स्मृति ग्रन्थों में आचरण की व्यवस्था (तृतीय अध्याय) व्यक्तिगत आचरण

1. विशिष्ट आचरण
2. आपद्धर्म आचरण

व्यक्तिगत आचार भी मानव जीवन का महत्त्वपूर्ण अग् है। चारों वर्णों के व्यक्तिगत आचार भी होते हैं। स्मृति ग्रन्थों में मानव के व्यक्तिगत आचार पर पूर्णरूप दृष्टिपात किया गया है।
व्यक्तिगत आचार के अन्तर्गत आचार के दो प्रकार के रूप दृष्टिगोचर होते हैं - 1. विशिष्ट आचार 2. आपद्धर्म आचार

1. विशिष्ट आचार

          विशिष्ट आचार का तात्पर्य कुछ विशेष आचार से है। उदाहरण के लिए ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र के अपने कुछ विशेष कर्म होते हैं जिनके कारण चारों वर्ण एक दूसरे से पृथक अपनी एक अलग पहचान रखते हैं। मनुष्य को कभी भी धर्म से च्युत नहीं होना चाहिए। मनुष्य को सदा अपने धर्म में रत रहना चाहिए अपितु दूसरे धर्म से निकृष्ट होने पर भी अपने धर्म को श्रेष्ठ मानकर उसका आचरण करना चाहिए।
ब्राह्मण के विशिष्ट आचार - ब्राह्मण शूद्र के राज्य में निवास करने का निषेध करे। अधार्मिक लोगों के निवासभूत, पाखण्डी-समूहों से व्याप्त तथा चाण्डाल आदि से सर्वत्र भरे हुए ग्राम में निवास न करे।
मेधातिथि के अनुसार जिस राज्य का राजा, सेनापति, मन्त्री, राष्ट्र, कोश,दण्ड तथा कौर मित्र शूद्र हो वहां निवास नहीं करना चाहिए।
शूद्र को इष्टार्थक उपदेश, उच्छिष्ट (झूठा), यज्ञ कर्म से बचा हुआ हविष्य, धर्म तथा व्रत ( प्रायश्चित्त) का उपदेश साक्षात् न दें।
अंग्रिा के अनुसार ब्राह्मण को मध्य में करके शूद्र के लिये ( प्रायश्चित्त) धर्मोपदेश, इष्टार्थोपदेश करें।  मनु ने असेवक शूद्र को देने का निषेध किया है किन्तु जो शूद्र सेवक है उसको झूठा अन्न, पुराने वस्त्र, अन्नों के पुआल, तथा पुराने खाट बर्तन आदि ब्राह्मण को देने की आज्ञा दी है।
ब्राह्मण को दान लेने में ‘‘धर्मयुक्तविधि (ग्राह्य देवता, प्रतिगृहमंत्र आदि) को बिना जाने भूख से पीडि़त होते हुए भी, बुद्धिमान ब्राह्मण दान न ले।’’  याज्ञवल्क्य भी किसी दूसरे से धन का निषेध करते हैं - ‘‘अपने स्वाध्याय के विरोधियों से धन अर्जित करने की इच्छा न करे, इधर-उधर अविचारित स्थान से या (अपने कर्म के) विरूद्ध कार्य (जैसे - नृत्य-गीत आदि) द्वारा धन कमाने की अभिलाषा न रखे। सदैव सन्तोष रखे।  भूख से व्याकुल होने पर राजा, अन्तेवासी तथा यज्ञ कराने योग्य व्यक्ति से धन प्राप्ति की इच्छा करे, अपितु अहंकारी, संशय की दृष्टि रखने वाले, पाखंडी तथा बगुलाभगत के निकट (धन की इच्छा) से न जावे।  जो ब्राह्मण दान लेने में समर्थ होकर भी दान नहीं लेता है उसको दानशीलों के समान लोक मिलता है।
ब्राह्मण अबध्य, अदण्डनीय थे। उनका बहिष्कार भी नहीं किया जाता था किन्तु यह नियम केवल शास्त्रज्ञ सदाचारी ब्राह्मण के लिये था, सम्पूर्ण वर्ण के लिए नहीं। ब्राह्मण को दण्डस्वरूप मुण्डन करा देने की प्रथा थी  क्योंकि ब्राह्मण का मुण्डन कराना प्राणदण्ड देने के समान है। राजा समस्त पाप करने वाले ब्राह्मण का वध कभी न करे, किन्तु सम्पूर्ण धन के साथ अक्षत शरीर वाले ब्राह्मण को राज्य से निर्वासित कर दे।  याज्ञवल्क्य के अनुसार कूटसाक्षी ब्राह्मण भी झूठ बोले तो राज्य से निष्कासित करें।
क्षत्रिय का विशिष्ट आचार - क्षत्रिय को उचित है कि ब्याज लेने के लिए कभी किसी को ऋण न दें, किन्तु धर्मकार्य के लिये वे लोग हीन कर्मवालों को थोड़े ब्याज पर ऋण दे सकते है।ं  प्रजा का पालन करना क्षत्रिय का प्रधान कर्म है।  यदि क्षत्रिय (कलियुग) में खेती करे तो वह भी देवता तथा ब्राह्मणों को भाग दें।

