लघुसिद्धान्तकौमुदी (द्वन्द्व-समासः)

                          अथ द्वन्‍द्वः



द्वन्द्व समास के लिए एक ही सूत्र है- चार्थे द्वन्द्वः। इस समास में समस्यमान पद प्रायः प्रथमान्त ही होते हैं और कहीं कहीं अन्य विभक्तियाँ भी हो सकती हैं किन्तु प्रथमान्त में ही समास अधिक प्रचलित है।
९८८ चार्थे द्वन्‍द्वः

अनेकं सुबन्‍तं चार्थे वर्तमानं वा समस्‍यते स द्वन्‍द्वः । समुच्‍चयान्‍वाचयेत रेतरयोगसमाहाराश्‍चार्थाः । तत्र ‘ईश्वरं गुरुं च भजस्‍व’ इति परस्‍परनिरपेक्षस्‍यानेक स्‍यैकस्‍मिन्नन्‍वयः समुच्‍चयः । ‘भिक्षामट गां चानय’ इत्‍यन्‍यतरस्‍यानुषङि्गकत्‍वेन अन्‍वयो ऽन्‍वाचयः । अनयोरसामथ्‍र्यात्‍समासो न । ‘धवखदिरौ छिन्‍धि’ इति मिलितानामन्‍वय इतरेतरयोगः । ‘संज्ञापरिभाषम्’ इति समूहः समाहारः ।।
चकार के अर्थ में अनेक सुबन्तों का समास होता है और उसकी द्वन्द्वसंज्ञा होती है।
 चार्थे द्वन्द्वः में पठित च इस निपात के 4 अर्थ है।
1.समुच्चय 2. अन्वाचय 3. इतरेतरयोग और 4. समाहार ।
समुच्चय- जब परस्पर (एक दूसरे से) निरपेक्ष अनेक पद किसी एक पद में अन्वित होते हैं तो उसे समुच्चय नामक चार्थ कहा जाता है। जैसे- ईश्वरं गुरुं च भजस्व यहाँ ईश्वर और गुरू दोनों परस्पर निरपेक्ष हैं। इन दोनों का भजन क्रिया के साथ अन्वय हो रहा है । अतः यहाँ पर समुच्चय नामक चार्थ है।
अन्वाचयः- जिनका समुच्चय हो रहा हो, ऐसे पदार्थो में एक का गौणरूप से अन्वय हो, तब उसे अन्वाचय नामक चार्थ कहा जाता है। जैसे भिक्षाम् अट गां चानयइस वाक्य में भिक्षार्थ अटन अनिवार्य है और गाय को लाना आनुषंगिक (गौण) कर्म है। इस लिए यह अन्वाचय है।
इतरेतरयोग- जब दो या अधिक पदार्थ परस्पर में मिलकर आगे अन्वित होते हैं, तब उसे इतरेतरयोग चार्थ कहा जाता है। जैसे- धवखदिरौ छिन्धि। यहाँ पर धव और खदिर दोनों मिलकर छिन्धि क्रिया में अन्वित हो जाते हैं। यह इतरेयोग है।

समाहार- समूह का नाम समाहार है। इतरेयोग की तरह इसमें पदार्थों का अन्य पदार्थ के साथ पृथक् – पृथक् अन्वय नहीं होता अपितु समूहात्मक अर्थ का अन्वय होता है। उसे समाहार नामक चार्थ कहा जाता है। जैसे- सञ्ज्ञापरिभाषम्। सञ्ज्ञा और परिभाषा का समूह। संज्ञा च परिभाषा च अनयोः समाहारः में चार्थे द्वन्द्वः से समास हुआ। प्रातिपदिकसंज्ञा, सु का लुक्, संज्ञापरिभाषा बना। समाहार होने पर स नपुंसकम् से नपुंसकलिंग और समूहार्थ के एक होने से एकवचन मात्र होता है। सु विभक्ति करके ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य से परिभाषा के आकार को ह्रस्व करने पर संज्ञापरिभाष बना। सु के स्थान पर अम् आदेश, पूर्वरूप करने पर सञ्ज्ञापरिभाषम् बना। 

९८९ राजदन्‍तादिषु परम्

एषु पूर्वप्रयोगार्हं परं स्‍यात् । दन्‍तानां राजानो राजदन्‍ताः । 

(धर्मादिष्‍वनियमः)
 । अर्थधर्मौ । धर्मार्थावित्‍यादि ।।

९९० द्वन्‍द्वे घि

द्वन्‍द्वे घिसंज्ञं पूर्वं स्‍यात् । हरिश्‍च हरश्‍च हरिहरौ ।।

९९१ अजाद्यदन्‍तम्

द्वन्‍द्वे पूर्वं स्‍यात् । ईशकृष्‍णौ ।।

९९२ अल्‍पाच्‍तरम्

शिवकेशवौ ।।

९९३ पिता मात्रा

मात्रा सहोक्तौ पिता वा शिष्‍यते । माता च पिता च पितरौमातापितरौ वा ।।

९९४ द्वन्‍द्वश्‍च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम्

एषां द्वन्‍द्व एकवत् । पाणिपादम् । मार्दङि्गकवैणविकम् । रथिकाश्वारोहम् ।।

९९५ द्वन्‍द्वाच्‍चुदषहान्‍तात्‍समाहारे

चवर्गान्‍ताद्दषहान्‍ताच्‍च द्वन्‍द्वाट्टच् स्‍यात्‍समाहारे । वाक् च त्‍वक् च वाक्‍त्‍वचम् । त्‍वक्‍स्रजम् । शमीदृषदम् । वाक्‍त्‍विषम् । छत्रोपानहम् । समाहारे किम् ? प्रावृट्शरदौ ।।

इति द्वन्‍द्वः ।। ५ ।।
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