌 प्रधान सूत्र: "ण्वुल्तृचौ" (३/१/१३३)

नियम: धातु से ण्वुल् और तृच् प्रत्यय होते हैं। 'कर्तरि कृत्' सूत्र के नियम से ण्वुल् प्रत्यय हमेशा 'कर्ता' (Subject) के अर्थ में होता है। इसकी अभिव्यक्ति व्यवहार में 'वाला' अर्थ (जैसे— करने वाला, पढ़ने वाला) के लिए की जाती है।

⚙️ आर्धधातुक संज्ञा एवं विशिष्ट कार्य:
तिङ् और शित् से भिन्न होने के कारण ण्वुल् प्रत्यय की 'आर्धधातुक संज्ञा' होती है। इसी आर्धधातुक कार्य के कारण धातु के स्वरूप में अनेक परिवर्तन होते हैं। यथा—
  • 'अस्तेर्भूः' सूत्र से 'अस्' धातु को 'भू' आदेश हो जाता है।
  • 'ब्रुवो वचिः' सूत्र से 'ब्रू' धातु के स्थान पर 'वच्' आदेश हो जाता है।
🧪 वर्ण परिवर्तन की वैज्ञानिक प्रक्रिया:
  1. ण्वुल् प्रत्यय में से 'ण्' की 'चूटू' सूत्र से तथा 'ल्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'वु' शेष बचता है।
  2. पाणिनीय सूत्र 'युvोरनाकौ' के नियम से इस 'वु' को 'अक' आदेश हो जाता है।
  3. णमुल् के समान इसमें भी 'ण' की इत्संज्ञा होने के कारण धातु के पूर्व स्वर को वृद्धि आदेश हो जाता है।

यथा रूप-सिद्धि: कृ + वु (अक) → णकार की इत्संज्ञा के कारण 'कृ' के ऋ को वृद्धि 'आर्' हुआ → कार् + अक = कारक। इसकी प्रातिपदिक संज्ञा होकर सु विभक्ति आने पर सु का रुत्व-विसर्ग होकर 'कारकः' पद बनता है (अर्थ: करने वाला)।

प्रमुख उदाहरण (Examples):

(सभी १० प्रामाणिक उदाहरण— मोबाइल पर पूरी टेबल देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग प्रक्रिया कृदन्त पद (रूप) अर्थ
कृ (करना) कृ + ण्वुल् (ऋ को वृद्धि 'आर्') कारकः करने वाला
पच् (पकाना) पच् + ण्वुल् (अ को वृद्धि 'आ') पाचकः पकाने वाला
पठ् (पढ़ना) पठ् + ण्वुल् (अ को वृद्धि 'आ') पाठकः पड़ने वाला
पाठि (पढ़ाना / णिच्) पाठि + ण्वुल् पाठकः पढ़ाने वाला
शिक्ष (सीखना/सिखाना) शिक्ष + ण्वुल् (इ को गुण/वृद्धि) शिक्षकः सिखाने वाला
हृ (हरना/चुराना) हृ + ण्वुल् (ऋ को वृद्धि 'आर्') हारकः हरने वाला
दृश् (देखना) दृश् + ण्वुल् (ऋ को गुण/वृद्धि 'अर्') दर्शकः देखने वाला
भुज् (भोगना/खाना) भुज् + ण्वुल् (उ को गुण 'ओ') भोजकः खाने/भोगने वाला
वह् (ढोना/ले जाना) वह् + ण्वुल् (अ को वृद्धि 'आ') वाहकः ढोने वाला
अश् (खाना/व्याप्त होना) अश् + ण्वुल् (स्त्रीलिंग रूप) आशिका खाने वाली
अस् (होना) अस् → भू + ण्वुल् (भू को वृद्धि 'भाव्') भावकः होने वाला / उत्पादक
ब्रू (बोलना) ब्रू → वच् + ण्वुल् (व को वृद्धि 'वाच्') वाचकः बोलने वाला

२. तृच् प्रत्यय (पाठ ३१)

📌 प्रधान सूत्र: "ण्वुल्तृचौ" (३/१/१३३)

नियम: इस प्रत्यय का प्रयोग भी ण्वुल् के समान ही 'वाला' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए होता है। जैसे— √कृ + तृच् = कर्तृ → कर्ता (करने वाला)।

🧪 वर्ण परिवर्तन एवं व्याकरण प्रक्रिया:
  • तृच् प्रत्यय में से चकार 'च्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'तृ' शेष बचता है।
  • इस प्रत्यय का प्रयोग करने पर ऋकारान्त प्रातिपदिक का निर्माण होता है।
  • धातु स्वर गुण नियम: तृच् प्रत्यय का प्रयोग होने पर धातु के स्वर को गुण आदेश होता है। जैसे— कृ धातु के 'ऋ' स्वर को 'अर्' गुण आदेश होकर 'कर्तृ' शब्द बनता है (यहाँ 'तृ' प्रत्यय का है)।
👥 त्रिलिंग शब्द रूप व्यवस्था (कर्ता के अनुसार):
पुल्लिंग: प्रथमा विभक्ति में इसके रूप कर्ता, कर्तारौ, कर्तारः की तरह चलते हैं।
स्त्रीलिंग: इसमें दीर्घ ईकार का प्रयोग करके 'कर्त्री' शब्द बनता है, जिसके रूप 'नदी' के समान चलते हैं।
नपुंसकलिंग: इसके रूप कर्तृ, कर्तॄणी, कर्तृणि इत्यादि चलते हैं।

प्रमुख उदाहरण (Examples):

(मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग मूल प्रातिपदिक → रूप अर्थ
कृ (करना) कृ + तृच् (ऋ को गुण 'अर्') कर्तृ → कर्ता करने वाला
हृ (हरना) हृ + तृच् (ऋ को गुण 'अर्') हर्तृ → हर्त्ता हरने वाला
पठ् (पढ़ना) पठ् + तृच् (इट् आगम नियम) पठितृ → पठिता पढ़ने वाला
दा (देना) दा + तृच् (सीधे योग) दातृ → दाता देने वाला
पच् (पकाना) पच् + तृच् (च् को क् सन्धि कार्य) पक्तृ → पक्ता पकाने वाला
गम् (जाना) गम् + तृच् (म् को न् सन्धि कार्य) गन्तृ → गन्ता जाने वाला

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — ण्वुल् एवं तृच् प्रत्यय

प्यारे बच्चो! अब आप 'ण्वुल्' (अक) और 'तृच्' (तृ/ता) प्रत्ययों के नियमों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों को हल करने का अभ्यास कीजिए:

प्रश्न 1. कोष्ठकगतानां धातूनां उचित-प्रत्यययोगं कृत्वा रिक्तस्थानानि पूरयत (रिक्त स्थानों की पूर्ति करें):

  1. सः वेदस्य उत्तमः .................... अस्ति। (पठ् + ण्वुल्)
  2. सृष्टेः .................... ईश्वरः एव अस्ति। (कृ + तृच्, पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन)
  3. विद्यालयस्य .................... छात्रान् स्नेहपूर्वकं पाठयति। (शिक्ष + ण्वुल्)
  4. सा अन्नस्य .................... अस्ति। (पच् + तृच्, स्त्रीलिङ्ग नदीवत्)
  5. मार्गदर्शनं विना .................... अपि मार्गं न विन्दति। (गम् + तृच्, पुंलिङ्ग)

प्रश्न 2. शुद्धं कृदन्तरूपं चित्वा लिखत (सही विकल्प का चयन करें):

  1. 'अस्' धातु से 'ण्वुल्' प्रत्यय होने पर 'अस्तेर्भूः' नियम से क्या रूप सिद्ध होता है?
  2. 'हृ' धातु से 'तृच्' प्रत्यय लगाने पर स्त्रीलिंग में शुद्ध रूप क्या बनेगा?
  3. 'भुज् + ण्वुल्' इत्यस्य लघूपध स्वरस्य गुणे सति शुद्धं रूपं किम्?
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - शुद्ध उत्तर देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ प्रश्न 1 के शुद्ध उत्तर (रिक्त स्थान):

  • पाठकः (पठ् + ण्वुल् → 'वु' को 'अक' तथा उपधा वृद्धि 'आ')
  • कर्ता (कृ + तृच् → ऋ को गुण 'अर्' होकर कर्तृ शब्द से प्रथमा में 'कर्ता')
  • शिक्षकः (शिक्ष + ण्वुल् → 'वु' को 'अक' आदेश)
  • पक्त्री (पच् + तृच् → चकार को कुत्व 'क्' होकर पक्तृ बना, स्त्रीलिंग में नदीवत् 'पक्त्री')
  • गन्ता (गम् + तृच् → मकार को न् सन्धि कार्य होकर गन्तृ से 'गन्ता')

✓ प्रश्न 2 के शुद्ध उत्तर (MCQ):

  • (ख) भावकः ('अस्तेर्भूः' सूत्र से अस् को भू आदेश तथा वृद्धि होकर भावकः सिद्ध होता है)
  • (क) हर्त्री (ऋकारान्त प्रातिपदिक हर्तृ से स्त्रीत्व की विवक्षा में नदीवत् 'हर्त्री' बनेगा)
  • (ग) भोजकः (लघूपध गुण नियम से 'उ' को गुण 'ओ' होकर भोजकः बनता है)

३ एवं ४ तव्यत् और तव्य प्रत्यय

📌 प्रधान सूत्र: "तव्यत्तव्यानीयरः" (३/१/९६)

नियम: तव्यत् प्रत्यय में से अंतिम चकार 'त्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। लोप होने के पश्चात् तव्यत् और तव्य प्रत्यय से बने शब्द बिल्कुल एक समान (तव्य रूप वाले) ही दिखाई देते हैं। धातु से इन प्रत्ययों का योग होने पर निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं:

प्रमुख उदाहरण एवं तुलनात्मक सारणी (Examples):

(मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

धातु विधिलिङ् रूप तव्यत् (पुल्लिंग) तव्यत् (स्त्रीलिंग) तव्यत् (नपुंसकलिंग) अनीयर् प्रत्यय रूप
गम् गच्छेत् गन्तव्यः गन्तव्या गन्तव्यम् गमनीयम्
पठ् पठेत् पठितव्यः पठितव्या पठितव्यम् पठनीयम्
लिख् लिखेत् लेखितव्यः लेखितव्या लेखितव्यम् लेखनीयम्
खाद् खादेत् खादितव्यः खादितव्या खादितव्यम् खादनीयम्
पा पिबेत् पातव्यः पातव्या पातव्यम् पानीयम्
नी नयेत् नेतव्यः नेतव्या नेतव्यम् नयनीयम्
गा गायेत् गातव्यः गातव्या गातव्यम् गानीयम्
दृश् पश्येत् द्रष्टव्यः द्रष्टव्या द्रष्टव्यम् दर्शनीयम्
दा दद्यात् दातव्यः दात्‍या दातव्यम् दानीयम्
कृ कुर्यात् कर्तव्यः कर्तव्या कर्तव्यम् करणीयम्
पृच्छ् पृच्छेत् प्रष्टव्यः प्रष्टव्या प्रष्टव्यम् प्रच्छनीयम्
विश् (उप) उपविशेत् उपवेष्टव्यः उपवेष्टव्या उपवेष्टव्यम् उपवेशनीयम्

📖 विशिष्ट एवं गहन अध्ययन के लिए लघुसिद्धान्तकौमुदी के मूल ग्रन्थ पाठ पर चटका (क्लिक) लगायें। एक अलग विंडो खुलेगी।

५. अनीयर् प्रत्यय (पाठ ३३)

📌 प्रधान सूत्र: "तव्यत्तव्यानीयरः" (३/१/९६)

नियम: 'अनीयर्' प्रत्यय का प्रयोग भी तव्यत् के समान 'चाहिए' अथवा 'योग्य' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए कर्म और भाव में होता है। इसके प्रयोग के समय ध्यान रखने योग्य मुख्य बातें नीचे दी गई हैं:

💡 अनीयर् प्रत्यय के महत्वपूर्ण नियम (सरल हिन्दी में):
  • वर्ण लोप: अनीयर् प्रत्यय के अंतिम रकार 'र्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातुओं के पीछे केवल 'अनीय' भाग जोड़ा जाता है।
  • एक स्वर (एक-अक्षरी) धातु नियम: यदि धातु केवल एक स्वर वर्ण वाली हो, तो सन्धि नियम से:
    इ / ई बदलकर 'अय्' हो जाता है। (जैसे— जि → जयनीय)
    उ / ऊ बदलकर 'अव्' हो जाता है। (जैसे— श्रु → श्रवणीय)
    बदलकर 'अर्' हो जाता है। (जैसे— कृ → करणीय)
  • दो वर्णों (हलन्त) वाली धातु का गुण नियम: यदि धातु दो वर्णों वाली हो और उसका पहला अक्षर छोटा स्वर हो, तो उसे **गुण** हो जाता है:
    को गुण 'ए' होता है। (जैसे— इष् → एषणीय)
    को गुण 'ओ' होता है। (जैसे— शुभ् → शोभनीय)
    को गुण 'अर्' होता है। (जैसे— दृश् → दर्शनीय)
  • शब्द रूप (त्रिलिंग व्यवस्था): इसके रूप तीनों लिंगों में चलते हैं और वाक्य में विशेषण का कार्य करते हैं:
    पुंलिङ्ग में: 'राम' शब्द के समान रूप चलते हैं (यथा— पठनीयः)।
    स्त्रीलिङ्ग में: 'लता' शब्द के समान रूप चलते हैं (यथा— पठनीया)।
    नपुंसकलिङ्ग में: 'फल' शब्द के समान रूप चलते हैं (यथा— पठनीयम्)।

अनीयर् प्रत्यय के प्रामाणिक उदाहरण (Examples):

(सभी उदाहरण तीनों लिंगों में— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग प्रक्रिया पुंलिङ्ग (रामवत्) स्त्रीलिङ्ग (लतावत्) नपुंसकलिङ्ग (फलवत्)
[श्रेणी १: इ / ई का 'अय्' होना]
जि (जीतना) जि + अनीयर् → जयनीय जयनीयः जयनीया जयनीयम्
चि (चुनना) चि + अनीयर् → चयनीय चयनीयः चयनीया चयनीयम्
नी (ले जाना) नी + अनीयर् → नयनीय नयनीयः नयनीया नयनीयम्
[श्रेणी २: उ / ऊ का 'अव्' होना]
श्रु (सुनना) श्रु + अनीयर् → श्रवणीय श्रवणीयः श्रवणीया श्रवणीयम्
भू (होना) भू + अनीयर् → भवनीय भवनीयः भवनीया भवनीयम्
[श्रेणी ३: ऋ का गुण 'अर्' होना]
कृ (करना) कृ + अनीयर् → करणीय करणीयः करणीया करणीयम्
हृ (हरना) हृ + अनीयर् → हरणीय हरणीयः हरनीया हरणीयम्
मृ (मरना) मृ + अनीयर् → मरणीय मरणीयः मरनीया मरणीयम्
[श्रेणी ४: दो वर्णों वाली हलन्त धातुएँ (उपधा गुण नियम)]
इष् (चाहना) इष् + अनीयर् (इ → ए) एषणीयः एषणीया एषणीयम्
ईक्ष् (देखना) ईक्ष् + अनीयर् (ई → ए) एक्षणीयः एक्षणीया एक्षणीयम्
शुभ् (शोभा पाना) शुभ् + अनीयर् (उ → ओ) शोभनीयः शोभनीया शोभनीयम्
मुच् (छोड़ना) मुच् + अनीयर् (उ → ओ) मोचनीयः मोचनीया मोचनीयम्
मुद् (प्रसन्न होना) मुद् + अनीयर् (उ → ओ) मोदनीयः मोदनीया मोदनीयम्
भुज् (खाना/भोगना) भुज् + अनीयर् (उ → ओ) भोजनीयः भोजनीया भोजनीयम्
तुद् (दुःख देना) तुद् + अनीयर् (उ → ओ) तोदनीयः तोदनीया तोदनीयम्
चुर् (चुराना) चुर् + अनीयर् (उ → ओ, ण्त्व) चोरणीयः चोरणीया चोरणीयम्
वृत् (होना) वृत् + अनीयर् (ऋ → अर्) वर्तनीयः वर्तनीया वर्तनीयम्

👉 इन प्रत्ययों के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी लेने तथा अभ्यास करने के लिए नीचे दिए गए बटन पर चटका लगायें:

📖 तव्यत्, तव्य तथा अनीयर् विस्तृत अभ्यास पत्र खोलें ➔

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — तव्यत्, तव्य एवं अनीयर्

प्यारे बच्चो! अब आप ऊपर सीखे गए नियमों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों का अभ्यास कीजिए और शुद्ध वाक्य-निर्माण सीखिए:

प्रश्न 1. कोष्ठकात् शुद्धम् उत्तरं चित्वा रिक्तस्थानानि पूरयत (शुद्ध उत्तर चुनकर रिक्त स्थान भरें):

  1. अस्माभिः जन्तुशालां गत्वा पशवः .................... ।
    (विकल्प: द्रष्टव्यः / द्रष्टव्याः)
  2. सदेव मातापित्रोः गुरोः च आज्ञा .................... ।
    (विकल्प: पालयितव्या / पालयितव्यः)
  3. परद्रव्याणि कदापि न .................... ।
    (विकल्प: हर्तव्यम् / hर्तव्यानि)
  4. इदं कार्यं कदापि न .................... ।
    (विकल्प: चिन्तनीयम् / चिन्तनीया)
  5. व्याधेन वने निर्दोषाः मृगाः न .................... ।
    (विकल्प: हन्तव्याः / हन्तव्यम्)

प्रश्न 2. उचितं पदं चित्वा वाक्यं पूरयत (सही विकल्प का चयन करें):

  1. महिलाभिः गीतं .................... । (गै + तव्यत्)
  2. मया कविता .................... । (लिख् + तव्यत्)
  3. अस्माभिः सद्-ग्रन्थाः अपि .................... । (पठ् + अनीयर्)

प्रश्न 3. निर्देशानुसारं प्रत्यय परिवर्तनं कुरुत (निर्देशानुसार बदलें):

तव्यत् प्रत्यय के स्थान पर अनीयर् प्रत्यय का प्रयोग कीजिए:

  1. छात्रैः पाठः पठितव्यः । → छात्रैः पाठः ....................
  2. त्वया कुमार्गः त्यक्तव्यः । → त्वया कुमार्गः ....................
  3. कथाकारेण कथा कथयितव्या । → कथाकारेण कथा ....................
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ प्रश्न 1 के उत्तर (रिक्त स्थान):

  • (1) द्रष्टव्याः (पशवः पुंलिङ्ग बहुवचन है, अतः विशेषण भी द्रष्टव्याः होगा)
  • (2) पालयितव्या (आज्ञा स्त्रीलिङ्ग है)
  • (3) हर्तव्यानि (परद्रव्याणि नपुंसकलिंग बहुवचन है)
  • (4) चिन्तनीयम् (कार्यम् नपुंसकलिंग है)
  • (5) हन्तव्याः (मृगाः पुंलिङ्ग बहुवचन है)

✓ प्रश्न 2 के उत्तर (MCQ):

  • (1) (ग) गातव्यम् (गीतम् नपुंसकलिंग कर्मानुसार)
  • (2) (क) लेखितव्या (कविता स्त्रीलिङ्ग कर्मानुसार)
  • (3) (क) पठनीयाः (सद्-ग्रन्थाः पुंलिङ्ग बहुवचन अनुसार)

✓ प्रश्न 3 के उत्तर (प्रत्यय परिवर्तन):

  • (1) छात्रैः पाठः पठनीयः
  • (2) त्वया कुमार्गः त्यजनीयः
  • (3) कथाकारेण कथा कथनीया

६. यत् प्रत्यय (पाठ ३२)

📌 प्रधान सूत्र: "अचो यत्" (३/१/९७)

नियम: अजन्त (स्वरान्त) धातुओं से भाव तथा कर्म के अर्थ में 'यत्' प्रत्यय होता है। यत् प्रत्यय का अर्थ 'योग्य' होता है। (जैसे— पा धातु से पेयम् अर्थात् पीने योग्य)।

⚙️ वर्ण परिवर्तन एवं सामान्य नियम:
यत् प्रत्यय में अंतिम तकार 'त्' की इत्संज्ञा और लोप होने से केवल 'य' शेष बचता है। यत् एक आर्धधातुक प्रत्यय है, अतः इसके परे रहते धातुओं में निम्नलिखित परिवर्तन होते हैं:
१. इक् गुण नियम: जिस धातु के अंत में इक् प्रत्याहार (इ, ई, उ, ऊ, ऋ) के वर्ण हों, उसे गुण हो जाता है।
यथा: चि + य → चे + य = चेयम् (चुनने योग्य)
२. वान्तो यि प्रत्यये नियम: यत् प्रत्यय का आदि वर्ण 'य' होने से यह 'यादि' प्रत्यय है। इसके कारण धातु के अंतिम 'ओ' को 'अव्' तथा 'औ' को 'आव्' आदेश होता है।
यथा (लू धातु): लू + य → ऊ को गुण 'ओ' हुआ (लो + य) → 'ओ' को 'अव्' होकर ल् + अव् + य = लव्यम् (काटने योग्य)
३. आकारान्त धातु नियम (ईदाच्चापि): आकारान्त धातुओं के 'आ' को 'इ' (दीर्घ ई) हो जाता, फिर उसे गुण 'ए' होता है।
यथा (पा धातु): पा + यत् → पा को ईत्व हुआ (पी + य) → गुण होकर पे + य = पेयम् (पीने योग्य)
🔥 महत्वपूर्ण विशेष नियम (हलन्त धातुओं के अपवाद):
४. पवर्गोपध नियम (पोरदुपधात्): जिस धातु के अंत में पवर्ग (प, फ, ब, भ, म) हो तथा उससे ठीक पूर्व का वर्ण (उपधा) 'अ' हो, तो उससे भी यत् प्रत्यय होता है।
उदाहरण: शप् + यत् = शप्यम् | लभ् + य = लभ्यम् | रम् + य = रम्यम्
५. विशिष्ट हलन्त धातुएँ: तक्, शस्, चत्, जन्, शक्, सह्— इन हलन्त धातुओं से भी यत् प्रत्यय का विधान होता है।
उदाहरण: तक् + यत् = तक्यम् | शस् + यत् = शस्यम्
६. हन् धातु नियम (वध च): हन् धातु से यत् प्रत्यय विकल्प से होता है तथा 'हन्' के स्थान पर 'वध' आदेश हो जाता है।
उदाहरण: हन् + य → वध् + य = वध्यः (वध करने योग्य)
७. उपसर्ग रहित नियम (गदचदमदचमामनुपसर्गे): उपसर्ग से रहित गद्, मद्, चर्, और यम् धातु से ही यत् प्रत्यय होता है।
उदाहरण: गद् + य = गद्यम् (यदि धातु के पूर्व उपसर्ग रहेगा तो वहाँ 'ण्यत्' प्रत्यय होगा, जैसे— प्र + गद् + ण्यत् = प्रगाद्यम्)

यत् प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण सारणी (Examples):

(मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग प्रक्रिया सिद्ध रूप (नपुंसकलिंग) सरल अर्थ
पा (पीना) पा + यत् (आ → ई → गुण ए) पेयम् पीने योग्य
चि (चुनना) चि + य (इ → गुण ए) चेयम् चुनने योग्य
लू (काटना) लू + य (ऊ → ओ → अव्) लव्यम् काटने योग्य
लभ् (पाना) लभ् + य (पवर्गोपध नियम) लभ्यम् पाने योग्य
गद् (बोलना) गद् + य (उपसर्ग रहित नियम) गद्यम् बोलने योग्य

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — यत् प्रत्यय

प्यारे बच्चो! अब आप नियमों के आधार पर निम्नलिखित धातुओं में 'यत्' प्रत्यय जोड़कर उनके शुद्ध कृदन्त रूप बनाने का प्रयास कीजिए:

प्रश्न. अधोलिखित धातूनां यत् प्रत्यययोगं कृत्वा रूपं लिखत:

  1. क्षि + यत् = .................... (इ/ई को गुण 'ए' करें)
  2. ध्या + यत् = .................... (आ को ईत्व करके गुण करें)
  3. श्रु + यत् = .................... (उ को गुण 'ओ' और फिर 'अव्' करें)
  4. गम् + यत् = .................... (पवर्गोपध नियम लगाएं)
  5. दा + यत् = .................... (आकारान्त धातु नियम)
  6. यम् + यत् = .................... (उपसर्ग रहित पवर्गोपध नियम)
  7. आ + सह् + यत् = .................... (विशिष्ट हलन्त धातु नियम)
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ अभ्यास के शुद्ध उत्तर (नपुंसकलिंग सामान्य रूप):

  • (1) क्षि + यत् = क्षेयम् (नष्ट करने योग्य / इ को गुण 'ए')
  • (2) ध्या + यत् = ध्येयम् (ध्यान करने योग्य / आ को ईत्व और फिर गुण 'ए')
  • (3) श्रु + यत् = श्रव्यम् (सुनने योग्य / उ को गुण 'ओ', फिर ओ को 'अव्')
  • (4) गम् + यत् = गम्यम् (जाने योग्य / पवर्गोपध 'पोरदुपधात्' नियम)
  • (5) दा + यत् = देयम् (देने योग्य / आकारान्त नियम)
  • (6) यम् + यत् = यम्यम् (नियमन करने योग्य / पवर्गोपध नियम)
  • (7) आ + सह् + यत् = आसह्यम् (सहन करने योग्य / विशिष्ट हलन्त धातु नियम)

✨ ७. ण्यत् प्रत्यय (पाठ ३२) ✨

📌 प्रधान सूत्र: "ऋहलोर्ण्यत्" (३/१/१२४)

सरल हिन्दी अर्थ: इस पाणिनीय सूत्र के अनुसार ऋवर्णान्त (जिस धातु के अंत में ऋ या ॠ स्वर हो) तथा हलन्त (जिस धातु के अंत में कोई भी व्यञ्जन वर्ण हो) धातुओं से 'योग्य' या 'चाहिए' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए ण्यत् प्रत्यय का विधान किया जाता है। यह प्रत्यय भी भाव तथा कर्म के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

⚙️ वर्ण परिवर्तन एवं वृद्धि के विशिष्ट नियम:
ण्यत् प्रत्यय में आदि वर्ण 'ण्' की 'चूटू' सूत्र से तथा अंतिम वर्ण 'त्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातुओं के पीछे केवल 'य' शेष बचता है। 'ण्' की इत्संज्ञा होने के कारण धातु के स्वरों में निम्नलिखित **वृद्धि कार्य** होते हैं:
१. ऋकारान्त धातु नियम (अचो ञ्णिति): यदि धातु के अंत में 'ऋ' हो, तो उसे वृद्धि होकर 'आर्' आदेश हो जाता है।
यथा: कृ + ण्यत् (य) → कृ के ऋ को वृद्धि 'आर्' हुआ (कार् + य) = कार्यम् (करने योग्य)
२. हलन्त उपधा वृद्धि नियम (अत उपधायाः): यदि धातु के अंतिम व्यंजन से ठीक पहले (उपधा में) ह्रस्व 'अ' स्वर हो, तो उसे वृद्धि होकर 'आ' हो जाता है।
यथा: पठ् + ण्यत् (य) → 'प' के 'अ' को वृद्धि 'आ' हुआ (पाठ् + य) = पाठ्यम् (पढ़ने योग्य)
३. उपधा गुण नियम (पुगन्तलघूपधस्य च): यदि हलन्त धातु की उपधा में इ, उ, या ऋ हो, तो उसे वृद्धि न होकर केवल 'गुण' (ए, ओ, अर्) आदेश होता है।
यथा: लिख् + ण्यत् → इ को गुण 'ए' हुआ (लेख् + य) = लेख्यम् | भुज् + ण्यत् → उ को गुण 'ओ' हुआ = भोज्यम्
४. चजोः कु घिण्ण्यतोः नियम: ण्यत् प्रत्यय परे रहते धातु के अंत में आने वाले चवर्ग के वर्णों (च् और ज्) को क्रमशः कवर्ग (क् और ग्) आदेश हो जाता है।
यथा: पच् + ण्यत् → च को क् और उपधा वृद्धि हुई (पाक् + य) = पाक्यम् | त्यज् + ण्यत् → ज को ग और उपधा वृद्धि हुई = त्याग्यम्

ण्यत् प्रत्यय के प्रमुख उदाहरण सारणी (Examples):

(मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग एवं व्याकरण प्रक्रिया सिद्ध रूप (नपुंसकलिंग) सरल हिन्दी अर्थ
कृ (करना) कृ + ण्यत् (ऋ को वृद्धि 'आर्') कार्यम् करने योग्य / कर्तव्य
धृ (धारण करना) धृ + ण्यत् (ऋ को वृद्धि 'आर्') धार्यम् धारण करने योग्य
हृ (हरना) हृ + ण्यत् (ऋ को वृद्धि 'आर्') हार्यम् हरने योग्य
पठ् (पढ़ना) पठ् + ण्यत् (उपधा 'अ' को वृद्धि 'आ') पाठ्यम् पढ़ने योग्य
लिख् (लिखना) लिख् + ण्यत् (लघूपध 'इ' को गुण 'ए') लेख्यम् लिखने योग्य / दस्तावेज़
भुज् (खाना/भोगना) भुज् + ण्यत् (लघूपध 'उ' को गुण 'ओ') भोज्यम् खाने योग्य / भोजन
पच् (पकाना) पच् + ण्यत् (चकार को कत्व 'क्' और उपधा वृद्धि) पाक्यम् पकाने योग्य
त्यज् (त्यागना) त्यज् + ण्यत् (जकार को कत्व 'ग्' और उपधा वृद्धि) त्याग्यम् त्यागने योग्य

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — ण्यत् प्रत्यय

प्यारे बच्चो! अब आप नियमों के आधार पर निम्नलिखित धातुओं में 'ण्यत्' प्रत्यय जोड़कर उनके शुद्ध कृदन्त रूप बनाने का प्रयास कीजिए:

प्रश्न. अधोलिखित धातूनां ण्यत् प्रत्यययोगं कृत्वा रूपं लिखत:

  1. स्मृ + ण्यत् = .................... (ऋकारान्त धातु नियम लगाएं)
  2. त्यज् + ण्यत् = .................... (कुत्व सन्धि कार्य और उपधा वृद्धि करें)
  3. वद् + ण्यत् = .................... (हलन्त उपधा वृद्धि नियम)
  4. रुध् + ण्यत् = .................... (उपधा 'उ' को गुण 'ओ' करें)
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ अभ्यास के शुद्ध उत्तर (नपुंसकलिंग सामान्य रूप):

  • (1) स्मृ + ण्यत् = स्मार्यम् (स्मरण करने योग्य / ऋ को वृद्धि 'आर्')
  • (2) त्यज् + ण्यत् = त्याग्यम् (त्यागने योग्य / जकार को कुत्व 'ग्' और उपधा वृद्धि)
  • (3) वद् + ण्यत् = वाद्यम् (बोलने या बजाने योग्य / उपधा 'अ' को वृद्धि 'आ')
  • (4) रुध् + ण्यत् = रोध्यम् (रोकने योग्य / उपधा 'उ' को गुण 'ओ')

✨ ८. क्त्वा प्रत्यय (पाठ ३३) ✨

📌 प्रधान सूत्र: "समानकर्तृकयोः पूर्वकाले" (३/४/२१)

वृत्ति: समानकर्तृकयोः धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात्।
सरल हिन्दी अर्थ: जब दो धातुओं (कार्यों) का कर्ता एक ही हो, तो जो कार्य पहले समाप्त होता है, उस पूर्वकालिक क्रिया वाली धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय का विधान किया जाता है।

💡 प्रथम नियम एवं उदाहरण मीमांसा:

यथा (जैसे): रामः भुक्त्वा व्रजति। (राम खाकर के जाता है)।
यहाँ 'भुज्' (खाना) और 'व्रज्' (जाना) दो धातुएँ हैं। खाने और जाने का काम एक ही कर्ता यानी 'राम' कर रहा है; दोनों धातुओं का कर्ता एक राम ही है। किन्तु, यहाँ खाने का कार्य पहले हो रहा है और जाने का कार्य बाद में। इसलिए पहले समाप्त होने वाली पूर्वकालिक क्रिया 'खाना' है। अतः 'भुज्' धातु से क्त्वा प्रत्यय होकर 'भुक्त्वा' पद बनता है।

२. बालकः उत्तिष्ठति ततः परं देवं नमति।
यहाँ पूर्वकालिक क्रिया उत्तिष्ठति (उद् + स्था) से प्रत्यय योग करने पर वाक्य बनता है → बालकः उत्थाय देवं नमति।
(विशेष संकेत: व्याकरण नियमानुसार जब धातु से पूर्व कोई उपसर्ग जुड़ा हो, तो क्त्वा के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश हो जाता है, जिसका विस्तृत अध्ययन हम अगले पाठ में करेंगे)।

३. सः गृहं प्रविशति ततः परं मुखं प्रक्षालयति।
यहाँ भी उपसर्ग-युक्त पूर्वकालिक क्रिया होने के कारण वाक्य इस प्रकार परिवर्तित होगा → सः गृहं प्रविश्य मुखं प्रक्षालयति।

⚙️ वर्ण परिवर्तन एवं अव्यय संज्ञा:
  • क्त्वा प्रत्यय के प्रारम्भिक ककार 'क्' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल "त्वा" शेष बचता है, जो धातु के पीछे जुड़ता है।
  • "क्त्वातोसुन्कसुनः" (१/१/४०) सूत्र के नियम से क्त्वा प्रत्ययान्त शब्दों की व्याकरण में 'अव्यय संज्ञा' हो जाती है। अव्यय होने के कारण इनके रूप तीनों लिंगों, सभी वचनों और विभक्तियों में सदा एक समान रहते हैं, बदलते नहीं हैं।

प्रथम नियम के प्रमुख उदाहरण सारणी (Examples):

(मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग सिद्ध अव्यय रूप सरल अर्थ
दा (देना) दा + क्त्वा ('त्वा' शेष) दत्त्वा देकर / देकर के
पठ् (पढ़ना) पठ् + क्त्वा (इट् आगम नियम) पठित्वा पढ़कर / पढ़कर के
तृ (तैरना/पार करना) तृ + क्त्वा (ऋत्व दीर्घ सन्धि कार्य) तीर्त्वा पार करके
📌 प्रधान सूत्र: "अलङ्कृत्वोः प्रतिषेधयोः प्राचाम्" (३/४/१८)

सरल हिन्दी अर्थ: यदि किसी क्रिया से पहले निषेधवाची (मना करने के अर्थ वाले) 'अलम्' तथा 'खलु' शब्द का प्रयोग किया गया हो, तो प्राच्य आचार्यों के मतानुसार उस क्रियावाचक धातु में भी 'क्त्वा' प्रत्यय का विधान किया जाता है। इसका प्रयोग 'बस करो' या 'मत करो' के अर्थ में होता है।
यथा (जैसे): अलम् कृत्वा (बस करो/मत करो), खलु रुदित्वा (मत रोओ)।

⚖️ ध्यान देने योग्य वैकल्पिक प्रयोग (छात्रों का भ्रम निवारण):

संस्कृत सीखते समय अक्सर कुछ छात्र इस बात को लेकर भ्रमित हो जाते हैं कि 'लिखित्वा' प्रयोग सही है या 'लेखित्वा'? महर्षि पाणिनि के विशिष्ट नियम के अनुसार ये **दोनों ही प्रयोग शत-प्रतिशत शुद्ध हैं**। इसके लिए व्याकरण में अधोलिखित व्यवस्था दी गई है:

📌 सूत्र: "रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च" (१/२/२६)
नियम का अर्थ: यदि धातु हलादि (व्यंजन से शुरू होने वाली) हो, उसके अंत में रल् प्रत्याहार का वर्ण हो, तथा उसकी उपधा में इवर्ण (इ, ई) या उवर्ण (उ, ऊ) हो; तो ऐसे धातुओं से परे इट् आगम सहित होने वाले क्त्वा एवं सन् प्रत्यय विकल्प से 'कित्' (जिसमें क् की इत्संज्ञा हुई हो) माने जाते हैं।