2. आपद्धर्म आचार

          आपत्ति काल में किये गये आचार को आपद्धर्म आचार कहते हैं। मनुष्य के जीवन में समय-समय पर बदलाव आते रहते हैं। कभी-कभी वो विषम परिस्थितियों में फंसकर अपने गुणकर्मों का निर्वाह नहीं कर पाता किन्तु जीविका चलाने के लिए उसे निरन्तर प्रयत्नशील रहना पड़ता है अतः विद्वानों ने मनुष्य की परिस्थिति को समझते हुए आपत्ति-काल में फंसे हुए मानव को अपने धर्म से कुछ छूट प्रदान करते हुए उसे अन्य आचार का पालन करने की आज्ञा प्रदान करते हैं। ऐसी स्थिति में वर्ण विशेष के सदस्य निम्न वर्ग के आचार को पालन कर सकते हैं।
ब्राह्मण - मनु ने ब्राह्मण को शूद्र के पकान्न को खाने का निषेध किया है किन्तु खाने के लिये दूसरा अन्न नहीं रहने पर शूद्र से एक रात भोजन करने योग्य कच्चे अन्न को लें।  ब्राह्मण यदि अपने कर्म से जीवन निर्वाह नहीं कर सके तो क्षत्रिय का कर्म करता हुआ जीवन निर्वाह करे, क्योंकि वह क्षत्रिय कर्म उस (ब्राह्मण कर्म) का समीपवर्ती है।  ब्राह्मण तथा क्षत्रियकर्म से जीवन निर्वाह नहीं कर पाये तो वह वैश्य के कर्म खेती, गोपालन तथा व्यापार से जीविका चलाये।  ब्राह्मण अथवा क्षत्रिय वैश्यवृत्ति, कृषि कर्म (खेती) प्रयत्नपूर्वक छोड़ दें।
सब रस, पकान्न, तिल, पत्थर, नमक, पशु तथा मनुष्य (दास-दासी) को आपत्तिकाल में ब्राह्मण क्षत्रिय नहीं बेचे।  जल, शस्त्र (सब प्रकार का हथियार या लोहा), विष, मांस, सोम नामक लतर, सर्वविष ग्रन्थ (कर्पूर, कस्तूरी आदि), दूध, मधु (शहद), दही, घी, तेल, मोम, गुड़ तथा कुशा (को आपत्तिकाल में भी ब्राह्मण-क्षत्रिय नहीं बेचे।  सब प्रकार के जंगली (हाथी आदि) पशु, दांतवाले (सिंह, बाघ, चित्ता, कुत्ता आदि) पशु, पक्षी, जलजन्तु (मछली, मगर, कच्छप आदि), मदिरा, नील, लाख (चपड़ा लाही), एक खुरवाले (घोड़ा आदि पशु) को (आपत्तिकाल में पड़ा हुआ भी ब्राह्मण-क्षत्रिय नहीं बेचे।)  (आपत्ति में पड़ने के कारण) कृषि (द्वारा जीविका निर्वाह) करने वाला (ब्राह्मण-क्षत्रिय) खेत में स्वयं तिलों को पैदा करके दूसरे पदार्थों के साथ मिलकर (लाभार्थ) बहुत समय तक नहीं रखकर धर्म (यज्ञ-हवन) आदि के लिए बेच दें।  आपत्ति में पड़ा हुआ ब्राह्मण सबसे (नीचे से भी) दान ग्रहण करे।  उसी प्रकार निन्दितों (अनधिकारियों) को पढ़ाने, यज्ञ कराने तथा उनका दिया हुआ दान लेने से आपत्तिकाल में पड़े हुए ब्राह्मण को दोष नहीं लगता।  संकट में प्राण होने की स्थिति में ब्राह्मण आदि किसी का भी अन्न ले सकता है इससे उसको पाप नहीं लगता है।  जीविका निर्वाह नहीं होने से आपत्ति में पड़े हुए ब्राह्मण को यदि नीचों को अध्यापन तथा यज्ञ कराने से भी जीवन निर्वाह नहीं हो सके तभी उसे उन नीचों से प्रतिग्रह लेना चाहिये।
