संस्कृत भाषा और छन्दोबद्धता

       संस्कृत भाषा को छन्दोबद्ध करने का श्रेय महर्षि वाल्मीकि को जाता है। संस्कृत भाषा को दो विभागों में विभक्त किया जाता है। 1-वैदिक संस्कृत 2-लौकिक संस्कृत। वैदिक संस्कृत को भी छन्दोबद्ध किया गया। शास्त्रीय ग्रन्थों की रचना सूत्र रुप में कर उसकी व्याख्या की परम्परा रही है। शास्त्रों से जनसामान्य का विशेष सरोकार नहीं रहा है। काव्य, व्याकरण, दर्शन, आदि विषयों के ग्रन्थ सू़त्रात्मक है तो जन सामान्य के लिए उपयोगी शास्त्र जैसे धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ, ज्योतिष आदि के शास्त्रीय ग्रन्थ भी श्लोकबद्ध (अनेक छन्दों में रचित कविता जिसमें गेयात्मता या लयात्मकता होती है) किये गये।
          आखिर कुछ साहित्य श्लोकबद्ध तो कुछ गद्य युक्त क्यों रहें। क्या ग्रन्थों को कालक्रमिक विकास के कारण ऐसा कुछ हुआ जैसे कि इतिहासविद् सूत्रकाल आदि द्वारा उसका विभाग करते है या अन्य भी कुछ? मेरा मानना है कि कुछ सीमा तक शास्त्रों के रचनाओं को हम कालखण्ड में बांटकर सूत्र गद्य श्लोक आदि अलग-अलग विधा पर रचना को स्वीकार कर सकते हैं परन्तु या पूर्णतः सत्य नहीं है
     मैंने संस्कृत रचनाओं का दो विभाग किया है। 1. आम जन के लिए की गयी रचनाएं श्लोकबद्ध 2. बुद्विजीवियों के लिए उपयोगी रचनाएं गद्य युक्त। ये परवर्ती काल में भी शास्त्रीय ग्रन्थ और उस पर भाष्य, टीका परम्परा गद्य रुप में ही पातें है यथा ब्रहम्सूत्र, उपनिषद् के भाष्य।
          इसके पीछे श्रुति परम्परा महत्वपूर्ण कारक रहा है। लयात्मक (छन्दोबद्ध) रचना को याद रखना सहज होता है। स्मृति संरक्षण हेतु आम जन के योग्य ग्रन्थ के श्लोकबद्ध करने की परम्परा चल पड़ी। जबकि गद्य युक्त ग्रन्थ सन्दर्भ प्रधान होते थे उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ विद्वानों के बीच चर्चा किये जाने वाले इन शास्त्रों को कण्ठस्थ करना उतना आवश्यक नहीं था। वहीं जब से विद्वान् जन समूह के बीच अपनी बात रखते थे तो वह छन्दोवद्ध होता था। जैसे जगन्नाथ। रस गंगाधर या प्रौढ़ मनोरमा की टीका गद्य युक्त है तो गंगालहरी पद्य युक्त।
          याद रखने आम जन के बीच उसे उद्धत करने हेतु, छन्दोबद्ध श्लोक उदाहरण स्वरुप रखे जाते थे। यही कारण रहा होगा छन्दोबद्ध ग्रन्थ सृजन के पीछे।
          सर्वप्रथम अनुष्टुप छन्द में काव्य सर्जना शुरु हुई। जहाँ इस छन्द में कवि अपने भावों को अभिव्यक्त करने में कठिनाई महसूस किया दूसरे प्रकार के छन्द उपस्थित हुए। गेयात्मा बनी रही। इतिहास तथा धार्मिक ग्रन्थ श्लोकबद्ध रचित हुए।
          पुराणों की रचना करते करते महर्षि व्यास में विचारों की बाढ़ सी आ गयी होगी। सभी प्रकार के छन्दों को आजमाने के बाद भी वे अपनी बात रखने में असमर्थ हो गये होंगें। व्यास की पौढ़ और अंतिम रचना भागवत मानी जाती है यहाँ अन्ततः उन्हे अपनी बात गद्य में रखनी पड़ी। क्लिष्ट संस्कृत या पौढ़ संस्कृत कादम्बरी में देखने को मिलता है जो बाण की रचना है। श्री हर्ष की रचना नैषधीय चरितम् में भी प्रौढ़ भाषा का प्रयोग किया गया। कारण शब्दों की व्यंजकता, अर्थगाम्भीर्य। इस प्रकार के ग्रन्थ अपने पाण्डित्य को प्रदर्शित करने या बुद्विजीवियों के बीच खुद को स्थापित करने के होड़ में लिखे गये। इस प्रकार के ग्रन्थों की भाषा आम जन जल्द समझ नहीं पाते और इसके बाद संस्कृत आम जन से दूर होता चला गया।
          कण्ठस्थी में सुलभता, जल्द याद हो जाना गेयात्मा आदि गुणों के कारण जिस लौकिक छन्दोबद्ध कविता को लवकुश ने गा गाकर आम जन तक पहुँचाया। जिसे छन्दोबद्ध कर कवि वाल्मीकि ने इसे सरल स्वरुप प्रदान किया। वही संस्कृत बौद्धिकता के बोझ तले दबकर कुछ लोगों के बीच सिमटकर रह गया।

          पंचतंत्र में भी कहानियों की चासनी में पिरोकर जिस नीति को कहा गया वह छन्दोबद्ध था। जीवनोपयोगी संदेश को वाचिक परम्परा में जीवित रखने हेतु छन्दों का सहारा लिया गया। इससे यह सन्देश वाचिक परम्परा में रहते हुए जन सामान्य के बीच उद्धृत होते रहे।
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