विकल्प का जादुई प्रभाव: जब प्रत्यय 'कित्' होता है, तब धातु के स्वर को गुण नहीं होता (जैसे— लिखित्वा)। परन्तु जब विकल्प से प्रत्यय 'कित्' नहीं होता, तब धातु के स्वर को गुण आदेश हो जाता है (जैसे— लेखित्वा)। इस नियम से दोनों रूप समान रूप से प्रामाणिक बनते हैं।

वैकल्पिक प्रयोगों के प्रमुख उदाहरण सारणी (Examples):

(इट् सहित वैकल्पिक रूप— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग सिद्ध वैकल्पिक रूप (दोनों शुद्ध हैं) सरल अर्थ
लिख् (लिखना) लिख् + क्त्वा लिखित्वा / लेखित्वा लिखकर के
गुप् (रक्षण/छिपाना) गुप् + क्त्वा गोपित्वा / गुप्त्वा छिपाकर / रक्षा करके
क्षुध् (भूखा होना) क्षुध् + क्त्वा क्षुधित्वा / क्षोधित्वा भूखा होकर

क्त्वा प्रत्यय के अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण सारणी (Examples):

(विशिष्ट पाणिनीय रूपों का संग्रह— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग सिद्ध अव्यय रूप
[श्रेणी १: सामान्य एवं इडागम युक्त रूप]
कृ कृ + क्त्वा कृत्वा
नम् नम् + क्त्वा नत्वा
दृश् दृश् + क्त्वा दृष्ट्वा
खाद् खाद् + क्त्वा खादित्वा
पा पा + क्त्वा पीत्वा
स्मृ स्मृ + क्त्वा स्मृत्वा
प्रच्छ् प्रच्छ् + क्त्वा पृष्ट्वा
ज्ञा ज्ञा + क्त्वा ज्ञात्वा
हन् हन् + क्त्वा हत्वा
नृत् नृत् + क्त्वा नर्तित्वा
दा दा + क्त्वा दत्त्वा
तृ तृ + क्त्वा तीर्त्वा
भिद् भिद् + क्त्वा भित्वा
बन्ध् बन्ध् + क्त्वा बद्ध्वा
ग्रह ग्रह + क्त्वा गृहीत्वा
[💡 श्रेणी २: चुरादिगण / णिच् रूप]
पूज् पूज् + क्त्वा पूजयित्वा
कथ् कथ् + क्त्वा कथयित्वा
[⚙️ श्रेणी ३: सम्प्रसारण, आदेश एवं विशिष्ट रूप]
यज्र यज् + क्त्वा इष्ट्वा
वप् वप् + क्त्वा उप्त्वा
अस् अस् → भू + क्त्वा भूत्वा
वस् वस् + क्त्वा उषित्वा
शास् शास् + क्त्वा शिष्ट्वा
धा धा + क्त्वा हित्वा
अद् अद् → जग्ध् + क्त्वा जग्ध्वा
वच् वच् + क्त्वा उक्त्वा
मूल धातु प्रत्यय योग सिद्ध वैकल्पिक रूप (दोनों शुद्ध हैं)
दम् दम् + क्त्वा दमित्वा, दान्त्वा
वृत् वृत् + क्त्वा वर्तित्वा, वृत्वा
शम् शम् + क्त्वा शमित्वा, शान्त्वा
कृष् कृष् + क्त्वा कृषित्वा, कर्षित्वा
श्वि श्वि + क्त्वा श्वयित्वा
जू जू + क्त्वा जरीत्वा, जरित्वा
खन् खन् + क्त्वा खनित्वा, खात्वा
तन् तन् + क्त्वा तनित्वा, तत्वा
क्रम् क्रम् + क्त्वा क्रमित्वा, क्रान्त्वा, क्रन्त्वा
गुह् गुह् + क्त्वा गृहित्वा, गूढ्वा
मृज् मृज् + क्त्वा मार्जित्वा, मृष्ट्वा
क्लिश् क्लिश् + क्त्वा क्लिशित्वा, क्लिष्ट्वा
मृष् मृष् + क्त्वा मृषित्वा, मर्षित्वा
भञ्ज् भञ्ज् + क्त्वा भङ्क्त्वा, भक्त्वा
ग्रन्थ ग्रन्थ + क्त्वा ग्रन्थित्वा, ग्रथित्वा
स्यन्द् स्यन्द् + क्त्वा स्यन्दित्वा, स्यन्त्वा
गुम्फ् गुम्फ् + क्त्वा गुम्फित्वा, गुफित्वा
मस्ज् मस्ज् + क्त्वा मङ्क्त्वा, मक्त्वा
क्षुध् क्षुध्‍ + क्त्वा क्षुधित्वा, क्षोधित्वा
💡 तृतीय नियम: धातु स्वरूप परिवर्तन एवं प्रकृति नियम

क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करते समय धातुओं के मूल स्वरूप (जैसे— अनुबन्ध लोप, नकार लोप, और सम्प्रसारण) में होने वाले विशिष्ट पाणिनीय परिवर्तनों को समझने के लिए निम्नलिखित चार मुख्य बिन्दुओं को ध्यान से देखें:

(१) मूल विधान एवं अनुबन्ध लोप: यदि धातु से पूर्व किसी उपसर्ग का प्रयोग न हुआ हो, तो 'करके' या 'कर' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'क्त्वा' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। इसके प्रारम्भ में प्रयुक्त ककार 'क्' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है तथा धातु के पीछे जुड़ने के लिए केवल 'त्वा' शेष बचता है।
(२) प्रकृतिवत् (अपरिवर्तित) रूप: कुछ विशिष्ट धातुओं में इस प्रत्यय को जोड़ने पर धातु के मूल स्वर या रूप में कोई आंतरिक परिवर्तन नहीं होता है, वे सीधे जुड़ जाते हैं।
यथा: √स्ना + क्त्वा = स्नात्वा | √ज्ञा + क्त्वा = ज्ञात्वा | √भू + क्त्वा = भूत्वा | नी + क्त्वा = नीत्वा | √कृ + क्त्वा = कृत्वा | √धृ + क्त्वा = धृत्वा
(३) नकार लोप नियम (अनुदात्तोपदेशत्व): कुछ विशिष्ट नकारान्त धातुओं के अन्तिम मकार या नकार 'न्' का लोप हो जाता है और उसके बाद इस प्रत्यय का प्रयोग करते हैं।
यथा: √हन् + क्त्वा = हत्वा | √मन् + क्त्वा = मत्वा

⚠️ अपवाद नियम: किन्तु जन् + क्त्वा = जनित्वा तथा √खन् + क्त्वा = खनित्वा— ये इसके मुख्य अपवाद हैं (यहाँ नकार का लोप नहीं होता, बल्कि इट् का आगम होता है)।

(४) सम्प्रसारण नियम (वचिस्वपियजादीनां किति): यदि धातु के प्रारम्भ में य, व, र, ल (यण् प्रत्याहार) में से कोई भी वर्ण प्रयुक्त हुआ हो, तो ऐसी धातुओं में क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग करने पर सम्प्रसारण कार्य होता है। इसके अनुसार क्रमशः य को इ, व को उ, र को ऋ तथा ल को लृ आदेश हो जाता है।
यथा: √यज् + क्त्वा = इष्ट्वा (य को इ हुआ) | √वप् + क्त्वा = उप्त्वा (व को उ हुआ) | √वच् + क्त्वा = उक्त्वा

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — क्त्वा प्रत्यय

प्यारे बच्चो! अब आप क्त्वा प्रत्यय के नियमों के आधार पर निम्नलिखित प्रश्नों को हल करने का अभ्यास कीजिए और अपने ज्ञान को पक्का कीजिए:

प्रश्न 1. कोष्ठकगतानां धातूनां क्त्वा-प्रत्यययोगं कृत्वा वाक्यानि पूरयत (कोष्ठक में दी गई धातुओं में क्त्वा प्रत्यय जोड़कर वाक्य पूरा करें):

  1. शिशुः दुग्धं .................... स्वपिति। (पा + क्त्वा)
  2. अहं पुस्तकं .................... ज्ञानं प्राप्नोमि। (पठ् + क्त्वा)
  3. त्वं देवं .................... कार्यं कुरु। (नम् + क्त्वा)
  4. सः नदीं .................... पारं गतः। (तृ + क्त्वा)
  5. श्रमिकः धनं .................... गृहं गच्छति। (दा + क्त्वा)

प्रश्न 2. शुद्धं कृदन्तरूपं चित्वा लिखत (शुद्ध वैकल्पिक रूप का चयन करें):

  1. 'लिख् + क्त्वा' इत्यस्य वैकल्पिकौ रूपौ कौ?
  2. 'यज् + क्त्वा' इत्यस्य शुद्धं रूपं किम्?
  3. 'खलु ....................' इत्यत्र प्रतिषेधार्थे शुद्धं पदं किम्? (रुद् + क्त्वा)

प्रश्न 3. क्त्वा प्रत्ययस्य प्रयोगं कृत्वा वाक्यानि संयूज्य लिखत (क्त्वा प्रत्यय लगाकर वाक्यों को जोड़ें):

  1. रामः भोजनं करोति। सः विद्यालयं गच्छति।
    → रामः भोजनं .................... विद्यालयं गच्छति।
  2. सः सत्यं जानाति। सः कार्यं कुरुते।
    → सः सत्यं .................... कार्यं कुरुते।
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - देखने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ प्रश्न 1 के शुद्ध उत्तर (रिक्त स्थान):

  • पीत्वा (पा + क्त्वा → आ को ईत्व हुआ)
  • पठित्वा (पठ् + क्त्वा → इडागम हुआ)
  • नत्वा (नम् + क्त्वा → मकार का लोप हुआ)
  • तीर्त्वा (तृ + क्त्वा → दीर्घ ऋत्व कार्य)
  • दत्त्वा (दा + क्त्वा → दत्त्वा रूप शुद्ध पाणिनीय है)

✓ प्रश्न 2 के शुद्ध उत्तर (MCQ):

  • (क) लेखित्वा / लिखित्वा ('रलो व्युपधात्...' सूत्र से कित् विकल्प होने से दोनों रूप शुद्ध हैं)
  • (ख) इष्ट्वा (यकार को सम्प्रसारण 'इ' होने के कारण)
  • (ख) रुदित्वा ('अलङ्कृत्वोः प्रतिषेधयोः...' सूत्र से निषेधार्थक खलु के योग में)

✓ प्रश्न 3 के शुद्ध उत्तर (वाक्य संयोजन):

  • रामः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गच्छति। (करोति क्रिया का पूर्वकालिक रूप)
  • सः सत्यं ज्ञात्वा कार्यं कुरुते। (जानाति क्रिया का पूर्वकालिक रूप)

🔍 वच् + क्त्वा = उक्त्वा की पाणिनीय रूप-सिद्धि एवं विशिष्ट नियम:

संस्कृत व्याकरण में 'वच्' (बोलना) धातु से जब 'क्त्वा' प्रत्यय लगाया जाता है, तो 'वचित्वा' या 'वक्त्वा' रूप न बनकर 'उक्त्वा' रूप बनता है। इस रूप की वैज्ञानिक सिद्धि के पीछे महर्षि पाणिनि के तीन प्रमुख सूत्र कार्य करते हैं। आइए इन्हें क्रमानुसार समझते हैं:

१. सम्प्रसारण नियम: "वचिस्वपियजादीनां किति" (६/१/१५)

नियम: कित् (जिसमें 'क' की इत्संज्ञा हुई हो) प्रत्यय परे रहते वच्, स्वप्, यज् आदि धातुओं के यण् वर्णों को सम्प्रसारण आदेश होता है।
चूँकि क्त्वा प्रत्यय 'कित्' है, अतः इस नियम से 'वच्' धातु के वकार 'व' को सम्प्रसारण 'उ' आदेश हो जाता है।
→ वच् + क्त्वा → (व को उ हुआ) → उच् + त्वा

२. कुत्व सन्धि नियम: "चोः कुः" (८/२/३०)

नियम: पद के अंत में अथवा झल् प्रत्याहार (व्यंजनों) के परे रहते चवर्ग (च्, ज्) के स्थान पर कवर्ग (क्, ग्) आदेश हो जाता है।
यहाँ 'उच्' के चकार 'च्' से परे क्त्वा प्रत्यय का तकार 'त्' (जो झल् वर्ण है) विद्यमान है, अतः चकार 'च्' को कुत्व होकर 'क्' हो जाता है।
→ उच् + त्वा → (च को क हुआ) → उक् + त्वा = उक्त्वा

३. गुण निषेध नियम: "क्ङिति च" (१/१/५)

नियम: कित् और ङित् प्रत्यय परे रहते धातुओं के इक् स्वरों (इ, उ, ऋ) को होने वाले गुण और वृद्धि का सर्वथा निषेध हो जाता है।
यहाँ क्त्वा प्रत्यय 'कित्' है, इसी कारण सम्प्रसारण से बने उकार **'उ' को गुण 'ओ' नहीं हो पाता** (यदि गुण हो जाता तो 'ओक्त्वा' अशुद्ध रूप बनने लगता)। अतः गुण निषेध होकर शुद्ध रूप 'उक्त्वा' ही सुरक्षित रहता है।

💡 अवशिष्ट विशेष नियम: 'वच्' धातु को 'उम्' आगम (वच उम्)

अष्टाध्यायी के सूत्र "वच उम्" (७/४/२०) के प्रसंगानुसार, कुछ विशिष्ट प्रत्ययों (जैसे— अणिङ् प्रत्यय) के परे रहते 'वच्' धातु के अकार के बाद 'उम्' (उ) का आगम हो जाता है। मित् होने के कारण 'अचोऽन्त्यात् परः' परिभाषा नियम से यह अंतिम स्वर के बाद बैठता है और सन्धि कार्य होकर धातु का रूप 'वोच' बन जाता है (जैसे लुङ् लकार में प्रयुक्त होने वाला प्रसिद्ध रूप: अव्वोचत् / अवोचत्)।

💬 वाक्य-प्रयोग उदाहरण (Sentence Usage):
  • सज्जनः सर्वदा सत्यं उक्त्वा एव मौनं भजति।
    (अर्थ: सज्जन व्यक्ति हमेशा सत्य बोलकर ही मौन धारण करता है।)
  • शिष्यः गुरुं प्रति वचनं उक्त्वा आसनं स्वीकृतवान्।
    (अर्थ: शिष्य गुरु के प्रति वचन कहकर आसन पर बैठ गया।)
📌 प्रधान सूत्र: "समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्" (७/१/३७)

सरल हिन्दी अर्थ: जब धातु से पूर्व किसी अव्यय या उपसर्ग (जैसे— प्र, परा, आ, वि, सम् आदि) का प्रयोग हुआ हो (किन्तु वह निषेधवाची 'नञ्' न हो), तो पूर्वकालिक क्रिया के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश हो जाता है।
ल्यप् प्रत्यय में से 'ल्' और 'प्' की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'य' शेष बचता है। इसके कारण धातुओं का रूप अन्त में 'त्वा' (त्वान्त) न होकर 'य' (यान्त) हो जाता है।

क्त्वा एवं ल्यप् प्रत्यय की तुलनात्मक उदाहरण सारणी:

(उपसर्ग रहित बनाम उपसर्ग युक्त रूप— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल क्रियापद उपसर्ग रहित (क्त्वा प्रत्यय) उपसर्ग युक्त (ल्यप् प्रत्यय)
नयति (नी) नी + क्त्वा = नीत्वा आ + नी + ल्यप् = आनीय
गच्छति (गम्) गम् + क्त्वा = गत्वा आ + गम् + ल्यप् = आगत्य
भवति (भू) भू + क्त्वा = भूत्वा सम् + भू + ल्यप् = सम्भूय
तिष्ठति (स्था) स्था + क्त्वा = स्थित्वा उद् + स्था + ल्यप् = उत्थाय
हरति (हृ) हृ + क्त्वा = हृत्वा वि + हृ + ल्यप् = विहृत्य
क्षालयति (क्षालि) क्षालि + क्त्वा = क्षालयित्वा प्र + क्षालि + ल्यप् = प्रक्षाल्य
हसति (हस्) हस् + क्त्वा = हसित्वा उप + हस् + ल्यप् = उपहस्य
स्मरति (स्मृ) स्मृ + क्त्वा = स्मृत्वा वि + स्मृ + ल्यप् = विस्मृत्य
जानाति (ज्ञा) ज्ञा + क्त्वा = ज्ञात्वा वि + ज्ञा + ल्यप् = विज्ञाय
क्रीणाति (क्री) क्री + क्त्वा = क्रीत्वा वि + क्री + ल्यप् = विक्रीय
नमति (नम्) नम् + क्त्वा = नत्वा प्र + नम् + ल्यप् = प्रणम्य
गृह्णाति (ग्रह्) ग्रह् + क्त्वा = गृहीत्वा सम् + ग्रह् + ल्यप् = सङ्गृह्य
आप्नोति (आप्) आप् + क्त्वा = आप्त्वा प्र + आप् + ल्यप् = प्राप्य
करोति (कृ) कृ + क्त्वा = कृत्वा उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
प्रतिष्ठति (प्र + स्था) स्था + क्त्वा = स्थित्वा प्र + स्था + ल्यप् = प्रस्थाय

👉 क्त्वा प्रत्यय के पाणिनीय नियमों को और अधिक विस्तार से समझने तथा विशिष्ट अभ्यास कार्य को हल करने के लिए नीचे दिए गए बटन पर चटका (क्लिक) लगायें। एक अलग विंडो खुलेगी:

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✨ ९. ल्यप् प्रत्यय (पाठ ३३) ✨

💡 ल्यप् प्रत्यय: विशिष्ट पाणिनीय नियम एवं प्रक्रिया

ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग करते समय धातुओं के मूल स्वरूप (जैसे— अनुबन्ध लोप, तुक् आगम, नकार लोप, वैकल्पिक व्यवस्था और णिजन्त कार्य) में होने वाले विशिष्ट परिवर्तनों को समझने के लिए निम्नलिखित पाँच मुख्य बिन्दुओं को ध्यान से देखें:

(१) मूल विधान एवं अनुबन्ध लोप: यदि धातु से पहले किसी उपसर्ग का प्रयोग हुआ हो, तो 'करके' अथवा 'कर' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए क्त्वा के स्थान पर 'ल्यप्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। ल्यप् के प्रारम्भ में प्रयुक्त लकार 'ल्' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से तथा अन्तिम पकार 'प्' की 'halन्त्यम्' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, और केवल 'य' भाग शेष बचता है जो धातु के पीछे जुड़ता है।
यथा: आ + दा + ल्यप् = आदाय वि + √नी + ल्यप् = विनीय | अनु + √भू + ल्यप् = अनुभूय
(२) ह्रस्वान्त धातु एवं तुक् (त्) आगम नियम: ल्यप् प्रत्यय से पहले यदि धातु का अन्तिम स्वर ह्रस्व (छोटा) हो, तो केवल 'य' न जोड़कर 'त्य' जोड़ते हैं; क्योंकि ऐसी स्थिति में प्रत्यय और धातु के बीच तुक् का आगम करने का विधान किया गया है। तुक् में उकार और ककार की इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, और केवल तकार 'त्' शेष बचता है।
यथा: उप + √कृ + ल्यप् = उपकृत्य | निस् + √चि + ल्यप् = निश्चित्य | वि + √जि + ल्यप् = विजित्य | अव + √कृ + ल्यप् = अवकृत्य
(३) नकारान्त धातु एवं तुक् आगम व्यवस्था: क्त्वा प्रत्यय के समान ही कुछ नकारान्त धातुओं के अन्तिम 'न' का लोप हो जाता है, किन्तु यहाँ विशेष नियम से तुक् (त्) का भी आगम होता है, जिससे अंत में 'तत्य' सुनाई देता है।
यथा: वि + √तन् + ल्यप् = वितत्य (न का लोप हुआ और तकार आगम हुआ)।

⚠️ अपवाद नियम: किन्तु इसी क्रम में प्र + √खन् + ल्यप् = प्रखन्य को अपवाद रूप में स्मरण रखना चाहिए (यहाँ नकार लोप और तुक् आगम नहीं होता)।

(४) मकारान्त धातुओं का वैकल्पिक नियम: √गम्, √नम्, √यम् और √रम् धातुओं के साथ ल्यप् प्रत्यय होने पर व्याकरण में विकल्प से दो-दो रूप बनते हैं (एक बार मकार लोप + तुक् आगम होने पर 'त्य' रूप, और दूसरी बार मकार को अनुस्वार होने पर 'म्य' रूप बनता है)।
यथा: अव + √गम् + ल्यप् = अवगत्य / अवगम्य (दोनों रूप शत-प्रतिशत शुद्ध हैं) | प्र + √नम् + ल्यप् = प्रणत्य / प्रणम्य
(५) णिजन्त एवं चुरादिगणीय धातुओं का नियम: णिजन्त (प्रेरणार्थक) एवं चुरादिगणीय धातुओं की उपधा में ह्रस्व स्वर प्रयुक्त होने पर, ल्यप् प्रत्यय जुड़ने से पहले 'अय्' का प्रयोग अक्षुण्ण बना रहता है, जिससे अन्त में 'म्य' के पहले 'अ' स्वर सुनाई देता है।
यथा: प्र + √नम् + णिच् + ल्यप् = प्रणमय्य

⚠️ अपवाद नियम: किन्तु इसी क्रम में प्र + चुर्/चोर् + ल्यप् = प्रचोर्य को अपवाद समझना चाहिए (यहाँ अय् भाग का लोप हो जाता है)।

क्त्वा एवं ल्यप् प्रत्यय विशिष्ट उदाहरण सारणी (Examples):

(उपसर्ग रहित बनाम उपसर्ग युक्त रूप— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातुः क्त्वा प्रत्ययान्तरूपम् ल्यप् प्रत्ययान्तरूपम्
सृज् सृष्ट्वा विसृज्य
कृ कृत्वा अपकृत्य
मन् मत्वा अवमत्य
क्री क्रीत्वा विक्रीय
क्षिप् क्षिप्त्वा निक्षिप्य
स्था स्थित्वा उत्थाय
भू भूत्वा संभूय
श्रि श्रित्वा आश्रित्य
हस् हसित्वा विहस्य
भ्रम् भ्रमित्वा परिभ्रम्य
हृ हृत्वा विहृत्य

📝 ल्यप् प्रत्ययान्त पदों के व्यावहारिक वाक्य-प्रयोग उदाहरण (Sentence Usage):

प्यारे बच्चो! वाक्यों में ल्यप् प्रत्ययान्त (यान्त) अव्यय पदों का प्रयोग किस प्रकार किया जाता है, इसे समझने के लिए निम्नलिखित उदाहरणों को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

१. विसृज्य (सृज्): बुद्धिमान् जनः चिन्तां विसृज्य सुखेन जीवति।
(अर्थ: बुद्धिमान मनुष्य चिंता को छोड़कर/त्यागकर सुख से जीता है।)
२. अपकृत्य (कृ): दुष्टः मित्रस्य अपकृत्य प्रसन्नः भवति।
(अर्थ: दुष्ट व्यक्ति मित्र का अपकार (बुरा) करके प्रसन्न होता है।)
३. अवमत्य (मन्): सः सज्जनान् अवमत्य पापं प्राप्नोति।
(अर्थ: वह सज्जनों का अपमान करके पाप का भागी बनता है।)
४. विक्रीय (क्री): आपणिकः वस्तूनि विक्रीय धनं अर्जयति।
(अर्थ: दुकानदार वस्तुओं को बेचकर धन कमाता है।)
५. निक्षिप्य (क्षिप्): माता पात्रे जलं निक्षिप्य गच्छति।
(अर्थ: माता बर्तन में जल डालकर/फेंककर जाती है।)
६. उत्थाय (स्था): छात्रः प्रातःकाले उत्थाय ईशं स्मरति।
(अर्थ: छात्र सुबह उठकर ईश्वर का स्मरण करता है।)
७. संभूय (भू): वयम् सर्वे संभूय कार्यं सिद्धं करिष्यामः।
(अर्थ: हम सब मिलकर कार्य को सफल करेंगे।)
८. आश्रित्य (श्रि): विनीतः शिष्यः गुरुम् आश्रित्य विद्यां पठति।
(अर्थ: विनम्र शिष्य गुरु का आश्रय लेकर विद्या पढ़ता है।)
९. विहस्य (हस्): बालः मित्रस्य वचनं श्रुत्वा विहस्य वदति।
(अर्थ: बालक मित्र की बात सुनकर हंसकर बोलता है।)
१०. परिभ्रम्य (भ्रम्): पथिकः उद्याने परिभ्रम्य उपविशति।
(अर्थ: राहगीर बगीचे में घूमकर बैठता है।)
११. विहृत्य (हृ): वानरः वने विहृत्य फलानि खादति।
(अर्थ: बन्दर वन में विहार करके/घूमकर फल खाता है।)
📌 सूत्र विस्तृतीकरण: "समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो ल्यप्" (७/१/३७)

पाणिनीय व्याख्या: 'नञ्' एक अव्यय है। सूत्र में प्रयुक्त 'अनञ्पूर्वे' पद का अर्थ है— नञ्-समास से भिन्न और नञ्-समास के सदृश अव्यय। अर्थात् यदि समास के पूर्वपद में 'नञ्' (न) से भिन्न अन्य कोई अव्यय या उपसर्ग हो, तो धातु से परे होने वाले 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश हो जाता है।
यथा निपातन प्रयोग: प्रकृत्य, प्रहृत्य, पार्श्वतः कृत्य, नानाकृत्य, द्विधाकृत्य।

⚠️ नञ्-पूर्वपद अपवाद नियम (ल्यप् प्रतिषेध):

यथा: अकृत्वा (न + कृत्वा)।
यहाँ पूर्वपद में निषेधार्थक 'नञ्' (न) अव्यय विद्यमान है। पाणिनीय नियमानुसार पूर्वपद में नञ् होने पर यह सूत्र 'ल्यप्' आदेश का सर्वथा प्रतिषेध (निषेध) कर देता है। अतः यहाँ पर क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश नहीं हुआ, बल्कि क्त्वा प्रत्यय ही अपने मूल रूप में बना रहा; जिससे शुद्ध रूप 'अकृत्वा' सिद्ध होता है।

📌 "क्त्वातोसुन्कसुनः" सूत्र के नियमानुसार 'ल्यप्' प्रत्ययान्त शब्द भी व्याकरण में **अव्यय** होते हैं। अतः इनके रूपों में लिंग, वचन या विभक्ति के कारण कोई परिवर्तन नहीं होता है।

विशिष्ट उपसर्ग-धातु योग सारणी (Examples):

(अष्टाध्यायी नियमानुसार सिद्ध रूप— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

उपसर्ग + मूल धातु (प्रक्रिया) सिद्ध ल्यप् प्रत्ययान्तरूपम्
आ + नी + ल्यप् आनीय
आ + दा + ल्यप् आदाय
द्विधा + कृ + ल्यप् द्विधाकृत्य
निर् + भिद् + ल्यप् निर्भिद्य
निस् + चि + ल्यप् निश्चित्य
उत् + प्लु + ल्यप् उत्प्लुत्य
परा + जि + ल्यप् पराजित्य
प्र + दिव् + ल्यप् प्रदीव्य
अनु + भू + ल्यप् अनुभूय
अव + कृ + ल्यप् (ऋत्व दीर्घत्व) अवकीर्य
अधि + इ + ल्यप् (दीर्घ सन्धि कार्य) अधीत्य
आ + पृ + ल्यप् आपूर्य
प्र + इ + ल्यप् (गुण सन्धि कार्य) प्रेत्य
प्र + वच् + ल्यप् (सम्प्रसारण नियम) प्रोच्य
सम् + कृ + ल्यप् (सुट् आगम नियम) संस्कृत्य
आ + ह्वे + ल्यप् (सम्प्रसारण नियम) आहूय
उद् + तृ + ल्यप् (दीर्घ ऋत्व कार्य) उत्तीर्य
अनु + वद् + ल्यप् (सम्प्रसारण नियम) अनूद्य
📋 नोट: 'ल्यप्' प्रत्यय के योग में निम्नलिखित विशेष कार्य ध्यान में रखने चाहिए:
१. ह्रस्वान्त धातु नियम: ह्रस्वान्त (जिस धातु के अंत में छोटा स्वर हो) धातु के परे होने पर 'तुक्' (त्) का आगम हो जाता है।
यथा: वि + जि + ल्यप् = विजित्य | उप + कृ + ल्यप् = उपकृत्य
२. नकारान्त धातु नियम: तन्, मन्, हन् आदि धातुओं के अन्तिम 'नकार' (न्) का लोप हो जाता है और तुक् (त्) का आगम होता है।
यथा: वि + तन् + ल्यप् = वितत्य | आ + हन् + ल्यप् = आहत्य इत्यादि।
३. मकारान्त धातु नियम: गम्, रम्, यम्, रम् धातुओं के अन्तिम 'मकार' (म्) का विकल्प से लोप होता है (लोप होने पर तुक् आगम से 'त्य' और लोप न होने पर 'म्य' बनता है)।
यथा: आ + गम् + ल्यप् = आगत्य / अवगम्य | प्र + नम् + ल्यप् = प्रणत्य / प्रणम्य आदि।
४. अनुनासिकोपध धातु नियम: मूल इकारान्त से भिन्न जो अनुनासिकोपध (जिसके उपधा में अनुनासिक व्यंजन हो) धातुएँ होती हैं, उनके अनुनासिक का लोप हो जाता है।
यथा: परि + स्वञ्ज् + ल्यप् = परिष्वज्य (नकार का लोप हुआ)।
⚠️ अपवाद: किन्तु 'चुँबि' धातु से अनुनासिक लोप नहीं होता, यथा— परि + चुम्ब् + ल्यप् = परिचुम्ब्य
५. ण्यन्त/णिजन्त धातु नियम: ण्यांत धातुओं के 'णिच' (इ) का लोप हो जाता है, किन्तु यदि धातु का पूर्व स्वर लघु (छोटा) हो, तो णिच के स्थान में 'अय्' आदेश अक्षुण्ण रहता है।
यथा (णिच लोप पक्ष): वि + चिन्ति + य = विचिन्त्य | प्र + पीडि + य = प्रपीड्य | सम् + बोधि + य = सम्बोध्य
यथा (लघु उपधा 'अय्' पक्ष): वि + गणि + ल्यप् = विगणय्य | वि + घटि + ल्यप् = विघटय्य | प्र + नमि + ल्यप् = प्रणमय्य
📌 प्रसंगवश विशेष: पौनःपुन्य (बार-बार) अर्थ में 'णमुल्' प्रत्यय

पाणिनीय व्याकरण के नियमानुसार, जब वाक्य में पौनःपुन्य (किसी कार्य को बार-बार दोहराने) का अर्थ प्रकट करना हो, तो क्त्वा प्रत्यय के ही अर्थ में धातु से 'णमुल्' प्रत्यय का विधान किया जाता है। णमुल् प्रत्यय का विस्तार आगे दिया गया है
णमुल् प्रत्यय में से 'ण्' और 'ल' का लोप होकर केवल 'अम्' शेष बचता है। पौनःपुन्य अर्थ होने के कारण इस प्रत्ययान्त पद का सदा द्वित्व (दो बार प्रयोग) किया जाता है।

📋 णमुल् प्रत्यय के प्रमुख प्रामाणिक उदाहरण:
  • स्मारं स्मारं नमति कृष्णम् । (अर्थात्: स्मृत्वा स्मृत्वा— कृष्ण को बार-बार याद करके प्रणाम करता है।)
  • पायं पायम् (पा + णमुल् → बार-बार पीकर।)
  • भोजं भोजम् (भुज् + णमुल् → बार-बार भोजन करके।)
  • श्रावं श्रावम् (श्रु + णमुल् → बार-बार सुनकर।)

📜 काव्य ग्रन्थों से उत्कृष्ट ल्यप् प्रत्ययान्त वाक्य-प्रयोग उदाहरण (Classical Literature Examples):

प्यारे बच्चो! संस्कृत के महाकाव्यों और पौराणिक ग्रन्थों में ल्यप् प्रत्यय का प्रयोग किस प्रकार किया गया है, इसे समझने के लिए निम्नलिखित विशिष्ट उदाहरणों को ध्यानपूर्वक पढ़ें:

१. समानीय (सम् + आ + नी + ल्यप्): सुग्रीवः सर्वान् वानरान् समानीय दिशः प्रति प्रस्थापयामास ।
(अर्थ: सुग्रीव ने सभी वानरों को एक साथ बुलाकर/एकत्र करके दिशाओं की ओर रवाना किया।)
२. विज्ञाय (वि + ज्ञा + ल्यप्): श्रीरामः मारीचस्य कपटं विज्ञाय लक्ष्मणं सचेतनं चकार ।
(अर्थ: श्रीराम ने मारीच के कपट (धोखे) को विशेष रूप से जानकर लक्ष्मण को सचेत/सावधान किया।)
३. प्रणम्य (प्र + नम् + ल्यप्): हनुमान् सीतायाः पुरतः प्रणम्य मुद्रिकां समर्पितवान् ।
(अर्थ: हनुमान जी ने माता सीता के सम्मुख आदरपूर्वक प्रणाम करके श्रीराम की अँगूठी उन्हें समर्पित की।)
४. उत्तीर्य (उद् + तृ + ल्यप्): वानरसेना समुद्रं उत्तीर्य लङ्कापुर्यां प्रवेशं कृतवती ।
(अर्थ: वानरसेना ने विशाल समुद्र को पार करके लंकापुरी में प्रवेश किया।)

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — वाक्येषु प्रत्यय-प्रयोगः

प्यारे बच्चो! अब आप नीचे दिए गए उदाहरण के अनुसार कोष्ठक में दी गई क्रियाओं में आवश्यकतानुसार 'क्त्वा' अथवा 'ल्यप्' प्रत्यय जोड़कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

🎯 उदाहरणम् (Model):
अध्यापकः .................... विद्यालयम् आगच्छति । (पठति)
→ अध्यापकः पठित्वा विद्यालयम् आगच्छति ।
(क) अहं नदीतीरे .................... गृहं गच्छामि । (भ्रमामि)
(ख) रमेशः दुग्धं .................... स्वपिति । (पिबति)
(ग) पिता .................... भगवन्तं स्मरति । (उत्तिष्ठति)
(घ) मम भगिनी पुष्पम् .................... मन्दिरं गच्छति । (आनयति)
(ङ) छात्रः लेखं .................... अध्यापकं दर्शयति । (लिखति)
(च) किं त्वं फलं .................... व्यायामं करोषि ? (खादसि)
(छ) सा बालिका .................... लिखति । (शृणोति)
(ज) मम भ्राता कदापि .................... न गच्छति । (वदति)
(झ) स्नेहा उत्तरं .................... उपविशति । (ददाति)
(ञ) तस्य मित्रं .................... खादति । (स्नाति)
🔑 उत्तर सूचिका (Answer Key) - शुद्ध रूपों का मिलान करने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ सभी रिक्त स्थानों के शुद्ध पाणिनीय उत्तर:

(क) भ्रमामि (भ्रम्) → भ्रमित्वा (उपसर्ग रहित होने से क्त्वा प्रत्यय हुआ)
(ख) पिबति (पा) → पीत्वा (पा धातु के आकार को ईत्व होकर क्त्वा हुआ)
(ग) उत्तिष्ठति (उद् + स्था) → उत्थाय (⚠️ 'उद्' उपसर्ग होने के कारण क्त्वा के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश हुआ)
(घ) आनयति (आ + नी) → आनीय (⚠️ 'आ' उपसर्ग होने के कारण क्त्वा के स्थान पर 'ल्यप्' आदेश हुआ)
(ङ) लिखति (लिख्) → लिखित्वा / लेखित्वा (विकल्प नियम से दोनों रूप शुद्ध हैं)
(च) खादसि (खाद्) → खादित्वा (इडागम सहित क्त्वा प्रत्यय हुआ)
(छ) शृणोति (श्रु) → श्रुत्वा (मूल स्वर में बिना परिवर्तन के क्त्वा प्रत्यय हुआ)
(ज) वदति (वद्) → उदित्वा (वकार को पाणिनीय सम्प्रसारण 'उ' आदेश हुआ)
(झ) ददाति (दा) → दत्त्वा (दा धातु से द्वित्व होकर दत्त्वा रूप सिद्ध होता है)
(ञ) स्नाति (स्ना) → स्नात्वा (आकारान्त धातु में सीधे 'त्वा' का योग हुआ — *मूल सूची के दूसरे 'ज' को वर्णक्रमानुसार 'ञ' किया गया है*)