क्षत्रिय - क्षत्रिय विपत्तिकाल में वैश्य कर्म से जीवन निर्वाह करे, किन्तु ब्राह्मण की श्रेष्ठवृत्ति (अध्यापन, यज्ञ कराना तथा दान देना) को कदापि न स्वीकार करे।  मनु ने ब्राह्मण के समान क्षत्रिय के भी आपद्धर्म आचार कहे गये है किन्तु याज्ञवल्क्य ने जूठा मद्य बेचने का भी निषेध किया गया है। याज्ञवल्क्य ने धर्मार्थ (औषधादिकार्यार्थ) तिल के बराबर धान्य लेकर तिल बेचना उचित मानते हैं।
वैश्य - वैश्य भी आपत्तिकाल में स्वधर्म का त्याग कर अन्य वर्णों की वृत्ति से जीवन निर्वाह कर सकता है। विष्णु के अनुसार वैश्य यदि अपने विहित कर्मों के द्वारा जीविकोपार्जन करने में असमर्थ हो तो शिल्पकारी, चित्रकारी आदि के द्वारा जीवन-यापन कर सकता है।
       वसिष्ठ के अनुसार अपनी रक्षा के लिए तथा जब वर्णों की शुद्धि समाप्त हो रही हो तो वैश्य को शस्त्र उठाना चाहिए।  मनु के अनुसार किसी भी परिस्थिति में वैश्य के लिए ब्राह्मण के कर्मों (वेदाध्यापन, यज्ञ कराना तथा दान लेना) वर्जित है।  मनु के अनुसार आपत्तिकाल में उसे द्विजातियों की सेवा तथा जूठन आदि खाये बिना शुद्ध वृत्ति से अपना जीवन-यापन करना चाहिए तथा आपत्तिकाल समाप्त हो जाने पर शूद्र कर्म से निवृत्त हो जाना चाहिए।
शूद्र - आपत्तिकाल में द्विजों की भांति शूद्रों को भी अन्य कार्य करने की अनुमति प्रदान की है। मनु के अनुसार यदि शूद्र द्विजातियों की सेवा करने में असमर्थ है तथा अपने परिवार का पालन-पोषण नहीं कर सकता है ऐसी अवस्था में वह सूप आदि बनाने का कार्य करे।  आपत्ति में पड़ा हुआ शूद्र बढ़ई तथा चित्रकारी के कार्यों को करे।  याज्ञवल्क्य के अनुसार वाणिज्य का कार्य भी कर सकता है अथवा द्विजातियों के अनुकूल आचरण करते हुए अनेक प्रकार के शिल्पों का निर्वाह करे।  संकटकाल में शूद्र क्षत्रियवृत्ति को अपना सकता है।  किन्तु नारद ने भी कहा है कि शूद्र द्वारा अपनायी छात्रवृत्ति को उत्कृष्ट नहीं माना जा सकता है अर्थात् शूद्र को क्षत्रिय का कार्य करते समय यह विचार नहीं करना चाहिए कि वह द्विजातियों के समान हो गया है।
आपद्धर्म के विषय में याज्ञवल्क्य मनु से कुछ उदार प्रतीत होते हैं। पराशर याज्ञवल्क्य से भी उदार है तथा नारद पराशर से भी अत्यधिक उदार है। याज्ञवल्क्य ने आपद्धर्म के विवेचन में मनु का ही अनुसरण किया है, तथापि कहीं-कहीं उनका विचार मनु से भिन्न प्रतीत होता है। पराशर देशभंग, प्रवास, व्याधि, विपत्ति तथा असमर्थता की अवस्था में सरल या कठोर धर्म का पालन कर प्राण रक्षा करना आपद्धर्म मानते हैं।
अतः आपत्तिकाल बीत जाने पर वह अपनी शास्त्रोक्त शुद्धि कर ले तथा शौच तथा आचार का पालन करें।

इस प्रकार स्मृतियों ने मानव के विपत्तिकाल में होने पर कुछ ढील प्रदान की तथा व्यक्तिगत आचार के महत्त्व को प्रतिपादित किया।
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