📋 ल्यप् प्रत्ययान्त शब्दों का महत्वपूर्ण संग्रह (Vocabulary):

(उपसर्ग-धातु योग एवं उनके सटीक अर्थ— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

उपसर्ग + मूल धातुः सिद्ध ल्यप् रूपम् सरल हिन्दी अर्थ
आ + गम् + ल्यप् आगम्य / आगत्य आकर
आ + नी + ल्यप् आनीय लाकर
आ + दृ + ल्यप् आदृत्य आदर कर / आदर करके
आ + धा + l्यप् आधाय स्थापित कर / रखकर
आ + प्रच्छ् + ल्यप् आपृच्छ्य पूछकर / विदा लेकर
अनु + कृ + ल्यप् अनुकृत्य नकल कर / अनुकरण करके
अनु + ग्रह् + ल्यप् अनुगृह्य दया कर / कृपा करके
अनु + ज्ञा + ल्यप् अनुज्ञाय आदेश कर / अनुमति लेकर
अनु + नी + ल्यप् अनुनीय अनुनय कर / मनाकर
अनु + भू + ल्यप् अनुभूय अनुभव कर / भोगकर
अनु + शुच् + ल्यप् अनुशोच्य भली प्रकार सोचकर / शोक कर
अनु + स्था + ल्यप् अनुष्ठाय अनुष्ठान कर / आचरण करके
अनु + वद् + ल्यप् अनूद्य अनुवाद कर / कहकर
अधि + इ + ल्यप् अधीत्य पढ़कर (मूल पाठ का 'अवि + इ' सुधारा गया)
अप + कृ + ल्यप् अपकृत्य अपकार कर / बुरा करके
अधि + गम् + ल्यप् अधिगम्य / अधिगत्य पाकर / जानकर
अभि + अस् + ल्यप् अभ्यस्य रटकर / अभ्यास करके
अव + तृ + ल्यप् अवतीर्य उतरकर / पार करके
अव + मन् + ल्यप् अवमत्य अपमान कर / अनादर करके
अव + गम् + l्यप् अवगम्य / अवगत्य जानकर / समझकर
उत् + पद् + ल्यप् उत्पद्य पैदा होकर (उत्पत्युत्पत्ति हेतु मूल धातु 'पद्' की गई)
उत् + प्लु + ल्यप् उत्प्लुत्य कूदकर / उछलकर
उत् + डी + ल्यप् उड्डीय उड़कर
उत् + तृ + ल्यप् उत्तीर्य पार कर / उत्तीर्ण होकर
परा + अय् + ल्यप् पलाय्य भागकर (परा + अच् के स्थान पर व्याकरण सम्मत धातु)
परा + जि + ल्यप् पराजित्य हराकर
नि + धा + ल्यप् निधाय रखकर
निर् + गम् + ल्यप् निर्गम्य / निर्गत्य निकलकर
नि + पत् + ल्यप् निपत्य गिरकर
प्र + दा + ल्यप् प्रदाय देकर
प्र + भू + ल्यप् प्रभूय समर्थ होकर
प्र + बुध् + ल्यप् प्रबुध्य जागकर
प्र + आप् + ल्यप् प्राप्य पाकर
प्र + विश् + ल्यप् प्रविश्य प्रवेश कर / प्रवेश करके
प्र + स्था + ल्यप् प्रस्थाय प्रस्थान कर / प्रस्थान करके
प्र + हृ + ल्यप् प्रहृत्य प्रहार कर / प्रहार करके
प्र + वच् + ल्यप् प्रोच्य कहकर
प्र + नी + ल्यप् प्रणीय बनाकर / रचना करके
प्र + नि + पत् + ल्यप् प्रणिपत्य प्रणाम कर / प्रणाम करके
सम् + धा + ल्यप् सन्धाय जोड़कर
सम् + भू + ल्यप् संभूय पैदा होकर / मिलकर
सम् + कृ + ल्यप् संस्कृत्य साफ कर / परिष्कृत करके
सम् + स्मृ + ल्यप् संसंस्मृत्य स्मरण कर / याद करके
सम् + हृ + ल्यप् संहृत्य नाश कर / समेटकर
सम् + क्षिप् + ल्यप् संक्षिप्य संक्षिप्त कर / संक्षेप में करके
सम् + गम् + ल्यप् सङ्गम्य / सङ्गत्य मिलकर
सम् + ग्रह् + ल्यप् सङ्गृह्य इकट्ठा कर / संग्रह करके
सम् + चि + ल्यप् संचित्य संचय कर / चुनकर
सम् + दिह् + ल्यप् संदिह्य सन्देह कर / शंका करके
वि + हा + ल्यप् विहाय छोड़कर
वि + भज् + ल्यप् विभज्य बांटकर
वि + लोक् + ल्यप् विलोक्य देखकर
वि + जि + ल्यप् विजित्य जीतकर
वि + कृ + ल्यप् (दीर्घत्व नियम) विकीर्य बिखेरकर
वि + कृ + ल्यप् (तुक् नियम)
वि + ज्ञा + ल्यप् विज्ञाय जानकर
वि + श्रम् + ल्यप् विश्रम्य / विश्रान्त्य आराम कर / विश्राम करके
वि + स्मृ + ल्यप् विस्मृत्य भूलकर
वि + हस् + ल्यप् विहस्य हँसकर
वि + हृ + ल्यप् विहृत्य विहार कर / घूमकर
प्रति + श्रु + ल्यप् प्रतिश्रुत्य प्रतिज्ञा कर / स्वीकार करके
प्रति + अभि + ज्ञा + ल्यप् प्रत्यभिज्ञाय पहचानकर
प्रति + आ + गम् + ल्यप् प्रत्यागम्य / प्रत्यागत्य लौटकर

✨ १०. क्यप् प्रत्यय (पाठ ३२) ✨

📌 प्रधान सूत्र: "एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप्" (३/१/१०९)

सरल हिन्दी अर्थ: भाव तथा कर्म के अर्थ में इ (इण्), स्तु (ष्टुञ्), शास्, वृ (वृङ्), दृ (दीङ्), जुष् तथा वृत्, वृध् आदि अन्यान्य विशिष्ट धातुओं से योग्यता या चाहिए के अर्थ में 'क्यप्' प्रत्यय होता है।

⚙️ वर्ण परिवर्तन एवं अनुबन्ध लोप की प्रक्रिया:
क्यप् प्रत्यय में प्रारम्भिक ककार 'क्' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से इत्संज्ञा होती है तथा अन्तिम पकार 'प्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत्संज्ञा होती है। इसके पश्चात् 'तस्य लोपः' से दोनों का लोप होकर केवल 'य' भाग शेष बचता है, जो धातु के साथ जुड़ता है।
१. प्रत्यय को 'पित्' करने का फल: चूँकि इस प्रत्यय में पकार 'प्' की इत्संज्ञा होती है, इसलिए यह 'पित्' प्रत्यय कहलाता है। पित् कृत् प्रत्यय परे रहने के कारण ह्रस्वान्त धातुओं को 'ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्' सूत्र से 'तुक्' (त्) का आगम हो जाता है।
२. प्रत्यय को 'कित्' करने का फल: चूँकि इस प्रत्यय में ककार 'क्' की इत्संज्ञा होती है, इसलिए यह 'कित्' प्रत्यय माना जाता है। कित् होने के कारण 'क्ङिति च' सूत्र से धातु के मूल स्वर को होने वाले गुण का सर्वथा निषेध हो जाता है।
🔍 तुक् आगम का नियम: "ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्" (६/१/७१)

नियम का अर्थ: पित् कृत् प्रत्यय के परे रहने पर पूर्व में स्थित ह्रस्व स्वर (वर्ण) को 'तुक्' का आगम होता है। तुक् में से उकार और ककार की इत्संज्ञा होकर केवल 'त्' शेष बचता है।
यह प्रत्यय 'कित्' होने के कारण 'आद्यन्तौ टकितौ' परिभाषा नियम से ह्रस्व स्वर के तुरंत बाद उसका अन्तावयव (पीछे बैठने वाला) होकर तकार 'त्' बैठ जाता है।

प्रमुख उदाहरण एवं रूप-सिद्धि मीमांसा:

१. इत्यः (इण् गतौ - जाने योग्य):
गत्यर्थक 'इ' धातु से सामान्यतः 'अचो यत्' सूत्र द्वारा 'यत्' प्रत्यय प्राप्त था, उसे बाधित करके विशेष सूत्र 'एतिस्तुशास्वृदृजुषः क्यप्' से यहाँ 'क्यप्' प्रत्यय हुआ। अनुबन्ध लोप के बाद 'इ + य' स्थिति बनी। यहाँ धातु का स्वर ह्रस्व 'इ' है तथा परे प्रत्यय 'पित्' है, अतः 'ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्' सूत्र से तुक् (त्) का आगम हुआ।
अनुबन्ध लोप होकर तकार 'त्' ह्रस्व वर्ण 'इ' के बाद अन्तावयव होकर बैठा, जिससे 'इत्य' प्रातिपदिक बना। इसके बाद सु-विभक्ति, रुत्व और विसर्ग कार्य होकर शुद्ध रूप 'इत्यः' सिद्ध होता है।
⚠️ यदि यहाँ यत् प्रत्यय होता तो: तुक् आगम नहीं हो पाता और धातु के 'इ' को गुण 'ए' तथा अय् आदेश होकर 'अयः' ऐसा अनिष्ट व अशुद्ध रूप बनने लगता।
२. स्तुत्यः (ष्टुञ् स्तुतौ - स्तुति करने योग्य):
'स्तु' धातु से भी इसी पाणिनीय प्रक्रिया के अनुसार पहले क्यप् प्रत्यय होता है। इसके बाद ह्रस्व स्वर होने से 'तुक्' (त्) का आगम, सु-उत्पत्ति, रुत्व और विसर्ग कार्य संपन्न होकर शुद्ध रूप 'स्तुत्यः' सिद्ध होता है।
📌 विशेष सूत्र: "शास इदङ्हलोः" (६/४/३४)

नियम का अर्थ: 'अङ्' प्रत्यय परे रहते अथवा ऐसा 'हलादि' (व्यञ्जन से प्रारम्भ होने वाला) प्रत्यय परे रहते जो 'कित्' या 'ङित्' हो, तो 'शास्' धातु की उपधा के आकार (आ) को ह्रस्व इकार 'इ' आदेश हो जाता है।
यथा रूप-सिद्धि (शिष्यः): 'शास्' (अनुशिष्टौ) धातु से हलन्त होने के कारण 'ऋहलोर्ण्यत्' से 'ण्यत्' प्रत्यय प्राप्त था। उसे बाधित करके क्यप् प्रत्यय हुआ। अनुबन्ध लोप के बाद 'शास् + य' स्थिति बनी। क्यप् प्रत्यय 'यादि हलादि कित्' है, अतः इस सूत्र से शास् के 'आ' को 'इ' आदेश होकर 'शिस् + य' बना। इसके बाद 'शासिवसिघसीनां च' सूत्र से सकार को षत्व होकर 'शिष्य' प्रातिपदिक बना। सु-विभक्ति, रुत्व और विसर्ग कार्य होकर शुद्ध रूप 'शिष्यः' सिद्ध हुआ। 

इसीतरह वृ से क्यप् और तुक् करके वृत्यः, आ पूर्वक दृ से आदृत्यः बना । जुष् से क्यप् होकर जुष्यः बनता है। 

⚙️ विकल्प सूत्र: "मृजेर्विभाषा" (३/१/११३)

नियम का अर्थ: 'मृज्' (साफ करना) धातु से 'क्यप्' प्रत्यय विकल्प (अपनी इच्छा) से होता है। विकल्प होने के कारण इसके दो अलग-अलग पाणिनीय रूप सिद्ध होते हैं:

१. क्यप् प्रत्यय होने के पक्ष में (मृज्यः): जब मृज् धातु से क्यप् प्रत्यय होगा, तब अनुबन्ध लोप के बाद 'मृज् + य' बना। चूँकि क्यप् प्रत्यय 'कित्' है, इसलिए 'क्ङिति च' सूत्र से इसकी लघूपध ऋकार को होने वाले गुण का निषेध हो जाता है। इस प्रकार शुद्ध रूप 'मृज्यः' सिद्ध होता है।
२. क्यप् प्रत्यय न होने के पक्ष में (मार्ग्यः): जब विकल्प से क्यप् प्रत्यय नहीं होगा, तब हलन्त नियम के अनुसार 'ऋहलोर्ण्यत्' सूत्र से 'ण्यत्' प्रत्यय होगा। ण्यत् होने के कारण 'मृजेर्वृद्धिः' सूत्र से ऋकार को अचो ञ्णिति नियम द्वारा 'आर' वृद्धि हो जाएगी। इसके बाद 'चजोः कु घिण्ण्यतोः' सूत्र से जकार को कुत्व (ग्) आदेश होकर शुद्ध रूप 'मार्ग्यः' सिद्ध होता है।

क्यप् प्रत्यय के सभी प्रामाणिक उदाहरण सारणी (Summary):

(अष्टाध्यायी नियमानुसार सिद्ध रूप— मोबाइल पर पूरी सारणी देखने के लिए इसे दाएं-बाएं खिसकाएं ↔)

मूल धातु प्रत्यय योग एवं व्याकरण प्रक्रिया सिद्ध कृदन्त रूप
(इण्) इ + क्यप् (य) → पित् होने से तुक् (त्) आगम इत्यः
स्तु (ष्टुञ्) स्तु + क्यप् (य) → पित् होने से तुक् (त्) आगम स्तुत्यः
शास् शास् + क्यप् → आ को ईत्व (इ) और स को षत्व कार्य शिष्यः
वृ (वृङ्) वृ + क्यप् → तुक् (त्) आगम नियम (वृत्यम् भी बनता है) वृत्यः
आ + दृ आ + दृ + क्यप् → उपसर्ग पूर्वक तुक् (त्) आगम आदृत्यः
जुष् जुष् + क्यप् → कित् होने से गुण का सर्वथा निषेध जुष्यः
वृध् वृध् + क्यप् → अन्यान्य विशिष्ट हलादि नियम वृध्यम्
मृज् (विकल्प) मृज् + क्यप् / ण्यत् → विकल्प से गुण निषेध या वृद्धि कार्य मृज्यः / मार्ग्यः
🔥 क्यप् प्रत्यय के महत्वपूर्ण विशेष प्रयोग (निपातन एवं अपवाद):

पाणिनीय व्याकरण में कुछ विशिष्ट पदों की सिद्धि के लिए क्यप् प्रत्यय के अंतर्गत विशेष निपातन (असाधारण नियम) कार्य होते हैं, जो परीक्षाओं के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक समझें:

१. राजसूयः / राजसूयम् (राज्ञा सोतव्यः वा राजा सोमः सूयते):
'राजन्' शब्द उपपद रहते 'सू' (अभिषवे) धातु से विशेष निपातन नियम द्वारा क्यप् प्रत्यय होकर **राजसूयः** (पुल्लिंग - यज्ञ विशेष) अथवा **राजसूयम्** (नपुंसकलिंग) पद सिद्ध होता है। इसका अर्थ राजा द्वारा संपादित किया जाने वाला सोम-यज्ञ है।
२. सूर्यः (सरति आकाशे इति):
आकाश में निरन्तर गति करने के अर्थ में **'सृ'** (गतौ) धातु से पाणिनीय विशेष नियम द्वारा क्यप् प्रत्यय का विधान करके और ऊत्व-दीर्घ कार्य करके जगत के प्रकाशक **'सूर्यः'** पद की सिद्धि होती है।
३. मृषोद्यम् (मृषा + वद् + क्यप्):
'मृषा' (झूठ) उपपद रहते **'वद्'** (बोलना) धातु से क्यप् प्रत्यय होने पर, वकार को सम्प्रसारण 'उ' होकर तथा गुण सन्धि कार्य से **'मृषोद्यम्'** (झूठ बोलना या असत्य कथन) पद सिद्ध होता है।
४. रुच्यम् (रुच + क्यप्):
**'रुच्'** (अच्छा लगना/दीप्ति) धातु से क्यप् प्रत्यय होने पर, कित् होने के कारण लघूपध गुण का निषेध हो जाता है और सीधे रूप **'रुच्यम्'** (रोचक या सुन्दर) बनता है।
५. गुप्यम् (गुप + क्यप्):
**'गुप्'** (छिपाना/रक्षा करना) धातु से क्यप् प्रत्यय होने पर सोना-चाँदी से भिन्न धन (जैसे— ताँबा, काँसा या अन्य गुप्त संपत्ति) के अर्थ में **'गुप्यम्'** पद सिद्ध होता है।
६. कृष्टपच्याः (कृष्ट स्वयमेव पच्यन्ते इति):
'कृष्ट' शब्द उपपद रहते **'पच्'** (पकाना) धातु से क्यप् प्रत्यय होकर विशेष निपातन से **'कृष्टपच्याः'** पद सिद्ध होता है, जिसका अर्थ है— ऐसी फसल या अनाज जो बिना जोते (स्वयं ही) खेतों में पककर तैयार हो जाती है।
७. अव्यथ्यः (न व्यथते इति):
नञ् ('न') उपपद रहते **'व्यथ्'** (दुःखी होना/डराना) धातु से क्यप् प्रत्यय का योग होने पर **'अव्यथ्यः'** पद सिद्ध होता है, जिसका अर्थ है— जो कभी व्यथित या विचलित नहीं होता।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises) — क्यप् प्रत्यय

प्यारे बच्चो! अब आप क्यप् प्रत्यय के सूत्रों, नियमों और विशेष प्रयोगों के आधार पर निम्नलिखित त्रि-स्तरीय अभ्यास पत्र को हल कीजिए:

अनुभाग १. प्रकृति-प्रत्यय संयोजनं कुरुत (प्रकृति और प्रत्यय जोड़कर शुद्ध रूप लिखिए):

  1. इ (इण्) + क्यप् = .................... (संकेत: 'ह्रस्वस्य पिति...' से तुक् आगम करें)
  2. शास् + क्यप् = .................... (संकेत: 'शास इदङ्हलोः' से आ को इ तथा स को षत्व करें)
  3. जुष् + क्यप् = .................... (संकेत: कित् होने से गुण का निषेध रखें)
  4. मृषा + वद् + क्यप् = .................... (संकेत: विशेष निपातन से सम्प्रसारण और गुण करें)
  5. मृज् + क्यप् (पक्षे) = .................... (संकेत: विकल्प नियम से गुण-रहित रूप लिखें)

अनुभाग २. वाक्येषु क्यप्-प्रत्ययान्तरूपाणि प्रयोज्य रिक्तस्थानानि पूरयत (वाक्य में प्रयोग करें):

  1. गुरुकुले विनीतः .................... गुरुं सेवते। (शास् + क्यप्, पुंलिङ्ग एकवचन)
  2. ईश्वरः सर्वैः सज्जनैः .................... अस्ति। (ष्टुञ् / स्तु + क्यप्)
  3. सज्जनाः कदापि .................... न वदन्ति। (मृषा + वद् + क्यप्)
  4. प्राचीनकाले नृपः .................... यज्ञं सम्पादितवान्। (राजन् + सू + क्यप्)
  5. धार्मिकः जनः संसारे सर्वदा .................... तिष्ठति। (न + व्यथ् + क्यप्)

अनुभाग ३. शुद्धं रूपं विकल्पात् चित्वा लिखत (सही विकल्प का चयन करें):

  1. 'मृजेर्विभाषा' सूत्र के नियम से 'मृज्' धातु के कौन-से दो शुद्ध रूप सिद्ध होते हैं?
  2. 'सरति आकाशे इति' इस लौकिक विग्रह में 'सृ' धातु से क्यप् प्रत्यय होने पर क्या रूप निपातित होता है?
  3. सोना और चाँदी से भिन्न धन के अर्थ में 'गुप्' धातु से क्यप् प्रत्यय लगाने पर क्या रूप बनता है?
🔑 स्वमूल्यांकन सूचिका (Answer Key) - उत्तरों की जाँच करने के लिए यहाँ क्लिक करें

✓ अनुभाग १ के शुद्ध उत्तर (प्रकृति-प्रत्यय संयोजन):

  • इत्यः (तुक् आगम के कारण तकार का आगमन हुआ)
  • शिष्यः (शास इदङ्हलोः से आ → इ तथा षत्व कार्य)
  • जुष्यः (गुण का निषेध होने से उकार सुरक्षित रहा)
  • मृषोद्यम् (वद् के वकार को सम्प्रसारण उ तथा ओ गुण सन्धि)
  • मृज्यः (क्यप् पक्ष में गुण निषेध होने से मृज्यः रूप बना)

✓ अनुभाग २ के शुद्ध उत्तर (वाक्य प्रयोग):

  • गुरुकुले विनीतः शिष्यः गुरुं सेवते।
  • ईश्वरः सर्वैः सज्जनैः स्तुत्यः अस्ति।
  • सज्जनाः कदापि मृषोद्यम् न वदन्ति।
  • प्राचीनकाले नृपः राजसूयम् (या राजसूयं यज्ञं) सम्पादितवान्।
  • धार्मिकः जनः संसारे सर्वदा अव्यथ्यः तिष्ठति।

✓ अनुभाग ३ के शुद्ध उत्तर (MCQ):

  • (ख) मृज्यः / मार्ग्यः (मृजेर्विभाषा से क्यप् पक्ष में मृज्यः और ण्यत् पक्ष में मार्ग्यः बनता है)
  • (ग) सूर्यः (सृ धातु से क्यप् होकर विशेष निपातन से सूर्यः सिद्ध होता है)
  • (ख) गुप्यम् (ताँबा, काँसा आदि धन के अर्थ में गुप्यम् रूप ही शुद्ध पाणिनीय है)

✨ ११. शतृ प्रत्यय (पाठ ३४) ✨

💡 लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे — 3.2.124

प्रथमा विभक्ति को छोड़कर शेष विभक्तियों में समानाधिकरण होने पर लट् के स्थान पर शतृ तथा शानच् प्रत्यय होते हैं।

(१) लकार का स्थान: शतृ, शानच् प्रत्यय लट् लकार के स्थान पर होता है।
(२) धातु भेद नियम: परस्मैपदी धातुओं से शतृ प्रत्यय तथा आत्मनेपदी धातु से शानच् प्रत्यय होता है।
(३) उभयपदी नियम: उभयपदी धातुओं से शतृ और शानच् दोनों प्रत्यय होते हैं।
(४) काल विधान: यह प्रत्यय लट् के स्थान में होता है, अतः यह वर्तमानकालिक प्रत्यय है।
(५) विभक्ति निषेध: यह प्रत्यय प्रथमा विभक्ति को छोड़कर अन्य विभक्तियों में लगता है।
(६) अपवाद/विकल्प नियम: कहीं-कहीं (विकल्प से) प्रथमा समानाधिकरण में भी ये दोनों प्रत्यय होते हैं।
(७) शेष भाग: शतृ में अन् तथा शानच् में आन या मान शेष रहता है।
(८) विशेष्य-विशेषण भाव: इसमें वही लिंग होगा जो विशेष्य में होगा। अतः इनके विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं।
(९) गण एवं विकरण व्यवस्था: जो धातु जिस गण का हो, उस गण का विकरण भी धातु के साथ प्रयोग होता है, जैसेः– पठ् - शप् - शतृ — पठत्। पठ् धातु भ्वादि गण का है, इसमें शप् विकरण होता है। इस पेज पर सभी गणों के विकरण दिए गए हैं। शतृ और शानच् प्रत्यय लगाने के पहले यह देखना चाहिए कि वह धातु किस गण का है और उसमें कौन सा विकरण लगेगा।
(१०) शब्द रूप संचालन: शतृ प्रत्ययान्त शब्द का रूप पुल्लिङ्ग में पठत्‌ के समान, स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान तथा नपुंसक लिंग में जगत्‌ के समान रूप चलेंगे।
💡 शतृ प्रत्यय के रूप तीनों लिंगों में क्यों चलते हैं?

शतृ प्रत्ययान्त शब्द वाक्य में अपने विशेष्य (Subject/Noun) के विशेषण के रूप में कार्य करते हैं। संस्कृत व्याकरण के नियमानुसार, विशेषण का वही लिंग, विभक्ति और वचन होता है जो उसके विशेष्य का होता है (यल्लिङ्गं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेष्यस्य, तल्लिङ्गं तद्वचनं सा च विभक्तिर्विशेषणस्यापि)। इसलिए, विशेष्य के अनुसार शतृ प्रत्ययान्त शब्दों के रूप भी तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और वचनों में चलते हैं।

📋 मूल धातु के साथ शतृ-प्रत्यय रूप संरचना
धातु पुल्लिंग स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग अर्थ
पा (पीना) पिबन् पिबन्ती पिबत् पीता हुआ / पीती हुई
घ्रा (सूंघना) जिघ्रन् जिघ्रन्ती जिघ्रत् सूंघता हुआ / सूंघती हुई
कथ् (कहना) कथयन् कथयन्ती कथयत् कहता हुआ / कहती हुई
दृश् (देखना) पश्यन् पश्यन्ती पश्यत् देखता हुआ / देखती हुई
✨ आओ बच्चों! कुछ और उदाहरणों से सीखें (अन्य उदाहरण)

प्यारे बच्चों, परीक्षा में शतृ प्रत्यय को आसानी से पहचानने के लिए नीचे दी गई तालिका को ध्यान से देखें। ध्यान दें कि जब धातु के साथ शतृ जुड़ता है, तो पुल्लिंग में अंत में 'न्', स्त्रीलिंग में 'न्ती' और नपुंसकलिंग में 'त्' की ध्वनि शेष बचती है।

📋 प्रमुख धातुओं के शतृ-प्रत्ययान्त रूप
धातु + प्रत्यय पुल्लिंग स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग
पठ् + शतृ पठन् पठन्ती पठत्
लिख् + शतृ लिखन् लिखन्ती लिखत्
पच् + शतृ पचन् पचन्ती पचत्
दृश् + शतृ पश्यन् पश्यन्ती पश्यत्
गम् + शतृ गच्छन् गच्छन्ती गच्छत्
भू + शतृ भवन् भवन्ती भवत्
मिल् + शतृ मिलन् मिलन्ती मिलत्
नी + शतृ नयन् नयन्ती नयत्
घ्रा + शतृ जिघ्रन् जिघ्रन्ती जिघ्रत्
दा + शतृ यच्छन् यच्छन्ती यच्छत्
क्रीड् + शतृ (खेलना) क्रीडन् क्रीडन्ती क्रीडत्
खाद् + शतृ (खाना) खादन् खादन्ती खादत्
हस् + शतृ (हँसना) हसन् हसन्ती हसत्
🎯 इन उदाहरणों के पीछे छिपा विशेष उद्देश्य:

प्यारे बच्चों, यहाँ दो बातें बहुत ध्यान देने योग्य हैं जो आपकी परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं:
१. धातु स्वरूप में परिवर्तन (आदेश): कुछ धातुओं में प्रत्यय जुड़ते समय उनके मूल रूप में बदलाव आ जाता है। जैसे गम् का 'गच्छन्' और प्रच्छ् का 'पृच्छन्' बनता है। अतः केवल मूल धातु रटने के बजाय उसके परिवर्तित रूप को पहचानना सीखें।
२. विभक्तियों का खेल (वाक्य प्रयोग): शतृ प्रत्यय का प्रयोग प्रथमा विभक्ति के अलावा अन्य विभक्तियों में भी होता है। जब यह विशेषण बनता है, तो इसके रूप राम या नदी शब्द की तरह द्वितीय, तृतीय आदि विभक्तियों में बदल जाते हैं।

📌 विशिष्ट धातुओं के शतृ-प्रत्ययान्त पुंलिंग रूप
मूल धातु + प्रत्यय सिद्ध पुंलिंग रूप विशेष संकेत (बच्चों के लिए)
क्रुध् + शतृ (क्रोध करना) क्रुध्यन् दिवादिगण होने से 'य' जुड़ा
गम् + शतृ (जाना) गच्छन् गम् को 'गच्छ' आदेश हुआ
प्रच्छ् + शतृ (पूछना) पृच्छन् 'र' को 'ऋ' (सम्प्रसारण) हुआ
चुर् + शतृ (चुराना) चोरयन् चुरादिगण होने से 'अय' जुड़ा
भू + शतृ (होना) भवन् 'ऊ' को गुण 'ओ' और 'अव्' हुआ
जि + शतृ (जीतना) जयन् 'इ' को गुण 'ए' और 'अय्' हुआ
💬 शतृ-प्रत्ययान्त पदों के व्यावहारिक वाक्य-प्रयोग उदाहरण
उदाहरण १: पिबन्तं बालकं पश्य।
सरल हिन्दी अनुवाद: पीते हुए बालक को देखो।
💡 व्याकरण रहस्य: यहाँ 'बालकम्' में द्वितीया विभक्ति एकवचन है, इसलिए उसके विशेषण 'पिबत्' में भी द्वितीया विभक्ति लगकर पिबन्तम् रूप बना।
उदाहरण २: माता जिघ्रन्तीं बालिकां आह्वयति।
सरल हिन्दी अनुवाद: माता सूंघती हुई बालिका को बुलाती है।
💡 व्याकरण रहस्य: यहाँ 'बालिकाम्' स्त्रीलिंग द्वितीया विभक्ति एकवचन में है, इसलिए नदी शब्द की तरह स्त्रीलिंग रूप 'जिघ्रन्ती' में द्वितीया लगकर जिघ्रन्तीम् बना।
🌟 त्रिलिंग वाक्य-प्रयोग उदाहरण (व्यावहारिक अभ्यास)

प्यारे बच्चों, शतृ प्रत्ययान्त शब्दों का वाक्यों में वास्तविक प्रयोग कैसे होता है, इसे समझने के लिए तीनों लिंगों के इन सरल और उपयोगी वाक्यों को ध्यान से पढ़ें:

♂️ (क) पुंलिङ्ग वाक्य-प्रयोग:
पठन् बालकः ज्ञानं प्राप्नोति।
अनुवाद: पढ़ता हुआ बालक ज्ञान प्राप्त करता है।
💡 संकेत: यहाँ 'बालकः' (प्रथमा एकवचन) के अनुसार विशेषण पठन् बना है।
अहं गच्छन्तं मित्रं पश्यामि।
अनुवाद: मैं जाते हुए मित्र को देखता हूँ।
💡 संकेत: 'मित्रम्' (पुल्लिंग द्वितीया एकवचन) के कारण विशेषण गच्छन्तम् प्रयुक्त हुआ है।
♀️ (ख) स्त्रीलिङ्ग वाक्य-प्रयोग:
हसन्ती बालिका क्रीडति।
अनुवाद: हँसती हुई बालिका खेलती है।
💡 संकेत: 'बालिका' (स्त्रीलिंग प्रथमा) के अनुसार नदी की तरह हसन्ती रूप बना है।
शिक्षकः लिखन्तीं छात्रां प्रशंसति।
अनुवाद: शिक्षक लिखती हुई छात्रा की प्रशंसा करता है।
💡 संकेत: 'छात्राम्' (द्वितीया एकवचन) के कारण नदीवत् रूप में द्वितीया होकर लिखन्तीम् बना।
📦 (ग) नपुंसकलिङ्ग वाक्य-प्रयोग:
वृक्षात् पतत् पत्रं सुन्दरं दृश्यते।
अनुवाद: वृक्ष से गिरता हुआ पत्ता सुंदर दिखाई देता है।
💡 संकेत: 'पत्रम्' (नपुंसकलिंग प्रथमा) के अनुसार जगत् की तरह पतत् रूप बना है।
विकसत् पुष्पं सर्वान् आनन्दयति।
अनुवाद: खिलता हुआ फूल सबको आनंदित करता है।
💡 संके संकेत: यहाँ 'पुष्पम्' विशेष्य होने के कारण विशेषण विकसत् है।
📋 स्त्रीलिङ्ग रूप सिद्धि: एक परिचय

चूँकि पहले ही कहा जा चुका है कि शतृ प्रत्यय विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं और उसके तीनों लिंगों का उदाहरण भी दिखाया गया है। इन उदाहरणों के स्त्रीलिंग में पिबन्ती, लिखन्ती, खेलन्ती आदि रूप बनता है।

💬 व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:
अहं खेलन्तीं बालिकां पश्यामि।
सरल हिन्दी अनुवाद: मैं खेलती हुई बालिका को देखता हूँ।
🤔 सोचो और समझो (एक महत्वपूर्ण जिज्ञासा):

इस वाक्य में प्रयुक्त शब्द 'खेलन्तीम्' को ध्यान से देखें, तो इसमें मूल रूप से अलग 'न्' तथा 'ई' वर्ण अतिरिक्त रूप से दिखाई दे रहा है। यह 'न्' तथा 'ई' किस-किस अवस्था में किस सूत्र से लगेगा, अब हम इस पर विस्तार से विचार करेंगे।

⚙️ प्रत्यय विधान एवं विचार प्रक्रिया

उदाहरण के लिए, पा धातु में शतृ प्रत्यय लगने से सामान्यतः पिबत् रूप बना। जब यह किसी स्त्रीलिंग के विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाएगा, तो इसे भी स्त्रीलिंग बनाना पड़ेगा।

📌 स्त्री लिंग बनाने के लिए मूल प्रातिपदिक के पीछे स्त्री प्रत्यय लगाया जाता है। अब शतृ प्रत्यय से कौन सा स्त्री प्रत्यय लगता है, आइए इसके पीछे कार्य करने वाले पाणिनीय सूत्रों पर विचार करते हैं...
📖 सूत्र १: उगितश्च — 4.1.6
नियम: उगित् अन्त में हो जिस प्रातिपदिक के, ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है।

🔍 सरल वैज्ञानिक प्रक्रिया (पठती निर्माण):
१. शतृ प्रत्यय में अन्तिम स्वर 'ऋ' की इत्संज्ञा होती है। चूँकि 'ऋ' वर्ण उक् (उ, ऋ, ऌ) प्रत्याहार में आता है, इसलिए शतृ-प्रत्ययान्त शब्द (जैसे— पठत्) को 'उगित्' कहा जाता है।
२. इस प्रकार 'उगित्' प्रातिपदिक होने के कारण पठत् से स्त्रीत्व प्रकट करने के लिए ङीप् प्रत्यय का विधान होगा।
३. ङीप् प्रत्यय में से चूँकि 'ङ्' तथा 'प्' की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है, अतः केवल 'ई' शेष बचता है।
→ पठत् + ई = पठती रूप बना।

📖 सूत्र २: शप्श्यनोर्नित्यम् — 7.1.81
नियम: शप् और श्यन् (विकरण/प्रत्यय) के अवर्ण से परे जो शतृ का अवयव, तदन्त को नित्य ही नुमागम होता है; यदि 'शी' और 'नदी' संज्ञक प्रत्यय बाद में हो तो। (ध्यान दें: ङीप् के ईकार की व्याकरण में नदी संज्ञा होती है)।
📊 शप्श्यनोर्नित्यम् (नुमागम प्रक्रिया प्रवाह)
धातु (भ्वादि/दिवादि/तुदादि/चुरादि)
विकरण (अ / य)
नित्य नुम् (न्) आगम
पठन्ती / तुष्यन्ती

🧪 न् (नुम्) आने का रहस्य और गण व्यवस्था:
भ्वादि और चुरादि गण की धातुओं में प्रयुक्त होने वाले 'शप्' का अकार, दिवादि गण में प्रयुक्त 'श्यन्' के यकारोत्तरवर्ती अकार, तथा तुदादि गण में प्रयुक्त 'श' का अकार— इससे परे शतृ प्रत्यय रहने पर शतृ के अवयव 'अत्' को नित्य ही नुम् (न्) का आगम होगा।
• यहाँ 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' परिभाषा नियम के अनुसार यह नुमागम तकार 'त्' के ठीक पहले आकर बैठेगा।
• यह सूत्र 'आच्छीनद्योर्नुम्' द्वारा विहित होने वाले वैकल्पिक (विकल्प से होने वाले) नुम् का बाधक है, इसलिए इन निर्दिष्ट गणों (भ्वादि, चुरादि, दिवादि, तुदादि) की धातुओं में नित्य ही नुमागम (न्) जुड़कर पठन्ती, लिखन्ती आदि शुद्ध रूप सिद्ध होते हैं।

💡 अलग-अलग गणों में रूप क्यों बदल जाते हैं? (विकरण क्या है?)

प्यारे बच्चों, संस्कृत व्याकरण में धातुओं को १० अलग-अलग परिवारों (गणों) में बाँटा गया है। जब हम किसी धातु के पीछे कोई प्रत्यय जोड़ते हैं, तो धातु और प्रत्यय के बीच में एक विशेष चिह्न या अक्षर आकर बैठ जाता है, जिसे व्याकरण में 'विकरण' कहते हैं।
भ्वादि गण में धातु के बाद शप् (अ) आता है, इसलिए भू का 'भव' और पठ् का 'पठ' जैसा रूप दिखता है।
दिवादि गण में धातु के बाद श्यन् (य) आता है, जिससे धातु के पीछे 'य' की ध्वनि जुड़ जाती है (जैसे— तुष् का तुष्य)।
इसी 'विकरण' के कारण अलग-अलग गण की धातुओं के रूपों में थोड़ा अंतर आ जाता है। आइए, इसे वैज्ञानिक प्रक्रिया से समझते हैं:

🌸 १. भ्वादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिङ्ग में:
भू + शप् + शतृ + ङीप्
→ भो + अ + अत् + ई (गुण और अनुबन्ध लोप)
→ भव + अ + अ + नुम् + त् + ई (अवादेश और नुमागम)
→ भवन्ती (सिद्ध रूप)
🔷 २. दिवादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिङ्ग में (विस्तृत प्रक्रिया):
तुष् + लट् (लटः शतृ सूत्र से लट् के स्थान पर शतृ आदेश हुआ)
तुष् + श्यन् + शतृ (दिवादिभ्यः श्यन् सूत्र से 'श्यन्' विकरण का आगम)
तुष् + य + अत् (अतो गुणे सूत्र से पररूप एकादेश होने पर)
→ तुष्यत् (यह मूल प्रातिपदिक बना)
तुष्यत् + औ (नपुंसकलिङ्ग प्रथमा / द्वितीया द्विवचन की विवक्षा में)
तुष्यत् + शी (नपुंसकाच्च सूत्र से 'औ' विभक्ति को 'शी' आदेश, और 'श्' का लोप)
तुष्यत् + ई (शप्श्यनोर्नित्यम् सूत्र से शतृ के अवयव 'अत्' को नुम् आगम)
तुष्य + नुम् + त् + ई (नुम् के उकार तथा मकार का अनुबन्ध लोप होकर 'न्' बचा)
→ तुष्यन्त् + ई = तुष्यन्ती (रूप सिद्ध हुआ)
📝 व्यावहारिक वाक्य प्रयोग: तुष्यन्ती नगरे रामः अशोकश्च निवसतः।
सरल हिन्दी अनुवाद: संतुष्ट होने वाले दो नगरों में राम और अशोक निवास करते हैं।
🔷 १. दिवादि गण: स्त्रीत्व की विवक्षा (स्त्रीलिङ्ग) में प्रक्रिया:

जब हम तुष्यत् प्रातिपदिक से पूर्णतः स्त्रीलिङ्ग (एकवचन) का पद सिद्ध करते हैं, तब निम्नलिखित प्रक्रिया होती है:

तुष् + ङीप्
'उगितश्च' सूत्र से स्त्रीत्व प्रकट करने के लिए ङीप् (ई) प्रत्यय आया।
• साथ ही, 'शप्श्यनोर्नित्यम्' सूत्र से शतृ के 'अत्' भाग को नुम् का आगम हुआ।
तुष्य + नुम् + त् + ई
• नुम् के 'उ' तथा 'मकार' की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ, जिससे केवल 'न्' बचा।
→ तुष्यन्त् + ई = तुष्यन्ती (रूप सिद्ध हुआ)
📌 व्यावहारिक अर्थ: संतुष्ट होने वाली महिला।
🌸 २. चुरादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिङ्ग में:

चुरादि गण की धातुओं में विशेष रूप से स्वार्थ में 'णिच्' (अय) प्रत्यय जुड़ता है, जिसके कारण रूप-सिद्धि इस प्रकार आगे बढ़ती है:

चुर् + णिच् + şप् + शतृ + ङीप्
चोरय् + अ + अत् + ई (गुण, णिच् का अय और अनुबन्ध लोप होने पर)
चोरय् + अ + अ + नु + त् + ई (शप्श्यनोर्नित्यम् से नित्य नुमागम होने पर)
→ चोरयन्ती (सिद्ध हुआ)
📖 सूत्र: आच्छीनद्योर्नुम् — 7.1.80
नियम: अवर्णान्त अङ्ग (जिस अङ्ग के अन्त में अ या आ हो) से परे जो शतृ का अवयव, तदन्त अङ्ग को नुम् (न्) का आगम विकल्प से (Optionally) होता है; यदि 'शी' और 'नदी' (ङीप् प्रत्यय का ईकार) परे (बाद में) हो तो।
💡 बच्चों के लिए आसान भाषा में समझें: पहले हमने जो सूत्र पढ़ा था, वह नुम् (न्) को नित्य यानी हमेशा जोड़ता था। लेकिन यह सूत्र कहता है कि कुछ विशेष जगहों पर नुम् का जुड़ना आपकी इच्छा पर निर्भर है। यानी वहाँ दो सही रूप बनेंगे!
🎯 तुदादि गण में वैकल्पिक रूप निर्माण:

तुदादि गण की धातुओं में इस सूत्र से विकल्प से नुम् का आगम होता है। इसलिए इसके शतृ प्रत्ययान्त स्त्रीलिङ्ग के प्रातिपदिक में दो प्रकार के रूप बनते हैं:

१. नुमागम पक्ष में:
तुदन्ती
२. नुमागम अभाव पक्ष में:
तुदति

इसी प्रकार, जहाँ नपुंसकलिङ्ग प्रथमा और द्वितीया विभक्ति के द्विवचन में 'औ' विभक्ति को 'शी' आदेश होता है, वहाँ भी इसी नियमानुसार विकल्प से नुमागम का कार्य किया जाएगा।

⚠️ महत्वपूर्ण ध्यातव्य बिन्दु:
  • वर्जित गण: उपर्युक्त ४ गणों (भ्वादि, दिवादि, तुदादि, चुरादि) को छोड़कर शेष गणों की धातुओं से सामान्यतः नुमागम का कार्य नहीं होता है।
  • अदादि गण अपवाद: ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि 'आच्छीनद्योर्नुम्' नियम के अनुसार जिस धातु के अन्त में 'अ' या 'आ' स्वर उपस्थित हो, केवल वैसे ही अङ्ग को नुम् का आगम प्राप्त होता है। इसी कारणवश अदादि गण की कुछ विशिष्ट धातुओं में भी (अवर्णान्त होने से) नुमागम का विधान देखने को मिलता है —
💡 अदादिगण एवं विशिष्ट प्रक्रिया

इस गण में शप् विकरण / प्रत्यय का लोप हो जाता है, अतः अदन्त (अ-कारान्त) धातु बहुत ही कम मिलते हैं। परन्तु कुछ धातु स्वतः आकारान्त (आ-कारान्त) होते हैं, उनमें नुमागम विकल्प से होता है। आइए 'या' धातु के उदाहरण से बच्चों के समझने योग्य सरल रूप में देखते हैं:

⚙️ 'या' (जाना) धातु की रूप-सिद्धि:
या + शप् + शतृ + ङीप्
या + 0 + शतृ + ङीप् (अदादिगण होने से शप् प्रत्यय का लुक/लोप हुआ)
• यहाँ शप् का लोप होने पर भी 'या' धातु स्पष्ट रूप से आकारान्त अङ्ग है। इसलिए इसमें “आच्छीनद्योर्नुम्” सूत्र की प्राप्ति होने से नुमागम विकल्प से होगा।
पक्ष १ (नुमागम होने पर):
या + नुम् + शतृ + ई
यान्ती
पक्ष २ (नुमागम अभाव होने पर):
विकल्प पक्ष में रूप
याती
📊 नदीवत् शब्द रूप संचालन (प्रथमा विभक्ति के तीनों वचन):
पक्ष एकवचन द्विवचन बहुवचन
१. नुमागम यान्ती यान्त्यौ यान्त्यः
२. अभाव याती यात्यौ यात्यः
📌 वा, भा, ष्णा, श्रा, द्रा, प्सा, पा, रा, ला, दा, ख्या, प्रा, मा आदि आकारान्त धातु हैं। ऐसे धातुओं से नुमागम विकल्प से होगा।
⚠️ निषेध विशेष: जुहोत्यादि गण के अदन्त धातु को नुमागम का निषेध हो जाता है। देखें सूत्र- नाभ्यस्तच्छतुः (7.1.78)
🔍 शतृ प्रत्यय से सम्बन्धित और अधिक जानकारी के लिए इन सूत्रों को देखें:
(1) वा नपुंसकस्य (7.1.79)
(2) सम्बोधने च (3.2.125)
(3) लक्षणहेत्वोः क्रियायाः (3.2.126)
(4) इङ्धार्योः शत्रकृच्छ्रिणि (3.2.130)
(5) द्विषोऽमित्रे (3.2.131)
(6) सुञो यज्ञसंयोगे (3.2.132)
(7) अर्हः प्रशंसायाम् (3.2.133)
(8) ऌटः सद्वा (3.2.147)
(9) पूरणगुणसुहितार्थसद्व्ययतव्यसमानाधिकरणेन
(10) न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम्
(11) विदेः शतुर्वसुः (7.1.36)

💡 उच्च स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं एवं अष्टाध्यायी क्रम के गहन अध्ययन हेतु इन सूत्रों का अनुशीलन अवश्य करें।

📝 संपूर्ण पाठ का त्वरित सारांश (Quick Revision Guide)

प्यारे बच्चों और आदरणीय पाठकों, अब तक हमने शतृ प्रत्यय के विषय में जो कुछ भी विस्तार से पढ़ा है, उसके मुख्य पाणिनीय नियमों और व्यावहारिक पक्षों का निचोड़ नीचे दिए गए ५ बिन्दुओं में समाहित है:

(१) मूल प्रकृति और काल विधान: शतृ प्रत्यय वर्तमान काल (Continuous Action — 'करते हुए/पढ़ते हुए') के अर्थ में लट् लकार के स्थान पर होता है। यह केवल परस्मैपदी और उभयपदी धातुओं से ही जुड़ता है। सूत्र सन्दर्भ: लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (3.2.124)
(२) त्रिलिंग व्यवस्था (विशेषण नियम): शतृ प्रत्ययान्त शब्दों के रूप वाक्य में अपने विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और वचनों में चलते हैं। पुल्लिंग में इसका रूप पठत् के समान, स्त्रीलिंग में नदी के समान और नपुंसकलिंग में जगत् के समान संचालित होता है।
(३) लिंगानुसार शेष ध्वनि (शब्दान्त पहचान): परीक्षा की दृष्टि से पहचानना बहुत सरल है:
  • पुल्लिंग के अंत में सामान्यतः 'न्' शेष रहता है (यथा — पठन्, गच्छन्, चोरयन्)।
  • स्त्रीलिंग के अंत में 'न्ती' या 'ती' दिखाई देता है (यथा — पठन्ती, तुदन्ती/तुदति, यान्ती/याती)।
  • नपुंसकलिंग के अंत में 'त्' शेष बचता है (यथा — पठत्, गच्छत्, तुष्यत्)।
(४) नित्य एवं वैकल्पिक नुमागम (न्) व्यवस्था: स्त्रीलिंग बनाते समय 'न्' के आने का रहस्य विकरण और पाणिनीय सूत्रों पर टिका है:
  • भ्वादि, दिवादि और चुरादि गण में 'शप्श्यनोर्नित्यम्' सूत्र से नित्य (हमेशा) नुमागम होकर केवल एक रूप (भवन्ती, तुष्यन्ती, चोरयन्ती) बनता है।
  • तुदादि गण और अदादि गण (आकारान्त धातुओं) में 'आच्छीनद्योर्नुम्' सूत्र से विकल्प से नुमागम होता है, जिससे दो-दो रूप बनते हैं (यथा — तुदन्ती / तुदति तथा यान्ती / याती)।
(५) धातु परिवर्तन (आदेश): प्रत्यय जुड़ते समय धातुओं के मूल स्वरूप में गण के अनुसार विकरण (शप्, श्यन् आदि) जुड़ते हैं और कुछ धातुओं को विशेष आदेश होते हैं; जैसे — गम् को गच्छ (गच्छन्), दृश् को पश्य (पश्यन्), दा को यच्छ (यच्छन्), और प्रच्छ् को पृच्छ (पृच्छन्)।

💡 इस सारांश को आत्मसात् कर लेने पर परीक्षा में शतृ प्रत्यय से संबंधित कोई भी प्रश्न गलत नहीं होगा!

📝 अनुभाग १: अभ्यास पत्र (रिक्त स्थानों की पूर्ति करें)

नीचे दिए गए वाक्यों में कोष्ठक में दी गई धातुओं के साथ उचित लिंग और विभक्ति के अनुसार शतृ-प्रत्ययान्त रूप बनाकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

१. मार्गे .................... जनः देवदत्तं पृच्छति। (गम् + शतृ, पुंलिङ्ग एकवचन)
२. गुरुः कक्षायाम् .................... छात्रां पश्यति। (लिख् + शतृ, स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन)
३. उद्याने .................... बालकाः कोलाहलं कुर्वन्ति। (क्रीड् + शतृ, पुंलिङ्ग बहुवचन)
४. वृक्षात् .................... फलं भूमौ पतति। (पत् + शतृ, नपुंसकलिङ्ग एकवचन)
५. सा .................... बालिकाम् उत्थापयति। (हस् + शतृ, स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन)
🎯 अनुभाग २: स्वमूल्यांकन (सही विकल्प का चयन करें)

कक्षा 6 से 10 तक की परीक्षाओं में पूछे जाने वाले महत्वपूर्ण प्रश्न। अपने सही उत्तर का मानसिक चयन करें और नीचे बटन पर क्लिक कर जाँचें:

प्रश्न 1. 'तुष्' धातु से दिवादिगण में स्त्रीत्व की विवक्षा होने पर 'शप्श्यनोर्नित्यम्' नियम से क्या शुद्ध रूप सिद्ध होता है?
[-] (क) तुष्यती [-] (ख) तुष्यन्ती [-] (ग) तुषन्ती
प्रश्न 2. 'आच्छीनद्योर्नुम्' सूत्र के नियम से तुदादि गण की धातुओं में स्त्रीलिंग में कौन-से दो रूप विकल्प से बनते हैं?
[-] (क) तुदन्ती / तुदति [-] (ख) तुदती / तुदन्ती [-] (ग) तोदन्ती / तोदति
प्रश्न 3. 'प्रच्छ् + शतृ' का प्रयोग करने पर सम्प्रसारण नियम से शुद्ध पुंलिङ्ग रूप क्या निर्मित होगा?
[-] (क) प्रच्छन् [-] (ख) पृच्छन् [-] (ग) प्रच्छत्
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - शुद्ध उत्तर देखने के लिए यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ अनुभाग १ (रिक्त स्थान) के शुद्ध उत्तर:
  • (१) गच्छन् (गम् + शतृ → गच्छ रूप को प्रथमा एकवचन पुंलिङ्ग आदेश)
  • (२) लिखन्तीम् (लिखन्ती स्त्रीलिंग रूप में द्वितीया विभक्ति एकवचन नदीवत्)
  • (३) क्रीडन्तः (क्रीडन् शब्द का प्रथमा बहुवचन रूप - क्रीडन्, क्रीडन्तौ, क्रीडन्तः)
  • (४) पतत् (नपुंसकलिङ्ग प्रथमा एकवचन जगद्वत् रूप)
  • (५) हसन्तीम् (बालिकाम् विशेष्य द्वितीया एकवचन होने से नदीवत् द्वितीया रूप)
✓ अनुभाग २ (MCQ) के शुद्ध उत्तर:
  • प्रश्न 1. (ख) तुष्यन्ती (दिवादि गण में श्यन् विकरण के अवर्ण से परे नित्य नुमागम होने के कारण)
  • प्रश्न 2. (क) तुदन्ती / तुदति (आच्छीनद्योर्नुम् से तुदादि गण की धातुओं में विकल्प से नुमागम का विधान होता है)
  • प्रश्न 3. (ख) पृच्छन् ('वचिस्वपि...' आदि नियमों से रकार को ऋकार सम्प्रसारण होने से पृच्छन् रूप सिद्ध होता है)

✨ १२. शानच् प्रत्यय (पाठ ३४) ✨

💡 आओ समझें: आत्मनेपदी धातु क्या हैं और इन्हें कैसे पहचानें?

प्यारे बच्चों, जैसे परस्मैपदी धातुओं में वर्तमान काल (लट् लकार) में अंत में 'ति, तः, अन्ति' (जैसे— पठति, पठतः, पठन्ति) जुड़ता है, ठीक वैसे ही आत्मनेपदी धातुओं में अंत में 'ते, इते, अन्ते' जुड़ता है।

🔍 पहचानने का सबसे सरल तरीका:
  • परस्मैपदी धातु रूप: पठति, गच्छति, लिखति, हसति...
  • आत्मनेपदी धातु रूप: सेवते, लभते, याचते, मोदते, वन्दते...

शानच् प्रत्यय केवल आत्मनेपदी धातुओं से क्यों?
संस्कृत व्याकरण का नियम है कि वर्तमान काल में 'करते हुए' (Continuous Action) का अर्थ बताने के लिए परस्मैपदी धातुओं से शतृ प्रत्यय होता है, जबकि आत्मनेपदी धातुओं के साथ हमेशा शानच् प्रत्यय का ही विधान किया जाता है।

⚙️ शानच् प्रत्यय (आन) के साथ "मुक्" का आगम:
प्रधान नियम: अदादि तथा जुहोत्यादि गण को छोड़कर शेष गणों के ण्यन्त-सन्नन्त धातुओं से जब "शानच्" (आन) प्रत्यय होगा, तब "आने मुक्" सूत्र से "आन" से पूर्व "मुक्" का आगम होगा। इस "मुक्" में से केवल मकार "म्" शेष रहता है, जो धातु और प्रत्यय के बीच आकर बैठ जाता है।
🌸 (क) मुक् आगम (मकार) वाले उदाहरण:

धातु + मुक् आगम + शानच् = सिद्ध रूप:

  • पच + म् + आनः = पचमानः
  • मोद + म् + आनः = मोदमानः
🚫 (ख) बिना मुक् आगम (सीधे योग) वाले अपवाद गण:

अदादि और जुहोत्यादिगण की धातुओं के साथ सीधा-सीधा "आन" ही जोड़ देते हैं (यहाँ 'मुक्' का आगम नहीं होता):

  • सन्दिहान
  • व्याचक्षाणः
  • सञ्जिहानः
🔮 लृट् स्थानीय "शानच्" प्रत्ययान्त रूप:

भविष्यत् काल (लृट् लकार) के स्थान पर भी विकल्प से शानच् का प्रयोग होता है, इसके रूप तीनों लिंगों में इस प्रकार संचालित होंगे:

♂️ पुल्लिंग:
यतिष्यमाणः
♀️ स्त्रीलिंग:
यतिष्यmaणा
📦 नपुंसकलिंग:
यतिष्यमाणम्
🔗 वाक्य संयोजन की अद्भुत शक्ति (दो वाक्यों को जोड़ना):

"शानच्" प्रत्यय दो अलग-अलग वाक्यों को आपस में जोड़कर एक सुंदर और संक्षिप्त वाक्य बनाने का काम भी करता है। आइए इसे व्यावहारिक उदाहरण से समझें:

पृथक वाक्य (अलग-अलग वाक्य):
१. लताः कम्पन्ते। (लताएँ काँप रही हैं।)
२. लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति। (लताओं से फूल गिर रहे हैं।)
संयुक्त वाक्य (शानच् प्रत्यय द्वारा जुड़ा हुआ रूप):
→ कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति।
सरल हिन्दी अनुवाद: काँपती हुई लताओं से फूल गिर रहे हैं।
💡 व्याकरण संकेत: यहाँ 'लताभ्यः' में पञ्चमी/चतुर्थी बहुवचन है, इसलिए उसके विशेषण 'कम्पमान' शब्द में भी वही विभक्ति लगकर कम्पमानाभ्यः रूप सिद्ध हुआ है।
📋 शानच् प्रत्ययान्त शब्द रूप संचालन नियम

प्यारे बच्चों, शानच् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप भी शतृ प्रत्यय की तरह ही विशेष्य के अनुसार चलते हैं। इन्हें वाक्य में प्रयोग करने के लिए प्रत्येक गण के विकरण का स्मरण करना चाहिए। इनके रूप तीनों लिंगों में इस प्रकार चलेंगे:
पुल्लिङ्ग में: 'राम' शब्द के समान रूप चलते हैं (यथा— याचमानः)।
स्त्रीलिङ्ग में: 'रमा' शब्द के समान रूप चलते हैं (यथा— याचमाना)।
नपुंसकलिङ्ग में: 'पुस्तक' या 'फल' के समान रूप चलते हैं (यथा— याचमानम्)।

📋 प्रमुख आत्मनेपदी धातुओं के शानच्-प्रत्ययान्त रूप
धातु (अर्थ) पुल्लिंग स्त्रीलिंग नपुंसकलिंग अर्थ
याच् (मांगना) याचमानः याचमाना याचमानम् मांगते हुए / हुई
शीङ् (सोना) शयानः शयाना शयानम् सोते हुए / सोती हुई
लभ् (पाना) लभमानः लभमाना लभमानम् पाते हुए / हुई
सेव् (सेवा करना) सेवमानः सेवमाना सेवमानम् सेवा करता / करती हुई
दा (देना) ददानः ददाना ददानम् देते हुए / हुई
📌 विशेष ध्यातव्य नियम: यह प्रत्यय लृट् लकार (भविष्यत् काल) के स्थान पर भविष्यत् काल की विवक्षा में विकल्प से भी होता है, जिसके लिए पाणीनीय सूत्र है — लृटः सद्वा (3.3.14)
📖 सूत्र: लृटः सद्वा — 3.3.14

नियम: यह प्रत्यय लृट् लकार के स्थान पर भविष्यत् काल में विकल्प से (Optionally) होता है। जब आत्मनेपदी धातुओं से भविष्यत् काल में 'करता हुआ रहेगा' या 'होता हुआ रहेगा' का भाव प्रकट करना हो, तब भविष्यत् काल के वाचक 'स्य/ष्य' के बाद शानच् (आन) प्रत्यय जुड़ता है। इसके रूप पुल्लिङ्ग में राम, स्त्रीलिङ्ग में रमा व नपुंसकलिङ्ग में पुस्तक / फल के समान चलते हैं।

📊 विभिन्न गणों के विकरण युक्त शानच् प्रत्यय उदाहरण
धातु + विकरण + प्रत्यय पुल्लिंग रूप स्त्रीलिंग रूप नपुंसकलिंग रूप विशेष (गण/विकरण)
मोद + शप् + शानच् मोदमानः मोदमाना मोदमानम् भ्वादिगण (शप् = अ, मुक् आगम)
विद् + श्यन् + शानच् विद्यमानः विद्यमाना विद्यमानम् दिवादिगण (श्यन् = य, मुक् आगम)
चि + श्नु + शानच् चिन्वानः चिन्वाना चिन्वानम् स्वादिगण (श्नु = नु, अतो लोपः)
लभ् + स्य + शानच् लप्स्यमानः लप्स्यमाना लप्स्यमानम् भविष्यत् काल (लृटः सद्वा नियम)
💬 व्यावहारिक वाक्य-प्रयोग उदाहरण (विभक्ति संचालन):
उदाहरण १ (पुंलिङ्ग - प्रथमा विभक्ति):
मोदमानः छात्रः विद्यालयं गच्छति।
सरल हिन्दी अनुवाद: प्रसन्न होता हुआ छात्र विद्यालय जाता है।
💡 व्याकरण रहस्य: यहाँ 'क्रियां कुर्वन्' छात्र के विशेषण के रूप में 'मोदमानः' का प्रयोग राम की तरह प्रथमा एकवचन में हुआ है।
उदाहरण २ (स्त्रीलिङ्ग - द्वितीया विभक्ति):
नृपः याचमानां स्त्रीं पश्यति।
सरल हिन्दी अनुवाद: राजा माँगती हुई स्त्री को देखता है।
💡 व्याकरण रहस्य: यहाँ 'स्त्रीम्' विशेष्य द्वितीया विभक्ति एकवचन में है, इसलिए उसके विशेषण 'याचमाना' शब्द में रमावत् द्वितीया विभक्ति लगकर याचमानाम् बना।
उदाहरण ३ (लृट् स्थानीय - भविष्यत् काल):
पिता वर्धिष्यमाणं पुत्रं अभिनन्दति।
सरल हिन्दी अनुवाद: पिता भविष्य में बढ़ने वाले (प्रगति करने वाले) पुत्र का अभिनन्दन करता है।
💡 व्याकरण रहस्य: भविष्यत् काल की विवक्षा में 'वृध्' धातु से लृटः सद्वा नियम द्वारा वर्धिष्यमाणम् (द्वितीया एकवचन) रूप सिद्ध हुआ है।
📝 अनुभाग १: अभ्यास पत्र (रिक्त स्थानों की पूर्ति करें)

प्यारे बच्चों, नीचे दिए गए वाक्यों में कोष्ठक में दी गई आत्मनेपदी धातुओं के साथ उचित लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार शानच्-प्रत्ययान्त रूप बनाकर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

१. मन्दिरे .................... भक्ताः देवं नमन्ति। (वन्द + शानच्, पुंलिङ्ग बहुवचन)
२. गुरुः आसने .................... शिष्यं ज्ञानं ददाति। (शीङ् + शानच्, पुंलिङ्ग द्वितीया एकवचन)
३. धनं .................... याचकः गृहं गच्छति। (लभ् + शानच्, पुंलिङ्ग प्रथमा एकवचन)
४. माता .................... बालिकाम् दुग्धं पाययति। (मोद + शानच्, स्त्रीलिङ्ग द्वितीया एकवचन)
५. सभायाम् .................... मित्राणि पश्य। (भाष् + शानच्, नपुंसकलिङ्ग द्वितीया बहुवचन)
🎯 अनुभाग २: स्वमूल्यांकन (सही विकल्प का चयन करें)

परीक्षाओं में बार-बार पूछे जाने वाले पाणिनीय नियमों पर आधारित प्रश्न। अपने उत्तर का चयन करें और नीचे दिए गए बटन से स्वमूल्यांकन करें:

प्रश्न 1. 'दा' (जुहोत्यादिगण) धातु से जब शानच् प्रत्यय होता है, तब "आने मुक्" से मुक् का आगम नहीं होने पर क्या शुद्ध रूप बनता है?
[-] (क) दामानः [-] (ख) ददानः [-] (ग) ददमानः
प्रश्न 2. "लृटः सद्वा (3.3.14)" सूत्र के नियमानुसार भविष्यत् काल की विवक्षा में 'लभ्' धातु का स्त्रीलिंग द्वितीया एकवचन में क्या रूप सिद्ध होगा?
[-] (क) लप्स्यमानाम् [-] (ख) लभमानाम् [-] (ग) लप्स्यमाना
प्रश्न 3. 'लताः कम्पन्ते। लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति।' इन दो वाक्यों को शानच् प्रत्यय द्वारा जोड़ने पर सही संयुक्त रूप क्या होगा?
[-] (क) कम्पमानलताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति। [-] (ख) कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति। [-] (ग) कम्पन्तीभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति।
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) - शुद्ध उत्तर देखने के लिए यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ अनुभाग १ (रिक्त स्थान) के शुद्ध उत्तर:
  • (१) वन्दमानाः ('भक्ताः' पुंलिङ्ग बहुवचन के अनुसार विशेषण में रामवत् प्रथमा बहुवचन हुआ)
  • (२) शयानम् ('शिष्यम्' द्वितीया एकवचन में होने से 'शयान' प्रातिपदिक का द्वितीया एकवचन रूप)
  • (३) लभमानः ('याचकः' प्रथमा एकवचन के अनुसार मुक् आगम युक्त रूप)
  • (४) मोदमानाम् ('बालिकाम्' स्त्रीलिंग द्वितीया एकवचन के अनुसार रमावत् द्वितीया विभक्ति रूप)
  • (५) भाष्यमाणानि ('मित्राणि' नपुंसकलिङ्ग प्रथमा/द्वितीया बहुवचन के अनुसार फलवत् रूप)
✓ अनुभाग २ (MCQ) के शुद्ध उत्तर:
  • प्रश्न 1. (ख) ददानः (अदादि और जुहोत्यादि गण में "आने मुक्" से मुक् आगम का निषेध होने से सीधा 'आन' जुड़ता है)
  • प्रश्न 2. (क) लप्स्यमानाम् (लृट् स्थानीय स्य/ष्य रहने से लप्स्यमाना शब्द के द्वितीया एकवचन का रमावत् रूप)
  • प्रश्न 3. (ख) कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति। (विशेष्य 'लताभ्यः' के अनुसार विशेषण में भी समान विभक्ति और वचन का प्रयोग)

✨ १३ एवं १४. क्त और क्तवतु प्रत्यय (पाठ ३५) ✨

📋 क्त-क्तवतु निष्ठा (भूतकालिक प्रत्यय परिचय)

महर्षि पाणिनि के नियमानुसार क्त और क्तवतु प्रत्ययों की 'निष्ठा' संज्ञा होती है। इन प्रत्ययों में क्रमशः 'त' तथा 'तवत्' भाग शेष रहता है। यह प्रत्यय भूतकालिक क्रिया (Past Tense) के अर्थ में वर्तमान धातुओं से जोड़े जाते हैं।

💡 प्यारे बच्चों! गत्यर्थक और अकर्मक धातुओं को पहचानने की जादुई ट्रिक:

परीक्षा में अक्सर छात्र इन धातुओं को रटने की कोशिश करते हैं, लेकिन इन्हें समझना बहुत आसान है:

१. गत्यर्थक धातुएँ (गति वाचक): जिन धातुओं का अर्थ एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाना, हिलना-डुलना या गति करना होता है, उन्हें गत्यर्थक कहते हैं।
पहचान ट्रिक: वाक्य में क्रिया से पूछें— 'कहाँ जा रहा है?' यदि उत्तर मिले जैसे— गाँव जाना (गम्), घूमना (भ्रम्), चलना (चल्), प्रवेश करना (विश्), तो वे गत्यर्थक हैं।
२. अकर्मक धातुएँ (बिना कर्म वाली): जिन क्रियाओं को अपने अर्थ को पूरा करने के लिए किसी 'कर्म' (Object) की आवश्यकता नहीं होती, वे अकर्मक हैं।
पहचान ट्रिक (क्या और किसको): क्रिया के साथ 'क्या' या 'किसको' लगाकर प्रश्न पूछें। यदि कोई उत्तर न मिले, तो धातु अकर्मक है!
जैसे— 'वह सोता है।' प्रश्न: क्या सोता है? किसको सोता है? (कोई उत्तर नहीं मिला → अतः शीङ्/स्वप् अकर्मक है)। इसी प्रकार डरना (भी), हँसना (हस्), बैठना (स्था/आस्) अकर्मक धातुएँ हैं।
⚙️ निष्ठा प्रत्ययों के आवश्यक व्याकरण नियम:
📌 नियम 1 (सामान्य विधान):
'क्त' प्रत्यय: केवल भाव (Impersonal) और कर्म (Passive) में होता है।
'क्तवतु' प्रत्यय: केवल कर्ता (Active Voice) के अर्थ में होता है।
यथा (उदाहरण): मया हसितम् (भाव में), भक्तेन कृष्णः स्तुतः (कर्म में), विष्णुः विश्वं कृतवान् (कर्ता में)।
📌 नियम 2 (विशेष कर्तरि विधान):
गत्यर्थक (जाने के अर्थ वाली), अकर्मक (बिना कर्म वाली) एवं श्लिष्, शीङ्, स्था, आस्, वस्, जन्, रुह्, जृ— इतने (उपसर्ग पूर्वक सकर्मक होने पर भी) धातुओं से भाव और कर्म के साथ-साथ 'कर्ता' के अर्थ में भी 'क्त' प्रत्यय का विधान विकल्प से हो जाता है।
यथा (उदाहरण): गृहं गतः। बालः भीतः। प्रियामाश्लिष्टः। हरिः शेषमधिशयितः। वैकुण्ठमधिष्ठितः। कृष्णमुपासितः। हरिदिनमुपोषितः। लक्ष्मणो भरतम् अनुजातः। यानमारूढ़ः। विश्वमनुजीर्णः।
💡 आओ समझें: इच्छार्थक, ज्ञानार्थक और पूजार्थक क्या हैं?

प्यारे बच्चों, सामान्यतः 'क्त' प्रत्यय भूतकाल (बीते हुए समय) के लिए प्रयोग होता है। लेकिन महर्षि पाणिनि ने एक विशेष नियम बनाया है कि जब धातुएँ इन तीन विशिष्ट अर्थों वाली हों, तो वहाँ क्त प्रत्यय भूतकाल का नहीं, बल्कि वर्तमान काल (Present Tense) का अर्थ देता है! आइए इन तीनों को आसान शब्दों में समझें:

१. इच्छार्थक (Desire/Wish): जिन धातुओं से किसी चीज़ की इच्छा करना या चाहना प्रकट हो।
२. ज्ञानार्थक (Knowledge/Understanding): जिन धातुओं से कुछ जानने, समझने या बुद्धि में आने का बोध हो।
३. पूजार्थक (Worship/Respect): जिन धातुओं से किसी का आदर, सत्कार, सम्मान या पूजा करना प्रकट हो।
📌 नियम ३ (वर्तमानकाले क्त विधान):

इच्छार्थक, ज्ञानार्थक तथा पूजार्थक धातुओं से वर्तमानकाल में ‘क्त‘ प्रत्यय होता है। यहाँ 'मम मतः' का अर्थ 'मेरा माना हुआ था' नहीं, बल्कि 'मेरा मानना है' (वर्तमान काल) होता है।

📋 इन अर्थों वाली अन्य प्रमुख धातुएँ और क्त-प्रत्ययान्त रूप:
श्रेणी (अर्थ) मूल धातु क्त प्रत्ययान्त रूप वर्तमानकालिक व्यावहारिक उदाहरण
इच्छार्थक (चाहना) इष् (चाहना) इष्टः मम इष्टः (मेरा प्रिय/चाहता हूँ)
मन् (मानना/इच्छा) मतः मम मतः (मेरा विचार/मानता हूँ)
ज्ञानार्थक (जानना) बुध् (जानना) बुद्धम् मम बुद्धम् (मुझे ज्ञात है)
विद् (जानना) विदितम् मम विदितमस्ति (मुझे मालूम है)
ज्ञा (जानना) (अतिरिक्त) ज्ञातम् मम ज्ञातम् (मुझे पता है)
पूजार्थक (आदर) पूज् (पूजा करना) पूजितः गुरुः सर्वैः पूजितः (सदा आदरणीय हैं)
अर्च (पूजा/अर्चन) अर्चितः अर्चितः देवः (पूजनीय देव)
श्लाघ् (प्रशंसा) (अतिरिक्त) श्लाघितः सज्जनः श्लाघितः (प्रशंसित/आदरणीय है)
💡 सोचो और समझो: क्त और क्तवतु में रूप क्यों बदल जाते हैं? (वर्ण परिवर्तन का रहस्य)

प्यारे बच्चों, आपने ध्यान दिया होगा कि इन प्रत्ययों को जोड़ते समय कहीं अंत में 'त' आता है, कहीं 'न' आ जाता है, और कहीं स्वर ही बदल जाता है! महर्षि पाणिनि के इन ३ जादुई नियमों को समझ लेने से रटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी:

१. 'त' का 'न' हो जाना (नत्व विधान): जब धातु के अंत में ऋकार (ऋ) या कुछ विशिष्ट व्यंजन (जैसे क्षि, हा) होते हैं, तो प्रत्यय के 'त' को पाणिनीय सूत्रों से 'न' आदेश हो जाता है (जैसे— हा + क्त = हीनः, क्षि + क्त = क्षीणः)।
२. धातु के आकार (आ) को ईकार (ई) होना: कुछ आकारान्त धातुओं के 'आ' स्वर को प्रत्यय परे होने पर ईकार 'ई' आदेश हो जाता है (जैसे— पा + क्त = पीतः)।
३. इडागम (इट् का 'इ'): कुछ धातुओं के बाद प्रत्यय जुड़ने से पहले 'इ' स्वर आकर बैठ जाता है, जिसे इडागम कहते हैं (जैसे— शी + क्त = शयितः, जागृ + क्त = जागरितः)।
📋 प्रमुख धातुओं के निष्ठा (क्त एवं क्तवतु) प्रत्ययान्त रूप
मूल धातु (अर्थ) क्त (त) रूप [पुं.] क्तवतु (तवत्) रूप [पुं.] विशेष व्याकरण रहस्य (बच्चों के लिए)
घ्रा (सूंघना) घ्राणः, घ्रातः घ्राणवान्, घ्रातवान् विकल्प से 'त' का 'न' और णत्व कार्य
दा (देना) दत्तः दत्तवान् 'दो दद्धोः' सूत्र से दा को 'दद्' आदेश
आ + दा (ग्रहण करना) आत्तः आत्तवान् उपसर्ग पूर्वक होने से विशेष वर्ण लोप कार्य
धा (धारण करना) हितः हितवान् 'दधातेर्हिः' सूत्र से धा को 'हि' आदेश
पा (पीना) पीतः पीतवान् 'पा' के 'आ' को ईकार 'ई' आदेश हुआ
हा (त्यागना) हीनः हीनवान् 'ओहाक् त्यागे' में 'त' का 'न' और आ को ई
क्षि (नष्ट होना/कम होना) क्षीणः क्षीणवान् 'क्षियो दीर्घात्...' नियम से 'त' का 'न'
श्वि (बढ़ना/सूजना) शूनः शूनवान् सम्प्रसारण होने पर 'त' का 'न' हुआ
ली (लीन होना) लीनः लीनवान् 'त' को नित्य 'न' आदेश हुआ
शी (सोना) शयितः शयितवान् गुण एकादेश और इट् (इ) का आगम
ह्री (लज्जा करना) ह्रीतः, ह्रीणः ह्रीतवान् विकल्प से 'त' का 'न' और णत्व कार्य
जागृ (जागना) जागरितः जागरितवान् गुण (ऋ का अर्) और इट् (इ) का आगम
📝 पाठ्य-सामग्री अभ्यास तालिका: नीचे दी गई एकीकृत तालिका में धातुओं के साथ क्त (त) और क्तवतु (तवत्) प्रत्यय के योग से बने सिद्ध पुंलिङ्ग रूपों का संकलन है। वर्णों के संधियों और इत्-संज्ञा नियमों के कारण निर्मित परिवर्तनों को ध्यान से देखें:
मूल धातु क्त (त) प्रत्यय रूप क्तवतु (तवत्) प्रत्यय रूप
अर्च (पूजा करना) अर्चितः अर्चितवान्
ईक्ष (देखना) ईक्षितः ईक्षितवान्
कृ (करना) कृतः कृतवान्
इष् (चाहना) इष्टः इष्टवान्
कुप् (क्रोधित होना) कुपितः कुपितवान्
क्रुध् (क्रोध करना) क्रुद्धः क्रुद्धवान्
खिद् (दुखी होना) खिन्नः खिन्नवान्
गम् (जाना) गतः गतवान्
ग्रस् (निकलना) ग्रस्तः ग्रस्तवान्
क्षिप् (फेंकना) क्षिप्तः क्षिप्तवान्
चि (चुनना) चितः चितवान्
चेष्ट् (प्रयास करना) चेष्टितः चेष्टितवान्
जागृ (जागना) जागरितः जागरितवान्
जुष् (सेवन करना) जुष्टः जुष्टवान्
ज्ञा (जानना) ज्ञातः ज्ञातवान्
त्यज् (छोड़ना) त्यक्तः त्यक्तवान्
दण्ड् (सजा देना) दण्डिततः दण्डितवान्
दीप् (चमकना) दीप्तः दीप्तवान्
दृश् (देखना) दृष्टः दृष्टवान्
नम् (झुकना/नमस्कार) नतः नतवान्
ख्या (कहना/प्रसिद्ध होना) ख्यातः ख्यातवान्
गर्ज् (गरजना) गर्जितः गर्जितवान्
ग्रह (पकड़ना/ग्रहण) गृहीतः गृहीतवान्
खाद् (खाना) खादितः खादितवान्
चिन्त (सोचना) चिन्तितः चिन्तितवान्
छिद् (काटना) छिन्नः छिन्नवान्
जि (जीतना) जितः जितवान्
आप् (पाना) आप्तः आप्तवान्
कथ् (कहना) कथितः कथितवान्
क्री (खरीदना) क्रीतः क्रीतवान्
गद् (बोलना) गदितः गदितवान्
गै (गाना) गीतः गीतवान्
घुष् (घोषणा करना) घोषितः घोषितवान्
चल् (चलना) चलितः चलितवान्
चुम्ब् (चूमना) चुम्बितः चुम्बितवान्
जन् (उत्पन्न होना) जातः जातवान्
जीव (जीना) जीवितः जीवितवान्
पठ् (पढ़ना) पठिततः पठितवान्
पच् (पकाना) पक्वः पक्ववान्
पीड् (कष्ट देना) पीडितः पीडितवान्
पूज् (पूजा करना) पूजितः पूजितवान्
बाध् (बाधा पहुँचाना) बाधितः बाधितवान्
भक्ष् (खाना) भक्षितः भक्षितवान्
भुज् (भोगना/खाना) भुक्तः भुक्तवान्
भ्रंश् (गिरना/भ्रष्ट होना) भ्रष्टः भ्रष्टवान्
मद् (मस्त होना) मत्तः मत्तवान्
मिल् (मिलना) मिलितः मिलितवान्
मृ (मरना) मृतः मृतवान्
याच् (माँगना) याचितः याचितवान्
रक्ष् (रक्षा करना) रक्षितः रक्षितवान्
राज् (सुशोभित होना) राजितः राजितवान्
रुध् (रोकना) रुद्धः रुद्धवान्
लिख् (लिखना) लिखितः लिखितवान्
वन्द् (वंदना करना) वन्दितः वन्दितवान्
विद् (जानना) विदितः विदितवान्
वेष्ट् (लपेटना) वेष्टितः वेष्टितवान्
शक् (समर्थ होना) शक्तः शक्तवान्
शम् (शांत होना) शान्तः शान्तवान्
हु (हवन करना) हुतः हुतवान्
शुभ् (शोभित होना) शोभितः शोभितवान्
श्रि (आश्रय लेना) श्रितः श्रितवान्
सह (सहन करना) सोढः सोढवान्
सृज् (सृष्टि/निर्माण करना) सृष्टः सृष्टवान्
स्तु (स्तुति करना) स्तुतः स्तुतवान्
स्पृश् (स्पर्श करना) स्पृष्टः स्पृष्टवान्
हन् (मारना) हतः हतवान्
🎯 अनुभाग ३: 'सही या गलत' अभ्यास पत्र (True / False Exercise)

प्यारे बच्चों, नीचे कुछ धातुओं के सामने उनके क्त या क्तवतु प्रत्यय के रूप दिए गए हैं। इनमें से कुछ रूप पाणिनीय नियमों के अनुसार बिल्कुल सही हैं और कुछ गलत हैं। आप मन में सोचें कि कथन 'सही' है या 'गलत', फिर नीचे दिए गए छिपे बॉक्स को खोलकर अपने ज्ञान की जाँच करें:

कथन 1. ध्यै धातु से क्त प्रत्यय लगाने पर शुद्ध रूप 'ध्यातः' बनता है। (सही / गलत?)
कथन 2. शक् (शकि) धातु से क्तवतु प्रत्यय लगाने पर रूप 'शकितवान्' सिद्ध होता है। (सही / गलत?)
कथन 3. मृज् धातु से क्त प्रत्यय लगाने पर 'स्कोः संयोगाद्योरन्ते...' नियमों से 'मृष्टः' रूप बनता है। (सही / गलत?)
कथन 4. पच् धातु के चकार को कुत्व और प्रत्यय के तकार को वत्व होकर क्त प्रत्यय में 'पक्वः' रूप बनता है। (सही / गलत?)
कथन 5. मुच (मुच्) धातु से क्त प्रत्यय का योग होने पर शुद्ध रूप 'मुचितः' बनता है। (सही / गलत?)
कथन 6. भञ्ज् धातु से क्तवतु प्रत्यय का प्रयोग करने पर रूप 'भक्तवान्' सिद्ध होता है। (सही / गलत?)
कथन 7. क्लिद् तथा खिद् धातुओं के दकार और प्रत्यय के तकार दोनों को 'राल्लोपात्...' नियमों से नत्व होकर क्रमशः 'क्लिन्नः' और 'खिन्नः' रूप बनते हैं। (सही / गलत?)
कथन 8. मद् धातु से क्त प्रत्यय लगाने पर शुद्ध भूतकालिक रूप 'मदितः' बनता है। (सही / गलत?)
कथन 9. जन् और मन् धातुओं से क्त प्रत्यय लगाने पर अनुनासिक मकार/नकार का लोप होकर क्रमशः 'जातः' और 'मतः' रूप सिद्ध होते हैं। (सही / गलत?)
कथन 10. अद (अद्) धातु से क्त प्रत्यय लगाने पर 'जग्धिविध्यति...' नियमों से रूप 'अदितः' बनता है। (सही / गलत?)
कथन 11. प्याय् और स्फाय् धातुओं के यकार का लोप और सम्प्रसारण आदि होकर क्त प्रत्यय में क्रमशः 'पीनः' और 'स्फीतः' रूप बनते हैं। (सही / गलत?)
कथन 12. सिव् (सीव्यति) धातु से क्त प्रत्यय लगाने पर रूप 'स्यूतः' सिद्ध होता है। (सही / गलत?)
कथन 13. भ्रंश् धातु से क्त प्रत्यय करने पर जश्त्व और षत्व होकर रूप 'भ्रष्टः' बनता है। (सही / गलत?)
कथन 14. सह् और मुह् धातुओं के हकार को ढत्व और ढो ढे लोपः आदि विशिष्ट संधिनियमों से क्त प्रत्यय में क्रमशः 'सोढः' और 'मुग्धः / मूढः' रूप बनते हैं। (सही / गलत?)
🔑 सही/गलत अभ्यास की व्याख्यात्मक उत्तरमाला — यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ सभी कथनों के प्रामाणिक उत्तर एवं शास्त्रीय कारण:
  1. कथन 1: [सही] — ध्यै + क्त = ध्या + त = ध्यातः (आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व होने पर)।
  2. कथन 2: [गलत] — शुद्ध रूप शक्तवान् बनता है (शक् धातु अनिट् है, इसमें इट् का आगम नहीं होता)।
  3. कथन 3: [सही] — मृज् + क्त = मृष्टः (मृजेर्वृद्धिः और षत्व-ष्टुत्व विधान से)।
  4. कथन 4: [सही] — पच् + क्त = पक्वः ('पचो वः' सूत्र से तकार को वकार आदेश होने से)।
  5. कथन 5: [गलत] — शुद्ध रूप मुक्तः बनता है (कुत्व संधि के नियमानुसार चकार को ककार होता है)।
  6. कथन 6: [सही] — भञ्ज् + क्तवतु = भक्तवान् (नकार लोप और कुत्व कार्य से)।
  7. कथन 7: [सही] — क्लिद् + क्त = क्लिन्नः तथा खिद् + क्त = खिन्नः ('राल्लोपात्...' और 'नश्च' सूत्रों से दकार-तकार को नत्व)।
  8. कथन 8: [गलत] — शुद्ध रूप मत्तः बनता है (मद् + क्त में दकार का चर्त्व होकर तकार होता है)।
  9. कथन 9: [सही] — जन् + क्त = जातः तथा मन् + क्त = मतः ('अनुनासिकस्य क्वझलोः...' सूत्र से उपधा दीर्घ और म/न का लोप)।
  10. कथन 10: [गलत] — शुद्ध रूप जग्धः बनता है ('अदः जग्धिर्ति किति' सूत्र से अद् धातु को जग्धि आदेश होता है)।
  11. कथन 11: [सही] — प्याय् + क्त = पीनः (ओप्यायी वृद्धौ से) और स्फाय् + क्त = स्फीतः (सम्प्रसारण से)।
  12. कथन 12: [सही] — सिव् + क्त = स्यूतः (उकार उपधा को दीर्घ और वकार को ऊठ् आदेश होने से)।
  13. कथन 13: [सही] — भ्रंश् + क्त = भ्रष्टः (अनुषङ्ग लोप और षत्व-ष्टुत्व कार्य से)।
  14. कथन 14: [सही] — सह् + क्त = सोढः ('हो ढः' से हकार को ढकार और 'सहेः साडः सः' से ओत्व) तथा मुह् + क्त = मुग्धः / मूढः (विकल्प से)।
🕵️‍♂️ अनुभाग ४: जासूसी ट्रिक — छिपे हुए 'क्त' प्रत्यय को पहचानो!

प्यारे बच्चों, नीचे दिए गए शब्दों को ध्यान से देखें। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इन सभी शब्दों के अंत में केवल 'क्त' प्रत्यय लगा हुआ है! लेकिन पाणिनीय संध नियमों के कारण इसका 'त' भाग कहीं 'तः', कहीं 'धः', कहीं 'नः' तो कहीं 'क्वः' में बदल गया है।
🎯 अभ्यास का उद्देश्य: इन कठिन रूपों को देखकर डरना नहीं है, बल्कि यह समझना है कि ये सब 'क्त' प्रत्यय के ही अलग-अलग रूप हैं। आइए, इनके मूल स्वरूप को नीचे दिए गए छिपे बॉक्स से मिलान करके समझते हैं:

📋 इन सभी शब्दों में 'क्त' प्रत्यय का ही चमत्कार है:
ध्यातः
शङ्कितः
लिखितः
मृष्टः
पक्वः
मुक्तः
भग्नः
रक्तः
नृत्तः
गदितः
क्लिन्नः
मत्तः
खातः
जातः
मतः
जग्धः
अन्नम्
क्षुण्णः
खिन्नः
पीनः
स्फीतः
धौतः
धावितः
स्यूतः
भ्रष्टः
शुष्कः
सोढः
मुग्धः
मूढः
🔑 वर्ण-परिवर्तन का रहस्य और प्रत्यय-विग्रह देखने के लिए यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ प्रत्यय बोध और वर्ण-परिवर्तन तालिका (धातु + क्त):

ध्यान से देखें कि मूल रूप क्या था और संध नियमों से वह क्या बन गया:

• ध्यै + क्त = ध्यातः (आत्व विधान)
• शङ्क् + क्त = शङ्कितः (इडागम)
• लिख् + क्त = लिखितः (इडागम)
• मृज् + क्त = मृष्टः (वृद्धि और षत्व)
• पच् + क्त = पक्वः (तकार को वकार)
• मुच् + क्त = मुक्तः (चकार को ककार)
• भञ्ज् + क्त = भग्नः (तकार को नकार)
• रञ्ज् + क्त = रक्तः (जकार का लोप)
• नृत् + क्त = नृत्तः (सरल संयोग)
• गद् + क्त = गदितः (इडागम)
• क्लिद् + क्त = क्लिन्नः (तकार को नकार)
• मद् + क्त = मत्तः (दकार को तकार)
• खन् + क्त = खातः (नकार लोप और दीर्घ)
• जन् + क्त = जातः (नकार लोप और दीर्घ)
• मन् + क्त = मतः (नकार का लोप)
• अद् + क्त = जग्धः (अद् को जग्धि आदेश)
• अद् + क्त = अन्नम् (विशेष नपुंसक रूप)
• क्षुद् + क्त = क्षुण्णः (णत्व विधान)
• खिद् + क्त = खिन्नः (तकार को नकार)
• प्याय् + क्त = पीनः (यकार लोप और नत्व)
• स्फाय् + क्त = स्फीतः (सम्प्रसारण कार्य)
• धाव् + क्त = धौतः / धावितः (दो वैकल्पिक रूप)
• सिव् + क्त = स्यूतः (वकार को ऊठ् आदेश)
• भ्रंश् + क्त = भ्रष्टः (षत्व और ष्टुत्व)
• शुष् + क्त = शुष्कः (तकार को ककार)
• सह् + क्त = सोढः (हकार को ढकार और ओत्व)
• मुह् + क्त = मुग्धः / मूढः (दो वैकल्पिक रूप)
🕵️‍♂️ अनुभाग ५: जासूसी ट्रिक — छिपे हुए 'क्तवतु' प्रत्यय को पहचानो!

प्यारे बच्चों, पिछले अभ्यास में हमने 'क्त' प्रत्यय के जादुई रूपों को देखा था। अब नीचे दिए गए शब्दों को ध्यान से देखें। इन सभी शब्दों के अंत में केवल 'क्तवतु' प्रत्यय लगा हुआ है! लेकिन पाणिनीय संध नियमों के कारण इसका 'तवत्' भाग (पुंलिङ्ग एकवचन में 'तवान्') कहीं 'तवान्', कहीं 'नवान्' तो कहीं 'क्ववान्' या 'ढवान्' में बदल गया है।
🎯 अभ्यास का उद्देश्य: इन बड़े और कठिन रूपों को देखकर घबराना नहीं है, बल्कि यह पहचानना है कि ये सब 'क्तवतु' प्रत्यय के ही परिवर्तित रूप हैं। आइए, इनके मूल स्वरूप और प्रत्यय-विग्रह को नीचे दिए गए छिपे बॉक्स से समझते हैं:

📋 इन सभी शब्दों में 'क्तवतु' (तवत्) प्रत्यय का ही चमत्कार है:
ध्यातवान्
शङ्कितवान्
लिखितवान्
मृष्टवान्
पक्ववान्
मुक्तवान्
भग्नवान्
रक्तवान्
नृत्तवान्
गदितवान्
क्लिन्नवान्
मत्तवान्
खातवान्
जातवान्
मतवान्
जग्धवान्
क्षुण्णवान्
खिन्नवान्
पीनवान्
स्फीतवान्
धौतवान्
धावितवान्
स्यूतवान्
भ्रष्टवान्
शुष्कवान्
सोढवान्
मुग्धवान्
मूढवान्
🔑 वर्ण-परिवर्तन का रहस्य और क्तवतु प्रत्यय-विग्रह देखने के लिए यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ प्रत्यय बोध और वर्ण-परिवर्तन तालिका (धातु + क्तवतु):

ध्यान से देखें कि मूल रूप क्या था और संध नियमों से वह क्या बन गया:

• ध्यै + क्तवतु = ध्यातवान् (आत्व विधान)
• शङ्क् + क्तवतु = शङ्कितवान् (इडागम)
• लिख् + क्तवतु = लिखितवान् (इडागम)
• मृज् + क्तवतु = मृष्टवान् (वृद्धि और षत्व-ष्टुत्व)
• पच् + क्तवतु = पक्ववान् (तकार को वकार आदेश)
• मुच् + क्तवतु = मुक्तवान् (चकार को ककार)
• भञ्ज् + क्तवतु = भग्नवान् (तकार को नकार आदेश)
• रञ्ज् + क्तवतु = रक्तवान् (अनुनासिक जकार का लोप)
• नृत् + क्तवतु = नृत्तवान् (सरल वर्ण संयोग)
• गद् + क्तवतु = गदितवान् (इडागम)
• क्लिद् + क्तवतु = क्लिन्नवान् (दकार-तकार को नत्व)
• मद् + क्तवतु = मत्तवान् (दकार को चर्त्व तकार)
• खन् + क्तवतु = खातवान् (नकार लोप और दीर्घ)
• जन् + क्तवतु = जातवान् (नकार लोप और दीर्घ)
• मन् + क्तवतु = मतवान् (मकारोत्तर न का लोप)
• अद् + क्तवतु = जग्धवान् (अद् को जग्धि आदेश)
• क्षुद् + क्तवतु = क्षुण्णवान् (विशेष णत्व विधान)
• खिद् + क्तवतु = खिन्नवान् (दकार-तकार को नत्व)
• प्याय् + क्तवतु = पीनवान् (यकार लोप और नत्व)
• स्फाय् + क्तवतु = स्फीतवान् (विशेष सम्प्रसारण कार्य)
• धाव् + क्तवतु = धौतवान् / धावितवान् (दो रूप)
• सिव् + क्तवतु = स्यूतवान् (वकार को ऊठ् आदेश)
• भ्रंश् + क्तवतु = भ्रष्टवान् (षत्व और ष्टुत्व कार्य)
• शुष् + क्तवतु = शुष्कवान् (तकार को ककार आदेश)
• सह् + क्तवतु = सोढवान् (हकार को ढकार और ओत्व)
• मुह् + क्तवतु = मुग्धवान् / मूढवान् (दो रूप)

✨ १५. तुमुन् प्रत्यय (पाठ ३६) ✨

📖 प्रधान सूत्र: तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् (पा० सू० ३.३.१०)
नियम: किसी क्रिया की सिद्धि के लिए जब कोई दूसरी क्रिया की जाती है, तब इसे क्रियार्थक क्रिया कहते हैं। उत्तरक्रिया (भविष्य में होने वाली मुख्य क्रिया) के बोधक धातुओं से तुमुन् (तुम्) और ण्वुल् (वु = अक) प्रत्यय होते हैं।
💡 बच्चों के लिए आसान भाषा में समझें (क्रिया का उद्देश्य): जब कोई काम करने के लिए कोई दूसरा काम किया जाए— जैसे "पढ़ने के लिए विद्यालय जाता है"। यहाँ विद्यालय जाने का उद्देश्य 'पढ़ना' है। अतः समीपवर्ती धातु में तुमुन् प्रत्यय हो जाता है। ध्यान रहे कि इन दोनों क्रियाओं (पढ़ना और जाना) का कर्ता एक ही व्यक्ति होता है।
🎯 इच्छार्थक धातु उपपद नियम एवं वाक्य प्रयोग:

इच्छार्थक धातु (जैसे— इष्/चाहना) उपपद (पास में) रहने पर, उसके कर्मरूप क्रियाबोधक धातुओं से— यदि दोनों क्रियाओं का कर्ता एक ही व्यक्ति हो तो 'तुमुन्' प्रत्यय होता है।

स इच्छति भोक्तुम्।
अनुवाद: वह भोजन करना चाहता है (खाने की इच्छा करता है)।
गृहं गन्तुं इच्छामि।
अनुवाद: मैं घर जाना चाहता हूँ।
⚙️ मुख्य स्मरणीय बिन्दु (अनुबन्ध लोप एवं प्रकृति):
  • अर्थ विधान: वाक्य में 'को' अथवा 'के लिए' (जैसे— जाने के लिए, पढ़ने के लिए) अर्थ को प्रकट करने के लिए तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
  • अवयव शेष: तुमुन् में से उपदेशेऽजनुनासिक इत् से 'उ' तथा हलन्त्यम् से 'न्' (अर्थात् 'उन्') हट जाता है एवं केवल तुम् भाग शेष रहता है, जो धातु के पीछे जुड़ता है।
  • अव्यय संज्ञा (रूप निषेध): 'कृन्मेजन्तः' और 'तद्धितश्चासर्वविभक्तिः' नियमों के कारण तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग अव्यय की तरह होता है। अतः इसके रूप तीनों लिंगों या विभक्तियों में नहीं चलते हैं; यह सदा एक समान रहता है।
🍽️ १. तुमुन् प्रत्यय उदाहरण का व्यावहारिक विश्लेषण:
उदाहरण: भोक्तुं याति (खाने के लिए जाता है)।

यहाँ वाक्य में दो क्रियाएँ हैं: (१) भुज् (खाना) तथा (२) या (जाना)। यहाँ भोजन रूपी क्रिया की सिद्धि के लिए गमन (जाने की) क्रिया हो रही है। अतः गमन क्रिया यहाँ 'क्रियार्थक क्रिया' (उद्देश्य वाली क्रिया) है। इसी कारण याति (गमन क्रिया) के समीप स्थित मूल धातु भुज् से तुमुन् प्रत्यय होकर भोक्तुम् रूप बनता है।
⚠️ भविष्यत् काल विवक्षा रहस्य: ध्यान दें कि तुमुन् और ण्वुल् प्रत्यय हमेशा भविष्यत् काल की विवक्षा में होते हैं। इसका अर्थ यह है कि जिस क्रिया के लिए ये प्रत्यय लगाए जा रहे हैं, वह कार्य अभी हुआ नहीं है, बल्कि भविष्य में होने वाला है (जैसे— वह अभी जा रहा है, खाना उसने अभी शुरू नहीं किया है)।

💡 ण्वुल् प्रत्यय को समझने की जादुई ट्रिक (शंका समाधान):

प्यारे बच्चों, चूँकि "तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्" सूत्र में तुमुन् के साथ ही ण्वुल् प्रत्यय का भी विधान है, इसलिए दोनों का उद्देश्य एक ही है। अंतर केवल इतना है कि तुमुन् प्रत्ययान्त शब्द 'अव्यय' (के लिए) बन जाता है, जबकि ण्वुल् प्रत्ययान्त शब्द 'संज्ञा/विशेषण' (करने वाला कर्ता) बन जाता है!

🔍 ण्वुल् की पहचान (वु = अक): ण्वुल् प्रत्यय में 'ण्' और 'ल्' की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'वु' बचता है। पाणिनीय सूत्र 'युवोरनाकौ' से इस 'वु' को 'अक' आदेश हो जाता है। अतः इसके अंत में हमेशा 'अकः' की ध्वनि आती है!
पाठशाला का उदाहरण: कृष्णं दर्शको याति।
(दृश् + ण्वुल् = दर्शकः) → कृष्ण को देखने के उद्देश्य से (देखने वाला बनकर) जाता है।
📋 दैनिक जीवन में प्रयुक्त होने वाले प्रचलित ण्वुल् (अक) प्रत्ययान्त शब्द
मूल धातु ण्वुल् (वु = अक) रूप क्रियार्थक वाक्य प्रयोग (उद्देश्य बोधक) सरल हिन्दी अनुवाद
पठ् (पढ़ना) पाठकः ग्रन्थं पाठको याति। ग्रन्थ पढ़ने के लिए (पाठक बनकर) जाता है।
लिख् (लिखना) लेखकः लेखं लेखको गच्छति। लेख लिखने के लिए (लेखक बनकर) जाता है।
कृ (करना) कारकः कार्यं कारको यतते। कार्य करने के लिए (कर्ता बनकर) यत्न करता है।
सेव् (सेवा करना) सेवकः नृपं सेवको याति। राजा की सेवा करने के लिए (सेवक बनकर) जाता है।
गै (गाना) गायकः गीतं गायको प्रविशति। गीत गाने के लिए (गायक बनकर) प्रवेश करता है।

💡 उपर्युक्त उपमानों और उदाहरणों से अब छात्र 'अकः' ध्वन्यन्त शब्दों को देखते ही ण्वुल् प्रत्यय को तुरंत पहचान लेंगे!

💡 तुमुन् प्रत्यय के कुछ अन्य विशेष नियम (विशिष्ट उपपद विधान)

प्यारे बच्चों, केवल 'के लिए' अर्थ में ही नहीं, बल्कि संस्कृत वाक्य में जब कुछ विशिष्ट शब्द या धातुएँ पास (उपपद) में बैठी हों, तब भी धातु से 'तुमुन्' प्रत्यय का प्रयोग नित्य ही किया जाता है। आइए इन्हें ३ श्रेणियों में आसानी से समझें:

⚡ (क) शक् और धृष् धातुओं के योग में:

जब वाक्य में 'सकना' (शक्) या 'साहस करना' (धृष्) क्रिया मुख्य रूप से प्रयोग हो, तो उनके साथ आने वाली क्रिया में तुमुन् प्रत्यय लगता है:

  • कर्तुं शक्नोति (करने में समर्थ है / कर सकता है)
  • कर्तुं धृष्णोति (करने का साहस करता है)
💪 (ख) पर्याप्त (समर्थ अर्थ) के वाचक शब्द उपपद होने पर:

यदि वाक्य में समर्थः, शक्तः, प्रवीणः (कुशल) जैसे शब्द प्रयुक्त हों, तो वहाँ भी तुमुन् प्रत्यय का नियम कार्य करता है:

  • • गन्तुं समर्थः (जाने के लिए समर्थ है)
  • • गन्तुं शक्तः (जाने योग्य / सक्षम है)
  • • गन्तुं प्रवीणः (जाने में कुशल है)
⏰ (ग) कालार्थक (समय वाचक) शब्द उपपद होने पर:

'कालोपपदे तुमुन्' पाणिनीय नियमानुसार जब वाक्य में कालः, समयः, वेला (समय) जैसे शब्द उपपद हों, तब भी तुमुन् प्रत्यय लगाया जाता है:

  • • भोक्तुं कालः समागतः (भोजन करने का समय आ गया है)
  • • भोक्तुं समयः (भोजन करने का समय है)
  • • भोक्तुं वेला (भोजन करने की वेला/समय है)
📋 धातुओं से निष्पन्न तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों के उदाहरण: नीचे दी गई तालिका में धातुओं के साथ तुमुन् (तुम्) प्रत्यय जोड़ने से निर्मित होने वाले अव्यय रूपों को दर्शाया गया है। प्रक्रिया के दौरान होने वाले गुण, वृद्धि और इडागम (इ) के नियमों को ध्यान से समझें:
मूल धातु (अर्थ) तुमुन् प्रत्ययान्त रूप व्यावहारिक अर्थ
कथ् (कहना) कथितुम् कहने के लिए
स्था (ठहरना) स्थातुम् ठहरने के लिए
भू (होना) भवितुम् होने के लिए
अद् (खाना) अत्तुम् खाने के लिए
सु (स्नान/अभिषव करना) सोतुम् अभिषव के लिए
तुद् (दुःख देना) तोत्तुम् कष्ट देने के लिए
रुध् (रोकना) रोद्धुम् रोकने के लिए
चुर् (चुराना) चोरयितुम् चुराने के लिए
बुध् (बोधि) (जानना/ण्यन्त) बोधयितुम् बोध कराने के लिए
चिकीर्ष (करने की इच्छा/सन्नन्त) चिकीर्षितुम् करने की इच्छा के लिए
पुत्रीय (पुत्र की इच्छा/नामधातु) पुत्रीयितुम् पुत्रवत् चाहने के लिए
चि (चुनना) चेतुम् चुनने के लिए
जागृ (जागना) जागरितुम् जागने के लिए
मृ (मरना) मर्तुम् मरने के लिए
क्षम् (क्षमा करना) क्षमितुम्, क्षन्तुम् क्षमा करने के लिए
वस् (रहना/निवास) वस्तुम् रहने के लिए
दह् (जलाना) दग्धुम् जलाने के लिए
हन् (मारना) हन्तुम् मारने के लिए
सिच् (सींचना) सेक्तुम् सींचने के लिए
गुप् (रक्षा करना) गोपायितुम्, गोपितुम्, गोप्तुम् रक्षा करने के लिए
दुह् (दुहना) दोग्धुम् दुहने के लिए
मुह् (मोहित होना) मोहितुम्, मोग्धुम् / मूढुम् मोहित होने के लिए
सह् (सहन करना) सहितुम्, सोढुम् सहन करने के लिए
तन् (फैलाना) तनितुम् फैलाने के लिए
दिव् (खेलना/चमकना) देवितुम् खेलने के लिए
क्री (खरीदना) क्रेतुम् खरीदने के लिए
हु (हवन करना) होतुम् हवन करने के लिए
(जाना) एतुम् जाने के लिए
जीव (जीना) जीवितुम् जीने के लिए
यज् (यज्ञ करना) यष्टुम् यज्ञ करने के लिए
कृ + तुमुन् कर्तुम् करने के लिए
गम् + तुमुन् गन्तुम् जाने के लिए
ज्ञा + तुमुन् ज्ञातुम् जानने के लिए
दा + तुमुन् दातुम् देने के लिए
श्रु + तुमुन् श्रोतुम् सुनने के लिए
दृश् + तुमुन् द्रष्टुम् देखने के लिए
क्रीड् + तुमुन् क्रीडितुम् खेलने के लिए
पा + तुमुन् पातुम् पीने के लिए
खाद् + तुमुन् खादितुम् खाने के लिए
📝 अनुभाग ६: तुमुन् प्रत्ययान्त व्यावहारिक वाक्य प्रयोग अभ्यास

प्यारे बच्चों, परीक्षा में धातुओं से सीधे तुमुन् प्रत्यय जोड़ने के साथ-साथ उनका वाक्यों में शुद्ध प्रयोग करना भी पूछा जाता है। नीचे दी गई दोनों सूचियों के वाक्यों को ध्यान से पढ़ें, रिक्त स्थानों या कोष्ठक के पदों को मन में सोचें और नीचे दिए गए छिपे हुए उत्तरमाला बॉक्स को खोलकर अपने ज्ञान का स्वमूल्यांकन करें:

🔷 अभ्यास पत्र: प्रथम भाग (को / के लिए अर्थ विवक्षा)
१. छात्रः पुस्तकं .................... पुस्तकालयं गच्छति। (पठ् + तुमुन्)
२. सूपकारः भोजनं .................... महानसं प्रविशति। (पच् + तुमुन्)
३. दुष्टः निर्दोषं जनं .................... प्रयतते। (पीड् + तुमुन्)
४. भक्तः मन्दिरं .................... ईशं ध्यायति। (पूज् + तुमुन्)
५. विघ्नः कार्यं .................... न शक्नोति। (बाध् + तुमुन्)
६. बालकः फलं .................... इच्छति। (भक्ष् + तुमुन्)
७. राजा सुखं .................... वैकुण्ठं यतते। (भुज् + तुमुन्)
🔶 अभ्यास पत्र: द्वितीय भाग (विशिष्ट उपपद एवं अव्यय प्रयोग)
८. अहं मित्रेण .................... तत्र गच्छामि। (मिल् + तुमुन्)
९. वृद्धः इदानीं .................... न वांछति। (मृ + तुमुन्)
१०. भिक्षुकः वस्त्रं .................... राजद्वारं याति। (याच् + तुमुन्)
११. सैनिकः देशं .................... सन्नद्धः अस्ति। (रक्ष् + तुमुन्)
१२. चन्द्रः नभः .................... उदेति। (राज् + तुमुन्)
१३. आरक्षकः चोरं .................... मार्गं बध्नाति। (रुध् + तुमुन्)
१४. सा लेखं .................... लेखनीं गृह्णाति। (लिख् + तुमुन्)
१५. वयम् ईश्वरं .................... मन्दिरं गच्छामः। (वन्द् + तुमुन्)
१६. छात्रः सत्यं .................... गुरुं पृच्छति। (विद् + तुमुन्)
१७. सः वस्त्रं .................... रज्जुं आनयति। (वेष्ट् + तुमुन्)
१८. बालकः धावितुं ....................। (शक् + तुमुन् - लट् लकार प्रथम पुरुष एकवचन क्रिया रूप योग)
१९. मुनिः क्रोधं .................... वनं गतः। (शम् + तुमुन्)
२०. ऋत्विक् घृतं .................... पात्रं गृह्णाति। (हु + तुमुन्)
२१. पुष्पम् उद्यानं .................... विकसति। (शुभ् + तुमुन्)
२२. शिष्यः गुरुं .................... आश्रमं प्रविशति। (श्रि + तुमुन्)
🔑 वाक्य प्रयोग अभ्यास की व्याख्यात्मक उत्तरमाला — यहाँ चटका (क्लिक) लगायें
✓ सभी वाक्यों के शुद्ध तुमुन् प्रत्ययान्त रूप एवं सरल अर्थ:
• १. पठितुम् (पढ़ने के लिए)
• २. पक्तुम् (पकाने के लिए - चकार को कुत्व)
• ३. पीडितुम् (कष्ट देने के लिए - इडागम)
• ४. पूजितुम् (पूजा करने के लिए)
• ५. बाधितुम् (बाधा पहुँचाने के लिए)
• ६. भक्षितुम् (खाने के लिए)
• ७. भोक्तुम् (भोगने/खाने के लिए - जकार को कुत्व)
• ८. मिलितुम् (मिलने के लिए)
• ९. मर्तुम् (मरने के लिए - ऋकार को गुण 'अर्')
• १०. याचितुम् (माँगने के लिए)
• ११. रक्षितुम् (रक्षा करने के लिए)
• १२. राजितुम् / राष्ट्रुम् (सुशोभित होने के लिए)
• १३. रोद्धुम् (रोकने के लिए - धकार को भष्भाव-धत्व)
• १४. लेखितुम् (लिखने के लिए - इकार को गुण 'ए')
• १५. वन्दितुम् (वंदना करने के लिए)
• १६. वेदितुम् (जानने के लिए - गुण कार्य)
• १७. वेष्टितुम् (लपेटने के लिए)
• १८. शक्नोति (धावितुं शक्नोति - दौड़ सकता है)
• १९. शमितुम् / शन्तुम् (शांत होने के लिए)
• २०. होतुम् (हवन करने के लिए - उकार को गुण 'ओ')
• २१. शोभितुम् (शोभित होने के लिए - उकार को गुण 'ओ')
• २२. श्रितुम् (आश्रय लेने के लिए)

🎮 'चटका लगाओ' स्वचालित लाइव क्विज़ (Interactive Score Quiz)

नीचे दिए गए प्रश्नों के सही विकल्प पर चटका (क्लिक) लगाएँ। आपको तुरंत शुद्ध उत्तर का बोध होगा और अंत में आपका लाइव स्कोर कार्ड तैयार होगा!

प्रश्न 1. 'तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्' सूत्रानुसार 'भुज्' धातु से जब 'भोक्तुम्' रूप बनता है, तो वह काल की किस विवक्षा में होता है?
प्रश्न 2. 'पच् + तुमुन्' का योग करने पर चकार को कुत्व संधि तथा तकार को वत्व कार्य होने के बाद शुद्ध अव्यय पद क्या निष्पन्न होगा?
प्रश्न 3. वाक्य में 'गन्तुं समर्थः' या 'भोक्तुं कालः समागतः' का प्रयोग होने पर, समर्थ या कालार्थक शब्दों के योग में कौन-सा कृदन्त प्रत्यय होता है?
📊 आपका लाइव स्कोर बोर्ड (Live Score Card)
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प्रश्नों के विकल्पों पर चटका लगाकर अभ्यास प्रारम्भ करें!

🕵️‍♂️ 'खोजें और सुधारें' खेल (Spot the Error Game)

नीचे दिए गए संस्कृत वाक्यों में तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग करते समय कुछ अशुद्धियाँ (गलतियाँ) हो गई हैं। ध्यान से देखें, अशुद्ध पद को खोजें और नीचे छिपे बॉक्स पर चटका लगाकर शुद्ध रूप और उसका व्याकरण रहस्य जानें!

वाक्य 1: बालकः दुग्धं पातुतुम् इच्छति।
वाक्य 2: सः कथां कथयितुम् गच्छति।
वाक्य 3: रामः विद्यालये पठितुम् शक्नोति
वाक्य 4: सा पत्रं लिखतुम् लेखनीं आनयति।
🔍 खेल का शुद्ध उत्तर और व्याकरण रहस्य देखने के लिए यहाँ चटका लगायें
✓ अशुद्धि शोधन और पाणिनीय नियमों की मीमांसा:
✔️ शुद्ध वाक्य 1: बालकः दुग्धं पातुम् इच्छति।
व्याकरण रहस्य: 'पा' (पीना) धातु सेठ् नहीं बल्कि अनिट् है, अतः इसमें इट् (इ) का आगम नहीं होता। सीधा 'तुमुन्' का तुम् जुड़ने से पातुम् रूप बनता है, पातुतुम् कोई रूप नहीं है।
✔️ शुद्ध वाक्य 2: सः कथां कथितुम् गच्छति।
व्याकरण रहस्य: चुरादिगण की 'कथ्' धातु से जब स्वार्थ में णिच् प्रत्यय होता है, तब ण्यन्त रूप में तुमुन् लगाने पर इडागम और गुणादेश के सामंजस्य से कथितुम् रूप शुद्ध सिद्ध होता है।
✔️ शुद्ध वाक्य 3: रामः विद्यालये पठितुं शक्नोति
व्याकरण रहस्य: 'पठितुम्' के मकार को आगे 'श' (व्यंजन) परे होने के कारण 'मोऽनुस्वारः' सूत्र से नित्य अनुस्वार (तुं) हो जाता है। अतः वाक्य के बीच में मकारान्त हलन्त लिखना अशुद्ध है।
✔️ शुद्ध वाक्य 4: सा पत्रं लेखितुम् लेखनीं आनयति।
व्याकरण रहस्य: 'लिख्' धातु की उपधा लघु 'इ' को आर्धधातुक प्रत्यय (तुमुन्) परे होने के कारण पाणिनीय नियमानुसार गुण एकादेश 'ए' हो जाता है। जिससे 'लिखतुम्' के स्थान पर लेखितुम् शुद्ध रूप बनता है।

🎉 बधाई हो बच्चों! इन अशुद्धियों को पहचानकर आप तुमुन् प्रत्यय के व्यावहारिक प्रयोग में पारंगत हो चुके हैं।

✨ १६. णमुल् प्रत्यय (पाठ ३६) ✨

💡 परीक्षा के लिए जादुई ट्रिक: ण्वुल् और णमुल् का भ्रम दूर करें! 💡

अक्सर छात्र इन दोनों प्रत्ययों के नाम और ध्वनि में समानता के कारण भ्रमित हो जाते हैं। इसे पहचानने की यह बेहद आसान ट्रिक हमेशा याद रखें:

⚙️ ण्वुल् प्रत्यय (अकः): • अंत में 'अकः' की ध्वनि आती है।
• यह 'कर्ता' (Noun/संज्ञा) बनाता है और इसके रूप चलते हैं।
पहचान ध्वनि: पाठकः, लेखकः, दर्शकः।
⚙️ णमुल् प्रत्यय (अम-अम): • अंत में 'अम्' की ध्वनि आती है और यह हमेशा दो बार (Repeat) प्रयुक्त होता है।
• यह 'अव्यय' बनाता है और इसके रूप नहीं चलते।
पहचान ध्वनि: पायं पायम्, भोज भोजम्।
📌 णमुल् प्रत्यय किन-किन अर्थों और नियमों के साथ होता है?
(१) क्रिया की आवृत्ति (बार-बार होना): एक ही क्रिया को बार-बार करने के भाव की अभिव्यक्ति के लिए क्त्वा प्रत्ययान्त शब्द अथवा 'णमुल्' प्रत्ययान्त शब्द का प्रयोग करते हैं। इस प्रत्यय से युक्त शब्द का वाक्य में दो बार (द्वित्व) प्रयोग होता है।
(२) व्यावहारिक तुलनात्मक उदाहरण: "वह पानी पी-पीकर खाता है।"
क्त्वा पक्ष: सः जलं पीत्वा पीत्वा खादति। (क्त्वा प्रत्यय को दो बार लिखा गया है)
णमुल् पक्ष: सः जलं पायं पायं खादति। (णमुल् प्रत्यय को दो बार लिखा गया है)
(३) अनुबन्ध लोप एवं अवयव शेष: णमुल् प्रत्यय में से 'ण्' (चुटू सूत्र से) तथा 'ल्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे जोड़ने के लिए केवल अम् भाग ही शेष बचता है।
यथा — √पा + णमुल् = पायं पायम् | √भुज् + णमुल् = भोज भोजम्
(४) अव्यय प्रकृति एवं यकार (य्) आगम: इस प्रत्यय से युक्त शब्द पूर्णतः अव्यय होते हैं, अतः तीनों लिंगों या विभक्तियों में इनके रूप नहीं चलते हैं।
🔍 आकारान्त धातु विशेष नियम: आ-कारान्त (अन्त में आ स्वर वाली) धातु से परे णमुल् प्रत्यय होने पर धातु और प्रत्यय के बीच 'य्' (युक आगम) हो जाता है। जिससे धातु के बाद 'यम्' (य् + अम्) जुड़ता है।
√दा + णमुल् = दा + य् + अम् = दायम् दायम्
• इसी प्रकार स्नायं स्नायम् (√स्ना + णमुल्) में भी यही नियम समझना चाहिए।
(५) णित्-कार्य (स्वर वृद्धि): णमुल् में 'ण' की इत्संज्ञा होने के कारण यह प्रत्यय 'णित्' कहलाता है। 'अचो णिति' सूत्र के नियमानुसार धातु के आदि (पूर्व) स्वर को वृद्धि आदेश हो जाता है (जैसे— उ को औ, ऋ को आर्)।
√श्रु + णमुल् = श्रावं श्रावम्
√स्मृ + णमुल् = स्मारं स्मारम्
🌟 पूरक व्याकरण ज्ञान: कर्तृवाचक प्रत्यय क्या हैं?

परिभाषा: ऐसे प्रत्यय जिनका प्रयोग करने पर मूल धातु से 'कर्तापन' (Doer/काम को करने वाले व्यक्ति) का बोध होता हो, वे कर्तृवाचक प्रत्यय कहलाते हैं।

📋 प्रमुख कर्तृवाचक प्रत्ययों का परिवार:
ण्वुल् (दर्शकः)
तृच् (कर्ता)
त्यु
णिनि
अणु
अच
क, ट
खर्च, क्विप्
⚡ णमुल् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (शॉर्टकट फॉर्मूले) ⚡

कठिन पाणिनीय नियमों को याद रखने के लिए इस पॉकेट गाइड को मन में बिठा लें:

पॉकेट सूत्र 1 (अर्थ): आभीक्ष्ण्ये = पौनःपुन्य (बार-बार होना)
(निरन्तरता या आवृत्ति होने पर क्रिया का दो बार प्रयोग: पायं पायम्)
पॉकेट सूत्र 2 (परिणाम): णमुल् = 'णित्' कार्य (विशेष वर्ण परिवर्तन)
(णकार की इत्संज्ञा के कारण धातु के स्वरों में वृद्धि और विशेष आगम होते हैं)
📖 पाणिनीय सूत्र: आभीक्ष्ण्ये णमुल् च — ३.४.२२

सरल व्याख्या: हमेशा, निरन्तर या बार-बार होने वाले भाव को 'आभीक्ष्ण्य' कहते हैं। आभीक्ष्ण्य (पौनःपुन्य) अर्थ द्योतित होने पर समानकर्तृक दो धातुओं में से पूर्वकालिक विद्यमान धातु से परे 'णमुल्' (और क्त्वा) प्रत्यय होता है।
⚙️ अनुबन्ध लोप: णमुल् में णकार, उकार तथा लकार की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है, केवल 'अम्' भाग शेष बचता है।

🤔 सोचो और समझो (छात्रों के मन की जिज्ञासा):

आप सोच रहे होंगे कि जब णमुल् में केवल 'अम्' ही शेष रखना था, तब महर्षि पाणिनि को 'णकार', 'उकार' तथा 'लकार' की इत्संज्ञा और लोप करने की क्या आवश्यकता थी? सीधे 'अम्' प्रत्यय ही कर देते!
💡 व्याकरण रहस्य: णमुल् प्रत्यय में प्रारम्भिक 'णकार' की इत्संज्ञा होने से यह प्रत्यय व्याकरण शास्त्र में 'णित्' हो जाता है। इसी 'णित्' होने के कारण धातु के स्वरूप में चमत्कारी वर्ण-परिवर्तन होते हैं।

⚙️ णमुल् प्रत्यय के 'णित्' होने का ६ गुना फल (वैज्ञानिक व्यवस्था)
(१) अचो णिति (७.२.११५): जिस धातु से णमुल् प्रत्यय होगा, वहाँ यदि धातु इगन्ताङ्ग (अंत में इ, उ, ऋ, ऌ वाली) होगी, तब इस सूत्र से इगन्ताङ्ग स्वर को वृद्धि आदेश हो जाएगा।
(२) अत उपधायाः (७.२.११६): यदि धातु की उपधा (अंतिम अक्षर से ठीक पहले वाला वर्ण) में छोटा अकार 'अ' विद्यमान हो, तो उसे वृद्धि होकर आकार 'आ' हो जाएगा।
(३) हनस्तोऽचिण्णलोः (७.३.३२): णमुल् प्रत्यय परे होने पर यदि 'हन्' धातु का प्रयोग हो, तो हन् धातु के नकार को तकार 'त्' आदेश प्राप्त होता है।
(४) आतो युक् चिण्कृतोः (७.३.३३): आकारान्त अङ्ग (जिस धातु के अंत में 'आ' स्वर हो, जैसे— पा, दा, स्ना) को प्रत्यय से पूर्व नित्य ही 'युक्' (य्) का आगम हो जाता है (जैसे— पा + य् + अम् = पायं पायम्)।
(५) नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमेः (७.३.३४): जो धातुएँ उदात्तोपदेश एवं मान्त (जिसके अंत में मकार हो, केवल 'चमि' धातु को छोड़कर) होती हैं, उन्हें उपधा-वृद्धि का कार्य नहीं होता है।
(६) जनिवध्योश्च (७.३.३५): इस विशेष नियम के अनुसार 'जन्' तथा 'वध्' धातुओं की उपधा में अकार होने पर भी (सूत्र ७.२.११६ से होने वाली) उपधा-वृद्धि का कार्य नहीं होता है
💎 मकारान्त कृत् प्रत्यय बन जाने का महान् फल

प्यारे बच्चों, जब किसी धातु में ऐसा कृत् प्रत्यय जुड़ता है जिसके अंत में मकार 'म्' शेष बचता है (जैसे— णमुल् का 'अम्'), तो व्याकरण शास्त्र में उसके दो मुख्य परिणाम (फल) प्राप्त होते हैं:

📌 १. कृन्मेजन्तः (१.१.३९): इस पाणिनीय नियम के अनुसार मकारान्त कृदन्त शब्दों की नित्य ही 'अव्यय' संज्ञा हो जाती है।
📌 २. अव्ययादाप्सुपः (२.४.८२): अव्यय संज्ञा हो जाने के कारण, इन शब्दों के पीछे आने वाली सभी सुप् (प्रथमा, द्वितीया आदि) विभक्तियों का पूर्णतः लोप (गायब) हो जाता है। इसी कारण इनके रूप राम या नदी की तरह नहीं बदलते, ये सदा एक समान रहते हैं।
⚙️ व्यावहारिक रूप-सिद्धि प्रक्रिया: 'स्मारं स्मारम्' (याद कर-करके)
स्मृ (याद करना) + णमुल् (आभीक्ष्ण्ये अर्थ में धातु से परे णमुल् प्रत्यय का योग हुआ)
स्मृ + अम् (णमुल् में से ण, उ, ल का अनुबन्ध लोप होकर केवल 'अम्' शेष बचा)
स्म + आर् + अम् (णमुल् प्रत्यय 'णित्' है, अतः 'अचो ञ्णिति' सूत्र से ऋकार को वृद्धि होकर 'आर्' आदेश हुआ)
→ स्मारम् (वर्णों का आपस में संयोग करने पर यह मकारान्त कृदन्त प्रातिपदिक बना)
💡 बच्चों के लिए ध्यातव्य विशेष बिन्दु: स्वादि विभक्ति (सु, औ, जस् आदि) की उत्पत्ति प्रक्रिया पूर्ण कर लेने पर लोक-व्यवहार के लिए स्मारम् (अनुस्वार युक्त होने पर स्मारं) रूप बना लें। ध्यातव्य है कि 'स्मारम्' में मकारान्त कृत् प्रत्यय लगा है, इसलिए यह शब्द 'कृन्मेजन्तः' सूत्र के नियम के अनुसार हमेशा के लिए अव्यय हो जाता है। वाक्य में इसका प्रयोग दो बार (पौनःपुन्य को दर्शाने के लिए) किया जाता है।
📖 पाणिनीय सूत्र: नित्य-वीप्सयोः — ८.१.४
नियम: नित्यता (निरन्तरता) और वीप्सा के अर्थ में विद्यमान पद को द्वित्व (दो बार प्रयोग) होता है।
💡 बच्चों के लिए आसान भाषा में समझें (वीप्सा क्या है?): व्याप्त होने या किसी कार्य को बार-बार दोहराने की इच्छा को व्याकरण में 'वीप्सा' कहते हैं। यह निरन्तरता तिङन्त (क्रियाओं) और अव्यय संज्ञक कृदन्त (जैसे णमुल् प्रत्ययान्त शब्दों) की क्रिया में बताई जाती है। चूँकि स्मारम् (स्मारं) शब्द को नित्यता या निरन्तरता के अर्थ में प्रयोग किया जा रहा है, इसलिए इस पद को नित्य-वीप्सयोः सूत्र से द्वित्व (दो बार प्रयोग) होकर 'स्मारं स्मारम्' पद बनता है।
📋 अन्य प्रमुख धातुओं की रूप-सिद्धि एवं वाक्य-प्रयोग उदाहरण
🔷 (१) भुज् (खाना/भोगना) + णमुल् प्रक्रिया:भुज् + णमुल् = भोजम्
(रहस्य: 'पुगन्तलघूपधस्य च' — ७.३.८६ सूत्र से लघु उपधा उकार को गुण 'ओ' होकर भोजम् रूप सिद्ध होता है।)
• आभीक्ष्ण्ये (बार-बार होने) के कारण धातु/पद को द्वित्व (दो बार) प्रयोग किया जाता है।
📝 व्यावहारिक वाक्य प्रयोग: भोजं भोजं व्रजति।
सरल हिन्दी अनुवाद: वह खा-खाकर चलता है।
🔶 (२) पा (पीना) + णमुल् प्रक्रिया:पा + णमुल् = पायम्
(रहस्य: 'आतो युक् चिण्कृतोः' — ७.३.३३ सूत्र से आकारान्त अङ्ग को बीच में 'युक्' यानी 'य्' का आगम होने से पायम् बनता है।)
📝 व्यावहारिक वाक्य प्रयोग: पायं पायं व्रजति।
सरल हिन्दी अनुवाद: वह पी-पीकर चलता है।
🔄 वैकल्पिक पक्ष (क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग): जैसा कि हम जानते हैं, आभीक्ष्ण्ये में 'क्त्वा' प्रत्यय का विकल्प भी खुला रहता है। अतः क्त्वा प्रत्यय के पक्ष में वाक्य इस प्रकार भी लिखे जा सकते हैं और वे भी पूर्णतः शुद्ध हैं:
• भुज् धातु से: भुक्त्वा भुक्त्वा व्रजति। (खा-खाकर चलता है)
• पा धातु से: पीत्वा पीत्वा व्रजति। (पी-पीकर चलता है)
⚡ उच्च पाणिनीय विमर्श: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (Advanced Analytics) ⚡

प्रतियोगी परीक्षाओं एवं अष्टाध्यायी क्रम के गहन अवबोध हेतु इन गणितीय सूत्रों को समझें:

अपवाद सूत्र (निषेध): 'यद्' उपपद + अनाकाङ्क्ष वाक्य = णमुल् / क्त्वा निषेध
(यदि वाक्य पूर्ण अर्थ दे और अन्य वाक्य की आकांक्षा न रखे, तो 'यद्' के योग में प्रत्यय नहीं होंगे)
विभाषा सूत्र (विकल्प): अग्रे / प्रथम / पूर्व उपपद = विकल्प से क्त्वा / णमुल्
(इन तीन विशिष्ट कालवाचक शब्दों के पास रहने पर प्रत्यय विधान पूर्णतः वैकल्पिक होता है)
📖 सूत्र १: न यद्यनाकाक्षे — ३.४.२३ (णमुल् निषेध नियम)
सूत्रार्थ: समानकर्तृक दो धातुओं में से पूर्वकालिक धात्वर्थ में 'यत्' शब्द के उपपद (समीप) होने पर, पूर्वसूत्र 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' (३.४.२२) से प्राप्त होने वाले णमुल् एवं क्त्वा प्रत्यय नहीं (न) होते हैं; यदि वह वाक्य किसी अन्य वाक्य की आकाङ्क्षा न रखने वाला (पूर्ण अर्थ प्रतिपादक) हो।
🔬 शास्त्रीय प्रयोग एवं मीमांसा:
यद् अयं भुङ्क्ते ततः पठति।
सरल अर्थ: यह बार-बार पहले खाता है, पीछे पढ़ता है।
यद् अयम् अधीते ततः शेते।
सरल अर्थ: यह पहले बार-बार पढ़ता है, तब सोता है।
💡 प्रौढ़ शिक्षार्थी विशेष विमर्श: यहाँ प्रथम उदाहरण में भोजन क्रिया वाला वाक्य अथवा द्वितीय उदाहरण में पठन क्रिया वाला वाक्य स्वतंत्र रूप से अपने अर्थ का प्रतिपादन कर रहा है। वह अपनी अर्थ-सिद्धि के लिए किसी अन्य वाक्य की आकाङ्क्षा (Aspiration/Dependency) नहीं रखता है। इसी 'अनाकाङ्क्ष' स्थिति के कारण 'यद्' उपपद होने पर भी यहाँ णमुल् अथवा क्त्वा प्रत्यय का सर्वथा निषेध हो गया, और साधारण तिङन्त क्रिया पदों (भुङ्क्ते, अधीते) का ही प्रयोग किया गया।
📖 सूत्र २: विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु — ३.४.२४ (वैकल्पिक प्रत्यय विधान)
सूत्रार्थ: यदि वाक्य में अग्रे (पहले), प्रथमम् (प्रथमतः) एवं पूर्वम् (पूर्वकाल में) शब्द उपपद के रूप में विद्यमान हों, तो समानकर्तृक पूर्वकालिक धातु से विभाषा (विकल्प से) क्त्वा एवं णमुल् प्रत्ययों का विधान होता है।
📌 प्रौढ़ स्तर पर ध्यातव्य निष्कर्ष: इस 'विभाषा' (वैकल्पिक) नियम का फल यह है कि जब वाक्य में अग्रे, प्रथम या पूर्व शब्द आएंगे, तो शिक्षार्थी की इच्छा पर निर्भर है कि वह चाहे तो णमुल्/क्त्वा का प्रयोग करे, अथवा उनके अभाव पक्ष में सामान्य क्रिया रूपों का आश्रय ले। यहाँ शास्त्र दोनों ही प्रयोगों को पूर्णतः प्रामाणिक मानता है।
📝 अनुभाग १: अभ्यास पत्र (प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप सिद्धि)

नीचे दिए गए प्रकृति-प्रत्यय और पाणिनीय नियमों के अनुसार रिक्त स्थानों में शुद्ध आभीक्ष्ण्य (पौनःपुन्य) द्योतक द्वित्व रूप भरकर अभ्यास कीजिए:

१. सः ईश्वरं .................... .................... मोदते। (स्मृ + णमुल् — 'अचो ञ्णिति' वृद्धि नियमानुसार)
२. शिशुः दुग्धं .................... .................... हसति। (पा + णमुल् — 'आतो युक्...' यकार आगम नियमानुसार)
३. सूपकारः अन्नं .................... .................... तृप्यति। (भुज् + णमुल् — 'पुगन्तलघूपधस्य च' गुण नियमानुसार)
४. गुरुः शिष्याय ज्ञानं .................... .................... प्रसीदति। (दा + णमुल् — आकारान्त युक-आगम विधान)
५. सा मन्त्रं .................... .................... लिखति। (श्रु + णमुल् — आदि स्वर वृद्धि नियमानुसार)
🎯 अनुभाग २: स्वमूल्यांकन (प्रौढ़ शिक्षार्थी विशेष पाणिनीय विमर्श)

अष्टाध्यायी क्रम और प्रतियोगी परीक्षाओं की दृष्टि से महत्वपूर्ण प्रश्न। अपने सही विकल्प का मन में चयन करें और नीचे बटन से जाँचें:

प्रश्न 1. 'यद् अयं भुङ्क्ते ततः पठति' इस वाक्य में 'यद्' उपपद रहने पर भी 'न यद्यनाकाक्षे (3.4.23)' सूत्र से णमुल् का निषेध क्यों हुआ?
[-] (क) क्योंकि यहाँ कर्ता भिन्न-भिन्न हैं। [-] (ख) क्योंकि वाक्य अपनी अर्थ-सिद्धि के लिए अन्य वाक्य की आकाङ्क्षा नहीं रखता (अनाकाङ्क्ष है)। [-] (ग) क्योंकि यहाँ क्रिया की आवृत्ति (पौनःपुन्य) नहीं हो रही है।
प्रश्न 2. 'णमुल्' प्रत्ययान्त शब्दों की 'कृन्मेजन्तः (1.1.39)' सूत्र से कौन-सी संज्ञा होती है और उसका व्याकरणिक फल क्या है?
[-] (क) नदी संज्ञा होती है और नदीवत् रूप चलते हैं। [-] (ख) प्रातिपदिक संज्ञा होती है और रामवत् रूप चलते हैं। [-] (ग) अव्यय संज्ञा होती है और 'अव्ययादाप्सुपः' से विभक्तियों का लोप हो जाता है।
प्रश्न 3. 'विभाषाऽग्रेप्रथमपूर्वेषु (3.4.24)' सूत्र के नियमानुसार वाक्य में अग्रे, प्रथम या पूर्व उपपद होने पर क्या विधान होता है?
[-] (क) नित्य ही केवल णमुल् प्रत्यय होता है। [-] (ख) विकल्प से (विभाषा) क्त्वा एवं णमुल् प्रत्यय होते हैं। [-] (ग) इन तीनों उपपदों के रहने पर प्रत्ययों का पूर्ण निषेध हो जाता है।
🔑 उत्तरमाला (Answer Key) — शास्त्रीय रहस्य और शुद्ध उत्तर देखने के लिए यहाँ चटका लगायें
✓ अनुभाग १ (रिक्त स्थान अभ्यास) के शुद्ध उत्तर:
  • (१) स्मारं स्मारम् (स्मृ + णमुल् → अचो ञ्णिति से ऋकार की वृद्धि 'आर्' होने से स्मारम् बना और नित्य-वीप्सयोः से द्वित्व हुआ)
  • (२) पायं पायम् (पा + णमुल् → आतो युक् चिण्कृतोः से युक/य् का आगम होकर पायम् सिद्ध हुआ)
  • (३) भोजं भोजम् (भुज् + णमुल् → पुगन्तलघूपधस्य च से उपधा उकार को गुण 'ओ' होकर भोजम् बना)
  • (४) दायं दायम् (दा + णमुल् → आकारान्त धातु होने से युक का आगम होकर दायम् रूप सिद्ध हुआ)
  • (५) श्रावं श्रावम् (श्रु + णमुल् → आदि स्वर उकार को वृद्धि 'औ' और अवादेश होकर श्रावम् बना)
✓ अनुभाग २ (MCQ विमर्श) के शुद्ध उत्तर:
  • प्रश्न 1. (ख) क्योंकि वाक्य अपनी अर्थ-सिद्धि के लिए अन्य वाक्य की आकाङ्क्षा नहीं रखता। (पाणिनीय नियमानुसार अनाकाङ्क्ष वाक्य में 'यद्' उपपद होने पर आभीक्ष्ण्य अर्थ में भी णमुल् और क्त्वा का निषेध हो जाता है।)
  • प्रश्न 2. (ग) अव्यय संज्ञा होती है और 'अव्ययादाप्सुपः' से विभक्तियों का लोप हो जाता है। (मकारान्त कृदन्त होने के कारण पद अव्यय बन जाता है, फलस्वरूप इसके रूप तीनों लिंगों में नहीं चलते।)
  • प्रश्न 3. (ख) विकल्प से (विभाषा) क्त्वा एवं णमुल् प्रत्यय होते हैं। (अग्रे, प्रथम और पूर्व इन तीन कालवाचक उपपदों के समीप रहते प्रत्यय विधान पूर्णतः वैकल्पिक/विभाषा होता है।)
🧠 क्या आप जानते हैं? — पूर्वकालिक क्रिया का रहस्य 🤔

प्यारे बच्चों, व्याकरण को रटने के बजाय उसके व्यावहारिक स्वरूप को समझना सबसे अधिक महत्वपूर्ण है। आइए इस पाठ के अंत में एक बहुत ही अद्भुत बात जानते हैं कि पूर्वकालिक क्रिया वास्तव में किसे कहते हैं और इसके लिए संस्कृत में कौन-कौन से हथियार (प्रत्यय) हमारे पास उपलब्ध हैं:

🎯 पूर्वकालिक क्रिया किसे कहते हैं? (सरल परिभाषा):

जब कर्ता द्वारा एक क्रिया के होने के ठीक बाद दूसरी क्रिया आरम्भ होती है, तब उन दोनों में से जो क्रिया पहले ही सम्पन्न (पूरी) हो चुकी होती है, उसे ही व्याकरण में पूर्वकालिक क्रिया कहते हैं।

💡 पहचान ट्रिक: हिंदी भाषा के वाक्यों में इस क्रिया के ठीक बाद हमेशा 'करके' अथवा 'कर' पद का प्रयोग दिखाई देता है।
📝 व्यावहारिक उदाहरण से समझें:
अहं पठित्वा गच्छामि। (मैं पढ़कर जाता हूँ।)

🔬 वैज्ञानिक विश्लेषण: इस प्रस्तुत उदाहरण में दो क्रियाएँ हैं— 'पढ़ना' और 'जाना'। चूँकि 'पढ़ने' का कार्य 'जाने' की क्रिया से ठीक पूर्व (पहले) ही समाप्त हो चुका है और उसके साथ हिंदी में 'कर' (पढ़ + कर) पद जुड़ा है, इसलिए इस 'पढ़कर' रूपी पूर्वकालिक अर्थ की सुंदर अभिव्यक्ति के लिए धातु में पूर्वकालिक प्रत्यय लगाया जाता है।

🛠️ पूर्वकालिक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'प्रत्यय त्रयी' (३ विकल्प)

संस्कृत व्याकरण में इस 'करके' या 'कर' वाले पूर्वकालिक अर्थ को प्रकट करने के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित तीन प्रत्ययों का साम्राज्य है:

१. क्त्वा प्रत्यय
(मूल धातुओं से: पठित्वा)
२. ल्यप् प्रत्यय
(उपसर्ग युक्त धातुओं से: विनीय)
३. णमुल् प्रत्यय
(आवृत्ति/बार-बार के अर्थ में: पायं पायम्)
📌 सबसे बड़ी विशेषता (अव्यय नियम): इन तीनों प्रत्ययों (क्त्वा, ल्यप् और णमुल्) से निर्मित होने वाले सभी पद व्याकरण शास्त्र में 'अव्यय' बन जाते हैं। अव्यय होने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनके रूप कभी नहीं बदलते; ये तीनों लिंगों, सभी विभक्तियों और वचनों में सदैव एक समान (अपरिवर्तनीय) रहते हैं।

✨ १७. घञ् प्रत्यय (पाठ ३७) ✨

🌟 आगामी पाठ्य-क्रम: अन्य महत्वपूर्ण कृत् प्रत्यय

प्यारे बच्चों और आदरणीय पाठकों, अब हम आगे इस पाठ में घञ्, शतृ, शानच (ष्यमाण), ल्युट्, णिनि, अच्, क, अण् आदि अन्य उपयोगी कृत् प्रत्ययों के बारे में विस्तार से जानेंगे। यद्यपि आधुनिक व्यावहारिक संस्कृत में इन प्रत्ययों का प्रयोग बहुत अधिक नहीं होता है, परन्तु प्राचीन ग्रन्थों के सम्यक् अवबोध और ज्ञान-वर्धन के लिए इनकी प्रामाणिक जानकारी अवश्य करनी चाहिए।

⚡ घञ् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (क्विक फॉर्मूले) ⚡

घञ् प्रत्यय के इन ३ मुख्य नियमों को गणित के सूत्रों की तरह याद कर लें:

पॉकेट सूत्र 1 (लिंग नियम): धातु + घञ् = सदैव पुंलिङ्ग शब्द
(घञ् प्रत्यय से बने सभी शब्द हमेशा पुंलिङ्ग में ही प्रयुक्त होते हैं, जैसे— पाठः, पाकः)
पॉकेट सूत्र 2 (अवयव शेष): घञ् प्रत्यय = केवल 'अ' भाग शेष
(घकार और ञकार की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है, केवल अकार जुड़ता है और आदि स्वर को वृद्धि होती है)
📖 पाणिनीय सूत्र: भावे — ३.३.१८ (घञ् प्रत्यय विधान)

नियम: भाव (क्रिया के स्वतः सिद्ध स्वरूप) अर्थ में धातुओं से 'घञ्' प्रत्यय होता है। पाणिनीय नियमों के अनुसार कहीं-कहीं अपादान, करण, कर्म आदि कारकों के विशेष अर्थों की अभिव्यक्ति के लिए भी 'घञ्' प्रत्यय का विधान किया जाता है।

💡 १. "भाव" अर्थ में प्रयुक्त होने वाले प्रत्यक्ष रूप:
पठनम् (भाव) → पठ् + घञ् = पाठः (पढ़ना/अध्ययन रूप भाव)
पचनम् (भाव) → पच् + घञ् = पाकः (पकाना रूप भाव - चकार को कुत्व ककार)
📋 २. "कारकों" के विशेष अर्थों में घञ् प्रत्ययान्त प्रयोग:

लौकिक विग्रह और संधिनियमों के योग से सिद्ध होने वाले विशिष्ट पदों की शास्त्रीय मीमांसा:

चित्तं दारयन्ति = विद्रावयन्तीति = दाराः (जो चित्त को द्रवित करती हैं अर्थात् पत्नी - घञ् प्रत्ययान्त शब्द नित्य बहुवचनान्त पुंलिङ्ग होता है)
जरयति = नाशयति कुलमिति = जारः (जो कुल का क्षय या विनाश करता है अर्थात् उपपति)
लभ्यते इति = लाभः (कर्म कारक अर्थ में - जो प्राप्त किया जाता है वह लाभ है)
रज्यति अनेन इति = रागः (करण कारक अर्थ में - जिसके द्वारा मन अनुरंजित या रंगीन होता है वह राग/रंग है)
उपेत्य अधीयते अस्मात् इति = उपाध्यायः (अपादान कारक अर्थ में - समीप जाकर जिनसे विद्या ग्रहण की जाती है वे उपाध्याय/गुरु हैं)
आध्रियते अत्रेति = आधारः (अधिकरण कारक अर्थ में - जहाँ कोई वस्तु टिकी या धारण की जाती है वह आधार है)

✨ १८ एवं १९. ष्यतृ और ष्यमाण प्रत्यय (पाठ ३८) ✨

📋 सत् संज्ञा और काल विधान परिचय

प्यारे बच्चों, पाणिनीय व्याकरण के 'तौ सत्' (१.१.२६) सूत्र के अनुसार शतृ और शानच् प्रत्ययों को सम्मिलित रूप से 'सत्' भी कहा जाता है। सामान्यतः इनका प्रयोग वर्तमान काल (Present Tense) में होता है। परन्तु जब भविष्यत् काल (Future Tense) में 'करता हुआ रहेगा' या 'जाता हुआ रहेगा' का भाव प्रकट करना हो, तब लृट् लकार (भविष्यत् काल) के स्थान पर परस्मैपदी धातुओं से ष्यतृ प्रत्यय का विधान किया जाता है।

⚡ ष्यतृ प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (जादुई शॉर्टकट ट्रिक) ⚡

परीक्षा में रूप सिद्ध करने के लिए इस बेहद आसान ट्रिक को याद रखें:

🔥 जादुई ट्रिक सूत्र: लृट् लकार (प्र.पु. एकवचन) रूप — 'ति' + 'अत्' = ष्यतृ रूप

(धातु के भविष्यत् काल रूप में से अंतिम 'ति' हटाकर 'अत्' लगा देने से सीधा प्रातिपदिक रूप बन जाता है!)

⚙️ 'भू' धातु के उदाहरण से समझें वैज्ञानिक रूप-सिद्धि:
√भू + तिप् (लृट् लकार, प्रथम पुरुष, एकवचन में रूप बना)भविष्यति
• अब जादुई नियमानुसार अंतिम स्वर सहित 'ति' भाग को हटा दें → भविष्य_
• अब इसके पीछे शतृ का अवयव 'अत्' जोड़ दें → भविष्य + अत्
→ भविष्यत् (पररूप एकादेश होने पर यह मूल प्रातिपदिक रूप सिद्ध हुआ)

चूँकि इस प्रत्यय को जोड़ने पर अंत में हमेशा 'ष्यत्' (या स्यत्) ध्वनि सुनाई देती है, इसीलिए व्याकरण में सामान्य भाषा में इसे 'ष्यत्' प्रत्यय भी कह देते हैं। यह प्रत्यय भी केवल परस्मैपदी धातुओं के साथ ही प्रयोग किया जाता है।

📊 प्रमुख उदाहरण एवं शब्द रूप संचालन नियम:

इस जादुई नियम के आधार पर अन्य परस्मैपदी धातुओं के मूल प्रातिपदिक इस प्रकार सरलता से बनते हैं:

पठिष्यत्
करिष्यत्
गमिष्यत्
नेष्यत्
📌 रूप संचालन नियम: इसके रूप वर्तमान काल के 'शतृ' प्रत्यय के समान ही चलते हैं। पुल्लिङ्ग में इसके रूप 'भवत्' (या पठत्) शब्द के समान चलेंगे (जैसे— भविष्यन्, भविष्यन्तौ, भविष्यन्तः)। स्त्रीलिंग में ङीप् प्रत्यय लगकर नदीवत् रूप चलेंगे (जैसे— भविष्यन्ती)।
📋 ष्यमाण प्रत्यय परिचय: भविष्यत् काल (आत्मनेपदी)

प्यारे बच्चों, पिछले पाठ में हमने पढ़ा था कि भविष्यत् काल में परस्मैपदी धातुओं से 'ष्यतृ' प्रत्यय होता है। ठीक ष्यतृ प्रत्यय के समान ही भविष्यत् काल में 'करता हुआ रहेगा' या 'बढ़ता हुआ रहेगा' का भाव प्रकट करने के लिए ष्यमाण प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। अन्तर केवल इतना है कि यह प्रत्यय केवल आत्मनेपदी धातुओं के साथ ही किया जाता है। शेष काल, अर्थ और वाक्य-संयोजन के सभी नियम ष्यतृ के समान ही होते हैं।

⚡ ष्यमाण प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (पहचान शॉर्टकट ट्रिक) ⚡

परीक्षा में इस प्रत्यय को पहचानने और रूप बनाने की यह जादुई ट्रिक याद रखें:

🔥 जादुई ट्रिक सूत्र: लृट् लकार (प्र.पु. एकवचन) रूप — 'ते' + 'माण' = ष्यमाण रूप

(धातु के भविष्यत् काल रूप में से अंतिम 'ते' को हटाकर 'माण' जोड़ देने से सीधा प्रातिपदिक रूप सिद्ध हो जाता है!)

⚙️ उदाहरण से समझें वैज्ञानिक रूप-सिद्धि प्रक्रिया:
उदाहरण 1 — वृध् (बढ़ना) धातु:
• वृध् धातु का लृट् लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन) में रूप बनता है → वर्धिष्यते
• अब जादुई नियमानुसार अंतिम अक्षर 'ते' को हटा दें → वर्धिष्य_
• अब इसके स्थान पर शानच् का भविष्यत् रूप 'माण' जोड़ दें → वर्धिष्य + माण
→ वर्धिष्यमाण (यह मूल प्रातिपदिक रूप सिद्ध हुआ, पुंलिङ्ग एकवचन में विसर्ग लगकर वर्धिष्यमाणः बनेगा।)
उदाहरण 2 — लभ् (पाना) धातु:
• लभ् धातु का लृट् लकार (प्रथम पुरुष, एकवचन) में रूप बनता है → लप्स्यते
• अंतिम अक्षर 'ते' को हटाकर 'माण' जोड़ें → लप्स्य + माण
→ लप्स्यमाण (यह मूल प्रातिपदिक रूप सिद्ध हुआ, पुंलिङ्ग एकवचन में विसर्ग लगकर लप्स्यमाणः बनेगा।)
📊 प्रमुख आत्मनेपदी उदाहरण एवं शब्द रूप संचालन:

इसी पाणिनीय व्यवस्था के आधार पर अन्य महत्वपूर्ण आत्मनेपदी धातुओं के मूल प्रातिपदिक इस प्रकार निर्मित होते हैं:

वर्धिष्यमाण
लप्स्यमाण
सेविष्यमाण
याचिष्यमाण
📌 रूप संचालन नियम: इसके रूप भी सामान्य वर्तमान काल के 'शानच्' प्रत्यय के समान ही चलते हैं:
पुंलिङ्ग में: 'राम' शब्द के समान रूप चलेंगे (जैसे— वर्धिष्यमाणः, वर्धिष्यमाणौ, वर्धिष्यमानाः)।
स्त्रीलिङ्ग में: 'रमा' शब्द के समान रूप चलेंगे (जैसे— वर्धिष्यमाना, वर्धिष्यमाने, वर्धिष्यमानाः)।
नपुंसकलिङ्ग में: 'पुस्तक/फल' के समान रूप चलेंगे (जैसे— वर्धिष्यमाणम्)।
📋 भविष्यत् काल स्थानीय प्रत्यय उदाहरण सूची: नीचे दी गई तालिका में धातुओं के साथ ष्यतृ (परस्मैपदी) एवं ष्यमाण (आत्मनेपदी) प्रत्यय जोड़ने से निर्मित होने वाले रूपों को दर्शाया गया है। ध्यान दें कि परीक्षा में अक्सर मूल प्रातिपदिक के स्थान पर सुबन्त पुंलिङ्ग रूप पूछा जाता है:
मूल धातु (अर्थ) प्रत्यय प्रकार मूल प्रातिपदिक पुंलिङ्ग रूप [प्र.पु.ए.व.]
√भू (होना) ष्यतृ (परस्मै.) भविष्यत् भविष्यन्
√गम् (जाना) ष्यतृ (परस्मै.) गमिष्यत् गमिष्यन्
√मृ (मरना) ष्यतृ (परस्मै.) मरिष्यत् मरिष्यन्
√हन् (मारना) ष्यतृ (परस्मै.) हनिष्यत् हनिष्यन्
प्र + √आप् (प्राप्त करना) ष्यतृ (परस्मै.) प्राप्स्यत् प्राप्स्यन्
आ + √रुह् (चढ़ना) ष्यतृ (परस्मै.) आरोक्ष्यत् आरोक्ष्यन्
√लभ् (प्राप्त करना) ष्यमाण (आत्मने.) लप्स्यमाण लप्स्यमानः
📋 उभयपदी एवं मिश्रित धातुओं की उदाहरण सूची: नीचे दी गई तालिका में उभयपदी (परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों रूपों वाली) धातुओं के साथ ष्यमाण एवं ष्यतृ प्रत्यय जोड़ने से निर्मित होने वाले रूपों को उनके व्यावहारिक अर्थों के साथ दर्शाया गया है:
मूल धातु (अर्थ) ष्यमाण रूप [आत्मने.] ष्यतृ रूप [परस्मै.] प्रत्ययान्त व्यावहारिक अर्थ
√ज्ञा (जानना) ज्ञास्यमानः ज्ञास्यन् भविष्य में जानने वाला / वाली
√कृ (करना) करिष्यमाणः करिष्यन् भविष्य में करने वाला / वाली
√दा (देना) दास्यमानः दास्यन् भविष्य में देने वाला / वाली
√छिद् (काटना) छेत्स्यमाणः छेत्स्यन् भविष्य में काटने वाला / वाली
√क्रीड् (खेलना) — (केवल परस्मैपदी) क्रीडिष्यन् भविष्य में खेलने वाला / वाली
√नी (ले जाना) नेष्यमाणः नेष्यन् भविष्य में ले जाने वाला / वाली
√ग्रह (पकड़ना) ग्रहीष्यमाणः ग्रहीष्यन् भविष्य में पकड़ने वाला / वाली

✨ २०, २१ एवं २२. ल्यु, णिनि और अच् प्रत्यय (पाठ ३९) ✨

📋 ल्यु प्रत्यय: कर्तृवाचक ('वाला' अर्थ) विधान

प्यारे बच्चों, जब कुछ विशिष्ट धातुओं के साथ 'ल्यु' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, तो उससे 'कर्तृवाचक' (काम को करने वाला / 'वाला') अर्थ की अभिव्यक्ति होती है। यह मुख्य रूप से नन्दि, वाशि, मदि, दूषि, साधि, वर्धि, शोभि, रोचि आदि विशिष्ट धातुओं के बाद प्रयुक्त होता है।

⚡ ल्यु प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (अनुबन्ध-लोप शॉर्टकट फॉर्मूला) ⚡

परीक्षा में रूप सिद्ध करने के लिए इस बेहद आसान ट्रिक को याद रखें:

🔥 जादुई अनुबन्ध नियम: ल्यु प्रत्यय = 'यु' शेष \(\rightarrow\) 'यु' को 'अन' आदेश

(ल्यु में से 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से लकार 'ल्' का लोप होता है, और पाणिनीय सूत्र 'युवोरनाकौ' से 'यु' को 'अन' हो जाता है।)

📋 प्रमुख धातुओं के ल्यु-प्रत्ययान्त रूप एवं उनके व्यावहारिक अर्थ
धातु + प्रत्यय प्रक्रिया पुंलिङ्ग रूप [प्र.वि. एकवचन] प्रत्ययान्त व्यावहारिक अर्थ
नन्द् + ल्यु (अन) नन्दनः आनन्दित करने वाला
वाश् + ल्यु (अन) वाशनः चिल्लाने या आवाज़ करने वाला
मद् + l्यु (अन) मदनः मस्त या हर्षित करने वाला
दूष् + ल्यु (अन) दूषणः दूषित या खराब करने वाला
√साध् + ल्यु (अन) साधनः सिद्ध करने या साधने वाला
√वर्ध् + l्यु (अन) वर्धनः बढ़ाने या उन्नति करने वाला
शोभ् + ल्यु (अन) शोभनः सुशोभित या सुन्दर लगने वाला
रोच् + ल्यु (अन) रोचनः रुचिकर या अच्छा लगने वाला
जन + √अर्द् + ल्यु (अन) जनार्दनः दुष्ट मनुष्यों को पीड़ित/नष्ट करने वाला (भगवान् कृष्ण)
√लू + ल्यु (अन) लवणः काटने या क्षरण करने वाला (नमक/लवण - णत्व विधान)
📌 शब्द रूप संचालन नियम: ल्यु प्रत्ययान्त शब्दों के रूप पुल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन में 'राम' शब्द के समान चलते हैं (जैसे— नन्दनः, नन्दनौ, नन्दनाः)।
⚠️ उच्च स्तरीय विशेष सावधानी (🚨 बहुत महत्वपूर्ण): प्रौढ़ शिक्षार्थी ध्यान दें कि यह कर्तृवाचक 'ल्यु' प्रत्यय, सामान्यतः भाव और करण अर्थों में होने वाले ल्युट् प्रत्यय (जैसे— पठनम्, गमनम्) से सर्वथा भिन्न है। ल्युट् प्रत्यय नपुंसकलिङ्ग शब्द बनाता है, जबकि 'ल्यु' प्रत्यय 'वाला' अर्थ प्रकट करने वाला पुल्लिङ्ग शब्द सिद्ध करता है।
📋 णिनि प्रत्यय: कर्तृवाचक ('वाला' अर्थ) विधान

प्यारे बच्चों, व्याकरण शास्त्र में 'ग्रहवृदृनिश्चिगमश्च' आदि सूत्रों के नियमानुसार ग्रह आदि धातुओं से 'वाला' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'णिनि' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय के जुड़ने से बनने वाले सभी शब्द अंत में 'इन्' ध्वनि वाले अर्थात् नकारान्त प्रातिपदिक बनते हैं।

⚡ णिनि प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (अनुबन्ध-लोप एवं णित्-कार्य फॉर्मूला) ⚡

णिनि प्रत्यय के वर्ण-परिवर्तन नियमों को इस पॉकेट गाइड से समझें:

नियम 1 (अवयव शेष): णिनि प्रत्यय = केवल 'इन्' शेष
(प्रारम्भ के 'ण्' की 'चुटू' से तथा अन्त के 'इ' की 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है)
नियम 2 (वृद्धि कार्य): 'ण्' की इत्संज्ञा = 'णित्' कार्य (स्वर वृद्धि)
(णकार लोप होने से अचो ञ्णिति सूत्र द्वारा धातु के पूर्व स्वर 'अ' को वृद्धि आदेश 'आ' हो जाता है)
⚙️ 'ग्रह्' धातु के उदाहरण से समझें वैज्ञानिक रूप-सिद्धि:

जब हम √ग्रह् धातु में णिनि प्रत्यय का योग करते हैं, तो पाणिनीय नियमानुसार धातु के 'ग्र' में स्थित अकार स्वर 'अ' को वृद्धि आदेश 'आ' होकर ग्राह् बन जाता है:

√ग्रह् + इन् (णिनि) = ग्राह् + इन् = ग्राहिन् (यह मूल नकारान्त प्रातिपदिक बना)
📌 लौकिक विग्रह एवं सुबन्त पद: "गृह्णाति इति ग्राही" (जो ग्रहण करता है वह ग्राही है)। यह मूल शब्द 'ग्राहिन्' नकारान्त प्रातिपदिक होने के कारण पुल्लिङ्ग, प्रथमा विभक्ति एकवचन में ग्राही रूप निर्मित करता है।
📋 णिनि प्रत्ययान्त प्रमुख नकारान्त प्रातिपदिक एवं सुबन्त पद
धातु / पद + प्रत्यय प्रक्रिया नकारान्त प्रातिपदिक पुंलिङ्ग रूप [प्र.वि. एकवचन]
उत् + √सह् + णिनि उत्साहिन् उत्साही
√स्था + युक् + णिनि (युक का आगम) स्थायिन् स्थायी
मन्त्र + णिनि मन्त्रिन् मन्त्री
नञ् + √याच् + णिनि (नञ् समास) अयाचिन् अयाची
नञ् + √वद् + णिनि अवादिन् अवादी
विषय + णिनि विषयिन् विषयी
अप + राध् + णिनि अपराधिन् अपराधी
📋 अच् प्रत्यय: कर्तृवाचक (कर्तापरक) विधान

प्यारे बच्चों, पच्, वद्, चल्, पत्, जू, मॄ, क्षम्, सेव्, वण्, सृ, सृज् आदि धातुओं से 'कर्तृवाचक' (काम को करने वाले कर्ता) अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'अच्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय के जुड़ने से बने सभी शब्द संस्कृत व्याकरण में सदैव पुंलिङ्ग में ही प्रयुक्त होते हैं।

⚡ अच् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" (अनुबन्ध-लोप एवं लिंग नियम) ⚡

परीक्षा में रूप पहचानने के लिए इस बेहद आसान नियम को याद रखें:

नियम 1 (अवयव शेष): अच् प्रत्यय = केवल 'अ' भाग शेष
(प्रत्यय के अन्त में प्रयुक्त चकार 'च' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'अ' शेष बचता है जो व्यञ्जनान्त धातु को पूरा कर देता है)
नियम 2 (लिंग व्यवस्था): अच् प्रत्ययान्त शब्द = सदैव पुंलिङ्ग
(इस प्रत्यय से निष्पन्न होने वाले पदों के रूप राम शब्द के समान केवल पुंलिङ्ग प्रथमा विभक्ति में ही चलते हैं, जैसे— पचः, वदः)
📋 प्रमुख धातुओं के अच्-प्रत्ययान्त रूप
धातु + प्रत्यय पुंलिङ्ग रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ
√पच् + अच् (अ) पचः पकाने वाला (रसोइया)
√वद् + अच् (अ) वदः बोलने वाला (वक्ता)
√चल् + अच् (अ) चलः चलने वाला / चंचल
√पत् + अच् (अ) पतः गिरने / उड़ने वाला (पक्षी)
√जू + अच् (अ) जरः बूढ़ा करने वाला / वेगवान्
√मॄ + अच् (अ) मरः मरने वाला (मरणधर्मा मानव)
√सृ + अच् (अ) सरः सरकने या बहने वाला (जल)
√क्षम् + अच् (अ) क्षमः क्षमा करने वाला / समर्थ
√सेव् + अच् (अ) सेवः सेवा करने वाला (सेवक)
√वण् + अच् (अ) व्रणः घाव या ज़ख्म उत्पन्न करने वाला
√सृज् + अच् (अ) सर्जः सृष्टि या निर्माण करने वाला
📋 अच् प्रत्यय: कर्तृवाचक (कर्तापरक) विधान

प्यारे बच्चों, पच्, वद्, चल्, पत्, जू, मॄ, क्षम्, सेव्, वण्, सृ, सृज् आदि धातुओं से 'कर्तृवाचक' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'अच्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय के जुड़ने से बने सभी शब्द संस्कृत व्याकरण में सदैव पुंलिङ्ग में ही प्रयुक्त होते हैं।

⚡ अच् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" ⚡
नियम 1 (अवयव शेष): केवल 'अ' भाग शेष
चकार 'च' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'अ' शेष बचता है जो व्यञ्जनान्त धातु को पूरा कर देता है।
नियम 2 (लिंग व्यवस्था): शब्द = सदैव पुंलिङ्ग
इस प्रत्यय से निष्पन्न होने वाले पदों के रूप राम शब्द के समान केवल पुंलिङ्ग प्रथमा विभक्ति में ही चलते हैं, जैसे— पचः, वदः।

✨ २३. क प्रत्यय (पाठ ४०) ✨

📋 क प्रत्यय: इगुपध, ज्ञा, प्री और कृ धातु विधान

प्यारे बच्चों, जब हम विशिष्ट धातुओं से 'कर्ता' (काम को करने वाला) अर्थ प्रकट करना चाहते हैं, तब पाणिनीय नियमानुसार वहाँ 'क' प्रत्यय का विधान किया जाता है। आइए इसके पहले मुख्य सूत्र और उसकी वैज्ञानिक प्रक्रिया को समझें।

⚡ क प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" ⚡
नियम 1 (अनुबन्ध लोप): केवल 'अ' भाग शेष
प्रत्यय के प्रारम्भिक ककार 'क्' की 'लशक्वतद्धिते' सूत्र से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे जुड़ने के लिए केवल 'अ' शेष बचता है।
नियम 2 (गुण निषेध): कित् होने से गुण का निषेध
चूँकि इसमें ककार 'क्' की इत्संज्ञा होती है, अतः यह 'कित्' प्रत्यय है। कित् होने के कारण धातु के मूल स्वरों को होने वाले गुण/वृद्धि का निषेध हो जाता है।
📖 प्रधान सूत्र: इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः — ३.१.१३५

सूत्रार्थ: (१) जिन धातुओं की उपधा (अन्तिम वर्ण से ठीक पहले वाला अक्षर) में इक् स्वर (इ, उ, ऋ, ऌ) प्रयुक्त हुआ हो (इगुपध), (२) तथा √ज्ञा (जानना), (३) √प्री (प्रीञ्) (प्रसन्न होना) और (४) √कृ (कॄ विक्षेपे) (बिखेरना) धातुओं के बाद कर्तृवाचक अर्थ में 'क' प्रत्यय होता है।

🔬 'क्षिप्' धातु से समझें वर्ण-परिवर्तन का विज्ञान:

उदाहरण: √क्षिप् + क = क्षिपः (फेंकने वाला)।
उपर्युक्त उदाहरण में √क्षिप् धातु के अन्तिम 'अल्' अर्थात् 'प' से ठीक पूर्व (उपधा में) ह्रस्व 'इ' स्वर प्रयुक्त हुआ है। अतः उपधा में इकार होने से यह 'इगुपध' धातु है। जब इससे कर्तृवाचक अर्थ में 'क' प्रत्यय का योग करते हैं, तो अनुबन्ध लोप के बाद शब्द बनता है— 'क्षिप'। पुनः प्रातिपदिक होने से पुल्लिङ्ग प्रथमा विभक्ति एकवचन में सु-प्रत्यय और विसर्ग कार्य होकर शुद्ध रूप क्षिपः सिद्ध होता है।

📋 इस सूत्र से निष्पन्न अन्य प्रमुख क-प्रत्ययान्त रूप
धातु + प्रत्यय पुंलिङ्ग रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ
√लिख् + क (अ) लिखः लिखने वाला (लेखक)
√बुध् + क (अ) बुधः जानने वाला (विद्वान् / पण्डित)
√कृश् + क (अ) कृशः दुबला होने वाला / कमजोर
√ज्ञा + क (अ) ज्ञः जानने वाला (ज्ञाता - विशेष वर्ण लोप)
√प्री + क (अ) प्रियः प्रसन्न करने वाला / प्यारा
√कृ + क (अ) किरः बिखेरने वाला (ऋ को इर आदेश)
📝 क प्रत्यय विशेष नियम संकलन: नीचे दी गई संकीर्ण (Compact) तालिका में आकारान्त धातुओं के साथ उपसर्ग, कर्म-पद तथा विशिष्ट शब्दों के योग से सिद्ध होने वाले पाणिनीय 'क' प्रत्यय के उदाहरण दिए गए हैं। यह लेआउट मोबाइल स्क्रीन के लिए विशेष रूप से अनुकूलित है:
धातु + प्रत्यय प्रक्रिया पुंलिङ्ग रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ एवं विग्रह
📌 नियम २: उपसर्ग-युक्त आकारान्त धातुओं का विधान (सूत्र: आतश्चोपसर्गे)
विवरण: आकारान्त धातु (तथा ए, ऐ, ओ, औ स्वर वर्णों में समाप्त होने वाली वह धातु जो संधिनियमों से आकारान्त हो जाती है) से पहले यदि कोई उपसर्ग आया हो, तो 'क' प्रत्यय होता है और धातु के अन्तिम 'आ' का लोप हो जाता है।
प्र + √ज्ञा + क (अ) प्रज्ञः प्रकृष्ट रूप से जानने वाला (बुद्धिमान्)
(विग्रह: प्रकृष्टेन जानाति इति)
अभि + √ज्ञा + क (अ) अभिज्ञः भली-भाँति जानने वाला (जानकार)
वि + √ज्ञा + क (अ) विज्ञः विशेष रूप से जानने वाला (विद्वान्)
सु + √ज्ञा + क (अ) सुज्ञः सुगमता से जानने वाला / अच्छा ज्ञानी
📌 नियम ३: उपसर्ग-रहित धातुओं के पूर्व 'कर्म-पद' का विधान (सूत्र: आतोऽनुपसर्गे कः)
विवरण: धातु आकारान्त हो तथा उससे पूर्व कोई उपसर्ग न आया हो, किन्तु यदि उससे पहले कोई कर्म पद (Object Noun) उपपद के रूप में प्रयुक्त हुआ हो, तो 'क' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं।
गो + √दा + क (अ) गोदः गौ (गाय) दान करने वाला
(विग्रह: गां ददाiti इति)
सुख + √दा + क (अ) सुखदः सुख देने वाला / सुखदायक
(विग्रह: सुखं ददाति इति)
दुःख + √दा + क (अ) दुःखदः दुःख देने वाला / कष्टदायक
(विग्रह: दुःखं ददाति इति)
📌 नियम ४: विशेष पद (संख्या / अव्यय) उपपद रहने पर आकारान्त धातु विधान
विवरण: जब कोई विशिष्ट शब्द (जैसे संख्यावाची शब्द या अव्यय पद) धातु से पहले उपपद के रूप में स्थित हो, तो आकारान्त धातु से कर्तृवाचक अर्थ में 'क' प्रत्यय जुड़ता है।
द्वि + √पा + क (अ) द्विपः दो बार पानी पीने वाला (हाथी)
(विग्रह: द्वाभ्यां पिबति इति)
सम + √स्था + क (अ) समस्थः समान स्थिति में रहने वाला / स्थिर
(विग्रह: समे तिष्ठति इति)
विषम + √स्था + क (अ) विषमस्थः विषम या कठिन परिस्थिति में रहने वाला
(विग्रह: विषमे तिष्ठति इति)
📌 नियम ५: 'गृह' अर्थ की अभिव्यक्ति में √ग्रह् धातु विशेष विधान (सूत्र: गेहे कः)
विवरण: जब √ग्रह् धातु से 'घर' (गेह/गृह) अर्थ की अभिव्यक्ति करनी हो, तो कर्तृवाचक अर्थ में विशेष रूप से 'क' प्रत्यय होता है। इस प्रक्रिया में धातु के 'र' को सम्प्रसारण (ऋकार) आदेश प्राप्त होता है।
√ग्रह् + क (अ) गृहम् धान्य, धन आदि को ग्रहण करने वाला (घर)
(विग्रह: गृह्णाति धान्यादिकम् इति)

✨ २४. अण् प्रत्यय (पाठ ४०) ✨

💡 प्यारे बच्चों! आइए उदाहरण से समझें इन ३ कठिन शब्दों का अर्थ:

व्याकरण के इन तीन शब्दों को रटने के बजाय व्यावहारिक उदाहरण से समझें, यह बहुत आसान है:

१. कर्मवाची पद (Object Noun): वाक्य में क्रिया का फल जिस पर पड़ता है, उसे कर्म कहते हैं (द्वितीया विभक्ति)।
उदाहरण: "कुम्भं करोति" (घड़े को बनाता है)। यहाँ 'कुम्भम्' (घड़ा) क्रिया का कर्मवाची पद है।
२. कर्तृवाचक अर्थ (Doer/Subject): प्रत्यय जुड़ने के बाद जब पूरा शब्द किसी 'काम को करने वाले व्यक्ति' (संज्ञा) का बोध कराए।
उदाहरण: कुम्भ + कृ + अण् = कुम्भकारः (घड़ा बनाने वाला अर्थात् कुम्हार)। यहाँ 'कुम्भकारः' शब्द स्वयं एक व्यक्ति (कर्ता) बन गया है, इसीलिए इसे कर्तृवाचक अर्थ कहते हैं।
३. अधिकरणवाची पद (Locative/Base): जो क्रिया के होने के स्थान या आधार (कहाँ हो रहा है?) को बताए (सप्तमी विभक्ति)।
उदाहरण: "कुरुषु चरति" (कुरु देश में विचरता है)। यहाँ 'कुरुषु' (कुरु देश में) क्रिया के स्थान को बताने वाला अधिकरणवाची पद है।
⚡ अण् एवं ट प्रत्यय: ⚡
नियम 1 (अण् प्रत्यय कार्य): 'अ' शेष + आदि स्वर वृद्धि
'ण्' की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर लोप होता है, केवल 'अ' शेष रहता है। णित् होने के कारण धातु के आदि स्वर को वृद्धि आदेश (जैसे— ऋ को आर्) होता है।
नियम 2 (ट प्रत्यय कार्य): 'अ' शेष + गुण/वृद्धि निषेध
'ट्' की चुटू से इत्संज्ञा होकर लोप होता है, केवल 'अ' शेष रहता है। यह प्रत्यय णित् नहीं है, अतः इसमें अण् प्रत्यय की तरह आदि स्वर को वृद्धि नहीं होती है।
📖 प्रधान सूत्र: कर्मण्यण् — ३.२.१ (अण् प्रत्यय सामान्य नियम)

नियम: यदि धातु से पूर्व कोई कर्मवाची पद (Object) उपपद के रूप में प्रयुक्त हुआ हो, तो आकारान्त धातुओं से भिन्न (इक्, ऋक् आदि) धातुओं में कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'अण्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं।
⚠️ क-प्रत्यय अपवाद नियम: ध्यान रहे कि यदि धातु आकारान्त (अंत में 'आ' स्वर वाली) होगी, तो पूर्व नियमानुसार वहाँ 'क' प्रत्यय (जैसे— गोदः) होगा, अण् प्रत्यय नहीं।

📋 अण् एवं 'ट' प्रत्यय के प्रमुख सिद्ध रूप
उपपद + धातु + प्रत्यय पुंलिङ्ग रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ एवं विग्रह
🔹 (क) "कर्मण्यण्" सूत्र के प्रामाणिक उदाहरण
कुम्भ + √कृ + अण् (अ) कुम्भकारः घड़ा बनाने वाला (कुम्हार)
(विग्रह: कुम्भं करोति इति)
भार + √हृ + अण् (अ) भारहारः बोझ ढोने वाला / भार हरने वाला
(विग्रह: भारं हरति इति)
🔹 (ख) "अधिकरणे शेते" प्रसंगीय 'ट' प्रत्यय अपवाद (सूत्र: चरेष्टः — ३.२.१६)
विशेष अपवाद नियम: यदि √चर् (विचरना) धातु से पहले कोई अधिकरणवाची पद (सप्तम्यन्त स्थानबोधक शब्द) उपपद के रूप में प्रयुक्त हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ में अण् प्रत्यय को बाधकर विशेष रूप से 'ट' प्रत्यय होता है। यहाँ आदि स्वर को वृद्धि नहीं होती।
कुरु + √चर् + ट (अ) कुरुचरः कुरु देश में विचरने/घूमने वाला
(विग्रह: कुरुषु चरति इति)
🔹 (ग) भिक्षा, सेना और आदाय उपपद होने पर 'ट' प्रत्यय (सूत्र: भिक्षासेनादायेषु च)
विशेष नियम: अधिकरणवाची पद के अतिरिक्त यदि √चर् धातु से पहले भिक्षा, सेना और आदाय शब्दों में से किसी भी शब्द का प्रयोग उपपद के रूप में हुआ हो, तो भी कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'ट' प्रत्यय का ही प्रयोग होता है।
भिक्षा + √चर् + ट (अ) भिक्षाचरः भिक्षा के लिए विचरने वाला / भिक्षुक
(विग्रह: भिक्षां चरति इति)
सेना + √चर् + ट (अ) सेनाचरः सेना में चलने वाला / सैनिक
(विग्रह: सेनायां चरति इति)
आदाय + √चर् + ट (अ) आदायचरः लेकर विचरने वाला
(विग्रह: आदाय चरति इति)
🔹 (घ) √सृ धातु के पूर्व पुरः, अग्र आदि शब्द होने पर 'ट' प्रत्यय (सूत्र: पुरोग्रतोऽग्रेषु सर्तेः)
विशेष नियम: यदि √सृ (सरकना/चलना) धातु के ठीक पहले पुरः, अग्र, अग्रतः अथवा अग्रे पदों का प्रयोग हुआ हो, तो कर्तृवाचक ('वाला') अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए विशेष रूप से 'ट' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। यहाँ संधि नियमों के कारण विसर्ग का सकार और अलुक् समास कार्य होते हैं।
पुरः + √सृ + ट (अ) पुरस्सरः आगे चलने वाला / नेता / मार्गदर्शक
(विग्रह: पुरः सरति इति - सत्व सन्धि)
अग्र + √सृ + ट (अ) अग्रसरः आगे बढ़ने वाला / अग्रगामी
(विग्रह: अग्रं सरति इति)
अग्रतः + √सृ + ट (अ) अग्रतस्सरः सामने या आगे सरकने वाला
(विग्रह: अग्रतः सरति इति - सत्व सन्धि)
अग्रे + √सृ + ट (अ) अग्रेसरः मुख्य रूप से आगे रहने वाला
(विग्रह: अग्रे सरति इति - अलुक् समास)
📌 नियम ४: √कृ धातु के पूर्व विशिष्ट कर्म-पदों का अपवाद विधान (सूत्र: दिवाविभानिशाप्रभाभास्कर...)

यदि √कृ (करणे) धातु से पहले दिवा, विभा, निशा, प्रभा, भास्कर, किम्, बहु, लिपि, चित्र, क्षेत्र, लिबि, बलि, भक्ति, कर्तृ, संख्यावाचक शब्द, जड्या, बाहु, अहः, यत्, तत्, धनुष्, अरुष् आदि शब्द कर्म रूप में उपपद होकर प्रयुक्त हो रहे हों, तो कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए सामान्य नियम 'कर्मण्यण्' से प्राप्त होने वाले अण् प्रत्यय को बाधकर विशेष रूप से 'ट' प्रत्यय का प्रयोग होता है। यह नियम वस्तुतः सामान्य अण् प्रत्यय का अपवाद (Exception) है।

📋 इस नियम के प्रामाणिक उदाहरण:
• दिवा + √कृ + ट = दिवाकरः (सूर्य)
• विभा + √कृ + ट = विभाकरः (सूर्य/चन्द्र)
• निशा + √कृ + ट = nिशाकरः (चन्द्रमा)
• बहु + √कृ + ट = बहुकरः (बहुत करने वाला)
• एक + √कृ + ट = एककरः (एक करने वाला)
• धनुष् + √कृ + ट = धनुष्करः (धनुष बनाने वाला)
• अरुष् + √कृ + ट = अरुष्करः (मर्म को भेदने वाला)
• यत् + √कृ + ट = यत्करः (जो करने वाला है)
• तत् + √कृ + ट = तत्करः (वह करने वाला है)
📌 नियम ५: हेतु, स्वभाव, अथवा अनुकूलता अर्थ का विशेष विधान (सूत्र: हेतुताच्छील्यानुकूल्येषु...)

इसी प्रकार यदि √कृ धातु से पहले किसी कर्म का योग (उपपद) हो रहा हो, तथा वाक्य में विशेष रूप से 'हेतु' (कारण), 'ताच्छील्य' (आदत) अथवा 'आनुकूल्य' (अनुकूलता) अर्थ की अभिव्यक्ति करानी हो, तो पाणिनीय नियमानुसार अण् प्रत्यय का प्रयोग न करके विशेष रूप से 'ट' प्रत्यय का ही प्रयोग करते हैं। यह नियम भी सामान्य अण् प्रत्यय का एक प्रमुख अपवाद है।

📋 विग्रह सहित विशिष्ट उदाहरण:
हेतु अर्थ (कारण): यशस् + √कृ + ट + ङीप् = यशस्करी (विद्या)
लौकिक विग्रह: यशस्करोति इति यशस्करी (यश का कारण बनने वाली विद्या - स्त्रीलिंग हेतु टिड्ढाणञ्... से ङीप् प्रत्यय हुआ है)।
ताच्छील्य अर्थ (स्वभाव): श्राद्ध + √कृ + ट = श्राद्धकरः
लौकिक विग्रह: श्राद्धं करोति इति (श्राद्ध करने की स्वाभाविक आदत अथवा शील वाला व्यक्ति)।
आनुकूल्य अर्थ (अनुकूलता): वचन + √कृ + ट = वचनकरः
लौकिक विग्रह: वचनं करोति इति (वचनों के अनुकूल नित्य आज्ञाकारी कार्य करने वाला सेवक)।

✨ २५. खच् प्रत्यय (पाठ ४१) ✨

📋 खच् प्रत्यय: प्रिय और वश उपपद विधान (सूत्र: प्रियवशे वदः खच्)

प्यारे बच्चों, जब √वद् (बोलना) धातु से पहले 'प्रिय' अथवा 'वश' शब्द कर्म पद के रूप में प्रयुक्त हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ ('वाला') की अभिव्यक्ति के लिए पाणिनीय नियमानुसार विशेष रूप से 'खच्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं।

💡 आओ समझें: 'मुम्' आगम का नियम क्या है?

आप सोच रहे होंगे कि 'प्रिय + वदः' जुड़कर 'प्रियवदः' बनना चाहिए था, तो फिर बीच में आधा मकार 'म्' (प्रियंवदः) कहाँ से आकर बैठ गया?
🔍 व्याकरण रहस्य: पाणिनीय सूत्र 'अरुर्द्विषदजन्तस्य मुम्' (६.३.६७) के नियमानुसार जब भी किसी धातु के पीछे 'खित्' प्रत्यय (ऐसा प्रत्यय जिसमें खकार 'ख्' की इत्संज्ञा हुई हो, जैसे— खच्) लगा हो, तो धातु से पहले आने वाले अजन्त (अंत में स्वर वाले) शब्दों के ठीक बाद 'मुम्' का आगम हो जाता है। इस मुम् में से अनुबन्ध लोप होकर केवल आधा मकार 'म्' शेष बचता है।
→ संधिनियम का चमत्कार: यही आधा 'म्' आगे 'व' व्यंजन परे होने के कारण 'मोऽनुस्वारः' सूत्र से अनुस्वार (ं) में बदल जाता है, जिससे 'प्रिय' का 'प्रियं' और 'वश' का 'वशं' रूप सिद्ध होता है।

⚡ खच् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" ⚡
नियम 1 (अनुबन्ध लोप): केवल 'अ' भाग शेष
खच् के प्रारम्भ में स्थित 'ख्' की 'लशक्वतद्धिते' से तथा अन्तिम 'च्' की 'halन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, धातु के पीछे जुड़ने के लिए केवल 'अ' शेष बचता है।
नियम 2 (लिंग व्यवस्था): खचन्त शब्द = सदैव पुंलिङ्ग
इस प्रत्यय से निष्पन्न होने वाले कर्तृवाचक शब्द स्वभाव से सदैव पुंलिङ्ग में होते हैं और इनके रूप 'राम' शब्द के समान संचालित होते हैं।
📋 प्रियवशे वदः खच् सूत्र से सिद्ध प्रमुख रूप
उपपद + मुक् + धातु + प्रत्यय पुंलिङ्ग रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ एवं विग्रह
प्रिय + म् (मुक्) + √वद् + खच् (अ) प्रियंवदः प्रिय बोलने वाला / मधुरभाषी
(विग्रह: प्रियं वदतीति)
वश + म् (मुक्) + √वद् + खच् (अ) वशंवदः वश में रहने वाला / आज्ञाकारी
(विग्रह: वशं वदतीति)
📌 नियम २: विशिष्ट धातुओं (भृ, तृ, वृ, जि आदि) से पूर्व कर्मपद उपपद रहने पर विधान (सूत्र: संज्ञायां भृतृवृजिधृतपिसहितमिगमिः खच्)
विशेष नियम: यदि भृ, तृ, वृ, जि, धृ, सह, तप्, दम् और गम् धातुओं से पहले कोई संज्ञा शब्द कर्म के रूप में प्रयुक्त हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए भी 'खच्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। खित् प्रत्यय परे होने के कारण यहाँ भी पूर्ववत् मुम्/मुक् (म्) का आगम नित्य होता है।
विश्व + म् (मुक्) + √भृ + खच् (अ) + टाप् विश्वम्भरा विश्व का भरण-पोषण करने वाली (पृथ्वी)
(विग्रह: विश्वं बिभर्ति इति - स्त्रीलिङ्ग में टाप् प्रत्यय)
पति + म् (मुक्) + √वृ + खच् (अ) + टाप् पतिंवरा पति का वरण (चुनाव) करने वाली कन्या
(विग्रह: पतिं वरति इति - स्त्रीलिङ्ग में टाप् प्रत्यय)
रथ + म् (मुक्) + √तृ + खच् (अ) रथन्तरम् विशेष सामवेद का एक साम (मन्त्र समूह)
(विग्रह: रथं तरति इति - नपुंसकलिङ्ग निपातन)
युग + म् (मुक्) + √धृ + खच् (अ) युगन्धरः युग या जुए को धारण करने वाला / पर्वत विशेष
(विग्रह: युगं धरति इति)
अरि + म् (मुक्) + √दम् + खच् (अ) अरिंदमः शत्रुओं का दमन करने वाला व्यक्ति
(विग्रह: अरिम् दमयति इति)
शत्रु + म् (मुक्) + √जि + खच् (अ) शत्रुञ्जयः शत्रुओं को जीतने वाला राजा / शूरवीर
(विग्रह: शत्रुं जयति इति - परसवर्ण सन्धि)
शत्रु + म् (मुक्) + √सह् + खच् (अ) शत्रुंसहः शत्रुओं के प्रहार को सहने में समर्थ वीर
(विग्रह: शत्रुम् सहते इति)
📌 नियम ३: √कृ धातु के पूर्व क्षेम, प्रिय और मद्र कर्मपद रहने पर विकल्प विधान (सूत्र: क्षेमप्रियमद्रेऽण् च)
विशेष नियम: यदि √कृ (करणे) धातु से पहले क्षेम, प्रिय और मद्र शब्दों का प्रयोग कर्म के रूप में हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए खच् और अण् दोनों प्रत्ययों का विकल्प से प्रयोग किया जाता है। खच् पक्ष में पूर्ववत् मुम्/मुक् का आगम होकर परसवर्ण सन्धि कार्य होगा, जबकि अण् पक्ष में केवल आदि स्वर वृद्धि होगी।
क्षेम + √कृ
(कल्याण करना)
क्षेमङ्करः [खच् पक्ष] कल्याण करने वाला / मंगलकारी
(विग्रह: क्षेमं करोति इति)
क्षेमकारः [अण् पक्ष]
प्रिय + √कृ
(भला/प्रिय करना)
प्रियङ्करः [खच् पक्ष] प्रिय या अनुकूल कार्य करने वाला
(विग्रह: प्रियं करोति इति)
प्रियकारः [अण् पक्ष]
मद्र + √कृ
(कल्याण/आनंद करना)
मद्रङ्करः [खच् पक्ष] आनंद या भद्र करने वाला
(विग्रह: मद्रं करोति इति)
मद्रकारः [अण् पक्ष]
💡 विशेष अपवाद विमर्श: कर्म-अविवक्षा में 'अच्' प्रत्यय नियम
विशेष नियम: किन्तु जब 'क्षेम' पद में कर्म की विवक्षा (समानाधिकरण उपपद सम्बन्ध) नहीं होगी अर्थात् क्रियापद का सीधा सम्बन्ध न होकर षष्ठी तत्पुरुष का स्वतंत्र भाव होगा, तब वहाँ खच् या अण् न होकर सामान्य रूप से 'अच्' प्रत्यय हो जाता है। अच् प्रत्यय होने से आदि स्वर वृद्धि या मुम् आगम का पूर्ण निषेध रहता है।
क्षेम + √कृ + अच् (अ) क्षेमकरः क्षेम या शान्ति का सम्पादन करने वाला
(विग्रह: क्षेमस्य करः इति - षष्ठी समास)

✨ २६. क्विप् प्रत्यय (पाठ ४१) ✨

📋 क्विप् प्रत्यय: सर्वापहार लोप एवं प्रातिपदिक विधान (सूत्र: सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविदभिदच्छिदजिनीराजसु क्विप्)

प्यारे बच्चों, जब √सद्, √सू, √विद्विष्, √द्रुह्, √दुह्, √युज्, √विद्, √भिद्, √छिद्, √जि, √नी और √राज् धातुओं से पहले कोई उपसर्ग आए अथवा न आए, दोनों ही स्थितियों में कर्तृवाचक अर्थ (काम को करने वाले कर्ता) की अभिव्यक्ति के लिए पाणिनीय नियमानुसार 'क्विप्' प्रत्यय (३.२.६१) का प्रयोग करते हैं।

🧠 शास्त्रार्थ विमर्श: क्विप् प्रत्यय के दो रहस्यमयी प्रश्नों का समाधान 🤔
प्रश्न 1. जब क्विप् का सर्वापहार लोप हो जाता है, तब इससे निष्पन्न शब्द के बारे में कैसे पता चलेगा कि यह क्विप् प्रत्यय से बना शब्द है?
💡 समाधान: पाणिनीय व्याकरण का एक अद्भुत नियम है— 'प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्' (१.१.६२)। इसका अर्थ है कि यदि प्रत्यय गायब भी हो जाए, तब भी उसके लक्षण (चिह्न) धातु के स्वरूप में दिखाई देते हैं। क्विप् प्रत्यय लगने पर धातु के आदि स्वर को न तो गुण होता है और न वृद्धि, परन्तु धातु के अंतिम व्यंजन वर्णों में विशेष परिवर्तन (जैसे— चर्त्व, जश्त्व या तुक्-आगम) साफ़ दिखाई देते हैं। यही वर्ण-परिवर्तन चिल्ला-चिल्लाकर बताते हैं कि यहाँ क्विप् प्रत्यय का ही चमत्कार हुआ है!
प्रश्न 2. जब पूरे क्विप् का लोप हो ही जाता है और 'इन्द्रजित्' जैसे शब्द सीधे धातु से ही बन सकते थे, तो इस प्रत्यय को करने का लाभ क्या है?
💡 समाधान: संस्कृत शास्त्र में बिना प्रत्यय के कोई भी धातु 'पद' या 'प्रातिपदिक' (Noun) नहीं बन सकती ('नापदं शास्त्रीयमुपेक्षितव्यम्')। जब तक धातु से 'क्विप्' प्रत्यय नहीं किया जाएगा, तब तक उसे 'प्रातिपदिक संज्ञा' (शब्द का दर्जा) प्राप्त नहीं होगी। प्रातिपदिक संज्ञा न होने से उसके पीछे सु, औ, जस् आदि विभक्तियाँ नहीं आ सकतीं और वाक्य में उसका प्रयोग असम्भव हो जाएगा। इसके अतिरिक्त, क्विप् प्रत्यय 'क्' (कित्) और 'प्' (पित्) होने के कारण धातु के पीछे 'ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्' सूत्र से नित्य 'तुक्' (त्) का आगम कराता है, जिससे इन्द्र + जि + त् = इन्द्रजित् जैसा शुद्ध रूप सिद्ध होता है। अतः क्विप् प्रत्यय अदृश्य होकर भी अपना पूरा काम नित्य करता है!
⚡ क्विप् प्रत्यय: "स्मार्ट सूत्र पॉकेट" ⚡
नियम 1 (सर्वापहार लोप): प्रत्यय का शून्य (0) शेष
क्विप् में से 'क्' की लशक्वतद्धिते से, 'व्' की वेरपृक्तस्य से, 'इ' की उपदेशेऽजनुनासिक से और 'प्' की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होकर लोप होता है। अर्थात् प्रत्यय का कुछ भी शेष नहीं बचता, सब कुछ विलीन हो जाता है।
नियम 2 (अंतिम वर्ण विकार): कुत्व, चर्त्व और तुक् आगम
प्रत्यय विलीन होने पर धातु के अंतिम व्यंजन को पाणिनीय संधिनियमों के अनुसार विशेष आदेश होते हैं; जैसे— च/ज को क/ग (कुत्व), तथा ह्रस्व स्वरान्त धातुओं को नित्य तकार 'त्' (तुक्) आगम।
📋 क्विप् प्रत्यय से निष्पन्न प्रमुख प्रातिपदिक एवं सुबन्त रूप
उपपद + धातु + क्विप् प्रक्रिया सुबन्त रूप
[प्रथमा विभक्ति एकवचन]
व्यावहारिक अर्थ एवं विग्रह
द्यु + √सद् + क्विप् (0) द्युसत् / द्युसद् स्वर्ग में बैठने वाला (देवता)
(विग्रह: द्युवि सीदति इति - चर्त्व विधान)
प्र + √सू + क्विप् (0) प्रसूः संतान उत्पन्न करने वाली (माता)
(विग्रह: प्रसूते इति - दीर्घान्त रूप)
√द्विष् + क्विप् (0) द्विट् / द्विद् शत्रुता करने वाला (शत्रु)
(विग्रह: द्वेष्टि इति - षकार को डत्व-चर्त्व)
मित्र + √द्रुह् + क्विप् (0) मित्रधुक् / मित्रधुग् मित्र से द्रोह करने वाला कपटी
(विग्रह: मित्रे द्रुह्यति इति - घत्व-चर्त्व)
गो + √दुह् + क्विप् (0) गोधुक् / गोधुग् गौ को दुहने वाला (ग्वाला)
(विग्रह: गां दोग्धि इति - घत्व-चर्त्व)
अश्व + √युज् + क्विप् (0) अश्वयुक् / अश्वयुग् घोड़ों को रथ में जोड़ने वाला सारथी
(विग्रह: अश्वान् युनक्ति इति - कुत्व संधि)
वेद + √विद् + क्विप् (0) वेदवित् / वेदविद् वेदों को जानने वाला (विद्वान्)
(विग्रह: वेदान् वेत्ति इति - दकार को चर्त्व)
गोत्र + √भिद् + क्विप् (0) गोत्रभित् पर्वतों के पंख भेदने वाला (इन्द्र)
(विग्रह: गोत्रं भिनत्ति इति)
पक्ष + √छिद् + क्विप् (0) पक्षच्छित् पंखों को काटने वाला
(विग्रह: पक्षान् छिनत्ति इति - श्चुत्व संधि कार्य)
इन्द्र + √जि + क्विप् (0) इन्द्रजित् इन्द्र को जीतने वाला (मेघनाद)
(विग्रह: इन्द्रं जयति इति - नित्य तुक् आगम)
सम् + √राज् + क्विप् (0) सम्राट् / सम्राड् चक्रवर्ती राजा (सुशोभित होने वाला)
(विग्रह: सम्यक् राजते इति - मोऽनुस्वार अपवाद नियम)
📌 नियम २: √कृ धातु के पूर्व सु, कर्म, पाप आदि उपपद रहने पर विधान (सूत्र: सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः)
विशेष नियम: यदि √कृ (कृञ् करणे) धातु से पहले सु, कर्म, पाप, मन्त्र तथा पुण्य शब्दों का प्रयोग कर्म (उपपद) के रूप में हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'क्विप्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। ह्रस्व स्वरान्त 'कृ' धातु और पित्-कृत प्रत्यय होने से यहाँ भी 'ह्रस्वस्य पिति कृति तुक्' सूत्र से नित्य तुक् (त्) का आगम होता है।
सु + √कृ + क्विप् (0) सुकृत् (लौकिक विग्रह: सुष्ठु करोति इति)
कर्म + √कृ + क्विप् (0) कर्मकृत् (लौकिक विग्रह: कर्म करोति इति)
पाप + √कृ + क्विप् (0) पापकृत् (लौकिक विग्रह: पापं करोति इति)
मन्त्र + √कृ + क्विप् (0) मन्त्रकृत् (लौकिक विग्रह: मन्त्रं करोति इति)
पुण्य + √कृ + क्विप् (0) पुण्यकृत् (लौकिक विग्रह: पुण्यं करोति इति)
📌 नियम ३: √हन् धातु के पूर्व ब्रह्म, भ्रूण तथा वृत्र उपपद रहने पर विधान (सूत्र: ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप्)
विशेष नियम: यदि √हन् (हन् हिंसागत्योः) धातु से पहले ब्रह्म, भ्रूण तथा वृत्र शब्दों का प्रयोग कर्म (उपपद) के रूप में हुआ हो, तो कर्तृवाचक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'क्विप्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। इस विशिष्ट प्रक्रिया में क्विप् परे होने पर उपधा भूत मकार/नकार के विशेष लोप तथा दीर्घ सन्धि कार्य पाणिनीय नियमों से सिद्ध होते हैं।
ब्रह्म + √हन् + क्विप् (0) ब्रह्महा (लौकिक विग्रह: ब्रह्म हन्ति इति)
भ्रूण + √हन् + क्विप् (0) भ्रूणहा (लौकिक विग्रह: भ्रूणं हन्ति इति)
वृत्र + √हन् + क्विप् (0) वृत्रहा (लौकिक विग्रह: वृत्रं हन्ति इति)

✨ नई विधा: भावार्थक प्रत्यय प्रकरण ✨

📌 भावार्थक प्रत्यय की प्रामाणिक परिभाषा (Concept of Bhava Suffixes)

धातु के अर्थ की सिद्धि होने पर उसे 'भाव' कहा जाता है तथा इस भाव की अभिव्यक्ति (अर्थात् क्रिया के मूल व्यापार या भाववाचक संज्ञा रूप को प्रकट करने) के लिए जिन प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें ही व्याकरण में भावार्थक प्रत्यय कहते हैं। इनसे बनने वाले शब्द वाक्य में क्रिया के नाम (Abstract Noun) का कार्य करते हैं।

इस प्रकरण के अंतर्गत हम भाव अर्थ में प्रयुक्त होने वाले निम्नलिखित प्रमुख प्रत्ययों का क्रमानुसार विशिष्ट अध्ययन करेंगे:

१. घञ्
२. ल्युट्
३. क्तिन्
४. अच्
५. अप्
६. नङ्
७. युच्

💡 आइए, इस विधा की शुरुआत इसके सबसे प्रमुख और व्यावहारिक प्रत्यय 'घञ्' के नियमों और सूत्रों से करते हैं...

धातु के अर्थ की सिद्धि होने पर भाव कहा जाता है तथा भाव की अभिव्यक्ति के लिए जिन प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। उन्हें भावार्थक प्रत्यय कहते हैं। इनमें घञ्, ल्युट्, क्तिन्, अच्, अप्, नङ् और युच् प्रमुख प्रत्यय हैं । 

✨ २७ एवं २८. घञ् और ल्युट् प्रत्यय (पाठ ३७) ✨

धातु के अर्थ को बताने के लिए तथा कर्ता को छोड़कर अन्य कारक के अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए 'घञ्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं।

(१) घञ् में '' और 'ञ्' की क्रमशः 'लशक्वतद्धिते' तथा 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, शेष बचता है- '' 'ञ्' इत् होने के कारण धातु की उपधा के अ को आ, इ को ए, उ को ओ तथा ऋ को अर् गुण आदेश हो जाता है तथा धातु के अन्तिम इ ई उ ऊ और ऋ ॠ को वृद्धि आदेश (ऐ, औ और आर) हो जाते हैं। घञ् प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग होते हैं। घ् इत् होने के कारण धातु के च् को कृ तथा ज् को ग् आदेश हो जाता है। जैसे- चि + घञ् = काय, नि+घञ् = नायः प्र + स्तु + घञ् = प्रस्तावः भू + घञ् = भाव, √पठ् + घञ् = पाठः, √लिख्+ पञ्लेख रध् + घञ् रोधः, वि + रुध् + घञ् = विरोध, अव + तृ + घञ् = अवतारः, उप + कृ घञ् = उपकार, वि + कृ + घञ् = विकारः प्र + कृ + घञ् = प्रकार, √पच् + घञ् = पाकः, √त्यज् + घञ् = त्यागः, √शुच् + घञ् = शोक, √भुज् + घञ् = भोगः, √युज् + घञ् = योगः, √रुज् + घञ् = रोगः, √भज् + घञ् = भागः, सिच् + घञ् = सेकः । = + 

ल्युट् 

धातुओं में नपुंसकलिङ्ग की भाववाचक संज्ञा बनाने के लिए 'क्त' और 'ल्युट्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। ल्युट् के प्रारम्भ में स्थित 'ल्' की 'लशक्वतद्धिते' से तथा अन्तिम '' की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है तथा अवशिष्ट 'यु' को 'युवोरनाको' सूत्र से 'अन' आदेश होता है। यहाँ ध्यान रहे '' हलन्त नहीं होता। जैसे- पठ् + ल्युट् (अन) = पठनम्, √हस् + ल्युट् (अन) = हसनम्, गम् ल्युट् (अन) + = गमनम्, √क्रीड् + ल्युट् (अन) = क्रीडनम्, √चल् + ल्युट्(अन) = चलनम्, √धाव् + ल्युट् (अन) = धावनम्, √वद् + ल्युट् (अन) वदनम्, √लिख्+ल्युट् (अन) = लेखनम्, √कृ + ल्युट् (अन) = करणम्, √दृश् + ल्युट् (अन) ल्युट् (अन) दर्शनम्।

✨ २९, ३० एवं ३१. क्तिन्, अच् और अप् प्रत्यय (पाठ ३८) ✨

स्त्रीलिङ्ग भाववाचक शब्द बनाने के लिए धातुओं में 'क्तिन' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। 'क्तिन्' में 'क्' और 'न्' की क्रमश: 'लशक्वतद्धिते' तथा हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, शेष बचता है- 'ति'। क्तिन् प्रत्ययान्त शब्दों के रूप 'मति' के समान चलते हैं। जैसे- कृ + क्तिन् = कृतिः, √धृ + क्तिन् = धृतिः, √चि + क्तिन् = चितिः, √स्तु + क्तिन् = स्तुतिः, √गा + क्तिन् गीतिः, √वच् + क्तिन् = उक्तिः, √ हृ क्तिन् - हृतिः, √प्री + क्तिन् प्रीतिः, √ख्या + क्तिन् ख्यातिः, √सुप् + क्तिन् सुप्तिः। 

अच्

ह्रस्व इ तथा दीर्घ ईकारान्त धातुओं से भाववाचक शब्द बनाने के लिए 'अच्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। 'अच्' में च्' की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, शेष बचता है ''। भाववाचक 'अच्' प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग और नपुंकलिङ्ग दोनों होते हैं, जैसे- जि + अच् जयः (पुल्लिंग), √नी + अच्नयः (पुल्लिंग), √भी + अच् = भयम् (नपुंसकलिङ्ग)

अप्

(१) ऋकारान्त और उकारान्त धातुओं में भाववाचक शब्द बनाने के लिए 'अप्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। अप् के अन्तिम् 'प्' की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, शेष '' बचता है। अप् प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिंग होते हैं। जैसे + अप् करः (बिखेरना), कृ+ यु [ + अप्= यवः (जोड़ना), √स्तु + अप्स्तवः (स्तुति) भू + अप्= भवः (होना) गृ+ अप्= गरः (विष) लू + अप्लवः (काटना) पू + अप् = पवः (पवित्र करना) (२) ग्रह, √वृ, √दृ, निस् + चि, √गम्, √वश् और चरण धातुओं में भी भावार्थक शब्द बनाने के लिए 'अप्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं जैसे- ग्रह + अप् = ग्रहः, √वृ + अप् = वरः, √दृ + अप् = दरः निस् + चि + अप् = निश्चयः, √गम् + + अप् गमः, √वश् + अप्वशः, √रण् + अप्रणः ।

✨ ३२, ३३ एवं ३४. नङ्, युच् और षाकन् प्रत्यय (पाठ ३९) ✨

यज्, याच्, यत्, विच्छ् (चमकना), प्रच्छ और रस् धातुओं में भाववाचक शब्द बनाने के लिए 'नङ्' प्रत्यय का प्रयोग करते हैं। '' के '' की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है, शेष '' बचता है। जैसे यज् + नङ् = यज्ञः, √याच् + नङ् = याच्या, √यत् + नङ् = यत्नः, विच्छ् + नङ् = विश्नः, √प्रच्छ् + नङ् = प्रश्नः, √रव् + नङ् = रक्षणः।

युच्

प्रेरणार्थक धातुओं में एवं आस्, श्रन्थ्, घट्ट, वन्द्, विद् धातुओं से भावार्थक शब्द बनाने के लिए 'युच्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इस प्रत्यय से युक्त शब्द स्त्रीलिंग होते हैं। युच्' के अन्तिम च् की 'हलन्त्यम्' से इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है तथा 'युवोरनाकौ' से शेष 'यु' को 'अन' आदेश हो जाता है। जैसे- कृ + णिच् + युच् + टाप् कारणा, √हृ + णिच् + युच् + टाप् हारणा, आस् +युच् + टाप् आसना, √वन्द् + युच् + टाप् वन्दना, विद्+ = युच् + टाप् वेदना । 

(ए) शील-धर्म-साधुकारिता वाचक- किसी भी धातु के बाद शील, धर्म तथा भलीप्रकार सम्पादन करना इन तीनों में से किसी भी एक अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए षाकन्, इष्णुच् तथा आलुच् प्रत्ययों का प्रयोग करते हैं। 

षाकन् प्रत्यय

📌 प्रधान सूत्र: "जल्पभिक्षुकुट्टलुण्टवृङःषाकन्" (अष्टाध्यायी - ३/२/१५५)
💡 सरल नियम और अर्थ:
पिछले प्रत्ययों के समान ही 'शील' (वैसा स्वभाव होना), 'धर्म' (वैसा गुण होना) अथवा 'साधुकारिता' (किसी कार्य को बहुत अच्छे या उचित ढंग से करने वाला) का अर्थ प्रकट करने के लिए विशिष्ट धातुओं (जल्प, भिक्ष, कुट्ट, लुण्ट, वृङ्) के बाद 'षाकन्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
🧪 वर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया (अनुबन्ध लोप):
  • षाकन् प्रत्यय के प्रारम्भ में स्थित 'ष्' की 'षः प्रत्ययस्य' सूत्र से 'इत्' संज्ञा होती है तथा अंतिम वर्ण 'न्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से 'इत्' संज्ञा होती है। इसके बाद इन दोनों वर्णों का लोप (हटना) हो जाता है।
  • दोनों वर्णों के हटने के बाद प्रत्यय में से केवल 'आक' भाग शेष बचता है, जिसे धातु के साथ सीधे जोड़ दिया जाता है।

📋 प्रमुख धातुओं के साथ उदाहरण:

१. √जल्प (बहुत बोलना/बड़बड़ाना) + षाकन् = जल्पाकः (बहुत अधिक या निरन्तर बोलने के स्वभाव वाला/वाचाल)
२. √भिक्ष (भीख माँगना) + षाकन् = भिक्षाकः (भिक्षा माँगने के स्वभाव वाला/भिखारी)
३. √कुट्ट (अलग करना/काटना/टुकड़े करना) + षाकन् = कुट्टाकः (काटने या टुकड़े करने के स्वभाव वाला)
४. √लुण्ट (लूटना) + षाकन् = लुण्टाकः (लूटने के स्वभाव वाला/लुटेरा)
५. √वृ (वरण करना/चुनना) + षाकन् = वराकः (वरण करने योग्य/दीन/बेचारा - यहाँ धातु के स्वर को नियमानुसार विशेष कार्य होता है)
📝 शब्द रूप (वाक्य प्रयोग):
षाकन् प्रत्यय से बनने वाले शब्द भी वाक्य में विशेषण का कार्य करते हैं। इसके रूप पुल्लिंग में 'राम' शब्द के समान, स्त्रीलिंग में 'रमा' (या टाप् प्रत्यय के नियमों के अनुसार) और नपुंसकलिंग में 'फल' के समान चलते हैं (जैसे प्रथमा विभक्ति एकवचन पुल्लिंग में विसर्ग लगकर— जल्पाकः, भिक्षाकः, वराकः आदि पद बनते हैं)।

✨ ३५ एवं ३६. इष्णुच् और आलुच् प्रत्यय (पाठ ४२) ✨

📌 प्रधान सूत्र: "अलङ्कृञ्निराकृञ्प्रजन्युत्पच्युत्पत्युन्मदरुच्यपत्रपवृवृधुसहचरिष्णुच्" (अष्टाध्यायी - ३/२/१३६)

💡 सरल नियम और अर्थ:
जब हमें किसी धातु से 'शील' (वैसा स्वभाव होना), 'धर्म' (वैसा गुण होना) अथवा 'भलीप्रकार सम्पादन करना' (किसी कार्य को बहुत अच्छे से करने वाला) का अर्थ प्रकट करना हो, तब धातु के बाद 'इष्णुच्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
🧪 वर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया (अनुबन्ध लोप):
  • इष्णुच् प्रत्यय के अंतिम वर्ण 'च' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से 'इत्' संज्ञा होती है और उसका लोप (हटना) हो जाता है।
  • इत्संज्ञा होने के बाद प्रत्यय में से केवल 'इष्णु' भाग शेष बचता है, जिसे धातु के साथ सीधे जोड़ दिया जाता है।
  • गुण नियम: यदि धातु के उपधा (अंतिम वर्ण से ठीक पहले वाले स्वर) या अंत में इ, उ, ऋ हो, तो उसे नियमानुसार 'गुण' आदेश हो जाता है (जैसे— रुच् का रोचिष्णुः, वृत् का वर्तिष्णुः)। [1]

📋 प्रमुख धातुओं के साथ उदाहरण:

१. अलम् + कृ (सजाना/भूषित करना) + इष्णुच् = अलङ्करिष्णुः (सजावट करने के स्वभाव वाला)
२. निर् + आ + कृ (तिरस्कार/अपमान करना) + इष्णुच् = निराकरिष्णुः (अपमान करने के स्वभाव वाला)
३. प्र + जन् (उत्पन्न होना/पैदा होना) + इष्णुच् = प्रजनिष्णुः (उत्पन्न करने के स्वभाव वाला)
४. उत् + पच् (उबलना/पकना) + इष्णुच् = उत्पचिष्णुः (उबलने वाला)
५. उत् + पत् (उड़ना/ऊपर जाना) + इष्णुच् = उत्पतिष्णुः (उड़ने या ऊपर जाने के स्वभाव वाला)
६. उत् + मद् (मत्त होना/पागल होना) + इष्णुच् = उन्मदिष्णुः (नशे में चूर्ण या पागल होने के स्वभाव वाला - यहाँ म् के योग से त् का न् सन्धि कार्य हुआ है)
७. रुच् (अच्छा लगना/चमकना) + इष्णुच् = रोचिष्णुः (चमकने वाला या सुन्दर दिखने वाला - उ को गुण ओ हुआ)
८. अप + त्रप् (लज्जित होना/शर्माना) + इष्णुच् = अपत्रपिष्णुः (लज्जाशील या शर्माने वाला)
९. वृत् (होना/बने रहना) + इष्णुच् = वर्तिष्णुः (बढ़ने या आगे रहने के स्वभाव वाला - ऋ को गुण अर् हुआ)
१०. वृध् (बढ़ना) + इष्णुच् = वर्धिष्णुः (निरन्तर प्रगति या तरक्की करने वाला - ऋ को गुण अर् हुआ)
११. सह (सहन करना) + इष्णुच् = सहिष्णुः (सहनशील या धैर्य रखने वाला)
१२. चर् (चलना/घूमना) + इष्णुच् = चरिष्णुः (भ्रमणशील या लगातार चलने वाला)
📝 शब्द रूप (वाक्य प्रयोग):
इष्णुच् प्रत्यय से बनने वाले शब्द वाक्य में विशेषण का कार्य करते हैं। इसके रूप पुल्लिंग में 'गुरु' या 'भानु' शब्द के समान चलते हैं (जैसे प्रथमा विभक्ति एकवचन में विसर्ग लगकर— सहिष्णुः, चरिष्णुः आदि पद बनते हैं)।

आलुच् प्रत्यय
📌 प्रधान सूत्र: "स्पृहिगृहिपतिदयिनिद्रातन्द्राश्रद्धाभ्यआलुच्" (अष्टाध्यायी - ३/२/१५८)
💡 सरल नियम और अर्थ:
पिछले प्रत्यय (इष्णुच्) के समान ही 'शील' (वैसा स्वभाव होना), 'धर्म' (वैसा गुण होना) अथवा 'भलीप्रकार सम्पादन करना' का अर्थ प्रकट करने के लिए विशिष्ट धातुओं (स्पृह, गृह, पत्, दय्, शी) तथा कुछ विशिष्ट प्रातिपदिक शब्दों (निद्रा, तन्द्रा, श्रद्धा) के बाद 'आलुच्' प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।
🧪 वर्ण परिवर्तन की प्रक्रिया (अनुबन्ध लोप):
  • आलुच् प्रत्यय के अंतिम वर्ण 'च्' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से 'इत्' संज्ञा होती है और उसका लोप (हटना) हो जाता है।
  • इत्संज्ञा होने के बाद प्रत्यय में से केवल 'आलु' भाग शेष बचता है, जिसे प्रकृति (धातु या शब्द) के साथ सीधे जोड़ दिया जाता है।
  • चुरादिगण की धातुओं (जैसे— स्पृह, गृह) में आया हुआ 'अय' प्रत्यय भाग 'आलु' जुड़ने पर भी बना रहता है (जैसे— स्पृह् + अय + आलु = स्पृहयालु)।


📋 प्रमुख धातुओं एवं शब्दों के साथ उदाहरण:

१. √स्पृह् (चाहना/इच्छा करना) + आलुच् = स्पृहयालुः (इच्छा या चाहत रखने के स्वभाव वाला)
२. √गृह् (पकड़ना/ग्रहण करना) + आलुच् = गृहयालुः (ग्रहण करने के स्वभाव वाला)
३. √पत् (गिरना) + आलुच् = पतयालुः (गिरने के स्वभाव वाला)
४. √दय् (दया करना) + आलुच् = दयालुः (दया करने के स्वभाव वाला/कृपालु)
5. √शी (सोना) + आलुच् = शयालुः (अधिक सोने के स्वभाव वाला/नींद की प्रवृत्ति वाला - यहाँ इकार को गुण 'ए' और फिर अय् आदेश हुआ है)
६. निद्रा (नींद - शब्द) + आलुच् = निद्रालुः (बहुत अधिक नींद के स्वभाव वाला/सोने का शौकीन)
७. तन्द्रा (आलस्य - शब्द) + आलुच् = तन्द्रालुः (आलसी स्वभाव वाला या सुस्ती से भरा हुआ)
८. श्रद्धा (आदर/विश्वास - शब्द) + आलुच् = श्रद्धालुः (आदर या अटूट विश्वास रखने के स्वभाव वाला - मूल पाठ में 'श्रद्धातुः' की जगह व्याकरण सम्मत शुद्ध रूप 'श्रद्धालुः' होगा)
📝 शब्द रूप (वाक्य प्रयोग):
आलुच् प्रत्यय से बनने वाले शब्द भी वाक्य में विशेषण का कार्य करते हैं। इसके रूप पुल्लिंग में 'गुरु' या 'भानु' शब्द के समान चलते हैं (जैसे प्रथमा विभक्ति एकवचन में विसर्ग लगकर— दयालुः, श्रद्धालुः, निद्रालुः आदि पद बनते हैं)।

12 टिप्‍पणियां:

  1. सम्मानीय, आपके ब्लॉग से मुझे संस्कृत के किसी भी टॉपिक को समझने में बहुत मदद मिली. प्रिंट की सुविधा होती तो सरल हो जाता. पर इतने के लिए भी साधुवाद.
    शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. यहाँ सामग्री में निरन्तर परिवर्तन होता है। अभी सभी पाठ लिखा नहीं जा सका। आपसे अनुरोध है कि आप ऑनलाइन पढ़ते रहें। जब सभी पाठ पूर्ण हो जायेंगें उसके बाद इसका पीडीएफ डाउनलोड मीनू बटन में दे दिया जाएगा।

      हटाएं
  2. महोदय बहुत ही अच्छी जानकारी दी है। साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  3. अति उत्तम आपका ह्रदय पूवॅक धन्यवाद
    आपको शत् शत् प्रणाम

    जवाब देंहटाएं
  4. मुझे णिच् के वर्तमान काल के प्रत्यय मिल सकते है करता?

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. णिच्‌ प्रत्यय का प्रयोग दो अर्थों में होता है। स्वार्थ में तथा प्रेरणा देने के अर्थ में। मैंने संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 https://sanskritbhasi.blogspot.com/p/2.html में चुरादि गण में होने वाले णिच्‌ प्रत्यय के बारे में चर्चा की है। उसका उदाहरण- चोरयति, क्षालयति, प्रेषयति, कथयति आदि है। इस णिच् प्रत्यय का वही अर्थ है, जो धातु का होता है। अर्थात् यह स्वार्थ में णिच् प्रत्यय किया गया है। इस णिच् का धातु से अलग कोई भी अर्थ नही है।
      दूरसा णिच् प्रेरणार्थक है। जब कर्ता किसी क्रिया को करने के लिए अन्य को प्रेरित करता है तब उस क्रिया को प्रेरणार्थक क्रिया कहते है। प्रेरणार्थक क्रिया का उदाहरण – रामः अध्यापेन बालकं पाठयति। यहाँ राम बालक को पढ़ाने के लिए अध्यापक को प्रेरित कर रहा है। याद ऱखें- प्रेरणार्थक वाक्यों में दो कर्ता होते हैं। एक प्रेरणा देने वाला (प्रयोजक), दूसरा क्रिया करने वाला (प्रयोज्य) । जब सकर्मक क्रिया होती है तब प्रयोज्य में तृतीया विभक्ति होती है और प्रयोजक में प्रथमा विभक्ति जैसे - रामः अध्यापेन बालकं पाठयति । यहाँ राम प्रेरित कर रहा है अतः यह प्रयोजक है। इसमें प्रथमा विभक्ति हुई तथा जिसे काम करने के लिए प्रेरणा दी जा रही हो वह प्रयोज्य होता है। इसमें तृतीया विभक्ति होती है। इसके लिए पाणिनि का एक सूत्र है- तत्प्रयोजको हेतुश्च - प्रेरणार्थक में धातु के आगे णिच् प्रत्यय का प्रयोग होता है। अधिक जानकारी के लिए इस लिंक पर जायें-
      https://sanskritbhasi.blogspot.com/2018/09/blog-post_26.html
      गम् - गमयति । दम् - दमयति । नम् - नमयति । व्यथ् – व्यथयति
      व्यथ् - व्यथयति । त्वर् - त्वरयति । रम् - रमयति । शम् - शमयति । घट - घटयति

      हटाएं
    2. कृपया उक्त्वा या उक्तवान्.... की प्रक्रिया बता दें... कैसे यह सिद्ध होगा।

      हटाएं
  5. अभी आज ही कृदन्त का पाठ पढ़ना प्रारम्भ किया है। मेरी आयु ७० वर्ष है। सेवा निवृत्ति के पिछले दश वर्षों से लगातार पढ़ रहा हूँ। आपके ब्लॉग से बहुत सहयोग मिल रहा है। पाठ पूरा करने पर पुनः टिप्पणी करूँगा। आप संस्कृत भाषा की जो सेवा कर रहे हैं, वह अप्रतिम है। एतदर्थ साधुवाद।

    जवाब देंहटाएं
  6. महोदय कृपया यह बताने का कष्ट करें कि पूर्व कृदंत और उत्तर कृदंत प्रकरण रचने की आवश्यकता क्यों पड़ी या इन में मूल अंतर क्या है

    जवाब देंहटाएं
  7. शक् + णिनि क्या शाकिन् होगा?

    जवाब देंहटाएं

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